शनिवार, 15 सितंबर 2012

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक पूजनीय श्री सुदर्शन जी का निधन


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15 सितंबर 2012 :  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक पूजनीय श्री. सुदर्शन जी का आज, शनिवार सुबह 6:50 पर हृदयाघात से रायपुर प्रवास के दौरान निधन हो गया। वे 81 वर्ष के थे। स्व. श्री. सुदर्शन जी का अंतिम संस्कार कल, रविवार  दिनांक 16 सितंबर 2012  को अपरान्ह 3:00 बजे नागपुर में होगा।
स्व. श्री. सुदर्शन संघ प्रमुख के पद से हटने के बाद से भोपाल में रह रहे थे और संघ के विभिन्न कार्यों में मार्गदर्शक की भूमिका में थे। कल शाम वह एक पुस्तक के विमोचन के सिलसिले में रायपुर गए थे। संयोग से उनका जन्म भी रायपुर में ही हुआ था।
आज सुबह जब अपना नित्य का टहलने का क्रम पूरा कर सुदर्शन जी वापस लौटे तभी उन्हें कुछ थकावट और बैचेनी महसूस हुई। उसके कुछ देर बाद ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
संक्षिप्त परिचयबाल्यकाल से ही अद्भुत प्रतिभा संपन्न तथा अनेक विषयों का गहन अध्ययन अन्वेषक वृत्ति से करनेवाले, कई भाषाओं के मर्मज्ञ, प्रभावी वक्ता, तथा कई पुस्तकों के रचयिता निवर्तमान सरसंघचालक श्री. सुदर्शन जी का जन्म छत्तीसगढ़ प्रान्त के रायपुर नगर में १८ जून १९३१ को हुआ था। आपका पूरा नाम कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन है। उनका परिवार कर्नाटक प्रान्त का रहने वाला माना जाता है। परन्तु वास्तव में उनके पूर्वज तमिलनाडु के संकेती के रहने वाले है और इसलिए उनकी मातृभाषा तमिल और तेलुगु मिश्रित शकैटी है। सुदर्शन जी के पिताजी श्री. सीतारामय्या मध्य प्रदेश शासन के वन विभाग में सेवारत होने के कारण मध्य प्रदेश आये थे। अपने सेवाकाल में प्रान्त के कई स्थानों पर रहे। उनके साथ रहते हुए ही दमोह, मंडला, रायपुर आदि स्थानों पर सुदर्शन जी की प्राथमिक शिक्षा पूरी हुई। आज के महाराष्ट्र का चंद्रपुर उस समय मध्य प्रदेश में ही हुआ करता था। अत: जब पिता जी चंद्रपुर में पदस्थ थे तब वहां से उन्होंने अपनी हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके पश्चात सन १९५४ में जबलपुर से दूरसंचार विषय में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
तीन भाई व एक बहन में सबसे बड़े सुदर्शन जी ही थे। बचपन से ही उनका सम्बन्ध संघ से हो गया था। परिणाम यह हुआ की अभियांत्रिकी उपाधि प्राप्त करते ही उन्होंने जीवनभर अविवाहित रहते हुए संघ के माध्यम से समाज कार्य करने के लिए प्रचारक जीवन स्वीकार कर लिया और उनकी पहली नियुक्ति छत्तीसगढ़ प्रान्त के रायगढ़ जिला प्रचारक के रूप में हुई। वे रीवा विभाग प्रचारक भी रहे। १९६४ में ही उन की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर उन्हें मध्य भारत के प्रान्त प्रचारक की जिम्मेदारी सौंपी गई।
मध्य भारत के प्रान्त प्रचारक रहते हुए ही सन १९६९ में उन्हें अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख का दायित्व भी दिया गया। सन १९७५ में आपातकाल की घोषणा हुई और पहले ही दिन इंदौर में उन को गिरफ्तार कर लिया गया। पुरे उन्नीस माह उन्होंने कारावास में बिताये। आपातकाल समाप्ति के पश्चात सन १९७७ में उन्हें पूर्वांचल [असम, बंगाल और पूर्वोत्तर राज्य] का क्षेत्र प्रचारक बनाया गया। क्षेत्र प्रचारक के रूप में उन्होंने वहाँ के समाज में सहज रूप से संवाद करने के लिए असमिया, बंगला भाषाओँ पर प्रभुत्व प्राप्त किया तथा पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातियों की अलग अलग भाषाओँ का भी पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया। कन्नड़, बंगला, असमिया, हिंदी, इंग्लिश, मराठी, इत्यादि कई भाषाओँ में उन्हें धाराप्रवाह बोलते हुए देखना यह कई लोगों के लिए एक आश्चर्य तथा सुखद अनुभूति का विषय होता था।
सन १९७९ में उन्हें अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख व १९९० में सह-सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया। अपनी लंबी शारीरिक अस्वस्थता के कारण श्री. राजेंद्र सिंह जी ने १० मार्च २००० को अवकाश लेने की घोषणा करते हुए अपने स्थान पर सुदर्शन जी को सरसंघचालक मनोनीत किया। इतनी प्रतिभा और संघ के सर्वोच्च स्थान पर होने के बावजूद उनकी सहजता व सरलता के कारण समाज के विभिन्न स्तरों के लोग तथा स्वयंसेवक उन्हें विना संकोच मिलकर अपनी अपनी बात रखते थे।
उनके ९ वर्ष के कार्यकाल में संघ के ७५ वर्ष की पूर्ति के निमित्त राष्ट्र जागरण अभियान, द्वितीय सरसंघचालक श्री. गुरूजी की जन्मशती, आदि कई अभियानों के माध्यम से संघ कार्य का विस्तार हुआ। ग्रामविकास के कार्य, स्वदेशी तंत्रज्ञान, आदि विषयों के माध्यम से साम्यवाद तथा पाश्चिमात्य जगत के भौतिकवाद से अलग हटकर हिंदू समग्र चिंतनपर आधारीत विकासपथ के अन्वेषण को उन्होंने प्रोत्साहित किया।
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