भारत का बड़ा भू-भाग बचाने वाले : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी



भारत का बड़ा भू-भाग बचाने वाले : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

राष्ट्रहित के अमर संघर्ष और वर्तमान भारत में उनकी प्रासंगिकता

जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है।
जो कश्मीर हमारा है, वह सारे का सारा है।।

भारत के स्वतंत्रता-उपरांत राजनीतिक इतिहास में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम राष्ट्र की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक के रूप में लिया जाता है। उन्होंने न केवल विभाजन के समय बंगाल और पंजाब के बड़े भूभाग को भारत में बनाए रखने के लिए निर्णायक भूमिका निभाई, बल्कि जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण एकीकरण के प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बनाया। आंदोलन करते हुये अपने प्राणों का बलिदान किया। यही बलिदान दिवस 23 जून है।

23 जून को उनकी पुण्यतिथि तथा 6 जुलाई को उनकी जयंती के अवसर पर राष्ट्र उनके योगदान को स्मरण करता है। स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक वर्षों में राष्ट्रीय एकता के लिए संघर्ष करते हुए प्राणों का बलिदान देने वाले वे प्रमुख राजनीतिक नेताओं में गिने जाते हैं।

जन्म, शिक्षा और प्रारंभिक जीवन

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी प्रसिद्ध शिक्षाविद्, न्यायविद् और कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे। माता का नाम योगमाया देवी था।

उन्होंने अंग्रेजी और बंगला साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा बाद में इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर बने। मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा उपकुलपति बने। शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

राजनीति में प्रवेश

1929 में वे बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए। प्रारंभ में कांग्रेस से जुड़े, किन्तु बाद में वैचारिक मतभेदों के कारण स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका में सक्रिय हुए। 1939 में वे हिन्दू महासभा से जुड़े और उसके अखिल भारतीय उपाध्यक्ष बने।

1941 में बंगाल सरकार में वित्त मंत्री बने, परंतु ब्रिटिश नीतियों के विरोध में उन्होंने पद छोड़ दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध और ब्रिटिश शासन के दौरान उन्होंने भारतीय हितों की मुखर पैरवी की।

विभाजन के समय ऐतिहासिक भूमिका

1946-47 में जब भारत के विभाजन का प्रश्न सामने आया, तब मुस्लिम लीग सम्पूर्ण पंजाब और बंगाल को पाकिस्तान में शामिल करने की मांग कर रही थी। डॉ. मुखर्जी ने बंगाल के हिन्दू-बहुल क्षेत्रों को भारत में बनाए रखने के लिए व्यापक जनमत तैयार किया।

उनके नेतृत्व में चले आंदोलन और राजनीतिक प्रयासों के परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा बना। इसी प्रकार पंजाब के विभाजन में भी भारत के हितों की रक्षा हेतु जनदबाव निर्मित हुआ। इस दृष्टि से अनेक राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि ये प्रयास नहीं हुए होते, तो भारत का भूगोल आज भिन्न हो सकता था।

स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में भूमिका

15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत की प्रथम सरकार में उन्हें उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया गया। उन्होंने औद्योगिक विकास की आधारभूत योजनाओं को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।

1950 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों और नेहरू-लियाकत समझौते को लेकर असहमति जताते हुए उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

भारतीय जनसंघ की स्थापना

21 अक्टूबर 1951 को डॉ. मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। यही संगठन आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में विकसित हुआ। वे इसके प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।

उनकी राजनीति का मुख्य आधार था—

- राष्ट्र की अखंडता
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
- लोकतांत्रिक व्यवस्था
- समान नागरिक अधिकार
- राष्ट्रीय एकीकरण

जम्मू-कश्मीर और अनुच्छेद 370 के विरुद्ध आंदोलन

स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के अंतर्गत विशेष दर्जा दिया गया था। अनुच्छेद 370 के कारण राज्य का अलग संविधान, अलग ध्वज अलग प्रधानमंत्री तथा कुछ विशेष संवैधानिक व्यवस्थाएँ थीं।

डॉ. मुखर्जी का मानना था कि एक राष्ट्र में अलग-अलग संवैधानिक व्यवस्थाएँ राष्ट्रीय एकता के अनुकूल नहीं हैं। उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया—

"एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे।"

1953 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट व्यवस्था का विरोध करते हुए राज्य में प्रवेश किया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हिरासत के दौरान 23 जून 1953 को रहस्यमयी पारिस्थियों में उनका निधन हो गया। माना जाता है कि यह उनकी सुनियोजित हत्या थी।

उनकी मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक विवाद और प्रश्न उठते रहे, किंतु आज भी यह भारतीय राजनीति के चर्चित अध्यायों में से एक है।

संविधान सभा में प्रभावशाली भूमिका

संविधान सभा की बहसों में डॉ. मुखर्जी ने राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र और स्वाधीन भारत की संप्रभुता के पक्ष में सशक्त विचार रखे। उन्होंने ब्रिटिश नीति की आलोचना करते हुए भारतीयों से स्वयं अपने भविष्य का निर्माण करने का आह्वान किया।

उनके भाषणों में राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वैचारिक निकटता

डॉ. मुखर्जी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तथा द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर से संपर्क रहा। वे व्यापक राष्ट्रवादी राजनीतिक संगठन के निर्माण के पक्षधर थे। भारतीय जनसंघ के गठन में संघ के अनेक स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2019 : अनुच्छेद 370 का निरसन

5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त कर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया। साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया गया।

भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों ने इसे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के लंबे समय से व्यक्त लक्ष्य की पूर्ति बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में हुए इस निर्णय को राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना गया।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य

आज जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान पूर्ण रूप से लागू है। अनेक केंद्रीय कानून, आरक्षण संबंधी प्रावधान, महिला अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़े कानून अब वहाँ प्रभावी हैं।

साथ ही, लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत विधानसभा चुनावों तथा विकास परियोजनाओं के माध्यम से क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति और 2019 के निर्णय पर राजनीतिक मतभेद आज भी मौजूद हैं, फिर भी यह निर्विवाद है कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

निष्कर्ष

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन राष्ट्र की एकता, सांस्कृतिक चेतना और लोकतांत्रिक संघर्ष का प्रतीक है। शिक्षा, राजनीति, संविधान निर्माण, विभाजन कालीन भारत की रक्षा और जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर उनके योगदान ने उन्हें आधुनिक भारत के प्रमुख राष्ट्रनायकों की श्रेणी में स्थापित किया है।

उनकी पुण्यतिथि पर राष्ट्र कृतज्ञतापूर्वक उन्हें नमन करता है और उनके इस संदेश को स्मरण करता है कि भारत की अखंडता और राष्ट्रीय एकता सर्वोपरि है।


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