आपातकाल

इंदिरा गांधी के शासनकाल में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक (21 महीने) लगाए गए राष्ट्रीय आपातकाल को स्वतंत्र भारत के इतिहास का "काला अध्याय" माना जाता है. इस दौरान जनता और विपक्षी दलों पर ढाए गए अत्याचारों का मुख्य ब्यौरा निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है: 

## 1. मानवाधिकारों का हनन और सामूहिक गिरफ्तारियां

* विपक्षी नेताओं को जेल: जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई और चंद्रशेखर सहित 1 लाख से अधिक राजनीतिक विरोधियों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया. 

* कठोर कानूनों का दुरुपयोग: बिना किसी मुकदमे या वारंट के लोगों को अनिश्चितकाल के लिए कैद करने के लिए मीसा (MISA - Maintenance of Internal Security Act) और डीआईआर (DIR) जैसे क्रूर कानूनों का अंधाधुंध इस्तेमाल किया गया. 

* मौलिक अधिकारों का निलंबन: संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 22 को निलंबित कर दिया गया, जिससे नागरिकों से 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार' भी छीन लिया गया. गिरफ्तार व्यक्ति अदालत से जमानत भी नहीं मांग सकता था. 

* जेलों में अमानवीय यातनाएं: पुलिस हिरासत में बंदियों को बेरहमी से पीटा गया. केरल के छात्र पी. के. राजन जैसे कई लोगों की हिरासत में बर्बर टॉर्चर के कारण मौत हो गई और उनके शव तक गायब कर दिए गए. 

## 2. जबरन नसबंदी (परिवार नियोजन अभियान) [10] 

* संजय गांधी के नेतृत्व में देश भर में क्रूरतापूर्वक सामूहिक नसबंदी अभियान चलाया गया. 

* लगभग 62 लाख पुरुषों (मुख्य रूप से गरीब, युवा और अल्पसंख्यक समुदायों) की उनकी मर्जी के बिना जबरन नसबंदी कर दी गई. 

* सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और पुलिस को नसबंदी के "कोटा" पूरे करने के लिए मजबूर किया गया, जिसके कारण जनता पर भारी जुल्म ढाए गए. 

## 3. सुंदरीकरण के नाम पर उजाड़ और पुलिस फायरिंग (तुर्कमान गेट कांड)

* अप्रैल 1976 में दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में झुग्गियों को हटाने और सुंदरीकरण के नाम पर बुलडोजर चलाकर हजारों गरीब लोगों के आशियाने उजाड़ दिए गए. 

* जब स्थानीय निवासियों ने इसका विरोध किया, तो पुलिस ने बर्बरता दिखाते हुए भीड़ पर सीधी गोलीबारी कर दी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए (आधिकारिक तौर पर संख्या कम बताई गई). 

## 4. प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूर्ण प्रतिबंध

* सेंसरशिप लागू: अखबारों की स्वतंत्रता पूरी तरह छीन ली गई. छपने से पहले हर खबर को सरकारी अधिकारियों से पास कराना अनिवार्य था. इसके विरोध में कई अखबारों ने अपने संपादकीय पन्ने खाली छोड़े थे.

* कलाकारों पर प्रतिबंध: सरकार का गुणगान न करने वाले कलाकारों को प्रताड़ित किया गया. मशहूर गायक किशोर कुमार के गानों को ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर पूरी तरह प्रतिबंधित (ब्लैकलिस्ट) कर दिया गया क्योंकि उन्होंने कांग्रेस की रैली में गाने से मना कर दिया था. 'किस्सा कुर्सी का' और 'आंधी' जैसी फिल्मों को जब्त या प्रतिबंधित किया गया. [

## 5. न्यायपालिका और राजघरानों पर प्रहार

* न्यायपालिका को कमजोर करना: इंदिरा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के उन जजों का तबादला कर दिया या उन्हें पदोन्नत नहीं किया जिन्होंने सरकार के खिलाफ फैसले दिए थे.
* राजघरानों की प्रताड़ना: जयपुर की महारानी गायत्री देवी और ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया जैसी लोकप्रिय महिला नेताओं को विदेशी मुद्रा कानून के झूठे आरोपों में तिहाड़ जेल की सामान्य बैरकों में बंद कर दिया गया और उनकी संपत्तियां सील कर दी गईं. 

