राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आपातकाल में भारत के लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए संघर्ष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आपातकाल में भारत के लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए संघर्ष - 25 जून 1975

इस इन्फोपैक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आपातकाल के विरोध तथा उसके निमित्त किए गए विभिन्न कार्यों का उल्लेख है। आपातकाल देश के संविधान और लोकतंत्र को बचाने तथा उसकी पुनः स्थापना का संघर्ष था, जिसमें सर्वाधिक योगदान संघ का रहा। इस इन्फोपैक में उससे जुड़े अनेक घटनाक्रमों और तथ्यों का भी उल्लेख किया गया है।

साथ ही, संघ के स्वयंसेवकों पर इंदिरा गाँधी सरकार द्वारा किए गए अत्याचारों और अमानवीय व्यवहार के कई उदाहरण भी इसमें शामिल किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, कई बार बालासाहब देवरस जी के पत्रों का उदाहरण देकर संघ पर कथित समझौते के बेबुनियाद आरोप लगाए जाते हैं, किंतु उन पत्रों की पृष्ठभूमि और तथ्यों का उल्लेख नहीं किया जाता। अतः इस इन्फोपैक में उस विषय की वास्तविकता भी तथ्यों के आधार पर स्पष्ट की गई है।

श्री बालासाहब देवरस जी के आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिखे गए पत्रों का सत्य

आपातकाल लागू होने के दो महीने बाद, बालासाहब ने इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि संघ पर लगाए गए सभी आरोप असत्य हैं और संघ पर लगा प्रतिबंध हटाने का अनुरोध किया।

उस पत्र का कोई उत्तर नहीं मिला। इसके लगभग तीन महीने बाद उन्होंने दूसरा पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने गांधीजी के निर्वाचन की वैधता सिद्ध होने पर उन्हें बधाई दी, साथ ही यह भी दोहराया कि समाज के उत्थान का कार्य आपसी विभाजन के वातावरण में नहीं किया जा सकता। उन्होंने पुनः आग्रह किया कि वे संघ के प्रति अपने पूर्वाग्रह त्यागें और प्रतिबंध हटा दें।

इसके अतिरिक्त दो अन्य पत्र विनोबा भावे को लिखे गए, जिनमें उनसे अनुरोध किया गया कि वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को वास्तविक स्थिति समझाएँ और संघ पर लगा प्रतिबंध हटवाने का प्रयास करें।

आपातकाल के दौरान और उसके बाद, भारतीय लोक दल (BLD) के कुछ सदस्यों ने इन लंबे पत्रों के केवल पहले और अंतिम अनुच्छेदों को प्रचारित किया, ताकि यह आभास दिया जा सके कि संघ ने “समझौता” कर लिया था।

कुछ लोगों ने बालासाहब जी द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके विवादास्पद निर्वाचन-वैधीकरण पर बधाई देने की आलोचना भी की। परंतु तथ्य यह है कि लोक संघर्ष समिति, जिसमें BLD भी सम्मिलित थी, पहले ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्वाचन की वैधता को स्वीकार कर चुकी थी और औपचारिक रूप से उनके इस्तीफे की मांग वापस ले चुकी थी। इसके अतिरिक्त, BLD ने संयुक्त रूप से चलाए जा रहे आंदोलन से एकतरफा हटने का प्रस्ताव भी पारित कर दिया था।

इन पत्रों को लिखने के कारण की व्याख्या करते हुए बालासाहब ने कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं था। उन्होंने कहा, “आपातकाल के सभी बंदियों में से अस्सी प्रतिशत संघ के स्वयंसेवक थे। क्या मेरा उनके और उनके परिवारों के प्रति कोई दायित्व नहीं था? यदि मैंने सम्मानजनक समाधान के लिए सरकार से संवाद स्थापित करने का प्रयास किया, तो उसमें गलत क्या था?”

तथ्य यह है कि महात्मा गांधी भी किसी आंदोलन की शुरुआत के तुरंत बाद वायसराय को पत्र लिखते थे, ताकि संवाद का मार्ग खुला रहे। भारत छोड़ो आंदोलन के समय तो उन्होंने जेल में जाने के एक सप्ताह के भीतर ही वायसराय को पत्र लिखा था।

इसी अवधि [आपातकाल] में संघ के सत्याग्रह की योजनाएँ अंतिम रूप ले रही थीं। बालासाहब जी का दूसरा पत्र 10 नवंबर 1975 का था, और केवल चार दिन बाद संघ ने ऐसा सत्याग्रह प्रारंभ किया जिसमें पूरे देश में 80,000 स्वयंसेवक जेल गए और जिसने आपातकालीन सरकार को झकझोर दिया।

स्पष्टतः बालासाहब किसी व्यक्ति या सिद्धांत से समझौता नहीं कर रहे थे। वे केवल सरकार को सम्मानजनक ढंग से पीछे हटने का अवसर दे रहे थे।

संघ की गतिविधियाँ

लोकतंत्र की पुनः स्थापना : आपात‌कालजन्य तानाशाही का विरोध करना संघ के लिए स्वाभाविक कर्तव्य ही बन गया था। संघ पर लगाया हुआ प्रतिबंध इसकी तुलना में एक छोटी बात थी। केवल प्रतिबंध हटाने का उद्देश्य आपातकाल में संघ नेतृत्व के सामने नहीं था, उद्देश्य था तानाशाही को हटाना। इसी कारण प्रतिबंध हटा लेने की दृष्टि के बाद में सरकार की ओर से जब सशर्त सुझाव आया, तब संघ नेतृत्त्व ने दृढ़ता के साथ उसको ठुकराया और निःसंदिग्ध शब्दों में सरकार को बताया कि संघ पर से प्रतिबंध हटता है या नहीं, यह हमारे लिए महत्व का प्रश्न नहीं है। महत्व का प्रश्न है लोकतंत्र की पुनः स्थापना का।

राजनैतिक स्थिति : लोक संघर्ष समिति ने सभी राजनीतिक दलों और सेवाव्रती संगठनों को इस संघर्ष में पूरी तरह भागीदार बनाने का भी प्रयास किया। कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर बाकी सभी दलों ने सत्याग्रह में यथाशक्ति सहभाग देने का वचन दिया। द्रमुक तमिलनाडु में सरकार चला रही थी। इसलिए उस पार्टी ने सत्याग्रह में प्रत्यक्ष रूप में अपने कार्यकर्ताओं को भेजने में असमर्थता प्रकट की। किन्तु उन्होंने अन्य सब प्रकार का सहयोग देने का आश्वासन दिया। संत विनोबा से भी अनुरोध किया गया। इस प्रकार सारे देश में सत्याग्रह के पक्ष में वातावरण बनने लगा। सत्याग्रह की तैयारी के अन्य पक्षों यथा, साहित्य-निर्माण, बंदी परिवारों की देखरेख, संपर्क-सूत्रों की व्यवस्था आदि का विशेष विवेचन भूमिगत पर्व के अन्तर्गत विस्तार से किया गया है।

