शनिवार, 30 अप्रैल 2016

अगस्ता मुद्दा : कांग्रेस करप्शन





अगस्ता विवाद: सरकार बोली- मोदी ने नहीं की काेई डील; जांच में यूं जुटे पर्रिकर
dainikbhaskar.com 30 Apr 2016


नई दिल्ली.केंद्र ने अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर डील पर बड़ा बयान दिया है। इसमें कहा गया है कि नरेंद्र मोदी ने इस मामले में इटली से कोई डील नहीं की। सरकार का कहना है कि असली मुद्दा तो करप्शन का है। इस बीच, अपोजिशन के हमलों का जवाब देने के लिए मनोहर पर्रिकर ने खास टीम बनाई है। यह टीम 40 फाइलों को खंगाल कर यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि 'फेवर' लिए गए या 'वेवर' दिए गए ? और क्या कहा गया है स्टेटमेंट में....
- शुक्रवार रात जारी स्टेटमेंट में सरकार ने कहा- जो लोग प्रधानमंत्री को कामयाब होते नहीं देख पा रहे हैं वो ही उन पर सौदे की तरफ इशारा कर रहे हैं। लेकिन इसका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि प्रधानमंत्री ने कोई सौदा या डील की ही नहीं है।
डोभाल और मिश्रा का नाम आने पर भी सफाई
- बयान में एनएसए अजीत डोभाल और पीएम के प्रिंसिपल सेक्रेटरी का नाम एक आरोपी से जोड़े जाने को लेकर भी सफाई दी गई है। इसमें कहा गया है कि इन दोनों पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं वो पूरी तरह गलत हैं।
- ''पॉलिटिक्स का एक छोटा सा तबका इस मामले से ध्यान भटकाने और शांत करने की नाकाम कोशिश कर रहा है। कुछ लोग जांच की रफ्तार पर सवाल कर रहे हैं लेकिन वे ये नहीं बताते कि कुछ करप्ट लोगों ने कैसे पर्चेसिंग प्रॉसेस पर असर डाला और इससे देश को नुकसान हुआ।''
आरोपियों को नहीं बख्शा जाएगा
- सरकार ने कहा, ''हमने सच्चाई को सामने लाने के लिए सही कदम उठाए हैं और इस मामले में जो भी दोषी हैं उन्हें कानून के दायरे में लाया जाएगा। इस मामले में कोई भी कसर बाकी नहीं रखी जाएगी और न ही किसी को बख्शा जाएगा।''
- ''आरोपी चाहे देश के हों या बाहर के, जांच एजेंसियां उन्हें कानून के हवाले जरूर करेंगी।''
40 फाइलें खंगाल रहे मनोहर पर्रिकर
- डिफेंस मिनिस्ट्री की एक खास टीम 40 फाइलों को खंगाल कर यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि 'फेवर' लिए गए या 'वेवर' दिए गए ताकि सरकार अपोजिशन पर हमले तेज कर सके।
- यह टीम हजारों पन्नों को खंगालने में जुटी है। खास बात यह है कि यही टीम सीबीआई और ईडी को डिफेंस डील प्रोसीजर के मुश्किल सवालों के जवाब मुहैया करा रही है।
- डिफेंस मिनिस्टर मनोहर पर्रिकर ने शुक्रवार को दो घंटे तक टॉप अफसरों के साथ मीटिंग की। पर्रिकर संसद में इस मामले पर बयान देने वाले हैं।
- जानकारी के मुताबिक, डिफेंस मिनिस्टर खुद हर फाइल को बारीकी से देख रहे हैं। मनोहर ने इटालियन हाईकोर्ट के ऑर्डर को भी काफी गौर से पढ़ा है।
- पर्रिकर यह जानने की कोशिश कर रहे हैं खरीदी के दौरान हेलिकॉप्टर्स के कम ऊंचाई पर उड़ने को लेकर समझौता क्यों किया गया? इसके लिए ऑर्डर किसने दिए? टेंडर की शर्तों को अगस्ता वेस्टलैंड के फेवर में किसके कहने पर तैयार किया गया?
क्या है मामला?
- यूपीए-1 सरकार के वक्त 2010 में अगस्ता वेस्टलैंड से वीवीआईपी के लिए 12 हेलिकॉप्टरों की खरीद की डील हुई थी। डील के तहत मिले 3 हेलिकॉप्टर आज भी दिल्ली के पालम एयरबेस पर खड़े हैं।
- डील 3,600 करोड़ रुपए की थी। टाेटल डील का 10% हिस्सा रिश्वत में देने की बात सामने आई थी। इसके बाद यूपीए सरकार ने फरवरी 2013 में डील रद्द कर दी थी।
- तब एयरफोर्स चीफ रहे एसपी त्यागी समेत 13 लोगों पर केस दर्ज किया गया था।
- जिस मीटिंग में हेलिकाॅप्टर की कीमत तय की गई थी, उसमें यूपीए सरकार के कुछ मंत्री भी मौजूद थे। इस वजह से कांग्रेस पर भी सवाल उठे थे।
अब क्यों चर्चा में आया?
- मिलान कोर्ट ऑफ अपील्स ने सोमवार को दिए फैसले में माना कि इस हेलिकॉप्टर डील में करप्शन हुआ और इसमें इंडियन एयरफोर्स के पूर्व चीफ एसपी. त्यागी भी शामिल थे।
- 90 से 225 करोड़ रुपए की रिश्वत भारतीय अफसरों को दी गई।
- कोर्ट ने वीवीआईपी हेलिकॉप्टर देने वाली कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड के चीफ जी. ओरसी को दोषी ठहराया है। उन्हें साढ़े चार साल जेल की सजा सुनाई गई है।
- कोर्ट के जजमेंट में चार बार 'सिग्नोरा' (सोनिया) गांधी और दो बार मनमोहन सिंह का जिक्र है। इसलिए कांग्रेस बीजेपी के निशाने पर है।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

इशरत जहां मामले में कांग्रेस पर उंगली उठी


उंगली उठी, चिंता बढ़ी
तारीख: 27 Apr 2016


इशरत जहां मामले में भाजपा के तीखे तेवरों के आगे कांग्रेस को जवाब देना भारी पड़ गया है। इशरत के खतरनाक षड्यंत्र को छुपाने के तथ्य चिदंबरम को 10 जनपथ से शह मिलने की तरफ संकेत कर रहे हैं
इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले का भूत फिर से लौट आया है। ताजा खुलासे में केंद्रीय वाणज्यि व उद्योग मंत्री नर्मिला सीतारमन ने 18 अप्रैल को अपने बयान में कहा, ''कांग्रेसी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी तत्कालीन गृहमंत्री पी़ चिदंबरम के साथ इस मामले में शामिल हैं। इस मामले को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया था।'' सीतारमन ने कहा, ''कांग्रेस ने आतंकी साजिश को दबाया जो (प्रधानमंत्री) मोदी को समाप्त कर सकती थी। आप साफ तौर पर मान रहे हैं कि आप राजनीतिक तौर पर यह लड़ाई नहीं लड़ सकते इसलिए उस नेता का खत्मा किया जाए या उसके लिए उकसावा ही दिया जाए जिससे राजनीतिक तौर पर आप जीत नहीं सकते। ऐसा प्रयास हर संभव किया गया जिससे यह पता चले कि वह एक वर्ग के खिलाफ हैं और उनको कोई आतंकी खतरा नहीं है।''
नए घटनाक्रम
विवादास्पद 'इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले' में नए खुलासे हुए हैं और एक बार फिर साजिशकर्ता के तौर पर शक की उंगली पी़ चिदंबरम की ओर उठ रही है। चिदंबरम यूपीए-2 के शासनकाल में गृह मंत्री थे। जाहिर है नए खुलासों से फायदा उठाने में भाजपा ने देर नहीं लगाई।
एक आरटीआई के बाद ये नए तथ्य सामने आए, जिसके बाद केवल चिदंबरम ही नहीं बल्कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ही अब निशाने पर है। खुद को फंसा हुआ पाकर कांग्रेस आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए इशरत जहां और उसके साथियों के पुलिस मुठभेड़ की सत्यता पर सवाल उठा रही है। सीधा हमला बोलते हुए भाजपा ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी को तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम के साथ साठगांठ करके 'इशरत जहां, एक कथित एलइटी आतंकी को मुंब्रा, मुम्बई की एक मासूम लड़की' बताने का आरोप लगाया है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने 20 अप्रैल को कहा कि चिदंबरम को बताना चाहिए कि उनसे हलफनामा बदलने के लिए किसने कहा था। उन्होंने चिदंबरम पर कुछ सख्त सवाल दागे। पात्रा के अनुसार, ''देश जानना चाहता है कि इसके पीछे कौन है? सभी जानते हैं कि कांग्रेस में हुक्मनामे एक ही पते से आते हैं। आप वह पता जानते हैं।   रिमोट कंट्रोल वहीं रहने वाली महिला के   हाथ में है।''
इस बार इशरत जहां मामले में दायर हलफनामों में बदलाव के बारे में भाजपा ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को निशाने पर लिया है। इसके जवाब में कांग्रेस ने अपने शीर्ष नेतृत्व पर लगाए गए आरोपों को सख्ती से नकारा है। कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने पार्टी अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पर लगाए गए आरोपों को नकारते हुए कहा, ''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने वश्विासपात्र अधीनस्थों की मदद से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर इशरत जहां मामले में शामिल होने का झूठा आरोप लगा रहे हैं।'' सुरजेवाला ने कहा, ''कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी या उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इशरत जहां मामले सहित अन्य किसी भी प्रशासनिक मुद्दे पर तत्कालीन गृह मंत्री पी़ चिदंबरम या अन्य किसी व्यक्ति को किसी तरह की सलाह आदि नहीं दी।''शीर्ष नेतृत्व को घिरता देख कांग्रेस ने चिदंबरम से अपने को अलग कर लिया और कहा कि वे अपनी सफाई स्वयं दें।
भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने खुफिया एजेंसियों द्वारा इशरत जहां मामले में उपलब्ध कराई गई सूचना को नजरअंदाज किया था। खुफिया एजेंसियों की सूचना के अनुसार इशरत जहां आतंकी गुट लश्कर-ए-तैयबा से संबद्ध थी और वह और उसके साथी गुजरात में 'तत्कालीन मुख्यमंत्री की हत्या करने के महत्वपूर्ण कार्य' को अंजाम देने के लिए पहुंचे थे। भाजपा का आरोप है कि सोनिया गांधी ने चिदंबरम से हलफनामे को राजनीतिक साजिश के तौर पर बदलवाया था।
लोकसभा में भाजपा संासद निशिकांत दुबे द्वारा इस मामले पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी गृह मंत्रालय की फाइलों में मौजूद इस तथ्य को माना। गृहमंत्री ने संसद के निचले सदन को सूचित किया, ''कथित हलफनामे में कहा गया है कि भारत सरकार को विशेष सूचनाएं प्राप्त हुई हैं जिनके आधार पर पता चलता है कि लश्कर-ए-तैयबा गुजरात सहित देश के विभन्नि हस्सिों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बना रहा था। यह भी कहा गया है कि भारत सरकार यह जानती थी कि लश्कर-ए-तैयबा देश के कुछ शीर्ष राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय नेताओं की हत्या किए जाने की योजना भी रखता था और इस कार्य के लिए उसने देश में मौजूद अपने कैडर को नेताओं की गतिविधियों के आकलन के लिए तैयार किया था।''
पृष्ठभूमि
इशरत जहां मामले के खुलासे के साथ कई चौंका देने वाले सच सामने आए हैं। पूर्व गृह सचिव जी़ के़ पल्लिै, पूर्व अवर सचिव (गृह) आरवीएस मणि एवं पूर्व आईबी विशेष निदेशक राजेंद्र कुमार ने खुलासों में बताया कि कैसे यूपीए की सरकार ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और प्रतष्ठिा को नष्ट करने के लिए तमाम तरह के गैरकानूनी और गैर-वाजिब तरीके अपनाए थे। कांग्रेस ने ऐसा मोदी की लोकप्रियता से डरकर और उन्हें 2014 के आम चुनाव लड़ने से रोकने की मंशा से किया था।
तथ्य बताते हैं कि कैसे तत्कालीन यूपीए अध्यक्ष के मार्गदर्शन और पी़ चिदंबरम की अगुआई में गृह मंत्रालय साजिशों का अड्डा बन कर रह गया था। उस दौरान यूपीए के अधीन कार्यरत सरकारी तंत्र न केवल हतोत्साहित था बल्कि ईमानदार गुप्तचर एवं प्रशासनिक अधिकारियों को तंग किया जाता था, कुछ को झूठे और बेबुनियाद आरोपों के तहत जेल भेजा गया था, जनता के बीच झूठी अफवाहें फैलाई गईं, मीडिया में झूठी खबरें प्रसारित की गईं और अधिकारियों पर उनके विचार बदलने के लिए जोर डाला गया।
इशरत जहां मामले को आधार बनाकर ही मोदी और शाह पर गत एक दशक से विपक्षी दल, कुछ कथित सामाजिक कार्यकर्ता, और विपक्षी गैर-सरकारी संगठन हमला बोलते रहे हैं। इस देश की मुस्लिम जनता को यह यकीन दिलाने की कोशिश की गई कि 'इशरत जहां एक मासूम लड़की थी जो अपने तीन मत्रिों (या जानकारों) के साथ गुजरात जा रही थी, उसे नरेंद्र मोदी के राज्य की पुलिस और इंटेलिजेंस ब्यूरो ने फर्जी एनकाउंटर का शिकार बनाया।' इसके बाद केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सीबीआई के जरिये मोदी को 'फर्जी मुठभेड़' के साजिशकर्ता के तौर पर बताने का काम किया। गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त एसआईटी की जांच के बाद मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि यह फर्जी मुठभेड़ का मामला था।
तब से सीबीआई और आईबी के बीच तनातनी जारी है। सीबीआई ने आईबी अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए गृह मंत्रालय से इजाजत भी मांगी थी। आईबी ने इशरत की आतंकी गुट के साथ साठ-गांठ से जुड़े दस्तावेज सवार्ेच्च न्यायालय के सामने पेश किए हैं। यह साक्ष्य उसे 26/11 के मुंबई हमलों के अभियुक्त डेविड कोलमेन हैडली उर्फ दाऊद गिलानी की एफबीआई द्वारा जांच के आधार पर प्राप्त हुए थे। सीबीआई ने दो आरोप पत्र दायर किए थे। पहला जुलाई 2013 में सात पुलिस अधिकारियों के खिलाफ था जिनमें आईपीएस अधिकारी पी़ पी़ पांडे, डी. जी. वंजारा और जी़ एल़ सिंघल शामिल थे। चार्जशीट में सीबीआई का आरोप था कि मुठभेड़ फर्जी थी और यह गुजरात पुलिस और आईबी का संयुक्त अभियान था। दूसरा फरवरी 2014 को दायर किया गया था, जिसमें सीबीआई ने आईबी के विशेष निदेशक राजेंद्र कुमार के खिलाफ हत्या, आपराधिक षड्यंत्र, हत्या हेतु अपहरण, अनुचित कारागार एवं शस्त्र अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। राजेंद्र कुमार की टीम के सदस्यों-पी़ मत्तिल, एम. के़ सन्हिा एवं राजीव वानखेडे़ पर भी मामला दर्ज किया गया था।
यूपीए सरकार द्वारा दायर दूसरा हलफनामा वह था जिसमें इशरत जहां, प्रणेश पल्लिै उर्फ शेख, अमजद अली राणा और जीशान जौहर के लश्कर-ए-तैयबा के साथ संबंधों की जानकारी को हटाया गया था। आर.वी.एस. मणि का आरोप है कि दूसरा हलफनामा दाखिल करने का फैसला खुद चिदंबरम का था। उनका आरोप है कि तत्कालीन एसआईटी प्रमुख, जो एक सीबीआई अधिकारी थे, लगातार उनके पीछे थे और इशरत एवं अन्य आतंकियों के बारे में खुफिया एजेंसियों की सूचना की मौलिकता पर सवाल उठाने की कोशिश की गई थी।
कांग्रेस कई वषार्से इस झूठ की तूती बजाती रही है और लोगों के सामने मोदी की छवि एक 'कातिल' और 'कसाई' की बनाकर पेश करती रही। मोदी की इस मामले में संलप्तिता नहीं होने का हरेक सबूत मिटाने की पुरजोर कोशिश की गई। और उन गवाहों को मुठभेड़ों में खत्म कर दिया गया जो इशरत मुठभेड़ को जायज साबित कर सकते थे अरुण श्रीवास्तव
वृत्तचित्र से पकड़ा गया कांग्रेसी झूठ
इशरत जहां मामले में मौजूदा सच के सामने आने से कहीं पहले लंदन में रहने वाले डॉक्टर एवं फिल्मकार डॉ़ मनीष पंडित ने इस विषय पर एक तथ्यपूर्ण वृत्तचित्र बनाया था। इसमें इशरत जहां की असलियत साफतौर पर दिखती है। हालांकि, देश से बाहर इस वृत्तचित्र की खासी प्रशंसा हुई, लेकिन देश में किसी भी न्यूज चैनल ने यूपीए-2 के शासनकाल में इसका प्रसारण नहीं किया। पेश है डॉ़ पंडित से ई-मेल से लिया गया साक्षात्कार :
ल्ल  भारतीय मीडिया ने 2013-14 में आपके बनाए वृत्तचित्र का प्रसारण करने से इनकार कर दिया था। लेकिन 16 मार्च 2016 में आपकी फिल्म सहित एक रिपोर्ट खबरिया वेबसाइट फर्स्टपोस्ट ने प्रसारित की थी। बाद में इसे वेबसाइट से हटा दिया गया। आप क्या कहेंगे?
भारतीय मीडिया ने 2014 और 2015 में मेरी फिल्म के प्रसारण से इनकार कर दिया था। लेकिन फिल्म ऑनलाइन और अन्य माध्यमों से बाहर आई और इसका खासा असर पड़ा। भारत की एक न्यूज वेबसाइट फर्स्टपोस्ट ने पहले मेरा एक साक्षात्कार प्रसारित किया और इसी साल 16 मार्च को वीडियो फिल्म भी प्रसारित की। हालांकि, चार घंटे बाद वह लिंक बहुत ही रहस्यमय तरीके से वेबसाइट से गायब हो गया। पूरी रात बीत जाने के बाद भी वह लिंक ऑनलाइन वापस नहीं आया। जिन चार घंटों के दौरान वह लिंक मौजूद था, मेरे साक्षात्कार पर ट्विटर पर 1000 रीट्वीट हुए थे और फेसबुक पर भी कई स्थानों पर वह लिंक शेयर किया गया था।
हालांकि, कुछ लोगों ने फर्स्टपोस्ट के लेख की समूची पीडीएफ कॉपी को अपने गूगल ड्राइव पर सेव कर लिया था। आप जानते ही है कि ऑनलाइन राष्ट्रीय महत्व की किसी भी सामग्री को 'डिलीट' करने के विपरीत असर पड़ते हैं। अगले ही दिन मेरा साक्षात्कार तेजी से ऑनलाइन फैला। ऑनलाइन मैग्जीन ओपइंडिया ने फिल्म पर तीन अलग-अलग आलेख और मेरा एक नया साक्षात्कार भी प्रसारित किया जिसका व्यापक प्रसारण हुआ।
मुझे अभी तक नहीं पता कि फर्स्टपोस्ट से मेरा साक्षात्कार क्यों हटाया गया। फर्स्टपोस्ट के उस आलेख के मूल लिंक पर अभी भी 404 एरर मेसेज दिखता है।
ल्ल  भाजपा ने इशरत कांड पर सोनिया गांधी पर निशाना साधा है? आपके क्या विचार हैं?
जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि इशरत जहां मामले की व्यापक छानबीन होनी चाहिए। आप जानते हैं कि 2013 में मैं बता चुका हूं कि यह समूचा मामला झूठा था और इसके जरिये नरेंद्र मोदी को फंसाए जाने का लक्ष्य था। इसलिए साफ है कि यूपीए सरकार में कोई बहुत ऊंचे स्तर पर इस मामले के पीछे था। इसीलिए यह मामला इतनी दूर तक पहुंच सका।
ऐसे मामलों में जिम्मेदारी देश के सवार्च्च कार्यालय में बैठे व्यक्ति की होती है जो देश की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदार होता है। इसलिए जिम्मेदारी तत्कालीन गृहमंत्री की थी। उन्हें अब कुछ बेहद जरूरी सवालों के जवाब देने चाहिए। जो भी हो, उनको आदेश उनके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गांधी परिवार से ही मिलते रहे होंगे।
मेरा मानना है कि भाजपा गांधी परिवार पर इसलिए निशाना साध रही है क्योंकि उस समय गृहमंत्री को आदेश देने वाले अन्य व्यक्ति केवल मनमोहन सिंह ही थे और यह संभव नहीं कि उन्होंने ऐसा कोई आदेश दिया हो। मेरा एक और विचार है। स्थानीय स्तर पर भी कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो नरेंद्र मोदी के सख्त खिलाफ रहा हो और वह चाहता हो कि मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार न बन सकें। लेकिन इस धारणा की गहरी पड़ताल होनी चाहिए।
ल्ल  कांग्रेस 2008, 2009, 2010 में मोदी को रोकने का प्रयास क्यों करती, जबकि वह उस समय केवल गुजरात के मुख्यमंत्री थे?
देखिए, भाजपा की ओर से 2014 में प्रधानमंत्री पद के गिने-चुने उम्मीदवार थे। इनमें से नरेंद्र मोदी की छवि भ्रष्टाचार विरोधी मामलों में बेहद गंभीर थी। भारत में ऐसे कई लोग हैं जो भ्रष्टाचार विरोधी होने का दम भरते हैं, लेकिन मोदी ने गुजरात में ऐसा कर के दिखाया है और भ्रष्टाचार के खिलाफ वहां कड़े कदम उठाए गए।
इसलिए मेरा मानना है कि मोदी का विरोध करने के पीछे यह प्रमुख कारण था। आज जमीनी सच्चाई मेरे इस तर्क के पक्ष में है। आप जानते ही हैं कि मोदी ने राष्ट्रीय राजधानी में काले धन की व्यवस्था पर इतनी सख्ती से रोक लगाई है कि दिल्ली की प्रॉपर्टी मार्केट, जो काले धन पर चलती थी, आज ठंडी पड़ी है। दिल्ली में किसी से भी पूछ सकते हैं कि भ्रष्टाचार पर मोदी ने कितनी सख्ती बरती है। बतौर मुख्यमंत्री, मोदी के लंबे कार्यकाल से जो लोग वाकिफ हैं वे जानते है कि मोदी एकमात्र व्यक्ति हैं जो दिल्ली में इतने बड़े पैमाने पर काले धन की व्यवस्था पर रोक लगा सकते थे़. उनके खिलाफ लोगों के दिमाग में यही एक लक्ष्य था।
मेरी राय में कुछ और भी कारण हैं जिनकी वजह से मोदी को निशाना बनाया गया था, लेकिन पुख्ता सबूतों के अभाव में मैं पहले उन कारणों की जांच करना चाहूंगा।

