कविता - आपातकाल का कलंक कहता...
आपातकाल का कलंक कहता...
- अरविन्द सिसोदिया
9414180151
आपातकाल का कलंक कहता,
कांग्रेस जिसे कहते वह संविधान की हत्यारी है,
अंग्रेजों जैसी अत्याचारी, मुस्लिम लीग सी विभाजनकारी है,
सत्ता के लिए दमन और हनन की खेलती पारी है।
आपातकाल का कलंक कहता...
=====1=====
पच्चीस जून की काली रात , लोकतंत्र पर छायी थी,
स्वतंत्रता की ज्योति बुझाने सत्तासीन इंदिरा स्वयं आयी थी।
निर्दोषों की गिरफ्तारियाँ,कलम पर पहरेदारी थी,
सत्य बोलना अपराध बना, जनता लाचार बेचारी थी।
आपातकाल का कलंक कहता...
=====2=====
जेलों में भर दिए गए थे जननायक और रखवाले,
लोकनायक के स्वर को रोका, बंद हुए सब उजियाले।
अटल, आडवाणी, जॉर्ज सहित कितनों की बारी थी,
लोहे की सलाखों के पीछे, बली लोकतंत्र की दी जाती थी।
आपातकाल का कलंक कहता...
=====3=====
अखबारों की हर पंक्ति पर शासन का पहरा बैठा था,
काला सच छुप जाता था और झूठ सुनहरा लगता था।
सेंसरशिप के तीखे पंजे, अभिव्यक्ति पर भारी थे,
जन-जन के अधिकार सभी तब सत्ता ने ही मारे थे।
आपातकाल का कलंक कहता...
=====4=====
नसबंदी के नाम चलाया भय और बल का अभियान,
गरीबों की पीड़ा सुनने को बहरे थे तब शासन के कान ।
आँसू, आहें, चीखें गूँजीं, जनता कितनी हारी थी,
मानवता भी रो पड़ी थी, कैसी वह लाचारी थी।
आपातकाल का कलंक कहता...
=====5=====
नाख़ून उखाड़े थानों में,नौजवानों पर जुल्मों की पहरेदारी थी,
कुंवारों की भी नसबंदी करदी, जल्लादी शैतानी थी।
बिना बात ही ढहा दिये चबूतरे और दीवारें,
निर्दोष देश पर कांग्रेस और इंदिरा के तेवर अत्याचारी थे।
आपातकाल का कलंक कहता...
=====6=====
संविधान की आत्मा घायल, अधिकारों पर प्रहार हुआ,
न्यायालय की शक्ति कुचली, जनमत का अपमान हुआ।
लोकतंत्र की पावन गंगा तब संकट में सारी थी,
सत्ता की अंधी चाहत ही उस युग की महामारी थी।
आपातकाल का कलंक कहता...
=====7=====
फिर जब जनता जाग उठी और मतदान का दिन आया,
सत्य-सूर्य ने अंधकार के हर बादल को दूर भगाया।
जनशक्ति ने सिंहासन को अपनी ताकत दिखलाई थी,
लोकतंत्र ने पुनः विजय की गौरवगाथा गाई थी।
आपातकाल का कलंक कहता...
=====8=====
इतिहास सदा चेतावनी देता, मत भूलो वह काला काल,
जब अधिकारों की रक्षा हेतु जन-जन बना था ढाल।
स्वतंत्रता की कीमत समझो, यह बलिदानों की क्यारी है,
लोकतंत्र की रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है।
आपातकाल का कलंक कहता,
=====9=====
कांग्रेस जिसे कहते वह संविधान की हत्यारी है,
अंग्रेजों जैसी अत्याचारी, मुस्लिम लीग सी विभाजनकारी है,
सत्ता के लिए दमन और हनन की खेलती पारी है।
आपातकाल का कलंक कहता...
=====समाप्त=====
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें