बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

इंदिरा जैसा दम चाहिए..! प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कायरता त्यागें

*मनमोहन सिंह .., नेहरु की तरह पराजित मानसिकता ग्रस्त
*विशेष कर विदेश नीति और शत्रु संहार के मामलों में इंदिरा जी  से सीखें  
*स्वाभिमान खो देने वाला कभी नहीं जीतता !! 
*मनमोहन सिंह जी रिमोट स्टाईल ठीक नहीं हैं..,   
- अरविन्द सीसोदिया
पहले पाकिस्तान के तमाशे ब्रिटेन - अमरीकी गुट की सह पर और अब चीन की सह पर, एकवार फिर से बड़ी उलझन बन गई है..! देश फिरसे युद्ध और नए विभाजन के सामने खड़ा है...!!
    जो कुछ प्रधानमंत्री नेहरु जी की कायरता के कारण हुआ , वही सब अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की कायरता से हो रहा है..! उस समय ब्रिटेन- अमरीकी गुट के पैरोकार भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउन्टबेटन थे अब यू पी ए की सर्वेसर्वा  सोनिया गांधी ...! वे भी ईसाई थे ये भी ईसाई हैं..!!
    नेहरुजी पाकिस्तान के द्वारा कश्मीर के दवाये हिस्से को उसी  के कब्जे में छोड़  दिया.., तिब्बत पर से भारतीय हक़ चीन  के पक्ष में छोड़ दिए.., फिर चीन से युद्ध हार गए..! जम्मू और कश्मीर में शेख अब्दुल्ला  के राष्ट्र विरोधी कृत्यों  को अवसर दिया...!! यही मनमोहन सिंह की स्थिती है.., पाकिस्तान  के सामने दब्बू की तरह दुम हिला रहे हैं..! चीन  ने पाकिस्तान में स्थित भारतीय क्षैत्र में अड्डे बना लिए, सैन्य ठिकाने बना लिए.., जम्मू कश्मीर में अलग वीजा का तमाशा खड़ा कर दिया..! अरुणाचल में उसकी घुसपैठ जारी है..! जम्मू और कश्मीर में उमर अब्दुल्ला  के राष्ट्र विरोधी कृत्यों  को अवसर दिया जा रहा है, वह भी कांग्रेस के समर्थन  से..?

     कुल मिला कर आज जिस तरह से देश के साथ खलनायिकी नेहरु के इर्द गिर्द घूमतीं है और उन्हें समस्याओं का जनक माना जाता है..; वही बात सरदार मनमोहन सिंह के ईर्द गिर्द  घूम रही है.., मनमोहन सिंह जी को सोनियाजी के बजाये इंदिराजी की तरफ देखना  चाहिए.., विशेष कर विदेश नीति और शत्रु संहार के मामलों में ..!
  पाकिस्तान को बड़ी पराजय १९६५  में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी ने दी थी.., मगर इंदिरा  जी के समय उसने फिर से सिर उठाया, १९७१ में युद्ध हुआ और वह शर्मनाक हार दी कि उसके दो टुकड़े हो गए..! अमरीकी और ब्रिटेन गुट तब भी पाकिस्तान की मदद के लिए उसके  साथ  थे .., हिम्मत ये मर्द ; मदद ये खुदा की कहावत के अनुसार इंदिरा जी सफल हुईं...!
  सवाल यही है कि आप में अपना स्वाभिमान होना चाहिए., स्वाभिमान खो देने वाला कभी नहीं जीतता !! मनमोहन सिंह जी के सारे काम रिमोट स्टाईल के हैं जो ठीक नहीं हैं..,
  इंदिरा जी और सोनिया जी में बहुत फर्क है, इंदिरा जी जमीनी नेता थीं.., उनमें सहास था , उन्होंने कभी पलायन नहीं किया था , उन्होंने कभी हार नहीं मानीं थी, इनमें से बहुत सी बातें इंदिरा जी की सोनिया जी में नहीं है! इसी कारण इंदिरा जी कई मामलों में फेल होने के बाबजूद भारतीय जानता में आदरणीय रहीं ..! हलांकि  उनके समय  जम्मू और कश्मीर मामला सबसे आसान तरीके से हल हो सकता था, पाकिस्तान के ९० हजार से ज्यादा हमारे बंदी थे तब हमें जीते हुए पाकिस्तानी भू भाग तभी लौटना चाहिए था , जब हमारा दवाया कश्मीरी हिस्सा पाकिस्तान वापस कर देता.!
  यह सच है कि उनके समय यह चूक हुई.., मगर उन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके यह यह स्थिति उत्पन्न करदी कि वह तब से युद्ध करना भूल गया...! इंदिरा जी की बहुत सी बों से असमती होते हुए भी उनकी पाकिस्तान के दो टुकड़े करने की नीति भारत के इतिहास की अविस्मर्णीय  घटना थी.., हालांकी पाकिस्तान का विभाजन क्षेत्रीयता के कारण तो होना ही था.., वह अप्राकृतिक बना ही  था.., मगर उसे सही समय पर करवा कर, भारत के लिए बड़ी मुसीबत कम की है..!
  सरदार मनमोहन सिंह को अपने पुरखों का इतिहास पड़ना चाहिए और वीरता कि शान बनाना चाहिए.., लड़ाकू देश भले ही जीत नहीं पाए मगर उससे सब घबराते हैं..,  थोड़ी हिम्मत की जरुरत ही तो है..., कम से कम देश को देश जैसा तो दिखाओ...!!         
        

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