गुरुवार, 12 जुलाई 2012

रणकपुर : जैन समुदाय के लिए पाँच पवित्र स्थलों में से एक





रणकपुर : जैन समुदाय के लिए पाँच पवित्र स्थलों में से एक 

 खूबसूरती sculptured जैन मंदिरों इस प्रसिद्ध जगह की महिमा निशान. एक जैन समुदाय के लिए पाँच पवित्र स्थलों में से एक माना जाता, ये 15 वीं सदी में राणा कुम्भ के शासनकाल के दौरान बनाया गया था. ये एक दीवार में संलग्न हैं. केन्द्रीय Chaumukha [चार सामना मंदिर] Adinathji करने के लिए समर्पित है. यह मंदिर 29 हॉलों और 1444 खम्भों सब साफ़ खुदवाए, नहीं, दो स्तंभों की जा रही के साथ एक जैसा वास्तुशिल्प महिमा का एक अद्भुत रचना है. मंदिर के हर हॉल है अचिंतनीय सतह बराबर विनम्रता के साथ नक़्क़ाशीदार. मुख्य मंदिर के मंदिरों का सामना कर रहे हैं Parasvanath - Neminath उत्तम अंक जो कि खजुराहो मूर्तियां के समान लग रहे टेक्सचराइज़र के साथ. दौरा कर लायक एक अन्य मंदिर है कि 'आसपास के सूर्य मंदिर' को समर्पित की 'सूर्य भगवान'. मंदिर, बड़े योद्धा, घोड़े और आकाश के carvings के साथ संवरना एक polygonal दीवार है (नक्षत्रों, grahs) bodies.The सूर्य भगवान ने अपने वाहन की सवारी के रथ पर दिखाया गया है. वहाँ श्रद्धालुओं की एक धारा के आशीर्वाद के लिए उत्सुक है. Ranakpur को शांत तीर्थयात्रा शहर 'के रूप में जाना जाता है. इस निर्दोष वास्तुकला, जटिल carvings, नाजुक डिजाइन बड़े करीने से मूर्तियों, विविध और कई hues और सब से ऊपर छेनी से काटा, Ranakpur महल के वातावरण सममूल्य पर माउंट पर जैन मंदिरों का एक और समूह के साथ भी समान रूप से प्रसिद्ध है. अबू को Dilwara मंदिरों. 'जैसे बाहरी इलाके के लिए एक सवारी Sadari' - 'Desuri'-' Ghanerao'-'Narlai', मिल जाएगा पर्यटन buffs के लिए रोमांचक होगा.
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आस्था और वास्तु का संयोजन है रणकपुर जैन मंदिर

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जैन धर्म के प्रसिद्ध मंदिरों की सैर में आज देखिए रणकपुर के जैन मंदिर को. राजस्थान में स्थित रणकपुर जैन धर्म के पांच प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है. यहां के मंदिरों में कला का अनूठा स्वरुप देखने को मिलता है. इन मंदिरों का निर्माण 15 वीं शताब्दी में राणा कुंभा के शासनकाल में हुआ था. इन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम रणकपुर पड़ा. यहां के जैन मंदिर भारतीय स्थादपत्यम कला का अद्भुत नमूना हैं. इस क्षेत्र के साथ-साथ इसके आसपास के स्थानों में भी मंदिर फैले हुए हैं जिससे आपको एक ही जगह बोर होने का अवसर नहीं मिलेगा. जैन धर्म में आस्थाए रखने वालों के साथ-साथ वास्तु शिल्प में दिलचस्पी रखने वालों को भी यह जगह बहुत भाती है.
चारों ओर जंगलों से घिरे इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है. मंदिर में प्रवेश के लिए चार कलात्मक प्रवेश द्वार हैं. मंदिर के मुख्य गृह में तीर्थंकर आदिनाथ की संगमरमर से बनी चार विशाल मूर्तियां हैं जिसकी ऊचांई 72 मीटर है और इसका मुख चतुर्मुख है. इसी कारण इसे चतुर्मुख मंदिर भी कहा जाता है.
इसके अलावा मंदिर में 76 छोटे गुम्बदनुमा पवित्र स्थान, चार बड़े प्रार्थना कक्ष तथा चार बड़े पूजन स्थल हैं. ये मनुष्य को जीवन-मृत्यु की 84 योनियों से मुक्ति प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं.मंदिर के निर्माताओं ने जहां कलात्मक दो मंजिला भवन का निर्माण किया है, वहीं भविष्य में किसी संकट का अनुमान लगाते हुए कई तहखाने भी बनाए हैं. इन तहखानों में पवित्र मूर्तियों को सुरक्षित रखा जा सकता है. ये तहखाने मंदिर के निर्माताओं की निर्माण संबंधी दूरदर्शिता का परिचय देते हैं.
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रणकपुर