भारत 'माता' वेदकाल से - साधु प्रो़ वी़ रंगराजन

तारीख: 25 Apr 2016 
- साधु प्रो़ वी़ रंगराजन


दुर्भाग्य से आज भारत के ही कुछ लोग कहते हैं कि प्राचीन भारत में 'भारत माता की जय' बोलने की प्रथा नहीं थी, इन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने 3 मार्च, 2016 को कहा था, 'अब समय आ गया है कि हम नई पीढ़ी को कहें कि वह 'भारत माता की जय' का उद्घोष करे।' उनके इस बयान पर गैर जिम्मेदाराना तरीके से टीका-टिप्पणी की गई। श्री भागवत द्वारा स्पष्टीकरण देने के बावजूद विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। स्पष्टीकरण में उन्होंने कहा, 'हमें ऐसे महान भारत का निर्माण करना है जिसमें लोग स्वयं ही 'भारत माता की जय' का नारा बुलंद करें। इसे किसी पर थोपा न जाए। यह वास्तविक और स्वत: स्फूर्त हो।' इसलिए भारत को मातृभूमि के तौर पर समझने और महसूस करने की जरूरत है।
श्री भागवत के बयान के जवाब में कई बयान सामने आए। एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि अगर उनके गले पर चाकू भी रख दिया जाए तो भी वह भारत माता की जय नहीं बोलेंगे। 'भारत माता की जय' न बोलने पर महाराष्ट्र विधानसभा ने एआईएमआईएम के विधायक वारिस पठान को निलंबित कर दिया। लेकिन असम के 73 वर्षीय ताजुद्दीन बरभूभुइयां ने कहा, ''यह नारा लगाने में क्या गलत है? क्या मैं भारतीय नहीं? मैं असदुद्दीन ओवैसी की श्रेणी में नहीं हूं। मैं यह नारा सौ बार लगाऊंगा।'' हालांकि, 1 अप्रैल, 2016 को जारी एक फतवे में उत्तर प्रदेश के दारुल उलूम देवबंद की ओर से कहा गया, 'भारत माता की जय का नारा इस्लाम के नियमों के खिलाफ है' जबकि मेरठ में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने 'भारत माता की जय' का उद्घोष किया। इस मामले में सबसे खराब बयान, खुद को इतिहासकार कहने वाले इरफान हबीब का आया। 'द हिंदू' को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ''भारत को माता मानने का चलन प्राचीन भारत में नहीं था और यह विचार यूरोप से   आया है।''
यहां हम हबीब जैसे अज्ञानी को प्रख्यात भारतवेत्ता एवं देशभक्त अनवर शेख के उन शब्दों की याद दिलाना चाहेंगे, जिनमें उन्होंने अथर्ववेद के भूमि सूक्त के छंदों पर टिप्पणी की है। अपने त्रैमासिक लिबर्टी में 'भारत माता' पर उन्होंने लिखा है, ''छंद 12 में हिंदू को भारत माता के प्रति पूरी तरह समर्पित होने के लिए कहा गया है,'मैं पृथ्वी का पुत्र हूं, पृथ्वी मेरी माता है।' इस स्तोत्र का अध्ययन बताता है कि जहां वैदिक विचारों में सभी देवताओं के प्रति आदर भाव है, वहीं इसमें सबसे अधिक महत्व भारतभूमि को दिया गया है क्योंकि यह उन सबकी माता है जो इसमें निवास करते हैं। हालांकि इस बारे में दो विचारों पर ध्यान देना होगा-
एक, कोई व्यक्ति भारत में रहकर किसी भी ईश्वर की उपासना कर सकता है क्योंकि ईश्वरत्व के बारे में वैदिक विचार इतने मुक्त हैं कि उसके अंतर्गत देवताओं के बीच कोई आपसी द्वेष नहीं है। यह मुक्त सोच प्रगतिशील वैदिक विचारधारा पर आधारित है, जिसमें बताया जाता है कि समय का पहिया लगातार आगे की ओर चलता है और हर तरह का परिवर्तन हमारे सामने आता है और इसीलिए सामाजिक सौहार्द पर धार्मिक विचारों की कट्टरता की छाया नहीं पड़नी चाहिए।
दूसरा, इस वैदिक मुक्तता को हालांकि भारत माता के विचार के जरिये सीमित भी किया गया है। इस भूमि पर रहने वाले को मानना होगा 'मैं भारत माता का पुत्र हूं और भारत मेरी माता है।' कहना न होगा कि केवल अपना प्रेम स्वीकारना ही निष्ठा का परिचायक नहीं होता; इसे निरंतर कार्य के जरिये साबित करना होगा। इस देश की संस्कृति को नकारने वाला इस देश से प्रेम कैसे कर सकता है?
संस्कृत शब्द राष्ट्र एक राजनीतिक-सांस्कृतिक विचार है जो पश्चिम के 'राष्ट्र' या 'राज्य' जैसे राजनीतिक विचारों से भिन्न है। ब्रहस्पत्य संहिता में कहा गया है, 'हिमालयाद आराभ्य यावाद इंदु सरोवरपर्यत्नम तम देव निर्मितम देशम हिंदुस्तानम प्रचाक्शते' -''देवताओं द्वारा निर्मित और हिमालय से हिंद महासागर तक फैली यह भूमि हिंदुस्तान है। इसे भारतवर्ष भी कहा जाता है।'' विष्णुपुराण में कहा गया है, ''वह भूमि जो महासागर के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में है, वह भारत है और उसके निवासी भारतीय हैं।'' चंद्रगुप्त मौर्य के अधीन प्रभावशाली मौर्य वंश की नींव रखने वाले चाणक्य ने घोषित किया 'पृथ्वय: समुद्र पर्यन्तय: एक: रत' - समुद्र तक पहुंचने वाली यह भूमि एक राष्ट्र है। भगवान रामचंद्र ने कहा था 'जननि जन्मभूमिश्च: स्वर्गादपि गरियसी'अर्थात माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी अधिक पवित्र हैं!
अनंतकाल से हमारे वैभवशाली राष्ट्र की बुनियाद अध्यात्मवाद पर रखी गई है। वैदिक ऋषि अथर्ववेद के एक सूक्त में प्रार्थना करता है, ''ओह मां, जो हमसे घृणा करता है, जो हमारे ऊपर शासन करने के लिए सैन्य बल लेकर आता है, जो हमारे अनिष्ट की कल्पना करता है, और जो हमारी मृत्यु एवं विध्वंस की कामना करता है, आप उनका संहार करें; यह मेरी मातृभूमि है जिसकी गोद में बैठकर मेरे पूर्वजों, महान ऋषियों ने यज्ञ किए, प्रायश्चित किया और सातों ऋतुओं के गीत गाए।''
भारत भवानी - भारत माता - की महान परंपरा का आह्वान करने की हमारी समृद्ध परंपरा रही है। हमारी भूमि की सभी 52 शक्ति पीठों में हम देश मातृका यानी मातृभूमि रूपी माता की वंदना करते रहे हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ''अगले पचास वर्ष तक यह हमारा प्रधान स्वर रहेगा - हमारी महान भारत माता। कुछ समय के लिए अन्य देवताओं को हमें भुला देना चाहिए।'' उनकी विख्यात शिष्या भगिनी निवेदिता ने इसी तर्ज पर एक प्रार्थना भी तैयार की थी।
स्वामी रामतीर्थ ने देशभक्ति को व्यावहारिक वेदांत की संज्ञा दी थी। ''भारतभूमि मेरा शरीर है। कन्याकुमारी मेरे पांव हैं, हिमालय मेरा शीर्ष है। मेरी जटाओं से गंगा प्रवाहित होती है, मेरे शीर्ष से ब्रह्मपुत्र और सिंधु निकलती हैं। विंध्यांचल मेरी कमर से बंधा है। कोरोमंडल मेरी बाईं एवं मालाबार मेरी दाईं टांग है। मैं संपूर्ण भारत हूं और इसके पूर्व व पश्चिम मेरे बाजू हैं।''
तमिल के महान कवि और दार्शनिक सी़ सुब्रमण्य भारती ने छोटे बच्चों को मातृभूमि के बारे में बताते हुए कहा, ''छेदामिल्लाता हिंदुस्थानम, अतई देइवमेनरु कुंबिदादी पाप:।'' अर्थात 'ओह शिशु, अखंड भारत की, अपनी देवी की तरह आराधना और उसे प्रेम कर।'
तंत्र के पश्चिमी साधक सर जॉन वुडरॉफ ने पवित्र भारतवर्ष के बच्चों के बारे में कहा है, ''वह अपने वर्ण को बनाए रखने के लिए और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए शक्ति प्राप्त करेंगे, यदि वह अपने देश की सेवा यह सोच कर करेंगे कि श्री भारत की पूजा (सेवा) महाशक्ति की सेवा है। श्री भगवती जो अपने एक रूप में भारत शक्ति बन कर भी आती हैं, वह केवल हिंदुओं की ही देवी नहीं हैं, बल्कि यह विश्व माता का नाम है।''
बंकिम चंद्र की 'नवीन युग के अग्रणी ऋषियों में से एक' के तौर पर प्रशंसा करते हुए महर्षि अरविंद कहते हैं, ''जब तक मातृभूमि खुद को मात्र पृथ्वी या जन समुदाय से अलग प्रकट नहीं करेगी, जब तक वह महान दिव्यता और मातृत्व शक्ति के सौंदर्य के रूप में मस्तिष्क पर आच्छादित नहीं होगी और हृदय को जीत नहीं लेगी और माता के प्रति स्नेह और सेवाभाव से सभी क्षुद्र भय और आशाएं मुक्त नहीं हो जाएंगे, तब तक डूबते देश को बचाने वाले चमत्कारी राष्ट्रप्रेम का उदय नहीं होगा।''
'विज्डम ऑफ इंडिया' पुस्तक में लिन युतांग ने भारत को 'विश्व गुरु' माना है। महान इतिहासकारों ए़ एल़ बेशम आर्नल्ड टॉयन्बी और विचारकों आऱ रॉनल्ड, मैक्समूलर, मोनिएर विलियम्स एवं अल्बर्ट आइंस्टीन ने भारत की प्रशंसा ज्ञान और विद्या की भूमि के तौर पर की है। भारत के महान देशभक्त-क्रांतिकारी श्री ब्रह्मबांधव उपाध्याय के पद्चिन्हों पर चलने वाले मुंबई के बांद्रा स्थित सेंट कैथरीन ऑफ सिएना स्कूल के रेवरेंड फादर एंथनी इलांजीमिट्टम ने तत्व दर्शन में प्रकाशित अपने आलेख 'वेदांतिक इंडिया' में लिखा है, ''यह भारत माता प्रकृति की गोद से निकली है और हमारा यह उपमहाद्वीप अपने आप में एक दुनिया है जिसकी एवरेस्ट सरीखी गोपनीय सूझ-बूझ है, जो हमारी वैदिक संस्कृति में समाहित है।''
इसलिए, इस सच को सूक्ष्मदर्शी से देखने की जरूरत नहीं है कि जो लोग 'वंदे मातरम' और 'भारत माता की जय' का विरोध करते हैं वे देशप्रेमी नहीं हैं और इस पवित्र भूमि पर हमला बोल चुके आक्रांताओं की संतानें हैं। दुर्भाग्यवश, अंग्रेजों से सत्ता प्राप्त कर देश की कमान संभालने वाला नेतृत्व ऐसे ही राष्ट्र-विरोधी और विश्वासघाती ताकतों के हाथों में खेलता रहा।
4 फरवरी, 1938 को मद्रास के तत्कालीन गवर्नर जॉन फ्रांसिस एश्ले अर्सकाइन ने तत्कालीन गवर्नर-जनरल और भारत के वाइसरॉय विक्टर होप को संविधान सभा आयोजनों से वंदे मातरम को हटाए जाने के बारे में लिखा था। उस दौरान इस मुद्दे पर मुस्लिम सदस्य सदन का बहिष्कार करते थे। बाद में, स्वतंत्र भारत में भी यही कहानी दोहराई जाती रही।
आज हमारे सोते हुए धर्माचायार्ें को जगाए जाने की जरूरत है ताकि वे देश के प्रत्येक कोने में भारतवर्ष की मातृभूमि की आराधना को बढ़ावा दें जो कि सभी देवताओं, देवियों, साधुओं, ऋषियों, संन्यासियों और हमारे संप्रदायों की मां है और साथ ही उसकी प्रतिष्ठा में मंदिर भी स्थापित कराए। गौरवान्वित, देशभक्त और आत्मसम्मानी हिंदुओं को अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्ल तृतीया जैसे पर्व भी मनाने चाहिए जो 9 मई, 2016 को आने वाले हैं। यह दिवस श्री भारतमाता की आराधना का शुभ दिन होता है। बेंगलुरू स्थित श्री भारत माता मंदिर के 12 वर्ष पूरे होने पर 24 दिसंबर, 2016 को महाकुंभाभिषेकम का आयोजन किया जाएगा। 14 अप्रैल, 2016 को बैसाखी दिवस से लेकर हम प्रतिदिन लघु भारतचंडी होम का आयोजन कर रहे हैं। इसके अंतर्गत देशमत्रिका पूजा के जरिये भारतशक्ति का आह्वान किया जाता है ताकि वह राष्ट्र-विरोधी शक्तियों और पाप का नाश करे और देश की एकता और अखंडता को बनाए रखे।
साधु प्रो़ वी़ रंगराजन
(लेखक सिस्टर निवेदिता एकेडमी के संस्थापक न्यासी और बेंगलुरू स्थित श्री भारत माता मन्दिर से जुड़े हुए हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

