सोमवार, 30 मार्च 2015

भाजपा : दुनिया की नंबर वन पार्टी राजनीति बनी



राजनीति के मैदान में दुनिया की नंबर वन पार्टी बनी BJP

Mar 30 2015

नई दिल्ली (एसएनएन): भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है. सदस्यों के मामले में बीजेपी ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को पीछे छोड़ते हुए यह उपलब्धि हासिल की है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के जहां अब 8.4 करोड़ सदस्य हैं तो वहीं बीजेपी के सदस्यों की संख्या 8 करोड़ 79 लाख हो गई है.

पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अमित शाह ने सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए अभियान चलाने का फैसला किया था. पीएम नरेंद्र मोदी ने एक नवंबर, 2014 को नई दिल्ली में सदस्यता अभियान का शुभारंभ किया. उसी वक्त शाह ने यह घोषणा की थी कि वे बीजेपी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाना चाहते हैं. इसके लिए 10 करोड़ सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा गया था. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पार्टी का सदस्यता अभियान अभी भी जारी है. पार्टी सूत्रों के अनुसार, एक अप्रैल के बाद भी सदस्यता अभियान जारी रहेगा. इसके जरिये बीजेपी 10 करोड़ सदस्य बनाने का लक्ष्य हासिल करने का प्रयास करेगी.

आपको बता दें कि इस समय चीन में भी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्यता अभियान चल रहा है लेकिन बीजेपी ने उसे फिलहाल पीछे छोड़ दिया है. इस सदस्यता अभियान में बीजेपी ने दक्षिण भारत में भी नए सदस्य बनाए हैं. पार्टी विस्तार की दिशा में यह अभियान काफी अहम माना जा रहा है.

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राष्ट्रीय सदस्यता अभियान के प्रभारी डॉ. दिनेश शर्मा के मुताबिक


नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी अब विश्व की सबसे बडी पार्टी बन गई है। राष्ट्रीय सदस्यता अभियान के प्रभारी डॉ. दिनेश शर्मा के मुताबिक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को पीछे छोड़ते हुए बीजेपी ने पूरे देश में 8 करोड़ 82 लाख सदस्य बनाए हैं। भाजपा ने इस मामले में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को पछाड़ा है जिसकी सदस्य संख्या पिछले साल नवंबर में आठ करोड़ 67 लाख थी।
शर्मा ने बताया कि हर रोज पार्टी के 13 से 14 लाख नए सदस्य बन रहे हैं। सदस्यता अभियान 31 मार्च को खत्म हो रहा है लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार और असम में स्थानीय निकाय के चुनावों और झारखंड में विधानसभा चुनावों के कारण सदस्यता अभियान प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि इन राज्यों के कार्यकर्ता सदस्यता अभियान को 31 मार्च से आगे भी जारी रखने का अनुरोध कर रहे हैं। वह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से इस पर विचार करने का आग्रह करेंगे।
भाजपा के विधान के अनसुार हर छह साल में पार्टी के सभी सदस्यों का नवीकरण होता और नए सदस्य बनाए जाते हैं। सदस्यता अभियान की शुरुआत नवंबर में की गई थी। तब शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहला सदस्य बनाया था। उसी वक्त शाह ने यह घोषणा की थी कि वह बीजेपी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाना चाहते हैं। इसके लिए दस करोड़ सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
बीजेपी के इस सदस्यता अभियान में सबसे ज्यादा सदस्य उत्तर प्रदेश में बनाए हैं। प्रदेश में करीब डेढ़ करोड़ सदस्य बीजेपी से जुड़े हैं। पार्टी का लक्ष्य उत्तर प्रदेश में दो करोड़ सदस्य बनाने का है। राज्य में 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस लिहाज से पार्टी इस सदस्यता अभियान को लेकर काफी उत्साहित है।

आतंक के संदर्भ में श्रीराम की प्रासंगिकता - प्रमोद भार्गव



आतंक के संदर्भ में श्रीराम की प्रासंगिकता
- प्रमोद भार्गव

(28 मार्च, श्रीरामनवमी पर प्रासंगिक लेख)
दुनिया में बढ़ रहे आतंकवाद को लेकर अब जरूरी हो गया है कि इनके समूल विनाश के लिए
भगवान श्री राम जैसी सांगठनिक शक्ति और दृढ़ता दिखाई जाए। आतंकवादियों की
मंशा दहशत के जरिए दुनिया को इस्लाम धर्म के बहाने एक रूप में ढालने की है।
जाहिर है, इससे निपटने के लिए दुनिया के आतंक से पीड़ित देशों में परस्पर
समन्वय और आतंकवादियों से संघर्ष के लिए भगवान राम जैसी दृढ़ इच्छा शक्ति की
जरुरत है।
- प्रमोद भार्गव
दुनिया के शासकों अथवा महानायकों में भगवान राम ही एक ऐसे अकेले योद्धा हैं, जिन्होंने आतंकवाद के समूल विनाश के लिए एक ओर जहां आतंक से पीड़ित मानवता को संगठित  किया, वहीं आतंकी स्त्री हो अथवा पुरुष किसी के भी प्रति उदारता नहीं बरती। अपनी इसी रणनीति और दृढ़ता के चलते ही राम त्रेतायुग में भारत को राक्षसी  या आतंकी शक्तियों से मुक्ति दिलाने में सफल हो पाए। उनकी आतंकवाद पर विजय ही इस बात की पर्याय रही कि सामूहिक जातीय चेतना से प्रगट राष्ट्रीय भावना ने इस महापुरुष का दैवीय मूल्यांकन किया और भगवान विष्णु के अवतार का अंश मान लिया। क्योंकि अवतारवाद जनता-जर्नादन को निर्भय रहने का विश्वास, सुखी व संपन्न रहने के अवसर और दुष्ट लोगों से सुरक्षित रहने का भरोसा दिलाता है।

अवतारवाद के मूल में यही मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति काम करती है। लेकिन राम  वाल्मीकि के रहे हों चाहे गोस्वामी तुलसीदास के अलौकिक शक्तियों से संपन्न  होते हुए भी वे मनुष्य हैं और उनमें मानवोचित गुण व दोष हैं।
राम के पिता अयोध्या नरेश भले ही त्रेतायुग में आर्यावर्त के चक्रवर्ती सम्राट थे, किंतु उनके कार्यकाल में कुछ न कुछ ऐसी कमियां जरुर थीं कि रावण की लंका से थोपे गए आतंकवाद ने भारत में मजबूती से पैर जमा लिए थे। गोस्वामी तुलसीदास ने  इस सर्वव्यापी आतंकवाद का उल्लेख कुछ इस तरह से किया है -
निसिचर एक सिंधु महुं रहई। करि माया नभु के खग गहई।
गहई छांह सक सो न उड़ाई। एहि विधि सदा गगनचर खाई।

यानी ये आतंकी अनेक मायावी व डरावने रूप रखकर नगरों तथा ग्रामों को आग के हवाले कर देते थे। ये उपद्रवी ऋषि, मुनियों और आम लोगों को दहशत में डालने की  दृष्टि से पृथ्वी के अलावा आकाश एवं सागर में भी आतंकी घटनाओं को अंजाम  देने से नहीं चूकते थे। इनके लिए एक संप्रभु राष्ट्र की सीमा, उसके कानून  और अनुशासन के कोई अर्थ नहीं रह गए थे। बल्कि इनके विंध्वंस में ही इनकी  खुशी छिपी थी।

