बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

बालिगा और नाबालिग मानना : विज्ञान सम्मत होना चाहिए

- अरविन्द सिसोदिया

मेरा मानना हे कि न्यायलय को सिर्फ उम्र के किसी सरकार द्वारा कानून बना देने को नजर अंदाज यह कह कर कर देना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति शारीरिक और मानसिक वयस्क 14 से 16 के बीच  हो जाता हे । बालिगा और नाबालिग  का मानना किसी सरकार के बजाये विज्ञान सम्मत होना चाहिए । एक व्यक्ति दोबार बलात्कार करके हत्या कर रहा हे , वह किसी भी तरह से नाबालिग नहीं हे ।

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सुप्रीम कोर्ट 'जुविनायल जस्टिस एक्ट' यानी किशोर न्याय क़ानून के भीतर किशोर की परिभाषा पर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के लिए तैयार हो गया है.
न्यायालय में दाख़िल याचिका में कहा गया है कि साल 2000 के इस क़ानून में कई ऐसे प्रावधान हैं जो संविधान के भीतर मौजूद मूलभूत अधिकारों का उलंघन करते हैं.कहा गया है कि ये प्रावधान बराबरी, जीवन और आज़ादी के अधिकारों के मूलभूत अधिकारों के विरूद्ध हैं.
न्याय बोर्ड
किशोर न्याय क़ानून किशोरों के अपराध से संबंधित है और इस तरह के मामले किशोर न्याय बोर्ड में सुने जाते हैं.
क़ानून के भीतर प्रावधान है कि जो किशोर या किशोरी 18 साल से कम उम्र के हैं, और वो अगर किसी अपराध में लिप्त पाए जाते हैं तो उनकी सुनवाई इसी बोर्ड में होगी.ख़बरों के मुताबिक़ दो वकीलों- सुकुमार और कमल कुमार पांडे की याचिका में कहा गया है कि किसी कम उम्र के अभियुक्त का मामला इस किशोर क़ानून के भीतर सुना जाएगा या सामान्य भारतीय दंड संहिता के दायरे में ये अपराध की गंभीरता के आधार पर तय किया जाना चाहिए.
वर्मा समिति
हाल में हुए दिल्ली सामुहिक बलात्कार मामले के बाद किशोर न्याय क़ानून पर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है.एक वर्ग की मांग है कि अगर अपराध गंभीर हो तो उम्र की सीमा कड़ी कारवाई के आड़े नहीं आनी चाहिए. दूसरी ओर बाल अधिकारों के लिए काम करने वालों का कहना है कि कम उम्र के लोगों को सुधरने का मौक़ा फिर से दिया जाना चाहिए.औरतों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों पर क़ानून की समीक्षा और सुझाव के लिए तैयार जस्टिस वर्मा समिति ने भी किशोरों की परिभाषा में तबदीली न करने की सलाह दी है.

