गुरुवार, 28 नवंबर 2019

इकलौता बेटा : करोड़पति मां का कंकाल



भारतीय संस्कृति बचाओ पवित्र परिवार बनाओ 

- अरविन्द सिसौदिया, जिला महामंत्री भाजपा कोटा !!! 9414180151



मुम्बई की करोड़पति स्त्री का शव है। एक करोड़पति NRI पुत्र की माँ की लाश है।

#जरूर_पढ़ें
यह मुम्बई की करोड़पति स्त्री का शव है। एक करोड़पति NRI पुत्र की माँ की लाश है। लगभग 10 माह से 7 करोड़ के फ़्लैट में मरी पड़ी थी। अमेरिका में रहने वाले इंजीनियर ऋतुराज साहनी लंबे अरसे बाद अपने घर मुंबई लौटे, तो घर पर उनका सामना किसी जीवित परिजन की जगह अपनी मां के कंकाल से हुआ। बेटे को नहीं मालूम कि उसकी मां आशा साहनी की मौत कब और किन परिस्थितियों में हुई। आशा साहनी के बुढ़ापे की एकमात्र आशा 'उनके इकलौते बेटे' ने खुद स्वीकार किया कि उसकी मां से आखिरी बातचीत कोई सवा साल पहले बीते साल अप्रैल में हुई थी।
23 अप्रैल 2016 को मां ने ऋुतुराज से कहा था कि बेटा! अब अकेले नहीं रह पाती हूँ। या तो अपने पास अमेरिका बुला लो या फिर मुझे किसी ओल्डएज होम में भेज दो। बेटे ऋतुराज ने आशा साहनी को ढाढस दिया कि मां फिक्र न करे, वह जल्द ही इंडिया आएगा। डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका में किसी भारतीय का नौकरी करना और डालर कमाना आसान नहीं रहा। लिहाजा बेटे ने अपने हिसाब से तो जल्दी ही की होगी, वह सवा साल बाद मॉं से किया वायदा पूरा करने इंडिया आया, पर माँ के हिसाब से देर हो गई और इसी बीच न जाने कब आशा साहनी की मौत हो गई।
रविवार सुबह एयरपोर्ट से घर पहुंचने के बाद ऋतुराज साहनी ने काफी देर तक दरवाजे पर दस्तक दी। जब कोई जवाब नहीं आया तो उन्होंने दरवाजा खुलवाने के लिए एक चाबी बनाने वाले की मदद ली। भीतर घुसे तो उन्हें अपनी 63 साल की मां आशा साहनी का कंकाल मिला।

आशा साहनी 10वें फ्लोर पर बड़े से फ़्लैट में अकेले रहती थीं। उनके पति की मौत 2013 में हो चुकी थी। पुलिस के मुताबिक 10वीं मंजिल पर स्थित दोनों फ्लैट साहनी परिवार के ही हैं, इसलिए शायद पड़ोसियों को कोई बदबू नहीं आई। हालांकि पुलिस के मुताबिक यह भी हैरानी की बात है कि किसी मेड या फिर पड़ोसी ने उनके दिखाई न देने पर गौर क्यों नहीं किया।

बेटे ने अंतिम बार अप्रैल 2016 में बात होने की जानकारी ऐसे दी, मानों वह अपनी मां से कितना रेगुलर टच में था। जैसा कि बेटे से बातचीत में आशा ने संकेत भी किया था कि वह इतनी अशक्त हो चुकी थीं कि उनका अकेले चल-फिर पाना और रहना मुश्किल हो गया था। करोड़ों डालर कमाने वाले बेटे की मां और 12 करोड़ के दो फ़्लैटों की मालकिन आशा साहनी को अंतिम यात्रा तो नसीब नहीं ही हुई, इससे भी बड़ी विडंबना यह हुई, जैसा कि प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि संभवत: आशा की मौत भूख-प्यास के चलते हुई।

भारत के महाराष्ट्र प्रान्त की आर्थिक राजधानी मुंबई के अंधेरी इलाके लोखंडवाला की पाश लोकलिटी 'वेल्स कॉट सोसायटी' में इस अकेली बुजुर्ग महिला की मौत जिन हालात में हुई, उनसे यह साफ है कि कोलंबिया विश्वविद्यालय की रिपोर्ट में छुपी पश्चिमी सभ्यता की त्रासदी हम भारतीयों के दरवाजे पर दस्तक देती लग रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक मौत का इंतजार ही इस सदी की सबसे खौफनाक बीमारी और आधुनिक जीवन शैली की सबसे बड़ी त्रासदी है। अशक्त मां की करुण पुकार सुनकर भी अनसुना कर देने वाला जब अपना इकलौता बेटा ही हो, तब ऐसे समाज में रिश्ते-नातेदारों से क्या अपेक्षा की जाय?

आशा साहनी की मौत ने एक बार फिर चेताया है कि भारत के शहरों में भी सामाजिक ताना-बाना किस कदर बिखर गया है। अब समय नहीं बचा है, अब भारतवर्ष को चेत जाना चाहिए। भारत में भारतीय संस्कृति नहीं बची तो कुछ नहीं बचेगा।

रविवार, 24 नवंबर 2019

अयोध्या मामले से :न्यायपालिका के प्रति, देश का सम्मान और बढ़ा - प्रधानमंत्री मोदी



https://www.narendramodi.in/hi/mann-ki-baat
अयोध्या मामले में:न्यायपालिका के प्रति, देश का सम्मान और बढ़ा - प्रधानमंत्री मोदी
मेरे प्यारे देशवासियो, ‘मन की बात’ में आप सबका स्वागत है |
आज मन की बात की शुरुआत, युवा देश के, युवा, वो गर्म जोशी, वो देशभक्ति, वो सेवा के रंग में रंगे नौजवान, आप जानते हैं ना | नवम्बर महीने का चौथा रविवार हर साल NCC Day के रूप में मनाया जाता है | आमतौर पर हमारी युवा पीढ़ी को Friendship Day बराबर याद रहता है | लेकिन बहुत लोग हैं जिनको NCC Day भी उतना ही याद रहता है | तो चलिए आज NCC के बारे में बातें हो जाए | मुझे भी कुछ यादें ताजा करने का अवसर मिल जाएगा | सबसे पहले तो NCC के सभी पूर्व और मौजूदा Cadet को NCC Day की बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूँ | क्योंकि मैं भी आप ही की तरह Cadet रहा हूँ और मन से भी, आज भी अपने आपको Cadet मानता हूँ | यह तो हम सबको पता ही है NCC यानी National Cadet Corps | दुनिया के सबसे बड़े uniformed youth organizations में भारत की NCC एक है | यह एक Tri-Services Organization है जिसमें सेना, नौ-सेना, वायुसेना तीनों ही शामिल हैं | Leadership, देशभक्ति, selfless service, discipline, hard-work इन सबको अपने character का हिस्सा बना लें, अपनी habits बनाने की एक रोमांचक यात्रा मतलब - NCC | इस journey के बारे में कुछ और अधिक बातें करने के लिए आज फ़ोन कॉल्स से कुछ नौजवानों से, जिन्होंने अपने NCC में भी अपनी जगह बनायी है | आइये उनसे बातें करते हैं |

प्रधानमंत्री : साथियो आप सब कैसे हैं |

तरन्नुम खान : जय हिन्द प्रधानमंत्री जी

प्रधानमंत्री : जय हिन्द

तरन्नुम खान : सर मेरा नाम Junior Under Officer तरन्नुम खान है

प्रधानमंत्री : तरन्नुम आप कहाँ से हैं |

तरन्नुम खान : मैं दिल्ली की रहने वाली हूँ सर

प्रधानमंत्री : अच्छा | तो NCC में कितने साल कैसे कैसे
अनुभव रहे आपके ?

तरन्नुम खान : सर मैं NCC में 2017 में भर्ती हुई थी and ये तीन
साल मेरी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन साल रहे हैं |

प्रधानमंत्री : वाह, सुनकर के बहुत अच्छा लगा |

तरन्नुम खान : सर, मैं आपको बताना चाहूंगी कि मेरा सबसे अच्छा अनुभव जो रहा वो ‘एक भारत-श्रेष्ठभारत’ कैम्प में रहा था | ये हमारा कैम्प अगस्त में हुआ था जिसमें NER ‘North Eastern Region’ के बच्चे भी आये थे | उन Cadets के साथ हम 10 दिन के लिये रहे | हमने उनका रहन-सहन सीखा | हमने देखा कि उनकी language क्या है | उनका tradition, उनका culture हमने उनसे ऐसी कई सारी चीजें सीखी | जैसे via-zhomi का मतलब होता है... हेलो आप कैसे हैं?.... वैसे ही, हमारी cultural night हुई थी,उसके अन्दर उन्होंने हमें अपना dance सिखाया, तेहरा कहते हैं उनके dance को | और उन्होंने मुझे ‘मेखाला’(mekhela) पहनना भी सिखाया | मैं सच बताती हूँ , उसके अन्दर बहुत खूबसूरत हम सभी लग रहे थे दिल्ली वाले as well as हमारे नागालैंड के दोस्त भी | हम उनको दिल्ली दर्शन पर भी लेकर गये थे ,जहां हमने उनको National War Memorial और India Gate दिखाया | वहां पर हमने उनको दिल्ली की चाट भी खिलायी, भेल-पूरी भी खिलाई लेकिन उनको थोड़ा तीखा लगा क्योंकि जैसा उन्होंने बताया हमको कि वो ज्यादातर soup पीना पसंद करते हैं, थोड़ी उबली हुई सब्जियां खाते हैं, तो उनको खाना तो इतना भाया नहीं, लेकिन, उसके अलावा हमने उनके साथ काफी pictures खींची, काफी हमने अनुभव share करे अपने |

प्रधानमंत्री : आपने उनसे संपर्क बनाये रखा है ?

तरन्नुम खान : जी सर, हमारे संपर्क उनसे अब तक बने हुए हैं |

प्रधानमंत्री : चलिए ,अच्छा किया आपने |

तरन्नुम खान : जी सर

प्रधानमंत्री : और कौन है साथी आपके साथ?

श्री हरि जी.वी. : जय हिन्द सर |

प्रधानमंत्री : जय हिन्द
श्री हरि जी.वी. : मैं Senior Under Officer Sri Hari
G.V. बोल रहा हूँ | मैं बेंगलूरू, कर्नाटका का रहने वाला हूँ |

प्रधानमंत्री : और आप कहाँ पढ़ते हैं ?

श्री हरि जी.वी. : सर बेंगलूरू में Kristujayanti College में

प्रधानमंत्री : अच्छा, बेंगलूरू में ही हैं !

श्री हरि जी.वी. : Yes Sir,

प्रधानमंत्री : बताइये

श्री हरि जी.वी. : सर, मैं कल ही Youth Exchange Programme
Singapore से वापिस आये थे

प्रधानमंत्री : अरे वाह !

श्री हरि जी.वी. : हाँ सर

प्रधानमंत्री : तो आपको मौका मिल गया वहां जाने का

श्री हरि जी.वी. : Yes Sir

प्रधानमंत्री : कैसा अनुभव रहा सिंगापुर में ?

श्री हरि जी.वी. : वहां पे छह (six) country आये थे जिनमें था
United Kingdom, United States of America, Singapore, Brunei, Hong Kong और Nepal | यहाँ पर हमने combat lessons और International Military exercises का एक exchange सीखा था | यहाँ पर हमारा performance कुछ ही अलग था, sir | इनमें से हमें water sports और adventure activities सिखाया था और water polo tournament में India team जीत हासिल किया था sir | और cultural में हम overall performers थे sir | हमारा drill और word of command बहुत अच्छा लगा था sir उनको |

प्रधानमंत्री : आप कितने लोग थे हरि ?

श्री हरि जी.वी. : 20 लोग sir | हम 10 (ten) boy, 10 (ten) girl थे sir|

प्रधानमंत्री : हाँ यही, भारत के सभी अलग-अलग राज्य से थे?

श्री हरि जी.वी. : हाँ सर |

प्रधानमंत्री : चलिए, आपके सारे साथी आपका अनुभव सुनने के
लिए बहुत आतुर होंगे लेकिन मुझे अच्छा लगा | और कौन है आपके साथ ?

विनोले किसो : जय हिन्द सर,

प्रधानमंत्री : जय हिन्द

विनोले किसो : मेरा नाम है Senior Under Officer
विनोले किसो | मैं North Eastern Region Nagaland State का है सर

प्रधानमंत्री : हाँ, विनोले, बताइए क्या अनुभव है आपका ?

विनोले किसो : सर, मैं St. Joseph’s college, Jakhama ( Autonomous) में पढ़ाई कर रहा है , B.A. History (Honours) में | मैंने 2017 साल में NCC join किया और ये मेरे ज़िन्दगी का सबसे बड़ा और अच्छी decision था, सर |

प्रधानमंत्री : NCC के कारण हिंदुस्तान में कहाँ-कहाँ जाने का
मौका मिला है ?

विनोले किसो : सर, मैंने NCC join किया और बहुत सीखा था
और मुझे opportunities भी बहुत मिली थी और मेरा एक experience था वो मैं आपको बताना चाहता है | मैंने इस साल 2019 जून महीने से एक कैंप attend किया वो है Combined Annual Training Camp और वो Sazolie College, Kohima में held किया | इस कैंप में 400 cadets ने attend किया |

प्रधानमंत्री : तो नागालैंड में सारे आपके साथी जानना चाहते होंगे हिंदुस्तान में कहाँ गए, क्या-क्या देखा ? सब अनुभव सुनाते हो सबको ?

विनोले किसो : Yes sir.

प्रधानमंत्री : और कौन है आपके साथ ?

अखिल : जय हिन्द सर, मेरा नाम Junior Under Officer
Akhil है |

प्रधानमंत्री : हाँ अखिल, बताइए |

अखिल : मैं रोहतक, हरियाणा का रहने वाला हूँ, सर |

प्रधानमंत्री : हाँ...

अखिल : मैं दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी से
Physics Honours कर रहा हूँ |

प्रधानमंत्री : हाँ... हाँ...

अखिल : सर, मुझे NCC में सबसे अच्छा discipline लगा है
सर |

प्रधानमंत्री : वाह...

अखिल : इसने मुझे और ज्यादा responsible citizen बनाया
है सर | NCC cadet की drill, uniform मुझे बेहद पसंद है |

प्रधानमंत्री : कितने camp करने का मौका मिला, कहाँ-कहाँ
जाने का मौका मिला ?

अखिल : सर, मैंने 3 camp किये है सर | मैं हाल ही में
Indian Military Academy, Dehradun में attachment camp का हिस्सा रहा हूँ |

प्रधानमंत्री : कितने समय का था ?

अखिल : सर, ये 13 दिन का camp का था सर |

प्रधानमंत्री : अच्छा

अखिल : सर, मैंने वहाँ पर भारतीय फौज में अफसर कैसे
बनते हैं ,उसको बड़े करीब से देखा है और उसके बाद मेरा भारतीय फौज में अफसर बनने का संकल्प और ज्यादा दृढ़ हुआ है सर |

प्रधानमंत्री : वाह...

अखिल : और सर मैंने Republic Day Parade में भी हिस्सा
लिया था और वो मेरे लिए और मेरे परिवार के लिए बहुत ही गर्व की बात थी |
प्रधानमंत्री : शाबाश...

अखिल : मेरे से ज्यादा ख़ुशी मेरी माँ थी सर | जब
हम सुबह 2 बजे उठ कर राजपथ पर practice करने जाते थे तो जोश हम में इतना होता था कि वो देखने लायक था | बाकी forces contingent के लोग जो हमें इतना प्रोत्साहित करते थे राजपथ पर march करते वक़्त हमारे रोंगटे खड़े हो गए थे सर |

प्रधानमंत्री : चलिए आप चारों से बात करने का मौका मिला
और वो भी NCC Day पर | मेरे लिये बहुत ख़ुशी की बात है क्योंकि मेरा भी सौभाग्य रहा कि मैं भी बचपन में मेरे गाँव के स्कूल में NCC Cadet रहा था तो मुझे मालूम है कि ये discipline, ये uniform, उसके कारण जो confidence level बढ़ता है, ये सारी चीज़ें बचपन में मुझे एक NCC Cadet के रूप में अनुभव करने का मौका मिला था |

विनोले : प्रधानमंत्री जी मेरा एक सवाल है |
प्रधानमंत्री : हाँ बताइए...

तरन्नुम : कि आप भी एक NCC का हिस्सा रहे हैं
प्रधानमंत्री : कौन ? विनोले बोल रही हो ?

विनोले : yes sir
प्रधानमंत्री : हाँ विनोले बताइए...

विनोले : क्या आपको कभी भी punishment मिली थी ?
प्रधानमंत्री : (हँस कर) इसका मतलब कि आप लोगों को
punishment मिलती है ?

विनोले : हां सर |
प्रधानमंत्री : जी नहीं, मुझे ऐसा कभी हुआ नहीं क्योंकि मैं
बहुत ही, एक प्रकार से discipline मैं मानने वाला था लेकिन एक बार जरुर misunderstanding हुआ था | जब हम camp में थे तो मैं एक पेड़ पर चढ़ गया था | तो पहले तो ऐसा ही लगा कि मैं कोई कानून तोड़ दिया है लेकिन बाद में सबको ध्यान में आया कि वहाँ, ये पतंग की डोर में एक पक्षी फंस गया था | तो उसको बचाने के लिए मैं वहाँ चढ़ गया था | तो खैर, पहले तो लगता था कि मुझ पर कोई discipline action होंगे लेकिन बाद में मेरी बड़ी वाह-वाही हो गयी | तो इस प्रकार से एक अलग ही अनुभव आया मुझे |

तरन्नुम खान : जी सर, ये जान कर बहुत अच्छा लगा सर |
प्रधानमंत्री : Thank You.

तरन्नुम खान : मैं तरन्नुम बात कर रही हूँ |
प्रधानमंत्री : हाँ तरन्नुम, बताइए...

तरन्नुम खान : अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं आपसे एक सवाल
करना चाहूंगी सर |

प्रधानमंत्री : जी... जी... बताइए |

तरन्नुम खान : सर, आपने अपने संदेशों में हमें कहा है कि हर
भारतीय नागरिक को 3 सालों में 15 जगह तो जाना ही चाहिए | आप हमें बताना चाहेंगे कि हमें कहाँ जाना चाहिए ? और आपको किस जगह जा कर सबसे अच्छा महसूस हुआ था ?

प्रधानमंत्री : वैसे मैं हिमालय को बहुत पसंद करता रहता हूँ
हमेशा |

तरन्नुम खान : जी...

प्रधानमंत्री : लेकिन फिर भी मैं भारत के लोगों से आग्रह
करूँगा कि अगर आपको प्रकृति से प्रेम है |

तरन्नुम खान : जी...

प्रधानमंत्री : घने जंगल, झरने, एक अलग ही प्रकार का माहौल
देखना है तो मैं सबको कहता हूँ आप North East जरुर जाइए |

तरन्नुम खान : जी सर |

प्रधानमंत्री : ये मैं हमेशा बताता हूँ और उसके कारण North
East में tourism भी बहुत बढ़ेगा, economy को भी बहुत फायदा होगा और ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के सपने को भी वहाँ मजबूती मिलेगी |

तरन्नुम खान : जी सर |

प्रधानमंत्री : लेकिन हिंदुस्तान में हर जगह पर बहुत कुछ
देखने जैसा है, अध्ययन करने जैसा है और एक प्रकार से आत्मसात करने जैसा है |

श्री हरि जी.वी. : प्रधानमंत्री जी, मैं श्री हरि बोल रहा हूँ |

प्रधानमंत्री : जी हरि बताइए...

श्री हरि जी.वी. : मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि आप एक
politician न होते तो आप क्या होते ?

प्रधानमंत्री : अब ये तो बड़ा कठिन सवाल है क्योंकि हर बच्चे
के जीवन में कई पड़ाव आते हैं | कभी ये बनने का मन करता है, कभी वो बनने का मन करता है लेकिन ये बात सही है कि मुझे कभी राजनीति में जाने का मन नहीं था, न ही कभी सोचा था लेकिन अब पहुँच गया हूँ तो जी-जान से देश के काम आऊँ, उसके लिए सोचता रहता हूँ और इसलिए अब मैं ‘यहाँ न होता तो कहाँ होता’ ये सोचना ही नहीं चाहिए मुझे | अब तो जी-जान से जहाँ हूँ वहाँ जी भरकर के जीना चाहिए, जी-जान से जुटना चाहिए और जमकर के देश के लिए काम करना चाहिए | न दिन देखनी है, न रात देखनी है बस यही एक मकसद से अपने आप को मैंने खपा दिया है |

अखिल : प्रधानमंत्री जी...

प्रधानमंत्री : जी...

अखिल : आप दिन में इतने busy रहते हो तो मेरी ये जिज्ञासा
थी जानने की कि आपको टी.वी. देखने का, फिल्म देखने का या किताब पढ़ने का समय मिलता है ?