ऐसे विकट संक्रमण काल में महर्षि विश्वामित्र ने आतंकवाद से कठोरता से निपटने  के रास्ते खोजे और राम से छात्र जीवन में ही राक्षसी ताड़का का वध कराया। उस समय लंकाधीश रावण अपने साम्राज्य विस्तार में लगा था। ताड़का कोई मामूली स्त्री नहीं थी। वह रावण के पूर्वी सैनिक अड्ढे की मुख्य सेना नायिका थी। राम का पहला आतंक विरोधी संघर्ष इसी महिला से हुआ था। जब राम ने ताड़का पर स्त्री होने के नाते, उस पर हमला करने में संकोच किया, तब  विश्वामित्र ने कहा, आततायी स्त्री हो या पुरुष वह आततायी होता है, उस पर  दया धर्म - विरुद्ध है। राम ने ऋषि की आज्ञा मिलते ही महिला आतंकी ताड़का को सीधे युद्ध में मार गिराया। ताड़का के बाद राम ने देश के लिए संकट बनीं  सुरसा और लंकिनी का भी वध किया। शूर्पनखा के नाक-कान लक्ष्मण ने कतरे। भारत की धरती पर आतंकी विस्तार में लगे सुबाहु, खरदूषण और मारीच को मारा।
दरअसल राजनीति के दो प्रमुख पक्ष हैं, शासन धर्म का पालन और युद्ध धर्म का पालन। रामचरितमानस की यह विलक्षणता है कि उसमें राजनीतिक सिद्धांतों और  लोक-व्यवहार की भी चिंता की गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में रामकथा संघर्ष और  आस्था का प्रतीक रूप ग्रहण कर लोक कल्याण का रास्ता प्रशस्त करती है। 

महाभारत में भी कहा गया है कि ‘राजा रंजयति प्रजा’ यानी राजा वही है, जो प्रजा के सुख-दुख की चिंता करते हुए उसका पालन करे।

राम-रावण युद्ध भगवान राम ने श्रीलंका को आर्यावर्त के अधीन करने की दृष्टि से नहीं लड़ा था, यदि उनकी ऐसी इच्छा होती तो वे रावण के अंत के बाद विभीषण को लंका का अधिपति बनाने की बजाए, लक्ष्मण को बनाते या फिर हनुमान, सुग्रीव या  अंगद में से किसी एक को बनाते? उनका लक्ष्य तो केवल अपनी मातृभूमि से जहां  आतंकवाद खत्म करना था, वहीं उस देश को भी सबक सिखाना था, जो आतंक का  निर्यात करके दुनिया के दूसरे देशों की शांति भंग करके, साम्राज्यवादी
विस्तार की आकांक्षा पाले हुए था। ऐसे में भारत के लिए राम की प्रासंगिकता वर्तमान आतंकी परिस्थितियों में और बढ़ गई है। इससे देश के शासकों को  अभिप्रेरित होने की जरुरत है।
- लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)


संगठन के कार्यकर्ताओं को श्रीराम-चरित से सन्देश




संगठन के कार्यकर्ताओं को श्रीराम-चरित से सन्देश'
 - राघवलु, संयुक्त महामंत्री, विहिंप
राम शब्द में तीन बीजाक्षर है- ‘र’कार, ‘अ’कार, और ‘म’कार| ‘र’ अग्नि बीज है, ‘अ’ आदित्य बीज है, ‘म’ चंद्र बीज है|
सृष्टि में अग्नि, सूर्य और चंद्रमा यह तीन ही प्रकाश देनेवाले है| ये तीन एक राम शब्द में समाविष्ट है| यदि हम एक बार मनसे राम कहेंगे तो शरीर के अंदर प्रकाश उत्पन्न होता है| कोटी-कोटी बार राम जप करनेसे ही शबरी सशरीर स्वर्ग पहुँची, हनुमान देवता स्वरूप बने और वाल्मीकि ऋषी बनें| इतना सामर्थ्य है राम शब्द में|
श्रीराम का आदर्श जीवन
त्रेतायुग में बहुत आतंकवाद फैला था| उस समय ऋषि-मुनियों की हत्या करना, यज्ञ-याग आदि का विध्वंस करना, कन्या-अपहरण, अपनी राज्य सत्ता के लिए समाज में पूरा आतंक निर्माण करना, ऐसी उस समय की परिस्थिति रही| इस पृष्ठभूमि में श्रीराम एक आदर्श राजा एवं सामान्य मानव के रूप में कैसे जीवन चलाएँ, यह उनके जीवन से हमें सीखना हैं|
स्थितप्रज्ञ राम
श्रीराम को राज्याभिषेक की जानकारी मिली, उसके बाद दो घंटे के अंदर कोपगृह में बुलाकर १४ वर्ष जंगल जाने के लिए आज्ञा मिली| लेकिन दोनों को सहर्ष स्वीकार करते हुए श्रीराम ने अपने जीवन में कृती में लाया है|
उदये सविता रक्तो रक्तश्चालस्तमने तथा|
सम्पतौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥
(सूर्योदय के समय जैसे सूरज का वर्ण होता है, वहीं वर्ण सूर्यास्त के समय भी होता है| वैसे ही समृद्धि तथा
विपत्काल में भी श्रेष्ठ लोग स्थितप्रज्ञ रहते हैं|)
राज्याभिषेक की वार्ता सुनकर तथा वनगमन की जानकारी सुनकर, दोनों ही स्थितियों में श्रीराम अचल थे| इतना ही नहीं, सब प्रकार से सरल जीवन अपनाया| अयोध्या का संपन्न अंत:पुर छोड़कर जंगल में आए| पर्ण-कुटिर में रहने लगे| फल-पत्ते खाकर जीने लगे| जमीन पर सोने लगे|
निरंतर और प्रभावी संपर्क
अगस्त्य ऋषि से संपर्क करते हुए आदित्य हृदय महामंत्र पाया है और भरद्वाज ऋषि से संपर्क करते हुए समंत्रित अस्त्र-शस्त्र पाए| अत्रि-अनसूया से संपर्क करते हुए समंत्रित वस्त्र पाए| सुग्रीव से संपर्क करते हुए महाबल वानरसेना पाए| नील-नल को भी संपर्क करके रामसेतु निर्माण किया| शक्तिमान महारावण को संहार करके अयोध्या वापस आए| संपर्क से सबकुछ पाए| किसी भी स्थिति में भरत से ना सैन्य मॉंगा ना धन|
कार्यकर्ता का चयन
सीता की खोज चल रही थी, उस समय श्रीराम के सामने वाली और सुग्रीवआए| किसको चुनना? वाली के पास शक्ति, साम्राज्य, सेना, संपत्ती सब कुछ है| लेकिन चरित्र, सत्य, धर्म और नम्रता आदि गुण नहीं है| ऐसी व्यक्ति धर्म संस्थापना के लिए योग्य नहीं है| इसलिए वाली को समाप्त कर दिया| जो गुण आवश्यक थे वे सुग्रीव के पास थे| इसके कारण उसको स्वीकारा| संगठन का कार्य करते समय व्यक्ति का या सहयोगी का चयन करना हो तो राम का आदर्श आवश्यक है|
यश मिला तो साथियों में बॉंटना
रावण-संहार के बाद अंगद, सुग्रीव, नील,नल, विभिषण, हनुमान, जांबुवंत सभी को लेकर श्रीराम अयोध्या पहुँचे| वहॉं इन सभी सहयोगीयों का अयोध्या वासीयोंको परिचय कराया| सेतु-बंधन इन्ही लोगों ने किया है| रावण-संहार इन्ही लोगों ने किया है, ऐसा बताया| यह सब मैंने किया, मैंने करवाया ऐसा एक भी शब्द बोले नहीं| यही संगठन कार्यकर्ता की विशेषता है|
शत्रु से भी सीखना
रावण बाणसे विद्ध होकर गिरने के बाद राम और लक्ष्मण रावण के पास पहुँचकर ‘तुमने जीवन मे क्या सीखा है’ ऐसा प्रश्न किया| तब रावण ने बताया ‘मैंने धरती से स्वर्ग तक सिढ़िया बनाने के लिए सोचा था| अष्टदिग्पाल, नवग्रह मेरे नियंत्रण में थे इस लिए यह काम कभी भी कर सकता हूँ ऐसा सोचकर उस काम को तुरंत न करते हुए छोड़ दिया| लेकिन जानकी का अपहरण करने की लालसा मन में आयी तो यह काम तुरंत कर दिया| गलत काम तुरंत करने से मेरा पतन हो गया|’
रावण का पछताना भी श्रीराम को कुछ सीखा गया| तात्पर्य, अच्छा काम को छोड़कर गलत काम जल्दी करने  से किसी का भी पतन हो सकता है|
कनक, कांता, कीर्ति का मोह
जब सुवर्ण लंका प्राप्त हुई तब, लक्ष्मण ने इसका क्या करना इस बारे में श्रीराम के विचार जानने चाहे| श्रीराम ने कहा-
अपि स्वर्णमयि लंका न मे लक्ष्मण रोचते
जननी जन्मभूमिश्चक स्वर्गादपि गरीयसी|

