गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ? : संजय राउत



अतिथि लेखक - क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है?
तारीख: 18 Apr 2016 12:43:21

एक वर्ग ऐसा है जिसने हमेशा देश विरोधी बातें की हैं और उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया है, और भारत ऐसे लोगों को बर्दाश्त करता रहा है
संजय राउत
(लेखक राज्यसभा सांसद एवं प्रमुख मराठी समाचार पत्र 'सामना' के संपादक हैं)

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में इन दिनों काफी कहा और लिखा जा रहा है। हमारे देश में इस शब्द 'स्वतंत्रता' का मतलब क्या है? हमने स्वतंत्रता की वास्तविक अवधारणा को कभी समझा ही नहीं।  इस कारण पीढियों में स्वतंत्रता क्या होनी चाहिए और क्या नहीं इसे लेकर एक अबूझ भ्रम की स्थिति बनी हुई है। हमारे देश में स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है इसे लेकर कौतुहल बना हुआ है। हम ऐसे लोग हैं जो भगवान जाने किससे स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हममें स्पष्ट समझ नहीं है, हममें जीवन की सही समझ ही नहीं है; और हम कुछ निश्चित विचारों और अवास्तविक विश्वासों से ही स्वतंत्र नहीं हुए हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर वाल्टर ने कहा है, ''आप जो भी कहते हैं वह मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं है, लेकिन आपको वह बात कहने का पूरा अधिकार है जो आप कहना चाहते हैं। यदि कोई आपको आपके इस अधिकार से वंचित करना चाहता है तो मैं आपके लिए संघर्ष करुंगा।'' लोग जो कुछ कहते हैं उस सब पर हमें सहमत होने की कोई जरूरत नहीं है, लोगों के अपने-अपने विचार हो सकते हैं और फिर भी वे एक साथ रह सकते हैं। जरूरी नहीं कि जो लोग हमारे विचारों से सहमत नहीं, वे हमारे दुश्मन हों।

महान अमेरिकी न्यायाधीश होम्स ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस तरह से परिभाषित किया है, ''अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यह नहीं है कि हम उन्हें बोलने दें जिनके विचारों से हम सहमत हैं बल्कि उन्हें बोलने का अवसर देना है जिनसे हम नफरत करते हैं।'' तमाम राजनैतिक दलों के प्रति रूझान रखने वाले और सभी विचारधाराओं के लोगों को अभिव्यक्ति का अवसर मिलना चाहिए, यही लोकतंत्र है। लेकिन हमारे देश में इस तरह की आजादी की अधिकता हो चुकी है। असामाजिक तत्वों को भी अपने देश विरोधी विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए मंच मिल रहा है जो देश के लिए खतरनाक हो सकता है, इससे युवाओं में गलत संदेश जाएगा और  न केवल देश का माहौल खराब होगा बल्कि सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित होगा।

जेएनयू में जो कुछ हुआ वह लोकतंत्र का उपहास था। ''अफजल गुरू जिंदाबाद और ''हम भारत को टुकड़ों में बांट देंगे'' ये नारे कहीं से भी अभिव्यक्ति के आस-पास नहीं थे, इन्हें केवल आतंकवाद से जोड़ा जा सकता है। अफजल गुरू जैसे लोगों ने देश की संपूर्णता और आजादी को कमजोर करने, तोड़ने और उस पर हमला करने की कोशिश की। सर्वोच्च अदालत ने उसे मौत की सजा सुनाई।

जिन लोगों को इस तथ्य पर भरोसा नहीं उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी पर बात करने का अधिकार नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी विचारों का वही लोग समर्थन कर सकते हैं जिनका देश के लिए कोई योगदान नहीं है।

एक वर्ग है जिसने हमेशा देश विरोधी बातें की हैं और उसे आजादी का नाम दिया है। अपने विचारों को व्यक्त करने के नाम पर ऐसे लोगों ने खासतौर पर आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। और भारत ऐसे लोगों को बर्दाश्त करता रहा है। एक तरफ हमारी सेना के जवान देश के लिए अपनी जान दे रहे हैं, उसी समय हम कश्मीर को तोड़कर भारत से अलग करने की बातें बर्दाश्त कर रहे हैं। ये केवल भारत में ही हो सकता है।
ओवैसी जैसा व्यक्ति कह सकता है, ''यदि मेरी गर्दन काट दोगे तब भी मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा'' और उसके बाद भी वह देश में एक संवैधानिक स्थिति में रह सकता है। ये हमारे देश का दुर्भाग्य और अभिव्यक्ति की आजादी है कि हम बेमतलब की बातें बर्दाश्त कर रहे हैं। किसी भी चीज की अधिकता नुकसानदेह होती है, और अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में भी ऐसा ही है। देश में कोई भी व्यक्ति समान नागरिक संहिता और अनुच्छेद 370 पर स्टैंड नहीं लेता लेकिन लोगों की जिंदगियों में हिंसा और जहर घोलने वाले देश विरोधी लोगों को सारे अधिकार दिए जाते हैं।

हमारे देश को सबसे बड़ा खतरा बाहरी लोगों से नहीं है लेकिन भीतर के ऐसे लोगों से हैं जो हमारी मजबूत जड़ों को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। सीमा पर होने वाले हमलों से ज्यादा देश के भीतर रहने वाले कुछ लोग देश को डराते हैं। इसे सही तरह से नियंत्रित करके ही देश को बचाया जा सकता है। ऐसे तत्वों का दमन और राष्ट्रवादी तत्वों, चाहे वे जेएनयू में संघर्ष कर रहे हों या एनआइटी, श्रीनगर में, का समर्थन करने की जरूरत है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश के मूलाधार पर चोट करने की इजाजत किसी को नहीं मिलनी चाहिए। लोगों को सचेत रहना होगा और विविधता में एकता के जरिए देश की अखंडता की रक्षा करनी होगी। राष्ट्र पहले है, बाकी सब चीजें बाद में।


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