इतालवी कोर्ट के फैसले को स्वीकार करे कांग्रेस : अमित शाह






इतालवी कोर्ट के फैसले को स्वीकार करे कांग्रेस : अमित शाह

Last Updated: Thursday, April 28, 2016
कोलकाता : भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अगस्तावेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस को घोटाले से जुड़े इतालवी अदालत के फैसले को स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने बुधवार को यहां एक चुनावी सभा में कहा कि अब इतालवी अदालत का (फैसला) आ गया है। उसे स्वीकार करें। कांग्रेस यहां की कोई चीज स्वीकार नहीं करेगी लेकिन क्या उन्हें इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए अगर वह ‘इटली’ से आ रहा हो। शाह ने कहा कि इतालवी अदालत का फैसला आ गया। हमारे पास सभी अखबार नहीं आए और वे (कांग्रेस) कह रहे हैं कि जांच कराएं। इंतजार कीजिए। जांच की जाएगी। इससे पहले दिन में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि सरकार को इतालवी अदालत के फैसले की प्रति मिली है और उसका अंग्रेजी में अनुवाद कराया जा रहा है।

भाषा

अगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर डील में भारतीय अफसरों को दी गई रिश्वत:अदालत (इटली)
2010 में हुए अगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर डील मामले में इटली की अदालत ने अहम फैसला दिया है.मिलान कोर्ट ऑफ अपील्स ने माना है कि इस हेलिकॉप्टर डील में करप्शन हुआ और इसमें इंडियन एयरफोर्स के पूर्व चीफ एसपी. त्यागी भी शामिल थे. सरकार ने अब रोम में भारतीय दूतावास से कोर्ट के फैसले की जानकारी मांगी है.
कोर्ट के फैसले के जानकारी मिलने के बाद रक्षा मंत्रालय पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी के आधिकारिक सरकारी समारोहों में शामिल होने को लेकर एडवाइजरी जारी कर सकता है.यह साबित हो चुका है कि 10 से 15 मिलियन डॉलर की रिश्वत भारतीय अफसरों को दी गई.
अदालत के 225 पन्नों के फैसले में अलग से 17 पेज सिर्फ पूर्व वायुसेना प्रमुख त्यागी के बारे में हैं. इनमें जिक्र है कि किस आधार पर अदालत इस फैसले पर पहुंची कि भारतीय सरकारी अफसरों ने भ्रष्टाचार किया.त्यागी ने इटली के कोर्ट के फैसले पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है. हालांकि, इस मामले में वो खुद को बेकसूर बताते रहे हैं.

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चॉपर डील में भारतीयों को दी गई थी रिश्वत, सरकार ने मांगी रिपोर्ट
नई दिल्ली। अगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर डील में भारतीय अधिकारियों को घूस दी गई थी। विवादित अगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर डील के मामले में इटली की कोर्ट ने कहा कि भारत के कुछ लोगों को इसके लिए रिश्वत दी गई थी। वहीं इस डील मामले में इटली की अदालत के फैसले के बाद सरकार की नींद खुली गई है। सरकार ने अब रोम में भारतीय दूतावास से कोर्ट के फैसले की जानकारी मांगी है।

अदालत ने कंपनी के प्रमुख ऊर्सी व हेलीकॉप्टर बनाने वाली कंपनी फिनमेक्कनिका को घूस देने का दोषी माना है। ऊर्सी को इस मामले में चार साल की सजा दी गई है। दूसरी ओर मिलान की कोर्ट ने पूर्व वायु सेना प्रमुख एसपी त्यागी को भी दोषी माना है। 225 पन्नों की फाइल में 17 पन्ने त्यागी पर ही है। त्यादी का इस मामले में कहना है कि फैसले की पूरी कॉपी पढ़ने के बाद ही वो कोई प्रतिक्रिया देंगे। वो हमेशा से खुद को इस मामले में निर्दोष बताते आए है। 2005-07 के दौरान त्यागी वायु सेना के प्रमुख थे और तभी इटली के साथ चॉपर डील हुई थी।

इटली की अदालत ने यूपीए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए है। वीवीआइपी चॉपर डील के मामले की सुनवाई करते हुए इटली की कोर्ट ने इसे भ्रष्टाचार पूर्ण बताया है। यूपीए सरकार द्वारा इस मामले को नजरअंदाज किए जाने की भी बात कही है। अदालत का कहना है कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने चॉपर से जुड़े स्कैंडल के पीछे का सच जानने की कोशिश नहीं की। इतना ही नहीं जांच कर्ताओं को उससे संबंधित महत्वपूर्ण कागजात भी उपलब्ध नहीं कराए। कोर्ट का कहना है कि अस डील के मामले में मुख्य आरोपी ने इटली के तत्कालीन पीएम मारियो मोंटी की ओर से भारत के प्रधानमंत्री मनमोहगन सिंह से बात करने की कोशिश भी की थी।

यह डील 3,565 करोड़ रुपए की थी। कोर्ट ने अपने आदेशों की 225 पन्नों की रिपोर्ट में यह भी कहा कि भारत की सुरक्षा मंत्रालय ने तथ्यों को सामने लाने में लापरवाही बरती। इटली की अदालत ने इसके पीछे ऑगस्‍टा वेस्‍टलैंड के पूर्व हेड गिउस्‍प ओर्सी की ओर से जेल से मार्च 2013 में हाथ से लिए गए एक पत्र के जुड़े होने की भी आशंका जताई है।

इसमें लिखा गया था, मेरे नाम मोंटी या टेरासिआनो को कॉल करें और उनसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बात करने को कहें। मोंटी उस समय पीएम थे और टेरासिआनो उनके डिप्लोमेटिक एडवाइजर थे। लेकिन फिलहाल वो ये बताने की स्थिति में नहीं है कि जेल में रहते हुए उन्होने कौन सा संदेश भारत सरकार के प्रमुख को पहुंचाने की कोशिश की थी।

कोर्ट का कहना है कि यदि भारत सरकार न्यायिक सहायता के लिए भेजे गए आवेदनों का परिणाम देखे, तो इसके बारे में पता चल सकता है। अप्रैल 2013 में इटली ने भारत से संबंधित दस्तावेजों की मांग की थी। जिसके बाद भारत ने मार्च 2014 में केवल तीन दस्तावेज उपलब्ध कराए। इस डील में बिचौलिए की भूमिका निभाने वाले क्रिश्चियन माइकल की भूमिका पर भी अदालत ने सवाल उठाए है।

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ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर’ डील में हुआ था घोटाला, 
पूर्व एयरफोर्स चीफ थे शामिल- इटली कोर्ट
Tue, Apr 26th, 2016
https://wikileaks4india.com
इटली की एक अदालकत ने ‘ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर’ डील में अहम फैसला सुनाते हुए बड़ा खुलासा किया है। कोर्ट ने माना है कि ‘ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर’ डील में भ्रष्टाचार हुआ और रिश्वत भी  दी गई। इस पूरे मामले में इंडियन एयरफोर्स के पूर्व चीफ एसपी त्यागी भी शामिल थे।

आपको बता दें कि ऑगस्‍टा कंपनी ने भारत में 3600 करोड़ में 12 वीवीआईपी हेलिकॉप्टरों का सौदा किया था। वहीं कोर्ट के इस खुलासे के बाद केंद्र सरकार ने नींद टूट गई है। अब सरकार ने रोम में भारतीय दूतावास से कोर्ट के फैसले की जानकारी मांगी है। इस डील मामले में रक्षा मंत्रालय ने वहां भारतीय दूतावास से फैसले की जानकारी तलब की है।

जानकारी के अनुसार, इटली की अदालत ने 225 पेज में इस मामले में अपना जजमेंट दिया है। कोर्ट ने अपनी टिप्‍पणी में कहा कि इस डील के लिए कई भारतीयों (कई कांग्रेस नेताओं के नाम) को रिश्‍वत दी गई। करीब 120-125 करोड़ रुपये रिश्‍वत दी गई। गौर हो कि इस डील में फिनमैकेनिका के प्रमुख को रिश्‍वत देने का दोषी करार दिया गया है। कोर्ट ने अगस्टा वेस्टलैंड कंपनी के प्रमुख ऊर्सी और हेलिकॉप्टर बनाने वाली कंपनी फिनमेक्कनिका को घूस देने का दोषी माना है। 3600 करोड़ के इस डील में ऑगस्‍टा ने 125 करोड़ रुपये रिश्वत दी थी। कोर्ट ने 225 पेज के अपने फैसले में 17 पन्‍नों में पूर्व एयरफोर्स चीफ एसपी त्यागी का रोल बताया है।

कोर्ट ऑफ मिलान के इस फैसले में कई बड़े नेताओं के नाम सामने आए हैं। फैसले में Signora Gandhi के नाम का जिक्र किया गया है। आरोप है कि signora Gandhi का मतलब सोनिया गांधी है। वैसे इटेलियन में सोनिया का मतलब होता है लेडी। वहीं, मनमोहन सिंह का भी नाम लिया गया है। इस जजमेंट की कॉपी स्क्रिप्‍ट डॉटकॉम से ली गई है। इसके अलावा, मनमोहन सिंह, अहमद पटेल, ऑस्‍कर फर्नांडीस के नाम का भी जिक्र है। जजमेंट में भारतीय वायुसेना अधिकारी का भी नाम है। कोर्ट ने अपनी टिप्‍पणी में कहा कि कांग्रेस नेताओं को रिश्‍वत दी गई है। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन का भी इसमें जिक्र है।

इस वीवीआईपी चॉपर डील मामले में इटली की कोर्ट ने कहा कि भारत के कुछ लोगों को इसके लिए रिश्वत दी गई थी। अदालत ने कंपनी के प्रमुख ऊर्सी व हेलीकॉप्टर बनाने वाली कंपनी फिनमेक्कनिका को घूस देने का दोषी माना है। कोर्ट ने पूर्व वायु सेना प्रमुख एसपी त्यागी को भी दोषी माना है। इस फाइल में 17 पन्ने त्यागी पर ही है। त्यादी का कहना है कि फैसले की पूरी कॉपी पढ़ने के बाद ही वो कोई प्रतिक्रिया देंगे। वो हमेशा से खुद को इस मामले में निर्दोष बताते आए हैं।

गौरतलब है कि 2005-07 के दौरान त्यागी वायु सेना के प्रमुख थे और तभी इटली के साथ चॉपर डील हुई थी। यह डील करीब 3600 करोड़ रुपये की थी। कोर्ट ने अपने आदेशों की 225 पन्नों की रिपोर्ट में यह भी कहा कि भारत के रक्षा मंत्रालय ने तथ्यों को सामने लाने में लापरवाही बरती।

रविवार, 24 अप्रैल 2016

वीर तोगोजी राठौड़ : सिर कटा और धड़ लड़ा

मारवाड़ का इतिहास वीरों की गाथाओं से भरा पड़ा है। वीरता किसी कि बपौती नहीं रही। इतिहास गवाह है कि आम राजपूत से लेकर खास तक ने अप सरजमीं के लिए सर कटा दिया। लेकिन इसे विडम्बना ही कहेंगे कि इतिहास में ज्यादातर उन्हीं वीरों की स्थान मिल पाया जो किसी न किसी रूप में खास थे | आम व्यक्ति की वीरता इतिहास के पन्नों पर बेहद कम आईं। आई भी तो कुछ शब्दों तक सीमित| कुछ भी कहा जाए, लेकिन इन वीरों ने नाम के लिए वीरता नहीं दिखाई। ऐसा ही एक बेहतरीन उदाहरण दिया है मारवाड़ के आम राजपूत तोगाजी राठौड़ Togaji Rathore ने, जिसने शाहजहां को महज यह यकीन दिलाने के लिए अपना सिर कटवा दिया कि राजपूत अप आन-बान के लिए बिना सिर भी वीरता पूर्वक युद्ध लड़ सकता है और उसकी पत्नी सती हो जाती है। आज का राजपूत या और कोई भले ही इसे महज कपोल-कल्पना समझे, लेकिन राजपूतों का यही इतिहास रहा है कि वे सच्चाई के लिए मृत्यु को वरण करना ही अपना धर्म समझते थे |


----अद्भत वीर तोगोजी राठौड़-----
----सिर कटा और धड़ लड़ा उस वीर का -----
वर्ष 1656 के आसपास का समय था | दिल्ली पर बादशाह शाहजहां व जोधपुर Jodhpur पर राजा गजसिंह प्रथम Maharaja Gaj Singh 1st का शासन था। एक दिन शाहजहां Shajahan का दरबार लगा हुआ था। सभी अमीर उमराव और खान अपनी अपनी जगह पर विराजित थे| उसी समय शाहजहां जे कहा कि अपने दरबार में खान 60 व उमराव 62 क्यों है? उन्होंने दरबारियों से कहा कि इसका जवाब तत्काल चाहिए | सभा में सन्नाटा पसर गया | सभी एक दूसरे को ताकने लगे। सबने अपना जवाब दिया, लेकिन बादशाह संतुष्ट नहीं हुआ ।

आखिरकार दक्षिण का सुबेदार मीरखां खड़ा हुआ और उसने कहा कि खानों से दो बातों में उमराव आगे है इस कारण दरबार में उनकी संख्या अधिक है। पहला, सिर कटने के बावजूद युद्ध करना और दूसरा युद्धभूमि में पति के वीरगति को प्राप्त होने पर पत्नी का सति होना। शाहजहां यह जवाब सुनने के बाद कुछ समय के लिए मौन रहा | अगले ही पल उसने कहा कि ये दोनों नजारे वह अपनी आंखों से देखना चाहता है | इसके लिए उसने छह माह का समय निर्धारित किया । साथ ही उसने यह भी आदेश दिया कि दोनों बातें छह माह के भीतर साबित नहीं हुई तो मीरखां का कत्ल करवा दिया जाएगा और उमराव की संख्या कम कर दी जाएगी। इस समय दरबार में मौजूद जोधपुर के महाराजा गजसिंह जी को यह बात अखर गई| उन्होंने मीरखां से इस काम के लिए मदद करने का आश्वासन दिया |

मीरखां चार महीने तक ररजवाड़ों में घूमे, लेकिन ऐसा वीर सामने नहीं आया जो बिना किसी युद्ध महज शाहजहां के सामने सिर कटने के बाद भी लड़े और उसकी पत्नी सति हो। आखिरकार मीरखां जोधपुर महाराजा गजसिंह जी से आ कर मिले । महाराजा ने तत्काल उमरावों की सभा बुलाई| महाराजा ने जब शाहजहां की बात बताई तो सभा में सन्नाटा छा गया । महाराजा की इस बात पर कोई आगे नहीं आया । इस पर महाराजा गजसिंह जी की आंखें लाल हो गई और भुजाएं फड़कजे लगी। उन्होंने गरजना के साथ कहा कि आज मेरे वीरों में कायरता आ गई है। उन्होंने कहा कि आप में से कोई तैयार नहीं है तो यह काम में स्वयं करूँगा। महाराजा इससे आगे कुछ बोलते कि उससे पहले 18 साल का एक जवान उठकर खड़ा हुआ। उसने महाराजा को खम्माघणी करते हुए कहा कि हुकुम मेरे रहते आपकी बारी कैसे आएगी| बोलता-बोलता रुका तो महाराज ने इसका कारण पूछ लिया| उस जवान युवक ने कहा कि अन्नदाता हुकुम सिर कटने के बाद भी लड़ तो लूँगा, लेकिन पीछे सति होने वाली कोई नहीं है अर्थात उसकी शादी नहीं हो रखी है| यह वीरता दिखाने वाला था तोगा राठौड़| महाराजा इस विचार में डूब गए कि लड़ने वाला तो तैयार हो गया, लेकिन सति होने की परीक्षा कौन दे | महाराजा ने सभा में दूसरा बेड़ा घुमाया कि कोई राजपूत इस युवक से अप बेटी का विवाह सति होने के लिए करे| तभी एक भाटी सिरदार इसके लिए राजी हो गए।