प्रधानमंत्री : वैसे मेरी किताब पढ़ने की रूचि तो रहती थी |
फिल्म देखने की कभी रूचि भी नहीं रही, उसमें समय का बंधन तो नहीं है और न ही उस प्रकार से टी.वी. देख पाता हूँ | बहुत कम | कभी-कभी पहले discovery channel देखा करता था, जिज्ञासा के कारण | और किताबें पढ़ता था लेकिन इन दिनों तो पढ़ नहीं पाता हूँ और दूसरा Google के कारण भी आदतें ख़राब हो गई हैं क्योंकि अगर किसी reference को देखना है तो तुरंत shortcut ढूंढ लेते हैं | तो कुछ आदतें जो सबकी बिगड़ी हैं, मेरी भी बिगड़ी है | चलिए दोस्तों, मुझे बहुत अच्छा लगा आप सबसे बात करने के लिए और मैं आपके माध्यम से NCC के सभी cadets को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ देता हूँ | बहुत-बहुत धन्यवाद दोस्तों, Thank You !
सभी NCC cadets : बहुत-बहुत धन्यवाद सर, Thank You !
प्रधानमंत्री : Thank you, Thank You.
सभी NCC cadets : जय हिन्द सर |
प्रधानमंत्री : जय हिन्द |
सभी NCC cadets : जय हिन्द सर |
प्रधानमंत्री : जय हिन्द, जय हिन्द |
मेरे प्यारे देशवासियो, हम सभी देशवासियों को ये कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि 7 दिसम्बर को Armed Forces Flag Day मनाया जाता है | ये वो दिन है जब हम अपने वीर सैनिकों को, उनके पराक्रम को, उनके बलिदान को याद तो करते ही हैं लेकिन योगदान भी करते हैं | सिर्फ सम्मान का भाव इतने से बात चलती नहीं है | सहभाग भी जरुरी होता है और 07 दिसम्बर को हर नागरिक को आगे आना चाहिए | हर एक के पास उस दिन Armed Forces का Flag होना ही चाहिए और हर किसी का योगदान भी होना चाहिए | आइये, इस अवसर पर हम अपनी Armed Forces के अदम्य साहस, शौर्य और समर्पण भाव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें और वीर सैनिको का स्मरण करें |

मेरे प्यारे देशवासियो, भारत में Fit India Movement से तो आप परिचित हो ही गए होंगे | CBSE ने एक सराहनीय पहल की है | Fit India सप्ताह की | Schools, Fit India सप्ताह दिसम्बर महीने में कभी भी मना सकते हैं | इसमें fitness को लेकर कई प्रकार के आयोजन किए जाने हैं | इसमें quiz, निबंध, लेख, चित्रकारी, पारंपरिक और स्थानीय खेल, योगासन, dance एवं खेलकूद प्रतियोगिताएं शामिल हैं | Fit India सप्ताह में विद्यार्थियों के साथ-साथ उनके शिक्षक और माता-पिता भी भाग ले सकते हैं | लेकिन ये मत भूलना कि Fit India मतलब सिर्फ दिमागी कसरत, कागजी कसरत या laptop या computer पर या mobile phone पर fitness की app देखते रहना | जी नहीं ! पसीना बहाना है | खाने की आदतें बदलनी है | अधिकतम focus activity करने की आदत बनानी है | मैं देश के सभी राज्यों के school board एवं school प्रबंधन से अपील करता हूँ कि हर school में, दिसम्बर महीने में, Fit India सप्ताह मनाया जाए | इससे fitness की आदत हम सभी की दिनचर्या में शामिल होगी | Fit India Movement में fitness को लेकर स्कूलों की ranking की व्यवस्था भी की गई हैं | इस ranking को हासिल करने वाले सभी school, Fit India logo और flag का इस्तेमाल भी कर पाएंगे | Fit India portal पर जाकर school स्वयं को Fit घोषित कर सकते हैं | Fit India three star और Fit India five star ratings भी दी जाएगी | मैं अनुरोध करते हूँ कि सभी school, Fit India ranking में शामिल हों और Fit India यह सहज स्वभाव बने | एक जनांदोलन बने | जागरूकता आए | इसके लिए प्रयास करना चाहिए |

मेरे प्यारे देशवासियो, हमारे देश इतना विशाल है | इतना विविधिताओं से भरा हुआ है | इतना पुरातन है कि बहुत सी बातें हमारे ध्यान में ही नहीं आती हैं और स्वाभाविक भी है | वैसी एक बात मैं आपको share करना चाहता हूँ | कुछ दिन पहले MyGov पर एक comment पर मेरी नजर पड़ी | ये comment असम के नौगाँव के श्रीमान रमेश शर्मा जी ने लिखा था | उन्होंने लिखा ब्रहमपुत्र नदी पर एक उत्सव चल रहा है | जिसका नाम है ब्रहमपुत्र पुष्कर | 04 नवम्बर से 16 नवम्बर तक ये उत्सव था और इस ब्रहमपुत्र पुष्कर में शामिल होने के लिए देश के भिन्न-भिन्न भागों से कई लोग वहाँ पर शामिल हुए हैं | ये सुनकर आपको भी आश्चर्य हुआ ना | हाँ यही तो बात है ये ऐसा महत्वपूर्ण उत्सव है और हमारे पूर्वजों ने इसकी ऐसी रचना की है कि जब पूरी बात सुनोगे तो आपको भी आश्चर्य होगा | लेकिन दुर्भाग्य से इसका जितना व्यापक प्रचार होना चाहिए | जितनी देश के कोने-कोने में जानकारी होनी चाहिए, उतनी मात्रा में नहीं होती है | और ये भी बात सही है इस पूरा आयोजन एक प्रकार से एक देश-एक सन्देश और हम सब एक है | उस भाव को भरने वाला है, ताकत देने वाला है |

सबसे पहले तो रमेश जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने ‘मन की बात’ के माध्यम से देशवासियों के बीच ये बात शेयर करने का निश्चय किया | आपने पीड़ा भी व्यक्त की है कि है इतने महत्वपूर्ण बात की कोई व्यापक चर्चा नहीं होती है, प्रचार नहीं होता है | आपकी पीड़ा मैं समझ सकता हूँ | देश में ज्यादा लोग इस विषय में नहीं जानते हैं | हाँ, अगर शायद किसी ने इसको International River festival कह दिया होता, कुछ बड़े शानदार शब्दों का उपयोग किया होता, तो शायद, हमारे देश में कुछ लोग है जो ज़रूर उस पर कुछ न कुछ चर्चाएँ करते और प्रचार भी हो जाता |

मेरे प्यारे देशवासियों पुष्करम, पुष्करालू, पुष्करः क्या आपने कभी ये शब्द सुने हैं, क्या आप जानते हैं आपको पता है ये क्या है, मै बताता हूँ यह देश कि बारह अलग अलग नदियों पर जो उत्सव आयोजित होते हैं उसके भिन्न- भिन्न नाम है | हर वर्ष एक नदी पर यानि उस नदी का नंबर फिर बारह वर्ष के बाद लगता है, और यह उत्सव देश के अलग-अलग कोने की बारह नदियों पर होता है, बारी- बारी से होता है और बारह दिन चलता है कुम्भ की तरह ही ये उत्सव भी राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देता है और ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के दर्शन कराता है | पुष्करम यह ऐसा उत्सव है जिसमें नदी का मह्त्मय , नदी का गौरव, जीवन में नदी की महत्ता एक सहज रूप से उजागर होती है!

हमारे पूर्वजो ने प्रकृति को, पर्यावरण को , जल को , जमीन को , जंगल को बहुत अहमियत दी | उन्होंने नदियों के महत्व को समझा और समाज को नदियों के प्रति सकारात्मत भाव कैसा पैदा हो, एक संस्कार कैसे बनें , नदी के साथ संस्कृति की धारा, नदी के साथ संस्कार की धारा , नदी के साथ समाज को जोड़ने का प्रयास ये निरंतर चलता रहा और मजेदार बात ये है कि समाज नदियों से भी जुड़ा और आपस में भी जुड़ा | पिछले साल तमिलनाडु के तामीर बरनी नदी पर पुष्करम हुआ था | इस वर्ष यह ब्रह्मपुत्र नदी पर आयोजित हुआ और आने वाले साल तुंगभद्रा नदी आँध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में आयोजित होगा | एक तरह से आप इन बारह स्थानों की यात्रा एक Tourist circuit के रूप में भी कर सकते हैं | यहाँ मैं असम के लोगों की गर्मजोशी उनके आतिथ्य की सराहना करना चाहता हूँ जिन्होंने पूरे देश से आये तीर्थयात्रियों का बहुत सुन्दर सत्कार किया | आयोजकों ने स्वच्छता का भी पूरा ख्याल रखा | plastic free zone सुनिश्चित किये | जगह-जगह Bio Toilets की भी व्यवस्था की | मुझे उम्मीद है कि नदियों के प्रति इस प्रकार का भाव जगाने का ये हज़ारों साल पुराना हमारा उत्सव भावी पीढ़ी को भी जोड़े | प्रकृति, पर्यावरण, पानी ये सारी चीजें हमारे पर्यटन का भी हिस्सा बनें, जीवन का भी हिस्सा बनें |

मेरे प्यारे देशवासियों Namo App पर मध्यप्रदेश से बेटी श्वेता लिखती है, और उसने लिखा है, सर, मैं क्लास 9th में हूँ मेरी बोर्ड की परीक्षा में अभी एक साल का समय है लेकिन मैं students और exam warriors के साथ आपकी बातचीत लगातार सुनती हूँ, मैंने आपको इसलिए लिखा है क्योंकि आपने हमें अब तक ये नहीं बताया है कि अगली परीक्षा पर चर्चा कब होगी | कृपया आप इसे जल्द से जल्द करें | अगर, सम्भव हो तो, जनवरी में ही इस कार्यक्रम का आयोजन करें | साथियो, ‘मन की बात’ के बारे में मुझे यही बात बहुत अच्छी लगती है - मेरे युवा-मित्र, मुझे, जिस अधिकार और स्नेह के साथ शिकायत करते हैं, आदेश देते हैं, सुझाव देते हैं - यह देख कर मुझे बहुत खुशी होती है | श्वेता जी, आपने बहुत ही सही समय पर इस विषय को उठाया है | परीक्षाएँ आने वाली हैं, तो, हर साल की तरह हमें परीक्षा पर चर्चा भी करनी है | आपकी बात सही है इस कार्यक्रम को थोड़ा पहले आयोजित करने की आवश्यकता है !

पिछले कार्यक्रम के बाद कई लोगों ने इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए अपने सुझाव भी भेजे हैं, और, शिकायत भी की थी कि पिछली बार देर से हुआ था, परीक्षा एकदम से निकट आ गई थी | और श्वेता का सुझाव सही है कि मुझे, इसको, जनवरी में करना चाहिए HRD Ministry और MyGov की टीम, मिलकर, इस पर काम कर रही हैं | लेकिन, मैं, कोशिश करुगां, इस बार परीक्षा पर चर्चा जनवरी की शुरू में या बीच में हो जाए | देश भर के विद्यार्थियों-साथियों के पास दो अवसर हैं | पहला, अपने स्कूल से ही इस कार्यक्रम का हिस्सा बनना | दूसरा, यहाँ दिल्ली में होने वाले कार्यक्रम में भाग लेना | दिल्ली के लिए देश-भर से विद्यार्थियों का चयन MyGov के माध्यम से किया जाएगा | साथियो, हम सबको मिलकर परीक्षा के भय को भगाना है | मेरे युवा-साथी परीक्षाओं के समय हँसते-खिलखिलाते दिखें, Parents तनाव मुक्त हों, Teachers आश्वस्त हों, इसी उद्देश्य को लेकर, पिछले कई सालों से, हम, ‘मन की बात’ के माध्यम से ‘परीक्षा पर चर्चा’ Town Hall के माध्यम से या फिर Exam Warrior’s Book के माध्यम से लगातार प्रयास कर रहें हैं | इस मिशन को देश-भर के विद्यार्थियों ने, Parents ने, और Teachers ने गति दी इसके लिए मैं इन सबका आभारी हूँ, और, आने वाली परीक्षा चर्चा का कार्यक्रम हम सब मिलकर के मनाएँ - आप सब को निमंत्रण हैं |

साथियो, पिछले ‘मन की बात’ में हमने 2010 में अयोध्या मामले में आये इलाहाबाद हाई कोर्ट के Judgement के बारे में चर्चा की थी, और, मैंने कहा था कि देश ने तब किस तरह से शांति और भाई-चारा बनाये रखा था | निर्णय आने के पहले भी, और, निर्णय आने के बाद भी | इस बार भी, जब, 9 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट का Judgement आया, तो 130 करोड़ भारतीयों ने, फिर से ये साबित कर दिया कि उनके लिए देशहित से बढ़कर कुछ नहीं है | देश में, शांति, एकता और सदभावना के मूल्य सर्वोपरि हैं | राम मंदिर पर जब फ़ैसला आया तो पूरे देश ने उसे दिल खोलकर गले लगाया | पूरी सहजता और शांति के साथ स्वीकार किया | आज, ‘मन की बात’ के माध्यम से मैं देशवासियों को साधुवाद देता हूँ, धन्यवाद देना चाहता हूँ | उन्होंने, जिस प्रकार के धैर्य, संयम और परिपक्वता का परिचय दिया है, मैं, उसके लिए विशेष आभार प्रकट करना चाहता हूँ | एक ओर, जहाँ, लम्बे समय के बाद कानूनी लड़ाई समाप्त हुई है, वहीं, दूसरी ओर, न्यायपालिका के प्रति, देश का सम्मान और बढ़ा है | सही मायने में ये फैसला हमारी न्यायपालिका के लिए भी मील का पत्थर साबित हुआ है | सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद, अब देश, नई उम्मीदों और नई आकांशाओं के साथ नए रास्ते पर, नये इरादे लेकर चल पड़ा है | New India, इसी भावना को अपनाकर शांति, एकता और सदभावना के साथ आगे बढ़े - यही मेरी कामना है, हम सबकी कामना है |

मेरे प्यारे देशवासियो, हमारी सभ्यता, संस्कृति और भाषाएं पूरे विश्व को, विविधता में, एकता का सन्देश देती हैं | 130 करोड़ भारतीयों का ये वो देश है, जहाँ कहा जाता था, कि, ‘कोस-कोस पर पानी बदले और चार कोस पर वाणी’ | हमारी भारत भूमि पर सैकड़ों भाषाएँ सदियों से पुष्पित पल्लवित होती रही हैं | हालाँकि, हमें इस बात की भी चिंता होती है कि कहीं भाषाएँ और बोलियाँ ख़त्म तो नहीं हो जाएगी ! पिछले दिनों, मुझे, उत्तराखंड के धारचुला की कहानी पढ़ने को मिली | मुझे काफी संतोष मिला | इस कहानी से पता चलता है कि किस प्रकार लोग अपनी भाषाओँ, उसे बढ़ावा देने के लिए, आगे आ रहें है | कुछ, Innovative कर रहें हैं धारचुला खबर मैंने, मेरा, ध्यान भी, इसलिए गया कि किसी समय, मैं, धारचूला में आते-जाते रुका करता था | उस पार नेपाल, इस पार कालीगंगा - तो स्वाभाविक धारचूला सुनते ही, इस खबर पर, मेरा ध्यान गया | पिथौरागढ़ के धारचूला में, रंग समुदाय के काफ़ी लोग रहते हैं, इनकी, आपसी बोल-चाल की भाषा रगलो है | ये लोग इस बात को सोचकर अत्यंत दुखी हो जाते थे कि इनकी भाषा बोलने वाले लोग लगातार कम होते जा रहे हैं - फिर क्या था, एक दिन, इन सबने, अपनी भाषा को बचाने का संकल्प ले लिया | देखते-ही-देखते इस मिशन में रंग समुदाय के लोग जुटते चले गए | आप हैरान हो जायेंगे, इस समुदाय के लोगों की संख्या, गिनती भर की है | मोटा-मोटा अंदाज़ कर सकते हैं कि शायद दस हज़ार हो, लेकिन, रंग भाषा को बचाने के लिए हर कोई जुट गया, चाहे, चौरासी साल के बुज़ुर्ग दीवान सिंह हों या बाईस वर्ष की युवा वैशाली गर्ब्याल प्रोफेसर हों या व्यापारी, हर कोई, हर संभव कोशिश में लग गया | इस मिशन में, सोशल मिडिया का भी भरपूर उपयोग किया गया | कई Whatsapp group बनाए गए | सैकड़ों लोगों को, उस पर भी, जोड़ा गया | इस भाषा की कोई लिपि नहीं है | सिर्फ, बोल-चाल में ही एक प्रकार से इसका चलन है | ऐसे में, लोग कहानियाँ, कवितायेँ और गाने पोस्ट करने लगे | एक-दूसरे की भाषा ठीक करने लगे | एक प्रकार से Whatsapp ही classroom बन गया जहाँ हर कोई शिक्षक भी है और विद्यार्थी भी ! रंगलोक भाषा को संरक्षित करने का एक इस प्रयास में है | तरह-तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, पत्रिका निकाली जा रही है और इसमें सामाजिक संस्थाओं की भी मदद मिल रही है |

साथियो, ख़ास बात ये भी है कि संयुक्त राष्ट्र ने 2019 यानी इस वर्ष को ‘International Year of Indigenous Languages’ घोषित किया है | यानी उन भाषाओँ को संरक्षित करने पर जोर दिया जा रहा है जो विलुप्त होने के कगार पर है | डेढ़-सौ साल पहले, आधुनिक हिंदी के जनक, भारतेंदु हरीशचंद्र जी ने भी कहा था :-
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ||”
अर्थात, मातृभाषा के ज्ञान के बिना उन्नति संभव नहीं है | ऐसे में रंग समुदाय की ये पहल पूरी दुनिया को एक राह दिखाने वाली है | यदि आप भी इस कहानी से प्रेरित हुए हैं, तो, आज से ही, अपनी मातृभाषा या बोली का खुद उपयोग करें | परिवार को, समाज को प्रेरित करें |
19वीं शताब्दी के आखरी काल में महाकवि सुब्रमण्यम भारती जी नें कहा था और तमिल में कहा था | वो भी हम लोगों के लिए बहुत ही प्रेरक है | सुब्रमण्यम भारती जी ने तमिल भाषा में कहा था -
मुप्पदु कोडि मुगमुडैयाळ् उयिर्,
मोईम्बुर ओन्ड्रुडैयाळ् – इवळ्,
सेप्पु मोऴि पतिनेट्टुडैयाळ् एनिर्,
सिन्तनै ओन्रुडैयाळ्॥
(muppadhu KOdi mugamudayAL, uyir,
moymbura ondrudaiyAL – ivaL,
seppu mozhi pathinettudaiyAL enir,
sinthanai ondrudaiyAL.)

और उस समय ये 19वीं शताब्दी के ये आखरी उत्तरार्ध की बात है | और उन्होंने कहा है भारत माता के 30 करोड़ चेहरे हैं, लेकिन शरीर एक है | यह 18 भाषाएँ बोलती हैं, लेकिन सोच एक है |

मेरे प्यारे देशवासियो, कभी-कभी जीवन में, छोटी-छोटी चीज़ें भी हमें बहुत बड़ा सन्देश दे जाती हैं | अब देखिये न, media में ही scuba divers की एक story पढ़ रहा था | एक ऐसी कहानी है जो हर भारतवासी को प्रेरित करने वाली है | विशाखापत्तनम में गोताखोरी का प्रशिक्षण देने वाले scuba divers एक दिन mangamaripeta beach पर समुद्र से लौट रहे थे तो समुद्र में तैरती हुई कुछ प्लास्टिक की बोतलों और pouch से टकरा रहे थे | इसे साफ़ करते हुए उन्हें मामला बड़ा गंभीर लगा | हमारा समुद्र किस प्रकार से कचरे से भर दिया जा रहा है | पिछले कई दिनों से ये गोताखोर समुद्र में, तट के, करीब 100 मीटर दूर जाते है, गहरे पानी में गोता लगाते हैं और फिर वहाँ मौजूद कचरे को बाहर निकालते हैं | और मुझे बताया गया है कि 13 दिनों में ही, यानी 2 सप्ताह के भीतर-भीतर, करीब-करीब 4000 किलो से अधिक plastic waste उन्होंने समुद्र से निकाला है | इन scuba divers की छोटी- सी शुरुआत एक बड़े अभियान का रूप लेती जा रही है | इन्हें अब स्थानीय लोगों की भी मदद मिलने लगी है | आस-पास के मछुआरें भी उन्हें हर प्रकार की सहायता करने लगे है | जरा सोचिये, इस scuba divers से प्रेरणा लेकर, अगर, हम भी, सिर्फ अपने आस-पास के इलाके को प्लास्टिक के कचरे से मुक्त करने का संकल्प कर लें तो फिर ‘प्लास्टिक मुक्त भारत’ पूरी दुनिया के लिए एक नई मिसाल पेश कर सकता है |

मेरे प्यारे देशवासियो, दो दिन बाद 26 नवम्बर है | यह दिन पूरे देश के लिए बहुत ख़ास है | हमारे गणतंत्र के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन को हम ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनाते हैं | और इस बार का ‘संविधान दिवस’ अपने आप में विशेष है, क्योंकि, इस बार संविधान को अपनाने के 70 वर्ष पूरे हो रहे हैं | इस बार इस अवसर पर पार्लियामेंट में विशेष आयोजन होगा और फिर साल भर पूरे देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम होंगे | आइये, इस अवसर पर हम संविधान सभा के सभी सदस्यों को आदरपूर्वक नमन् करें, अपनी श्रद्धा अर्पित करें | भारत का संविधान ऐसा है जो प्रत्येक नागरिक के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करता है और यह हमारे संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता की वजह से ही सुनिश्चित हो सका है | मैं कामना करता हूँ कि ‘संविधान दिवस’ हमारे संविधान के आदर्शों को कायम रखने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने की हमारी प्रतिबद्धता को बल दे | आखिर ! यही सपना तो हमारे संविधान निर्माताओं ने देखा था|

मेरे प्यारे देशवासियो, ठंड का मौसम शुरू हो रहा है, गुलाबी ठंड अब महसूस हो रही है | हिमालय के कुछ भाग बर्फ की चादर ओढ़ना शुरू किये हैं लेकिन ये मौसम ‘Fit India Movement’ का है | आप, आपका परिवार, आपके मित्रवार्तूर आपके साथी, मौका मत गंवाइये | ‘Fit India Movement’ को आगे बढ़ाने के लिए मौसम का भरपूर फ़ायदा उठाइए |बहुत-बहुत शुभकामनाएँ | बहुत-बहुत धन्यवाद |

शनिवार, 9 नवंबर 2019

Ayodhya Verdict: राम जन्मभूमि पर SC का फैसला

Ayodhya Verdict:
एक नजर में पढ़ें अयोध्या राम जन्मभूमि -बाबरी मस्जिद विवाद पर आया SC का फैसला
By Ankur Sharma| Updated: Saturday, November 9, 2019,

नई दिल्ली। देश के सबसे बहुचर्चित कोर्ट केस अयोध्या राम जन्मभूमि - बाबरी मस्जिद विवाद केस में शनिवार को फैसला आ गया है और इसके बाद अब तक विवादित रही जमीन पर रामलला विराजमान ही रहेंगे वहीं दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष को अलग से मस्जिद के लिए जमीन देने के निर्देश दिए हैं। आज पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने इस मामले में एतिहासिक फैसला सुनाया है, बता दें कि इस बेंच ने लगातार 40 दिन की मैराथन सुनवाई के बाद बीती 16 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला अतार्किक: SC इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा विवादित जमीन को तीन पक्षों में बांटने के फैसले को अतार्किक करार देते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने जो तीन पक्ष माने थे, उसे दो हिस्सों में मानना होगा। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा जमीन को तीन हिस्सों में बांटना तार्किक नहीं था। इससे साफ हो गया कि मामले में अब रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड दो पक्ष ही रह गए।

SC ने निर्मोही अखाड़ा के दावे को खारिज किया सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा के दावे को खारिज करते हुए कहा कि उसने देरी से याचिका दायर की थी, गोगोई ने कहा कि कोर्ट धर्मशास्त्र में पड़े, यह उचित नहीं। प्लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्ट सभी धार्मिक समूहों के हितों की रक्षा के लिए भारत की प्रतिबद्धता को बताता है।

आस्था वैयक्तिक विश्वास का विषय देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हिंदुओं की आस्था है कि भगवान राम की जन्म गुंबद के नीचे हुआ था। आस्था वैयक्तिक विश्वास का विषय है, बाबरी मस्जिद का निर्माण खाली जगह पर हुआ था, जमीन के नीचे का ढांचा इस्लामिक नहीं था। ASI के निष्कर्षों से साबित हुआ कि नष्ट किए गए ढांचे के नीचे मंदिर था और इस बात के सबूत हैं कि अंग्रेजों के आने के पहले से राम चबूतरा और सीता रसोई की हिंदू पूजा करते थे।

अपना अधिकार साबित नहीं कर पाए मुस्लिम: सु्प्रीम कोर्ट मुस्लिमों ने इस बात के सबूत पेश नहीं किए कि 1857 से पहले स्थल पर उनका ऐक्सक्लुसिव कब्जा था। सुप्रीम कोर्ट ने शिया वक्फ बोर्ड की अपील खारिज कर दी। उन्होंने कहा कि मस्जिद कब बनी, इससे फर्क नहीं पड़ता। 22-23 दिसंबर 1949 को मूर्ति रखी गई। गौरतलब है कि मुस्लिम पक्ष ने कहा था कि वहां लगातार नमाज पढ़ी जाती रही थी। कोर्ट ने कहा कि 1856 से पहले अंदरूनी हिस्से में हिंदू भी पूजा किया करते थे। रोकने पर बाहर चबूतरे पर पूजा करने लगे खाली जमीन पर नहीं बनी थी मस्जिद: SC सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई से निकले सबूतों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला पूरी पारदर्शिता से हुआ है। बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी। कोर्ट ने कहा कि मस्जिद के नीचे विशाल रचना थी। एएसआई ने 12वीं सदी का मंदिर बताया था। कोर्ट ने कहा कि वहां से जो कलाकृतियां मिली थीं, वह इस्लामिक नहीं थीं।

