शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

भारत 'माता' वेदकाल से - साधु प्रो़ वी़ रंगराजन

तारीख: 25 Apr 2016 
- साधु प्रो़ वी़ रंगराजन


दुर्भाग्य से आज भारत के ही कुछ लोग कहते हैं कि प्राचीन भारत में 'भारत माता की जय' बोलने की प्रथा नहीं थी, इन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने 3 मार्च, 2016 को कहा था, 'अब समय आ गया है कि हम नई पीढ़ी को कहें कि वह 'भारत माता की जय' का उद्घोष करे।' उनके इस बयान पर गैर जिम्मेदाराना तरीके से टीका-टिप्पणी की गई। श्री भागवत द्वारा स्पष्टीकरण देने के बावजूद विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। स्पष्टीकरण में उन्होंने कहा, 'हमें ऐसे महान भारत का निर्माण करना है जिसमें लोग स्वयं ही 'भारत माता की जय' का नारा बुलंद करें। इसे किसी पर थोपा न जाए। यह वास्तविक और स्वत: स्फूर्त हो।' इसलिए भारत को मातृभूमि के तौर पर समझने और महसूस करने की जरूरत है।
श्री भागवत के बयान के जवाब में कई बयान सामने आए। एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि अगर उनके गले पर चाकू भी रख दिया जाए तो भी वह भारत माता की जय नहीं बोलेंगे। 'भारत माता की जय' न बोलने पर महाराष्ट्र विधानसभा ने एआईएमआईएम के विधायक वारिस पठान को निलंबित कर दिया। लेकिन असम के 73 वर्षीय ताजुद्दीन बरभूभुइयां ने कहा, ''यह नारा लगाने में क्या गलत है? क्या मैं भारतीय नहीं? मैं असदुद्दीन ओवैसी की श्रेणी में नहीं हूं। मैं यह नारा सौ बार लगाऊंगा।'' हालांकि, 1 अप्रैल, 2016 को जारी एक फतवे में उत्तर प्रदेश के दारुल उलूम देवबंद की ओर से कहा गया, 'भारत माता की जय का नारा इस्लाम के नियमों के खिलाफ है' जबकि मेरठ में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने 'भारत माता की जय' का उद्घोष किया। इस मामले में सबसे खराब बयान, खुद को इतिहासकार कहने वाले इरफान हबीब का आया। 'द हिंदू' को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ''भारत को माता मानने का चलन प्राचीन भारत में नहीं था और यह विचार यूरोप से   आया है।''
यहां हम हबीब जैसे अज्ञानी को प्रख्यात भारतवेत्ता एवं देशभक्त अनवर शेख के उन शब्दों की याद दिलाना चाहेंगे, जिनमें उन्होंने अथर्ववेद के भूमि सूक्त के छंदों पर टिप्पणी की है। अपने त्रैमासिक लिबर्टी में 'भारत माता' पर उन्होंने लिखा है, ''छंद 12 में हिंदू को भारत माता के प्रति पूरी तरह समर्पित होने के लिए कहा गया है,'मैं पृथ्वी का पुत्र हूं, पृथ्वी मेरी माता है।' इस स्तोत्र का अध्ययन बताता है कि जहां वैदिक विचारों में सभी देवताओं के प्रति आदर भाव है, वहीं इसमें सबसे अधिक महत्व भारतभूमि को दिया गया है क्योंकि यह उन सबकी माता है जो इसमें निवास करते हैं। हालांकि इस बारे में दो विचारों पर ध्यान देना होगा-
एक, कोई व्यक्ति भारत में रहकर किसी भी ईश्वर की उपासना कर सकता है क्योंकि ईश्वरत्व के बारे में वैदिक विचार इतने मुक्त हैं कि उसके अंतर्गत देवताओं के बीच कोई आपसी द्वेष नहीं है। यह मुक्त सोच प्रगतिशील वैदिक विचारधारा पर आधारित है, जिसमें बताया जाता है कि समय का पहिया लगातार आगे की ओर चलता है और हर तरह का परिवर्तन हमारे सामने आता है और इसीलिए सामाजिक सौहार्द पर धार्मिक विचारों की कट्टरता की छाया नहीं पड़नी चाहिए।
दूसरा, इस वैदिक मुक्तता को हालांकि भारत माता के विचार के जरिये सीमित भी किया गया है। इस भूमि पर रहने वाले को मानना होगा 'मैं भारत माता का पुत्र हूं और भारत मेरी माता है।' कहना न होगा कि केवल अपना प्रेम स्वीकारना ही निष्ठा का परिचायक नहीं होता; इसे निरंतर कार्य के जरिये साबित करना होगा। इस देश की संस्कृति को नकारने वाला इस देश से प्रेम कैसे कर सकता है?