भाटी कुल री रीत, आ आजाद सूं आवती । 
करण काज कुल कीत, भटियाणी होवे सती।

महाराजा जे अच्छा मुहूर्त दिखवा कर तोगा राठौड़ का विवाह करवाया । विवाह के बाद तोगाजी ने अपनी पत्नी के डेरे में जाने से इनकार कर दिया | वे बोले कि उनसे तो स्वर्ग में ही मिलाप करूँगा । उधर, मीरखां भी इस वीर जोड़े की वीरता के दिवाने हो गये | उन्होंने तोगा राठौड़ का वंश बढ़ाने की सोच कर शाहजहां से छह माह की मोहलत बढ़वाने का विचार किया। ज्योंहि यह बात नव दुल्हन को पता चली तो उसने अपने पति तोगोजी की सूचना भिजवाई कि जिस उद्देश्य को लेकर दोनों का विवाह हुआ है वह पूरा किये बिना वे ढंग से श्वास भी नहीं ले पाएंगे| इस कारण शीघ्र ही शाहजहाँ के सामने जाने की तैयारी की जाए| महाराजा गजसिंह व मीरखां ने शाहजहाँ को सूचना भिजवा दी|

समाचार मिलते ही शाहजहां जे अपने दो बहादूर जवाजों को तोणोजी से लड़ने के लिए तेयार किया । शाहजहां ने अपने दोनों जवानों को सिखाया कि तोगा व उसके साथियों की पहले दिन भोज दिया जायेगा |
जब वे लोग भोजन करने बैठेंगे उस वक्त तोगे का सिर काट देना ताकि वह खड़ा ही नहीं हो सके। उधर, तोगाजी राठौड़ आगरा पहुंच गए। बादशाह ने उन्हें दावत का न्योता भिजवाया। तोगाजी अपने साथियों के साथ किले पहुँच गए। वहां उनका सम्मान किया गया। मान-मनुहारें हुई। बादशाह की रणनीति के तहत एक जवान तोगाजी राठौड़ के ईद-गीर्द चक्कर लगाने लगा । तोगोजी को धोखा होने का संदेह ही गया। उन्होंने अपने पास बैठे एक राजपूत सरदार से कहा कि उन्हें कुछ गड़बड़ लग रही है इस कारण उनके आसपास घूम रहे व्यक्ति को आप संभाल लेना ओर उनका भी सिर काट देना। उसके बाद वह अपना काम कर देगा । दूसरी तरफ, तोगोजी की पत्नी भी सती होने के लिए सजधज कर तैयार हो गई । इतने में दरीखाने से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आने लगी कि तोगाजी ने एक व्यक्ति को मार दिया ओर पास में खड़े किसी व्यक्ति ने तोगाजी का सिर धड़ से अलग कर दिया। तोगाजी बिना सिर तलवार लेकर मुस्लिम सेना पर टूट पड़े। तोगाजी के इस करतब पर ढोल-नणाड़े बजने लगे। चारणों ने वीर रस के दूहे शुरू किए। ढोली व ढाढ़ी सोरठिया दूहा बोलने लगे। तोगोजी की तलवार रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। बादशाह के दरीखाने में हाtहाकार मच गया। बादशाह दौड़ते हुए रणक्षेत्र में पहुंचे। दरबार में खड़े राजपूत सिरदारों ने तोगोजी ओर भटियाणी जी की जयकारों से आसमाज गूंजा दिया तोगोजी की वरीता देखकर बादशाह जे महाराजा गजसिंह जी के पास माफीनामा भिजवाया और इस वीर को रोकने की तरकीब पूछी। कहते हैं कि ब्राह्मण से तोगोजी के शरीर पर गुली का छिंटा फिंकवाया तब जाकर तोगोजी की तलवार शांत हुई और धड़ नीचे गिरा। उधर, भटियाणी सोलह श्रृंगार कर तैयार बैठी थी। जमना जदी के किनारे चंदन कि चिता चुनवाई गई। तोगाजी का धड़ व सिर गोदी में लेकर भटियाणीजी राम का नाम लेते हुए चिता में प्रवेश कर गई|

शत् शत् नमन वीर को और सति विरांगना को
साभार : जाहरसिंह जसोल द्वारा रचित राजस्थान री बांता पुस्तक से लेकर घम्माघणी पत्रिका द्वारा हिंदी में अनुवादित

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

भारतीय नववर्ष अभिनंदन उत्सव

भारतीय नववर्ष अभिनंदन उत्सव
तारीख: 18 Apr 2016 नई दिल्ली


प्रतिवर्ष की तरह नववर्ष के स्वागतार्थ यमुना के सूरघाट पर जैसे ही सूर्य देव ने अपनी लालिमा आसमान में बिखेरी, तभी ढोल नगाड़ों की गूंज, जयकारों के उद्घोष मंत्रोचार के बीच उपस्थित जनसमूह ने हाथों में फूल और दीप प्रज्जवलित कर अभिनंदन करते हुए अर्ध्य दिया। संस्कार भारती दिल्ली प्रांत द्वारा 8 अप्रैल को विक्रमी संवत् 2073 के अभिनंदन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल, विशिष्ट अतिथि श्री विजय जिंदल व श्री एस के जिंदल।  डा. कृष्ण गोपाल ने भारतीय नववर्ष को अपनाने और युवा पीढ़ी को इसकी जानकारी देने के आग्रह पर जोर देते हुए कहा कि यह हमारी भारतीय परंपरा और संस्कृति का अटूट हिस्सा है, इस पर हमें गर्व करना चाहिए।
श्री अवनीश त्यागी एवं उनकी टोली ने संस्कार भारती का ध्येय गीत प्रस्तुत किया। मंत्रोच्चारण, हनुमान संस्कृत विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा योग एवं सूर्य नमस्कार किया गया। प्रख्यात गायिका डॉ. कुमुद दीवान ने लोकगीत और भजन गाकर लोगों को मंत्रमुग्ध किया। नृत्यांगना श्रीमती सीमा शर्मा की शिष्याओं ने कथक, भरतनाट्यम एवं असमिया नृत्य का मिश्रण कर सुंदर नाट्य की प्रस्तुतियां दी। वरिष्ठ कवि श्री विमल विभाकर ने कविता पाठ किया।
कार्यक्रम के संयोजक श्री देवेन्द्र खन्ना ने आभार प्रकट किया। दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता एवं श्री शिवकुमार गोयल, महामंत्री श्री सुबोध शर्मा, जितेंद्र मेहता, श्री अनुपम भटनागर, श्री विजय बहल सहित अनेकानेक कार्यकर्ताओं के सहयोग से यह कार्यक्रम सफल रहा।
दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में एनडीटीएफ द्वारा नववर्ष प्रतिपदा कार्यक्रम आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री सुनील आंबेकर थे जिन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर व्यापक चर्चा की। उन्होंने चाणक्य, चन्द्रगुप्त, विवेकानंद और टैगोर के दर्शन को प्रासंगिक बताया। समारोह में एनडीटीएफ के वरिष्ठ नेता प्रो. एन.के. कक्कड़, एनडीटीएफ अध्यक्ष ए.के. भागी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। धन्यवाद ज्ञापन एनडीटीएफ के महासचिव डा. वीरेन्द्र सिंह नेगी ने और संचालन डा. गीता भट्ट ने किया। इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के कई शिक्षक व शोधार्थी उपस्थित थे।
स्वदेशी जागरण मंच द्वारा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत् 2073 नववर्ष का स्वागत समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य, स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक श्री अरुण ओझा, राष्ट्रीय संगठक श्री कश्मीरी लाल व अखिल भारतीय सह संयोजक श्री सरोज मित्तल ने कार्यकर्ताओं को संबोधित कर नववर्ष की बधाई दी।
डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि अतीत में भारत पर 800 वर्षों तक मुसलमानों का शासन था उन्होंने कन्वर्जन के हरसंभव प्रयास किये। लेकिन केवल 12 प्रतिशत हिन्दुओं को ही मुसलमान बना पाए, 150 वर्षों तक अंग्रेजों का शासन रहा उन्होंने भी कन्वर्जन के अनेक प्रयास किये लेकिन 2 प्रतिशत से अधिक लोगों का धर्म परिवर्तन नहीं कर पाए। इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि हमारा समाज शासनों पर आधारित नहीं था। समाज की रचना हमें करनी है तो अपने पुरुषार्थ के बलबूते पर कुछ कार्य-रचनाएं खड़ी करने का प्रयास करना होगा। 1,60,000 सेवा कार्य संघ के स्वयंसेवक देशभर में चलाते हैं। 90 प्रतिशत सेवा कार्य सरकार की मदद के बिना समाज के बलबूते चल रहे हैं। राज्य आधारित नहीं, हम समाज के नाते अपने बलबूते पर अपना काम खड़ा करेंगे। समन्वय, परहित, दूसरों को देने का वातावरण संभवत: बनेगा तो हमारा देश अपने आप आगे बढेगा।
श्री कश्मीरी लाल ने कहा कि विक्रमी संवत् हमें सात्विकता की प्रेरणा देते हुए शरीर में नई ऊर्जा का संचार करता है।
श्री अरुण ओझा ने कहा कि नववर्ष शक्ति की उपासना का पर्व है। कार्यक्रम के समापन पर श्री अश्विनी महाजन ने सभी अधिकारियों व कार्यकर्ताओं का धन्यवाद दिया।
अमरावती
नववर्ष के स्वागत में संस्कार भारती की स्थानीय इकाई द्वारा 'पाडवा पहाट' कार्यक्रम आयोजित किया गया।
गुड़ी पाड़वा के दिन प्रात: साढ़े पांच बजे अमरावती के 5,000 से अधिक नागरिकों की उपस्थिति में संस्कार भारती के करीब सौ से अधिक स्थानीय कला साधक नृत्य, संगीत, नाट्य, चित्रकला आदि विधाओं के माध्यम से किसी एक विषय को लेकर एक सुरुचिपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करते हैं। इस वर्ष भी कार्यक्रम में दर्शकों की रिकॉर्ड भीड़ रही। कार्यक्रम के मध्य नववर्ष का सूयार्ेदय होते ही 'गुड़ी' का पारंपरिक पद्घति से पूजन किया गया, जिसमें राजस्व राज्यमंत्री डॉ. रणजीत पाटील, विधायक डा. सुनील देशमुख, कमिश्नर ज्ञानेश्वर राजूरकर आदि उपस्थित थे।
इस वर्ष के कार्यक्रम का विषय 'भारतमाता की जय' था, वारकरी पंथ ने सामाजिक समरसता के विषय में किये प्रयास, देशभक्तों की आहूतियां आदि विषयों को प्रभावी रूप से नृत्य, नाट्य, संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम में विदर्भ के करीब सभी गांव व कस्बों के लोग उपस्थित रहे।
मुरादाबाद
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा गांधी नगर पार्क में वर्ष प्रतिप्रदा एवं संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जयंती उत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में स्वयंसेवकों ने शारीरिक, योग, दण्ड, समता आदि का प्रदर्शन किया। मुख्य वक्ता के रूप में क्षेत्र शारीरिक प्रमुख श्री रणवीर सिंह ने भारतीय कालगणना को सर्वाधिक पुरातन, श्रेष्ठ एवं पूर्णत: वैज्ञानिक बताया। कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री भोपाल सिंह अध्यक्ष मुरादाबाद एलपीज़ी. गैस वितरण संघ ने नव संवत्सर के शुरू होने की शुभकामनाएं दीं। गांधी पार्क पर संचलन का समापन हुआ। संचलन का महानगर में अनेकों स्थानों पर लोगों द्वारा पुष्पवर्षा कर स्वागत किया गया।
इस अवसर पर श्री अजय, विभाग संघचालक, श्री हरिकृष्ण महानगर संघचालक, कवीश राना महानगर कार्यवाह, रवि, सुभाष, सुभाष शर्मा, महेंद्र, अजय गोयल, ओम प्रकाश, संदीप, नीरज, अशोक सिंघल, ब्रिजेश,  अर्पित, नमन जैन आदि उपस्थित थे
गुरुग्राम
गौशाला मैदान में अर्घ्यदान के कार्यक्रम में पूरे शहर से सैकड़ों बन्धु-बहनों ने भाग लिया। प्रात: 5  बजे उगते सूर्य की प्रथम रश्मियों को अर्घ्य देने के लिए शहर भर से लोग जुटे।
प्रख्यात अर्थशास्त्री व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर क्षेत्र के संघ चालक डॉ. बजरंग लाल गुप्त ने कहा कि भारतमाता की जय बोलने वालों की संख्या निरन्तर बढ़नी चाहिए। भारत में रहने वाला भारत की जय नहीं बोलेगा तो किसकी बोलेगा। मुख्य अतिथि हरियाणा कला परिषद के निदेशक श्री अजय सिंहल ने कहा कि हरियाणा सरकार कला के माध्यम से भारतीय मूल्यों व संस्कृति को बचाने के लिए वचनबद्घ है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष मेजर दीनदयाल सैनी ने धन्यवाद किया। इस अवसर पर हरियाणा कला परिषद की ओर से मंचीय प्रस्तुतियों का प्रदर्शन किया गया और शीतला माता गुरुकुल की ओर से आए बटुकों द्वारा आदित्य हृदय स्त्रोत्र व चाक्षुसी विद्या का पाठ किया गया। मंच संचालन श्री राम बहादुर सिंह ने किया, जबकि संयोजन श्री श्रवण दुबे व यशवंत शेखावत द्वारा किया गया।
गोहाना
संस्कार भारती की गोहाना इकाई ने नववर्ष अभिनन्दन समारोह आयोजित किया। सुबह 5.45  पर ध्येय गीत से प्रारंभ कार्यक्रम की अध्यक्षता विक्रम सैनी ने की। इस अवसर पर उनके सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए , माधव गंगनेजा ने जहां युवा पीढ़ी को देशभक्ति का पाठ पढ़ाया वहीं कुमारी खुशबू ने भारतीय नववर्ष की महत्ता बताती कविता प्रस्तुत की। सरस्वती विद्या निकेतन के बच्चों ने सामूहिक देशभक्ति गीत से मन मोहा तो रमन ने बदलती जीवन शैली को सांस्कृतिक रूप देने पर बल दिया। मुख्य अतिथि समाजसेवी अरुण बड़ौक, प्रान्त कोषाध्यक्ष राकेश गंगाना व जितेन्द्र पांचाल ने अपने विचार रखे। संयोजन संतलाल रोहिल्ला व बादल मधु ने किया।
इलाहाबाद
नव संवत्सर के अवसर पर 8 अप्रैल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयाग उत्तर जिले में स्वयंसेवकों ने बारह स्थानों पर एक साथ और एक ही समय पथ संचलन किया। लोगों ने कई स्थानों पर स्वयंसेवकों पर फूलों की वर्षा कर स्वागत किया।
संघ कार्यालय जॉर्जटाउन से आजाद नगर के पथ संचलन में बाल स्वयंसेवकों के साथ ही कई वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए। यह पथ संचलन चिन्तामणि मार्ग होते हुए सरस्वती हार्ड केयर चौराहे, बालसन चौराहे और गांधी प्रतिमा के पास से वापस संघ कार्यालय पर समाप्त हुआ। इसी तरह भारद्वाज पार्क से शुरू होकर कर्नलगंज कटरा बाजार, वापस भारद्वाज पार्क पर समाप्त हुआ। विश्वविद्यालय नगर और एनी बेसेन्ट स्कूल भगीरथ नगर से शुरू होकर चौथम लाइन होते हुए पुन: वहीं जाकर समाप्त हुआ। दयानन्द नगर, त्रिवेणी नगर, श्रीकृष्ण नगर, साकेत नगर, गंगा नगर में रसूलाबाद ज्वाला देवी, गोविन्दपुर नगर में श्रीराम पार्क से शुरू होकर विभिन्न मागार्े से होते हुए स्वयंसेवकों ने पथ संचलन किया।
पथ संचलन में प्रमुख रूप से विभाग प्रचारक मनोज, जिला प्रचारक अनुराग, विभाग कार्यवाह नागेन्द्र, जिला कार्यवाह संजीव, जिला संघचालक वेंकटेश्वर, विभाग कार्यवाह मनीष के नेतृत्व में हजारों स्वयंसेवकों ने कुल 48 किमी. पथ
संचलन किया।    -प्रतिनिधि

क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ? : संजय राउत



अतिथि लेखक - क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है?
तारीख: 18 Apr 2016 12:43:21

एक वर्ग ऐसा है जिसने हमेशा देश विरोधी बातें की हैं और उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया है, और भारत ऐसे लोगों को बर्दाश्त करता रहा है
संजय राउत
(लेखक राज्यसभा सांसद एवं प्रमुख मराठी समाचार पत्र 'सामना' के संपादक हैं)