लोक कल्याण कार्य में धन, व्यामोह रुकावट होगा इसलिए यह तुच्छ है, अपने जननी जन्मभूमि स्वर्ग से अधिक सुख देने वाली है| ऐसा कहकर लक्ष्मण का मार्गदर्शन किया|
शूर्पणखा अतिसुंदरी बनकर श्रीराम के पास आकर, ‘मैंने आपके लिए ही जन्म लिया है; कृपया मुझे स्वीकार करो’ ऐसी बोली तब श्रीराम ने शूर्पणखा के अनुरोध को ठुकरा दिया| इतना ही नहीं, जानकी के साथ १३ वर्ष रहे; लेकिन मुनिवृत्ति अपनाकर पूर्ण रूप से इंद्रियों को नियंत्रण कर दिया|

जब सुवर्ण लंका मिली तो वह विभिषण को दे दी| किष्किंधा का राज्य मिला तो वह सुग्रीव को दे दिया| अयोध्या का राज्य मिला तो वह भरत को दे दिया| इस प्रकार श्रीराम पदवी तथा व्यामोह से दूर रहे|
अच्छे लोगों की पहचान
रावण कुल में विभिषण एक दैवी गुण का व्यक्ति है, यह श्रीराम ने जाना| जब विभिषण श्रीराम के शरण में आ गये तो सब लोग विभिषण के बारे में संदेह करने लगे| लेकिन श्रीराम ने उनका व्यवहार देखकर विभिषण पर अनुग्रह किया| इतनाही नहीं, शत्रु भावना रखने वाले रावण के दहन संस्कार कार्यक्रम संपन्न करने के लिए विभिषण को प्रोत्साहित किया|
समरसता का कार्य
श्रीराम प्रेम के सागर है| समरसता के निर्माता है| जंगल में वनवासी महिला शबरी के झुटे फल खाकर उसपर अनुग्रह किया है| केवट को आलिंगन कर के अनुग्रह किया है| जटायु का दहन संस्कार करते हुए उसे मोक्ष उपलब्धी करायी| गिल्लरी को हस्तस्पर्श करके अनुग्रह किया|
इस प्रकार अयोध्या वासीयों के साथ परिवारपर भी अनंत प्रेम की वृष्टि की|
सभी वर्गों के विचारों का आदर
लंका से वापस आने के बाद जब धोबी समाज के एक व्यक्ति ने सीता पर कलंक लगाया, तो उसके विचार का आदर करते हुए प्राणसमान सीता को वनवास भेजने के लिए भी श्रीराम तैयार हुए| उस समय श्रीराम ने प्रतिज्ञा की-
स्नेहम् दयां च सौख्यं च यदि वा जानकी मति
आराधनाय लोकस्य मुंचते नास्ति मे व्यथा॥
लोककल्याण के लिए स्नेह, दया, स्वीय सुख, इतना ही नहीं अत्यंत प्रिय जानकी को भी छोड़ने में किंचित भी व्यथित नहीं है|
कठोर अनुशासन
त्रेता युग के अंत में कलि अयोध्या में प्रवेश करते हुए श्रीराम के साथ एकांत में बात करने के लिए आ गये| उस समय किसी का भी अंदर प्रवेश ना हो इसलिए श्रीराम ने लक्ष्मण को द्वार पर खड़ाकिया| ‘किसी को अंदर आने नहीं देना, यदि इस आज्ञा का उल्लंघन होता तो कठिन दंड भोगना पड़ेगा’ ऐसा बताकर श्रीराम अंदर गए| इतने में दुर्वास महर्षि आकर ‘मुझे अभी श्रीराम से बात करनी है| अनुमति नहीं मिली तो तुम्हारा पुरा इक्ष्वाकु वंश का नाश करुंगा|’ ऐसा क्रोधित हो कर कहा| लक्ष्मण दुविधा में पड़े| प्रवेश की अनुमति देते तो श्रीराम क्रोधित होंगे और अनुमति नहीं दी तो दुर्वास महर्षि इक्ष्वाकु वंश का नाश कर देंगे| अंतत: लक्ष्मण दुर्वास महर्षि को अंदर जाने की अनुमति देते है| तब राम बाहर आ रहे थे| आज्ञा का उल्लंघन देखकर अति प्रिय भ्राता लक्ष्मण को कठिन दंड देते हुए श्रीराम अपने शरीर को भी शरयु नदी में छोडकर अवतार समाप्त कर देते है|
निन्दन्तु नीतिनिपुणा: यदि वा स्तुवन्तु|
लक्ष्मी: समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्|
मरणमद्यास्तु युगान्तरे वा
न्यायात्पथ: प्रविचलन्ति पदं न धीरा॥

नीतिज्ञ लोग निन्दा करे या स्तुति,  संपत्ति का लाभ हो या हानी, मृत्यु आज आये या युगों के बाद, श्रेष्ठ लोग
कभी भी न्यायपथ से दूर नहीं जाते |

श्रीराम का जीवन भी इसी प्रकार का है | उन्होंने किसी भी स्थिति में आदर्शों को तिलांजली नहीं दी| सामाजिक जीवन में संगठन का कार्य करते हुए, अनेक बाधाएँ, व्यवधान, मोह-माया के प्रसंग पग पग पर आ सकते हैं| क्या करना, क्या नहीं करना, ऐसी किंकर्तव्यमूढ़ स्थिति बनती है| किस से मार्गदर्शन लेना, समझ में नहीं आता| उस समय श्रीराम हमारे सहायक हो सकते है| उनका जीवन चरित हमें दिग्दर्शन करा सकता है| श्रीराम
नवमी के पावन पर्व श्रीराम चरित का चिंतन करने पर यह विश्वाबस हमें मिलता है|