5 एकड़ की जमीन कोर्ट ने आगे कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को कहीं और 5 एकड़ की जमीन दी जाए और इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बनाए, इस ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को भी प्रतिनिधित्व देने का आदेश हुआ है। कोर्ट ने आगे कहा कि हर मजहब के लोगों को संविधान में बराबर का सम्मान दिया गया है।
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अयोध्या पर फैसला: निर्मोही अखाड़े का विवादित जमीन पर दावा खारिज, लेकिन ट्रस्ट में मिलेगा प्रतिनिधित्व
By Anjan Kumar Chaudhary| Updated: Saturday, November 9, 2019,

नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने रामजन्मभूमि की विवादित जमीन पर निर्मोही अखाड़ा का दावा तो खारिज कर दिया है, लेकिन उसे राम मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व देने का फैसला सुनाया है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल-142 का उपयोग किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का निर्मोही अखाड़ा ने स्वागत किया है।

अयोध्या में रामजन्मभूमि की विवादित जमीन पर एक दावेदार निर्मोही अखाड़ा भी था। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दावेदारी ठुकरा दी है। हालांकि अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट में उसे भी प्रतिनिधित्व दिया जाय। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए निर्मोही अखाड़ा के प्रवक्ता कार्तिक चोपड़ा ने कहा है कि, "150 वर्षों के हमारे संघर्ष को पहचानने के लिए निर्मोही अखाड़ा सुप्रीम कोर्ट का आभारी है और इसने निर्मोही अखाड़ा को केंद्र सरकार की ओर से बनाए जाने वाले श्री राम जन्मस्थान मंदिर के निर्माण एवं प्रबंध के लिए गठित होने वाले ट्रस्ट में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया है।"


गौरतलब है कि मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जिस आर्टिकल 142 का इस्तेमाल किया है, उसमें उसे यह अधिकार है कि किसी ऐसे दुर्लभ मामले में जहां कानून से उसे कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिखाई देता, वह अपने विवेक का उपयोग कर सकता है। आपको बता दें कि रामजन्मभूमि में निर्मोही अखाड़ा भी अपने स्वामित्व का दावा करता रहा है, लेकिन वह शुरू से रामलला के पक्ष में ही रहा है।

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Ayodhya Verdict:
रामलला को मिली विवादित जमीन, जानिए अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 10 बड़ी बातें
By Bavita Jha| Updated: Saturday, November 9, 2019

नई दिल्ली। देश की सबसे पुराने विवाद अयोध्या जमीन विवाद में आज देश की सर्वोच्च अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद मामले में फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन रामजन्मभूमि न्याय को दी है। कोर्ट ने अपने फैसले में सुन्नी बोर्ड को अलग से 5 एकड़ जमीन देने की बात कही है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े के दावे को खारिज कर दिया है।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में संवैधानिक पीठ ने फैसला सुनाते हुए निर्मोही अखाड़ा और शिया वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया है। पांच जजों की बेंच ने अयोध्या मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि विवादित जमीन पर राम मंदिर का निर्माण केंद्र सरकार ट्रस्ट बनाकर करेगी। वहीं अयोध्या में ही मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन मिलेगी।
आइए जानें इस ऐतिहासिक फैसले की 10 बड़ी बातें....
अयोध्या पर ऐतिहासिक फैसला सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या जमीन विवाद मामले में पैसला सुनाते हुए कहा कि विवादित जमीन रामलला विराजमान को दी जाए। कोर्ट ने कहा कि हिन्दुओं की यह आस्था अविवादित है कि भगवान राम का जन्म स्थल ध्वस्त संरचना है। उन्होंने कहा का सीता रसोई राम चबूतरा, भंडार गृह की उपस्थिति के मिले सबूत इस तथ्य का दावा पेश करते हैं।

केंद्र सरकार बनाएगी ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रामलला के जमीन पर केंद्र सरकार ट्रस्ट बनाकर मंदिर का निर्माण करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बनाकर, योजना तैयार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि फैसले आस्था और विश्वास, दावे के आधार पर नहीं दिए जा सकते। कोर्ट ने कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेज दिखाते हैं हिंदुओं का विश्वास है कि अयोध्या भगवान राम का जन्मस्थान है।

मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन सुप्रीम कोर्ट ने मुस्जिद बनाने के लिए वैकल्पिक जमीन आवंजिट कराने का नि र्देश दिया। कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में 5 एकड़ जमीन देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि बाबरी मस्जिद को नुकसान पहुंचाना कानून के खिलाफ था।

निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में तीसरे पक्ष निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज कर दिया। निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज करते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि हमने 1946 के फैजाबाद कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली शिया वक्फ बोर्ड की सिंगल लीव पिटिशन को खारिज करते हैं।


खाली जमीन पर नहीं बनी बाबरी मस्जिद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी। मस्जिद के नीचे विशाल रचना थी। वह रचना इस्लामिक नहीं थी। वहां जो कलाकृतियां मिली वो भी इस्लामिक नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि नमाज पढ़ने की जगह को मस्ज़िद मानने के हक को हम मना नहीं कर सकते।


सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि विवादित ढांचे में पुरानी संरचना की चीज़ें इस्तेमाल हुईं। कसौटी का पत्थर, खंभा आदि देखा गया। कोर्ट ने कहा कि ASI यह नहीं बता पाए कि मंदिर तोड़कर विवादित ढांचा बना था या नहीं। कोर्ट ने कहा कि अयोध्या में विवादित स्थल के नीचे बनी संरचना इस्लामिक नहीं थी लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यह साबित नहीं किया कि मस्जिद के निर्माण के लिये मंदिर गिराया गया था।

हिन्दू अयोध्या को राम भगवान का जन्मस्थान मानते हैं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिन्दू अयोध्या को राम भगवान का जन्मस्थान मानते हैं। कोर्ट ने कहा कि मुख्य गुंबद को ही जन्म की सही जगह मानते हैं। अयोध्या में राम का जन्म होने के दावे का किसी ने विरोध नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि नमाज पढ़ने की जगह को मस्ज़िद मानने के हक को हम मना नहीं कर सकते। मुख्य नयायाधीश ने कहा कि 1991 का प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट धर्मस्थानों को बचाने की बात कहता है. एक्ट भारत की धर्मनिरपेक्षता की मिसाल है।

ASI यह नहीं बता पाए कि मंदिर तोड़कर विवादित ढांचा बना था या नहीं अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि मस्ज़िद 1528 की बनी बताई जाती है लेकिन कब बनी इससे फर्क नहीं पड़ता। कोर्ट ने कहा कि ASI यह नहीं बता पाए कि मंदिर तोड़कर विवादित ढांचा बना था या नहीं। 12वीं सदी से 16वीं सदी पर वहां क्या हो रहा था, साबित नहीं हुआ।


सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बहस में बदला दावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बहस में अपने दावे को बदला। उन्होंने पहले कुछ कहा, बाद मे नीचे मिली रचना को ईदगाह कहा। कोर्ट ने कहा कि साफ है कि बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बना था। कोर्ट ने कहा कि बाबरी मस्जिद के नीचे विशाल रचना थी। कोर्ट ने कहा कि ASI ने वहां 12वीं सदी की मंदिर बताई। विवादित ढांचे में पुरानी संरचना की चीज़ें इस्तेमाल हुईं। रिपोर्ट में इस संरचना में कसौटी का पत्थर, खंभा आदि की बात कही गई।

एक मत से आया फैसला सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक मत से आया। कोर्ट की कार्यवाही शुरू होते ही सबसे पहले केस नंबर 1501, शिया बनाम सुन्नी वक्फ बोर्ड केस में एक मत से फैसला आया। इस मामले में शिया वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया गया।

राम दरबार है जग सारा

राम दरबार है जग सारा


राम ही तीनो लोक के राजा, सबके प्रतिपला सबके आधारा
राम दरबार है जग सारा.
राम का भेद ना पाया वेद निगम हू नेति नेति उचरा
राम दरबार है जग सारा.
तीन लोक में राम का सज़ा हुआ दरबार, जो जहाँ सुमिरे वहीं दरस दें उसे राम उदार. जय जय राम सियाराम.
जय जय राम सियाराम जय जय राम सियाराम जय जय राम सियाराम जय जय राम सियाराम जय जय राम सियाराम!
राम में सर्व राम में सब माही रूप विराट राम सम नाहीं, जितने भी ब्रह्मांड रचे हैं, सब विराट प्रभु में ही बसें हैं !!
रूप विराट धरे तो चौदह भुवन में नाहीं आते हैं, सिमटेई तो हनुमान ह्रदय में सीता सहित समाते हैं.
पतित उधरन दीन बंधु पतितो को पार लगातें हैं, बेर बेर शबरी के हाथों बेर प्रेम से खाते हैं
जोग जतन कर जोगी जिनको जनम जनम नहीं पाते हैं, भक्ति के बस में होकर के वे बालक भी बन जाते हैं.
योगी के चिंतन में राम, मानव के मंथन में राम, तन में राम मन में राम, सृष्टि के कन कन में राम.
आती जाती श्वास में राम, अनुभव में आभास में राम, नहीं तर्क के पास में राम, बसतें में विश्वास में राम
राम तो हैं आनंद के सागर, भर लो जिसकी जितनी गागर, कीजो छमा दोष त्रुटि स्वामी राम नमामि नमामि नमामि.
अनंता अनंत अभेदा अभेद आगमया गम्या पार को पारा, राम  दरबार  है  जग  सारा, राम दरबार है जग सारा !!

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

विजयादशमी :सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

विजयादशमी पर विशेष – राष्ट्र जागरण के अग्रिम मोर्चे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
(मंगलवार, 08 अक्तूबर 2019)



आदरणीय प्रमुख अतिथि महोदय, इस उत्सव को देखने के लिए विशेष रूप से यहां पर पधारे हुए निमंत्रित अतिथि गण, श्रद्धेय संत वृंद, मा. संघचालक गण, संघ के सभी माननीय अधिकारीगण, माता भगिनी, नागरिक सज्जन एवं आत्मीय स्वयंसेवक बंधु.

इस विजयादशमी के पहले बीता हुआ वर्ष भर का कालखंड श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश वर्ष के रूप में तथा स्वर्गीय महात्मा गांधी के जन्म के डेढ़ सौ वे वर्ष के रूप में विशेष रहा. उस उपलक्ष्य में किए जाने वाले कार्यक्रम आगे और कुछ समय, उनकी अवधि समाप्त होने तक, चलने वाले हैं. इस बीच 10 नवंबर से स्वर्गीय दत्तोपंत जी ठेंगड़ी का भी शताब्दी वर्ष शुरू होना है. परंतु बीते हुए वर्ष में घटी हुई कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं ने, उसको हमारे लिए और स्मरणीय बना दिया है.

मई मास में लोकसभा चुनावों के परिणाम प्राप्त हुए. इन चुनावों की ओर संपूर्ण विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ था. भारत जैसे विविधताओं से भरे विशाल देश में, चुनाव का यह कार्य समय से और व्यवस्थित कैसे सम्पन्न होता है, यह देखना दुनिया के लिए आकर्षण का पहला विषय था. वैसे ही 2014 में आया परिवर्तन केवल 2014 के पहले के सरकार के प्रति मोहभंग से उत्पन्न हुई एक नकारात्मक राजनीतिक लहर का परिणाम है, अथवा विशिष्ट दिशा में जाने के लिए जनता ने अपना मन बना लिया है, यह 2019 के चुनावों में दिखाई देना था. विश्व का ध्यान उस ओर भी था. जनता ने अपनी दृढ़ राय प्रकट की और भारत देश में प्रजातंत्र, विदेशों से आयातित नई अपरिचित बात नहीं है, बल्कि देश के जनमानस में सदियों से चलती आई परंपरा तथा स्वातंत्र्योत्तर काल में प्राप्त हुआ अनुभव व प्रबोधन, इनके परिणामस्वरूप प्रजातंत्र में रहना व प्रजातंत्र को सफलतापूर्वक चलाना यह समाज का मन बन गया है, यह बात सबके ध्यान में आई. नई सरकार को बढ़ी हुई संख्या में फिर से चुनकर लाकर समाज ने उनके पिछले कार्यों की सम्मति व आने वाले समय के लिए बहुत सारी अपेक्षाओं को व्यक्त किया था.

उन अपेक्षाओं को प्रत्यक्ष में साकार कर, जन भावनाओं का सम्मान करते हुए, देश के हित में उनकी इच्छाएँ पूर्ण करने का साहस इस दोबारा चुने हुए शासन में भी है, यह बात फिर एक बार सिद्ध हो गई, कलम 370 को अप्रभावी बनाने के सरकार के काम से. सत्तारूढ़ दल की विचार परंपरा में यह कार्य तो पहले से ही स्वीकारा गया था. लेकिन इस बार कुशलतापूर्वक अन्य मतों के दलों का भी दोनों सदनों में समर्थन प्राप्त कर, सामान्य जनों के हृदय के भावों के अनुरूप तथा मजबूत तर्कों के साथ यह जो काम हुआ, उसके लिए देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित शासक दल तथा इस जन भावना का संसद में समर्थन करने वाले अन्य दल भी अभिनंदन के पात्र हैं. यह कदम अपनी पूर्णता तब प्राप्त कर लेगा, जब 370 के प्रभाव में न हो सके न्याय कार्य सम्पन्न होंगे तथा उसी प्रभाव के कारण चलते आये अन्यायों की समाप्ति होगी. वहां से अन्यायपूर्वक निकाल दिए गए हमारे कश्मीरी पंडितों का पुनर्वसन,  उनकी निर्भय, सुरक्षित तथा देशभक्त व हिंदू बने रहने की स्थिति में होगा. कश्मीर के रहिवासी जनों को अनेक अधिकार, जिनसे वे अब तक वंचित थे, प्राप्त होंगे और घाटी के बंधुओं के मन में यह जो गलत डर भरा गया है, कि 370 हटने से उनकी जमीनें, उनकी नौकरियां इन पर बड़ा संकट पैदा होने वाला है, वह दूर होकर आत्मीय भाव से शेष भारत जनों के साथ एकरूप मन से देश के विकास में वो अपनी जिम्मेवारी भी बराबरी से संभालेंगे.

सितंबर के महीने में अपनी प्रतिभा से, संपूर्ण विश्व के वैज्ञानिक बिरादरी का ध्यानाकर्षण करते हुए, उनकी प्रशंसा व सहानुभूति प्राप्त करते हुए, हमारे वैज्ञानिकों ने अब तक चंद्रमा के अनछुए प्रदेश, उसके दक्षिण ध्रुव पर अपना चांद्रयान ‘विक्रम’ उतारा. यद्यपि अपेक्षा के अनुरूप पूर्ण सफलता ना मिली, परंतु पहले ही प्रयास में इतना कुछ कर पाना यह भी सारी दुनिया को अबतक साध्य न हुई एक बात थी. हमारे देश की बौद्धिक प्रतिभा व वैज्ञानिकता का तथा संकल्प को परिश्रमपूर्वक पूर्ण करने के लगन का सम्मान हमारे वैज्ञानिकों के इस पराक्रम के कारण दुनिया में सर्वत्र बढ़ गया है. जनता की परिपक्व बुद्धि व कृति, देश में जगा हुआ स्वाभिमान, शासन में जगा हुआ दृढ़ संकल्प तथा साथ ही हमारे वैज्ञानिक सामर्थ्य की अनुभूति इन के इन सुखद अनुभवों के कारण पिछला वर्ष हमें हमेशा स्मरण में रहेगा.

परंतु, इस सुखद वातावरण में अलसा कर हम अपनी सजगता व अपनी तत्परता को भुला दें, सब कुछ शासन पर छोड़ कर, निष्क्रिय होकर विलासिता व स्वार्थों में मग्न हो ऐसा समय नहीं है. जिस दिशा में हम लोगों ने चलना प्रारंभ किया है, वह अपना अंतिम लक्ष्य-परमवैभव सम्पन्न भारत – अभी दूर है. मार्ग के रोड़े, बाधाएं और हमें रोकने की इच्छा रखने वाले शक्तियों के कारनामे अभी समाप्त नहीं हुए हैं. हमारे सामने कुछ संकट हैं जिनका उपाय हमें करना है. कुछ प्रश्न है जिनके उत्तर हमें देने हैं, और कुछ समस्याएं हैं जिनका निदान कर हमें उन्हें सुलझाना है.

सौभाग्य से हमारे देश के सुरक्षा सामर्थ्य की स्थिति, हमारे सेना की तैयारी, हमारे शासन की सुरक्षा नीति तथा हमारे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुशलता की स्थिति इस प्रकार की बनी है कि इस मामले में हम लोग सजग और आश्वस्त हैं. हमारी स्थल सीमा तथा जल सीमाओं पर सुरक्षा सतर्कता पहले से अच्छी है. केवल स्थल सीमापर रक्षक व चैकियों की संख्या व जल सीमापर-विशेषकर द्वीपों वाले टापुओं की – निगरानी अधिक बढ़ानी पड़ेगी. देश के अन्दर भी उग्रवादी हिंसा में कमी आयी है. उग्रवादियों के आत्मसमर्पण की संख्या भी बढ़ी है.

व्यक्ति के या विश्व के जीवन में संकटों की परिस्थिति हमेशा बनी रहती है. कुछ संकट सामने दिखाई देते हैं. कुछ-कुछ बाद में सामने आते हैं. अपनी शरीर मन बुद्धि जितनी सजग स्वस्थ और प्रतिकारक्षम रहती है उतनी ही उन संकटों से बचने की संभावना बढ़ती है. परंतु, मनुष्य को अंदर से भी संकट पैदा होने का भय तो रहता ही है. कई प्रकार के संकट पैदा करनेवाले कारक शरीर के ही अंदर निवास करते हैं. शरीर की रोग प्रतिकारक शक्ति कम होने से उनका प्रभाव दिखाई देता है अन्यथा उनका उपद्रव नहीं होता.

हम सब लोग जानते हैं की गत कुछ वर्षों में एक परिवर्तन भारत की सोच की दिशा में आया है. उसको न चाहने वाले व्यक्ति दुनिया में भी है और भारत में भी है. भारत को बढ़ता हुआ देखना जिनके स्वार्थों के लिए भय पैदा करता है, ऐसी शक्तियां भी भारत को दृढ़ता व शक्ति से सम्पन्न होने नहीं देना चाहती. दुर्भाग्य से भारत में समाज के एकात्मता की, समता व समरसता की स्थिति जैसी चाहिए वैसी अभी नहीं है. इसका लाभ लेकर इन शक्तियों के उद्योग चलते हुए हम सभी देख रहे हैं. विविधताओं को, जाति, पंथ, भाषा, प्रांत इत्यादि प्रकारों को, एक दूसरे से अलग करना, भेदों में परिवर्तित करना पहले से चलते आ रहे भेदों की खाईयों को, आपस में वैमनस्य भड़काकर और बढ़ाना, उत्पन्न किए गए अलगावों को मनगढ़ंत कृत्रिम पहचानों पर खड़ा कर, इस देश की एक सामाजिक धारा में अलग-अलग विरोधी प्रवाह उत्पन्न करना; ऐसा प्रयास चल रहा है. सजगतापूर्वक इन कुचक्रों की पहचान करते हुए, उनका बौद्धिक तथा सामाजिक धरातल पर प्रतिकार होने की आवश्यकता है. शासन व प्रशासन में कार्यरत व्यक्तियों द्वारा सदभावनापूर्वक प्रवर्तित नीति, दिये गए वक्तव्यों या निर्णयों को भी गलत अर्थ में अथवा तोड़मरोड़ कर प्रचारित कर अपने घृणित उद्देश्यों के लाभ के लिए ऐसी शक्तियाँ उपद्रव करती है. सतत सावधानी की आवश्यकता है. ऐसी सब गतिविधियों में कहीं ना कहीं देश के कानून, नागरिक अनुशासन आदि के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का छुपा अथवा प्रकट प्रयास चलता है. उसका सभी स्तरों पर अच्छा प्रतिकार होना चाहिए.

आजकल अपने ही समाज के एक समुदाय के द्वारा दूसरे समुदाय के व्यक्तियों पर आक्रमण कर उनको सामूहिक हिंसा के शिकार बनाने के समाचार छपे हैं. ऐसी घटनाएं केवल एक तरफा नहीं हुई है. दोनों तरफ से ऐसी घटनाओं के समाचार हैं तथा आरोप-प्रत्यारोप चलते हैं. कुछ घटनाओं को जानबूझकर करवाया गया है तथा कुछ घटनाओं को विपर्यस्त रूप में प्रकाशित किया गया है, यह बात भी सामने आई है. परंतु, कहीं ना कहीं कानून और व्यवस्था की सीमा का उल्लंघन कर यह हिंसा की प्रवृत्ति समाज में परस्पर संबंधों को नष्ट कर अपना प्रताप दिखाती है इस बात को स्वीकार तो करना ही पड़ेगा. यह प्रवृत्ति हमारे देश की परंपरा नहीं है, न ही हमारे संविधान में यह बात बैठती है. कितना भी मतभेद हो, कितना भी भड़काई जाने वाली कृतियाँ हुई हो, कानून और संविधान की मर्यादा के अंदर रहकर ही, पुलिस बलों के हाथ में ऐसे मामले देकर, न्याय व्यवस्था पर विश्वास रखकर ही चलना पड़ेगा. स्वतंत्र देश के नागरिकों का यही कर्तव्य है. ऐसी घटनाओं में लिप्त लोगों का संघ ने कभी भी समर्थन नहीं किया है और ऐसी प्रत्येक घटना के विरोध में संघ खड़ा है. ऐसी घटनाएं ना हो इसलिए स्वयंसेवक प्रयासरत रहते हैं. परंतु ऐसी घटनाओं को, जो परंपरा भारत की नहीं है ऐसी परंपरा को दर्शाने वाले ‘लिंचिंग’ जैसे शब्द देकर, सारे देश को व हिंदू समाज को सर्वत्र बदनाम करने का प्रयास करना; देश के तथाकथित अल्पसंख्यक वर्गों में भय पैदा करने का प्रयास करना; ऐसे षड्यंत्र चल रहे हैं यह हम को समझना चाहिए. भड़काने वाली भाषा तथा भड़काने वाले कृतियों से सभी को बचना चाहिए. विशिष्ट समुदाय के हितों की वकालत करने की आड़ में आपस में लड़ा कर स्वार्थ की रोटियां सेकने का उद्योग करने वाले तथाकथित नेताओं को प्रश्रय नहीं देना चाहिए. ऐसी घटनाओं का कड़ाई से नियंत्रण करने के लिए पर्याप्त कानून देश में विद्यमान है. उनका प्रामाणिकता से व सख्ती से अमल होना चाहिए.

समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में सद्भावना, संवाद तथा सहयोग बढ़ाने के प्रयास में प्रयासरत होना चाहिए. समाज के सभी वर्गों का सद्भाव, समरसता व सहयोग तथा कानून संविधान की मर्यादा में ही अपने मतों की अभिव्यक्ति और हितों की रक्षा के लिए प्रयास करने का अनुशासन पालन करना, यह आज की स्थिति में नितांत आवश्यक बात है. इस प्रकार के संवाद को, सहयोग को बढ़ाने का प्रयास संघ के स्वयंसेवक प्रारंभ कर रहे हैं. इसके बाद भी कुछ बातों का निर्णय न्यायालय से ही होना पड़ता है. निर्णय कुछ भी हो आपस के सद्भाव को किसी भी बात से ठेस ना पहुंचे ऐसी वाणी और कृति सभी जिम्मेदार नागरिकों की होनी चाहिए. यह जिम्मेवारी किसी एक समूह की नहीं है. यह सभी की जिम्मेवारी है. सभी ने उसका पालन करना चाहिए और प्रारंभ स्वयं से करना चाहिए.