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में इन दिनों काफी कहा और लिखा जा रहा है। हमारे देश में इस शब्द 'स्वतंत्रता' का मतलब क्या है? हमने स्वतंत्रता की वास्तविक अवधारणा को कभी समझा ही नहीं।  इस कारण पीढियों में स्वतंत्रता क्या होनी चाहिए और क्या नहीं इसे लेकर एक अबूझ भ्रम की स्थिति बनी हुई है। हमारे देश में स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है इसे लेकर कौतुहल बना हुआ है। हम ऐसे लोग हैं जो भगवान जाने किससे स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हममें स्पष्ट समझ नहीं है, हममें जीवन की सही समझ ही नहीं है; और हम कुछ निश्चित विचारों और अवास्तविक विश्वासों से ही स्वतंत्र नहीं हुए हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर वाल्टर ने कहा है, ''आप जो भी कहते हैं वह मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं है, लेकिन आपको वह बात कहने का पूरा अधिकार है जो आप कहना चाहते हैं। यदि कोई आपको आपके इस अधिकार से वंचित करना चाहता है तो मैं आपके लिए संघर्ष करुंगा।'' लोग जो कुछ कहते हैं उस सब पर हमें सहमत होने की कोई जरूरत नहीं है, लोगों के अपने-अपने विचार हो सकते हैं और फिर भी वे एक साथ रह सकते हैं। जरूरी नहीं कि जो लोग हमारे विचारों से सहमत नहीं, वे हमारे दुश्मन हों।

महान अमेरिकी न्यायाधीश होम्स ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस तरह से परिभाषित किया है, ''अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यह नहीं है कि हम उन्हें बोलने दें जिनके विचारों से हम सहमत हैं बल्कि उन्हें बोलने का अवसर देना है जिनसे हम नफरत करते हैं।'' तमाम राजनैतिक दलों के प्रति रूझान रखने वाले और सभी विचारधाराओं के लोगों को अभिव्यक्ति का अवसर मिलना चाहिए, यही लोकतंत्र है। लेकिन हमारे देश में इस तरह की आजादी की अधिकता हो चुकी है। असामाजिक तत्वों को भी अपने देश विरोधी विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए मंच मिल रहा है जो देश के लिए खतरनाक हो सकता है, इससे युवाओं में गलत संदेश जाएगा और  न केवल देश का माहौल खराब होगा बल्कि सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित होगा।

जेएनयू में जो कुछ हुआ वह लोकतंत्र का उपहास था। ''अफजल गुरू जिंदाबाद और ''हम भारत को टुकड़ों में बांट देंगे'' ये नारे कहीं से भी अभिव्यक्ति के आस-पास नहीं थे, इन्हें केवल आतंकवाद से जोड़ा जा सकता है। अफजल गुरू जैसे लोगों ने देश की संपूर्णता और आजादी को कमजोर करने, तोड़ने और उस पर हमला करने की कोशिश की। सर्वोच्च अदालत ने उसे मौत की सजा सुनाई।

जिन लोगों को इस तथ्य पर भरोसा नहीं उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी पर बात करने का अधिकार नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी विचारों का वही लोग समर्थन कर सकते हैं जिनका देश के लिए कोई योगदान नहीं है।

एक वर्ग है जिसने हमेशा देश विरोधी बातें की हैं और उसे आजादी का नाम दिया है। अपने विचारों को व्यक्त करने के नाम पर ऐसे लोगों ने खासतौर पर आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। और भारत ऐसे लोगों को बर्दाश्त करता रहा है। एक तरफ हमारी सेना के जवान देश के लिए अपनी जान दे रहे हैं, उसी समय हम कश्मीर को तोड़कर भारत से अलग करने की बातें बर्दाश्त कर रहे हैं। ये केवल भारत में ही हो सकता है।
ओवैसी जैसा व्यक्ति कह सकता है, ''यदि मेरी गर्दन काट दोगे तब भी मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा'' और उसके बाद भी वह देश में एक संवैधानिक स्थिति में रह सकता है। ये हमारे देश का दुर्भाग्य और अभिव्यक्ति की आजादी है कि हम बेमतलब की बातें बर्दाश्त कर रहे हैं। किसी भी चीज की अधिकता नुकसानदेह होती है, और अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में भी ऐसा ही है। देश में कोई भी व्यक्ति समान नागरिक संहिता और अनुच्छेद 370 पर स्टैंड नहीं लेता लेकिन लोगों की जिंदगियों में हिंसा और जहर घोलने वाले देश विरोधी लोगों को सारे अधिकार दिए जाते हैं।

हमारे देश को सबसे बड़ा खतरा बाहरी लोगों से नहीं है लेकिन भीतर के ऐसे लोगों से हैं जो हमारी मजबूत जड़ों को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। सीमा पर होने वाले हमलों से ज्यादा देश के भीतर रहने वाले कुछ लोग देश को डराते हैं। इसे सही तरह से नियंत्रित करके ही देश को बचाया जा सकता है। ऐसे तत्वों का दमन और राष्ट्रवादी तत्वों, चाहे वे जेएनयू में संघर्ष कर रहे हों या एनआइटी, श्रीनगर में, का समर्थन करने की जरूरत है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश के मूलाधार पर चोट करने की इजाजत किसी को नहीं मिलनी चाहिए। लोगों को सचेत रहना होगा और विविधता में एकता के जरिए देश की अखंडता की रक्षा करनी होगी। राष्ट्र पहले है, बाकी सब चीजें बाद में।


कांग्रेस के पाप बनाम भगवा आतंक : हरि शंकर व्यास

कांग्रेस के पाप व भगवा आतंक! भाग 1

: हरि शंकर व्यास (नया इंडिया में प्रकाशित)
पता नहीं सोनिया गांधी और राहुल गांधी को शर्म आई या नहीं! पर डा. मनमोहन सिंह को आनी चाहिए। आखिर बतौर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के कलंक अभी भी खुल रहे हैं। उन्हें शर्म आनी चाहिए कि वे ऐसे प्रधानमंत्री हुए जिनकी छत्रछाया में चिदंबरम के नाम का एक ऐसा गृहमंत्री था जिसने अपने हाथों एक आरोपी आतंकी की हकीकत के हलफनामे को बदला। सोचें, भारत का गृहमंत्री ऐसा जिसने सरकार की ही एजेंसियों की रिपोर्ट, आकलन के विपरीत अपनी बात थोपी। किसलिए? ताकि नरेंद्र मोदी, अमित शाह, उनकी सरकार झूठे हत्यारा बनें। वे फर्जी मुठभेड़ के मामले में फंसें। देश, दुनिया, अदालत जाने कि हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति करने वाले कैसे हत्यारे हैं! उन दिनों को याद करें तो कांग्रेस ने चौतरफा हिंदुओं को बदनाम करने की मुहिम चलाई थी। हिंदू की वैश्विक बदनामी का वह मिशन था जिसमें दिग्विजय सिंह से ले कर राहुल गांधी तक ने प्रचार किया था कि भारत में ‘भगवा आतंकवाद’ भी है।

हां, याद है आपको साध्वी प्रज्ञा, स्वामी असीमानंद, कर्नल पुरोहित के नाम? याद है अभिनव भारत और उसकी मालेगांव साजिश? मतलब ‘हिंदू आतंकवाद’ की प्रायोजित कालिख! उसे याद कर इशरत जहां मामले के ताजा खुलासे के साथ सोचें तो लगेगा कि कांग्रेस, मनमोहन सिंह, चिदंबरम एंड पार्टी ने ही तो हिंदुओं को बदनाम करने के लिए इन चेहरों को झूठ मूठ में फंसा कर ‘हिंदू आतंकवाद’ का हल्ला पैदा करने की साजिश तो नहीं बनाई थी?
यह सवाल ‘द इकोनोमिक टाइम्स’ में कल छपी रिपोर्ट और पिछले 6-8 सालों की जांच, उसके नतीजों की हकीकत पर भी बना है। कल रपट थी कि अभिनव भारत के यशपाल भड़ाना ने मजिस्ट्रेट के आगे बयान दे कर कहा है कि स्वामी असीमानंद को फंसाने के लिए उस पर ‘दबाव’ डाला गया। दबाव के चलते उसने झूठ बोला कि जनवरी 2008 में वह फरीदाबाद की हरी पर्वत बैठक में, अप्रैल की भोपाल बैठक में था। इनमें विचार हुआ था कि बम का बदला बम से लेना है।

इस खबर पर चाहे तो आप मान सकते हैं कि फिलहाल क्योंकि मोदी की सरकार है इसलिए एनआईए उसके असर में होगी। उसने इस गवाह से नया बयान करवा दिया। इस बात को मालेगांव बम विस्फोट के मामले में एनआईए की तरफ से पेश होने वाली रोहिणी सालियान के बयान से भी जोड़ सकते हैं। रोहिणी ने केस से हटते हुए आरोप लगाया था कि एनआईए अब हिंदू कट्टरपंथियों के प्रति नरमी बरतने का दबाव बना रही है।
मतलब इशरत जहां की हकीकत खुल रही है, हिंदू आतंकवादी असीमानंद को फंसाने वाला गवाह पलट रहा है तो यह मोदी सरकार का प्रायोजन है। यदि ऐसा है तब पी. चिदंबरम, डा. मनमोहन सिंह, कांग्रेस खुल कर मैदान में क्यों नहीं आते? क्यों नहीं कहते कि इशरत जहां को निर्दोष मानने की उनकी वजह अभी भी कायम है?



कांग्रेस के पाप व भगवा आतंक! भाग 2
: हरि शंकर व्यास

बोलें, बताएं तथ्य।
इससे अधिक संगीन हकीकत भगवा आतंक का हल्ला कराने की कांग्रेसी साजिश की है। 2008 से ले कर मई 2014 तक चिदंबरम के गृहमंत्री रहते, डा. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते अदालत के आगे हिंदू आतंकवादियों उर्फ असीमानंद, कर्नल पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ सबूत, अदालत में चार्जशीट तक दायर नहीं की जा सकी। मान सकते हैं कि 2014 से 2016 के बीच मोदी सरकार स़ॉफ्ट है। पर रोहिणी सालियान या हिंदू आतंकियों के होने की बात मानने वालों को यह तो बताना चाहिए कि मनमोहन सिंह की ‘हार्ड’ सरकार और उस वक्त की एनआईए क्योंकर प्रमाण, चार्जशीट नहीं पेश कर पाई? इतना बड़ा केस जिससे मनमोहन सरकार ने पूरी दुनिया में हिंदुओं के ‘भगवा आतंकवादी’ चेहरे दिखाए, उसकी वैश्विक बदनामी कराई, उसमें भी यदि अदालत के आगे तथ्य नहीं आए और जो गवाह पेश किए गए वे बदलते गए तो दुनिया में हिंदू को बदनाम करने की सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन, चिदंबरम एंड पार्टी की जिम्मेवारी बनती है या नहीं?
मीडिया अपना क्योंकि नेताओं के असर में रहता है इसलिए वह नरेंद्र मोदी, अमित शाह की वजह से आज इशरत जहां मामले में हुई धांधली को प्रचारित कर रहा है पर असलियत में उसे भंडाफोड़ यह करना चाहिए कि हिंदू को दुनिया में बदनाम करने के लिए सोनिया गांधी व कांग्रेस ने 2006 से 2014 के बीच कैसी साजिश रची हुई थी? हिंदू को बदनाम करने वाला भगवा आतंकवाद कितने झूठों से भरा था?
हां, यह तथ्य अब बनता है कि मनमोहन सरकार ने झूठ को सच, सच को झूठ बनवाने के लिए ‘एनआईए’ एजेंसी बनवाई। एक मोटा तथ्य जानें। 2006 में मालेगांव में बम धमाकों में 31 लोग मारे गए थे। महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी दस्ते यानी एटीएस ने नौ मुस्लिम आरोपी गिरफ्तार किए। 2006 के अंत में इनके खिलाफ चार्जशीट हुई। बाद में मामला सीबीआई को सौंपा गया। उसने 2010 में इन्हीं आरोपियों के खिलाफ एक और चार्जशीट दाखिल की। मगर 2011 में जांच एनआईए ने अपने हाथ में ली। तभी हल्ला हुआ कि यह करतूत हिंदू कट्टरपंथियों की है।
घटना को दस साल हो गए हैं अदालत के आगे दोनों तरह के वाद हैं। मूल जांच क्या थी, क्या हुई और पहुंची कहां? इसके चपेटे में कर्नल पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा इतने साल से जेल में हैं तो इसलिए कि उन पर महाराष्ट्र का माफिया रोधी मकोका एक्ट लगा हुआ है। उसमें जमानत नहीं हो सकती। मनमोहन सरकार, चिदंबरम ने, एनआईए सबने दम लगाया लेकिन भगवा आतंकवाद के साक्ष्य या तो बनावटी निकले हैं या गवाह दबाव वाले पाए गए। सुप्रीम कोर्ट में बताया जा चुका है कि मकोका के तहत चार्जशीट लायक साक्ष्य नहीं मिले हैं।
क्या अर्थ निकालें?

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

अमेरिका महाद्विप में आर्य सभ्यता की छाप

अमेरिका महाद्विप में आर्य सभ्यता की छाप
अश्विन भट्ट


कभी हिन्दू संस्कृति से समृद्ध था अमेरिका महाद्वीप हिन्दू धर्म “धीयते इति धर्मः” यानि “मनुष्य अपनी धारणा
जो स्वीकार करता है वो ही धर्म है” के सिद्धांत पर चलता है | रोम संस्कृति के राजा के विरुद्ध ईसामसीह ने अल्लाह को परमेश्वर कहा तो राजद्रोह में मृत्युदंड मिला… इसाइयत को अपनी संख्या बढ़ाना था तो उसने धर्मांतरण को और चर्च आधारित राजनीति और कूटनीति से अनुयायियों की संख्या बढ़ाया क्यों की उसको डर था की संख्या कम रहेगी तो इसाइयत के विरोधी उसका खात्मा कर देंगे | इस्लाम ने हिजरत से ही हथियार थाम लिया और उसे अपनी संख्या बढ़ाने के लिए गुलामों पर अत्याचार कर के और क्रूरता से लोगों को मुसलमान बनाया क्यों की रोम की विशाल सत्ता के विपरीत अरब में छोटी छोटी आबादी और उनके खलीफा होते थे जिन्हें हथियारों से हराया जा सकता था | हिन्दू धर्म ने कभी किसी को जबरन हिन्दू नहीं बनाया, क्योंकि ये सनातन सभ्यता के ऊपर किसी विरोधियों या शत्रुओं का भय नहीं था की अपनी आबादी बढाओ | इतिहास देखो हमारी संस्कृति ने “पृथ्वी शान्तिः” “अन्तरिक्षम शान्ति” का उद्घोष किया है| अयोध्या” संस्कृत के अयुध्य शब्द से बना है यानि जहाँ कभी युद्ध न हुआ हो | 

अवध का भी सामान अर्थ है की जहाँ पर कभी “वध” न हुआ हो | ये अलग बात है की मुग़ल आक्रान्ताओं और लुटेरों ने इसे नरसंहार का सबसे बड़ा अखाडा बना दिया | हमारे हिन्दू मनीषियों ने अपने संस्कृति को इतना श्रेष्ठ बनाया की पूरा विश्व उसकी ओर आकर्षित हुआ | फाह्यान, ह्वेनसांग और तुम्हारे अलबरूनी जैसे कितने मुल्ले भी यहाँ इस देश की माटी में धन्य होने और मुक्ति पाने आ गये थे | इस्लाम के अभ्युदय के हज़ारों साल पहले पूरा संसार आर्यों ने नाप लिया था| आज युरोप जिसे “navigation” कहता है वो कुछ और नहीं संस्कृत शब्द “नवगतिम” है जिसका अर्थ है नौका संचालन| पूरे विश्व को नौका संचालन का ज्ञान आर्यों ने ही दिया है | भले ही आज हम मुर्ख भारतीय कहते हैं की भारत की खोज “वास्कोडिगामा” ने किया था |

अमेरिका महाद्वीप और हिन्दू धर्म :
अमेरिका के रेड इंडियन वहां के आदि निवासी माने जाते हैं और हिन्दू संस्कृति वहां पर आज से हजारों साल पहले पहुंच गई थी इन्ही लाल मनुष्यों के द्वारा यानी की इतिहासकारों के आधार पर महाभारत काल में| सभी अमेरिकन इतिहासकार मानते हैं की भारतीय आर्यों ने ही अमेरिका महाद्वीप पर सबसे पहले बस्तियां बनाई | अमेरिकन महाद्वीप में मक्सिको सबसे पुराना है | मैक्सिको के सबसे आदि धर्म AZTEC के देवता TLALOC हैं और ये AZTEC और कुछ नहीं अपितु संस्कृत का “आस्तिक” ही है और TLALOC, संस्कृत का
शब्द त्रिलोक है | मेक्सिको में TLALOC की पूजा का इतिहास AZTEC साम्राज्य के इतिहास से भी १००० साल
पुराना है | मजे की बात यह है की त्रिलोक (TLALOC) के मदिरों को वहां त्रिलोचन (TLALOCAN) कहा जाता है और उनका सबसे महत्वपूर्ण मंदिर “Mount Tlaloc” पर स्थित है यानि हिमालय वासी शिव का त्रिलोचन स्वरुप उसी रूप में वहां पहुंचा | TLALOC को वहां के लोग गुफाओं, झीलों और पर्वतों का वासी मानते हैं और अकाल मृत्यु से मुक्ति का देवता भी | हमारे सनातन संस्कृति में भी शिव मुक्ति दाता हैं |