संघ का दायित्व : आपातकाल की घोषणा के समय ही श्रीमती गांधी और लोकसंघर्ष समिति, दोनों को ही यह ठीक-ठीक पता था कि देशव्यापी संगठित प्रतिरोध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग और पूर्ण भागीदारी से ही संभव है। केवल जीवनमूल्यों की रक्षा और जनतंत्र की पुनःस्थापना के निःस्वार्थ उद्देश्यों से प्रेरित होकर उसी के कार्यकर्ता संघर्ष हेतु प्राणप्रण से जुट सकते हैं। अन्य राजनीतिक दलों के पास वह क्षमता और उस योग्यता का कार्यकर्ता समूह नहीं है। वे बड़े-बड़े आन्दोलन कर सकते हैं, किन्तु जनता या उसके किसी वर्ग के स्वार्थ को उभाड़ कर ही। तभी तो लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपनी गिरफ्तारी के पूर्व लोकसंघर्ष को चलाने का उत्तरदायित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता नानाजी देशमुख के कंधों पर सौंपा। संघ के प्रति पूर्वाग्रह रखनेवाले किसी नेता या दल ने इसका विरोध नहीं किया था। सबने उसे सहर्ष स्वीकारा था। इन्दिरा गांधी द्वारा किये गये अनर्गल प्रचार के बाद भी किसी ने इस नेतृत्व के औचित्य पर अंगुली नहीं उठायी थी। यही नहीं, नानाजी की गिरफ्तारी के बाद जब नेतृत्व का प्रश्न उपस्थित हुआ तब सभी दलों के नेताओं का यह आग्रह था कि चूँकि संघर्ष का मुख्य भार संघ को निभाना है इसलिए यह उत्तरदायित्व ऐसे व्यक्ति को सौंपना चाहिए जो संघ से जुड़ा हुआ हो।

लोक संघर्ष समिति में संघ के प्रमुख कार्यकर्ता और उनके कार्य

• संघ क्षेत्र का काम माधवराव जी के सहयोगी भाउराव देवरस तथा मोरोपंत पिंगले, आपातकाल के लिए नियुक्त संघ के विभिन्न स्तरीय अधिकारी, स्वयंसेवकों द्वारा संचालित जन-संगठनों के प्रमुख, लोक संघर्ष समिति के संचालन में सहभागी स्वयंसेवक, इसके अलावा विभिन्न मोर्चों के संगठक, सहायक या सम्पर्क प्रमुख के नाते कार्य संभालने वाले कार्यकर्ता।

• नागरिक स्वातंत्र्य के मोर्चे के लिए मा. रज्जू भय्या (प्रो. राजेन्द्र सिंह), आचार्य सम्मेलन के मोर्चे के लिए डॉ. आबा थत्ते, विदेशों में सम्पर्क के लिए बाला साहब भिड़े, चमनलाल जी, जगदीश मित्र सूद तथा केदारनाथ साहनी।

• राजनैतिक क्षेत्र के लिए रामभाउ गौड़-बोले, सुन्दर सिंह भण्डारी, ओम प्रकाश त्यागी तथा उत्तम राव पाटिल, कामनवैल्थ कान्फ्रेंस के लिए जगन्नाथ राव जोशी तथा सहयोगी सांसद।

• कानूनी मोर्चे के लिए डॉ. अप्पा घटाटे, साहित्य निर्माण के लिए दिल्ली में भानुप्रताप शुक्ल तथा वेद प्रकाश भाटिया, नागपुर में अनन्तराव गोखले, मधु लिमये।

• साहित्य प्रकाशन तथा दिल्ली केन्द्रित सम्पर्क के लिए बापूराव मोघे।

• धर्माचार्य सम्पर्क के लिए दादा साहब आप्टे।

• पत्र-पत्रिकाओं से सम्पर्क के लिए जदगीश प्रसाद माथुर।

• महिलाओं के लिए मौसी जी केलकर तथा राष्ट्र सेविका समिति की सेविकायें और इन उपरोक्त सभी के सहयोग के लिए अपनी जान हथेली पर रख कर दिन रात भाग दौड़ कर काम करने वाले हजारों कार्यकर्ता।

लोक संघर्ष समिति के अन्य प्रमुख नाम

• मोरारजी भाई और नानाजी देशमुख की गिरफ्तारी के पश्चात् लोकसंघर्ष समिति के द्वितीय मंत्री के नाते रवींद्र वर्मा ने तथा द्वितीय अध्यक्ष के नाते एस.एम. जोशी का किया हुआ कार्य और उनके व्यक्तिगत सचिव भोगीभाई की सेवाएं बहुत महत्त्वपूर्ण रहीं। नानासाहेब गोरे का किया हुआ प्रकट जन-जागरण और कर्पूरी ठाकुर तथा लोकनाथ जोशी का किया हुआ भूमिगत जन-जागरण, वैसे ही दिग्विजय नारायण सिंह, सुरेन्द्र मोहन, मोहन धारिया, तथा इरा चेजियन के प्रकट-अप्रकट प्रयास अपने-अपने स्तरों पर महत्त्वपूर्ण रहे। लोक संघर्ष समिति की अहिंसक भूमिका को अमान्यकर जॉर्ज फर्नांडिस ने बड़ौदा काण्ड के समान प्रयास किये और सी.जी.के. रेड्डी ने उनको साहसपूर्ण सहयोग दिया। केरल के कैथॉलिक चर्च के एम.एम. थॉमस ने आपात स्थिति विरोधी जन-शिक्षा का काम किया।

• प्रधानमंत्री को कितने ही विचारकों ने पत्र लिखे जैसे लोकनायक जयप्रकाश नारायण, श्री बालासाहब देवरस, श्रीमती कृष्णाबाई निबकर, पेजावर मठ के विश्वेशतीर्थ स्वामी जी, मधु लिमये आदि।

• सर्वोदय के नेताओं का योगदान अपने ढंग का रहा। उनमें प्रमुख थे, तथाकथित 'अनुशासन पर्व' को 'आतंकपर्व' घोषित करने वाले आचार्य दादा धर्माधिकारी, सर्वसेवासंघ के प्रमुख रा. कृ. पाटिल, सिद्धराज ढड्ढा, आचार्य राममूर्ति, जयप्रकाश जी के सचिव सच्चिदानंद और मित्र रमाकांत पांडेय, और इनके साथ तथा आचार्य विनोबाजी के साथ संपर्क रखने वाली पद्मश्री कमला ताई हॉस्पेट।

लोक संघर्ष समिति का उद्देश्य

लोकसंघर्ष समिति ने 15 जुलाई से 25 जलाई 1975 तक सांकेतिक सत्याग्रह करने का निर्णय लिया। इसके मोटे तौर पर तीन उद्देश्य थे :-