विश्व की आर्थिक व्यवस्था चक्र की गति में आयी मंदी सर्वत्र कुछ न कुछ परिणाम करती है. अमरीका व चीन में चली आर्थिक स्पर्धा के परिणाम भी भारतसहित सभी देशों को भुगतने पड़ते हैं. इस स्थिति से राहत देनेवाले कई उपाय शासन के द्वारा गत डेढ़ महिने में किये गये हैं. जनता के हितों के प्रति शासन की संवेदना व उसकी सक्रियता का परिचय इससे अवश्य मिलता है. इस तथाकथित मंदी के चक्र से हम निश्चित रूप से बाहर आयेंगे, हमारे आर्थिक जगत की सभी हस्तियों का यह सामर्थ्य अवश्य है.

अर्थव्यवस्था में बल भरने के लिए विदेशी सीधे पूँजी निवेश को अनुमति देना तथा उद्योगों का निजिकरण ऐसे कदम भी उठाने को सरकार बाध्य हो रही है. परन्तु सरकार की कई लोककल्याणकारी नीतियाँ व कार्यक्रमों के निचले स्तर पर लागू करने में अधिक तत्परता व क्षमता तथा अनावश्यक कड़ाई से बचने से भी बहुत सी बातें ठीक हो सकती है.

परिस्थिति के दबावों का उत्तर देने के प्रयास में स्वदेशी का भान विस्मृत होने से भी हानि होगी. दैनन्दिन जीवन में देशभक्ति की अभिव्यक्ति को ही स्व. दत्तोपंत ठेंगड़ी “स्वदेशी” मानते थे. स्व. विनोबाजी भावे ने उसका अर्थ “स्वावलंबन तथा अहिंसा” यह किया है. सभी मानकों में स्वनिर्भरता तथा देश में सबको रोजगार ऐसी शक्ति रखनेवाले ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक संबंध बना सकते हैं, बढ़ा सकते हैं तथा स्वयं सुरक्षित रहकर विश्वमानवता को भी एक सुरक्षित व निरामय भविष्य दे सकते हैं. अपने आर्थिक परिवेश के अनुसार कोई घुमावदार दूर का रास्ता हमें चुनना पड़ सकता है तो भी लक्ष्य व दिशा तो स्वसामर्थ्य को बनाकर मजबूरियों से सदा के लिए बाहर आना यही होना चाहिए.

परंतु इतर तात्कालिक संकटों का तथा विश्व में चलने वाले आर्थिक उतार-चढ़ाव का परिणाम हमारी अर्थव्यवस्था पर कम से कम हो, इसलिए हमको मूल में जाकर विचार करना पड़ेगा. हमको हमारी अपनी दृष्टि से, हमारी अपनी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर, हमारी अपनी जनता का रूप और परिवेश ध्यान में रखकर, हमारे अपने संसाधन और जन का विचार करते हुए, हमारी आकांक्षाओं को सफल साकार करने वाली अपनी आर्थिक दृष्टि बनाकर, अपनी नीति बनानी पड़ेगी. जगत का प्रचलित अर्थविचार कई प्रश्नों का उत्तर देने में असमर्थ है. उसके मानक भी कई प्रकार से अधूरे पड़ते हैं यह बात विश्व के अनेक अर्थतज्ञों के द्वारा ही सामने आ रही है. ऐसी अवस्था में कम से कम ऊर्जा का उपयोग करते हुए अधिकाधिक रोजगार पैदा करने वाली पर्यावरण के लिए उपकारक, हमको हर मामले में स्वनिर्भर बना सकने वाली तथा अपने बलबूते सारे विश्व के साथ हम अपनी शर्तों पर व्यापारी संबंध बनाएँ बढ़ाएँ रख सके, ऐसा सामर्थ्य हम में भरने वाली अपनी आर्थिक दृष्टि, नीति व व्यवस्था का निर्माण करने की दिशा में हमको कदम बढ़ाने ही पड़ेंगे.

यह स्व का विचार कर सकने में हम लोग स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी कम पड़ रहे, इसके मूल में, योजनापूर्वक हम को गुलाम बनाने वाली शिक्षा का, जो प्रवर्तन गुलामी के काल में भारत में किया गया तथा स्वतंत्रता के बाद भी अभी तक हमने उसको जारी रखा है, यह बात ही कारण है. हमको अपने शिक्षा की रचना भी भारतीय दृष्टि से करनी पड़ेगी. विश्व में शिक्षा क्षेत्र में उत्कृष्ट गिने जाने वाले देशों की शिक्षा पद्धतियों का हम अध्ययन करते हैं, तो वहां भी इसी प्रकार से स्व आधारित शिक्षा ही उन-उन देशों की शैक्षिक उन्नति का कारण है, यह स्पष्ट दिखाई देता है. स्वभाषा, स्वभूषा, स्वसंस्कृति का सम्यक् परिचय तथा उसके बारे में गौरव प्रदान करने वाली कालसुसंगत, तर्कशुद्ध सत्यनिष्ठा, कर्तव्य बोध तथा विश्व के प्रति आत्मीय दृष्टिकोण व जीवों के प्रति करुणा की भावना देने वाली शिक्षा पद्धति हमको चाहिए. पाठ्यक्रम से लेकर तो शिक्षकों के प्रशिक्षण तक सब बातों में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता लगती है. केवल ढांचागत परिवर्तनों से काम बनने वाला नहीं है.

शिक्षा में इन सब बातों के अभाव के साथ हमारे देश में परिवारों में होने वाला संस्कारों का क्षरण व सामाजिक जीवन में मूल्य निष्ठा विरहित आचरण यह समाज जीवन में दो बहुत बड़ी समस्याएं उत्पन्न करने के लिए कारण बनता है. जिस देश में यह मातृवत्परदारेषु की भावना थी, महिलाओं के सम्मान की रक्षा के लिए रामायण महाभारत जैसे महाकाव्यों का विषय बनने वाले भीषण संग्राम हुए, स्वयं की मान रक्षा हेतु जौहर जैसे बलिदान हुए, उस देश में आज हमारी माता बहने न समाज में सुरक्षित न परिवार में सुरक्षित इस प्रकार की स्थिति का संकेत देने वाली घटनाएं घट रही है, यह हम सबको लज्जा का अनुभव करा देने वाली बात है. अपनी मातृशक्ति को हमको प्रबुद्ध, स्वावलंबनक्षम स्वसंरक्षणक्षम बनाना ही होगा. महिलाओं को देखने की पुरुषों की दृष्टि में हमारे संस्कृति के पवित्रता व शालीनता के संस्कार भरने ही पड़ेंगे.

बाल्यावस्था से ही घर के वातावरण से इस प्रशिक्षण का प्रारंभ होता है यह हम सब लोग जानते हैं. परंतु इसका नितांत अभाव आज के अणु परिवारों में दिखाई देता है. इसका और एक भयंकर लक्षण नई पीढ़ी में बढ़ने वाला नशीले पदार्थों के व्यसन का प्रमाण है. एक समय चीन जैसे सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध राष्ट्र की तरुणाई को भी व्यसनाधीन बनाकर विदेशी शक्तियों ने निःसत्त्व बना कर रख दिया था. ऐसे व्यसन के मोह से अलिप्त रहने की, सुशीलता की ओर झुकने वाली और मोह के वश ना होते हुए इन खतरों से दूर रहने की दृढ़ता वाली मानसिकता, घर में नहीं बनेगी तो, इससे व्यसन के प्रकोप को रोक पाना यह बहुत कठिन कार्य हो जाएगा. इस दृष्टि से संघ के स्वयंसेवकों सहित सभी अभिभावकों को सजग व सक्रिय होने की आवश्यकता है.

समाज में सर्वत्र अनुभव होने वाला आर्थिक तथा चारित्रिक भ्रष्ट आचरण भी मूल में इसी संस्कारहीनता के कारण उत्पन्न होता है. समय-समय पर इसको नियंत्रित करने के लिए कानून तो होते रहते हैं, कतिपय भ्रष्टाचारियों को कड़ा दंड दिया जाता है ऐसे उदाहरण भी स्थापित हो जाते हैं. परंतु ऊपर के स्तर पर हुए इस स्वस्थ स्वच्छ परिष्कार के नीचे सामान्य स्तर पर भ्रष्टाचार चलते चलता ही रहा है. और कहीं-कहीं वह इन उपायों को ही आश्रय बनाकर बढ़ रहा है, यह भी ध्यान में आता है. प्रामाणिक व्यक्ति तो इन कड़े कानूनों के पालन के चक्कर में कई कठिनाइयों में छटपटाते रहते हैं और जिनको विधि और शील की कोई परवाह नहीं ऐसे निर्लज्ज और उद्दंड लोग इन व्यवस्थाओं को चकमा देकर पनपते पलते रहते हैं. यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है. बिना श्रम या कम श्रम में व बिना अधिकार के अधिक पाने का लालच, कुसंस्कार के रूप में हमारे मन में पैठ कर बैठा है, यह ऐसे भ्रष्ट आचरण का मूल कारण है. सामाजिक वातावरण में, घरों में सब प्रकार के प्रबोधन से तथा अपने आचरण के उदाहरण से इस परिस्थिति को बदलना, यह देश के स्वास्थ्य व सुव्यवस्था के लिए एक अनिवार्य कर्तव्य बनता है.

समाज के प्रबोधन तथा समाज में वातावरण निर्माण करने में माध्यमों की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है. व्यापारिक दृष्टि से केवल मसालेदार व सनसनीखेज विषयों को उभारने के मोह से बाहर आकर, माध्यम भी इस वातावरण के निर्मिती में जुड़ जाए, तो यह कार्य और भी गति से हो सकता है.

अपने समाज के अंदर का वातावरण जैसे हम सभी सजग होकर उस वातावरण को स्वस्थ बनाये रखने की चिन्ता करने की आवश्यकता को अधोरेखांकित करता है वैसे ही संपूर्ण विश्व में विश्व के बाह्य पर्यावरण की समस्या मानव-समाज के व्यापक पहल की मांग कर रही है. पर्यावरण को स्वस्थ रखने के लिए बड़े नीतिगत उपायों की पहल तो सभी देशों की पर्यावरण नीति में उचित व समन्वित परिवर्तन लाने का विषय है व शासन से संबंधित विषय है. परन्तु जनसामान्यों के नित्य व्यवहार में छोटे-छोटे परिवर्तन की पहल भी इस दिशा में परिणामकारक हो सकती है. संघ के स्वयंसेवक इस क्षेत्र में ऐसे अनेक कार्य पहले से ही कर रहे हैं. उनके इन सारे प्रयासों को सुव्यवस्थित रूप देकर, समाज की गतिविधि के नाते आगे बढ़ाने का कार्य भी “पर्यावरण गतिविधि” नाम से प्रारम्भ हुआ है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गत 9 दशकों से समाज में एकात्मता व सद्भावना, सदाचरण व सद्व्यवहार तथा इस राष्ट्र के प्रति स्पष्ट दृष्टि व भक्ति उत्पन्न करने का कार्य कर रहा है. संघ के स्वयंसेवकों के सेवा भावना व समर्पण के बारे में देश में सर्वत्र आस्था जगी है ऐसा अनुभव आता है. परंतु अभी तक संघ के संपर्क में न आए हुए वर्गों में संघ के प्रति अविश्वास, भय व शत्रुता उत्पन्न हो, ऐसा प्रयास किया जाता है. संघ हिन्दू समाज का संगठन करता है इसका अर्थ वह अपने आप को हिन्दू न कहनेवाले समाज के वर्गों, विशेषकर मुस्लिम व ईसाइयों से शत्रुता रखता है, यह नितान्त असत्य व विपर्यस्त प्रचार चलता है. हिन्दू समाज, हिन्दुत्व इनके बारे में अनेक प्रमाणहीन, विकृत आरोप लगाकर उनको भी बदनाम करने का प्रयास चलता ही आया है. इन सब कुचक्रों के पीछे हमारे समाज का निरंतर विघटन होता रहे, उसका उपयोग अपने स्वार्थलाभ के लिये हों, यह सोच काम कर रही है. यह बात अब इतनी स्पष्ट है कि जानबूझकर आँखें बंद कर रखनेवालों को ही वह समझ में नहीं आती.

संघ की अपने राष्ट्र के पहचान के बारे में, हम सबकी सामूहिक पहचान के बारे में, हमारे देश के स्वभाव की पहचान के बारे में स्पष्ट दृष्टि व घोषणा है, वह सुविचारित व अडिग है, कि भारत हिंदुस्थान, हिंदू राष्ट्र है. संघ की दृष्टि में हिंदू शब्द केवल अपने आप को हिंदू कहने वालों के लिए नहीं है. जो भारत के हैं, जो भारतीय पूर्वजों के वंशज है तथा सभी विविधताओं का स्वीकार सम्मान व स्वागत करते हुए आपस में मिलजुल कर देश का वैभव तथा मानवता में शांति बढ़ाने का काम करने में जुट जाते हैं वे सभी भारतीय हिंदू हैं. उनकी पूजा, उनकी भाषा, उनका खानपान, रीति रिवाज, उनका निवास स्थान, कोई भी होने से इसमें अंतर नहीं आता. सामर्थ्यसम्पन्न व्यक्ति व समाज निर्भय होते हैं. ऐसे सामर्थ्यसम्पन्न लोग चारित्र्यसम्पन्न हो तो और किसी को भयभीत भी नहीं करते. दुर्बल लोग ही स्वयं की असुरक्षितता के भय के कारण अन्यों को भय दिखाने का प्रयास करते हैं. संघ सम्पूर्ण हिन्दू समाज को ऐसा बलसम्पन्न तथा सुशील व सद्भावी बनाएगा, जो किसी से न डरेंगे, न किसी को डरायेंगे, बल्कि दुर्बल व भयग्रस्त लोगों की रक्षा करेंगे.

इस हिंदू शब्द के बारे में एक भ्रमपूर्ण धारणा, उसको एक संप्रदाय के चैखट में बंद करने वाली कल्पना, अंग्रेजों के जमाने से हमारा बुद्धि भ्रम कर रही है. इसके चलते इस शब्द का स्वीकार न करने वाला वर्ग भी समाज में है. वे अपने आप के लिए भारतीय शब्द का उपयोग करते हैं. भारतीय स्वभाव, भारतीय संस्कृति के आधार पर चलने वाली सभ्यताओं को कुछ लोग अंग्रेजी में ‘इंडिक’ इस शब्द से संबोधित करते हैं. संघ के लिए इन शब्दों का पर्यायी उपयोग भी, जो हिंदू शब्द को भय या भ्रमवश नकारते हैं उनके लिए मान्य है. शब्द अलग होने से, पंथ संप्रदाय पूजा अलग होने से, खानपान रीति रिवाज अलग होने से, रहने के स्थान अलग-अलग होने से, प्रांत या भाषा अलग होने से, हम समाज के वर्गों को एक दूसरे से अलग नहीं मानते. इन सब को अपना मान कर ही संघ का काम चलता है. हमारा यह अपनत्व, जोड़नेवाली भावना ही राष्ट्रभावना है. वही हिन्दुत्व है. हमारे इस प्राचीन राष्ट्र का, कालसुसंगत परमवैभवसम्पन्न रूप प्रत्यक्ष साकार करने का भव्य लक्ष्य, इसकी धर्मप्राण प्रकृति व संस्कृति का संरक्षण संवर्धन ही इस अपनत्व का केन्द्र व लक्ष्य है.

विश्व को भारत की नितान्त आवश्यकता है. भारत को अपनी प्रकृति; संस्कृति के सुदृढ़ नींव पर खड़ा होना ही पड़ेगा. इसलिये राष्ट्र के बारे में यह स्पष्ट कल्पना व उसका गौरव मन में लेकर समाज में सर्वत्र सद्भाव, सदाचार तथा समरसता की भावना सुदृढ़ करने की आवश्यकता है. इन सभी प्रयासों में संघ के स्वयंसेवकों की महती भूमिका है व रहेगी. इसके लिए उपयोगी अनेक योजनाओं को यशस्वी करने के लिए संघ के स्वयंसेवक प्रयासरत हैं. प्रत्येक स्वयंसेवक को ही समय की चुनौती को स्वीकार कर कार्यरत होना होगा.

परन्तु यह समय की आवश्यकता तभी समय रहते पूर्ण होगी जब इस कार्य का दायित्व किसी व्यक्ति या संगठन पर डालकर, स्वयं दूर से देखते रहने का स्वभाव हम छोड़ दें. राष्ट्र की उन्नति, समाज की समस्याओं का निदान तथा संकटों का उपशम करने का कार्य ठेके पर नहीं दिया जाता. समय-समय पर नेतृत्व करने का काम अवश्य कोई न कोई करेगा, परंतु जब तक जागृत जनता, स्पष्ट दृष्टि, निःस्वार्थ प्रामाणिक परिश्रम तथा अभेद्य एकता के साथ वज्रशक्ति बनकर ऐसे प्रयासों में स्वयं से नहीं लगती, तब तक संपूर्ण व शाश्वत सफलता मिलना संभव नहीं होगा.

इसी कार्य के लिए समाज में वातावरण बना सकनेवाले कार्यकर्ताओं का निर्माण संघ करता है. उन कार्यकर्ताओं द्वारा समाज में चलनेवाले क्रियाकलाप व उनके परिणाम आज यह सिद्ध कर रहे हैं कि हम, हमारा कुटुंब, हमारा यह देश तथा विश्व को सुखी बनाने का यही सुपंथ है.

आप सभी को यह आवाहन है कि सद्य समय की इस आवश्यकता को अच्छी तरह संज्ञान में लेते हुए हम सब इस भव्य व पवित्र कार्य के सहयोगी बनें.

“युगपरिवर्तन की बेला में, हम सब मिलकर साथ चलें

देशधर्म की रक्षा के हित, सहते सब आघात चलें

मिलकर साथ चलें,  मिलकर साथ चलें..”

.. भारत माता की जय..

बुधवार, 2 अक्तूबर 2019

हिन्दू महात्मा गांधी - अरविन्द सिसौदिया





- गांधी जयंती !

हिन्दू महात्मा गांधी को स्थापित करनें की जरूरत है - अरविन्द सिसौदिया

जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस ने जिस महात्मा गांधी को सामनें रखा वह महात्मा गांधी थे ही नहीं । महात्मा गांधी ने तो शुद्ध रूप से रघुपति राघव राजा राम गाया था और रामराज्य की कल्पना की थी। महात्मा गांधी तो सनातन महात्मा गांधी थे, हिन्दू महात्मा गांधी थे भारतीय संस्कृित को आगे रख कर चलने वाले महात्मा गांधी थे। श्रीराम, अहिंसा, सत्य, मानवता, रामराज्य और क्षमा हिन्दू संस्कृति से ही उन्होने लिये थे । गीता उनको सबसे प्रिय थी। उनकी 150 जयंती पर हिन्दू महात्मा गांधी को स्थापित कर उन्हे सच्ची श्रृद्धांजल दी जानी चाहिये।

मंगलवार, 17 सितंबर 2019

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी दीर्घायु हों - अरविन्द सिसौदिया







https://www.youtube.com/watch?v=0xwiBM0Pldg

 प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी को जन्मदिवस की कोटि-कोटि शुभकामनाएं - अरविन्द सिसौदिया

सोमवार, 2 सितंबर 2019

’मतदाता सत्यापन कार्यक्रम’ से अवश्य जुडें - अरविन्द सिसौदिया







प्रत्येक मतदाता के नाम का सत्यापन होगा
1 जनवरी 2020 को 18 वर्ष पूर्ण करने वाले भी अपना नाम जुडवा सकेगें
’’मतदाता सत्यापन कार्यक्रम’’ प्रारम्भ, वोटरसूची में अपना - अपना नाम सत्यापन अवश्य करवायें - अरविन्द सिसौदिया

1 सितम्बर, कोटा। भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार 01 सितंबर से 30 सितंबर 2019 तक मतदाता सूची सत्यापन का कार्य प्रारम्भ हो चुका हे। वर्तमान में मौजूद सभी नामों का सत्यापन किसी अन्य दस्तावेज के साथ किया जायेगा। भाजपा के जिला महामंत्री अरविन्द सिसौदिया ने बताया कि सत्यापन कार्यक्रम के अंतर्गत फोटोयुक्त निर्वाचक नामावली में मौजूदा मतदाताओं ने नामों का सत्यापन बीएलओ द्वारा घर-घर जाकर किया जाएगा। उन्होने कहा अपना और अपने परिवार के नामों की सुनिश्चितता के लिये स्वंय प्रेरणा से तय दस्तावेजों से नाम अवश्य सत्यापित करवाना चहिये। उन्होने बताया कि आयोग द्वारा इस हेतु 7 अधिकृत किये गये दस्तावेजों में भारतीय पासपोर्ट, ड्राइविंग लाईसेंस, आधार, राशनकार्ड, सरकारी-अर्द्ध सरकारी कर्मियों को जारी पहचान पत्र, बैंक की पासबुक, किसान पहचान पत्र आदि में से किसी एक के साथ किया जा रहा है। सीसौदिया ने आव्हान किया है कि सभी नागरिकों को, राजनैतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को मतदाता सत्यापन कार्य में बढ़-चढ़ कर भाग लेना चाहिये और मतदाता सूची शुद्ध व सही बनानें में सहयोग करना चाहिये। महामंत्री ने बताया कि सत्यापन में बोगस, डुप्लीकेट, मृतक, शिटेड आदि मतदाताओं के नाम पुनरीक्षित कर पात्र वास्तविक मतदाता के नाम को ही निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस हेतु मतदाताओं द्वारा स्वंय भी एनवीएसपी “ राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल” पर अपना सत्यापन आनलाइन करवा सकतें है। उन्होनें बताया कि इस कार्यक्रम के अन्तर्गत सभी मतदाता स्वयं आयोग द्वारा ’वोटर हेल्पलाइन’ मोबाईल एप, एनवीएसपी पोर्टल एवं अपने - अपने क्षेत्रों में संचालित होने वाले ई-मित्र, कामन सर्विस सेंटर (सीएससी ) तथा निर्वाचक पंजीकरण कार्यालय में मतदाता सुविधा केन्द्र के माध्यम से मतदाता सूची में अपनी ￧प्रविष्ठियांे का सत्यापन आयोग द्वारा इस हेतु अधिकृत किय गये दस्तावेजों के साथ करवा सकेंगे।
उन्होंने बताया कि यदि मतदाता सूची की किसी भी प्रविष्टि में संशोधन भी निर्धारित प्रपत्र से आनलाइन आवेदन पत्र भरकर प्रस्तुत कर सकेंगे। मतदाता सत्यापन कार्यक्रम के दौरान मतदाताओं द्वारा परिवार के सदस्यों की प्रविष्ठियां का सत्यापन भी किया जा सकेगा। ऐसे पात्र मतदाता जिनका संदर्भ तिथि 1 जनवरी-2020 के सदर्भ में मतदाता सूची में पंजीकरण नहीं किया गया है के द्वारा भी निर्धारित प्रपत्र में आवेदन किया जा सकेगा। अभियान के दौरान प्रयुक्त होने वाले विभिन्न आवेदन फार्म 6,7,8 एवं 8ए की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित आयोग द्वारा की गई है । बीएलओ द्वारा घर-घर सत्यापन के दौरान एवं मतदान केन्द्रों पर आयोजित किये जाने वाले विशेष शिविरों में इनका प्रयोग किया जायेगा।
- अरविन्द सिसौदिया, जिला महामंत्री भाजपा कोटा। 9414180151