यदि हम बात करें वहां के मूल भाषा पुरानी नौहाटी की तो उसमे इसका उच्चारण “त्रालोक” से करते हैं | त्रिलोक की एक मूर्ती Templo Mayor (मयूर मंदिर) में आज के वर्तमान मक्सिको सिटी शहर में है | जिसमे त्रिलोक की
मूर्ती में मुकुट पर सर्प विराजमान है | यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत घोषित किया है | उसी के साथ माया सभ्यता का भी प्रभाव मक्सिको पर पड़ा जो की हिन्दू संस्कृति से बहुत कुछ आत्मसात कर चुकी थी विशेषकर पंचांग और गणित |

चिली पेरू और बोलीविया में हिन्दू धर्म :
अमेरिकन महाद्वीप के बोलीविया (वर्तमान में पेरू और चिली) में हिन्दुओं ने अपनी बस्तियां बनाएँ और कृषि का भी विकास किया | Quechua Pachakutiq “he who shakes the earth” की महान घटना कुर्म पुराण के “कच्छप प्रिष्ठौती” है और वही एक सामान पौराणिक कथा भी |

प्रसिद्द थिअहुअन्को के कैलासिय मंदिर “Temple of Kalasasaya” के द्वारपाल विरोचन, सूर्य द्वार, चन्द्र द्वार सब कुछ हिन्दू संस्कृति की महान गाथा का साक्षी है | सांप या नाग, हिंदू धर्म के सभी पंथ महत्वपूर्ण है और यहां
तक कि अमेरिका में, अभी भी बहुत स्थानों में प्रचलित है जो प्राचीन अमेरिका के व्यापक नाग पंथ और उसके समानता के प्रति समर्पित हैं | यहां तक कि ईसाई धर्म में, यीशु ने बाइबिल में कहा : “तु रहो नागों, और कबूतर के रूप में हानिरहित के रूप में इसलिए बुद्धिमान. “मूसा ने अपने भगवान से निर्देशन में बेशर्म नाग की स्थापना करके लोगों को चंगा किया | रोमन और ग्रीक में प्रचलित शब्द serpent संस्कृत शब्द “सर्प” ही है |प्राचीन हिन्दुओं की पूजा पधतियों ने अमेरिका पर प्रभुत्व किया|

संयुक्त राज्य अमेरिका की आधिकारिक सेना के नेटिव अमेरिकन की एक ४५वि मिलिट्री इन्फैन्ट्री डिविसन का चिन्ह एक पीले रंग का स्वास्तिक था | नाजियों की घटना के बाद इसे हटाकर उन्होंने गरुण को चिन्ह अपनान पड़ा | अमेरिकी महाद्वीप के होपी आदिवासीयों का एक महत्वपूर्ण घटना की गाथा “Saquasohuh” “Day of Purification” (संस्कृत : स्वच्छ होहु) में Blue Star Kachina की घटना में वर्णित ८ प्रमुख चिन्हों में वृष आरूढ़ शिव और नागों से लिपटती धरती का वर्णन है जो हमारे पौराणिक गाथाओं से पूरा पूरा मिलता है | 

अमेरिकी महाद्वीप के पेमा इंडियन की गाथा हिन्दू गरुण के थंडर बर्ड और क्रेते सिक्कों के चक्रव्यूह की रचना सभी भारतीय प्रवासों की गाथा कह रहे हैं | प्राचीन अमेरिका महाद्वीप के पेमा इंडियन हों या रोमन साम्राज्य (युरोप)में मिलने वाला लोकप्रिय खेल “करेते”Crete (Greek: Κρήτη, Kríti) या Labyrinth वास्तव में भारत के प्रसिद्द चक्रव्यूह भेदन की कृति है और यही कृति वहां करेते बन गई महाभारत काल से ही चक्रव्यूह भेदन और धनुर्विद्या भारत के लोकप्रिय खेल थे | यूरोप में भी युद्ध के खेलों का बहुत प्रचलन था और चक्रव्यूह भेदन की कला करेते के लोकप्रिय आयोजन होते थे, इसी कारण आज भी मैराथन खेलों के लिए विश्व प्रसिद्द ग्रीस का सबसे सुन्दर और प्रसिद्द स्थान का नाम “करेते” Crete है और ये शहर अपने खेलों, संगीत और साहित्य के लिए आज भी प्रसिद्ध है| ये शहर यूरोप के सबसे पुराने ज्ञात मानव सभ्यता के लिए जाना जाता है |

गुयाना : दक्षिण अमेरिका के गुयाना में १५० साल पहले उत्तर प्रदेश और बिहार से लोगों का पलायन हुआ था | आज वहां की आबादी के ४०% लोग हिन्दू है और वहां फगुआ और दीपावली राष्ट्रीय त्यौहार घोषित है | भारतीय भाषा में हिंदी भोजपुरी बोली जाती है |

सूरीनाम : इस देश का नाम ही भोजपुरी शब्द सरनाम से सूरीनाम पड़ा जिसका मतलब है प्रसिद्ध | ३० % हिन्दुओं के साथ हिन्दू देश का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है | गिरमिटिया मजदूरों के समूह में वहां गन्ने के खेतों में काम करने गए हिन्दू आज उन देशों की राजनीति में ऊंचे स्थानों पर हैं और दक्षिण अमेरिका में एक शसक्त पहचान के साथ उभरे हैं |
जमैका : जमैका में हिन्दू दूसरा सबसे बड़ा धर्म है | ये हिन्दू गिरमिटिया मजदूर के रूप में वहां पहुचे और दीवाली देश की राष्ट्रीय छुट्टी है |
त्रिनिदाद एवं टोबैगो : इस देश में हिन्दू ३० % हैं | और हिन्दुओं का राजनीति पर बेहद मजबूत पकड़ है | सनातन धर्म महासभा के माध्यम से हिन्दू धर्म इस देश में सबसे तेजी से मजबूत हो रहा है | फगवा सबसे बड़ा त्यौहार है | वासुदेव पाण्डेय यहां के प्रधानमंत्री रह चुके हैं और कमला प्रसाद बिस्वेस्वर देश की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं | और रोचक बात ये है की मशहूर रैपर और गायिका निकी मीनाज इसी देश की एक हिन्दू ब्राह्मण की बेटी हैं जिनका वास्तविक नाम ओनिका तान्या महाराज है| प्रसिद्ध पिपिल भाषा जो मेक्सिको में प्रारंभ हुई वो हिन्दुस्तानी नाविकों की बस्तियों में प्रारम्भ हुआ और वहां इसे आज भी नाविक (nawat) भाषा कहते है इसी प्रकार nahua भी संस्कृत के नाविक से निकली है | पूरा मेसो अमेरिकन सभ्यता हिन्दू धर्म से भरी पड़ी है | यहाँ तक की आज की स्पेनिश भाषा जो मेक्सिको और अमेरिका की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है वह भी हिंदी-यूरोपीय भाषा परिवार है | हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार (Indo-European family of languages) दुनिया का सबसे बड़ा भाषा परिवार (यानी कि सम्बन्धित भाषाओं का समूह) हैं । हिन्द-यूरोपीय (या भारोपीय) भाषा परिवार में विश्व की सैंकड़ों भाषाएं और बोलियां सम्मिलित हैं ।
आधुनिक हिन्द यूरोपीय भाषाओं में से कुछ हैं : हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी, फ़्रांसिसी, जर्मन, पुर्तगाली, स्पैनिश, डच,
फ़ारसी, बांग्ला, पंजाबी, रूसी, इत्यादि । ये सभी भाषाएँ एक ही आदिम भाषा से निकली है | स्पेनिश का बोय्नेस दियास में दियास हमारा “दिवस” है जिसका अर्थ है गुड मार्निंग |

आदिम-हिन्द-यूरोपीय भाषा (Proto-Indo-European language), जो संस्कृत से काफ़ी मिलती-जुलती थी, जैसे
कि वो संस्कृत का ही आदिम रूप हो ।
Annotata : अन्नदाता
Banff : वाष्प
Bahia : बाहु (हाथ)
Cuika : कविता
Chocaya : शोकः
Chaacâ : चक्र देवी (माया सभ्यता)
Huascar : भास्कर (सूर्य)
Havana : हवन
Wanaco : वन वासी (जंगली)
Jaguarâ : व्याघ्र
Montezuma/Moktesuma : मुक्ति कुसुमः
Matawan : मात्री वन
Nazca/Naska : नक्षत्र
Papeetee : पाप इति
Palenque : पालक (मंदिर के देवता)
इस तरह के बहुत शब्द हैं जो आर्यों की वैदिक परम्पराओं से
वहां तक पहुंचे|
मनुष (संस्कृत) >> menos (यूनानी) >> mens(लैटिन) >> men (अंग्रेजी)|
आज पूरा विश्व खुद को मनुष्य यानि मनु की संतान कहता है
| यही तो सनातन का गौरव है 

दुनियाभर की धार्मिक संस्कृति में हिन्दू धर्म की झलक





सनातन धर्म के 90 हजार से भी ज्यादा वर्षों के लिखित इतिहास में लगभग 20 हजार वर्ष पूर्व नए सिरे से वैदिक धर्म की स्थापना हुई और नए सिरे से सभ्यता का विकास हुआ। विकास के इस प्रारंभिक क्रम में हिमयुग की समाप्ति के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला। वेद और महाभारत पढ़ने पर हमें पता चलता है कि आदिकाल में प्रमुख रूप से ये जातियां थीं- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, भल्ल, वसु, अप्सराएं, रुद्र, मरुदगण, किन्नर, नाग आदि। प्रारंभ में ब्रह्मा और उनके पुत्रों ने धरती पर विज्ञान, धर्म, संस्कृति और सभ्यता का विस्तार किया। इस दौर में शिव और विष्णु सत्ता, धर्म और इतिहास के केंद्र में होते थे। देवता और असुरों का काल अनुमानित 20 हजार ईसा पूर्व से लगभग 7 हजार ईसा पूर्व तक चला। फिर धरती के जल में डूब जाने के बाद ययाति और वैवस्वत मनु के काल और कुल की शुरुआत हुई। दुनियाभर की प्राचीन सभ्यताओं से हिन्दू धर्म का कनेक्शन था। संपूर्ण धरती पर हिन्दू वैदिक धर्म ने ही लोगों को सभ्य बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक विचारधारा की नए-नए रूप में स्थापना की थी। 

आज दुनियाभर की धार्मिक संस्कृति और समाज में हिन्दू धर्म की झलक देखी जा सकती है चाहे वह यहूदी, यजीदी, रोमा, पारसी, बौद्ध धर्म हो या ईसाई-इस्लाम धर्म हो। अफगानिस्तान पहले था हिन्दू राष्ट्र भातीय लोगों ने इस दौर में विश्‍वभर में विशालकाय मंदिर, भवन और नगरों का निर्माण कार्य किया किया था। हिन्दू धर्म ने अपनी जड़ें यूरोप से लेकर एशिया तक फैला रखी थी, जिसके प्रमाण आज भी मिलते हैं। आज हम आपको विश्व की ऐसी ही जगहों के बारे में बता रहे हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि यहां कभी हिन्दू धर्म अपने चरम पर हुआ करता था। 1.सिन्धु-सरस्वती घाटी की हड़प्पा एवं मोहनजोदोड़ो सभ्यता (5000-3500 ईसा पूर्व) : हिमालय से निकलकर सिन्धु नदी अरब के समुद्र में गिर जाती है। प्राचीनकाल में इस नदी के आसपास फैली सभ्यता को ही सिन्धु घाटी की सभ्यता कहते हैं। इस नदी के किनारे के दो स्थानों हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान) में की गई खुदाई में सबसे प्राचीन और पूरी तरह विकसित नगर और सभ्यता के अवशेष मिले। इसके बाद चन्हूदड़ों, लोथल, रोपड़, कालीबंगा (राजस्थान), सूरकोटदा, आलमगीरपुर (मेरठ), बणावली (हरियाणा), धौलावीरा (गुजरात), अलीमुराद (सिंध प्रांत), कच्छ (गुजरात), रंगपुर (गुजरात), मकरान तट (बलूचिस्तान), गुमला (अफगान-पाक सीमा) आदि जगहों पर खुदाई करके प्राचीनकालीन कई अवशेष इकट्ठे किए गए। अब इसे सैंधव सभ्यता कहा जाता है। 

हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में असंख्य देवियों की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। ये मूर्तियां मातृदेवी या प्रकृति देवी की हैं। प्राचीनकाल से ही मातृ या प्रकृति की पूजा भारतीय करते रहे हैं और आधुनिक काल में भी कर रहे हैं। यहां हुई खुदाई से पता चला है कि हिन्दू धर्म की प्राचीनकाल में कैसी स्थिति थी। सिन्धु घाटी की सभ्यता को दुनिया की सबसे रहस्यमयी सभ्यता माना जाता है, क्योंकि इसके पतन के कारणों का अभी तक खुलासा नहीं हुआ है। चार्ल्स मेसन ने वर्ष 1842 में पहली बार हड़प्पा सभ्यता को खोजा था। इसके बाद दया राम साहनी ने 1921 में हड़प्पा की आधिकारिक खोज की थी तथा इसमें एक अन्य पुरातत्वविद माधो सरूप वत्स ने उनका सहयोग किया था। इस दौरान हड़प्पा से कई ऐसी ही चीजें मिली हैं, जिन्हें हिन्दू धर्म से जोड़ा जा सकता है। पुरोहित की एक मूर्ति, बैल, नंदी, मातृदेवी, बैलगाड़ी और शिवलिंग। 1940 में खुदाई के दौरान पुरातात्विक विभाग के एमएस वत्स को एक शिव लिंग मिला जो लगभग 5000 पुराना है। शिवजी को पशुपतिनाथ भी कहते हैं। बाली का प्राचीन मंदिर : इंडोनेशिया कभी हिन्दू राष्ट्र हुआ करता था, लेकिन इस्लामिक उत्थान के बाद यह राष्ट्र आज मुस्लिम राष्ट्र है। शोधकर्ताओं का मानना है कि जहां आज इंडोनेशियन इस्लामिक यूनिवर्सिटी है वहां कभी हिन्दू मंदिर हुआ करता था, जिसमें शिव और गणेश की पूजा की जाती थी। यहां से एक ऐतिहासिक शिवलिंग भी मिला है। इंडोनेशिया के एक द्वीप है बाली जो हिन्दू बहुल क्षेत्र है। यहां के हिन्दुओं ने अपने धर्म और संस्कृति को नहीं छोड़ा था। बाली में एक इमारत के निर्माण की खुदाई के दौरान मजदूरों को मंदिर के कुछ अंश मिले जिसके बाद यह खबर बाली के ऐतिहासिक संरक्षण विभाग को दी गई जिसने खुदाई करने पर एक विशाल हिन्दू इमारत को पाया, जो कभी हिन्दू धर्म का केंद्र था। यह विशालकाय मंदिर आज बाली द्वीप की पहचान बन गया है। इंडोनेशिया के द्वीप बाली द्वीप पर हिन्दुओं के कई प्राचीन मंदिर हैं, जहां एक गुफा मंदिर भी है। इस गुफा मंदिर को गोवा गजह गुफा और एलीफेंटा की गुफा कहा जाता है। 19 अक्टूबर 1995 को इसे विश्व धरोहरों में शामिल किया गया। यह गुफा भगवान शंकर को समर्पित है। यहां 3 शिवलिंग बने हैं। देश-विदेश से पर्यटक इसे देखने आते हैं। शंकर पुत्र सुकेश के तीन पुत्र थे- माली, सुमाली और माल्यवान। माली, सुमाली और माल्यवान नामक तीन दैत्यों द्वारा त्रिकुट सुबेल (सुमेरु) पर्वत पर बसाई गई थी लंकापुरी। माली को मारकर देवों और यक्षों ने कुबेर को लंकापति बना दिया था। रावण की माता कैकसी सुमाली की पुत्री थी। अपने नाना के उकसाने पर रावण ने अपनी सौतेली माता इलविल्ला के पुत्र कुबेर से युद्ध की ठानी थी और लंका को फिर से राक्षसों के अधीन लेने की सोची। रावण ने सुंबा और बाली द्वीप को जीतकर अपने शासन का विस्तार करते हुए अंगद्वीप, मलय द्वीप, वराह द्वीप, शंख द्वीप, कुश द्वीप, यव द्वीप और आंध्रालय पर विजय प्राप्त की थी। इसके बाद रावण ने लंका को अपना लक्ष्य बनाया। लंका पर कुबेर का राज्य था, परंतु पिता ने लंका के लिए रावण को दिलासा दी तथा कुबेर को कैलाश पर्वत के आसपास के त्रिविष्टप (तिब्बत) क्षेत्र में रहने के लिए कह दिया। इसी तारतम्य में रावण ने कुबेर का पुष्पक विमान भी छीन लिया। आज के युग अनुसार रावण का राज्य विस्तार, इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, दक्षिण भारत के कुछ राज्य और संपूर्ण श्रीलंका पर रावण का राज था। वेटिकन शहर का शिवलिंग : कुछ लोग कहते हैं कि वेटिकन तो वाटिका का बिगड़ा रूप है। वैदिक काल में यह स्थान भी हिन्दू धर्म का केंद्र हुआ करता था। यहां पुरातात्विक खुदाई के दौरान शिवलिंग प्राप्त हुआ है जो रोम के ग्रेगोरियन इट्रस्केन संग्रहालय (Gregorian Etruscan Museum) में रखा गया है। यह भी कहा जाता है कि वेटिकन सिटी का मूल स्वरूप शिवलिंग के समान ही है। इतिहासकार पी.एन.ओक ने अपने शोध में यह दावा किया है कि धर्म चाहे कोई भी हो उसका उद्भव सनातन धर्म यानि की हिन्दू धर्म में से ही हुआ है। अपने दावो को आधार देने के लिए पी.एन.ओक ने कई उदाहरण भी पेश किए हैं जिनमें से रोम का वेटिकन शहर प्रमुख है। ओक का कहना है कि वेटिकन शब्द की उत्पत्ति हिन्दी के ‘वाटिका’ शब्द से हुई है। इतना ही नहीं उनका कहना है कि ईसाई धर्म यानि ‘क्रिश्चैनिटी’ को भी सनातन धर्म की ‘कृष्ण नीति’ और अब्राहम को ‘ब्रह्मा’ से ही लिया गया है। पी.एन.ओक का कहना है कि इस्लाम और ईसाई, दोनों ही धर्म वैदिक मान्यताओं के विरुपण से जन्में हैं। वेटिकन शहर की संरचना और शिवलिंग की आकृति में एक गजब की समानता है। इस तस्वीर को देखकर आप समझ सकते हैं कि हिन्दुओं के पवित्र प्रतीक शिवलिंग और वेटिकन शहर के प्रांगण की रचना में अचंभित कर देने वाली समानता है। शिव के माथे पर तीन रेखाएं (त्रिपुंडर) और एक बिन्दु होती हैं, ये रेखाएं शिवलिंग पर भी समान रूप से अंकित होती हैं। ध्यान से देखने पर आपको समझ आएगा कि जिन तीन रेखाओं और एक बिन्दू का जिक्र यहां कर रहे हैं वह पिआज़ा सेन पिएट्रो के रूप में वेटिकन शहर के डिजाइन में समाहित है। 