रविवार, 29 मार्च 2015

रामनवमी : मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की शोभायात्रा




राम धुन के साथ उमड़ा आस्था का सैलाब

By Prabhat Khabar | Publish Date: Mar 29 2015

मर्यादा पुरुषोतम श्रीराम की निकली शोभायात्रा, झांकियों ने मन मोहा, भक्तों ने दिखाया उत्साह
श्रृंगार समिति ने किया उपायुक्त का स्वागत

रांची : डोरंडा में रामनवमी की शोभायात्रा का श्रृंगार समिति व सेंट्रल मुहर्रम कमेटी की ओर से स्वागत किया गया. इस दौरान उपायुक्त मनोज कुमार, एसएसपी प्रभात कुमार, सिटी एसपी डॉ जया राय सहित विभिन्न पूजा समिति के सदस्यों को पगड़ी पहना कर सम्मानित किया गया और स्मृति चिह्न प्रदान किया गया. श्रृंगार समिति की ओर से राधे श्याम विजय, आलोक दूबे, राम लाल व अनिल विजय सहित अन्य पदाधिकारी शामिल थे. उधर, सेंट्रल मुहर्रम कमेटी के अध्यक्ष अशरफ अंसारी व मुमताज गद्दी की ओर से भी उनका स्वागत किया गया था. इसमें कई अन्य पदाधिकारी व सदस्य उपस्थित थे.

रांची: मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की शोभायात्रा में शनिवार को श्री राम भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी. शोभायात्रा में भीड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मुख्य जुलूस श्री राम जानकी मंदिर तपोवन में था, तो उसका अंतिम भाग शहीद चौक में था. इसके अलावा अन्य सहायक सड़कों में भी राम भक्तों की भीड़ उमड़ी थी, जो मुख्य शोभायात्रा में शामिल हो रही थी. भगवान के जयकारों व श्रीराम जी चले न हनुमान के बिना राम जी चले न हनुमान के बिना, राम जी की निकली सवारी राम जी की लीला है न्यारी.. सहित अन्य मधुर भजनों के बीच भक्त झूम रहे थे. वहीं कई राम भक्तों ने रास्ते भर लाठी-डंडे का खेल दिखाया व तलवारबाजी की.

दिन के दो  बजे निकली शोभायात्रा दिन के दो बजे सात जगहों से एक साथ गाजा-बाजा व पारंपरिक अस्त्रों के साथ मुख्य शोभायात्रा निकली. हालांकि, कई जगहों पर हल्की बूंदाबादी के कारण थोड़ी परेशानी हुई, लेकिन राम भक्त इसकी परवाह किये बगैर आगे बढ़ते रहे. कई जगहों पर युवा झंडे को लेकर दौड़ रहे थे. वहीं, कई प्रमुख चौक-चौराहों पर झंडों का प्रदर्शन भी कर रहे थे. मुख्य शोभायात्रा शाम साढ़े चार बजे के करीब अलबर्ट एक्का चौक पहुंची. सबसे आगे अध्यक्ष जय सिंह यादव व मंत्री सतीश यादव सहित अन्य पदाधिकारी खुली जीप में हाथ में तलवार लिये हुए थे.

इसके पीछे-पीछे शोभायात्रा थी. शोभायात्रा यहां से सजर्ना चौक, काली मंदिर चौक होकर मेन रोड, ओवरब्रिज, निवारणपुर होते हुए तपोवन राम-जानकी मंदिर पहुंची. यहां श्री महावीर मंडल रांची के झंडे की मंदिर के महंत व पुजारियों ने पूजा-अर्चना की. अन्य झंडे की मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर सटा कर पूजा की गयी. पूजा के बाद सभी अखाड़ेधारी अपने-अपने अखाड़े में लौट गये.

मर्यादा से ही मिलता है संस्कार : मुख्यमंत्री

रांची:  मुख्यमंत्री रघुवर दास ने शनिवार को अलबर्ट एक्का चौक पर रामनवमी शोभायात्रा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं. मर्यादा से ही संस्कार मिलता है और संस्कार से ही संस्कृति का निर्माण होता है. भगवान राम का चरित्र अनुकरणीय है.

भगवान श्री राम के चरित्र से हम सब को सीख लेनी चाहिए. श्री दास ने कहा कि राज्य के युवा अपनी शक्ति और ज्ञान का उपयोग करें. कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नगर विकास मंत्री सीपी सिंह ने कहा कि रामनवमी आपसी भाईचारे का त्योहार है. हम इस त्योहार में यह संकल्प लें कि हम राज्य को विकास की पटरी पर ले जायेंगे. कार्यक्रम को सांसद रामटहल चौधरी, हटिया विधायक नवीन जायसवाल, मेयर आशा लकड़ा, डिप्टी मेयर संजीव विजयवर्गीय, अरविंदर सिंह देओल, राजेश गुप्ता आदि ने संबोधित किया.

डोरंडा व हिनू से निकली शोभायात्रा

रांची: डोरंडा व हिनू में शनिवार को गाजे-बाजे व भगवान के जयकारों के साथ भगवान की शोभायात्रा निकाली गयी. श्री महावीर मंडल डोरंडा के तत्वावधान में शाम चार बजे तीनों प्वाइंट घाघरा, एजी कॉलोनी व पोखड़टोली से शोभायात्रा निकली, जो डोरंडा के विभिन्न इलाकों से होते हुए  तपोवन मंदिर की ओर गयी.

डोरंडा बजरंग बली मंदिर में उमड़ी भीड़ : डोरंडा झंडा चौक स्थित बजरंगबली मंदिर, मिस्कोट मैदान स्थित हनुमान मंदिर सहित अन्य मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ी. यहां पूजा-अर्चना के लिए काफी संख्या में भक्त आये थे.

हिनू चौक महावीर मंडल की ओर से निकली भव्य शोभायात्रा : श्री महावीर मंडल हिनू चौक की ओर से रामनवमी की भव्य शोभायात्रा दिन के डेढ़ बजे  निकाली गयी. सभी शोभायात्रा एक साथ हिनू पुल होते हुए एजी मोड़ होकर शाम सात बजे तपोवन मंदिर पहुंची.जहां पूजा-अर्चना के बाद मंडल का जुलूस लौट गया. इसका नेतृत्व अध्यक्ष मदन यादव, राजेंद्र तिवारी, संजय सिन्हा, एम केरकेट्टा, सतपाल सिंह, सुधीर चौधरी, उमा सिंह, राज,राजेश्वर पंडित, उदय झा, मुन्ना अग्रवाल, अवधेश यादव, हुलास प्रधान, ललन यादव, सुनील यादव सहित अन्य पदाधिकारी व अखाड़ाधारी कर रहे थे.