गुरुवार, 29 अगस्त 2019

कांग्रेस गद्दार, उसे वोट देना पाप है - अरविन्द सिसौदिया





कांग्रेस गद्दार पार्टी, उसे वोट देना पाप है - अरविन्द सिसौदिया
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधाी ने , अपने बयानों के द्वारा पाकिस्तान की पूरी पूरी मदद की और कश्मीर पर झूठ फैलानें का काम स्वंय किया है। जनता में वह गद्दार पार्टी मानी जानें लगी है। तीन बडे राज्यों के विधानसभा चुनाव सामनें हैं। मध्यप्रदेश और राजस्थान में पालिका और पंचायतीराज चुनाव सामनें है। इन चुनावों में जनता से वोट ठगनें के लिये राहुल ने यूटर्न लिया है। राहुल का यह बयान मात्र छल है। वोट ठगनें की राजनीति है।
- अरविन्द सिसौदिया, जिला महामंत्री भाजपा, कोटा।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

क्या वंश पूछते हो, श्रीराम मय जो पूरा देश है - अरविन्द सिसौदिया







12 अग॰ 2019 को प्रीमियर हुआ था
**** क्या वंश पूछते हो,भगवान श्रीराम मय जो पूरा देश है - अरविन्द सिसौदिया
*** अनुसंधान हो - श्रीराम के वंशज सीसौदिया, सिकरवार बडगूजर गुहिल भी हें
*** सूर्यवंशी भगवान श्रीराम और माता जानकी की कोख से जन्में "लव" के वंशज पूरे भारत में फैले हुये हैं। मेवाड श्रीराम के पुत्र लव के वंशजों का ही है। गुहिल , सीसौदिया, सिकरवार और बड गूजर लव के वंशज ही है। लव ने लाहौर बसाई थी । बाद में गुजरात और फिर मेवाड पर उनके वंशजों का शासन हुआ। लेकिन पश्चिमी भारत की अशांत और संघर्षशील सीमाओं के कारण कोई बडे दस्तावेजी सबूत मिलना मुस्किल है। किन्तु स्मृतियों,जागाओं और संस्कृत साहित्य इस बात का गवाह है कि श्रीराम के एक मात्र पुत्र लव थे ! वाल्मीकी जी ने कुशा से कुश को बनाया था और कुश को भी पुत्रवत सम्मान ही प्राप्त था। इन दानों पुत्रों को राज्य दिया गया था तथा उनकी वंश परम्परा समस्त भारत में फैली हुई हे।
- अरविन्द सिसौदिया,जिला महामंत्री भाजपा कोटा !!!
भाजपा कोटा संभाग मीडिया प्रभारी ! 9414180151 / 9509559131

कांग्रेस आराजकता उत्पन्न करना चाहती है - अरविन्द सिसौदिया





14 अग॰ 2019 को प्रीमियर हुआ था
कांग्रेस आराजकता उत्पन्न करना चाहती है - अरविन्द सिसौदिया
कांग्रेस पाकिस्तान परस्ती के लिये माफी मांगे - अरविन्द सिसौदिया
काँग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने कहा कि “ कश्मीर से धारा 370 हटाना असंवैधानिक है “। काँग्रेसी के क्रूर नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा कि “ कश्मीर अब फलस्तीन बनके रहेगा“। मतलब कश्मीर में खून-खराबे की काँग्रेस की पाकिस्तान से मिल कर मुकम्मल योजना है। काँग्रेस के महाज्ञानी नेता पी. चिदम्बरम् ने साम्प्रदायिक राग अलापते हुये कहा कि “ मुस्लिम-बहुल होने के कारण ही भगवा सरकार ने धारा 370 हटाई, कश्मीर यदि हिन्दू-बहुल होता तो धारा 370 कभी न हटती ।“ चिदम्बरम् यह बताना भूल गए कि यदि कश्मीर हिन्दू-बहुल होता तो धारा 370 लगती ही नहीं। फिर कल ही काँग्रेस के लगभग मुख्य नेता दिग्विजय सिंह बोले कि “ भाजपा ने 370 हटाकर अपने हाथ जला लिए, अब कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा ।“. मतलब कांग्रेस अब कश्मीर पाकिस्तान को सौंप कर ही मानेंगे।“ कुल मिला कर कांग्रेस देश को संकअ में डालनें पर आमादा है।
इसके पूर्व संसद में धारा 370 पर चर्चा के दौरान काँग्रेस के अधीर रंजन चैधरी, मनीष तिवारी, दिग्विजय सिंह और चिदम्बरम् वगैरह ने वो सब कुछ कहा जो कश्मीर पर पाकिस्तान कहता रहा है। अधीर रंजन चैधरी ने तो कश्मीर को यूएन का मसला तक बता दिया, जिसमें भारत बिना यूएन की अनुमति के कुछ नहीं कर सकता३ राज्यसभाक् में तो काँग्रेसियों ने विरोध में लगातार हुल्लड़ और नारेबाजी की। समूचा प्रकरण संसद में मौजूद काँग्रेस आलाकमान द्वारा प्रायोजित और समर्थित था। काँग्रेस कार्यसमिति की मीटिंग छोड़कर बाहर आये राहुल गांधी ने पत्रकारों को झूठा बयान दिया कि “ कश्मीर हिंसा में जल रहा है, लोग सेना द्वारा मारे जा रहे हैं, स्थिति बहुत गंभीर है।“
काँग्रेस कश्मीर को सेना द्वारा बना दिया गया नाजी कैम्प तक बता रही है । इसके पहले भी कांग्रेसी मणिशंकर अय्यर और कांग्रेसी सलमान खुर्शीद मोदी सरकार को हटाने के लिए पाकिस्तान मदद माँगने गए थे। भारत भर के लोग हतप्रभ हैं कि देश को आजादी दिलाने और राष्ट्रनिर्माता होने का दावा करने वाली काँग्रेस एका एक पाकिस्तान की प्रवक्ता कैसे बन गई। वह पाकिस्तान की राजनैतिक पार्टी की तरह कैसे व्यवहार कर रही है। लेकिन सच तो यह है कि काँग्रेस वैसी ही है जैसे सत्तर साल पहले थी। देश की जनता ही इतने दशकों तक काँग्रेस से भ्रमित रही और देश गर्त में जाता रहा। भड़काकर धारा 370 और 35 ए को पुनर्जीवित करने की अघोषितनीति से काम कर रहीं हे। जिसे कभी देश सफल नहीं होनें देगा।

शनिवार, 6 जुलाई 2019

कांग्रेस को अपना ब्रिटिश दिमाग बदलना होगा-अरविन्द सिसौदिया

सुरक्षा को संकल्पित भाजपा घोषणापत्र - अरविन्द सिसौदिया

भाजपा के सदस्य बनें , देश धर्म से जुडें - अरविन्द सिसौदिया

मंगलवार, 5 मार्च 2019

हिन्दू धर्म और राष्ट्रीयता – शंकर शरण



हिन्दू धर्म और राष्ट्रीयता – शंकर शरण द्वारा एक व्याख्यान
जनवरी 8, 2018 भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन

https://indictales.com/hi

समय बदल गया है, समय की मांग बदल गयी है,और जो नयी पीढ़ी आती है वह स्वयं सबकुछ तय नहीं करती; बहुत सी चीजे उसको बनी-बनायीं मिलती है | यह जो कैरियर ओरिएंटेडनेस का आज कासमय है, उसमेपढ़ना-लिखनाएक तरह से कम हो गया है|सबकुछ रेडीमेड, जल्दी, गूगल से मिल जाये, नेट से मिल जाये,उससे कम चल जाये – यह परंपरा बन गयी है और उसी में जो लोग सिद्धहस्त है,उनको ही सफलमाना जाता है |लेकिन जिस तरह के राष्ट्रवादी वातावरण में आपका संस्थानमुझे दिखाई पढ़ता है, और जिस तरह के परम्पराएं इस संस्थान ने बनाई हुई है,उसमे मुझे लगता है की आपको थोड़ी अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए | क्यूंकि भारत एक अनूठा देश है | अपने सभ्यता की दृष्टि से भी अनूठा है,और विश्व में आज भारत का जो स्थान है,अच्छा भी और कठिन भी – वह दोनों ही दृष्टिसेपहले आपको समझ के रखना चाहिए |

आजआप युवा है,काल आप प्रोफेशन में जायेंगे, काम करेंगे, तो आपको यह चेतना होनी चाहिए की इस पुरे एक्सिस्टेंस में विश्व के परिदृश्य में आप, आपका देश, आपका समाज, आपका कर्त्तव्य कहाँ है | और इसीलिए मुझे यह शुरुयाद करने में कठिनाई हो रही है की इतना जनरल विषय – इसमें कौन सी बातेंमैं आपके साथ शेयर करूँ, क्यूंकि आपकी बैकग्राउंड क्या है, आपने अबतक कितना जाना है,उससे मुझे परिचय नहीं है | और यह कठिनाई होती है शिक्षक को – खास करके उच्चशिक्षा में –की जबतक वह विद्यार्थी की बैकग्राउंड जानकारी की उसको – जानकारी नहीं है,तो वह अगली चीज़ को कैसे कनेक्ट करे | इसीलिए मैं अंदाजे से कुछ बातेंआप के सामने रखने की कोशिश कर रहा हूँ,और मुझे आशा है की आप इस परस्वयं विचार करेंगे, स्वयं समझने की कोशिश करेंगे | हमारे देश में – जैसा मैंने आप को कहाँ की भारत एक अनूठी स्थिति में है | सभ्यता के दृष्टि से भारत एक ऐसी अनूठी सभ्यता है जैसी दुनिया में कोई और नहीं | कहने के लिए भी अगर तुलना हो तो सिर्फ एक चीन है या मिशर है जिससे तुलना होती है,जो विद्वान् लोग करते है, एक अर्थ में शयेद वह तुलना भी बिलकुल सठिक नहीं है, क्यूंकि कोई ऐसी सभ्यता नहीं है आज विश्व में जिसका सातत्य, continuity, इतनी unbroken हो जितनी भारत की है | कोई सभ्यता नहीं है ऐसी |

यह विश्व का एकमात्र देश है जहाँ पर आज भी वह साहित्य पढ़ा जाता है जो ढाई हज़ार साल पहले पढ़ा जाता था | आज भी वह भाषायें वह शब्द इस्तेमाल किये जाते है जो ढाई हज़ार साल पहले, तीन हज़ार साल पहले किये जाते थे | आज भी कला की वह रूप, वह शब्द, वह गान उपलब्ध है जो ढाई हज़ार – तीन हज़ार – चार हज़ार साल पहले तक, पहले भी इसी धरती पर गाये जाते थे या पढ़े जाते थे | ऐसी विश्व में कोई सभ्यता नहीं है | और यह continuity इसके बावजूद की पिछले एक हज़ार वर्ष से भारत एक तरह से विदेशियों का गुलाम रहा है | ठीक है, इसपर विवाद होता है की मुघलों के समय में या सुल्तानों के समय में पूरा भारत गुलाम नहीं हुआ; कुछ लोग यहाँ तक कहते है कोई गुलाम ही नहीं था, वह तो स्वदेशी शासन था,और सिर्फ हम विदेशी शासन में– सिर्फ अंग्रेजों के समय से आये; यह विवाद अपनी जगह है, लेकिन एक जनरल consensus है की भारत, भारत के लोग अपनी समझ से, अपने इच्छा से, अपने संस्कार से यहाँ का शासन कम से कम पिछले एक हज़ार सालों से नहीं चला है; कुछ लोग यहाँ तक कहते है की वह अभी तक नहीं हुआ है | और यह बात सिर्फ rhetoric नहीं है, सिर्फ लफाज़ी नहीं है | यह बात सच है की हम लोग पिछले सत्तर सालों से राजनैतिक रूप से स्वतंत्र है |

लेकिन यह भी उतना ही सच है की अभी तक हम लोग सांस्कृतिक रूप से, बौद्धिक रूप से मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुए है | और उसका सबसे सुन्दर और प्रत्यक्ष प्रमाण – हमारी भाषा और शिक्षा है | हमारी शिक्षा आज भी वही है जो अंग्रेजों ने बनाई थी – जो डिज़ाइन की थी | हमारी भाषा आज भी वही है – शासकीय, नीतिगत – अंग्रेजों ने बनाई थी | यहाँ तक की हमारा राजनीतिक तंत्र– कानून – वही है जो अंग्रेजों ने बनाया था | और यह आप आसानी से समझ सकते है की अंग्रेज यहाँ शासन करने ही नहीं आये थे, शोषण करने भी आये थे | वह अपने देश के हित में काम करते थे, इंग्लैंड के हित में काम करते थे | और इन्होंने जो यहाँ का तंत्र बनाया था – राजनीतिक तंत्र – वह बिलकुल अलग था | आप देखते होंगे बीबीसी में या सीएनएन में इंग्लैंड का – इउके का प्राइम मिनिस्टर १० जनप – सॉरी – १० डाउनिंग स्ट्रीट से निकलता है तो वह बिलकुल एक सड़क पर एक बिल्डिंग है, बिल्डिंग में दरवाज़ा खुलता है और वह प्रधान मंत्री बाहर आ जाता है | उसके – उसके पचास मीटर सौ मीटर दूर में बस स्टॉप है | तो इंग्लैंड का – भाई इउके का प्राइम मिनिस्टर ऐसी जगा में रहता है जहाँ पर निकलते ही वह सड़क आती है – एक कामकाजी जैसी जगह है | और भारत में उसी – उन्ही अंग्रेजों ने – वाइसराय का घर तो छोड़ दीजिये, एकजिले के कलेक्टर के लिए कम से कम पचास पचास बीघे का उन्होंने बंगला बनवाया | एक पूरी – एक पूरा ऐसा आडंबर खड़ा किया जिसमे शासन के प्रति लोगों में एक सम्मान का, रौब का, दबदबे का भाव पैदा हो |

ब्रिटेन में वह नौकरशाही नहीं है जो उन्होंने यहाँ बनया है | कहने का मतलब के हम आज भी उसी तंत्र को चला रहे है तो यह महसूस करना चाहिए की हम आज भी स्वतंत्र नहीं हुए है, हमने अपना तंत्र नहीं बनाया है | यह हमारी एक कठिनाई है | हम अपनी भाषा में आज भी लिख पढ़ नहीं रहे है, नियम कानून नहीं बना रहे है | हमारी कोर्ट, हमारी पार्लामेंट, हमारे कानून मंत्रालय, हमारेसारे महत्वपूर्ण दस्ताबेज पहले अंग्रेजी में बनते है, फिर उसका जैसे तैसे अनुवाद वगेरह होता है | दुनिया में ऐसा कोई महत्वपूर्ण देश नहीं है जहाँ पर उसका सर्वोच्च व्यक्ति और सबसे निचला व्यक्ति एक भाषा में नहीं काम करता | और इससे जो कठिनाइयाँ होती है आप कभी उस पर सोचने की कोशिश कीजिये, उससे बहुत बड़ा अंतर पैदा होता है | बहुत बड़ा अंतर | रूस में या जापान में या चीन में, अमेरिका में वह राष्ट्रपति हो या फिल्म स्टार या पालिसी मेकर या यूनिवर्सिटी का वाईस चांसलर जो भी बोलता है वह उसी भाषा में बोलता है जो उस समाज का सबसे अंतिम आदमी सीधे सुनता है, सीधे समझता है | यहाँ पर बिलकुल ऐसा नहीं है और यह सिर्फ एकमात्र ऐसा देश है – महत्वपूर्ण देश | छोटे छोटे अफ़्रीकी देश बहुत है जिनको अंग्रेजो ने और फ्रांसीसियों ने इउरोपियों ने उन्होंने गुलाम बनाया, उनकी भाषाएँ पूरी तरह मिट गयी है | वहाँ या तो फ्रांसीसी बोली जाती है या अंग्रेजी बोली जाती है, या पूरे लैटिन अमेरिका में स्पेनिश बोली जाती है | लेकिन उनकी पुराणी भाषा, पुराणी संस्कृति, पुराने लोग, पुराना साहित्य सबकुछ मिट गया | भारत एक ऐसा अनूठा देश है की इसमें वह continuity है जो ऋग्वेद के समय से आज तक आपको मिलेगी| आप ऋग्वेद उलट कर के पढ़े, उपनिषद् उलट कर के पढ़े, ध्यान से थोड़ी देर, और आप को दिखाई पड़ेगा की उसमे ऐसे दृश्य है जो आप को आज भी दिखाई पड़ते है |

उसमे ऐसे शब्द ऐसे मुहावरेहै जो आप आज भी इस्तेमाल करते है | तो ऋग्वेद से लेकर आज तक एकcontinuity, और दूसरी ओर पूरी की पूरी राजनीतिक प्रणाली, पूरी की पूरी शैक्षिक प्रणाली अभी भी उस कोलोनियल माइंडसेट में है जिसका उद्देश्य यहाँ का शोषण करना था, यहाँ के लोगों को क्लर्क और यहाँ के लोगों को अधीन बना के रखना था, यहाँ के लोगों में हीनता भरने की जिस की एक – एक उद्देश्य था – मैं यह नहीं कहूँगा की उनका सारा उद्देश्य यही था – ऐसी स्थिति की जो शिक्षा थी, ऐसी स्थिति की जो राजनीती थी , ऐसी स्थिति का जो कानून था, वह हम आज तक चला रहे है | तो एक अर्थ में हम स्वतंत्र भी है, दूसरी ओर हम परतंत्र भी है और इस परतंत्रता से हमारी मुक्ति अभी नहीं हुई है, इसका सबसे सामान्य उदहारण यह भाषा है | और इस भाषा से भारत जैसे देश में एक दूसरी मुश्किल हुई है | और वह – उस पर आप को ध्यान देना चाहिए –पत्रकार के रूप में विशेष कर , क्यूंकि पत्रकारों को किसी भी चीज़ की सूचना देनी होती है, और सूचना देने से पहले आप को स्वयं समझना होता है की असली बात क्या है | यानि आप अन्वेषण भी करते है, आप चीज़ों को समझते है, फिर आप दूसरों तक पहुचाते है | अब आप देखिये की यहाँ भाषा से कितनी बड़ी समस्याएं  खड़ा हुई है |

पुरे जिन जिन शब्दों का हम इस्तेमाल करते है, यानि आप को कहा है की अफ्रीका में या लैटिन अमेरिका में, अमेरिका में भी – उत्तरी अमेरिका में भी – पुरे अमेरिका में भी, जोवहा मूलनिवासीथे, मूल भाषा थी, मूल परव – त्यौहारथे वह सब ख़तम हो गये| भारत ऐसा है की एक हज़ार वर्ष की गुलामी के बावजूद इसका कुछ भी पूरी तरह ख़तम नहीं हुआ | ऐसे लोग भी आये जिनका पूरा उद्देश्य था की यहाँ की पूरी की पूरी संस्कृति, धर्म, समाज, भाषा को हमें ख़तम कर देना है | इनको कन्वर्ट कर लेना है | किसी को सफलता नहीं मिली | लेकिन इससे हमारे जीवन में एक विकृति भी आई है की हम बहुत सी चीज़े – हम जो बोलते है, जिन शब्दों का हम प्रयोग करते है, उसके अर्थ बदले हुए है | एक तिब्बती विद्वान् है, प्रोफेसर रिन्पोचे , उन्होंने एक बड़ी सुन्दर उपमा दी थी,मैं उसका प्रयोग करके आप को बताना चाहता हूँ की यह भाषाई समस्या हमें कहाँ तक परेशां करती है | उन्होंने कहा था की जैसे शब्दों का हम – जिनजिनशब्दों का – अपने शब्दों का इस्तेमाल करते है उसका वह जो मूल अर्थ हमारी सभ्यता ने दिया है, हमारे समाज ने दिया है वह अर्थ च्युत हो गए है | उसपे हमने यूरोपीय और अंग्रेजी अर्थ भर दिया है | और उसका मूल अर्थ खो गया है | तो वह उपमा देते है की जैसे किसी लोटे में दूध रखा हुआ था, तो किसी – कोई तेल ले कर आया, उसने कहा की आप यह तेल रख लीजिये तो उन्हें कोई और बर्तन नहीं मिला, तो उसने दूध को फेक दिया और उसमे तेल ले लिया | तो वह इस –यह शब्दों की उपमा दे रहे थे, की हमने बहुत सारे शब्दों का, वह उसका मूल अर्थ फेक दिया, और उसमे अंग्रेजी वाला, यूरोपीय वाला या अमेरिका वाला अर्थ रख लिया है |

अब यही लीजिये – धर्म-संस्कृति | हमारे यहाँ संस्कृति अलग से नहीं बोनी जाती, आम तौर पर आप देखिएगा धर्म-संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन, बोलचाल – तो संस्कृति हमारीयहाँ धर्म से अलग नहीं रही है | बल्कि धर्म से अलग यहाँ कुछ भी नहीं रहा | तो अब यही धर्म शब्द लीजिये, जो उन्होंने कहा – उदहारण दिया था रिन्पोचे ने | हमारे यहाँ अधिकांश बच्चे, मुझे लगता है की दस में नौ नहीं, सौ में पंचानवे बच्चे, धर्म का अर्थ रिलिजन, रिलिजन का अर्थ धर्म समझते है | जबकि अकेडमिक रूप से भी, theoretically भी, व्यवहारिक रूप से भी – यह दोनों बिलकुल भिन्न धारणा है | धर्म में, हमारे धर्म में विश्वास या पूजा पाठ इसका कोई अर्थ नहीं रहा है | धर्म का मतलब भारत मेंरहा है कर्त्तव्य | सत्कर्म | अबरावण को अधर्मी कहते है लेकिन रावण तो शिवभक्त था | यह महाभारत को धर्मयुद्ध कहते है | मतलब एक पक्ष धर्म का था, दूसरा पक्ष अधर्म का था | तो दोनों तो सारे एक ही देवी देवतायों को पूजने वाले थे, एक ही परिवार के थे, एक ही विश्वास के थे, दोनों के गुरु एक थे, माता – वह पूरा वंश एक था | तो यह धर्मयुद्ध हम क्यूँ कहते है?उसी तरह हमारे यहाँ शब्द है पुत्रधर्म, राजधर्म, मात्रधर्म, गुरु का धर्म,विद्यार्थी धर्म, आप देखिये के रिलिजन से यह सब स्पष्ट नहीं होता | रिलिजन का मतलब है faith| rather उसके लिए,उनके लिए anotherword ही है – faith| आप का faith क्या है?you are मुस्लिम, jew, क्रिस्चियन –तो रिलिजन है faith | और धर्म है – faith आप का कुछ भी हो – आप का आचरण | आचरण से धर्म तय होता है और विश्वास से रिलिजन तय होता है |