कंबोडिया का हिन्दू सम्राज्य : विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर परिसर तथा विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक कंबोडिया में स्थित है। यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम 'यशोधरपुर' था। इसका निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (1112-53ई.) के शासनकाल में हुआ था। यह विष्णु मन्दिर है जबकि इसके पूर्ववर्ती शासकों ने प्रायः शिवमंदिरों का निर्माण किया था। कंबोडिया में बड़ी संख्या में हिन्दू और बौद्ध मंदिर हैं, जो इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यहां भी हिन्दू धर्म अपने चरम पर था। पौराणिक काल का कंबोजदेश कल का कंपूचिया और आज का कंबोडिया। पहले हिंदू रहा और फिर बौद्ध हो गया। सदियों के काल खंड में 27 राजाओं ने राज किया। कोई हिंदू रहा, कोई बौद्ध। यही वजह है कि पूरे देश में दोनों धर्मों के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। भगवान बुद्ध तो हर जगह हैं ही, लेकिन शायद ही कोई ऐसी खास जगह हो, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से कोई न हो और फिर अंगकोर वाट की बात ही निराली है। ये दुनिया का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर है। विश्व विरासत में शामिल अंगकोर वाट मंदिर-समूह को अंगकोर के राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने बारहवीं सदी में बनवाया था। चौदहवीं सदी में बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ने पर शासकों ने इसे बौद्ध स्वरूप दे दिया। बाद की सदियों में यह गुमनामी के अंधेरे में खो गया। एक फ्रांसिसी पुरातत्वविद ने इसे खोज निकाला। आज यह मंदिर जिस रूप में है, उसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का बहुत योगदान है। सन् 1986 से 93 तक एएसआई ने यहाँ संरक्षण का काम किया था। अंगकोर वाट की दीवारें रामायण और महाभारत की कहानियाँ कहती हैं। यह मंदिर लगभग 1 स्क्वेयर मील क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यहां की दीवारों पर पर छपे चित्र और उकेरी गई मूर्तियां हिन्दू धर्म के गौरवशाली इतिहास की कहानी को बयां करती हैं। सीताहरण, हनुमान का अशोक वाटिका में प्रवेश, अंगद प्रसंग, राम-रावण युद्ध, महाभारत जैसे अनेक दृश्य बेहद बारीकी से उकेरे गए हैं। अंगकोर वाट के आसपास कई प्राचीन मंदिर और उनके भग्नावशेष मौजूद हैं। इस क्षेत्र को अंगकोर पार्क कहा जाता है। सियाम रीप क्षेत्र अपने आगोश में सवा तीन सौ से ज्यादा मंदिर समेटे हुए है। अफ्रीकी में हिन्दू : भगवान शिव कहां नहीं हैं? कहते हैं कण-कण में हैं शिव, कंकर-कंकर में हैं भगवान शंकर। कैलाश में शिव और काशी में भी शिव और अब अफ्रीका में शिव। साउथ अफ्रीका में भी शिव की मूर्ति का पाया जाना इस बात का सबूत है कि आज से 6 हजार वर्ष पूर्व अफ्रीकी लोग भी हिंदू धर्म का पालन करते थे। साउथ अफ्रीका के सुद्वारा नामक एक गुफा में पुरातत्वविदों को महादेव की 6 हजार वर्ष पुरानी शिवलिंग की मूर्ति मिली जिसे कठोर ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया है। इस शिवलिंग को खोजने वाले पुरातत्ववेत्ता हैरान हैं कि यह शिवलिंग यहां अभी तक सुरक्षित कैसे रहा। हाल ही में दुनिया की सबसे ऊंची शिवशक्ति की प्रतिमा का अनावरण दक्षिण अफ्रीका में किया गया। इस प्रतिमा में भगवान शिव और उनकी शक्ति अर्धांगिनी पार्वती भी हैं। बेनोनी शहर के एकटोनविले में यह प्रतिमा स्थापित की गई। हिन्दुओं के आराध्य शिव की प्रतिमा में आधी आकृति शिव और आधी आकृति मां शक्ति की है। 10 कलाकारों ने 10 महीने की कड़ी मेहनत के बाद इस प्रतिमा को तैयार किया है। ये कलाकार भारत से आए थे। इस 20 मीटर ऊंची प्रतिमा को बनाने में 90 टन के करीब स्टील का इस्तेमाल हुआ है। चीन में हिन्दू : चीन के इतिहासकारों के अनुसार चीन के समुद्र से लगे औद्योगिक शहर च्वानजो में और उसके चारों ओर का क्षे‍त्र कभी हिन्दुओं का तीर्थस्थल था। वहां 1,000 वर्ष पूर्व के निर्मित हिन्दू मंदिरों के खंडहर पाए गए हैं। इसका सबूत चीन के समुद्री संग्रहालय में रखी प्राचीन मूर्तियां हैं। वर्तमान में चीन में कोई हिन्दू मंदिर तो नहीं है, लेकिन 1,000 वर्ष पहले सुंग राजवंश के दौरान दक्षिण चीन के फुच्यान प्रांत में इस तरह के मंदिर थे लेकिन अब सिर्फ खंडहर बचे हैं। 

यजीदी हिन्दू है? : इस्लामिक आतंकवाद के चलते यजीदी अब खत्म हो रही मनुष्य की विशिष्ट प्रजाति में शामिल हो चुके हैं। यजीदी धर्म भी विश्व की प्राचीनतम धार्मिक परंपराओं में से एक है। इस कुछ इतिहासकार हिन्दू धर्म का ही एक समाज मानते हैं। यजीदियों की गणना के अनुसार अरब में यह परंपरा 6,763 वर्ष पुरानी है अर्थात ईसा के 4,748 वर्ष पूर्व यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों से पहले से यह परंपरा चली आ रही है। यजीदी मंदिर की इस तस्वीर से यह सिद्ध हो जाएगा कि ये सभी हिन्दू हैं। शोध से पता चलता है कि यजीदियों का यजीद या ईरानी शहर यज्द से कोई लेना-देना नहीं। उनका संबंध फारसी भाषा के 'इजीद' से है जिसके मायने फरिश्ता है। इजीदिस के मायने हैं 'देवता के उपासक' और यजीदी भी खुद को यही कहते हैं। यजीदियों की कई मान्यताएं हिन्दू और ईसाइयत से भी मिलती-जुलती हैं। ईसाइयत के आरंभिक दिनों में मयूर पक्षी को अमरत्व का प्रतीक माना जाता था। बाद में इसे हटा दिया गया। 'यजीदी' का शाब्दिक अर्थ 'ईश्वर के पूजक' होता है। ईश्वर को 'यजदान' कहते हैं। यजीदी अपने ईश्वर को 'यजदान' कहते हैं। यजदान से 7 महान आत्माएं निकलती हैं जिनमें मयूर एंजेल है जिसे मलक ताउस कहा जाता है। मयूर एंजेल को दैवीय इच्छाएं पूरा करने वाला माना जाता है। यजीदी ईश्‍वर को इतना ऊपर मानते हैं कि उनकी सीधे उपासना नहीं की जाती। उन्हें सृष्टि का रचयिता तो मानते हैं, लेकिन रखवाला नहीं। हिन्दुओं की तरह ही यजीदियों में जल का महत्व है। धार्मिक परंपराओं में जल से अभिषेक किए जाने की परंपरा है। तिलक लगाते हैं और अपने मंदिर में दीपक जलाते हैं। हिन्दू देतता कार्तिकेय जैसे दिखाई देने वाले देवता की पूजा करते हैं। उनके मंदिर और हिन्दुओं के मंदिर समान नजर आते हैं। पुनर्जन्म को मानते हैं। यजीदी अपने ईश्‍वर की 5 समय प्रार्थना करते हैं। सूर्योदय व सूर्यास्त में सूर्य की ओर मुंह करके प्रार्थना की जाती है। स्वर्ग-नरक की मान्यता भी है। धार्मिक संस्कार कराने वाले विशेषज्ञों की परंपरा है। व्रत, मेले, उत्सव की परंपरा भी है। समाधियां व पूजागृह (मंदिर) भी हैं। इनकी धार्मिक भाषा कुरमांजी है, जो प्राचीन परशियन (ईरान) की शाखा है। पृथ्वी, जल व अग्नि में थूकने को पाप समझते हैं। यजीदी धर्म परिवर्तन नहीं करते। यजीदी के लिए धर्म निकाला सबसे दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है, क्योंकि ऐसा होने पर उसकी आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता। रूस में हिन्दू : एक हजार वर्ष पहले रूस ने ईसाई धर्म स्वीकार किया। माना जाता है कि इससे पहले यहां असंगठित रूप से हिन्दू धर्म प्रचलित था और उससे भी पहले संगठित रूप से वैदिक पद्धति के आधार पर हिन्दू धर्म प्रचलित था। वैदिक धर्म का पतन होने के कारण यहां मनमानी पूजा और पुजारियों का बोलबाला हो गया अर्थात हिन्दू धर्म का पतन हो गया। यही कारण था कि 10वीं शताब्दी के अंत में रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर चाहते थे कि उनकी रियासत के लोग देवी-देवताओं को मानना छोड़कर किसी एक ही ईश्वर की पूजा करें। इसके बाद रूसी राजा व्लादीमिर ने यह तय कर लिया कि वह और उसकी कियेव रियासत की जनता ईसाई धर्म को ही अपनाएंगे। रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर ने जब आर्थोडॉक्स ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और अपनी जनता से भी इस धर्म को स्वीकार करने के लिए कहा तो उसके बाद भी कई वर्षों तक रूसी जनता अपने प्राचीन देवी और देवताओं की पूजा भी करते रहे थे। बाद में ईसाई पादरियों के निरंतर प्रयासों के चलते रूस में ईसाई धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हो सका है और धीरे-धीरे रूस के प्राचीन धर्म को नष्ट कर दिया गया। एक हजार वर्ष पूर्व रूस में था हिन्दू धर्म? प्राचीनकाल के रूस में लोग जिन शक्तियों की पूजा करते थे, उन्हें तथाकथित विद्वान लोग अब प्रकृति-पूजा कहकर पुकारते हैं। सबसे प्रमुख देवता थे- विद्युत देवता या बिजली देवता। आसमान में चमकने वाले इस वज्र-देवता का नाम पेरून था। कोई भी संधि या समझौता करते हुए इन पेरून देवता की ही कसमें खाई जाती थीं और उन्हीं की पूजा मुख्य पूजा मानी जाती थी। प्राचीनकाल में रूस के दो और देवताओं के नाम थे- रोग और स्वारोग। सूर्य देवता के उस समय के जो नाम हमें मालूम हैं, वे हैं- होर्स, यारीला और दाझबोग। सूर्य के अलावा प्राचीनकालीन रूस में कुछ मशहूर देवियां भी थीं जिनके नाम हैं- बिरिगिन्या, दीवा, जीवा, लादा, मकोश और मरेना। प्राचीनकालीन रूस की यह मरेना नाम की देवी जाड़ों की देवी थी और उसे मौत की देवी भी माना जाता था। हिन्दी का शब्द मरना कहीं इसी मरेना देवी के नाम से तो पैदा नहीं हुआ? इसी तरह रूस का यह जीवा देवता कहीं हिन्दी का ‘जीव’ ही तो नहीं? ‘जीव’ यानी हर जीवंत आत्मा। रूस में यह जीवन की देवी थी। रूस में आज भी पुरातत्ववेताओं को कभी-कभी खुदाई करते हुए प्राचीन रूसी देवी-देवताओं की लकड़ी या पत्थर की बनी मूर्तियां मिल जाती हैं। कुछ मूर्तियों में दुर्गा की तरह अनेक सिर और कई-कई हाथ बने होते हैं। रूस के प्राचीन देवताओं और हिन्दू देवी-देवताओं के बीच बहुत ज्यादा समानता है। प्राचीनकाल में रूस के मध्यभाग को जम्बूद्वीप का इलावर्त कहा जाता था। यहां देवता और दानव लोग रहते थे। कुछ वर्ष पूर्व ही रूस में वोल्गा प्रांत के स्ताराया मायना (Staraya Maina) गांव में विष्णु की मूर्ति मिली थी जिसे 7-10वीं ईस्वी सन् का बताया गया। यह गांव 1700 साल पहले एक प्राचीन और विशाल शहर हुआ करता था। स्ताराया मायना का अर्थ होता है गांवों की मां। उस काल में यहां आज की आबादी से 10 गुना ज्यादा आबादी में लोग रहते थे। माना जाता है कि रूस में वाइकिंग या स्लाव लोगों के आने से पूर्व शायद वहां भारतीय होंगे या उन पर भारतीयों ने राज किया होगा। महाभारत में अर्जुन के उत्तर-कुरु तक जाने का उल्लेख है। कुरु वंश के लोगों की एक शाखा उत्तरी ध्रुव के एक क्षेत्र में रहती थी। उन्हें उत्तर कुरु इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। महाभारत में उत्तर-कुरु की भौगोलिक स्थिति का जो उल्लेख मिलता है वह रूस और उत्तरी ध्रुव से मिलता-जुलता है। अर्जुन के बाद बाद सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद और उनके पोते जयदीप के उत्तर कुरु को जीतने का उल्लेख मिलता है। यह विष्णु की मूर्ति शायद वही मूर्ति है जिसे ललितादित्य ने स्त्री राज्य में बनवाया था। चूंकि स्त्री राज्य को उत्तर कुरु के दक्षिण में कहा गया है तो शायद स्ताराया मैना पहले स्त्री राज्य में हो। खैर...! 2007 को यह विष्णु मूर्ति पाई गई। 7 वर्षों से उत्खनन कर रहे समूह के डॉ. कोजविनका कहना है कि मूर्ति के साथ ही अब तक किए गए उत्खनन में उन्हें प्राचीन सिक्के, पदक, अंगूठियां और शस्त्र भी मिले हैं। मौजूदा रूस की जगह पहले ग्रैंड डची ऑफ मॉस्को का गठन हुआ। आमतौर से यह माना जाता है कि ईसाई धर्म करीब 1,000 वर्ष पहले रूस के मौजूदा इलाके में फैला। यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी के प्रख्यात विद्वान डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार रूसी भाषा के करीब 2,000 शब्द संस्कृत मूल के हैं। यूक्रेन की राजधानी कीव से भी पहले का यह गांव 1,700 साल पहले आबाद था। अब तक कीव को रूस के सभी शहरों की जन्मस्थली माना जाता रहा है, लेकिन अब यह अवधारणा बदल गई है। ऊल्यानफस्क स्टेट यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विभाग के रीडर डॉ. एलिग्जैंडर कोझेविन ने सरकारी न्यूज चैनल को बाताया कि हम इसे अविश्वनीय मान सकते हैं, लेकिन हमारे पास इस बात के ठोस आधार मौजूद हैं कि मध्यकालीन वोल्गा क्षे‍त्र प्राचीनकालीन रूस की मुख्य भूमि है। डॉ. कोझेविन पिछले साल साल से मैना गांव की खुदाई से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि वोल्गा की सहायक नदी स्तराया के हर स्क्वैयर मीटर जमीन अपने आप में अनोखी है और पुरातत्व का खजाना मालूम होती है। वानर साम्राज्य का रहस्य : वानर का शाब्दिक अर्थ होता है 'वन में रहने वाला नर।' वन में ऐसे भी नर रहते थे जिनको पूछ निकली हुई थी। नए शोधानुसार प्रभु श्रीराम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व अयोध्या में हुआ था। श्रीराम के जन्म के पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था अर्थात आज (फरवरी 2015) से लगभग 7129 वर्ष पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था। शोधकर्ता कहते हैं कि आज से 9 लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो आज से 15 से 12 हजार वर्ष पूर्व लुप्त होने लगी थी और अंतत: लुप्त हो गई। इस जाति का नाम कपि था। हनुमान का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था। दरअसल, आज से 9 लाख वर्ष पूर्व मानवों की एक ऐसी जाति थी, जो मुख और पूंछ से वानर समान नजर आती थी, लेकिन उस जाति की बुद्धिमत्ता और शक्ति मानवों से कहीं ज्यादा थी। अब वह जाति भारत में तो दुर्भाग्यवश विनष्ट हो गई, परंतु बाली द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है जिनकी पूछ प्राय: 6 इंच के लगभग अवशिष्ट रह गई है। ये सभी पुरातत्ववेत्ता अनुसंधायक एकमत से स्वीकार करते हैं कि पुराकालीन बहुत से प्राणियों की नस्ल अब सर्वथा समाप्त हो चुकी है। वानरों के साम्राज्य की राजधानी किष्किंधा थी। सुग्रीव और बालि इस सम्राज्य के राजा थे। यहां पंपासरोवर नामक एक स्थान है जिसका रामायण में जिक्र मिलता है। 'पंपासरोवर' अथवा 'पंपासर' होस्पेट तालुका, मैसूर का एक पौराणिक स्थान है। हंपी के निकट बसे हुए ग्राम अनेगुंदी को रामायणकालीन किष्किंधा माना जाता है। तुंगभद्रा नदी को पार करने पर अनेगुंदी जाते समय मुख्य मार्ग से कुछ हटकर बाईं ओर पश्चिम दिशा में, पंपासरोवर स्थित है। भारत के बाहर वानर साम्राज्य कहां? सेंट्रल अमेरिका के मोस्कुइटीए (Mosquitia) में शोधकर्ता चार्ल्स लिन्द्बेर्ग ने एक ऐसी जगह की खोज की है जिसका नाम उन्होंने ला स्यूदाद ब्लैंका (La Ciudad Blanca) दिया है जिसका स्पेनिश में मतलब व्हाइट सिटी (The White City) होता है, जहां के स्थानीय लोग बंदरों की मूर्तियों की पूजा करते हैं। चार्ल्स का मानना है कि यह वही खो चुकी जगह है जहां कभी हनुमान का साम्राज्य हुआ करता था। एक अमेरिकन एडवेंचरर ने लिम्बर्ग की खोज के आधार पर गुम हो चुके ‘Lost City Of Monkey God’ की तलाश में निकले। 1940 में उन्हें इसमें सफलता भी मिली पर उसके बारे में मीडिया को बताने से एक दिन पहले ही एक कार दुर्घटना में उनकी मौत हो गई और यह राज एक राज ही बनकर रह गया। अमेरिका की प्राचीन माया सभ्यता ग्वाटेमाला, मैक्सिको, पेरू, होंडुरास तथा यूकाटन प्रायद्वीप में स्थापित थी। यह एक कृषि पर आधारित सभ्यता थी। 250 ईस्वी से 900 ईस्वी के बीच माया सभ्यता अपने चरम पर थी। इस सभ्यता में खगोल शास्त्र, गणित और कालचक्र को काफी महत्व दिया जाता था। मैक्सिको इस सभ्यता का गढ़ था। आज भी यहां इस सभ्यता के अनुयायी रहते हैं। यूं तो इस इलाके में ईसा से 10 हजार साल पहले से बसावट शुरू होने के प्रमाण मिले हैं और 1800 साल ईसा पूर्व से प्रशांत महासागर के तटीय इलाक़ों में गांव भी बसने शुरू हो चुके थे। लेकिन कुछ पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि ईसा से कोई एक हजार साल पहले माया सभ्यता के लोगों ने आनुष्ठानिक इमारतें बनाना शुरू कर दिया था और 600 साल ईसा पूर्व तक बहुत से परिसर बना लिए थे। सन् 250 से 900 के बीच विशाल स्तर पर भवन निर्माण कार्य हुआ, शहर बसे। उनकी सबसे उल्लेखनीय इमारतें पिरामिड हैं, जो उन्होंने धार्मिक केंद्रों में बनाईं लेकिन फिर सन् 900 के बाद माया सभ्यता के इन नगरों का ह्रास होने लगा और नगर खाली हो गए। अमेरिकन इतिहासकार मानते हैं‍ कि भारतीय आर्यों ने ही अमेरिका महाद्वीप पर सबसे पहले बस्तियां बनाई थीं। अमेरिका के रेड इंडियन वहां के आदि निवासी माने जाते हैं और हिन्दू संस्कृति वहां पर आज से हजारों साल पहले पहुंच गई थी। 