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        किसी खास केस में नाबालिग को सजा हो सकती है या नहीं इसकी समीक्षा अब सु्प्रीम कोर्ट करेगा. एक पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्‍ट की समीक्षा किए जाने की जरूरत है. इस मामले की अगली सुनवाई 3 अप्रैल को होगी. पिछले साल दिसंबर में दिल्‍ली गैंगरेप में फंसे 6 आरोपियों में एक ने अपने आपको 17 साल का बताया है, जिसके बाद से पूरे देश भर में यह बहस हो रही है कि क्‍या ऐसे मामलों में नाबालिग को भी सजा होनी चाहिए या नहीं.
           इस मामले में बाकी 5 आरोपियों पर आईपीसी की 11 धाराओं पर केस चलाया जा रहा है जिसमें अधिकतम सजा फांसी तक की है. लेकिन इस जुर्म के लिए उस नाबालिग पर जुवेनाइल कोर्ट में मामला चल रहा है और उसमें अधिकतम सजा 3 साल की है, जिसमें उसे सुधार प्रक्रिया के तहत रखा जाएगा.
पुलिस के अनुसार नाबालिग ही उन छह में सबसे क्रूर था, जिसने मृतक लड़की और उसके दोस्‍त पर लोहे के सरिया से वार किया था. उल्‍लेखनीय है कि कोर्ट ने उसे नाबालिग ही माना है.
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नाबालिग की परिभाषा फिर होगी तय, एक्ट की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय कानून में ‘किशोर’ की परिभाषा की सांविधानिक वैधता के सवाल पर गौर करने का निश्चय किया है। इसमें अपराध की संगीनता के बावजूद 18 साल से चंद सप्ताह कम आयु का होने पर भी ऐसे अपराधी को नाबालिग ही माना गया है।
न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने कहा कि हम इस मामले पर गौर करेंगे क्योंकि यह आयु निर्धारण से संबंधित है। न्यायाधीशों ने कहा कि यह कानून का सवाल है और गंभीर अपराध में आरोपी पर बालिग के रूप में मुकदमा चलाने का निर्णय करते समय उसकी आयु के निर्धारण का अपराध की गंभीरता से कुछ तो तालमेल होना चाहिए। न्यायालय ने इसके साथ ही इस मामले में उठाए गए मसलों पर विचार के लिए अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती से सहयोग करने का आग्रह किया है। इस याचिका में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) कानून में प्रदत्त किशोर की परिभाषा को निरस्त करने का भी अनुरोध किया गया है।
न्यायालय ने अटार्नी जनरल को इस मामले में विधि मंत्रालय और गृह मंत्रालय की ओर से हलफनामा तथा संबंधित रिपोर्ट 29 मार्च तक दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले में अब तीन अप्रैल को आगे सुनवाई होगी। यह याचिका कमल कुमार पांडे और सुकुमार नाम के वकीलों ने दायर की है। याचिका में किशोर न्याय कानून की धारा 2 (एल), धारा 10 और 17 के प्रावधानों के तर्कहीन, मनमाना और असंवैधानिक होने का दावा किया गया है। अटार्नी जनरल ने कहा कि न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति की रिपोर्ट ने सभी बिंदुओं पर गौर किया है लेकिन उसने किशोर का वर्गीकरण करने के लिए उसकी उम्र कम करने की सिफारिश करने से परहेज किया है। इस पर न्यायाधीशों ने कहा कि वे न्यायमूर्ति वर्मा समिति की रिपोर्ट पर गौर नहीं करेंगे क्योंकि उसके समक्ष शुद्ध रूप से कानून का मसला था।
अटार्नी जनरल वाहनवती ने कहा कि केन्द्र सरकार इस मामले में न्यायालय के साथ सहयोग के लिए तैयार है और राज्य सरकारों से भी इस विषय पर गौर करने के लिए कहा जा सकता था। उन्होंने कहा कि कुछ गैर सरकारी संगठन भी इस विषय पर काफी सक्रिय हैं। न्यायाधीशों ने इस पर कहा कि राज्यों की इसमें कोई भूमिका नहीं है और हम गैर सरकारी संगठनों को नहीं सुनेंगे। न्यायालय ने कहा कि चूंकि यह मामला आयु निर्धारण से संबंधित है और किशोर न्याय कानून अंतरराष्ट्रीय कंनवेन्शन पर आधारित है। ऐसे भी कई देश हैं, जिन्होंने किशोर की उम्र परिभाषित करने के इरादे से इसे 16 साल निर्धारित किया है तो कुछ ने 18 साल ही रखा है।
न्यायाधीशों ने कहा कि हम सिर्फ संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के संदर्भ में ही इस पर विचार कर रहे है। इससे पहले, जनहित याचिका में आरोपी व्यक्ति को ‘किशोर’ के रूप में वर्गीकृत करना विधि के विपरीत है और किशोर न्याय कानून में प्रदत्त संबंधित प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि इस कानून में प्रदत्त किशोर की परिभाषा कानून के प्रतिकूल है। उनका तर्क है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 82 और 83 में किशोर की परिभाषा में अधिक बेहतर वर्गीकरण है। धारा 82 के अनुसार सात साल से कम आयु के किसी बालक द्वारा किया गया कृत्य अपराध नहीं है जबकि धारा 83 के अनुसार सात साल से अधिक और 12 साल से कम आयु के ऐसे बच्चे द्वारा किया गया कोई भी कृत्य अपराध नहीं है जो किसी कृत्य को समझने या अपने आचरण के स्वरूप तथा परिणाम समझने के लिये परिपक्व नहीं हुआ है।
न्‍यायालय का यह निश्चय दिल्ली में पिछले साल 16 दिसंबर को 23 साल की लड़की से सामूहिक बलात्कार की घटना में शामिल छह आरोपियों में से एक के नाबालिग होने की बात सामने आने के बाद से अधिक महत्वपूर्ण है। इस वारदात के बाद से ही किशोर न्याय कानून के तहत किशोर की आयु का मामला चर्चा में है। वाहनवती ने कहा कि इस मसले पर गौर करते समय यह ध्यान रखना होगा कि यह किशोर के कृत्य का सवाल नहीं है बल्कि यह भी सोचना होगा कि उसने ऐसा क्यों किया और यह भी संबंधित तथ्य है कि समाज ने उसे विफल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि किशोर को वर्गीकृत करते समय उसकी उम्र सीमा कम करके 16 साल की जाये या फिर इसके 18 साल रखा जाये या इस मसले पर निर्णय का सवाल अदालत के विवेक पर छोड़ना होगा।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की वर्ष 2011 की रिपोर्ट के अपराध के आंकड़ों से पता चलता है कि 18 साल से कम आयु के किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में कुल मिलाकर करीब दो फीसदी का इजाफा हुआ है। यही नहीं, 2011 में किशोरों ने 33887 अपराध किये जिसमें से 4443 अपराध करने वाले किशोरों ने उच्चतर माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त की थी और 27577 किशोर अपराधी अपने परिवारों के साथ रह रहे थे जबकि सिर्फ 1924 किशोर ही बेघर थे।
याचिका के अनुसार इन किशोर अपराधियों में से लगभग दो तिहाई किशोर 16 से 18 आयु वर्ग के हैं। याचिका में कहा गया है कि 2010 की तुलना में 2011 में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। (एजेंसी)
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