संस्कृत शब्द राष्ट्र एक राजनीतिक-सांस्कृतिक विचार है जो पश्चिम के 'राष्ट्र' या 'राज्य' जैसे राजनीतिक विचारों से भिन्न है। ब्रहस्पत्य संहिता में कहा गया है, 'हिमालयाद आराभ्य यावाद इंदु सरोवरपर्यत्नम तम देव निर्मितम देशम हिंदुस्तानम प्रचाक्शते' -''देवताओं द्वारा निर्मित और हिमालय से हिंद महासागर तक फैली यह भूमि हिंदुस्तान है। इसे भारतवर्ष भी कहा जाता है।'' विष्णुपुराण में कहा गया है, ''वह भूमि जो महासागर के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में है, वह भारत है और उसके निवासी भारतीय हैं।'' चंद्रगुप्त मौर्य के अधीन प्रभावशाली मौर्य वंश की नींव रखने वाले चाणक्य ने घोषित किया 'पृथ्वय: समुद्र पर्यन्तय: एक: रत' - समुद्र तक पहुंचने वाली यह भूमि एक राष्ट्र है। भगवान रामचंद्र ने कहा था 'जननि जन्मभूमिश्च: स्वर्गादपि गरियसी'अर्थात माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी अधिक पवित्र हैं!
अनंतकाल से हमारे वैभवशाली राष्ट्र की बुनियाद अध्यात्मवाद पर रखी गई है। वैदिक ऋषि अथर्ववेद के एक सूक्त में प्रार्थना करता है, ''ओह मां, जो हमसे घृणा करता है, जो हमारे ऊपर शासन करने के लिए सैन्य बल लेकर आता है, जो हमारे अनिष्ट की कल्पना करता है, और जो हमारी मृत्यु एवं विध्वंस की कामना करता है, आप उनका संहार करें; यह मेरी मातृभूमि है जिसकी गोद में बैठकर मेरे पूर्वजों, महान ऋषियों ने यज्ञ किए, प्रायश्चित किया और सातों ऋतुओं के गीत गाए।''
भारत भवानी - भारत माता - की महान परंपरा का आह्वान करने की हमारी समृद्ध परंपरा रही है। हमारी भूमि की सभी 52 शक्ति पीठों में हम देश मातृका यानी मातृभूमि रूपी माता की वंदना करते रहे हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ''अगले पचास वर्ष तक यह हमारा प्रधान स्वर रहेगा - हमारी महान भारत माता। कुछ समय के लिए अन्य देवताओं को हमें भुला देना चाहिए।'' उनकी विख्यात शिष्या भगिनी निवेदिता ने इसी तर्ज पर एक प्रार्थना भी तैयार की थी।
स्वामी रामतीर्थ ने देशभक्ति को व्यावहारिक वेदांत की संज्ञा दी थी। ''भारतभूमि मेरा शरीर है। कन्याकुमारी मेरे पांव हैं, हिमालय मेरा शीर्ष है। मेरी जटाओं से गंगा प्रवाहित होती है, मेरे शीर्ष से ब्रह्मपुत्र और सिंधु निकलती हैं। विंध्यांचल मेरी कमर से बंधा है। कोरोमंडल मेरी बाईं एवं मालाबार मेरी दाईं टांग है। मैं संपूर्ण भारत हूं और इसके पूर्व व पश्चिम मेरे बाजू हैं।''
तमिल के महान कवि और दार्शनिक सी़ सुब्रमण्य भारती ने छोटे बच्चों को मातृभूमि के बारे में बताते हुए कहा, ''छेदामिल्लाता हिंदुस्थानम, अतई देइवमेनरु कुंबिदादी पाप:।'' अर्थात 'ओह शिशु, अखंड भारत की, अपनी देवी की तरह आराधना और उसे प्रेम कर।'
तंत्र के पश्चिमी साधक सर जॉन वुडरॉफ ने पवित्र भारतवर्ष के बच्चों के बारे में कहा है, ''वह अपने वर्ण को बनाए रखने के लिए और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए शक्ति प्राप्त करेंगे, यदि वह अपने देश की सेवा यह सोच कर करेंगे कि श्री भारत की पूजा (सेवा) महाशक्ति की सेवा है। श्री भगवती जो अपने एक रूप में भारत शक्ति बन कर भी आती हैं, वह केवल हिंदुओं की ही देवी नहीं हैं, बल्कि यह विश्व माता का नाम है।''