रविवार, 17 अप्रैल 2016

'भारत माता की जय' - प्रशान्त बाजपेई

कौन नहीं बोलना चाहता जय ?
तारीख: 28 Mar 2016



'दु:स्वप्ने आतंके, रक्षा करिले अंके, स्नेहमयी तुमि माता' भारत को स्नेहमयी मां कहने वाली ये पंक्तियां गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना 'जन -गण-मन' की हैं जिसके प्रथम छंद को भारत के राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया है। अर्थात् 'जन-गण-मन' की पृष्ठभूमि में भी राष्ट्र का मातृरूप समाहित है। जिस मातृरूप को सामने रखकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी गई, और वंदेमातरम् भारत का राष्ट्र मंत्र बन गया। पर भारत में तथाकथित 'सेकुलर', लिबरल और वामपंथी बुद्धिजीवियों का एक ऐसा वर्ग है जिन्हंे 'भारत की बरबादी' के नारे तो  विचलित नहीं करते लेकिन 'भारत माता की जय' या 'वंदेमातरम्' का उद्घोष बेचैन कर देता है। उन्हीं की ताल पर असदुद्दीन ओवैसी जैसे लोग मजहबी उन्माद का आलाप देते हैं। इन लोगों का तर्क  है कि मुसलमान देश के नागरिक मात्र बनकर रहें  लेकिन जन्मभूमि का बेटा होने का गौरव न करें।
बुद्धिजीवी कहलाने वाले इसे 'मर्जी' का मामला' बताते हैं तो कट्टरपंथी इसे मजहब का मामला कहते हैं और इससे सवाल उठता है कि  क्या मां को मां कहने से ईश्वर नाराज हो सकता है? क्या मां को नकारकर अपनी पहचान बचाई जा सकती है? जिन प्रश्नों  का उत्तर कोई बच्चा भी दे सकता है, कई बार वे प्रश्न राजनीति के खिलाडि़यों को बड़े कठिन लगते हैं। नागरिकता तो कानूनी मान्यता है लेकिन अपनी धरती का बेटा होना भावनात्मक संबंध है। इस भावनात्मक संबंध के बिना राष्ट्र खड़े नहीं होते। भावों के जागरण के लिए मां-बेटे से ज्यादा शक्तिशाली कौन-सा प्रतीक हो सकता है? नकार  की इस शृंखला में नया पैंतरा यह है कि बंकिमचन्द्र चटर्जी के उपन्यास 'आनंदमठ' (प्रकाशन 1882) से पहले भारत माता की परिकल्पना थी ही नहीं। तर्क  के ऐसे धनी लोगों को हजारों वर्ष पहले रचित वाल्मीकि रामायण पढ़नी चाहिए जिसमें श्रीराम जन्मभूमि की तुलना जन्म देने वाली माता से करते हुए कहते हैं, 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी', प्राचीन काल से ही भारत माता को ज्ञानदायिनी, जीवनदायिनी और रक्षा करने वाली के रूप में देखा गया। वेदों ने ही इस देश को भारत कहा है। अब 'सेकुलर' टोली भारत नाम को भी सांप्रदायिक घोषित कर सकती है।

जब बंकिमचन्द्र 'वंदेमातरम् ' गाते हैं और 'जन -गण-मन' की (अगली) पंक्तियों में जब रवीन्द्रनाथ कहते हैं कि—
'तव करुणारुण-रागे, निद्रित भारत जागे, तव चरणे नत माथा' तो क्या वे उसी भाव को नहीं जगाते जो कहता है कि 'मां के कदमों के तले जन्नत है।' फिर भारत माता संबोधन का विरोध क्यों?
मुस्लिम बहुल बांग्लादेश के राष्ट्रगीत में बार-बार 'मां' संबोधन आता है। देखिये इन पंक्तियों को- 'मां, तोर मुखेर बानी, आमार काने लागे सुधामृतो।' अर्थ है कि मां तुम्हारी वाणी मेरे कानों को अमृत समान लगती है। आगे की पंक्तियां कहती हैं- 'मां तोर बदन खानी मलिन होले, आमी नयन ओ मां आमी नयन जोले भाषी। सोनार बंगला, आमी तोमाय भालो बाशी।' अर्थ हुआ- 'मां यदि तुम्हारा मुख दु:ख से मलिन होता है, तो हमारी आंखों में अश्रु भर जाते हैं। ओ स्वर्णमय बंगाल, मैं तुमसे प्यार करता हूं।' 87 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया के राष्ट्र गीत की पंक्तियां कहती हैं- 'मेरे देश इंडोनेशिया, वह धरती जिसके लिए मैं अपना खून बहाता हूं, मैं यहां हूं अपनी मातृभूमि का सेवक बनने के लिए।' मुस्लिम बहुल तुर्क मेनिस्तान के मुस्लिम  अपने राष्ट्रगीत में गाते हैं- 'पर्वत, नदियां और मैदानों की शोभा, प्रेम और भाग्य, प्रकटन है मेरा। ओ मेरे पुरखों और मेरी संतानों की मातृभूमि।' 98 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले अजरबैजान के आड़े इस्लाम नहीं आता जब वे गाते हैं- 'गौरवशाली मातृभूमि! गौरवशाली मातृभूमि! अजरबैजान! अजरबैजान!' मिस्रवासी मिस्र को सभी देशों की माता निरूपित करते हैं। मिस्र का राष्ट्रगान कहता है- 'मिस्र! ओ मिस्र, हे सभी देशों की माता, तुम मेरी आशा और मेरी महत्वाकांक्षा हो।  तुम्हारी नील (नदी) में असीम गौरव है।' मिस्र में मुस्लिम आबादी कुल जनसंख्या का 90 प्रतिशत है। तजाकिस्तानवासी अपने देश के लिए गाते हैं- 'तुम हम सबकी माता हो, तुम्हारा भविष्य हमारा भविष्य है। हमारी देह और आत्मा का अर्थ तुमसे है।' तजाकिस्तान में मुस्लिम कुल आबादी का 99 फीसदी हैं। एक अन्य मुस्लिम देश उज्बेकिस्तान (मुस्लिम जनसंख्या 96.5 प्रतिशत) का राष्ट्रगान कहता है- 'स्वातंत्र्य की  प्रकाश स्तम्भ, शान्ति की संरक्षक, सत्यप्रेमी मातृभूमि! सदा फलो फूलो।' अब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब बांग्लादेश, इंडोनेशिया, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान, मिस्र, तजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों को अपनी भूमि को मातृभूमि कहने में गौरव का भान होता है तो फिर भारत में 'भारत माता की जय' बोलने में इस्लाम पर खतरा कैसे आ सकता है? इस धोखेबाजी के बारे में सभी देशवासी और विशेष रूप से मुसलमानों को बताना जरूरी है। वास्तव में ऐसे लोगों का उद्देश्य भारत के मुसलमानों को भारत की जड़ों से जुड़ने से रोकना और उनका अरबीकरण करना है। इसी सोच के चलते कट्टरपंथियों द्वारा मुसलमानों से शेष देशवासियों से अलग दिखने, अलग वेशभूषा धारण करने का आग्रह किया जाता है।  इसी राग में एक नया कुतर्क जोड़ा गया है कि 'मैं भारत माता की जय नहीं कहूंगा क्योंकि ऐसा संविधान में नहीं लिखा है।'  इसी कुतर्क और मुसलमानों के अरबीकरण के छिपे एजेंडे पर चोट करते हुए गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने राज्यसभा में कहा कि ''शेरवानी और टोपी क्यों पहनते हो? ऐसा करने के लिए भी तो संविधान में नहीं लिखा है।''
आजकल जब कभी ऐसे मुद्दों पर चर्चा होती है तो सेक्युलर वीरों को अटल जी की याद सताने लगती है। जब जेएनयू में लगे राष्ट्रविरोधी नारों के संबंध में गृह मंत्रालय ने हस्तक्षेप किया तो ऐसे लोगों द्वारा कहा जाने लगा कि सरकार गलत लड़ाई का चुनाव कर रही है और अटल जी होते तो कहते कि 'छोकरे हैं, जाने दो।' ऐसे लोगों को 29 मार्च, 1973 को (बांग्लादेश निर्माण के सवा साल बाद) लोकसभा में दिए गए उनके भाषण को पढ़ना चाहिए।  अटल जी ने कहा था ''हम आशा करते थे कि पाकिस्तान का विभाजन हो गया, मजहब के आधार पर पाकिस्तान एक नहीं रह सका। स्वाधीन बांग्लादेश का आविर्भाव हुआ। अब भारत का भी वातावरण बदलेगा और मजहब के आधार पर संघर्ष या विशेषाधिकारों की मांग नहीं होगी। लेकिन ऐसा लगता है कि पाकिस्तान के विभाजन और बांग्लादेश की मुक्ति से हमने कोई पाठ नहीं सीखा।  आज मुसलमानों में एक वर्ग ऐसा क्यों निकल रहा है जो मुंबई में खड़े हो कर कहता है कि हम 'वंदेमातरम्' कहने के लिए तैयार नहीं हैं। 'वंदेमातरम्' इस्लाम विरोधी नहीं है। क्या इस्लाम को मानने वाले जब नमाज पढ़ते हैं तो इस देश की धरती पर, इस देश की पाक जमीन पर सिर नहीं टेकते हैं? ऐसे मुद्दे पर किसी को भी असहमत होने की इजाजत नहीं दी जा सकती। कल यह कहेंगे कि  'तिरंगा झंडा है, मगर हम तिरंगे के आगे झुकेंगे नहीं, क्योंकि हम अल्लाह के आगे झुकते हैं। हिंदुस्थान में रहने वाले हर आदमी को तिरंगे के सामने झुकना पड़ेगा।'' यहां पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मुहम्मद खान को उद्धृत करना समीचीन होगा कि ''भारत सरकार ने एक परिपत्र के जरिये जब से राज्य सरकारों से राष्ट्रीय गीत गाने  के लिए कहा है, तब से एक अनावश्यक विवाद शुरू हो गया है। सबसे पहले परिपत्र का विरोध मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने किया।  उनके प्रवक्ता ने मुस्लिम अभिभावकों को हिदायत जारी की कि वे अपने बच्चों को 7 सितंबर को स्कूल न भेजें। 'फरमान' जारी करने से पहले पर्सनल लॉ बोर्ड के पास न तो गीत का प्रामाणिक अनुवाद था, और न ही उस भाषा की जानकारी जिसमें यह गीत लिखा है।  आज तक उन्होंने यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि क्या वे सिर्फ  स्कूलों में राष्ट्रीय गीत गाए जाने के विरोधी हैं या फिर संसद जहां हर सत्र का समापन वंदेमातरम् से होता है और राजनैतिक दल, जिनके हर अधिवेशन में वंदेमातरम् गाया जाता है, उसके मुसलमान सदस्यों पर भी वह यही हुक्म जारी करेंगे? .... कोई व्यक्ति अगर गाना नहीं चाहता, तो हम कानून बना लें, तो भी उसे मजबूर नहीं कर पाएंगे, लेकिन क्या हम यह अधिकार किसी व्यक्ति या पर्सनल लॉ बोर्ड को दे सकते हैं कि वह राष्ट्रीय गीत का विरोध करे, गाने से परहेज करे? दूसरों को विरोध के लिए भड़काना और उकसाना केवल राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है।''
आरिफ मुहम्मद खान, नजमा हेपतुल्ला जैसे मुसलमानों की बात सुनी जानी चाहिए। देश में ऐसी हरकतों के खिलाफ विरोध मुखर हो रहा है। और 'सेक्युलर' महारथी भी देश के मिजाज को भांप रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने में आया महाराष्ट्र विधानसभा में, जब कांग्रेस और एनसीपी के विधायक भी अपने केंद्रीय नेतृत्व द्वारा रखी गई मिसालों के उलट 'भारत माता की जय' न बोलने वाले एआईएमआईएम के विधायक को निलंबित करने के लिए भाजपा-शिवसेना विधायकों के साथ आ खड़े हुए। माहौल भांपते हुए ओवैसी भी लीपापोती करने आए और बोले 'भारत माता की जय' नहीं 'जय हिंद' बोलूंगा। अभिनेत्री शबाना आजमी ने ओवैसी पर कटाक्ष किया कि चलो 'भारत अम्मी की जय' ही बोल दो। सोशल मीडिया उबला भी और ओवैसी का मखौल भी उड़ाया कि 'नहीं बोलूंगा-नहीं बोलूंगा' कहकर एआईएमआईएम प्रमुख ने बार-बार 'भारत माता की जय' तो बोली ही।