रणकपुर राजस्थान के देसूरी तहसील के निकट पाली ज़िले के सादडी में स्थित है। रणकपुर जोधपुर और उदयपुर के बीच में अरावली पर्वत की घाटियों में स्थित है।
इतिहास
यह स्थान मन्दिरों के लिए प्रसिद्ध है, जो उत्तरी भारत के श्वेताम्बर जैन मन्दिरों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। इन मन्दिरों का निर्माण धन्ना नामक सेठ ने किया था, उसे 'धरणाक सेठ' भी कहते हैं। इस सेठ ने महाराणा कुम्भा से इन मन्दिरों के लिए भूमि ख़रीदी थी। यहाँ स्थित प्रमुख मन्दिर को 'रणकपुर का चौमुखा मन्दिर' कहते हैं। इस मन्दिर के चारों ओर द्वार हैं। मन्दिर में प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ की मूर्ति स्थापित है। इस मन्दिर के अलावा दो और जैन मन्दिर हैं, जिनमें पार्श्वनाथ और नेमिनाथ की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। एक वैष्णव मन्दिर सूर्यनारायण का भी है। एक धार्मिक मन्दिर चौमुखा त्रलोक्य दीपक है, जिसमें राजस्थान की जैन कला और धार्मिक परम्परा का अपूर्व प्रदर्शन हुआ है।

स्थापना
रणकपुर में मन्दिर की प्रतिष्ठा विक्रम संवत 1496 (1439 ई.) में हुई थी। प्रधान मन्दिर वर्गाकार (220 फुट x 220 फुट) एवं चौमुखा है। इसका विस्तार 48, 400 वर्ग फुट ज़मीन पर किया गया है। इस मन्दिर में कुल 24 मण्डप, 84 शिखर और 1444 स्तम्भ हैं। सम्पूर्ण मन्दिर में सोनाणा, सेदाड़ी और मकराना के पत्थर का प्रयोग किया गया है। इस मन्दिर को बनाने में 99 लाख रुपया व्यय किया गया था।

चौमुखा मन्दिर
रणकपुर में आदिनाथ की भव्य प्रतिमाएँ श्वेत संगमरमर पत्थर की बनी हुई हैं। एक उच्च पीठिका पर आसीन आदिनाथ की प्रतिमाएँ पाँच फुट ऊँची हैं और एक-दूसरे की पीठ से लगी हुई चारों दिशाओं में मुख किये हुए हैं। इसी कारण यह मन्दिर चौमुखा कहलाता है। चारों ओर द्बार होने से कोई भी श्रद्धालु किसी भी दिशा से भगवान आदिनाथ के दर्शन कर सकता है।
इस मन्दिर के सामने दो अन्य जैन मन्दिर हैं, जिनमें से पार्श्वनाथ के मन्दिर का बाहरी भाग पूरा मैथुन मूर्तियों से भरा पड़ा है। इसीलिए इस मन्दिर को लोग 'वेश्या मन्दिर' कहते हैं। मन्दिर के सभामण्डप, द्वार, स्तम्भ, छत आदि तक्षण-कला के काम से लदे पड़े हैं। नर्तकी की मूर्तियाँ हाव-भाव से परिपूर्ण हैं। प्रमुख मन्दिर में जैन तीर्थों का भी वर्णन हैं। मन्दिर के चारों ओर 80 छोटी और 4 बड़ी देवकुलिकाएँ हैं।
प्राचीन वर्णन

मन्दिर की मुख्य देहरी में भगवान नेमीनाथ की श्यामल भव्य मूर्ति है। अन्य मूर्तियों में सहस्त्रकूट, भैरव, हरिहर, सहस्त्रफणा, धरणीशाह और देपाक की मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं। यहाँ पर एक 47 पंक्तियों का लेख चौमुखा मन्दिर के एक स्तम्भ में लगे हुए पत्थर पर उत्कीर्ण है, जो विक्रम संवत 1496 (1939 ई.) का है। इस लेख में संस्कृत तथा नागरी, दोनों लिपियों का प्रयोग किया गया है। प्रस्तुत लेख में बापा से लेकर कुम्भा तक के बहुत से शासकों का वर्णन है। महाराणा कुम्भा की विजयों तथा उसके विरुदों का विस्तृत विवरण दिया गया है। इस लेख में तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन के बारे में भी पर्याप्त जानकारी मिलती है। फर्ग्युसन ने इस अद्भुत प्रासाद का वर्णन करते हुए लिखा है कि ऐसा जटिल एवं कलापूर्ण मन्दिर मेरे देखने में नहीं आया है और मैं अन्य ऐसा कोई भवन नहीं जानता, जो इतना रोचक व प्रभावशाली हो। कर्नल टॉड ने भी इसे भव्य प्रासादों में गिना है।


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