राहुल गांधी के पीछे खड़ी विदेशी ताकतों के प्रभाव को समझना होगा, भारत फिर किसी अंग्रेज का गुलाम नहीं बनेगा - अरविन्द सिसोदिया
राहुल गांधी के पीछे खड़ी विदेशी ताकतों के प्रभाव को समझना होगा, भारत फिर किसी अंग्रेज का गुलाम नहीं बनेगा - अरविन्द सिसोदिया
भारत की स्वतंत्रता, संप्रभुता और राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा का समय - सिसोदिया
अरविन्द सिसोदिया
भारत ने सदियों की गुलामी के बाद 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त की। यह स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करने के राष्ट्रीय अधिकार की स्थापना है । भारत का शासन, उसकी नीतियाँ और उसकी राजनीतिक दिशा भारत की जनता तय करेगी—किसी विदेशी शक्ति, संस्था अथवा बाहरी दबाव के अधीन नहीं ! किन्तु विश्व भूराजनीती भारत में भी विदेशी स्वार्थों के हस्तक्षेप को जबरदस्ती थोपने की कोशिश करती प्रतीत हो रही है।
आज दुनिया का स्वरूप बदल चुका है। अब किसी देश को गुलाम बनाने के लिए सेना भेजना ही आवश्यक नहीं है। आर्थिक दबाव, विदेशी वित्तपोषण, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का प्रभाव, प्रचार माध्यमों के जरिए विचारों का प्रसार, सामाजिक संचार माध्यमों पर दुष्प्रचार और राजनीतिक संपर्कों के माध्यम से भी किसी देश की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करने के प्रयास हो सकते हैं। इसलिए भारत को ऐसे सभी संभावित प्रभावों के प्रति सजग रहना होगा।
इस संदर्भ में राहुल गांधी और कांग्रेस के कुछ नेताओं के विदेशी संपर्कों, विदेशों में दिए गए वक्तव्यों तथा विदेशी संस्थाओं से जुड़े प्रसंगों पर सार्वजनिक चर्चा होना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल और नेता से यह पूछा जा सकता है कि उसके विचारों, संपर्कों और गतिविधियों का राष्ट्रीय हितों से क्या संबंध है। लेकिन इन प्रश्नों का उत्तर प्रमाणों, तथ्यों और पारदर्शिता के आधार पर ही खोजा जाना चाहिए।
जॉर्ज सोरोस और भारत की राजनीति पर विदेशी टिप्पणियाँ
विदेशी प्रभाव की चर्चा में अमेरिकी खरबपती जॉर्ज सोरोस का नाम विशेष रूप से सामने आता है। फरवरी 2023 में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अडानी समूह और भारतीय राजनीति पर टिप्पणी की थी। उन्होंने अडानी समूह के संकट से प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक स्थिति कमजोर होने और भारत में लोकतांत्रिक पुनरुत्थान की संभावना बनने की बात कही थी। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ऐसी टिप्पणियों की आलोचना की थी।
सोरोस द्वारा स्थापित ओपन सोसाइटी फाउंडेशन विभिन्न देशों में नागरिक समाज, लोकतंत्र और अधिकारों से संबंधित गतिविधियों को आर्थिक सहायता देता रहा है। किसी भी विदेशी संस्था को भारत में काम करने का अधिकार कानूनों के अधीन है। साथ ही यह पूछना भी उचित है कि विदेशी धन कहाँ से आता है, किस उद्देश्य से दिया जाता है और उसका उपयोग किस प्रकार होता है। हालांकि, किसी संस्था की गतिविधियों अथवा राजनीतिक टिप्पणी मात्र से किसी षड्यंत्र का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
सोनिया गांधी और विदेशी संस्थाओं से जुड़े प्रश्न
सोनिया गांधी का नाम भी विदेशी संस्थाओं से जुड़े राजनीतिक विमर्श में उठता रहा है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लोकतांत्रिक नेताओं के मंच से उनके जुड़ाव का उल्लेख सार्वजनिक रूप से किया गया है। दिसंबर 2024 में भारतीय जनता पार्टी ने ओपन सोसाइटी फाउंडेशन और कश्मीर से संबंधित गतिविधियों के संदर्भ में उनके कथित संबंधों पर प्रश्न उठाए थे।