बंकिम चंद्र की 'नवीन युग के अग्रणी ऋषियों में से एक' के तौर पर प्रशंसा करते हुए महर्षि अरविंद कहते हैं, ''जब तक मातृभूमि खुद को मात्र पृथ्वी या जन समुदाय से अलग प्रकट नहीं करेगी, जब तक वह महान दिव्यता और मातृत्व शक्ति के सौंदर्य के रूप में मस्तिष्क पर आच्छादित नहीं होगी और हृदय को जीत नहीं लेगी और माता के प्रति स्नेह और सेवाभाव से सभी क्षुद्र भय और आशाएं मुक्त नहीं हो जाएंगे, तब तक डूबते देश को बचाने वाले चमत्कारी राष्ट्रप्रेम का उदय नहीं होगा।''
'विज्डम ऑफ इंडिया' पुस्तक में लिन युतांग ने भारत को 'विश्व गुरु' माना है। महान इतिहासकारों ए़ एल़ बेशम आर्नल्ड टॉयन्बी और विचारकों आऱ रॉनल्ड, मैक्समूलर, मोनिएर विलियम्स एवं अल्बर्ट आइंस्टीन ने भारत की प्रशंसा ज्ञान और विद्या की भूमि के तौर पर की है। भारत के महान देशभक्त-क्रांतिकारी श्री ब्रह्मबांधव उपाध्याय के पद्चिन्हों पर चलने वाले मुंबई के बांद्रा स्थित सेंट कैथरीन ऑफ सिएना स्कूल के रेवरेंड फादर एंथनी इलांजीमिट्टम ने तत्व दर्शन में प्रकाशित अपने आलेख 'वेदांतिक इंडिया' में लिखा है, ''यह भारत माता प्रकृति की गोद से निकली है और हमारा यह उपमहाद्वीप अपने आप में एक दुनिया है जिसकी एवरेस्ट सरीखी गोपनीय सूझ-बूझ है, जो हमारी वैदिक संस्कृति में समाहित है।''
इसलिए, इस सच को सूक्ष्मदर्शी से देखने की जरूरत नहीं है कि जो लोग 'वंदे मातरम' और 'भारत माता की जय' का विरोध करते हैं वे देशप्रेमी नहीं हैं और इस पवित्र भूमि पर हमला बोल चुके आक्रांताओं की संतानें हैं। दुर्भाग्यवश, अंग्रेजों से सत्ता प्राप्त कर देश की कमान संभालने वाला नेतृत्व ऐसे ही राष्ट्र-विरोधी और विश्वासघाती ताकतों के हाथों में खेलता रहा।
4 फरवरी, 1938 को मद्रास के तत्कालीन गवर्नर जॉन फ्रांसिस एश्ले अर्सकाइन ने तत्कालीन गवर्नर-जनरल और भारत के वाइसरॉय विक्टर होप को संविधान सभा आयोजनों से वंदे मातरम को हटाए जाने के बारे में लिखा था। उस दौरान इस मुद्दे पर मुस्लिम सदस्य सदन का बहिष्कार करते थे। बाद में, स्वतंत्र भारत में भी यही कहानी दोहराई जाती रही।
आज हमारे सोते हुए धर्माचायार्ें को जगाए जाने की जरूरत है ताकि वे देश के प्रत्येक कोने में भारतवर्ष की मातृभूमि की आराधना को बढ़ावा दें जो कि सभी देवताओं, देवियों, साधुओं, ऋषियों, संन्यासियों और हमारे संप्रदायों की मां है और साथ ही उसकी प्रतिष्ठा में मंदिर भी स्थापित कराए। गौरवान्वित, देशभक्त और आत्मसम्मानी हिंदुओं को अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्ल तृतीया जैसे पर्व भी मनाने चाहिए जो 9 मई, 2016 को आने वाले हैं। यह दिवस श्री भारतमाता की आराधना का शुभ दिन होता है। बेंगलुरू स्थित श्री भारत माता मंदिर के 12 वर्ष पूरे होने पर 24 दिसंबर, 2016 को महाकुंभाभिषेकम का आयोजन किया जाएगा। 14 अप्रैल, 2016 को बैसाखी दिवस से लेकर हम प्रतिदिन लघु भारतचंडी होम का आयोजन कर रहे हैं। इसके अंतर्गत देशमत्रिका पूजा के जरिये भारतशक्ति का आह्वान किया जाता है ताकि वह राष्ट्र-विरोधी शक्तियों और पाप का नाश करे और देश की एकता और अखंडता को बनाए रखे।
साधु प्रो़ वी़ रंगराजन
(लेखक सिस्टर निवेदिता एकेडमी के संस्थापक न्यासी और बेंगलुरू स्थित श्री भारत माता मन्दिर से जुड़े हुए हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

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