• पहला, शासन की मनस्थिति और तैयारी का आंकलन करना तथा उसे यह बता देना कि यदि वह तानाशाही की ओर बढ़ाये गये अपने कदमों को वापस नहीं लेता तो देशव्यापी प्रतिरोध होगा।

• दूसरा, निराशा और टूटे मनोबल वाले समाज में आशा और साहस का संचार करना तथा भावी व्यापक संघर्ष में समर्थन की मनोवैज्ञानिक भावभूमि तैयार करना। उसे प्रत्यक्ष अनुभव करा देना कि जनतांत्रिक शक्तियाँ मरी नहीं हैं, वे प्रतिप्रहार करने की स्थिति में हैं।

• तीसरा, जेल में बन्द लोगों के मनोबल को ऊँचा बनाये रखने के लिए उनके बीच में निर्भय सत्याग्रही लोगों को भेजकर यह अनुभव करा देना कि बाहर के लोग शान्त नहीं बैठे हैं। इस प्रकार समाज और कारागार स्थित लोगों के बीच संबंध प्रस्थापित करना।

स्वयंसेवकों की गिरफ्तारियां

4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल 1,30,000 सत्याग्रहियों में से 100000 से अधिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के थे। मीसा के अधीन जो 30,000 लोग बंदी बनाए गए, उनमे से 25000 से अधिक संघ-संवर्ग के थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांशतः बंदीग्रहों और कुछ बाहर आपातकाल के दौरान बलिदान हो गए। उनमे संघ के अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख श्री पांडुरंग क्षीरसागर भी थे।

(उपरोक्त संख्या संघ द्वारा बताई गयी है लेकिन संघ से बाहर की रिपोर्ट में भी संघ के स्वयंसेवकों के सर्वाधिक गिरफ्तारियों पर बताया गया है। हालाँकि, संख्या में थोडा-बहुत अंतर है लेकिन मोटे तौर पर संघ स्वयंसेवकों के योगदान, बलिदान और समर्पण को लेकर किसी के भी मन में कोई प्रश्न नहीं था। )

एक अन्य रिपोर्ट - The People Versus Emergency: A Saga of Struggle के अनुसार, आपातकाल के दौरान MISA के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की संख्या 23,015 थी, जिनमें 22,938 पुरुष एवं 77 महिला कार्यकर्ता शामिल थे। आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने के कारण गिरफ्तार किए गए संघ कार्यकर्ताओं की संख्या 44,965 थी, जबकि अन्य दलों के केवल 9,655 लोगों ने सत्याग्रह किया था।

विदर्भ एवं महाराष्ट्र : संघ ने अपनी संगठनात्मक व्यवस्था की दृष्टि से महाराष्ट्र राज्य को नागपुर, विदर्भ और महाराष्ट्र, इन तीन प्रांतों में बाँटा हुआ है। चूँकि लोक-संघर्ष का मुख्य उत्तरदायित्व संघ को ही निभाना था इसलिए लोक संघर्ष समिति ने संघर्ष चलाने हेतु इसी रचना को मान्य कर लिया था।

नागपुर और विदर्भ, दोनों को मिलाकर सत्याग्रह के दौरान कुल 2378 लोग गिरफ्तार हुए, जिनमें से 34 को छोड़ कर सभी संघ परिवार के थे। जिन 2044 कार्यकर्ताओं ने सत्याग्रह करके अपनी गिरफ्तारी दी उनमें 1767 पुरुष व 328 महिलाएं थीं। इस क्षेत्र के 166 गाँवों से आये सत्याग्रहियों ने 215 जत्थों में 69 केंद्रों पर सत्याग्रह कर अपनी गिरफ्तारी दी। सत्याग्रह सभी आठ जिलों में निरंतर चलता रहा।

इस संख्या में नागपुर नगर के 550 सत्याग्रही भी शामिल हैं। नागपुर में 45 जत्थों में 40 केंद्रों पर सत्याग्रह हुआ।

इंदिरा गांधी का निशाना : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

27 जून 1975 को श्रीमती गांधी ने केन्द्रीय सचिवालय के अधिकारियों की विशेष बैठक में कहा, “इन सब मामलों की जड़ संघ है।“ दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष देवकान्त बरुआ ने यूथ कांग्रेस के पदाधिकारियों के सम्मेलन में कहा था कि “हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पूर्णतः नष्ट करना चाहते हैं। इन लोगों को पुनः संगठित होने का अवसर नहीं देना चाहिए।“ आपातकाल के बिलकुल प्रारंभिक दिनों में, प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के इन उद्गारों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे लोग संघ को अपने मार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानते थे। देशभर में, आपातकाल की घोषणा के साथ ही जहाँ आन्दोलनकारी राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं को ही पकड़ा गया था, वहाँ संघ के छोटे से छोटे स्तर के कार्यकर्ताओं को भी हजारों की संख्या में बंदी बनाया गया। जिन छब्बीस संस्थाओं को प्रतिबन्धित किया गया था, उनमें संघ ही एकमात्र देशव्यापी प्रभावी संगठन था। बाकी सब संस्थाएं सीमित क्षेत्रों में कार्यरत थीं। ये सभी तथ्य हमें इसी निर्णय पर पहुँचाते हैं कि श्रीमती गांधी का मुख्य निशाना संघ था।

संघ के अधिकारियों ने इंदिराजी की चाल का रहस्य समझ लिया था। उन्होंने यह विचार किया कि यह संघर्ष केवल राजनीतिक ही नहीं है, वरन् यह तो जीवनमूल्यों की रक्षा का संघर्ष है। इसलिए उन्होंने अपना पूर्ण बल लगाकर देश पर छाये महासंकट का सामना करने का निश्चय किया।

नानाजी की गिरफ्तारी और आन्दोलन की निरंतरता

नानाजी देशमुख के नेतृत्व में ही नवंबर मास से प्रारम्भ होने वाले विशाल सत्याग्रह का निर्णय लिया जा चुका था और उस दृष्टि से सारे देश में तैयारियाँ शुरू हो गयी थीं। किन्तु इसी बीच में लोक संघर्ष समिति को एक बड़ा धक्का लगा। 15 अगस्त के सत्याग्रह के कार्यक्रम के बाद जब संघर्ष समिति आगामी योजना पर विचार कर रही थी, तभी 29 अगस्त को नानाजी को गिरफ्तार कर लिया गया। नानाजी का पुलिस की गिरफ्त में न आना सरकार के लिए एक सिरदर्द बना हुआ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जीवनव्रती प्रचारक, लोकसंघर्ष समिति का नेतृत्व कर रहा है, यह बात ही इंदिराजी को संत्रस्त कर रही थी। जिस संघ को बदनाम करने की उन्होंने बहुत कोशिश की थी, उसी का एक कार्यकर्ता सभी वर्गों, राजनीतिक दलों का समर्थन अपने पीछे खड़ा करके लोकसंघर्ष समिति के महामंत्री के नाते उन्हें चुनौती दे रहा है यह इंदिरा के लिए सर्वथा असहनीय था।

