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इज्जत की जिंदगी, गरीबी का पैमाना - एन के सिंह

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इज्जत की जिंदगी, गरीबी का पैमाना एन के सिंह, राज्यसभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय सचिव गरीबी की राजनीति उसके अर्थशास्त्र पर भारी है। सरकार उम्मीद कर रही थी कि गरीबी के तेजी से नीचे आने का श्रेय उसे मिलेगा, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता और मध्य वर्ग के लोग इस बात से सकते में हैं कि गरीबी के आधार को इतना नीचा क्यों रखा गया है? राज्य सरकारें और वे संस्थाएं चिंता में हैं, जिन्हें गरीबी के लिए किए जाने वाले प्रावधानों का फायदा मिलता है। और सबसे बढ़कर यह मानव सम्मान का मामला है। आम धारणा यह है कि गरीबी की रेखा या गरीबों की संख्या को तय करने तरीका सम्मानजनक जिंदगी तक तो पहुंचना ही चाहिए। लेकिन क्या गरीबी की कोई ऐसी परिभाषा है, जो सबको स्वीकार्य हो? हम गरीब को कैसे परिभाषित करें, जबकि यह एक तुलनात्मक स्थिति है? आर्थिक रणनीति का तरीका यह होता है कि गरीबी का ऐसा पैमाना बनाया जाए, जिससे गरीब कम गरीब से अलग दिखे। ताजा विवाद योजना आयोग के उन आंकड़ों से पैदा हुआ है, जिनके अनुसार गरीबों की संख्या में तेजी से कमी आई है। ये अनुमान बताते हैं कि साल 2004-05 से लेकर 2011-12 तक 13.7 करोड़ लोग, यानी आबादी क