पोस्ट

अक्तूबर 8, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

समाज चेतना के जागरण का समय : विजयादशमी उद्बोधन

इमेज
समाज चेतना के जागरण का समय    04 Oct 2014 समय के पंचांग में समाज अपने संस्कार इंगित करता है। सिर्फ ग्रह नक्षत्रों की नहीं खुद अपनी चाल के अनुसार इंगित करता है। विजयादशमी पर शक्ति का अर्चन और दुर्गुणों के पुतलों का दहन इस समाज की उस सोच का संकेतक है, जिसने सही को स्वीकारने में पूरी उदारता बरती और गलत को खारिज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। समाज जागरण का, हर भारतीय के पुरुषार्थ को जगाने का रोमांचकारी आह्वान सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत के विजयादशमी उद्बोधन का सारतत्व है। सबका भला, सबको साथ लेकर चलने का विशुद्ध हिन्दूभाव इस उद्बोधन की धुरी है। यह सिर्फ स्वयंसेवकों से कही गई बात नहीं, बल्कि देश-दुनिया में बह रही परिवर्तनकारी हवाओं में लहराता समय का आह्वान है। वैसे, समय क्या है? घटनाओं की अजस्र धारा या इससे भी परे कुछ ? क्या यह पूरी सृष्टि ही समय के धागों से नहीं बुनी गई ? सही समय पर डोर हिली, सही कदम बढ़ा तो बढ़त, अन्यथा एक गलत धागा उधड़ा और बुनावट में कुछ घट गया। कम हो गया। बढ़त का अच्छा-भला मौका गंवा दिया। नीतिशतक में कहा गया है- 'का हानि: समयच्युति:।' यानी, हानि क

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : परम पूज्य डा0 हेडगेवार जी

इमेज
सारा समाज उस रंग को देख सिर झुकाता है 04 Oct 2014   प्रशांत बाजपेई यह जरूरी नहीं कि जिस क्षण इतिहास रचा जा रहा हो, उस क्षण उसकी महत्ता को भी समझा जाए। ऐतिहासिक विजय की ओर बढ़ती किसी क्रिकेट टीम, युद्घ के मैदान में निर्णायक बढ़त लेती सेना की किसी टुकड़ी, या तख्त की ओर प्रथम बार बढ़ते किसी बादशाह को यह अहसास होता होगा कि कोई तारीख बनने जा रही है, परंतु संघ की प्रथम शाखा में आए सामान्य पृष्ठभूमि के चंद किशोरों को इस बात की तनिक भी अनुभूति नही थी कि वह किसी नवयुग के प्रारंभ के साक्षी बने हुए हैं। संघ का जन्म एक गुमनाम घटना थी। वैसे भी सृजन अंधेरे से ही प्रारंभ होता है। बीज धरती के अंधकार में अंकुरित होता है। जीव माँ के गर्भ में विकसित होता है। संघ भी इसी प्रकार विकसित होता रहा। संघ को समझने के लिए संघ प्रवर्तक के जीवन पर दृष्टिपात करना उपयुक्त होगा। वैसे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के कार्य की विलक्षणता को सही अर्थों मे वही समझ सकता है, जिसे सार्वजनिक जीवन में काम का कुछ अनुभव हो। आज भी विस्मय होता है, कि किशोरावस्था से ही स्वतंत्रता संग्राम में तपता आ रहा व्यक्ति, ज