नानाजी गिरफ्तार हुए और शासन ने सोचा कि अब यह आन्दोलन ठप्प हो जायेगा क्योंकि अन्य दलों के बारे में उनका यही अनुभव था। किन्तु नानाजी की गिरफ्तारी से ऐसा कुछ नहीं हुआ क्योंकि सारा सूत्र तो संघ के हाथों में था जिसका ढाँचा किसी एक व्यक्ति के ऊपर किसी भी स्तर पर निर्भर नहीं था। समुद्र की एक लहर के जाने के बाद वहाँ पीछे अनेक लहरें उमड़ पड़ती हैं, वैसा ही यहाँ हुआ। आन्दोलन अबाध गति से चलता रहा।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की भूमिका

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी। उनका संयोजन तथा क्रियान्वयन सुव्यवस्थित रहता था। पूना में विनय सहस्रबद्धे उनके सचिव थे। उन्होंने अपने इतिवृत्त में लिखा है :

"विद्यालय-महाविद्यालयों में, मध्याह्न में जो छुट्टी रहती है ठीक उसी समय सत्याग्रह किया जाता था। बहुधा पटाखों की तेज आवाज से वह प्रारंभ होता था। फिर नारे लगते थे, पर्चे बँटते थे और भाषण होते थे। भाषणों में कहा जाता था, "आइए संघर्ष में सहभागी होइए। अन्याय और अत्याचार से लड़ना हर किसी का कर्तव्य है। आज हमारे देश में जनतंत्र को खतरा पैदा हुआ है। तानाशाही का नंगा नाच हो रहा है। कल आप पर बीतेगी, तब पश्चात्ताप करना पड़ेगा। अतः हे युवक वीरो, हमारा साथ देकर देश की सेवा कीजिए।

"सब विद्यार्थी बाहर निकलते थे, भाषण सुनते थे और नारे दोहराते थे। उनमें से अनेक सत्याग्रह में सहभागी होते थे। प्राचार्य या अन्य कोई कर्मचारी पुलिस को फोन से सूचना देते थे। पुलिस आती थी, तब शांत चित्त से 'वंदे मातरम्' गाया जाता था और फिर सत्याग्रही पुलिस की गाड़ियों में चढ़ते थे। अनेक बार पुलिस अपनी जल्दी में महिला पुलिस लाना भूल जाती थी। तब उनके आने तक एक-डेढ़ घण्टा और अधिक ताव से नारे लगाये जाते थे और भाषण होते थे।"

पूना के समान ही बम्बई, कोल्हापुर नगर, रत्नागिरि आदि स्थानों में विद्यार्थी परिषद् का सहयोग बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ। विद्यार्थी नेता अपनी कल्पनाशक्ति का उपयोग कर कोई न कोई नये ढंग का अविष्कार करते थे। जनता तथा विद्यार्थियों को होने वाले सत्याग्रह की सूचना किस प्रकार दी जाती थी उसका उदाहरण देखिए -

"क्या आप विश्वास भी कर सकते हैं कि इन दिनों हमारे देश में 'वंदे मातरम्' और 'भारत माता की जय' कहना अपराध माना जा रहा है? हाथ कंगन को आरसी क्या! आइए, आज शाम को...... स्थान पर प्रत्यक्ष आकर देख लीजिए......

पूना के एक महाविद्यालय के प्रवेशद्वार पर एक फलक लगा था। उस पर आकर्षक ढंग से लिखा था-"कल सुबह ठीक 10:30 बजे इसी स्थान पर बड़ी धूमधाम के साथ विवाह सम्पन्न होगा। आप बाराती के रूप में आइए। आपका हार्दिक स्वागत है।"

आपातकाल और सामयिक मार्गदर्शन

आपातकाल की घोषणा होते ही संघ नेतृत्व ने श्रीमती गांधी के इरादों को भाँप लिया था। इसलिए अपनी गिरफ्तारी (30 जून) के पूर्व ही सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ने आवाहन किया, "प्रयाग उच्च न्यायालय के निर्णय के कारण दर्भाग्य से प्रधानमंत्री अपना सन्तुलन खो बैठी हैं। परिणामस्वरूप आपातुस्थिति की घोषणा कर दी गयी है। जननेताओं को बन्दी बनाया गया है तथा समाचारपत्रों पर बन्धन लगाये गये हैं। इन कार्यवाहियों से लोकतन्त्रात्मक पद्धति पर आघात हुआ है और जनता के मूलभूत अधिकारों का हनन हुआ है। इस असाधारण परिस्थिति में स्वयंसेवकों का दायित्व है कि वे अपना सन्तुलन न खोयें। सरकार्यवाह माधवरावजी मुले तथा उनके द्वारा नियुक्त अधिकारी के आदेशानुसार संघ-कार्य जारी रखें तथा यथापूर्व जनसंपर्क, जनजागृति और जनशिक्षा का कार्य करते हुए अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन करने की क्षमता जनसाधारण में निर्माण करें।"

सांकेतिक सत्याग्रह का निर्णय लेने के साथ ही नानाजी देशमुख ने सम्पूर्ण देश में एक मार्गदर्शक पत्रक भिजवाया। वह उन्होंने संघ के भूमिगत ढाँचे के माध्यम से ही सर्वत्र पहुँचाया। संघ के कार्यकर्ताओं ने ही उस निर्णय को क्रियान्वित करवाया। इस पत्रक में कहा गया था, "इस व्यक्तिगत सत्याग्रह में केवल उन्हीं कार्यकर्ताओं को भाग लेना है जिनके विरुद्ध वारंट है या जो भूमिगत रहकर कार्य करने की स्थिति में नहीं हैं।" पत्र में आगे कहा गया था कि "जिस व्यक्ति के नेतृत्व में जिस स्थान पर सत्याग्रह होना तय हो, उसका प्रचार विभिन्न तरीकों से व्यापक रूप में किया जाय। सत्याग्रह के लिए सामान्य रूप से ऐसे सार्वजनिक स्थान का चयन किया जाय जहाँ लोग स्वभावतः ही एकत्रित रहते हैं, जिससे जनता सत्याग्रह को देख सके। सत्याग्रही सत्याग्रह के निश्चित समय से पहले किसी प्रकार गिरफ्तार न हो। किसी पूर्वनिर्धारित स्थान से माला पहनकर, तिलक लगाकर, नारे लगाते हुए और परचे बाँटते चलें। भाषण देने का अवसर मिले तो उसका भी भरसक लाभ लें।...."

