कविता - संघ जिसे कहते हैं, वही बना था ईश्वर का अवतार

संघ जिसे कहते हैं, वही बना था ईश्वर का अवतार
-अरविन्द सिसोदिया 

विभाजन के कालखंड में सोया हुआ था शासन,
भुगत रहे थे आम हिंदू पाकिस्तानी दुशासन,
इतने सारे अत्याचारों पर भी मौन था नेतृत्व,
कैसी आज़ादी थी जिस पर लाखों निर्दोषों का हुआ नरसंहार।
पूछ रहा है वक़्त आज भी, क्यों उत्तर नहीं आपके पास !

जलती थीं बस्तियाँ, धधक रहे थे घर-आँगन,
चीखों से भर उठे थे गाँव, नगर और उपवन।
माताएँ खो बैठीं बेटे, बच्चे ढूँढ़ें अपना संसार,
रक्तरंजित धरती पूछ रही थी यह कैसा अत्याचार ।

रेलगाड़ियाँ चलती थीं बनकर मृत्यु का पैगाम,
हर डिब्बे में छिपा हुआ था बिछड़ने का अंजाम।
अपनों की लाशों पर रोता था सारा परिवार,
आँसू भी थक जाते थे देखकर ऐसा नरसंहार।

सीमाओं की रेखाओं ने कितने दिल तोड़ दिए,
सदियों के रिश्तों को पल भर में ही छोड़ दिए।
कल तक जो पड़ोसी थे, आज बने थे तलवार,
नफ़रत की आँधी में डूब गया था प्रेम अपार।

बहनों की अस्मिता पर होते थे निर्मम प्रहार,
मानवता के माथे पर लगते थे कलंक हजार।
करुण पुकारें गूँज रही थीं सिसकियाँ बारंबार,
फिर भी सत्ता के गलियारों में छाया था अंधकार।

शरणार्थी बन भटक रहे थे अपने ही देश के लोग,
सिर पर दुःख का आसमान, पैरों में संघर्ष के छाले ।
टूटी गठरी, सूनी आँखें, जीवन था लाचार,
फिर भी मन में बचा हुआ था अपने भारत से प्यार ।

इतिहास के उन पन्नों पर अब भी अंकित है वेदना,
लाखों बिछड़े, लाखों उजड़े, कैसी थी वह संवेदना ।
स्वतंत्रता का सूरज निकला, किंतु साथ था हाहाकार,
याद दिलाता है विभाजन का वह दर्दभरा संहार।

जब चारों ओर निराशा थी, टूट रहा था हर परिवार,
विस्थापन की अग्नि में जलता था जन-जन का संसार।
ऐसे घोर अंधकार समय में आशा का हुआ संचार,
सेवा, साहस और समर्पण बनकर पहुँचे स्वयंसेवक द्वार ।

संघ जिसे कहते हैं, वही बना था ईश्वर का अवतार,
आँसू पोंछे, भूख मिटाई, सिर को छाँव भी दिलवाई ।
बिछड़ों को अपनापन देकर जीवन का दीप जलाया,
निराश हृदयों में विश्वास और नव-साहस फिर जगाया।

यही स्वयंसेवक था जिसने आशा की ज्योति जलाई थी,
संकट की उस घड़ी में मानवता की लाज बचाई थी।
सब भूले हों चाहे लेकिन इतिहास रहा साक्षीदार,
वह कालखंड आज भी इन्हें करता है शत-शत नमस्कार।

आओ उन सबको नमन करें जो सेवा-पथ पर डटे रहे,
पीड़ा के महासागर में भी मानव धर्म निभाते रहे।
राष्ट्र स्मरण रखेगा उनका त्याग, तपस्या और उपकार,
जिनसे फिर मुस्काया जीवन, जिनसे जागा नव-संसार।

विभाजन की उस विभीषिका का स्मरण रहे हर बार,
स्वतंत्रता के संग जुड़ा था त्याग, तपस्या और बलिदान अपार।
जो बिछड़े, जो उजड़े, जो राष्ट्र हेतु हुए न्योछावर,
भारत उनकी अमर गाथा को कहेगा  बारंबार ।

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