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रक्तपात के बीच ठिठका देश - मृणाल पांडे

रक्तपात के बीच ठिठका देश मृणाल पांडे दैनिक भास्कर और अब, जबकि नक्सली दस्तों के हैबतनाक हौसले बुलंद हैं, कई चूजादिल विद्वान पोथे खोले बैठे हैं कि देश के संघीय ढांचे को चुनौती दिए बिना, सेना भेजे बिना, राज्य के स्वघोषित दुश्मनों के मानवाधिकारों का हनन किए बिना, स्थानीय जनजीवन में खलबली मचाए बिना, अगले चुनाव के संभावित घटक दल को खफा किए बिना कैसे इन हिंसक, अराजकता समर्थक गुरिल्ला जत्थों का जल्द और समूल विनाश हो! एक और छानबीन कमेटी बिठा दी गई है, जो छत्तीसगढ़ नरसंहार पर जब रपट देगी, तब देगी। जमीनी सच्चाई यह है कि अभी नक्सली वारदातें जारी हैं, पर चुनाव भी सर पर हैं। लिहाजा षड्यंत्र की अफवाहों में लिथड़ी समस्या की गेंद राजनीतिक दलों के बीच लतियाई जाने लगी है। गृहमंत्री तथा रक्षामंत्री की तरफ से मिले संकेतों के अनुसार नक्सली जत्थे भले बेगुनाह नागरिकों और सशस्त्र बलों के खून की नदियां बहाते रहें, अपने कैदियों को जेल तोड़कर उड़ा लें, स्कूल बंद करा दें, सड़क निर्माण रोक दें और जिलाधिकारियों का अपहरण कर फिरौती मांगें, लेकिन भारतीय सशस्त्र बल उनसे अंतरराष्ट्रीय शांतिसेना की तरह पेश आते रहेंग