लोकसंघर्ष समिति की जिस बैठक में सांकेतिक सत्याग्रह का निर्णय लिया गया था उसमें तीन कार्यक्रम और दिये गये थे :

1. 9 अगस्त को सारे प्रांतों में 'क्रांति-दिवस' मनाया जाये और सरकारी तंत्र को चुनौती देकर, सत्याग्रह कर, सत्याग्रही अपनी गिरफ्तारी दें। नगरों, कस्बों के सभी गली-बाजारों की दीवारों पर आपातकाल के विरोध में और लोकतंत्र की भावना को व्यक्त करने वाले नारे लिखे जायें। आपातकाल के नाम पर देश में थोपी जा रही तानाशाही का पर्दाफाश किया जाय।


2. 15 अगस्त 1975 को सरकार द्वारा आयोजित सभी स्थानों पर स्वातंत्र्य-दिवस के कार्यक्रम में उपस्थित होकर सत्याग्रह किया जाय और पत्रक बाँटे जायें, आपातकाल के विरोध में लोक-स्वातंत्र्य के पक्ष में नारे लगाये जायें। जहाँ तक संभव हो, समानांतर स्वातंत्र्य-दिवस मनाया जाय, आपातकाल में ध्वस्त नागरिक स्वातंत्र्य को फिर बहाल करने के लिए भाषण दिया जाय। यदि पुलिस वहाँ गिरफ्तार करना चाहे, तो सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दे दें।


3. 2 अक्तूबर को गांधी जयंती के अवसर पर इंदिरा कांग्रेस द्वारा गांधी जी के विचारों के पूर्णतया विपरीत किये जा रहे आचरण को उजागर किया जाय।



इस सांकेतिक आन्दोलन के सम्बन्ध में यह निश्चित किया गया था कि उसमें मुख्य रूप से राजनीतिक दलों के नेता ही सत्याग्रह का नेतृत्व करें। संघ की पूर्णशक्ति इस सत्याग्रह में नहीं झोंकी जानी चाहिए। केवल कुछ संघचालकों तथा जिन कार्यकर्ताओं को पुलिस बहुत परेशान कर रही थी और पीछे पड़ी थी उन्हें ही इसमें भाग लेना था। यद्यपि लोकसंघर्ष से जुड़े राजनीतिक संगठनों ने इस योजना को सफल बनाने में योगदान दिया, फिर भी इस सांकेतिक सत्याग्रह का भार भी मुख्यतः संघ और जनसंघ को ही सँभालना पड़ा।

माधवराव जी का स्वयंसेवकों को आह्वान :

प्रिय बन्धुगण,

संघ पर प्रतिबंध गत चार माह के राष्ट्रीय घटनाचक्र से आप सब परिचित हैं। 26 जून को आपातस्थिति की घोषणा की गयी। इसके पहले ही 25 जून को देश के सर्वमान्य जननेताओं की अंधाधुंध गिरफ्तारियाँ प्रारम्भ की गयीं। समाचारपत्रों की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गयी। 30 जून को हमारे सरसंघचालक को बंदी बना लिया गया। 4 जुलाई को संघ पर प्रतिबंध लगाकर उसके लगभग 10 हजार कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिये गये। यह सारा घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि संघ पर लगाया प्रतिबंध लोकतंत्र की हत्या के षड्यंत्र की श्रृंखला की एक कड़ी है.... वास्तव में तानाशाही लादने की बृहत योजना का अंग है।....... देश की लोकतांत्रिक शक्तियाँ इस स्थिति से व्यग्र हैं। शासन ने जानबूझकर जनता पर संघर्ष थोपा है। जनता ने भी सरकार की इस चुनौती को स्वीकार किया है। घोर दमन के बावजूद स्थान-स्थान पर संवैधानिक प्रतिकार भी प्रारम्भ कर दिया है। लोकतंत्र में आस्था रखने वाले सभी भारतीयों का यह पवित्र कर्तव्य है कि देशव्यापी जनसंघर्ष के राष्ट्रीय यज्ञ में वे भी आहुति डालें।. ...मैं सभी बन्धुओं से आग्रह करता हूँ कि सत्य, न्याय तथा राष्ट्रीय जीवनमूल्यों की रक्षा हेतु अपने ईश्वरीय कार्य में उपस्थित किये गये अवरोध को दूर करने के लिए नित्य के सफ़ान अनुशासनयुक्त तथा शांतिपूर्ण ढंग से इस धर्मयुद्ध में पूरी शक्ति के साथ सहभागी बनें।...

धर्मक्षेत्र की ओर प्रस्थान करने वाले वीरव्रती बनकर सफलता का पूर्ण विश्वास लेकर हम आगे बढ़ें। ईश्वरीय कार्य की ध्वजा हमारे कन्धों पर है। असंख्य ऋषियों की तपस्या का तथा बलिदानी वीरों के हौतात्म्य का पुण्यबल हमारे पीछे है। मदांध आसुरी सत्ता से पीड़ित कोटि-कोटि देशबन्धुओं की सद्भावना हमारे साथ है। भारत माता को परम वैभव तक पहुँचाने का प.पू.डा. जी का दिया हुआ उदात्त ध्येय हमारे सामने है और हमारे हृदयों में अंकित हैं प.पू. श्री गुरुजी के अन्तिम आशीर्वचन। अब इसके पश्चात् विजय ही विजय है।

भारत माता की जय।

मातृसेवा में आपका ही

    माधवराव मुले

सत्याग्रह-संचालन का प्रमुख उत्तरदायित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ही निभाना था। किन्तु संघ के अनेक प्रमुख कार्यकर्ता बंदी बना लिये जाने के कारण संघ के संघटन का देशव्यापी तानाबाना कुछ परिमाण में विश्रृंखलित हो गया था। सत्याग्रह को सुचारु रूप से चलाने के लिए इस ढाँचे को पूर्ववत् बनाना आवश्यक था। इस दृष्टि से जो मुख्य कार्यकर्ता बाहर थे उन्होंने देशभर में भ्रमण करते हुए तथा कार्यकर्ताओं की बैठकें लेते हुए नयी रचना खड़ी की। माधवराव मुले, मोरोपंत पिंगले, बापूराव मोघे, प्रा. राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जूभय्या, डाक्टर आबाजी थत्ते, भाऊराव देवरस दत्तोपंत ठेंगडी आदि केन्द्रीय नेताओं ने इस रचना के पश्चात् स्थान-स्थान के प्रमुख कार्यकर्ताओं को जुटाकर सत्याग्रह विषयक निर्देश दिये और उनका मार्गदर्शन किया।