इन आरोपों की निष्पक्ष जाँच और संबंधित पक्षों की स्पष्ट प्रतिक्रिया आवश्यक है। किसी राजनीतिक आरोप को प्रमाणित तथ्य मान लेना उचित नहीं, लेकिन राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर पारदर्शिता की माँग करना भी अनुचित नहीं है। विदेशी संस्थाओं से जुड़े किसी भी सार्वजनिक पद, आर्थिक सहायता अथवा गतिविधि का विवरण कानून और सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में होना चाहिए।
सैम पित्रोदा के वक्तव्य और विदेशी दृष्टिकोण
सैम पित्रोदा लंबे समय तक गांधी परिवार के निकट राजनीतिक सलाहकार और कांग्रेस के विदेश विभाग से जुड़े प्रमुख चेहरों में रहे हैं। अप्रैल 2024 में विरासत कर को लेकर उनकी टिप्पणी और मई 2024 में भारतीयों की शारीरिक बनावट को क्षेत्रीय आधार पर अलग-अलग बताने वाले उनके वक्तव्य व्यापक विवाद का कारण बने।
उनके वक्तव्यों पर देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने कांग्रेस के विदेश विभाग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और बाद में फिर नियुक्त किए गए। ऐसे प्रसंग यह प्रश्न उठाते हैं कि भारत की विविधता, सामाजिक संरचना और आर्थिक नीतियों पर सार्वजनिक जीवन के जिम्मेदार लोगों की भाषा कितनी सावधान और संवेदनशील होनी चाहिए।
राहुल गांधी की विदेश यात्राएँ और पारदर्शिता का प्रश्न
राहुल गांधी की विदेश यात्राएँ भी सार्वजनिक चर्चा और राजनीतिक प्रश्नों का विषय रही हैं। उनकी कुछ विदेश यात्राओं, उनके कार्यक्रमों और विदेशी मंचों पर हुई बैठकों को लेकर समय-समय पर राजनीतिक दलों ने सवाल उठाए हैं। विशेष रूप से ऐसी यात्राओं के संदर्भ में, जिनकी जानकारी पहले सार्वजनिक रूप से विस्तार से उपलब्ध नहीं होती, यह जानना उचित है कि यात्रा का उद्देश्य क्या था, किन लोगों और संस्थाओं से मुलाकात हुई तथा उन मुलाकातों का विषय क्या था।
यह स्पष्ट रहना चाहिए कि किसी नेता की निजी या राजनीतिक विदेश यात्रा अपने-आप में संदेह का प्रमाण नहीं है। लेकिन जब कोई व्यक्ति देश के प्रमुख विपक्षी नेता की भूमिका निभा रहा हो, तब उसके महत्वपूर्ण विदेशी संपर्कों और सार्वजनिक गतिविधियों के बारे में उचित पारदर्शिता अपेक्षित है। यदि विदेशों में राजनीतिक, आर्थिक अथवा रणनीतिक विषयों पर बातचीत होती है, तो जनता को उसके उद्देश्य और संदर्भ की जानकारी मिलनी चाहिए।
भारत की राजनीति में विदेशी संपर्क कोई नई बात नहीं है। दुनिया के अनेक देशों के राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच संवाद होता है। प्रश्न संपर्क होने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि उन संपर्कों के माध्यम से भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप न हो।
राफेल, चीन, पेगासस और विदेशी कंपनियों से जुड़े विवाद
राहुल गांधी ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर तत्कालीन सरकार पर गंभीर सवाल उठाए थे और अनियमितताओं के आरोप लगाए थे। यह उनका राजनीतिक विरोध का प्रमुख मुद्दा रहा। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में जाँच की माँग वाली याचिकाएँ खारिज कीं और 2019 में पुनर्विचार याचिकाएँ भी खारिज कर दीं। राफेल प्रकरण में राहुल गांधी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के कथन का गलत संदर्भ देने पर उन्हें खेद भी व्यक्त करना पड़ा था। इसलिए इस विवाद को उसके पूरे न्यायिक घटनाक्रम के साथ देखना आवश्यक है।