झांकियों की लगी कतार

रांची. नारी सेना की शोभायात्रा अलबर्ट एक्का चौक से गुजरने के बाद तो मानो झांकियों की झड़ी लग गयी. नारी सेना के झांकी के गुजरने के बाद केंद्रीय महिला महावीर मंडल, महावीर मंडल, महावीर मंडल रांची महानगर, श्री राम सेना, सालासार बालाजी, सोना चांदी व्यवसायी समिति, चैती दुर्गा पूजा समिति की शोभायात्रा के पीछे दो दर्जन से अधिक झांकी कतार में खड़ी थी. शोभायात्रा में शामिल राम भक्तों के द्वारा अलबर्ट एक्का चौक पर अस्त्र-शस्त्र चालन का प्रदर्शन किया जा रहा था. यहां मंच से मशीन के माध्यम से रामभक्तों पर फूलों की बारिश भी हो रही थी. शोभायात्रा में शामिल विभिन्न मंडलों के द्वारा उपस्थित लोगों के बीच चॉकलेट से लेकर आइसक्रीम तक का वितरण किया जा रहा था.

झंडा आकर्षण का केंद्र

चौक पर विभिन्न समितियों के द्वारा अपने अपने झंडे को प्रदर्शनी के लिए लगाया जा रहा था. दिन के साढ़े चार बजे मनोकामना पूर्ण हनुमान मंदिर लाइन टैंक रोड के द्वारा विशाल महावीरी पताका को चौक पर खड़ा किया गया. तत्पश्चात चडरी सरना समिति व एकादशी रुद्र महावीर मंदिर के द्वारा भी े विशाल व भव्य महावीरी पताके को अलबर्ट एक्का चौक पर फहराया गया.

शनिवार, 28 मार्च 2015

राम नवमी : मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम


राम नवमी श्री राम
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम : भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
http://hi.bharatdiscovery.org/india
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम हिन्दू धर्म में विष्णु के 10 अवतारों में से एक हैं। राम का जीवनकाल एवं पराक्रम, महर्षि वाल्मिकि द्वारा रचित, संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में लिखा गया है। उनके उपर तुलसीदास ने भक्ति काव्य श्री रामचरितमानस रचा था। ख़ास तौर पर उत्तर भारत में राम बहुत अधिक पूज्यनीय माने जाते हैं। रामचन्द्र हिन्दुत्ववादियों के भी आदर्श पुरुष हैं। राम, अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र थे। राम की पत्नी का नाम सीता था (जो लक्ष्मी का अवतार मानी जाती है) और इनके तीन भाई थे, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। हनुमान, भगवान राम के, सबसे बड़े भक्त माने जाते हैं। राम ने राक्षस जाति के राजा रावण का वध किया।

 मर्यादा पुरुषोत्तम

अनेक विद्वानों ने उन्हें 'मर्यादापुरुषोत्तम' की संज्ञा दी है। वाल्मीकि रामायण तथा पुराणादि ग्रंथों के अनुसार वे आज से कई लाख वर्ष पहले त्रेता युग में हुए थे। पाश्चात्य विद्वान उनका समय ईसा से कुछ ही हज़ार वर्ष पूर्व मानते हैं। अपने शील और पराक्रम के कारण भारतीय समाज में उन्हें जैसी लोकपूजा मिली वैसी संसार के अन्य किसी धार्मिक या सामाजिक जननेता को शायद ही मिली हो। भारतीय समाज में उन्होंने जीवन का जो आदर्श रखा, स्नेह और सेवा के जिस पथ का अनुगमन किया, उसका महत्व आज भी समूचे भारत में अक्षुण्ण बना हुआ है। वे भारतीय जीवन दर्शन और भारतीय संस्कृति के सच्चे प्रतीक थे। भारत के कोटि कोटि नर नारी आज भी उनके उच्चादर्शों से अनुप्राणित होकर संकट और असमंजस की स्थितियों में धैर्य एवं विश्वास के साथ आगे बढ़ते हुए कर्त्तव्यपालन का प्रयत्न करते हैं। उनके त्यागमय, सत्यनिष्ठ जीवन से भारत ही नहीं, विदेशों के भी मैक्समूलर, जोन्स, कीथ, ग्रिफिथ, बरान्निकोव आदि विद्वान आकर्षित हुए हैं। उनके चरित्र से मानवता मात्र गौरवान्वित हुई है

जन्म

हिन्दू धर्म के कई त्योहार, जैसे दशहरा और दीपावली, राम की जीवन-कथा से जुडे हुए है। माना जाता है कि राम का जन्म प्राचीन भारत में हुआ था। उनके जन्म के समय का अनुमान सही से नहीं लगाया जा सका है। आज के युग में राम का जन्म, रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। राम चार भाईयो में से सबसे बड़े थे, इनके भाइयो के नाम लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न थे। राम बचपन से ही शान्त स्वभाव के वीर पुरुष थे। उन्‍होने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्‍च स्‍थान दिया था। इसी कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से जाना जाता है। उनका राज्य न्‍यायप्रिय और ख़ुशहाल माना जाता था, इसलिए भारत में जब भी सुराज की बात होती है, रामराज या रामराज्य का उद्धरण दिया जाता है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनो भाइयों के साथ गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्‍त की।
राम के बचपन की विस्तार-पूर्वक विवरण स्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस के बालकाण्ड से मिलती है। राजा दशरथ के तीन रानियाँ थीः कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। राम कौशल्या के पु्त्र थे, सुमित्रा के दो पु्त्र, लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे और कैकेयी के पु्त्र भरत थे। कैकेयी चाहती थी उनके पु्त्र भरत राजा बनें, इसलिए उन्होंने राम को, दशरथ द्वारा 14 वर्ष का वनवास दिलाया। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। राम की पत्नी सीता, और उनके भाई लक्ष्मण भी वनवास गये थे।

 रूप और सौंदर्य

अपनी छवि और कांति से अगणित कामदेवों को लज्जित करने वाले राम के सौंदर्य का वर्णन भी रामायणादि ग्रंथों में यथेष्ट मात्रा में पाया जाता है। तुलसी के रामचरितमानस में तो स्थल स्थल पर इस तरह के विवरण भरे पड़े हैं। राजा जनक जब विश्वामित्र मुनि से मिलने गए तो वहाँ राम की सुंदर छवि देखकर वह अपनी सुध वुध ही भूल गए, वे सचमुच ही विदेह हो गए। उके अलौकिक सौंदर्य का यहाँ तक प्रभाव पड़ा कि 'बरबस ब्रह्म सुखहिं मन त्यागा।' जनक की पुष्पवाटिका में सीता की एक सखी ने राम को जब देखा तो वह भौंचक रह गई। सीता के निकट आकर वह केवल इतना ही कह सकी 'स्याम गौर किमि कहौं वखानी, गिरा अनयन नयन बिनु बानी।' उनके अंग प्रत्यंग का जो वर्णन किया गया है, वह अद्वितीय है। मखभूमि में तथा विवाहमंडप में भी राम के नखशिख का ऐसा ही सुंदर वर्णन मानस में दिया गया है। सामान्य लोगों की तो बात ही क्या, परशुराम जैसे दुर्धर्ष वीर को भी राम के अलौकिक सौंदर्य ने हक्का बक्का बना दिया। वे निर्निमेष नेत्रों से उन्हें देखते रह गए। ऐसा ही एक प्रसंग उस समय आया जब खर दूषण की सेना के वीर राम का रूप देखकर हथियार चलाना ही भूल गए। उनके नेता को स्वीकार करना पड़ा कि अपने जीवन में आज तक हमने ऐसा सौंदर्य कहीं देखा नहीं, इसलिए 'यद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा, वध लायक़ नहिं पुरुष अनूपा।