## शाह आयोग की रिपोर्ट
आपातकाल के बाद 1977 में बनी जनता पार्टी सरकार ने इन अत्याचारों की जांच के लिए 'शाह जांच आयोग' (Shah Commission) का गठन किया था. पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.सी. शाह की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सत्ता के भयंकर दुरुपयोग, अवैध गिरफ्तारियों, जबरन नसबंदी और पुलिस की बर्बरता का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया था. [

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आपातकाल का वह क्रूर मंजर,
जब कांग्रेस की हैवानियत का बंदी बना लोकतंत्र का मंदिर 
जनता से लेकर नेता तक लाखों निर्दोष थे बंदी 
भूमिगत जो हुये उनकी नहीं थी गिनती 
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आपातकाल के दौरान संपूर्ण विपक्ष को जेल में बंद करके इंदिरा गांधी सरकार ने 42वां संविधान संशोधन अधिनियम (1976) पारित किया था, जिसे "लघु संविधान" (Mini-Constitution) भी कहा जाता है. इसके जरिए संविधान के मूल ढांचे को बदलने और संसद (प्रधान मंत्री) को सर्वोच्च बनाने के लिए निम्नलिखित प्रमुख बदलाव किए गए: 

## 1. प्रस्तावना (Preamble) में बदलाव

* तीन नए शब्द: संविधान की प्रस्तावना में तीन नए शब्द 'समाजवादी' (Socialist), 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) और 'अखंडता' (Integrity) जोड़े गए. 

## 2. संसद की सर्वोच्चता और न्यायिक समीक्षा पर रोक

* न्यायालयों के अधिकार छीने: अनुच्छेद 368 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि संसद द्वारा किए गए किसी भी संवैधानिक संशोधन को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती. 

* न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) सीमित: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की रिट जारी करने और कानूनों की संवैधानिकता जांचने की शक्ति को बेहद कमजोर कर दिया गया. 

## 3. लोक सभा और विधान सभाओं का कार्यकाल बढ़ाना  

* कार्यकाल 6 वर्ष किया: लोक सभा और देश की सभी राज्य विधान सभाओं का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया गया. 

## 4. मौलिक अधिकारों पर नीति निदेशक तत्वों को वरीयता 

* अधिकारों का हनन: यह व्यवस्था की गई कि यदि सरकार सभी नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles) को लागू करने के लिए कोई कानून बनाती है, तो उसे इस आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) का उल्लंघन करता है.

## 5. मौलिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) का समावेश

* संविधान में नया भाग: नागरिकों के लिए संविधान में एक नया भाग IV-A और अनुच्छेद 51A जोड़ा गया, जिसके तहत 10 मौलिक कर्तव्य निर्धारित किए गए (स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर). 

## 6. राष्ट्रपति को कैबिनेट की सलाह मानने के लिए बाध्य करना 

* राष्ट्रपति की शक्ति सीमित: अनुच्छेद 74(1) में संशोधन कर यह अनिवार्य कर दिया गया कि राष्ट्रपति, केंद्रीय कैबिनेट (प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद) की सलाह मानने के लिए पूरी तरह बाध्य हैं. 

## 7. शक्तियों का केंद्रीयकरण (सातवीं अनुसूची में बदलाव) 

* राज्यों के अधिकार छीने: पांच महत्वपूर्ण विषयों को 'राज्य सूची' (State List) से हटाकर 'समवर्ती सूची' (Concurrent List) में डाल दिया गया, जिससे केंद्र का नियंत्रण बढ़ गया:
* शिक्षा (Education)
   * वन (Forests)
   * वन्य जीवों और पक्षियों का संरक्षण
   * नाप और तौल
   * न्याय का प्रशासन 

## 8. देशव्यापी अशांति पर केंद्र को विशेष शक्ति

* सैन्य बल तैनात करने का अधिकार: केंद्र सरकार को यह शक्ति दी गई कि वह किसी भी राज्य में कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति से निपटने के लिए केंद्रीय सशस्त्र बलों (Armed Forces) को सीधे तैनात कर सकती है. 

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## आपातकाल के बाद क्या हुआ?
1977 में जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार आई, तो उन्होंने 43वें और 44वें संविधान संशोधन (1978) के जरिए 42वें संशोधन द्वारा किए गए कई अलोकतांत्रिक बदलावों को पलट दिया. लोक सभा का कार्यकाल वापस 5 वर्ष किया गया, न्यायपालिका के अधिकार बहाल किए गए और यह प्रावधान किया गया कि आपातकाल में भी नागरिकों के 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार' (अनुच्छेद 21) को छीना नहीं जा सकता. 


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