यह हार्वर्ड के प्रोफेसर भी जानते है | जो भी, जिन लोगों ने भी indology पर या धर्म पर काम किया वह जानते है की धर्म बिलकुल अलग धारणा है, रिलिजन बिलकुल अलग धारणा है | लेकिन हमारे देश में रिलिजन और धर्म को एक शब्द समझने वाले, एक चीज़ समझने वाले आप को सभी विद्यार्थी मिलेंगे | जो सचेत नहीं है,जिनकी – जिनमे यह अभीप्सा नहीं है की हमें कुछ जानना है या अधिक समझना है, ठीक से समझना है वह दोनों को पर्यायवाचीके रूप में लेते है – डिक्शनरी में वह मिलता है | और यह एक शब्द नहीं है, मैंने सिर्फ उदाहरण के लिया दिया – की धर्म रिलिजन नहीं है और रिलिजन धर्म नहीं है – सिर्फ एक शब्द है | हमारे बहुत सारे ऐसे शब्द है,जैसे संस्कृति भी उनमे एक शब्द है | या लीला, पर्व, तीर्थ सम्पराय, ऋत–इन सबके लिए अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है | इसका यह मतलब नहीं है की अंग्रेजी कोई दुर्बल भाषा है, और हम उससे अधिक सबल है – दोनों सबल भाषा है | कहने का मतलब यह है की जो इस समाज, एक खास समाज, एक – उसका जो एक विशेष इतिहास है, उसकी जो विशेष परंपरा है उसके शब्द उसको व्यक्त करते है | और किसी दुसरे समाज का जो इतिहास है,उसकी जो संस्कृति है, उसका जो अनुभव है वह उसके शब्दों में व्यक्त होता है |

इसलिएहमारे भी बहुत सी – हमारे भी बहुत सी धर्नाये है जिसके लिए अंग्रेजी में शब्द नहीं है या रशियन में शब्द नहीं है, उनकी भी बहुत सारी धारणाये है जिसके लिए हमारे पास शब्द नहीं है | लेकिन क्यूंकि हमारे देश में पूरी शिक्षा मूलतः अंग्रेजी में चल रही है, नीति निर्माण मूलतः अंग्रेजी में चल रहा है इसलिए हमें यह कठिनाई होती है की हम अपने बहुत सारे शब्दों को, अपने बहुतसारे समस्यायों को, अपने बहुत सारे स्थितियों को क्यूंकिअंग्रेजी के माध्यम से जानने की कोशिश करते है इसलिए पूरा का पूरा गडमड हो जाता है | न तो हम उसका वह यूरोपीय, अमेरिकी या रशियन या जर्मन इतिहास हम ठीक से समझ पाते है जिससे उन शब्दों की उत्पत्ति हुई, और न हम अपने इतिहास अपनी संस्कृति अपनी समझ को समझ पाते है क्यूंकि हम अंग्रेजी के कारण हमारा एक व्यवधान खड़ा हो जाता है | तो यह सिर्फ एक उदहारण है की हम जिन समस्यायों इस तरह की सभ्यतागत और दार्शनिक समस्यायों की जब हम चर्चा करते है तो यह भाषा का व्यवधान किस तरह एक हमें मुसीबत में डाल देता है जो आप के जैसे – अलावा – मतलब भारतीयों के अलावा यह समस्या किसी देश में विद्यार्थियों को या उच्चशिक्षार्थियों को नहीं होती | क्यूंकि अपनी भाषा अपनी संस्कृति ख़तम भी नहीं हुई – जैसेमैंने कहा की कुछ देशों में बिलकुल ख़तम हो गयी – ख़तम हो गयी तो ठीक है | एक बार आप रों लीजिये – ख़तम हो गयी – आस्ट्रेलिया में ख़तम हो गयी | लेकिन अब उनके पास नयी भाषा, नयी संस्कृति, नये – नयी शब्दावली, नयीअवधारणायेपूरी तरह – पूरा समाज उसी में जीता है | हमारेयहाँ ऐसा नहीं है | हमारे यहाँ अभी भी बृहत् समाज – बहु संख्यक समाज – बहुत बड़ी संख्या में समाज अपने ही धारणायों में जीता है |  लेकिन उसके ऊपर जो शिक्षा, जो नीति निर्माण, जो हायर स्टडीज़, रिसर्च, मीडिया यह सब आता है वह विदेशी माध्यम के भाषा के माध्यम से आता है, और विदेशी प्रत्यय इस्तेमाल करता है |

इससे कठिनाई यह होती है की हम ठीक ठीक किसी चीज़ को नहीं जानते | अगर हमारेविद्यार्थी, हमारे पत्रकार, हमारे विद्वान् – मैं तो कहूँगा हमारे प्रोफेसर अगर सचेत नहीं है तो वह बोलते कुछ है, उसका अर्थ कुछ और होता है | औरफिर जब वह कम्यूनिकेट होता है विद्यार्थियों तक या पाठकों तक तो उसका अर्थ कुछ और हो जाता है | तो इस भाषाई गड़बड़ी के कारण जो इस तरह की चीज़ें है जिसका ठीक ठीक विमर्श नहीं हो पाता | मैंने सिर्फ उदाहरण के कहा की धर्म और रिलिजन एक नहीं है | फिर हिन्दू धर्म| हिन्दू धर्म – जैसा मैंने कहा की रिलिजन नहीं है – रिलिजन faith होता है | हिन्दू धर्म में आप को – आप को कुछ भी मानने की छुट है | faith इसमें कुछ है ही नहीं | और इसी अर्थ में कुछ जो ऑर्थोडॉक्स मिशनरीज़ होते है, ऑर्थोडॉक्स इस्लामिस्ट्स होते है वह लोग कहते है की यह लोग तो रिलिजन विहीन लोग है | यह हिन्दू लोग – इनमे कोई faith नहीं है | क्यूंकि न इनकी कोई एक किताब है, न इनका कोई एक God है, न कोई इनका कोई चर्च है, या न कोई इनका कोई प्रिस्ट क्लास है जो इनको आर्डर दे कर के बताये की क्या पूजा करनी है क्या नहीं करनी है – यह तो बिलकुल फ्री फ्लोटिंग समाज है, इनमे कुछ भी निश्चित नहीं है , इसलिए यह लोग irreligious है – नॉन-रिलीजियस है |

इसलिए रिलिजन देने का काम हमें करना है | यह जो सिरियस मिशनरीज़ है बड़े बड़े – कैथोलिक चर्च के – उनकेआप डाक्यूमेंट्स अगर आप देखे इन्टरनेट पर, वेबसाइट पर बड़े आराम से मिल जाते है | अब देखिये की उनमे यह गहरी भावना है की हमें पुरे भारत को क्रिस्चियन बनाना है | क्यूँ? क्यूंकि यह तो अन्धकार में डूबे हुए है | इन तक क्राइस्ट नहीं पंहुचा है, इनको बुक अभी तक नहीं मिली, इनकोGod का मेसेज नहीं मिला, इनके पास कोई मैसेंजर नहीं है, तो और यह ऐसा सोचने वाले कोई पागल लोग नहीं है , वह लुनाटिक फ्रिंज नहीं है, और वह कोई फनाटिक भी नहीं है, वह बड़े सज्जन, शिष्ट, विद्वान् लोग है, जो अपने ह्रदय में यह महसूस करते है और उसके हिसाब से पुरे भारत के लिए – जिले जिले गाँव गाँव तक के लिए उन्होंने योजना बनायीं है की कैसे उनको हम क्रिस्चियन बनाएं | और यह पूरी परियोजना खुले आम चल रही है – आज से नहीं, दो सौ साल से चल रही है, चारसौ साल से चल रही है | लेकिन आज भी वह बहुत सीरियसली इस कम में लगे हुए है | उनको कितनी सफलता मिली है या नहीं मिली है यह दूसरी बात है, हमारे प्रसंग में सिर्फ यह है की किस तरह से वह हमको irreligious या नॉन-रिलीजियस मानते है | या हमें अन्धकार में डूबा हुआ मानते है | इसीलिए क्यूंकि उनकी जो रिलिजन की धारणा है,और हमारी धर्म की धारणा है वह बिलकुल अलग है | हमारे यहाँ अगर कोई बिलकुल जीवनभर पूजापाठ न करे तो भी उसके मातापिता उसका परिवार उसको अपने धर्म या अपने समाज से बहर नहीं मानता | कोई इन संस्कारों में पड़ता है या नहीं पड़ता है उससे उसकोकोई फरक नहीं पड़ता |

उसका आचरण कैसा है उसपर लोगकहते है की यह अधर्मी है, यह पापी है – उसकेकर्म से उसको कहा जाता है | तो ऐसे – ऐसेहिन्दू धर्म की जो स्थिति है विश्व में वह आपको ध्यान से समझनी चाहिए | वह इसलिए की आनेवाले समय में और अभी भी यह संघर्ष बहुत ही विकट हो सकता है | हम क्यूंकि एक बड़े देश के नागरिक है, और बड़े समृद्ध देश के नागरिक है, समृद्ध देश इस अर्थ में की प्रकृति से असलीसमृद्धिप्राकृतिक ही होती है | प्रकृति ने आप को क्या दिया है उसी से समृद्धि होती है और दूसरी समृद्धि फिर human resources है की लोग कितने चतुर है, कितने इंटेलीजेंट है, कितने मेहनती है इससे फिर दूसरी संपत्ति पैदा होती है लेकिन मूल संपत्ति प्राकृतिक संसाधन है | रशिया को देखिये, अमेरिका को देखिये, यह सब, यह दोनों देश मूलतः प्राकृतिक रूप से समृद्ध है | उसके बाद उनका human resources उसमे मिल कर के इन्हें दुनिया का सबसे धनी और सबसे प्रभावी देश बनाता है | भारत भी वैसा ही एक देश है | यह सिर्फ विदेशी शासनों के कारण हम उनसे पिछड़े हुए हो गए, काफी – काफी चीज़ों में– फिरभी आप देखेंगे की सिर्फ सत्तर साल की स्वतंत्रता ने भारत को कहाँ से कहाँ पंहुचा दिया है| १९४७ में जब भारत स्वतंत्र हुआ था तो दुनिया के देश – जो विकशित देश थे वह बिलकुल निराश थे के यह लोग तो लड़ मर कर ख़तम हो जायेंगे | यह बचने वाले नहीं है, यह बिलकुल गए गुजरे है | लेकिन इसके बावजूद की हमारे राजनीतीमें इतनी समस्या है, इसके बावजूद की इतना भ्रष्टाचार है, इतनी अकर्मण्यता है, इतना – सो, सारी बुराइया है जो हमारे नेतायों के लिए आप लोग – सब – हम सब लोग कहते है |

इसके बावजूद सत्तर सैलून में भारत की जो उन्नति हुई है वह सिर्फ इसलिए हुई है की विदेशी शासन हट गया | इतनी इस देश में क्षमता है, रिसोर्सेज है, लोग है – उद्यमी है,व्यापारी है,और ऐसे देश में रहते हुए हम लोगोको यह पता नहीं चलता है की हम लोग कैसे किस तरह की एक अपवाद किस्म के देश है | औरयहाँ पर धर्म और संस्कृति की बात आती है जिस को आप को मै एक सन्दर्भ देना चाह रहा था | वह यह – कीआप दुनिया में अकेले ऐसे देश है जो रिलिजन की अंतर्राष्ट्रीय परिभाषा से बिलकुल बाहर है | सरल शब्दों में कहे तो भारत दुनिया का एकमात्र हिन्दू देश भारत है | नेपाल था, अब उनको भी वह सेक्युलर बनारहे है और कन्वर्ट कर रहे है | ऐसे भी वह छोटा देह है,एक तरह से – ऐतिहासिक रूप से देखा जाये तो वह भारतीय सभ्यता का ही हिस्सा है | तो यह एकमात्र देश होना यह भी सुनिश्चित करता है की हमारे बारे में दूसरों को कितनी गलतफहमिया रहती है | मै आप को उदाहरण देता हूँ पत्रकारिता का –और शयेद आप लोगों ने भी नोट किया होगा –आप अगर सीएनएन, बीबीसी नियमित देखते हो,या अमेरिकी पत्रिकाए है जो अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्द – टाइम्स या न्यूज़वीक – अगर आप रेगुलर देखते हो तो आप नेपाया होगा की उसमे भारत के बारे में कभी भी सकारात्मक समाचार नहीं आते | हमेशा कोई न कोई नकारात्मक – कोई विचित्र चीज़ , कुछ जुगुप्सा पैदा करने वाली, या हेरत पैदा करने वाली – मानो यह जो देश है यह कुछ विचित्र किस्म का है, अनोखा किस्म का है, दैवीय किस्म का है, गड़बड़ किस्म का है – जहा से कोई पॉजिटिव समाचार आ ही नहीं सकता | या वहा के बारे में कोई पॉजिटिव आउटलुक बना ही नहीं सकते है| मैंआप को इस पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ की कुछ लोग कहते है की वह लोग दुष्ट है,भारत से जलते है,या भारत के शत्रु है, हमेशा ऐसा नहीं है |

इसके पीछे एक कठिनाई भी है की भारत हिन्दू देश होने के कारण यहाँ की बहुत सी चीज़ों को वह नहीं समझते है|यहाँ की बहुत सी चीज़ों को वह समस्या मानते है जो यहाँ की सिर्फ विशेषता है | जैसे यह डाइवर्सिटी, या यह जो रिलिजन वाली बात है,की हमारे पास कोई faith नाम की चीज़ नहीं है, हम दूसरों को कन्वर्ट नहीं कराते, हम को इससे कोई दिक्कत नहीं होती है की लोग – दुसरे लोग भी यहाँ आये रहे – वह इसको नहीं समझ पाते है | उनकी संस्कृति ने, उनकी सभ्यता ने, उनकेधर्म ने उनको सिखाया है एक खास तरह से देखना | और इसीलिए भारत के बारे में उनके पढ़े लिखे लोग, अच्छे समझदार लोग, नीतिकार लोग भी वह ठीक सही समझ नहीं बना पाते | और इसीलिए आप नोट – आप देखियेगा की वह हमेशा भारत के बारे में एक नकारात्मक छवि लिए हुए है | यह हमारी एक कठिनाई है जिस पर मैं आप को ध्यान दिलाना चाहता हूँ | की आप को दुनिया में – जिसको कहते है की fair consideration – आप को नहीं मिलेगा | उसके पीछे गहरे दुराग्रह है | वह हमें अपने से कम समझते है | अपने से नीचा समझते है | अपने से इतना भिन्न समझते है जिसके साथ कोई सांस्कृतिक सामंजस नहीं हो सकता|इसका दूसरा पक्ष भी है | जो उनके enlightened लोग है,जो सीकर किस्म के लोग है,खोंजी किस्म के लोग है,जो सच्चे विद्वान् किस्म के लोग है,उनमे ठीक उल्टा है | वह एक तरह से भारत के भक्त हो जाते है | वह भारत के प्रति उनमे एक श्रद्धा पैदा हो जाती है | और वह फिर वही हमारी संस्कृति और धर्म से जुड़ता है |

आपने एक छोटा सा उदाहरण है जो बिलकुल आप सामने देख सकते है | भारत के लोग पैसा कमाने के लिए, कैरियर बनानेके लिए अमेरिका जाते है, यूरोप जाते है | आप ने कभी नहीं सुना होगा की कितने भी हम गए गुजरे हो, कितने भी हमारे समस्याएं हो,कोई enlightenment के लिए, seeking के लिए या रिलिजन के लिए याspiritualism के लिए कोईकही जाता हो?कोई भारतीय नहीं जाता | ठीक इसका उल्टा है,पूरी दुनिया से जिनको भी कुछ सिखने की इच्छा होती है जिसकोmaterialism से अधिक, इस – जिसको कहते है कैरियर से अधिक – पैसा, technology इनसे अधिक अगर किसी को भी कुछ चाहिए, सब के सब भारत आते है | वह चाहे बीटल्स वाले लोग हो, या वह apple के संस्थापक हो,या हॉलीवुड की जूलिया रोबर्ट्स हो,या वह यह कौन है वहसात फीट वाला हीरो – माने दर्जनों लोग – स्पोर्ट्स के, संस्कृति के, कल्चर के, फिल्म के,हर तरह के लोग – एक दो नहीं, सैकड़ों हजारों की संख्या में बारहो महीने भारत में आप को मिलेंगे | और एक दो नहीं – मैं श्री अरविन्द आश्रम, और यह विवेकानंद आश्रम, रमण महर्षि का आश्रम,शिवानन्दआश्रम, चिन्मय आश्रम – यह जो, जिसको कहते है की टॉप लीग है,मैं इसको छोड़ देता हूँ,सबसे छोटे छोटे जो बाबा साधू संत है,आप उनके पास देखिये की दर्जनों की संख्या में उनके पास में से विदेशी आते है | वह किस लिए आते है? क्याखोंजने आते है?यह वाही चीज़ है, जिसके प्रति स्वयं हमारे लोग अभी तक सचेत नहीं हुए है | और, जो सचेत होना चाहते है, या हो रहे है, उनको कम्युनल कह कर के cow down किया जाता है |

उनको नीचा ठहराने की कोशिश की जाती है | जबकि यह प्रत्यक्ष प्रमाण आप देखिये –बहुत कम लोग जानते है की even अरब से – मुस्लिम देशों से लोग आते है | शिवानन्द आश्रम में, चिन्मयआश्रम में, विवेकानंद आश्रम में,औरमहीनों रहते है | कुछ तो उनको मिलता है | विज्ञापन का युग है, consumerism का युग है,तो आप उस परिभाषा में – उस भाषा में भी देख सकते है –की यह सिर्फ propaganda नहीं होसकता | यह ठीक है की नकली साधू भी है, नकलीबाबा भी है,but then वह तुलसीदास के समय में भी थे | आप रामचरितमानस पढ़िए, आप को उसमे भी मिलेगा की किस तरह से छली, छद्म, कपटी साधू लोग किस तरह से लोगों को बेवकूफ बनाते है और उनके – उनकेअंधविश्वास का शोषण करते है, वह अपनी जगह है | लेकिन genuine, सच्चे गुरु,सच्चे विद्वान्, सच्चे मनीषी – वह आज भी है, और पूरी दुनिया से लोग यही आते है | तो यह भारत का एक अनूठापन है | की हम, और दुर्भाग्य यह है की हमारी शिक्षा ने हमें ठीक उन चीज़ों से अलग कर दिया है | मैंने आप को कहा की अगर आप वेड को पढ़िए, ऋग्वेद को पढ़िए – ऐसे भी पढ़ सकते है –दुनिया की पहली किताब मानी जाती है, सबसे पुरानी existing किताब का उसको यूनाइटेड नेशंस ने भी दर्जा दिया हुआ है की जो उपलब्ध सबसे पुरानी पुस्तक मानवता के पास है वह ऋग्वेद है | आप उसको पढ़िए आप को आज की चीज़ दिखाई पढेगी | अगर आप महाभारत पढ़िए तो आप को लगेगा की आप आज के हरियाणामें या पाटलिपुत्र में घूम रहे है | आप को यह दोनों जीवन मिलता जुलता दिखाई पड़ेगा | रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसपर लिखा है | तो यह जो – यह जो continuity है,और यह जो हमारी दार्शनिक परंपरा है,हमारी जो अध्यात्मिक समृद्धि है,वह इतनी अखंड है की विदेशी लोग आते है और हम से सिख कर के जाते है, लेकिन यह हमारी एक कठिनाई भी हो जाती है की हम स्वयं अपने आप को दुनिया के सिस्टम के बीच में अभी तक फिट नहीं कर पा रहे है |

राजनीतिक रूप से फिट नहीं कर पा रहे है, आर्थिक रूप से फिट नहीं कर पा रहे है,even सांस्कृतिक रूप से फिट नहीं कर पा रहे है | क्यूंकि हमारी शिक्षा दीक्षा ऐसी होती है की जो ठीक हमारी सबसे अमूल्य निधि है,हमारी संस्कृति की,वाही हमारे शिक्षा से बाहर है |हमारे – हमारे स्कॉलर, हमारे सबसे अच्छे विद्यार्थी जो टॉप करते है, गोल्ड मेडलिस्ट है,सोशियोलॉजी में है, उनको यह पता नहीं है की दुनिया की सबसे पहली सोशियोलॉजी की बुक – technically – वह भारतीय है | और वह कौन सी किताब है उसकावह नाम तक नहीं जानते है|जिस उपनिषद् की चर्चा आज से नहीं, ग्रीक थिन्केर्स के समय से – प्लेटो-अरिस्तु की समय से आप को उपनिषद् शब्द, और उपनिषद् की बातेंcontinuous – मुझे लगता है की इंटरनेटकी कृपा से सबकुछ उपलब्ध होता है – आप उसमे कभी आप चेक कर के देखे – indophile – indophile – एक शब्द है,मतलब इण्डिया से प्रेम करने वाले – इण्डिया से प्रेम रखने वाले और उसमे उसने – किसी ने जमा करके सारे उदाहरण दिए है, दुनियाके बड़े बड़े दार्शनिकों, विद्वानों के – और उनमे सब एक से एक विद्वान् है|Voltaire, शोपेन्हौयेर, प्लेटो,अरिस्तु,यह रूसो – मतलब, उसकी गिनती नहीं है, मुझे लगता है कम से कम पचास ऐसे बड़े थिंकर पिछले ढाई हजार साल से दुनिया के, उनके आप को उसमे नाम मिल जायेंगे की उन्होंने भारतीय सभ्यता या भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में क्या कहा है |

तो कुछ लोग कहते है की वह लोग indophile है मतलब  इतनी उनको – इतना उनको भारत से प्रेम है की वह हर चीज़ भारत में देखते है | लेकिनइसको अगर आप तटस्थ दृष्टि से भी देखिये, journalistic दृष्टि से या अभीप्सु की दृष्टि से –अन्वेषक की दृष्टि से तोआप देखेंगे की इतनी बड़ी जो ज्ञान परंपरा  का स्रोत है, ठीक उससे हमारी शिक्षा कटी हुई है | हम एबीसी से शुरू करते है, यह स्थिति अंग्रेजोंके समय में तक नहीं थी, अंग्रेजों के समय ऐसा था की लोग अपनी भाषा में शिक्षा शुरू करते थे और बाद में अंग्रेजी भी उनकी शिक्षा में जुड़ जाती थी | और उनमे जो एक बड़े बड़े विद्वान् हुए थे वह अपनी भाषा को भी उतनी गहरे से जानते थे अंग्रेजी को भी जानते थे – अंग्रेजीसाहित्य को जानते थे | यह स्वतंत्र भारत में ही उल्टा हुआ की हम अपनी भाषा, अपनी साहित्य से कट गए है | हिंदी प्रदेश के आप को – कथित हिंदी प्रदेश जिसको कहते है,उसमे बच्चे आप को ऐसे मिलेंगे जो अज्ञेय का नाम नहीं जानते | जो दिनकर का नाम नहीं जानते, जजों बच्चन का नाम नहीं जानते| और यह स्थिति चालीस साल पहले तक यहाँ नहीं थी | क्यूँ? क्यूंकि हमारी शिक्षा मूलतःअपनी भाषा में होती थी,अंग्रेजी बाद में – छठे क्लास से या आठवे क्लास से, चौथे क्लास से – जैसा स्कुल और जैसा स्टार और जैसा वह परिवेश था उससे जुडती थी |

