परिवारवादी पार्टियों में टूटन और आंतरिक कलह की परंपरा का जन्म कांग्रेस से ही हुआ है


कांग्रेस : टूटन की राजनीति का प्रारंभिक अध्याय

1969 : जब इंदिरा गांधी ने ‘सिंडिकेट’ को चुनौती दी

कांग्रेस का पहला बड़ा विभाजन और हाईकमान संस्कृति की शुरुआत।

1978 : आपातकाल की पराजय के बाद फिर टूटी कांग्रेस

इंदिरा और संजय गांधी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ असंतोष का विस्फोट।

1999 : सोनिया नेतृत्व पर सवाल और एनसीपी का जन्म

विदेशी मूल विवाद के बहाने उभरा नेतृत्व केंद्रीकरण का विरोध।

2011 : जगन की बगावत और आंध्र में कांग्रेस का पतन

उत्तराधिकार की आकांक्षा ने जन्म दिया वाईएसआर कांग्रेस को।

1998 : ममता बनर्जी का विद्रोह और तृणमूल का उदय

केंद्रीय नेतृत्व से टकराव ने बंगाल में नया राजनीतिक विकल्प खड़ा किया।
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क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद की परिणति : विरासत की जंग और विभाजन

एनसीपी : चाचा-भतीजे की लड़ाई में बिखरी पवार विरासत

शरद पवार के बाद उत्तराधिकारी कौन—यही सवाल बना विभाजन का कारण।

शिवसेना : ठाकरे परिवार की विरासत पर दो दावेदार

उद्धव और राज के मतभेदों ने जन्म दिया महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को।

समाजवादी पार्टी : मुलायम परिवार में सत्ता संघर्ष

चाचा शिवपाल और पुत्र अखिलेश के बीच वर्चस्व की खुली जंग।

लोक जनशक्ति पार्टी : रामविलास के बाद परिवार दो खेमों में

चिराग बनाम पारस संघर्ष ने पार्टी की एकता तोड़ दी।

तेलुगु देशम पार्टी : दामाद की बगावत और एनटीआर का पतन

आंध्र राजनीति की सबसे चर्चित पारिवारिक सत्ता-क्रांति।

डीएमके : करुणानिधि की विरासत पर भाइयों की प्रतिस्पर्धा

स्टालिन और अलागिरी के संघर्ष ने वर्षों तक पार्टी को झकझोरा।

राजद : यादव परिवार में समय-समय पर उठती दरारें

तेजस्वी और तेज प्रताप के मतभेदों ने नेतृत्व की चुनौती को उजागर किया।

बीआरएस : तेलंगाना में अगली पीढ़ी की नेतृत्व प्रतिस्पर्धा

केसीआर के बाद उत्तराधिकार को लेकर उभरते संकेत।


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निष्कर्ष

जब दल परिवार बन जाते हैं, तब संगठन कमजोर पड़ जाता है

भारतीय राजनीति का अनुभव बताता है कि जहां आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होता है और नेतृत्व कुछ व्यक्तियों या परिवारों तक सीमित हो जाता है, वहां उत्तराधिकार की लड़ाई अक्सर विभाजन, विद्रोह और संगठनात्मक क्षरण का कारण बनती है।


भारत में परिवारवाद, आंतरिक कलह और उत्तराधिकार (Succession) की जंग के कारण कई बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों में ऐतिहासिक विभाजन हुए हैं। मुख्य रूप से चाचा-भतीजे, भाई-भाई या पिता-पुत्र के बीच वर्चस्व की लड़ाई इन टूटों की वजह बनी है। 

ऐसी प्रमुख घटनाओं की सूची नीचे दी गई है:
## 1. एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) - महाराष्ट्र

* कारण: शरद पवार के बाद पार्टी की कमान और विरासत को लेकर उनके भतीजे अजीत पवार और बेटी सुप्रिया सुले के बीच आंतरिक खींचतान शुरू हुई।
* परिणाम: अजीत पवार ने बगावत कर पार्टी तोड़ दी और अधिकांश विधायकों के साथ सरकार में शामिल हो गए। चुनाव आयोग ने अजीत पवार गुट को ही असली 'NCP' और चुनाव चिन्ह आवंटित किया।