आदर्श चरित्र
राम के चरित्र में भारत की संस्कृति के अनुरूप पारिवारिक और सामाजिक जीवन के उच्चतम आदर्श पाए जाते हैं। उनमें व्यक्तित्वविकास,लोकहित तथा सुव्यवस्थित राज्यसंचालन के सभी गुण विद्यमान थे। उन्होंने दीनों, असहायों, संतों और धर्मशीलों की रक्षा के लिए जो कार्य किए, आचारव्यवहार की जो परंपरा क़ायम की, सेवा और त्याग का जो उदाहरण प्रस्तुत किया तथा न्याय एवं सत्य की प्रतिष्ठा के लिए वे जिस तरह अनवरत प्रयत्नवान्‌ रहे, जिससे उन्हें भारत के जन-जन के मानस मंदिर में अत्यंत पवित्र और उच्च आसन पर आसीन कर दिया है।
आदर्श पुत्र
राम के पराक्रम सौंदर्य से भी अधिक व्याक प्रभाव उनके शील और आचार व्यवहार का पड़ा जिसके कारण उन्हें अपने जीवनकाल में ही नहीं, वरन्‌ अनुवर्ती युग में भी ऐसी लोकप्रियता प्राप्त हुई जैसी विरले ही किसी व्यक्ति को प्राप्त हुई हो। वे आदर्श पुत्र, आदर्श पति, स्नेहशील भ्राता और लोकसेवानुरक्त, कर्तव्यपरायण राजा थे। माता पिता का वे पूर्ण समादर करते थे।

प्रात: काल उठकर पहले उन्हें प्रणाम करते, फिर नित्यकर्म स्नानादि से निवृत्त होकर उनकी आज्ञा ग्रहण कर अपने काम काज में जुट जाते थे। विवाह हो जाने के बाद राजा ने उन्हें युवराज बनाना चाहा, किंतु मंथरा दासी के बहकाने से विमाता कैकेयी ने जब उन्हें 14 वर्ष का वनवास देने का वर राजा से माँगा तो विरोध में एक शब्द भी न कहकर वे तुरंतवन जाने को तैयार हो गए। उन्होंने कैकेयी से कहा 'सुन जननी सोइ सुत बड़ भागी, जो पितृ मातु वचन अनुरागी।' वाल्मीकि के अनुसार राम ने यहाँ तक कह दिया कि दिया कि 'राजा यदि अग्नि में कूदने को कहें तो कूदूँगा, विष खाने को कहें तो खाऊँगा।' निदान समस्त राजवैभव, उत्तुंग प्रासाद और बहुमूल्य वस्त्राभूषणों का परित्याग कर लक्ष्मण तथा सीता के साथ वे सहर्ष वन के लिए चल पड़े। जाने के पहले उन्होंने गुरु से कहलाकर ब्राह्मणों तथा विद्वानों के वर्षाशन की व्यवस्था करा दी और भरत के लिए संदेश दिया कि 'नीति न तजहिं राजपद पाये'। पिता और माताओं की सुख सुविधा का ध्यान रखने की प्रार्थना पुरजनों हितेच्छुओं से करते हुए उन्होंने कहा

    'सोइ सब भाँति मोर हितकारी, जाते रहैं भुआल सुखारी' तथा 'मातु सकल मोरे विरह जेहि न होयँ दुखदीन, सो उपाय तुम करह सब पुरजन प्रजा प्रवीना'

आदर्श पति
राम जानते थे कि सीता अत्यंत सुकुमार हैं अत: उन्होंने उन्हें अयोध्या में ही रहने को बहुत समझया पर जब वे नहीं मानीं तब उन्होंने उन्हें अपने साथ ले लिया और गर्मी, वर्षा, थकान आदि का बराबर ध्यान रखते हुए सहृदय, स्नेही पति के रूप में उन्हें भरसक कोई कष्ट नहीं होने दिया।

आदर्श भाई
राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को भी पिता, माता ओर बड़े भाई का अनुराग देकर इस तरह आप्यायित करते रहे कि उन्हें अयोध्या तथा परिजनों के वियोगका दु:ख तनिक भी खलने नहीं पाया। मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण के आहत होने पर राम को मर्मांताक पीड़ा हुई और वे फूट फूटकर रो पड़े। नारी के पीछे भाई का प्राण जाने की आशंका से उन्हें बड़ी ग्लानि हुई। धैर्यवान्‌ होते हुए भी वे इस समय परम व्याकुल हो उठे। किंतु तभी संजीवनी बूटी लेकर हनुमान के लौट आने से किसी तरह लक्ष्मण की प्राणरक्षा हो सकी। भरत पर भी राम का ऐसा ही स्नेह उनकी साधुता एवं निश्छलता पर राम का पूरा विश्वास था। इसी से भरत भी उनका पूर्ण समादर करते थे और सर्वदा उनकी आज्ञा का पालन करते थे। भरत जब इन्हें लौट लाने के लिए चित्रकूट पहुँचे तब राम ने उन्हें सत्य और कर्तव्यनिष्ठा का उपदेश देते हुए बड़े प्रेम से समझाया और सहारे के लिए अपनी खड़ाउँ देकर सहृदयतापूर्वक विदा किया। वनवास की अवधि बीतने में केवल एक दिन शेष रहने पर भरत की दशा का स्मरण कर राम अत्यंत व्याकुल हो उठे और उन्होंने विभीषण से पुष्प विमान की याचना की, जिससे वे यथासमय अयोध्या पहुँच सकें।

राम के इन्हीं गुणों के कारण समस्त अयोध्यावासी और पशुपक्षी तक उनमें अनुरक्त थे। वनवास के लिए प्रस्थान करने पर भारी संख्या में लोग तमसा नदी तक उनके साथ साथ दौड़ गए। राम को आधी रात के समय उन्हें सोते छोड़कर लुक छिपकर वहाँ से कूच कर देना पड़ा। जागने पर लोगों को बड़ा पछतावा हुआ। अत्यंत दु:खित होकर वे अयोध्या लौट आए वनवास की अवधि भर राम की मंगलकामना के उद्देश्य से नेमव्रत, देवोपासना आदि करते रहे। उधर नाव में बैठकर राम के गंगा पार चले जाने पर सुमंत्र मूर्छित हो गया और उसके रथ के घोड़े भी रामवियोग में व्याकुल हो उठे। उस समय यदि कोई व्यक्ति राम लक्ष्मण का नामोल्लेख कर देता था तो वे पशु विस्फारित नेत्रों से उसकी ओर देखने लगते थे-'जे कहि रामलखन वैदेही, हिकरि हिकरि पशु चितवहिं तेही।' पिता दशरथ ने तो पहले ही कह दिया था कि राम के बिना मेरा जीना संभव नहीं, और यही हुआ भी। माता कौशल्या को इस बात का उतना दु:ख न था कि राम वन गमन की बात सुनकर भी मेरी वज्र की छाती विदीर्ण नहीं हुई, जितनी उन्हें इस बात की ग्लानि थी कि राम जैसे आज्ञाकारी, सुशील पुत्र की मुझ जैसी माता हुई। मतिभ्रम से पूर्व कैकेयी का भी राम से पूर्ण विश्वास था। इसी से उनके राज्याभिषेक की बात सुनकर उसने प्रसन्नता करते हुए कहा था :

