कविता - इंदिरा तेरी तानाशाही जुल्मों का इतिहास बन गई



सत्ता के लिए जुल्मों का आपातकाल लगाया,
लोकतंत्र की हत्या की और संविधान को बदलवाया,
इंदिरा तेरी तानाशाही जुल्मों का इतिहास बन गई,
यह काला कालखंड फिर न आये, यह सतर्कता आगाज बन गई।

जब सच बोलना अपराध बना, कलमों पर पहरे बिठाए गए,
जनमत के मंदिर सूने कर, असहमति के स्वर दबाए गए।
जेलों में लोकतंत्र बंद था, सत्ता का अहंकार जवान था,
भारत माता का प्रत्येक पुत्र तब अन्याय से हैरान था।

मीसा की जंजीरों में लाखों सपनों को जकड़ा गया,
निर्दोषों को अपराधी कहकर कारागारों में पकड़ा गया।
न्यायालय की राहें रोकीं, अधिकारों पर ताले जड़े,
स्वतंत्रता के दीप बुझाकर भय के अंधियारे गढ़े।

नसबंदी के नाम पर मानवता का अपमान हुआ,
गरीब, किसान और मजदूरों पर निर्मम अत्याचार हुआ।
आँसू, पीड़ा, चीखें, करुणा सब सत्ता के शोर में खो गईं,
लोकतंत्र की पावन मर्यादाएँ राजनीति की भेंट हो गईं।

लेकिन भारत झुका नहीं, जनमन का विश्वास जगा,
अंधकार के उस युग के विरुद्ध स्वतंत्रता का प्रकाश जगा।
जनता ने मत की शक्ति से तानाशाही को उत्तर दिया,
लोकशक्ति ने सिंहासन से अहंकार का मुकुट लिया।

इसलिए इतिहास याद रखो, यह केवल बीता काल नहीं,
लोकतंत्र की रक्षा का यह साधारण कोई सवाल नहीं।
जब-जब राष्ट्रघात उठे , जनता को सजग हो जाना है,
संविधान और स्वतंत्रता की रक्षा हेतु आगे आना है।

आपातकाल की पीड़ा हमको हर पीढ़ी तक पहुँचानी है,
स्वतंत्र भारत की चेतना को हर मन में फिर जगानी है।
बलिदानों से मिली आज़ादी का सम्मान बना रहना चाहिए,
भारत में फिर कभी आपातकाल न आना चाहिए।


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