चीन के साथ कांग्रेस के संपर्कों का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। अगस्त 2008 में कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए थे। उस अवसर पर राहुल गांधी और चीनी नेता शी चिनफिंग की उपस्थिति की खबरें प्रकाशित हुई थीं। इस समझौते में दोनों दलों के बीच संवाद और आदान-प्रदान की व्यवस्था का उल्लेख था। इसे भारत सरकार और चीन के बीच कोई गुप्त संधि बताना सही नहीं होगा, लेकिन चीन के साथ किसी राजनीतिक दल के ऐसे संपर्कों का पूरा विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।
पेगासस जासूसी प्रकरण में राहुल गांधी और विपक्ष ने सरकार से जवाब माँगा था। सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में गठित तकनीकी समिति ने 29 मोबाइल फोन की जाँच की, लेकिन उनमें पेगासस के उपयोग का निर्णायक प्रमाण नहीं मिला। साथ ही समिति ने केंद्र सरकार के सहयोग न करने की बात भी दर्ज की। इस प्रकरण ने नागरिकों की निजता, सरकारी निगरानी और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन का गंभीर प्रश्न खड़ा किया।
हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद अडानी समूह पर लगे आरोप भी भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय विमर्श का बड़ा विषय बने। राहुल गांधी और कांग्रेस ने इन आरोपों के आधार पर सरकार से जवाबदेही तथा जाँच की माँग की। अडानी समूह ने आरोपों को खारिज किया। इस मामले में विदेशी वित्तीय संस्थाओं, निवेशकों और भारतीय नियामक संस्थाओं की भूमिका की निष्पक्ष जाँच महत्वपूर्ण है; केवल विदेशी रिपोर्ट को अंतिम सत्य या बिना जाँच के षड्यंत्र मान लेना दोनों ही उचित नहीं हैं।
स्टारलिंक के भारत में प्रवेश और उसके नियामकीय अनुमोदन को लेकर भी बहस हुई। एलन मस्क ने भारत में सेवा शुरू करने की अनुमति में देरी पर सवाल उठाए और राहुल गांधी ने उनके वक्तव्य पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी। यह मामला विदेशी तकनीकी कंपनियों के भारत में प्रवेश, दूरसंचार सुरक्षा, आँकड़ों की संप्रभुता और देश के नियमों के पालन से जुड़ा है। किसी भी विदेशी कंपनी को भारत में काम करने की अनुमति राष्ट्रीय सुरक्षा और भारतीय कानूनों के अनुरूप ही मिलनी चाहिए।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत की अर्थव्यवस्था पर की गई टिप्पणी के समर्थन में राहुल गांधी के वक्तव्य भी चर्चा में रहे। वहीं, एलन मस्क के साथ स्टारलिंक के मुद्दे पर उनका सार्वजनिक संवाद हुआ। इन घटनाओं को किसी विदेशी नेता या उद्योगपति के साथ राजनीतिक सहमति के प्रमाण के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए, लेकिन यह प्रश्न अवश्य उठता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और नीतियों पर विदेशी नेताओं की टिप्पणियों का भारतीय राजनीतिक विमर्श में किस प्रकार उपयोग किया जाता है।
मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने 2024 के चुनावों के संदर्भ में भारत की सत्ता में बदलाव का गलत उल्लेख किया था। इस पर भारत सरकार की ओर से आपत्ति दर्ज की गई और मेटा की भारतीय इकाई ने इसे अनजाने में हुई त्रुटि बताते हुए क्षमा माँगी। यह घटना बताती है कि वैश्विक सामाजिक संचार कंपनियों के वक्तव्यों और भारत से संबंधित सूचनाओं की तथ्यात्मक शुद्धता पर निगरानी और जवाबदेही आवश्यक है।
इन सभी प्रसंगों का महत्व इस बात में है कि भारत की रक्षा खरीद, चीन से राजनीतिक संवाद, नागरिकों की निजता, विदेशी निवेश, दूरसंचार सुरक्षा और वैश्विक डिजिटल मंचों से जुड़े निर्णयों में पारदर्शिता बनी रहे। किसी भी नेता के विरुद्ध आरोप लगाने के बजाय प्रत्येक मामले में दस्तावेज, तथ्य और जवाबदेही को आधार बनाया जाना चाहिए।