    रामे वा भरते वाहं विशेषं नोपलक्षये।
    तस्मात्तृष्टास्मि यद्राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति।


 आदर्श राजा
राम प्रजा को हर तरह से सुखी रखना राजा का परम कर्तव्य मानते थे। उनकी धारणा थी कि जिस राजा के शासन में प्रजा दु:खी रहती है, वह नृप अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है। जनकल्याण की भावना से ही उन्होंने राज्य का संचालन किया, जिससे प्रजा धनधान्य से पूर्ण, सुखी, धर्मशील एवं निरामय हो गई-'प्रहृष्ट मुदितो लोकस्तुष्ट: पुष्ट: सुधार्मिक:। निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जित:।'

    तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में रामराज्य की विशद चर्चा की है। लोकानुरंजन के लिए वे अपने सर्वस्व का त्याग करने को तत्पर रहते थे। इसी से भवभूति ने उनके के मुँह से कहलाया है |
    स्नेहं दयां च सौख्यं च, यदि वा जानकीमपि।
    आराधनाय लोकस्य मुंचतोनास्ति मे व्यथा'।
अर्थात्‌ 'यदि आवश्यकता हुई तो जानकी तक का परित्याग मैं कर सकता हूँ।' प्रजानुरंजन के लिए इतना बड़ा त्याग करने पर उन्हें कितनी मर्मांतक व्यथा हुई, सीता-विरह-कातर होकर किस तरह वे मुमूर्षुवत्‌ हो गए, इसका अत्यंत करुणोत्पादक चित्रण महाकवि भवभूति की कुशल लेखनी ने 'उत्तररामचरित' में किया है।

महापराक्रमी योद्धा
राम अद्वितीय महापुरुष थे। वे अतुल्य बलशाली, सौंदर्यनिधान तथा उच्च शील के व्यक्ति थे। किशोरावस्था में ही उन्होंने धार्मिक अनुष्ठानों में रत विश्वामित्र मुनि के परित्राणार्थ ताड़का और सुबाहु राक्षस का वध किया। राजा जनक की स्वयंवर सभा में उन्होंने शिव का वह विशाल धनुष अनायास ही तोड़ डाला जिसके सामने बड़े बड़े वीरपुंगवों को भी नतमस्तक होना पड़ा था। दंडक वन में शूर्पणखा के भड़काने से जब खर, दूषण, त्रिशिरादि ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया तो अकेले ही युद्ध करते हुए उन्होंने थोड़े समय में ही उनका विनाश कर डाला। किष्किंधा में एक ही बाण से राम ने सात तालवृक्षों का छेदन कर दिया और बाद में बड़े भाई के त्रास से उत्पीड़ित सुग्रीव की रक्षा के लिए बालि जैसे महापराक्रमी योद्धा को भी धराशायी कर दिया। लंका में रावण, कुंभकर्ण आदि से हुआ उनका युद्ध तो पराक्रम की पराकाष्ठा का ऐसा उदाहरण है जिसकी मिसाल अन्यत्र कठिनाई से ही मिलेगी।

परमधाम
जब प्रभु श्रीराम, भरत और शत्रुघ्न ने सरयू नदी के 'गोप्रतार घाट' पर विष्णु स्वरूप में प्रवेश किया तो उनके साथ गया समस्त समूह, अर्थात राक्षस, मनुज, रीछ, पक्षी, वानर और यशस्वी व महान मनुष्य आदि सभी को प्रभु का परमधाम मिला। ब्रह्माजी ये सब देखकर बहुत आह्लादित हुए और अपने धाम को चले गए।


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श्रीराम की पवित्र चौपाइयों से दूर करें संकट
कलियुग मे सिर्फ राम नाम के जय घोष से ही हमें मुक्ति मिल जाती है. बाल्मिकी जैसा अपराधी उल्टा नाम जपकर पूज्यनीय हो गया. सभी वेद ग्रंथ में बताया गया है कि यदि मरते समय अपने आराध्य देव का नाम जुबान पर आ गया तो उसे स्वर्ग के साथ-साथ मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है. सत्संग हमे अच्छा बुरा का ज्ञान के साथ-साथ सद्गति दिलाता है. महाकवि तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस की चौपाइयां मात्र राम का गुणगान ही नहीं करती बल्कि इ‍तनी चमत्कारिक महिमा भी है कि जीवन के हर संकट को समाप्त करने की दिव्य शक्ति उनमें विद्यमान है. प्रभु श्री राम के पावन आशीर्वाद हर चौपाई में निहित हैं. पढ़ें श्री रामचरितमानस की शुभ चौपाई और उनके जप से दूर होने वाले संकट.

अपने विचारों की शुद्धि के लिए- 'ताके जुग पद कमल मनाउं। जासु कृपां निरमल मति पावउं।।'

शांतिपूर्वक मृत्यु पाने के लिए- रामचरन दृढ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग । सुमन माल जिमि कंठ तें गिरत न जानइ नाग ॥

आकर्षण शक्ति बढ़ाने के लिए- 'जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥'

पवित्र नदी में स्नान से पुण्य-लाभ के लिए- 'सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग। लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।'

आलोचना से बचने के लिए- 'राम कृपां अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।

विद्या प्राप्ति के लिए- गुरु गृह गए पढ़न रघुराई। अल्प काल विद्या सब आई॥

घर में मंगल उत्सव के लिए- 'सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहुं सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।'

यज्ञोपवीत धारण कर उसे सुरक्षित रखने के लिए- 'जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग। पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।'

आपस में प्रेम बढ़ाने के लिए- सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

भय से बचने के लिए- 'मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहिं अवसर सहाय सोइ होऊ।।'
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श्री राम से सीखें ये पांच बातें...
    1
वैसे तो श्री राम का पूरा व्यक्तित्व ही अनगिनत सीखें देता है लेकिन हम यहां आपको बता रहे ऐसी पांच सीखें जिन्होंने का रखा रामायण का आधार।
आज्ञाकारीः पिता के एक वचन को निभाने के लिए बिताए 14 साल वनवास में।

2

समभावः चाहे केवट को या शबरी, राम जी ने सबको बराबर भाव से सम्मान दिया। यहां तक कि लक्ष्मण शबरी के जूठे बेर खाने की जगह पीछे फेंकते जा रहे थे लेकिन राम जी उतने ही प्रेम से उन जूठे बेरों का स्वाद चख रहे थे।

3

निश्छल भक्तिः हनुमान जी की भक्ति ही थी जिसकी वजह से वह एक तरफ समंदर पार करके सीता जी को राम जी की निशानी देकर आए और दूसरी तरफ एक संजीवनी बूटी के लिए पूरा पर्वत ले आए। राम जी ने इस भक्ति को हमेशा उचित सम्मान भी दिया।

4

अहंकार रहितः राम जी को न तो अपने ज्ञान का घमंड था और न ही अपनी शक्ति पर अभिमान। यहां तक कि उन्होंने रावण को भी हमेशा स्वयं से ज्ञानी और श्रेष्ठ माना।
5
दोस्तीः राम जी की सुग्रीव और विभीषण से दोस्ती तो सब स्वीकारते ही हैं लेकिन राम जी ने अपने परम भक्त हनुमान जी को भी अपने मित्र का ही दर्जा दिया।

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

अटलजी : 'भारत रत्न'