आपातकाल के दौरान संघ-शाखा, स्वयंसेवक और विद्यार्थियों पर अत्याचार

• इंदौर नगर के एक सत्याग्रही जत्थे का नेतृत्व विष्णुपंत खाम्बेटे ने किया था। गोविंद चौरसिया, रतन वैष्णव और यशोधर जैन उनके साथी थे। पहले उन्हें बुरी तरह पीटा गया। वे बेहोश हो गये। भयंकर सर्दी में नंगे शरीर उन्हें फर्श पर पटक दिया गया। साथ ही बाल नोचना, करेंट लगाना भी चालू रहा। ठंडे पानी के हौज में लिटाकर उस पानी में बिजली का करेंट छोड़ा गया। इन सारी यातनाओं के मध्य वे अनेक बार बेहोश हुए। होश में आने के बदा फिर उन पर अत्याचार किये गये। बेहोशी की अवस्था में ही उन्हें मीसा बंदी बनाकर जेल में भेज दिया गया।

• मध्यप्रदेश विद्यार्थी परिषद् के संगठन मंत्री तथा लोक संघर्ष समिति इदौर के सचिव चंपालाल यादव को पहले सामान्य पिटाई के द्वारा अधमरा कर दिया गया। बाद में उन्हें रस्सी से बाँध कर निर्वस्त्र अवस्था में छत से उलटा लटकाया गया। उनके चेहरे पर सूजन आने पर उन्हें उतारा गया। इसके बाद हाथ-पैर व गुप्तांगों में बिजली के झटके दिये गये। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। इसके बाद उन्हें जेल भेजा गया। वहाँ वे महीनों तक अपने हाथों से कुछ भी काम नहीं कर पाते थे, इतने वे दुर्बल हो गये थे।

• होशंगाबाद जिला विद्यार्थी परिषद् के संगठन मंत्री शम्भु सोनकिया ने आपबीती यों बतायी है। उन्होंने कहा, “हम 6 कार्यकर्ताओं ने 20 जनवरी 1976 को भोपाल में सत्याग्रह किया। हमें पकड़कर सर्राफा बाजार पुलिस चौकी ले जाया गया। रात को हमें नंगा कर एक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया। कड़ाके की ठिठ्ठा देने वाली ठंड और उस पर सीमेंट का फर्श। न कुछ ओढ़ने को न बिछाने को। भोजन वं पानी का तो प्रश्न ही नहीं।

• भारतीय युवा संघ के प्रादेशिक सचिव तेजसिंह सैंधव ने पाँच साथियों के साथ सत्याग्रह किया। इन सभी को बिजली के झटके लगाने से लेकर उलटे टांगने तक की यातनाओं में से तो गुजरना ही पड़ा, गीले कंबल से ढककर दम घोंटने की भयानक यातनाओं का भी उन्हें सामना करना पड़ा। कड़ाके की सर्दी में उन्हें हिम (बर्फ) की सिल्ली पर लिटाया गया। ये सब अत्याचार भी उसी दुष्टतामूर्ति ओंकार चन्द के निर्देशन में ढाये गये।

• उज्जैन के अठारह वर्षीय छात्र-विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ता राजेंद्रकुमार कड़ेल को 19 जुलाई 1975 को सत्याग्रही के रूप में गिरफ्तार किया गया। रात भर वह पीटा जाता रहा। संगीनों की नोकें उसकी देह में चभोयी गयीं। उसे बिजली का करंट लगाया गया। इन यातनाओं के कारण वह बेहोश हो गया। उसी हालत में उसे अति प्रभात में घर पर पहुँचाया गया। घरवालों को चेतावनी दी गयी कि इसे आठ बजे तक कोतवाली पहुँचा देना। राजेंद्र के दो बड़े भाई विजय और अशोक मीसा के अंतर्गत पहले ही बंद किये जा चुके थे। राजेंद्र को पुलिस की सूचना के अनुसार आठ बजे कोतवाली पहुँचा दिया गया। वहाँ लगातार सात दिनों तक उसे कठोर यातनाएँ दी जाती रहीं। सात दिनों में केवल दो बार उसे भोजन मिला। उसे सोने नहीं दिया गया। बस बेहोशी की अवस्था ही उसे नींद का सुख देती थी। आपातकाल के दौरान इस किशोर छात्र को पंद्रह बार अलग-अलग आरोपों में गिरफ्तार किया गया और हर बार उसे इन्हीं यातनाओं से गुजरना पड़ा।

• उज्जैन की एक संघ-शाखा के मुख्य शिक्षक सेवाराम वाधवानी को 29 दिसंबर 1975 को गिरफ्तार किया गया। पुलिस थाने में उन्हें ऊपर लिखे हुए सभी अत्याचार सहन करने पड़े। सेवाराम के साथ उनके छोटे भाई देवीदास व चचेरे भाई लक्ष्मण को भी सब प्रकार के कष्ट झेलने पड़े। अन्य दो भाइयों को जेल भेज दिया गया, परंतु सेवाराम की हालत मरणासन्न होने से थानेदार ने झूठी खबर फैला दी कि सेवाराम पुलिस कस्टडी से भाग गया है। सेवाराम का और उनके बच्चों का भाग्य ठीक होने के कारण ही सेवाराम मरे नहीं, बच गये।

• उज्जैन के स्वयंसेवक राजेंद्र शिंदे पर हुए अत्याचारों की कहानी भी रोंगटे खड़े करने वाली है। उन दिनों डाक्टरों पर भी पुलिस का कैसा आतंक छाया हुआ था, इसका भी परिचय यह कहानी देती है। 14 नवंबर को राजेंद्र ने सत्याग्रह किया। गिरफ्तारी के बाद उसे बिना भोजन दिये रखा गया। सी.एस.पी. के कमरे में बुला कर उसे अनेकों ने बुरी तरह पीटा। जब वह बेहोश हुआ, तब उसे कोठरी में पटक दिया गया। वहाँ उसे न भोजन दिया गया न पानी दिया गया। सीने में तथा पेट में हुई अंदरूनी चोटों के कारण राजेंद अर्धबेहोशी की अवस्था में था। उसी अवस्था में उसे भैरागढ जेल भेज दिया गया। मीसा बंदियों द्वारा भूख हड़ताल करने पर ही उसे अस्पताल में भर्ती किया गया, किंत बिना इलाज किये ही उसे जेल में वापस ले आया गया।

• रात में राजेंद्र को असहनीय वेदनाएँ होने लगीं। मीसा बंदियों ने जब फिर से बेहोशी की हालत में भी हथकडियाँ पहनाकर तथा पलंग से बाँधकर उसे रखा गया। अभी इलाज परा हुआ नहीं था। फिर भी पलिस के दबाव में आकर डाक्टरों ने उसे आंदोलन की धमकी दी, तब ही उसे जिला अस्पताल में भर्ती किया गया। वहाँ वैसे ही जेल भेज दिया। 24 नवंबर को फिर से वह हृदय-पीडा से कराहने लगा। रात्रि को ग्यारह बजे उसे फिर से जिला अस्पताल में भर्ती किया गया। पुनरपि पलिस ने वही बात दोहरायी। उसे बिना इलाज के ही जेल लौटना पड़ा।