अब आज बिलकुल बचपन से एबीसीडी की पढाई शुरू हो गयी है और यह गायों गायों तकपहुंच गयी है |इसका जो हानिकारक पक्ष है वह यह – की ठीक वह चीज़ जिससे भारतीय सभ्यता बनी है,ठीक वह चीज़ जिससे आज भी भारत का मूल्य है, ठीक वह चीज़ जो सिखने के लिए लोग आज भी भारत आते है,हम अपने ही बच्चों को उससे परिचय तक नहीं करा रहे है, वह नाम तक नहीं जानते है, उसकोपढ़ना तो दूर रहा |JNU – JNU में एक विद्यार्थी पढ़ रहा है, topperहै, वह उनसे एक दिन भेंट हुई,उनसे मैंने पूछा – कोई बहस हो रही थी तो उपनिषद् शब्द आया – तो उसके मुह पर मैंने देखा की कुछ व्यंग का भाव आया | मैंने कहा क्यूँ,तुमने उपनिषद् पढ़ा है क्या? बोला, नहीं – पढने की ज़रूरत क्या है?उसमेक्या होगा?मैंने कहा की क्यूँ,बोला वह तो ऐसे रिलीजियस बुक्स है | मैंने कहा तुमने उलट के देखा है?उसने कहा नहीं | मैंने कहा तुमको यह आईडिया है की वह कोई हजार पन्ने की किताब है या दस पन्ने की किताब है?बोला नहीं!तो, और यह मै उसकी बात कर रहा हूँ जो सचमुच एक genuineस्टूडेंट है | topper है | बढ़िया पेपर लिखता है | बढ़िया भाषण देता है | उसने उपनिषद् को देखा तक नहीं है | और उसको वह रूचि भी नहीं है | जैसे उसको कोई कहे रहा है की भाई तुम्हे जानना चाहिए तुम सोशियोलॉजी के विद्यार्थी हो,तुम्हे मालूम होना चाहिए की उसमे क्या है | पूरा सोशल description है | बोला, अच्छा?मुझे तो पता थाकी वह तो रिलीजियस बुक है |

तो इस स्थिति में हमने अपने देश को लाया हुआ है की हमारे नयी पीढ़ी बिलकुल एक अर्थ में अज्ञानी बन रही है | तो ऐसी स्थिति में आप को इन सब टर्म्स को समझना है | सधर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद| और इसीलिए मैंने कहा की यह एक कठिनाई है, क्यूंकि बैकग्राउंड जानकारी हमारे पास न यूरोप की है,न अपनी है | यह हमारी एक विचित्र स्थिति यूरोप का विद्यार्थी अपनी संस्कृति, अपनीभाषा, अपने साहित्य से उतना कटा हुआ नहीं है जितना एक भारतीय विद्यार्थी है | वह यहाँ के विद्यार्थी – प्रोफ़ेसर है वह अंग्रेजी के – अपने JNU से रिटायर्ड हुए बहुत बड़े विद्वान् – जो भी हो – वहकहे रहे थे की हमारे विद्यार्थी जब वहा जाते है तो वहा से फ़ोन कोरके पूछते है – की सर इसमें क्या है उसमे क्या है – क्यूंकि यहाँ तो उन्होंने पढ़ा नहीं, यहाँ पर तो वाही मार्क्स, फूकोपढ़कर जाते है, तो जो की उनकी अपनी चीज़ है | वहा वाले जानना चाहते है की आप मनुस्मृति के बारे में क्या जानते है, नारद स्मृति के बारे में क्या जानते है | और हमारे बच्चे जानते ही नहीं है | जब वहा जाते है तब उनको पता चलता है की इन सब चीज़ों की, जो हम लोग उपेक्षा किये वह खुद उपेक्षा नहीं करते है | वह उसको अध्ययन करते है | और हमारे यहाँ मनुस्मृति जलाई जाती है | जिसका स्थान वेदों के समकक्ष है | तो इस कठिनाई में इन टर्म्स को समझना, इन समस्यायों को समझनाएक कठिन काम हो जाता है | क्यूंकि हर चीज़ ऐसी नहीं है की जो कैप्सूल के रूप में या सूत्र के रूप में जल्दी जल्दी दी जा सकती है |

अभी यह राष्ट्रवाद ही ले लीजिये , जैसे मैंने कहा – धर्म रिलिजन नहीं है,उसी तरह हमारे यहाँ राष्ट्रवाद – यह राष्ट्रवाद nationalism का सिर्फ हिंदी ट्रांसलेशन, हिंदी प्रतिशब्द है |और सच पूछिए तो nationalism, nation, nation-makingयह स्वयं यूरोप के लिए दो सौ ढाई सौ साल पुराना है | अब यह ऐसे – देखिये कैसी विडम्बना है –यह एक ऐसी सभ्यता है जो चार हज़ार वर्षों से अक्षुण चल रही है | उसको एक ऐसी विदेशी टर्म से हम समझने की कोशिश करते है जो स्वयं यूरोप के लिए ढाई सौ साल पुराना है | इतना ही नहीं,स्वयं यूरोप में nationalism के अर्थ पर कोई सहमति नहीं है | एक विद्वान् ने – बल्कि कई विद्वानों ने जो nationalism पर अध्ययन किया है,उन्होंने पाया है,की nation और nationalismकी कोई एक परिभाषा होती ही नहीं है | रशियन लोग उसका एक अर्थ करेंगे, सर्बियन लोग उसका एक अर्थ करेंगे, चेचेन लोग अलग करेंगे, क्रोट्सअलग करेंगे,इउके को ही देख लीजिये तो स्कॉट् लोग एक बात बोलेंगे, इंग्लिश लोग दूसरी बात बोलेंगे,वेल्श तीसरी बात बोलेंगे उनमे कोई सहमति नहीं है | तो एक ऐसी धारणा, जो जिसके यूरोप में भी कोई निश्चित अर्थ नहीं है,उस धारणा से हम अपने देश की समस्यायों, अपनी देश की अभीप्सा, अपने देश की – जिसको कहे जनभावना –उसको जब हम अभिव्यक्त करने की कोशिश करते है,तो यह बड़ी बेढंग स्थिति हो जाती है | सच पूछिए तो राष्ट्रवाद या nationalismभारतीय सच्चाई को, भारतीय स्थिति को, हमारी समस्यायों को, हमारी विशेषतायों को अभिव्यक्तकरने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं है|जैसे मैंने कहा की वहा भी इसके बारे में कोई स्पष्टता नहीं है | एक ही अर्थ प्रमाणिक है,के अगर कोई एक खास समूह – वह छोटा हो या बड़ाहो –अगर वह अपने आप को एक मानता है,तो वह एक है |

अगर वह नहीं मानता है, तो आप तर्क करके आप उनको कुछ नहीं समझा सकते | उदाहरण के लिए चेचेन– चेचेन है रशिया का पार्ट –लेकिन अगर आप टॉलस्टॉय का उपन्यास पढ़िए, जिन्होंने डेढ़ सौ साल – पौने दो सौ साल पहले लिखा था, उसमेभीदेखिएगा की चेचेन लोग और जो मूल रशियन लोग है,उन लोगों में झगड़ा होता था और भयंकरझगड़ा होता था | युद्ध होता था | आज भी चेचेनिया उनका पार्ट है | तो आप को लगता है की कोई राष्ट्रवाद की ऐसी परिभाषा है जिसको रशियन और चेचेन दोनों मानते हो?वाही हल इउके का है | स्कॉटलैंड, इंग्लैंड और यह तीसरा आयरलैंड – तीनों का इतिहास एक दुसरे से झगडे का युद्ध का भी है | तो ऐसा भी होता है की एक व्यक्ति जो आइरिश लोगों के लिए हीरो है,इंग्लिश लोगों के लिए विलन है | कौनसा राष्ट्रवाद? राष्ट्रवाद की परिभाषा वहा ही निश्चित नहीं है | और यहाँ? जो एक पूरी की पूरी सभ्यता है,जहा पर उनकी जो परिभाषाएं है,उस परिभाषा में देखिये तो कह सकते है, जैसा कम्युनिस्ट लोग कहते थे, मार्क्सिस्ट लोग कहते थे,की यह भारत तो एक कंट्री है ही नहीं –एक नेशन है ही नहीं |

यह तो बहुत सारी nationalities का समूह है जिसको अंग्रेजों ने ज़बरदस्ती इकट्ठा रखा था | और इसीलिए १९४७ से पहेले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उसराष्ट्रिय्तायों के आत्मनिर्णय का अधिकार करके एक थीसिस दी थी, जिसमे उन्होंने कहा था की भारत में तो १७ राष्ट्रियातायें है,इसलिए इस देश का १७ टुकड़े होने चाहिए, दोही क्यूँ हो रहे है?लीजिये! अगर आप को जिन्नाह की राष्ट्र की परिभाषा पढ़िए तो उन्होंने कहा था की हिन्दू और मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्र है,और उन्होंने पुरे डिटेल में कहा था की क्यूँ मुसलमान एक राष्ट्र है,क्यूँ? क्यूँकी उनको अपना पाकिस्तान आन्दोलन के लिए एक बौद्धिक construct वह बना रहे थे | तो उन्होंने कहा की हिन्दू एक राष्ट्र है, मुस्लिम एक राष्ट्र है | गांधीजी की परिभाषा कुछ और थी | मार्क्सिस्टों की परिभाषा कुछ और थी,आर्य समाज की परिभाषा कुछ और थी \ तो यह जो हमारी सभ्यता है,इस – इसको सच पूछिए तो आप सभ्यता ही कह सकते है | इसको nationalism में और एक विदेशी टर्म के अन्दर डालना – इसमें पचास समस्याएं खड़ी होती है |

यहाँ तो इतनी विविधताएँ है, और इतने तरह के इतनी भाषाएँ है,इतनी भिन्नताएं है, की अगर आप वह यूरोपीय परिभाषा डालने की कोशिश कीजियेगा तो उसमे से आप को लगेगा की यहाँ तो एक-आध हजार देश बन्ने चाहिए, एक-आध हजार नेशन है | लेकिन, इसके विपरीत यह भी एक तथ्य है, की यह देश , यह सभ्यता,वैदिक काल से आज तक कुछ चीज़ों को एक आत्मसात किये हुए है, पता नहीं चलता है की उसकी – उसमे वह एकता का सूत्र कहा है,लेकिन वह एकता का सूत्र है | और इसीलिए जब आप देखिये की उदाहरण के लिए यह जो वन्देमातरम पर जब भी विवाद होता है,और यह विवाद आज से नहीं है,वन्देमातरम पर विवाद स्वाधीनता से पूर्व है | शयेद आप को मालूम होगा अगर आप में से किसी ने उसका अध्ययन किया हो तो १९४७ से पूर्व कम से कम पिछलेचालीस साल से यह वन्देमातरम ही हमारा राष्ट्रीय गीत था | और यह इतना decided था , fixed था की इसमे कोई असहमति की गुंजाईश नहीं थी | यह एक विडम्बना हुई की यह राष्ट्रगीत नहीं बना, लेकिन यह वन्देमातरम में भाव क्या है?यह गीत एक उपन्यास से लिया गया है,बंकिमचंद्र के आनंदमठ का – अगर आप आनंदमठ को पढ़िए – तो, और यह बंगला में है – मजे की बात यह भी है की यह हिंदी का गान नहीं है – वन्देमातरम–वैसेजन गण मन भी हिंदी का नहीं है,दोनों बंगला के है | लेकिन क्यूंकि देवनागरीमें लिखी होती है तो हमें लगता है की यह हिंदी है |

यह हमारी भाषाई विविधता और भाषाई एकता – दोनों का इसमें सूत्र मिलता है | के अगर आप देवनागरी में लिख दे तो भारत की कम से कम एक दर्जन भाषाएँ हैजो आप को हिंदी ही लगेंगी | लेकिन वह अलग लिपि में लिखी जाती है इसलिए पता नहीं चलता है| तो हमारी विविधता और हमारी एकता  एक दुसरे से अभिन्न है – और यह जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई पढ़ती है | जो मुहावरे, जो कहानियां, जो पुराण हम उत्तर भारत में जम्मू-कश्मीर तक सुनते है वह आपको केरल तक दिखाई पड़ती है | तो निर्मल वर्मा हमारे हिंदी के बड़े लेखक हुए थे, उन्होंने कहा था की हमलोग कहते है की हमारी दो महाकाव्य है|रामायण और महाभारत | वहकहते थे की एक तीसरा महाकाव्य भी है | वह यह भारतीय समाज है, जो अदृश्य रूप से उसमे एक ऐसी भावना है जो… तो होती है, लेकिन उसे कोई concretize नहीं कर सकता आप कोई उसको नाम नहीं दे सकते|तो रामायण और महाभारत के भी पात्रऔर उसकी कहानिया पुरे देश के कोने कोने में अपने अपने तरह सेन केवल मौजूद है, बल्किआज भी जीवंत है |हिमाचल –यह – उत्तराखंड में कहते है की महाभारत के जितने पात्र है,सब के एरिया बटे हुए है |लोग मानते है की हम उन्हीके वन्ग्श्जहै और यह उन्ही की जगह है |  और उसको आज भीजीवंतरूप में उनका मेला लगता है | यहाँ तक की लोग यह कहते है की उनपर वह आते है – किसी परभीम आते है, किसी पर युधिष्ठिर आते है | और आपको इस तरह की परंपरा आप को कर्णाटक तक दिखाई पड़ेगी| तो यह जो चीज़ है, जो इस पुरे देश को जोड़ती है वह क्या है? धर्म और संस्कृति का यह अर्थ जो भारत के लोगों को एक दुसरे से जोड़ता है और उनमे हजार तरह की विविधताएँ है, अलगाव भी है और यह अलगाव भी दिखाई पड़ते है – राजनीती में, भाषा में, व्यवहार में – बहुत चीज़ों में अलगाव भी दिखाई पड़ता है, लेकिन कुछ लोग अलगाव को अधिक महत्वा देते है और एकता को कम कर देते है |लेकिन उसमे जो एकता का तत्त्व है,शयेद वह इसलिए महत्वपूर्ण है की उसने प्रमाणित किया हुआ है की यह हजारों वर्षों से वह चीज़ है जो भारत के लोगों को एक करती है | और वन्देमातरम एक सूत्र है सिर्फ – एक उदाहरण है, की जब भी इस पर controversy होती है तो आप ने शयेद नोट किया होगा या आप करेंगे क्यूंकि यह ख़तम नहीं हुआ है , आप देखेंगे की पुरे भारत से उसके प्रति एक रेस्पोंसे आता है |

मतलब लोग indifferent नहीं रहते है | यह शयेद ९७ या ९८ में वह आया था – ए आर रहमान का गीत – वन्दे – माँ तुझे सलाम – उसमे भी वन्देमातरम है | और उस समय भी फतवे आये थे और बहुत विवाद हुआ था और उस समय भी उसके प्रति उसी तरह से पुरे देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई थी | मतलब पॉजिटिव प्रतिक्रिया – इन favour ऑफ़ वन्देमातरम | तो यह जो भावना है की भारत हमारी धरती है आसेतुहिमालय– हिमालय से ले कर के यह सेतुबंध रामेश्वरम तक – यह पूरा भारत एक है, इसको आप राष्ट्रवाद की जो पश्चिमी परिभाषाएं है या जो अकेडमिक terminologies है उनसे आप नहीं समझ सकते | दुर्भाग्य वही है की क्यूंकि हम लोग अपने शास्त्रों से कटगए है – शास्त्रों नहीं, अपनी ज्ञान-परंपरा से कट गए है – अन्यथा यह कठिनाई नहीं होती | जिन बातों को हमें मेहनत कर के अकेडमिक भाषा में समझण और समझाना पड़ता है वह स्वतः स्पष्ट हो जाता | लेकिन क्यूंकि ऐसा नहीं है इसलिए हमें यह कहने की ज़रूरत पड़ती है की भारत की जो  स्थितियां है उसको – उसकेलिए nationalismसही शब्द नहीं है | civilisation या civilisational स्टेट यह शयेद कुछ हद तक ठीक हो सकता है | एक चीन के विद्वान् है झांग व्हेइव्हेइ उन्होंने पांच साल पहले एक किताब लिखी थी “द चाइना वेव” |

उसमे वह तर्क करते है की – वह चाइना के लिए तर्क करते है की चीन को एक कंट्री या एक नेशन नहीं कहना चाहिए, यह एक civilaisationहै| हालाकीउन्होंने उसमे भारत की भी चर्चा की है, लेकिन नेगेटिव रूप में | उनका कहना है की नहीं भारत civilisation नहीं है, हम है | चाइना civilisation है | लेकिन अगर जो तर्क उन्होंने चीन के सभ्यता होने के लिए दिए है,सच पूछिए तो वह भारत पर अधिक लागु होते है | भारत को civilisational स्टेट या civilisation कहना चाहिए | और यह था भी, जैसा मैंने आप को कहा की अगर आप वह उस पर indophile वाला सर्च करे तो आप को ग्रीक थिंकर के समय से, प्लेटो के समय से आज तक आप को दुनिया के टॉप विद्वान् मिलेंगे जिनका यह सुनिश्चित मत है और इन्होंने तर्कपूर्ण ढंग से कहा है कीहमारे पास सारेज्ञान का स्रोत हमें इस गंगा के किनारे से मिला है | पूरा दर्शन, पूरा ज्ञान, पूरा – पूरी संस्कृति, पूरी समझ, philology, भाषा यह सब इसकी सब भारत से ही पूरी दुनिया में गयी है ऐसा कहने वाले सीरियस विद्वान्, topmost विद्वान् एक नहीं, अनंत हुए है | इस थ्रेड को, इस सूत्र को समझना सबसे अधिक हमारी जिम्मेदारी थी लेकिन हम इससे अलग हो गए | और इसलिए मैं आप को कहना चाहता हूँ की राष्ट्रवाद को हमें अपने ही सन्दर्भ में समझने की कोशिश करनी चाहिए की हमारी अपनी परंपरा से यह जो अर्थ हमें मिला है,और उसका सबसे यह एक व्यवहारिक सूत्र है की यह हमारी मातृभूमि है, रामायण में भी है – राम कहते है कीभाई सब कुछ तो ठीकहै लेकिन “जननी जन्मभूमिश्च…”|

तो यह जो हमारी मातृभूमि है और यह जो हमारा जो भूगोल है – हिमालय से लेके समुद्र तक – इसके प्रति सम्पूर्ण भारतवर्ष में  एक अव्यक्त किस्म की श्रद्धा या व्यक्त किस्म की श्रद्धा रही है और इसके बहुत सारे उदाहरण है | तो इस राष्ट्रवाद को हमें इस अपने terminology में या अपने परंपरा में अगर हम समझने की कोशिश करे,तभी शयेद इसके समस्यायों को भी ठीक से समझ सकेंगे | अन्यथा हम लोग एक – मैं कहूँगा की गलत सिद्धांतों या गलत मुहावरों के चक्कर में फंस जाते है, फिर उसमे उलझते चले जाते है | हम कोशिश करते है – एकउसके पीछे एक हीन भावनाभी है हमारे बहुत सारे लोगों की जो पिछले  डेढ़ सौसालों से चल रही है जब से अंग्रेजी शिक्षा ने हमें अपने जड़ों से काटना शुरू किया, हमारे लोगों में एक हीन भावना भरने लगी | की जब तक कोई चीज़ विदेशों से सर्टिफाइड हो के न आ जाये तब तक हम उसको लो ग्रेड का मानते है | जैसे योग | योगा योगाआजसारी दुनिया में है लेकिन बहुत कम लोग सिर्फ सत्तर अस्सी साल पहले इसको कोई नहीं जानता था,यद्यपि विवेकानंद ने इसको पूरी दुनिया में  सौ साल पहले एक  झलक उसकी दिखला दी थी, लेकिन फिर वह डूब गया | हम उस समय परतंत्र थे, और विवेकानंद जल्द चले गए, उनका काम रुक गया, फिर दुसरे किस्म के लीडर आये और दुसरे तरह के लोग आ गए और वह काम रुक गया| लेकिन योग के प्रतिइसको मैंने नेहरु जी के जीवनी में यह पढ़ा, नेहरु जी योग करते थे, और वहा उसके जीवनीकार लिखता है, की यह कुछ मोर्निंग में उठ कर के एक्रोबेटिक्स करते है |

तो योग को उसके नाम से भी नहीं पुकारा जाता था | लेकिन पिछले पचास सालों में जो उसका विकास हुआहै आज योग दिवस भी है और पूरी दुनिया योग जानती है, और यह योग हमारे पूरी ज्ञान परंपरा का एक छोटा सा अंश है | खास कर के यह जो प्रैक्टिकल योग – योगाभ्यास जिसको – उसी परउन्होंने सीमित कर दिया है,जब की वह नहीं है , वह एक पूरा योग दृष्टि है समझने की, विश्लेषण पद्धति है, पतंजलि योगसूत्र एक प्योर साइंस है | और यह अभ्यास तो उसका सिर्फ एक प्रारंभिक अंग है | लेकिन इस प्राम्भिक अंग ने ही दुनिया को इतना चमत्कृत किया, तो आप यह कल्पना कर सकते है की जिन फिलोसोफेर्स ने यह कहा है की पूरी हमारे सोचने समझने की जो टर्मिनोलॉजी है,conceptual कॉन्सेप्ट्स है,वह सब हमें यह भारतीय ज्ञान परंपरा से मिले है | और इस परंपरा को, इस पूरी इतिहास को हम इन जो विदेशी मुहावरों में, विदेशीphrase में विदेशी construct में फिट करने की कोशिश करते है,तो वास्तव में हमें सफलता नहीं मिलती है | और इसीलिए हमारी समस्याएं भी कुछ दुसरे किस्म की है | जैसा मैंने आप को शुरू में एक संकेत करने की कोशिश की थी,की क्यूंकि भारत दुनिया का एकमात्र हिन्दू देश है, इसीलिए इसके प्रति दूसरों को समझने में कठिनाई होती है | और हमें स्वयं भी उनको समझाने में कठिनाई होती है | बहुत लोग कहते है की भारत इतनी शानदार सभ्यता थी, इतनी सशक्त सभ्यता थी, इतनीधनी सभ्यता थी, और वीरता में भी पीछे नहीं थी तो ऐसा क्या हुआ की इनको छोटे छोटे गिरों आ कर के इनको जित लेते थे और इन पर शासन करते थे – तो कुछ हद तक इन लोगों को लगता है की बड़ा जटिल सवाल है |

सच पूछिए तो मेरे पास भी या किसी के पास भी इसका कोई प्रमाणिक उत्तर नहीं है, लेकिन उसका एक उत्तर है | और वह भी कुछ लोगों ने देखा है कीक्यूंकि हमारी दृष्टि मानवता को देखने की, हमारीउपनिषदिक दृष्टि यह झगडे की दृष्टि नहीं है, dominance की दृष्टि नहीं है, सामंजस की दृष्टि है, प्रकृति के साथ, प्राणिमात्र के प्रति सद्भाव की दृष्टि है | इसीलिए हम बाहर से आने वाले वैसे आक्रमणकारियों,जो संगठित होते थे और ideologically हमें कन्वर्टऔरनष्ट करना चाहते थे, इस दृष्टि के लोगों को हम समय रहते पहचान तक नहीं सके और यह स्थिति आज भी है | आज भी आप देखिये की जो डोमिनेंट डिस्कशन है मिडिया में, मिशनरीज के बारे में जब भी होता है तो आप देखेंगे की एक उसमे खास एंटी-हिन्दू slant होता है | जैसे ही कोई लोग कहेंगे की नहीं नहीं यह धर्मान्तरण का धंदा है, यह मिशनरीज यह कन्वर्शन हो रहा है तो कहंगे नहीं नहीं नहीं नहीं यह माइनॉरिटीज को सताया जा रहा है यह communalism है | अब देखिये की आज भी इस बात को हमारा पढ़ा लिखा समझदार वर्ग – ठीक है उसमे कुछ लोग है जो धूर्त है, जो पोलिटिकल है, जो जानबूझ के यह सब करते है, लेकिन अधिकांश ऐसे है जो सचमुच इस बात को नहीं समझते है | सचमुच मिशनरियों की जो योजना है भारत को कन्वर्ट करने की और उनका जो स्ट्रक्चर है उसको नोटिस तक नहीं लेते | क्यूँ नहीं लेते ? क्युन्किवः इस बात से अपरिचित है की दुनिया में ऐसे रिलिजन भी है जो दुसरे का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं करते | और हम अपनी ओर से मान लेते है की सर्वधर्म समभाव, सभी धर्म समान है, सभी धर्म अच्छे है, सभी धर्म भगवान के ओर ले जाते है |

