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'तब कहां थे अभिव्यक्ति के पैरोकार' : तरुण विजय

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'तब कहां थे अभिव्यक्ति के पैरोकार' तारीख: 14 Mar 2016   अतिथि लेखक - तरुण विजय http://panchjanya.com कोई आजादी संपूर्ण नहीं होती, परंतु इस संपूर्णता का अनुभव सबसे अधिक उसी भूमि पर हो सकता है जहां हिंदू बहुसंख्यक हो। यह इस देश में ही संभव है कि आप मूर्ति पूजक हैं या मूर्तिपूजा का खंडन करते हैं, आस्तिक हैं, नास्तिक हैं या स्वयं को ही भगवान घोषित करते हों तब  भी.. कोई आपत्ति नहीं करेगा। न ही आपको काफिर घोषित कर दंडित करेगा। लेकिन कोई भी स्वतंत्रता अमर्यादित, निस्सीम और संविधान-निरपेक्ष नहीं हो सकती। आज संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोगकर मुक्त विचारों के हिंसक प्रतिरोधी गुट उसी संविधान और लोकतंत्र पर हमला कर रहे हैं। जिस देश ने पृथ्वी पर सहिष्णुता और भिन्न मत के प्रति आदर के कीर्तिमान स्थापित किए उस माटी के पुत्रों को वे लोग सहिष्णुता का ककहरा समझा रहे हैं जिनके हाथ असहिष्णु, बर्बर व्यवहार के इतिहास में रंगे हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों को धन्यवाद देना चाहिये जिसने जेएनयू के देश विरोधी वगार्ें को भी जय हिंद बोलना