• उन दिनों मीसा का कितना आतंक था. इसकी करुण कहानी है किशोर छात्र सुबोध गोयल की मौत। उसने ग्वालियर के तानसेन समारोह के अवसर पर मुख्यमंत्री सेठी की उपस्थिति में मंच पर चढ़कर नारे लगाये थे। उसे तत्काल बंदी बनाया गया। उसके पिताजी एक प्रख्यात वकील हैं। उन्होंने पुलिस अधिकारी को कहा कि "इसकी पिटाई जितनी भी करो, परंतु इसे मीसा में मत भेजो।" उस बालक की इतनी भयंकर पिटाई की कि वह पागल होकर ही हवालात से बाहर आया और उसी अवस्था में दो वर्ष की जिंदगी बिताकर भगवान को प्यारा हो गया। पुलिस ने वह अपने पिता का इकलौता पुत्र था। मध्यप्रदेश पुलिस ने लगभग 700 लोगों की इसी प्रकार की घृणित यातनाओं का शिकार बनाया।

• आपात्कालीन अत्याचारों के मामले में सुदूर पूर्व का प्रांत असम भी अन्य प्रांतों के समान ही रहा। 27 सितंबर 1975 को मोतीलाल जालान को गिरफ्तार कर गोहाटी के पूछताछ-केंद्र पर लाया गया। वहाँ लंबे अर्से तक पहले तो सामान्य प्रश्न पूछे गये, बाद में यातनाओं के विभिन्न तरीकों का प्रयोग मोतीलाल पर किया गया। गंदी गालियों के साथ तमाचे तथा घूंसे जड़े गये, हाथ-पैरों के जोड़ों पर मारा गया। हाथ ऊपर बाँध कर उसी स्थिति में घंटों रखा गया, घंटों तक मुर्गा बनाया गया। नाक में पाइप घुसेड़ कर यातना दी गयी। उसके हाथ के नाखूनों मैं पिनें चुभोयी गयीं। इन यातनाओं के कारण तथा अन्न-जल न मिलने के कारण वह कई बार बेहोश हो गया। वह बहादुर बालक सब कुछ सहता रहा, परंतु उसने किसी प्रकार का भेद पुलिस को नहीं बताया।

• बिहार प्रदेश लोक संघर्ष समिति के आदेश के अनुसार 9 अगस्त 1975 को क्रांति-दिवस के रूप में मनाने के लिए बंद का आह्वान किया गया। बिहार बंद आंशिक रूप से सफल रहा। समूचे प्रांत में लगभग 500 व्यक्ति गिरफ्तार किये गये। पटना में संघ के सह-प्रांत संघचालक भोलानाथ जी झा 7 स्वयंसेवकों के साथ दमन विरोधी पर्चे बाँटते हुए बंदी बनाये गये। बिहार की राजधानी पटना ने अनुभव किया कि आतंक पर्व की तुलना में क्रांति पर्व क्रमशः बल पकड़ रहा है। जमशेदपुर में मजदूर नेता दीनानाथ पांडेय ने कचहरी में खड़े होकर तानाशाही शासन के खिलाफ भाषण देकर आतंक को चुनौती दी। जब भारी भीड़ में उनका भाषण समाप्त हुआ, तब पुलिस उनके पास जा सकी और डी.आई.आर. में वे गिरफ्तार किये गये।

• बांका में जनसंघ, विद्यार्थी परिषद् तथा संघर्ष समिति के 14 कार्यकर्ताओं ने जुलूस निकाला। चौक पर नुक्कड़ सभा की। रात्रि को मशाल जुलूस निकाला और तब जर्नादन प्रसाद यादव के नेतृत्व में तीन कार्यकर्ता बंदी बने।

• 15 सितंबर को कांग्रेस सांसद भागवत झा 'आजाद' बाराहाट में फासिस्ट विरोधी सभा संपन्न कर रहे थे। संघर्ष समिति के तीन कार्यकर्ताओं ने विरोध-प्रदर्शन किया। उनको गिरफ्तार किया गया।

• जनसंघ के इन्दौर विभाग के संगठन मंत्री शशिकान्त शेन्द्रींकर को इन्दौर के राजवाड़े पर सत्याग्रह करना था। वे सत्याग्रह करने वहाँ पहुँचने के पूर्व एक घटना घट गयी। वहाँ तैनात पुलिस ने एक सफेद चुस्त पैजामा और सफेद ही कमीज पहने नेता लगनेवाले सज्जन को पास में बने हुनमान मंदिर में घुसते देखा। उन्होंने हनुमानजी को हार पहनाकर प्रणाम किया ही था कि पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ रखकर कहा, "चलो, अब थाने पर ही सत्याग्रह करना।" उसने बहुत समझाया कि मैं कोई सत्याग्रही नहीं, व्यापारी हूँ। परन्तु वह नहीं माना और वह उसे थाने ले गया। इसके बाद शशिकान्तजी नारे लगाते परचे बाँटते राजवाड़े पर आये और उन्होंने सत्याग्रह किया। उन्हें गिरफ्तार कर जब थाने ले जाया गया तब पुलिस ने पहले गिरफ्तार किये व्यक्ति को माफी माँगकर छोड़ दिया। किन्तु वह सज्जन थाने की सीढ़ियाँ उतर ही रहे थे कि गुप्तचर अधिकारी आ गया और उसने पुलिस से कहा, "अरे, इन्हें कहा जाने दे रहे हो? ये जनसंघ के मण्डल मंत्री मोरुमल सुपारीवाला हैं।

• इंदौर में ही भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्ता राणा रामप्रसाद यादव तथा अब्दुल संतारा ने सांकेतिक सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी। आपात्‌काल के बाद जो इन्दौर के सांसद बने उन कल्याण जैन ने बजाजखाना चौक पर प्रभावी सत्याग्रह कर उत्साह का वातावरण निर्माण किया। हजारों की संख्या में जनता उपस्थित थी।