## 2. शिवसेना - महाराष्ट्र

* कारण: बाल ठाकरे की विरासत को लेकर उनके बेटे उद्धव ठाकरे और भतीजे राज ठाकरे के बीच साल 2005-06 में गहरा विवाद हुआ। 
* परिणाम: राज ठाकरे ने पार्टी छोड़कर अपनी नई पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) बनाई। (इसके बाद 2022 में एक और बड़ी टूट हुई, जिसमें एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में पार्टी विभाजित हुई)। 

## 3. समाजवादी पार्टी (सपा) - उत्तर प्रदेश

* कारण: संस्थापक मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव के बीच पार्टी पर नियंत्रण को लेकर 2016-17 में भारी विवाद हुआ।
* परिणाम: अखिलेश यादव ने पार्टी की कमान अपने हाथ में ले ली और शिवपाल यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। शिवपाल यादव ने बाद में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) का गठन किया (हालांकि बाद में वे फिर एक हो गए)। [1, 2, 5, 6] 

## 4. लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) - बिहार

* कारण: रामविलास पासवान के निधन के बाद पार्टी के नेतृत्व को लेकर उनके भाई पशुपति कुमार पारस और बेटे चिराग पासवान के बीच जंग छिड़ गई।
* परिणाम: पार्टी दो धड़ों में टूट गई। चाचा पशुपति पारस ने राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी बनाई, जबकि चिराग पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का गठन किया। 

## 5. तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) - आंध्र प्रदेश

* कारण: संस्थापक एन.टी. रामाराव (NTR) के अंतिम दिनों में उनकी पत्नी लक्ष्मी पार्वती के बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण परिवार में मतभेद शुरू हुआ।
* परिणाम: एनटीआर के दामाद नारा चंद्रबाबू नायडू ने 1995 में बगावत कर दी, अधिकांश विधायकों को अपने साथ लिया और एनटीआर को हटाकर खुद पार्टी के अध्यक्ष व मुख्यमंत्री बन गए। 

## 6. डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) - तमिलनाडु

* कारण: एम. करुणानिधि की राजनीतिक विरासत संभालने को लेकर उनके दो बेटों—एम.के. अलागिरी और एम.के. स्टालिन के बीच लंबा पारिवारिक और राजनीतिक विवाद चला।
* परिणाम: पार्टी भले ही औपचारिक रूप से दो टुकड़ों में नहीं बंटी, लेकिन करुणानिधि ने अलागिरी को पार्टी से निष्कासित कर दिया और स्टालिन को पूरी तरह पार्टी की कमान सौंप दी। 

## 7. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और बीआरएस (तेलंगाना) में अंदरूनी कलह

* बिहार (RJD): लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटों—तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव के बीच वर्चस्व को लेकर समय-समय पर मनमुटाव सामने आता रहा है।
* तेलंगाना (BRS): के. चंद्रशेखर राव (KCR) के बेटे के.टी. रामा राव (KTR) और बेटी के. कविता के बीच भी आंतरिक फैसलों को लेकर नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा देखी गई है। 

ये घटनाएं दर्शाती हैं कि जब किसी पार्टी का नियंत्रण केवल एक परिवार के पास होता है, तो 'उत्तराधिकारी' बनने की होड़ अंततः पार्टी के भीतर बड़े बिखराव का कारण बनती है। 

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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का इतिहास भी 'व्यक्ति-केंद्रित राजनीति', आंतरिक वर्चस्व और 'नेहरू-गांधी' परिवार के इर्द-गिर्द सत्ता के केंद्रीकरण के विरोध के कारण कई ऐतिहासिक विभाजनों (Splits) से भरा रहा है। जब भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व (विशेषकर इंदिरा गांधी और बाद में सोनिया गांधी) ने संगठन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने या योग्यता पर वफादारी को प्राथमिकता देने का प्रयास किया, तब-तब बड़े नेताओं ने बगावत की और कांग्रेस टूट गई। 
परिवारवाद और नेतृत्व के एकाधिकार के कारण कांग्रेस में हुए प्रमुख विभाजन इस प्रकार हैं:
## 1. 1969 का ऐतिहासिक विभाजन (कांग्रेस ओ बनाम कांग्रेस आर)

