ड़ा मुखर्जी का यह बलिदान दिवस, महानायक को विशिष्ट श्रद्धांजलि प्रस्तुत करता है dr Mukhrji
ड़ा मुखर्जी का यह बलिदान दिवस, महानायक को विशिष्ट श्रद्धांजलि प्रस्तुत करता है
जब हम "भारत माता की जय" और "वन्दे मातरम्" का उद्घोष करते हैं, तब हम भारतीय राष्ट्रवाद की उस महान धारा से जुड़ते हैं, जिसका उद्गम बंगाल की सांस्कृतिक चेतना में हुआ था। "वन्दे मातरम्" की रचना महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में की थी। यही गीत आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणास्रोत बना और अंग्रेजों द्वारा किए गए बंग-भंग के विरोध आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की। अंततः जनशक्ति के आगे ब्रिटिश सरकार को बंग-भंग का निर्णय वापस लेना पड़ा।
बंगाल केवल "वन्दे मातरम्" की भूमि ही नहीं है, बल्कि यह स्वामी विवेकानंद की कर्मभूमि भी है, जिन्होंने आधुनिक विश्व को सनातन भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक दर्शन का परिचय कराया। यही भूमि नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे प्रखर राष्ट्रवादी नेता को देश को देने वाली भूमि है। इसी बंगाल ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महान राष्ट्रनायक को जन्म दिया।
राष्ट्रवादी विचारधारा के विकास में बंगाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तथा द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ के विद्यार्थी जीवन पर भी बंगाल की राष्ट्रवादी चेतना का प्रभाव माना जाता है। भारतीय जनसंघ की प्रारंभिक राजनीतिक यात्रा में भी बंगाल का विशेष योगदान रहा। जनसंघ की प्रथम लोकसभा में प्राप्त तीन सीटों में से दो पश्चिम बंगाल से और एक राजस्थान के चित्तौड़ क्षेत्र से थी।
आज जब भारतीय जनता पार्टी, जो भारतीय जनसंघ का वर्तमान स्वरूप है, पश्चिम बंगाल में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित है, तब यह राष्ट्रवादी विचारधारा की दीर्घ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव प्रतीत होता है। अनेक कार्यकर्ताओं और समर्थकों की दृष्टि में बंगाल में भाजपा का विस्तार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों को मिली एक महत्वपूर्ण राजनीतिक स्वीकृति के रूप में देखा जाता है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अत्यंत विद्वान, शिक्षाविद् और दूरदर्शी राजनेता थे। वे राष्ट्रहित के प्रश्नों पर सदैव स्पष्ट और निर्भीक रहे। भारत विभाजन के दौर में उन्होंने बंगाल के हिन्दू-बहुल क्षेत्रों को भारत में बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संघर्ष किया। उनके प्रयासों के कारण पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा बना और भारत का एक बड़ा भूभाग पाकिस्तान में जाने से बच सका।
स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष संवैधानिक व्यवस्था के विषय में भी उन्होंने स्पष्ट मत रखा। उनका मानना था कि एक राष्ट्र में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान की व्यवस्था राष्ट्रीय एकता के अनुरूप नहीं है। इसी विचार को लेकर उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व किया और अंततः जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के दौरान गिरफ्तार किए गए। 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान उनका निधन हो गया। उनके समर्थक इस बलिदान को भारत की एकता और अखंडता के लिए दिए गए सर्वोच्च राजनीतिक बलिदानों में से एक मानते हैं।
वर्ष 2019 में केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त किए जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों ने इसे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के लंबे संघर्ष की पूर्णता के रूप में देखा। उनके अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह वह ऐतिहासिक निर्णय था, जिसकी वैचारिक आधारशिला डॉ. मुखर्जी ने दशकों पहले रखी थी।
आज जम्मू-कश्मीर पूर्ण रूप से भारतीय संविधान के अंतर्गत संचालित हो रहा है। ऐसे समय में, जब डॉ. मुखर्जी के विचारों से प्रेरित राजनीतिक धारा राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखती है, उनका बलिदान दिवस और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और स्वाभिमान के लिए संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। उनके विचार, उनका साहस और उनका राष्ट्रसमर्पण आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करता रहेगा।
जब तक सूरज चाँद रहेगा,
अमर राष्ट्रवादी मुखर्जी का नाम रहेगा।
जय भारत! जय हिन्द!
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