• इन्दौर में जनसंघ नेता पं. श्रीवल्लभ शर्मा द्वारा बड़ा सराफा और छोटा सराफा क्षेत्र में सत्याग्रह हुआ। तब वह क्षेत्र हजारों लोगों से भरा था। पुलिस और उनकी जीपें सराफा थाने पर खड़ी थीं। श्रीवल्ल्भ शर्मा ठीक समय पर पहुँचे। उन्होंने पर्चे बाँटे, नारे लगाये। जनता ने भी उनका पूरा साथ दिया। जनता निर्भयता से नारे दुहराती थी। पुलिस श्रीवल्लभजी को पकड़ने आगे बढ़ी। परंतु बीच में हजारों लोग थे। इसलिए हलका लाठी चार्ज भी हुआ। पर जनता जोश में थी और दिल खोलकर आपात्काल और तानाशाही के विरोध में नारे गूंज रहे थे। इतने में शर्माजी एक छत पर चढ़ गये। उत्तका भाषण प्रारंभ हुआ। जोशभरा भाषण था और जनता भी साथ थी। लगभग आधे घंटे के बाद पुलिस उन तक पहुँची। शर्माजी नारे लगा रहे थे। दो पुलिसवाले घर से होकर छत पर गये तो शर्माजी कूदकर चार छत दूर पहुँच गये। पुलिस वहाँ पहुँची तो वे और आगे। इस दरम्यान जनता को भी आनंद आ रहा था। वह मुक्त कंठ से नारे लगा रही थी। एक घंटे तक यह भागदौड़ चली। पुलिस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इतनी भीड़ होगी और इस प्रकार कूद-फाँद का सामना करना पड़ेगा। जैसे तैसे पुलिस शर्माजी तक पहुँची, पर उन्होंने जीप में बैठने से इन्कार कर दिया। पैदल, जनता के साथ, नारे लगाते हुए वे कोतवाली तक गये। उनको गिरफ्तार करने के बाद भी, जनसमुदाय सराफा और उसकी गलियों में नारे लगाते घूमता रहा। जनता का साहस खोलने के लिए इंदौर नगर में हुआ यह सत्याग्रह बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। किंतु इसके बाद पुलिस का व्यवहार अधिक क्रूर बन गया।

• अधिवक्ता श्रीमती रामकली मिश्रा और श्रीमती उमा शुक्ला ने 9 अगस्त 1975 को भोपाल में सत्याग्रह किया। 9 अगस्त के पूर्व श्रीमती मिश्रा भूमिगत थीं और बुरका पहनकर भोपाल में आपातकाल विरोधी पर्चे बाँटती थीं। इसी दौरान पुलिस ने उनकी छः वर्षीया पोलियो पीड़ित लड़की को मीसा में पकड़ लिया।

• भोपाल में विधायक लक्ष्मीनारायण शर्मा के साथ आठ लोगों ने भेल क्षेत्र में गिरफ्तारी दी। 13 अगस्त को जनसंघ के भोपाल संगठन मंत्री हशमत बारसी ने 80 लोगों के साथ बुधवारा चौक में सत्याग्रह किया।

• जनसंघ के अखिल भारतीय मंत्री आरिफ बेग ने भेल में सत्याग्रह किया। उज्जैन में संघ के नगर कार्यवाह शांताराम भवालकर और विभाग कार्यवाह राम कोटवानी ने अपने जत्थों के साथ सांकेतिक सत्याग्रह किया।

• भिण्ड में जनसंघ विधायक रिसाल सिंह ने 80 लोगों के साथ और विधायक रामेश्वर दयाल दांतरे ने 10 कार्यकर्ताओं के साथ तथा शिवपुरी में गोपाल दण्डोतिया ने अपने जत्थे के साथ सत्याग्रह किया। देवास में जनसंघ के जिलाध्यक्ष नर्मदाप्रसाद किंकर ने हजारों लोगों की उपस्थिति में सांकेतिक सत्याग्रह किया और संघ के जिला कार्यवाह शांतिलाल चौधरी ने सैकड़ों लोगों का जुलूस निकाला, कई स्थानों पर भाषण देने के बाद उन्होंने गिरफ्तारी दी।

संघ का आपातकाल में संघर्ष, समाचार-पत्रों के अनुसार

“RSS Played a Major Role Against the Draconian Emergency”, The Economist on 12 December 1976: “The underground campaign against Mrs. Gandhi claims to be the only non-left wing revolutionary force in the world, disavowing both bloodshed and class struggle. Indeed, it might even be called right wing since it is dominated by the Hindu communalist party, Jan Sangh and its ‘cultural’ (some say paramilitary) affiliate the RSS. But its platform at the moment has only one non-ideological plank; to bring democracy back to India. The ground troops of this operation (the underground movement), consist of tens of thousands of cadres who are organized to the village level into four men cells. Most of them are RSS regulars, though more and more new young recruits are coming in. The other underground parties which started out as partners in the underground have effectively abandoned the field to Jan Sangh and RSS.”

इंडियन एक्सप्रेस, 9 जून 1979: इस अंक में अच्युत पटवर्धन ने लिखा, “मुझे यह जानकार प्रसन्नता हुई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राजनीतिक प्रतिरोध करनेवाले किसी भी अन्य समूह के साथ मिलकर, उत्साह और निष्ठा के साथ कार्य करने के लिए, तथा घोर दमन और झूठ का सहारा लेने वाले पैशाचिक शासन का जो कोई भी विरोध कर रहे हों, उनके साथ खुल कर सहयोग करने और साथ देने के लिए तैयार थे। जिस साहस और वीरता के साथ पुलिस के अत्याचारों और उसकी नृशंसता को झेलते हुए स्वयंसेवक आंदोलन चला रहे थे,उसे देखकर तो मार्क्सवादी संसद सदस्य – श्री ए के गोपालन भी भावकुल हो उठे थे। उन्होने कहा था “कोई न कोई उच्चादर्श अवश्य है जो उन्हे ऐसे वीरोचित कार्य के लिए और त्याग के लिए अदम्य साहस प्रदान कर रहा है।”

इंडियन रिवियू (मद्रास) के संपादक एम.सी. सुब्रमण्यम (अप्रैल 1977): “जिन वर्गों ने निर्भीक लगन के साथ यह कार्य किया, उनमे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विशेषतः उल्लेखनीय है। उन्होने सत्याग्रह का आयोजन किया। अखिल भारतीय संचार तंत्र को बनाए रखा। आंदोलन के लिए चुपचाप धन एकत्र किया। बिना किसी विघ्न बाधा के साहित्य वितरण की व्यवस्था की। कारागार में अन्य दलों और मतों के संगी बंदियों को सहायता प्रदान की। इस प्रकार उन्होने सिद्ध कर दिया कि स्वामी विवेकानंद ने देश में सामाजिक और राजनीतिक कार्य के लिए जिस सन्यासी सेना का आवाहन किया था, उसके वो सबसे निकटतम पात्र हैं। वह एक परंपरावादी क्रांतिकारी शक्ति है।“


टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

परिवारवादी हिटलरशाही से मोहभंग, राष्ट्रप्रथम के विचार से जुड़ रहे विपक्ष के जनप्रतिनिधि — अरविन्द सिसोदिया

सुन्दर सिंह जी भंडारी:विभाजन के देवदुर्लभ स्वंयसवेक

खींची राजवंश : गागरोण दुर्ग

हमें वीर केशव मिले आप जबसे : संघ गीत

महाराणा प्रताप कठे ? Maharana Pratap Kathe

राजपूतो की शान रोहणी ठिकाना : सिर कटने के बाद भी लड़ने वाले वीरों की कहानी

महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई Rani Lakshmi Bai