यह बात उपनिषद् की दृष्टि से और हमारे अपनी ज्ञान परंपरा की दृष्टि से बिलकुल ठीक है, लेकिन क्या जिसे हम धरम कहते है क्या रिलिजन वही धर्म है?क्या इस्लाम वही धर्म है? क्या क्रिश्चियनिटी वही धर्म है?क्या उसमे वही मूल्य मान्यताएं है जिन मान्यतायों को हम मानते है? तब हम जब ऐसा कहते है की सभी धर्म में एक ही बात है,सभी धर्म एक ही दिशा में ले जाते है, और सब ठीक है, कोई फरक नहीं है,अगर कन्वर्ट भी कर ले रहा है तो क्या प्रॉब्लम है आप को? आप ही तो कहते है –ऐसा बच्चे तर्क देते है | के अगर कोई कन्वर्ट हो रहा है या कन्वर्ट कराया जा रहा है तो तर्क देते है – की आप ही ने तो कहा था की सभी धर्म एक है तो क्या फरक पद गया वह मुस्लमान बन गया क्रिस्चियन बन गया –अब देखिये | तो यह जो अज्ञान है,वह दो तरफ़ा है | दुनिया के लोग भी भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति, भारतीय धर्म को ठीक से नहीं जानते और इसीलिए इसके प्रति एक नकारात्मक और विचित्र, जैसे यह गोपूजा – कार्ल मार्क्स ने लिखा था की यह कैसे इतने गए गुजरे कौनलोग हो सकते है जो गे और बन्दर की पूजा करते है?माने यह उनके लिए कार्ल मार्क्स जैसे विद्वान् के लिए यह प्रमाण था की जो गे को पूजता है उससे गया गुजरा और बिलकुल पशुवत कम्युनिटी और हो ही कौन सकती है?अब जहा इतना बड़ा अंतर है,चेतना में,की वह हमारी गोपूजा को, हमारी वृक्ष पूजा को वह नहीं समझ पाते, उसी तरह हमारे लिए भी समस्या है की हम भी जो उनके जो कन्वर्शन प्रोजेक्ट है,हम उसको नहीं समझ पाते | उनके जो, उनके जो प्लान है भारत के बारे में, और जो सफल हुए है,आज भारत वाही नहीं है जो सौ साल पहले था – सौ साल पहले का छोड़िये अस्सी साल पहले भारत का आप नक्शा देखिये– और आज के भारत का आप नक्शा देखिये, उसके बाद उसकी डेमोग्राफी देखिये – जो बचा हुआ भारत है उसकी डेमोग्राफी भी देखिये, वह सिकुड़ रही है | तो यह कहना एक अर्थ में ठीक है की हम इतने समय से रहे है तो आगे भी रहेंगे लेकिन यह कोई गारंटी नहीं है |

अगर आप अपने राष्ट्र, आप उसको नेशन कह लीजिये, सभ्यता कह लीजिये, भारतवर्ष कह लीजिये, भारतमाता कह लीजिये– अगर आप इसके रक्षा के प्रति सचेत नहीं हुए तो जो आज तक नहीं हुआ है वह आगे भी नहीं होगा– सो असंभव –  यह नहीं सोचना चाहिए |जैसा मैंने कहा की निर्मल जी – निर्मल वर्मा या जितने भी बड़े साहित्यकार थे – तीन पीढ़ी,दोपीढ़ी एक पीढ़ीपहले तक– वह कहते थे,जिन्होंनेब्रिटिश समय भी देखा था वह कहते थे की ब्रिटिश शासन में भारतीय भाषा और संस्कृति और चेतना पर इतना बड़ा खतरा नहीं था जितना स्वतंत्र भारत में हो गया| क्यूंकि हम अपनी भाषा से ही कट रहे है – ख़तम हो रही है हमारी भाषा | और भाषा में ही सारी संस्कृति निवास करती है | भाषा से अलग संस्कृति नहीं होती | अगर आप किसी ऐसे दिन की कल्पना करे, बल्कि कल्पना करने की जरुरत नहीं है, आप लैटिन अमेरिका चले जाये, ऑस्ट्रेलिया चले जाये – जहा पूरी की पूरी भाषा एक विदेशी भाषा हो गयी – वहा की पूरी पुराणी संस्कृति भी ख़तम हो गयी | और यह भारत में भी यह खतरा है |

इसीलिए जब हम कहते है की – जब मैं कहता हु की भारत की समस्यायों को nationalism के टर्मिनोलॉजी में पूरी पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता,तो इसे उसी प्रसंग में समझने की कोशिश करनी चाहिए , की हमारी बहुत सी समस्याएं ऐसी है जो दुसरे किसी देश को नहीं है | भारत, जैसा मैंने कहा भारत एकमात्र हिन्दू देश है,इसीलिए दोनों जो दुनिया की सबसे बड़े रिलिजन है,जिनका कन्वर्शन एक ऑफिसियल एजेंडा है,जो वह कहते भी है,यहाँ सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कहा है,२००३ में ओडिशा का कोई केस था कन्वर्शन का, तो उसमे सुप्रीम कोर्ट ने जो क्रिस्चियन पार्टी थी उसने यह तर्क दिया की भाई आप कन्वर्ट नहीं कराते हैयह आप की प्रॉब्लम है | हिन्दुलोग कन्वर्ट नहीं कराते है यह आप की प्रॉब्लम है | हम उसको क्यूँ माने?हमारे रिलिजन का पार्ट है कन्वर्ट कराना | इसलिएby hook by crook by any way अगर हम कन्वर्ट कराते है,थिस इस पार्ट ऑफ़ आवर फंडामेंटल राईट | उसने भारतीय संविधान का हवाला दे कर के हिंदुयों को कन्वर्ट कर के क्रिस्चियन बनाने का कोइस यह कहके defend किया की यह हमारे रिलिजन का पार्ट है | के हम दूसरों को कन्वर्ट करा के क्रिस्चियन बनाये | अब एक कॉमन भारतीय के लिए, एक कॉमन हिन्दू के लिए जो उतना सचेत नहीं है,उसके लिए यह समझना कठिन है |

उसको कहिये तो इसा मसीह की भी एक मूर्ति यहाँ लगा देगा | उसको कोई दिक्कत नहीं है, भारतीय को | लेकिन उलटी तरफ यह नहीं है | तो कहने का मतलब यह है के हमारी बहुत सारे समस्याएं ऐसी है – कन्वर्शन सिर्फ एक issue है –यह जिस तरह से दलितों को या विभिन्न समूहों को  अलग करने की कोशिश की जाती है, सबको या तो रिजर्वेशन के नाम पर या ऑपरेशन के नाम पर, मैन्युफैक्चर्ड जिसको कहते है की यह atrocity literature – वास्तविक प्रोग्रेस जो हुई है पिछले सौ साल में वह न दिखा कर के सिर्फ जो बुराइया है उसको दिखाना, और उसके हिसाब से भारत के लोगों को अलग अलग हिस्सों में काटना, तोड़ना,उनको अलग दिखाना , उनको हिन्दू धर्म से, संप्रदाय से अलग करना , सिखों को दूर करना , बौद्धों को दूर करना – और इनमे जो ऐतिहासिक परंपरा है उसको पूरी तरह उसपर चादर डाल देना, जैसे यह कुछ नहीं था | तो यह सब जैसीसमस्याएंहम अगर राष्ट्रवाद के टर्मिनोलॉजी में रखने की कोशिश करेंगे तो वह फोर्मुलाते ही नहीं होंगी | यह जो प्रोब्लेम्स मैं आप को बता रहा हूँ,वह आप भी जानते है, आप इसको नेशनल nationalism के टर्म में आप नहीं रख सकते | जिस तरह से dravidistan – अब वह ठंडा पद गया – लेकिन एक ज़माने में उस द्रविड़ आइडियोलॉजी को बहुत मजबूती से खड़ा किया गया था और अभी तक है |

वह जो दोनों डोमिनेंट पार्टियाँ है तमिलनाडु में,दोनों द्रविड़ है | DMK और AIADMK| अब वह वह भाषा नहीं बोलती | लेकिन जो द्रविड़ फिलोसोफी या थ्योरी दी गयी,यह मिशनरीयों ने दी थी | एक भी उसमे तमिल नहीं है जिसने यह theorization किया था | की यह द्रविड़ जो है वह अलग है | और यह आर्य है यह अलग है | और आर्य ने इन पर कब्ज़ा कर लिया था | अब इनको मुक्त हो जाना चाहिए | यही स्थिति नार्थ ईस्ट में है और बहुत जगहों में है | तो इस तरह के समस्यायों को आप इस nationalism के टर्मिनोलॉजी में समझ भी नहीं सकते है इसका समाधान करना तो दूर का| इसीलिए मुझे लगता है की इन चीज़ों को आप अगर आप रिपोर्टिंग करे या आप लिखे या आप इसपर सोचे तो आप को कुछ न कुछ मूल में जाने की कोशिश करनी चाहिए | ऐसे भी रिपोर्टर का पहला काम है फैक्ट ढूँढना | और उस फैक्ट को फिर ट्रांसमिट करना | फिर उसको एक्सप्लेन करना |तो यह फैक्ट क्या है?हमारे देश का फैक्ट – कास्ट ले लीजिये | क्या कारण है? की हर तरह के लोग, जो otherwise हमारे शत्रु रहे है, और यह कोई छुपी हुई बात नहीं है – सब के सब कास्ट और कास्टिस्म के खिलाफ खड़े होते है | क्या कास्टिस्म और कास्ट एक चीज़ है?क्या कास्ट और वर्ण व्यवस्था एक ही चीज़ है? क्या वर्ना का वह अर्थ जो अकादमी में या यूनिवर्सिटी में पढाया जाता है या मीडिया में आता है वाही है जो मनुस्मृति में है?मनुस्मृति में शूद्रों के बारे में जो कहा जाता है,कहा गया है,ऑथेंटिक लिखा हुआ है,और जो वास्तव में आज विमर्श में आता है क्या एक ही चीज़ है?आप देखेंगे की बहुत बड़ा भेद है | तो सबसे पहले अगर जिन चीज़ों इस तरह के टर्म्स जब आते है तो आप को कुछ न कुछ ओरिजिनल स्वयं पढने की कोशिश करनी चाहिए | औरspecialization की बात होती है, मैं कहूँगा specializationword सही नहीं है |

किसी न किसी चीज़ का आप को स्वयं गहरा अध्ययन करने की कोशिश करनी चाहिए और गहरा अध्ययन का यह मतलब नहीं है की कोई आप को सौ पचास किताबे पढनी है | मैं कहता हूँ कभी कभी सिर्फ एक छोटी सी किताब पढ़नी भी – गंभीरता से –काफी होती है उस चीज़ को समझने के लिए | जैसे आज का जो विषय है – राष्ट्रवाद| विवेकानंद, रबीन्द्रनाथ टैगोर , श्री अरविंद, दयानंद, श्रद्धानंद, इस तरह के लोगों की जो अपनी रचनाएँ है,उनके बारे में नहीं, जो किसी प्रोफेसर ने बुकलेट या पेपर लिख दिया है या even ऑक्सफ़ोर्ड से भी क्यूँ न छपी हो,पेंगुइन से भी क्यूँ न छपी हो,उसको आप सेकेंडरी माने | मूल पढ़े | विवेकानंद का जो वह भाषण है – भाषण संग्रह – जब वह अमेरिका और यूरोप में तीन चार बरस काम कर के आये थे उसके बाद उनका एक उन्होंने कोलोंबो आये थे सबसे पहले – कोलोंबो से अल्मोड़ा तक | उनके जो भाषणों का संग्रह है शयेद १५ -१६ भाषण है आप उसको पढ़िए | आप देखिये भाषण की मैंने भाषण का रिफरेन्स इसलिए दिया के भाषण कम्युनिकेबल होते है | वह अकेडमिक वर्क नहीं है |

वह आम लोगों को दिए जाते है | और वह विवेकानंद ने सौ साल से भी पहले दिए थे | १८९७ में शयेद आये थे वह और १८९७ से १९०१ तक –तीन चार वर्ष के बीच के वह उनके महत्वपूर्ण भाषण है | आप उसको पढ़िए | आप को उसमे राष्ट्र , संस्कृति, भाषा, राजनीती, उपनिषद्, वेदांत,और अपने देश की समस्यायों का मूल – और उसके समाधान की दिशा – सब आप को उसमे स्पष्ट मिलेगी | क्लियर कट | अगर आप उसको सेंसिब्ली पढ़ रहे है,ध्यान से पढ़ रहे है की यह कहना क्या चाह रहे है |  और आप को कठिनाई नहीं होगी,क्यूंकि मैंने आप को कहा की वह भाषण है| विवेकानंद भाषण दे रहे थे , जैसे मैं दे रहा हूँ | तो मैं कोशिश कर रहा हूँ की आप तक बात पहुंचे | तो आप यह इमेजिन कीजिये की विवेकानंद ने भी उसी भाषा में वह कहा है | आप उसको मूल में पढ़िए | आप को यह दिखाई पढ़ेगा की हम जिन समस्यायों की आज चर्चा करते है,उन्ही समस्यायों की उन्होंने भी चर्चा की है | ऐसा नहीं है की वह चीज़ें arcane पुराणी हो गयी या पांच पीढ़ी पहले की बात है सौ साल पहले की बात है, आज दुनिया बहुत बदल गयी –कुछ भी नहीं बदला |

दुनिया में रोज परिवर्तन होते है | और दुनिया रोज वैसी की वैसी ही रहती है | यह दोनों चीज़ें है | तो हमारी बहुत सी समस्याएं – भाषा, संस्कृति, राष्ट्र, dominance,स्वतंत्रता, धर्म से जुडी हुई बहुत सारी समस्याएं हमारे पास आज हुबहू उसी शब्द में आप देखेंगे – अगर आप अज्ञेय को पढ़े, निराला को पढ़े,टैगोर को पढ़े, श्रद्धानंद को पढ़े – आप को दिखाई पढ़ेगा की वह हुबहू उन्ही समस्यायों से उलझ रहे है | तो technology बदलती है , आर्थिक सम्बन्ध, आर्थिक वातावरण बदलता है कपडे लट्टे कुछ और चीज़ें बदलती है लेकिनबहुत सी चीज़ें मूलतः वाही की वाही रहती है | इसीलिए मेरा आप से अनुरोध है,की आप, इनमे से जो आप को सूट करे, यह भी नहीं है की कोई prescriptive है,मैंने आप को कहा की भारत एक मात्रा दुनिया में ऐसी सभ्यता है जिसकीशास्त्र परंपरा ज्ञान परंपरा इतने समृद्ध है और इतनी तरह से वह कही गयी है की आप इस तरह के जितने भी महा ज्ञानी हुए है, या ऐसी जो महत्वपूर्ण क्क्लासिक पुस्तकें है,उसमे जो आप को रुचिकर लगे,आप को विवेकानंद रुचिकर लगे विवेकानंद को पढ़िए,आप को श्री अरविंद रुचिकर लगे वह पढ़िए |

टैगोर को कवी के रूप में प्रसिद्धि मिली है जो बिलकुल सही है,लेकिन टैगोर ने जो लेख लिखे है,सामाजिक लेख, उनकी संख्या सैकड़ों में है | जो शैक्षिक लेख लिखे है, वह असंख्य है | आप को मालूम है उन्होंने स्कूल खोला था बाद में वह विश्वविद्यालय बना,उसके लिए उन्होंने वर्णमाला से ले कर के, बच्चों की पुस्तक तक उन्होंने बहुत सी चीज़ें लिखी है | तो उन्होंने सामाजिक समस्यायों पर भी लिखा है | वह आप पढ़िए | किसी भी चीज़ को आप मूल में पढ़िए, मैं आप को दावे के साथ कहता हूँ,के आज अभी जो आप की इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी है,अभी जो आप की भाषाई कैपेसिटी है,लैंग्वेज,वह आप की अपने आप बहुत ऊँची हो जाएगी | बहुत अच्छी हो जाएगी | और पत्रकारिता में , खास कर के भाषा का बहुत महत्व है | आप अंग्रेजी में काम करे या हिंदी में काम करे – आप कोशिश करे की इन भाषायों के मूल में जो सबसे क्लासिक और सबसे महत्वपूर्ण – सबसे अच्छे लेखकों और कवियों के जो ग्रन्थ है या किताबें है – छोटी छोटी भी – आप उसको अपनी रूचि से आप थोडा बहुत पढ़ते रहे |

आप को यह सब समस्यायों इन सब स्थितियों की आप की अपनी समझ बननी शुरू हो जाएँगी | और जब आप की अपनी समझ बननी शुरू हो जाएँगी , तब आप इस चीज़ को realise कर सकेंगे की किसी बात पर वह रामचंद्र गुह जो बोल रहे है वह सही है या राम माधव जो बोल रहे है वह सही है | या दोनों की बातों में कमी कहा है |  और वाही आप का ऑब्जेक्ट होना चाहिए | आप देखिये की विवेकानंद ने, श्री अरविंद ने , टैगोरने – आप मार्क कीजिये की उस समय भारत आज की तुलना में , भारत के लोग आज की तुलना में पचास गुना अधिक गरीब थे | आज की तुलना में अधिक दीन अवस्था में थे | लेकिन आप नोट कीजिये – और वह सभी लोग सारी दुनिया को जानते थे | उन्होंने कभी गरीबी की चर्चा नहीं की | उन्होंने कभी आर्थिक परिवर्तन की चर्चा नहीं की | उन्होंने कभी यह डाटा और जीडीपी और रोजगार की चर्चा नहीं की | इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है की वह इन सब समस्यायों को जानते थे | recognize करते थे | लेकिन इसके बावजूद यह भी जानते थे की इसका समाधान सिर्फ वह ही नहीं है | वह इसके समाधान के लिए एक सीडी ऊपर से वह काम करना चाहते थे | वह हमारी चेतना, हमारी समझ,हमारी स्वतंत्रता,हमारा आत्मविश्वास,- उसके स्रोत तक हमें पहुँचाना चाहते थे | जैसा उपनिषद् में कहा गया है की वह कौन सी चीज़ है जिसको जानने के बाद आप सबकुछ को जन जाओगे|  वही विवेकानंद का, कहना चाहिए स्टाइल था | या उनका कंसर्न था | वही टैगोर का या श्री अरविंद का या श्रद्धानन्द का या दयानंद का कंसर्न था | के आप को, हमारे देश के लोगों को वह चीज़ मिलनी चाहिए, वह शक्ति मिलनी चाहिए जिससे वह बाकि सब चीज़ों को स्वयं समझना और सुलझाना शुरू कर दे सकते है | इसीलिए उन्होंने आजकी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया था |

विकास, डेवलपमेंट, पूल, बिजली, सड़क, रोजगार, बेरोज़गारी,इसकी चर्चा वह लोग नहीं करते थे, जब यह समस्याएं आज से कई गुना ज्यादा थी उस समय|वह इसकी चर्चा करते है की हम मानसिक रूप से, बौद्धिक रूप से स्वतंत्र हो | हम इस पूरी अस्तित्व को – हमारे सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, अध्यात्मिकसभी चीज़ों को दुनिया के सन्दर्भ में – दुनिया में हम कहा खड़े है और हम स्वयं अपने जीवन में कहा खड़े है – इसको हम समझने योग्य बने | जब हम इन चीज़ों को समझने योग्य हो जाते है,तो आप निश्चित रूप से फिर जब आप चाहे वह दैनिक रिपोर्टिंग कर रहे है या एनालिसिस कर रहे है,या रिसर्च कर रहे है,उसमे आप का काम तुलनात्मक रूप से थोडा आसान हो जायेगा | इसी लिए मैं आप से यही आग्रह करता हूँ की इस तरह की चीज़ों के प्रति आप यह भाव न रखे की यह हमारे काम की चीज़े नहीं है | आप भारत की जो क्लासिक ज्ञान परंपरा है – उपनिषद् से ले कर के लेटेस्ट – मैं तो कहूँगा सद्गुरु जग्गी वासुदेव तक आप देखेंगे की सब लोग उन्ही कुछ सत्यों को नयी नयी भाषा में हमारे सामने रखने की कोशिश करते रहे है और यह प्रैक्टिकल चीज़ें है |

यह थ्योरेटिकल नहीं है, कुछ लोग लोग कहते है यह सब फिलोसोफी है | अगर यह फिलोसोफी होती, अगर यह हमारी जीवन से जुडी हुई नहीं होती,अगर यह हमें आज भी सलूशन नहीं दे रही होती तो यह टिकी नहीं होती | आप देखिये जिन चीज़ों की उपयोगिता ख़तम हो जाती है,वह बिलकुल बाहर हो जाते है | आप उसका प्रचल – जैसे आज आप कितना भी प्रचार करे कोई टाइपराइटर नहीं खरीदेगा | यह उसी तरह की चीज़ है | इसका converse भी सही है | की आप कितना भी  दुष्ट विचार करें, मनुस्मृति या उपनिषद् की महत्व  ख़तम नहीं होगी| क्यूँ? क्यूंकि उससे रियल सलूशन्स मिलते है | और इसीलिए मेरा आप से यह आग्रह है की जिस भी भाषा में आप पत्रकारिता करें,आप कुछ न कुछ स्वाध्याय करने की एक आदत डालें | मैं यह नहीं कहता हूँ के आप मोटे मोटे ग्रन्थ पड़े, लेकिन जो पड़े ओरिजिनल पड़े | बेस्ट पड़े, क्लासिक पड़े | और थोडा थोडा पड़े |

अगर आप की रूचि है तो, नहीं रूचि है तो वह भी कोई चिंता की बात नहीं है – तब इस तरह के कैप्सूल और विडियो वगैरह आते रहते है उससे आप का कम चल जायेगा | लेकिन जिनको पढने में रूचि है,वह कुछ न कुछ हमारे जोमहापुरुष हुए है, जोज्ञानी हुए है, मैंनेजिनका नाम लिया उन तक लिमिट मत कीजियेगा – मैंने उनका नाम इसलिए लिया है के मैंने उनको पढ़ा है और मैंने यह पाया है की वह बिलकुल उपयोगी है, परफेक्ट है | और वह आप को यह सब सलूशन की दिशा में ले जाने के लिए सक्षम है | इसलिए मैंने उनका नाम लिया | दक्षिण भारत के बहुत सारे ज्ञानियों का हम नाम भी नहीं जानते क्यूंकि अंग्रेजी के कारण हम फसें रह जाते है और अपने ही देश के शास्त्र, अपने ही देश के ज्ञानियों का नाम तक हम नहीं जानते | लेकिन अगर यह एक आदत आप अपने में डालें,तो मुझे लगता है के आप को अपने कैरियर में, अपने जीवन में और अपनी समझ में हर जगह आप को लाभ होगा | मुझे लगता है मेरा समय से कुछ ज्यादा ही हो गया औरमुझे यह भी नहीं पता है की जो विषय देने वालों का मंतव्य था वह कितना पूरा हुआ लेकिन फ़िलहाल…