* मुख्य कारण: तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस के पुराने, कद्दावर नेताओं के गुट (जिसे सिंडिकेट कहा जाता था, जिसमें के. कामराज, मोरारजी देसाई और निजिलिंगप्पा शामिल थे) के बीच सत्ता और निर्णयों के केंद्रीकरण को लेकर सीधा टकराव था। सिंडिकेट को लगता था कि इंदिरा गांधी पार्टी के लोकतांत्रिक ढांचे को दरकिनार कर अपने हाथ में सारी शक्तियां ले रही हैं। 
* परिणाम: इंदिरा गांधी को अनुशासनहीनता के आरोप में मूल कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद कांग्रेस दो भागों में बंट गई—पुरानी नेताओं की कांग्रेस (O) और इंदिरा गांधी की कांग्रेस (R)। अंततः इंदिरा गांधी की कांग्रेस ही असली कांग्रेस के रूप में उभरी। 

## 2. 1978 का विभाजन (कांग्रेस आई का गठन)

* मुख्य कारण: 1975 में आपातकाल (Emergency) लगाने और 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद पार्टी के भीतर इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के बढ़ते हस्तक्षेप के खिलाफ गहरा असंतोष पैदा हुआ। देवराज अर्स और ब्रह्मानंद रेड्डी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने इंदिरा गांधी की कार्यशैली और संजय गांधी के 'अलोकतांत्रिक' नियंत्रण का विरोध किया। [2, 3] 
* परिणाम: इंदिरा गांधी ने जनवरी 1978 में एक बार फिर पार्टी तोड़ दी और अपने नाम पर कांग्रेस (I - इंदिरा) का गठन किया, जो आगे चलकर मुख्य कांग्रेस बनी। 

## 3. 1999 में एनसीपी (NCP) का गठन

* मुख्य कारण: राजीव गांधी के निधन के बाद पी.वी. नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी के दौर के बाद, जब 1998 में सोनिया गांधी को सीधे कांग्रेस अध्यक्ष पद सौंप दिया गया, तो पार्टी के भीतर एक परिवार के नेतृत्व के प्रति असंतोष उभरा। शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर ने खुले तौर पर सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे और उनके हाथों में पार्टी की कमान सौंपे जाने को चुनौती दी। 
* परिणाम: इन नेताओं को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया, जिसके बाद शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का गठन किया। 

## 4. 2011 में वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) का गठन - आंध्र प्रदेश

* मुख्य कारण: यह घटना विशुद्ध रूप से क्षेत्रीय स्तर पर 'उत्तराधिकार' की जंग और परिवारवाद से जुड़ी थी। आंध्र प्रदेश के कद्दावर मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (YSR) की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद, उनके बेटे वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी तुरंत मुख्यमंत्री की कुर्सी चाहते थे और अपनी 'ओदारपु यात्रा' निकालना चाहते थे, लेकिन दिल्ली स्थित कांग्रेस हाईकमान (गांधी परिवार और कोर कमेटी) ने एक नए वारिस को सीधे कमान सौंपने से मना कर दिया और उन्हें दबाने की कोशिश की। 

* परिणाम: जगन मोहन रेड्डी ने बगावत कर दी, कांग्रेस छोड़ी और YSR कांग्रेस पार्टी बनाई, जिसने आगे चलकर आंध्र प्रदेश से कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया।

## 5. तृणमूल कांग्रेस (TMC) का गठन (1998)

* मुख्य कारण: यद्यपि यह सीधे तौर पर परिवारवाद के खिलाफ खुली जंग नहीं थी, लेकिन ममता बनर्जी का आरोप था कि दिल्ली में बैठा कांग्रेस आलाकमान (गांधी परिवार के वफादार नेता) पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के बजाय उनके साथ अंदरूनी समझौते कर रहा है और जमीनी कार्यकर्ताओं को तरजीह नहीं दे रहा है।
* परिणाम: ममता बनर्जी ने अलग होकर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थापना की।

## निष्कर्ष
स्वतंत्रता पूर्व का विभाजन (1907 का सूरत विभाजन) विशुद्ध रूप से विचारधारा (नरम दल बनाम गरम दल) पर आधारित था। इसके विपरीत, स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस में जितने भी बड़े बिखराव हुए, उनके पीछे सत्ता का एक ही केंद्र (High Command/Family) के हाथों में सिमटना, आंतरिक लोकतंत्र की कमी और अन्य क्षेत्रीय या वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा ही सबसे मुख्य वजह रही। 


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