26 नवम्बर संविधान दिवस पर : ब्रिटिश शासन पद्धति भारत के अनुकूल नहीं..!

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26 नवम्बर संविधान दिवस पर
26 नवम्बर संविधान दिवस पर विशेष

- अरविन्द सीसोदिया 
संविधान कहता है, मुझे फिर लिखवाओ।
नेताओं के चोर रास्ते बंद करवाओ,
राष्ट्रधर्म पर परख फिर सिंहासन पर बिठाओ,वास्तविक लोकतंत्र बनाओ।
वंशवाद खा गया देश को,चोर उच्चके हो गये नेता।
बहूमत बैठा भीख मांगता, अल्पमत सिंहासन हथियाता।।
फिरसे विचार करो,कैसे हो रामराज्य का पूरा सपना!
संविधान कहता है, मुझे फिर लिखवाओ।


निर्वाचन पद्धति ; जवावदेह  प्रतिनिधि चुनने  में सक्षम बने 
 राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कु. सी. सुदर्शन जी ने कोटा में २२ अक्टूबर को दिए कश्मीर मुद्दे पर संबोधन में सर्व प्रथम भारतीय जन प्रतिनिधियों की निर्वाचन प्रक्रिया की व्यवस्था पर ही प्रश्न खड़ा करते हुए, उसे देश के लिए अहितकर बताया...! उनकी बात सही थी.., दिमाग पर जोर डालने से लगता है कि सब कुछ गड़बड़ झाला है!
श्री सुदर्शन ही ने कहा 

ब्रिटिश शासन पद्धति 
भारत के अनुकूल नहीं..!

        देश ने स्वाधीनता के पश्चात जिस जनतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया  , वह इग्लैंड में चलने वाली व्यवस्था का प्रतिरूप है  | इग्लैंड भारत से ३० गुणा छोटा देश है, जनसँख्या में भी यही स्थिति है..! तीन - चार प्रान्त हैं.! दो प्रमुख राजनैतिक दल हैं , एक अन्य दल भी जो बहुत कम प्रभाव में है | इग्लैंड में यह शासन पद्धति ३००-४०० वर्षों पुरानी है, कुल मिला कर वह हमारे देश के लिए अनुकूल नही है...! वहां भारत के तुल्य विविधता नहीं है |
         भारत एक विशाल देश है; एक सांस्क्रतिक परिवेश के होते हुए भी, विविधता की दृष्टी से  बहुत अधिक विविधता हैं.., यथा भोगोलिक , भाषाई, जलवायु और जातियां समाज इत्यादी...;
        सबसे अधिक  मत प्राप्त करने वाला जन प्रतिनिधि होगा , चाहे उसे २० प्रतिशत मत ही क्यों न मिलें..! चाहे उसके विरुद्ध ८० प्रतिशत  मत ही कोंन न हों...! यह पद्धती समाज के बड़े व्यापक समूह के प्रति उत्तरदायी नहीं हो पती , क्यों कि इतनी कम मात्रा के वोट किसी एक मुद्दे या  बात के आधार पर प्राप्त किये जा सकते हैं.., जब तक ५० प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त नहीं हों तब तक , समाज का पूर्ण निर्वाचन कैसे माना जा सकता है ? इस कारण उस गुणवत्ता के प्रतिनिधि नहीं पहुच रहे जिसकी  कि  जरूत है...! इस कारण महत्वपूर्ण मुद्दे और समस्याएं यथावत बनीं हुई हैं..! उनमें से एक जम्मू और कश्मीर की भी है !
       इसलिए हमें चुनाव की पद्धती में बदलाव लाना चाहिए, समाज का अधितम समर्थन  वाला प्रतिनिधि चुना जाये इस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए...! वह यह है कि पहले दौर के चुनाव में , प्रथम आने वाले प्रत्याशी को ५० प्रतिशत से अधिक मत नहीं मिले हैं तो , प्रथम और द्वितीय रहे प्रत्याशियों में दूसरे दौर का निर्वाचन एक हफ्ते में ही पुनः करवाना जाये  और जो ५० प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करे उसे चुना घोषित किया जाना चाहिए | इस तरह से समाज का , देश का वास्तविक बहुमत होगा और उससे चुना गया प्रतिनिधि अधिकतम नागरिकों के प्रती जवावदेह होगा ! देश की बड़ी समस्याओं के हल के प्रति भी सजग रहेगा !
अभी दोष क्या...? 
     अभी जैसे की कुल मतदाता हैं १०० और उनमें से ६० ने वोट डाला तो कहा जाता है , ६० प्रतिशत मतदान हुआ ! यानी कि उन ६० मतदाताओं के वोटमें जिसे सबसे ज्यादा मिले वह जीता माना जाएगा, यदी आमने सामने का ही चुनाव है तो ३१ मत वाला जीता और २९ मत वाला हारा ..., मगर सच यह है कि कुल उसे २९ ( दूसरे क्रम पर रहे प्रत्याशी के मत ) और ४० ( ये वे वोट हैं जो डाले नहीं ) ने नहीं चुना ! अर्थात जीते व्यक्ती के समर्थक मतों के विरुद्ध समर्थन नहीं करने वाले मत अधिक रहे ! इस तरह से हुआ निर्वाचन सांसद, विधायक या अन्य का हुआ ! अब इसी पद्धती से लोकसभा या विधान सभा में प्रधानमंत्री या मुख्यामंत्री का हुआ !! अर्थात देश में किसी लोकसभा का मतदान प्रतिशत १००  रहा तो लोकसभा में उससे जीते सांसद ५१ प्रतिशत पर चुने हुए हैं  जो सरकार बनायेंगे | उन्हें भी सरकार गठन हेतु भी मात्र ५१ प्रतिशत ही चाहिए.., इसे आंकड़ों की भाषा में ५१ प्रतिशत का ५१ प्रतिशत कहा जाता है  | इस तरह से जो सरकार प्रतिनिधित्व  करेगी वह मात्र २६ .०१ नागरिकों की होगी | मगर असल में तो मतदान ४० से ६० प्रतिशत के मध्य ही रहता है |  अर्थात बहुत कम नागरिकों के मत से सरकारें बनती है सो गैर जिम्मेवार जन प्रतिनिधि पहुचते हैं |
दो काम होने चाहिए
१- निर्वाचन में नागरिकों पर मतदान अनिवार्य हो.., 
२- ५० प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करने वाला ही चुना जाये  !!    

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