विदेशों में भारत की राजनीति पर बयान और राष्ट्रीय हित
मार्च 2023 में राहुल गांधी ने लंदन और अन्य विदेशी मंचों पर भारत के लोकतंत्र, संसद और राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर वक्तव्य दिए थे। भाजपा ने इन वक्तव्यों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि वे भारत की छवि को विदेशों में नुकसान पहुँचा रहे हैं। राहुल गांधी ने यह स्पष्ट किया था कि उन्होंने विदेशी देशों से भारत में हस्तक्षेप करने की माँग नहीं की है।
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन विदेशों में देश की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों पर बोलते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि आलोचना और विदेशी हस्तक्षेप को आमंत्रित करने के बीच स्पष्ट अंतर बना रहे। भारत की समस्याओं का समाधान भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनता के माध्यम से ही होना चाहिए।
भारत को किन बातों के प्रति सजग रहना होगा?
आज राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा केवल सीमाओं पर सैनिकों की तैनाती से नहीं होती। इसके लिए आर्थिक, वैचारिक, तकनीकी और राजनीतिक स्तर पर भी सतर्कता आवश्यक है।
विदेशी धन से संचालित गतिविधियों की पारदर्शिता, राजनीतिक दलों के विदेशी संपर्कों का उचित विवरण, सामाजिक संचार माध्यमों पर फैलाए जाने वाले दुष्प्रचार की पहचान, साइबर सुरक्षा और राष्ट्रीय संस्थाओं की स्वतंत्रता—ये सभी विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
भारत में काम करने वाली प्रत्येक विदेशी संस्था को देश के कानूनों का पालन करना चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल या नेता को विदेशी प्रभाव से लाभ पहुँचाने अथवा देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का माध्यम बनने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। साथ ही सरकार को भी इन नियमों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि निष्पक्ष और समान रूप से करना चाहिए।
भारत फिर किसी अंग्रेज का गुलाम नहीं बनेगा!
भारत ने अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाने के लिए लंबा संघर्ष किया था। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन इसलिए बलिदान नहीं किया था कि आज भारत की नीतियाँ किसी विदेशी संस्था, विदेशी पूँजी अथवा बाहरी राजनीतिक दबाव से प्रभावित हों। स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनता, उसका संविधान और उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था है।
राहुल गांधी हों या कोई अन्य राजनीतिक नेता—सभी को अपने विदेशी संपर्कों, यात्राओं और सार्वजनिक वक्तव्यों के विषय में उचित पारदर्शिता रखनी चाहिए। इसी प्रकार विदेशी संस्थाओं की गतिविधियों की जाँच भी प्रमाणों और कानून के आधार पर होनी चाहिए। न तो किसी को बिना प्रमाण दोषी ठहराया जाना चाहिए और न ही राष्ट्रीय हितों से जुड़े गंभीर प्रश्नों को राजनीतिक कहकर टाल देना चाहिए।
भारत की सत्ता का निर्णय भारत की जनता करेगी। भारत की नीतियाँ भारत के संविधान और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप बनेंगी। किसी विदेशी शक्ति को भारत की राजनीति की दिशा निर्धारित करने का अधिकार नहीं है।
भारत स्वतंत्र था, स्वतंत्र है और स्वतंत्र ही रहेगा। भारत फिर किसी अंग्रेज का गुलाम नहीं बनेगा!
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