                                             अटलजी का जीवन परिचय

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धूल और धुएँ की बस्ती में पले एक साधारण अध्यापक के पुत्र श्री अटलबिहारी वाजपेयी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री बने। उनका जन्म 25 दिसंबर 1925 को हुआ। अपनी प्रतिभा, नेतृत्व क्षमता और लोकप्रियता के कारण वे चार दशकों से भी अधिक समय से भारतीय संसद के सांसद रहे।

उनमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की संकल्पशक्ति, भगवान श्रीकृष्ण की राजनीतिक कुशलता और आचार्य चाणक्य की निश्चयात्मिका बुद्धि है। वे अपने जीवन का क्षण-क्षण और शरीर का कण-कण राष्ट्रसेवा के यज्ञ में अर्पित कर रहे हैं। उनका तो उद्‍घोष है - हम जिएँगे तो देश के लिए, मरेंगे तो देश के‍ लिए। इस पावन धरती का कंकर-कंकर शंकर है, बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है। भारत के लिए हँसते-हँसते प्राण न्योछावर करने में गौरव और गर्व का अनुभव करूँगा।'

प्रधानमंत्री अटलजी ने पोखरण में अणु-परीक्षण करके संसार को भारत की शक्ति का एहसास करा दिया। कारगिल युद्ध में पाकिस्तान के छक्के छुड़ाने वाले तथा उसे पराजित करने वाले भारतीय सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए अटल जी अग्रिम चौकी तक गए थे।

उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था - 'वीर जवानो! हमें आपकी वीरता पर गर्व है। आप भारत माता के सच्चे सपूत हैं। पूरा देश आपके साथ है। हर भारतीय आपका आभारी है।'

अटल जी के भाषणों का ऐसा जादू है कि लोग उन्हें सुनते ही रहना चाहते हैं। उनके व्याख्यानों की प्रशंसा संसद में उनके विरोधी भी करते थे। उनके अकाट्‍य तर्कों का सभी लोहा मानते हैं। उनकी वाणी सदैव विवेक और संयम का ध्यान रखती है। बारीक से बारीक बात वे हँसी की फुलझड़ियों के बीच कह देते हैं। उनकी कविता उनके भाषणों में छन-छनकर आती रहती है।

अटलजी का कवि रूप भी शिखर को स्पर्श करता है। सन् 1939 से लेकर अद्यावधि उनकी रचनाएँ अपनी ताजगी के साथ टाटक सामग्री परोसती आ रही है। उनका कवि युगानुकूल काव्य-रचना करता आ रहा है। वे एक साथ छंदकार, गीतकार, छंदमुक्त रचनाकार तथा व्यंग्यकार हैं।

यद्यपि उनकी कविताओं का प्रधान स्वर राष्ट्रप्रेम का है तथापि उन्होंने सामाजिक तथा वैचारिक विषयों पर भी रचनाएँ की हैं। प्रकृति की छबीली छटा पर तो वे ऐसा मुग्ध होते हैं कि सुध-बुध खो बैठते हैं। हिंदी के वरिष्ठ समीक्षकों ने भी उनकी विचार-प्रधान नई कविताओं की सराहना की है।

जन्म, बाल्यकाल और शिक्षा
उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद के सुप्रसिद्ध प्राचीन तीर्थस्थान बटेश्वर में एक वैदिक-सनातन धर्मावलंबी कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार रहता था। श्रीमद्‍भगवतगीता और रामायण इस परिवार की मणियाँ थीं। अटलजी के पितामह प. श्यामलाल जी बटेश्वर में ही जीवनपर्यंत रहे किंतु अपने पुत्र कृष्ण बिहारी को ग्वालियर में बसने की सलाह दी। ग्वालियर में अटलजी के पिता पं. कृष्ण बिहारी जी अध्यापक बने। अध्यापन के साथ-साथ वे काव्य रचना भी करते थे। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम के स्वर भरे रहते थे। 'सोते हुए सिंह के मुख में हिरण कहीं घुस जाते' प्रसिद्ध पंक्ति उन्हीं की है। वे उन दिनों ग्वालियर के प्रख्यात कवि थे। अपने अध्यापक जीवन में उन्नति करते-करते वे प्रिंसिपल और विद्यालय-निरीक्षक के सम्मानित पर पर पहुँच गए। ग्वालियर राजदरबार में भी उनका मान-सम्मान था अटलजी की माताजी का नाम श्रीमती कृष्णा देवी था।

ग्वालियर में शिंदे की छावनी में 25 सितंबर सन् 1925 को ब्रह्ममुहूर्त में अटलजी का जन्म हुआ था। पं. कृष्ण बिहारी के चार पुत्र अवध बिहारी, सदा बिहारी, प्रेम बिहारी, अटलबिहारी तथा तीन पुत्रियाँ विमला, कमला, उर्मिला हुईं। परिवार भरा-पूरा था।

परिवार का विशुद्ध भारतीय वातावरण अटलजी की रग-रग में बचपन से ही रचने-बसने लगा। वे आर्यकुमार सभा के सक्रिय कार्यकर्ता थे। परिवार 'संघ' के प्रति विशेष निष्ठावान था। परिणामत: अटलजी का झुकाव भी उसी ओर हुआ और वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बन गए। वंशानुक्रम और वातावरण दोनों ने अटलजी को बाल्यावस्था से ही प्रखर राष्ट्रभक्त बना दिया। अध्ययन के ‍प्रति उनमें बचपन से ही प्रगाढ़ रुचि रही।

अटलजी की बी.ए. तक की शिक्षा ‍ग्वालियर में ही हुई। वहाँ के विक्टोरिया कॉलेज (आज लक्ष्मीबाई कॉलेज) से उन्होंने उच्च श्रेणी में बी.ए. उत्तीर्ण किया। वे विक्टोरिया कॉलेज के छात्र संघ के मंत्री और उपाध्यक्ष भी रहे। वादविवाद प्रतियोगिताओं में सदैव भाग लेते थे। ग्वालियर से आप उत्तरप्रदेश की व्यावसायिक नगरी कानपुर के प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र डी.ए.वी.कॉलेज आए। राजनीतिशास्त्र से प्रथम श्रेणी में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। एलएलबी की पढ़ाई को बीच में ही विराम देकर संघ के काम में लग गए।

पिता-पुत्र की कानून की पढ़ाई साथ-साथ
अटलजी और उनके पिता दोनों ने कानून की पढ़ाई में एक साथ प्रवेश लिया। हुआ यह कि जब अटलजी कानून पढ़ने डी.ए.वी.कॅलेज, कानपुर आना चाहते थे, तो उनके पिताजी ने कहा - मैं भी तुम्हारे साथ कानून की पढ़ाई शुरू करूँगा। वे तब राजकीय सेवा से निवृत्त हो चुके थे। अस्तु, पिता-पुत्र दोनों साथ-साथ कानपुर आए। उन दिनों कॉलेज के प्राचार्य श्रीयुत कालकाप्रसाद भटनागर थे। जब ये दोनों लोग उनके पास प्रवेश हेतु पहुँचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। दोनों लोगों का प्रवेश एक ही सेक्शन में हो गया। जिस दिन अटलजी कक्षा में न आएँ, प्राध्यापक महोदय उनके पिताजी से पूछें - आपके पुत्र कहाँ हैं? जिस दिन पिताजी कक्षा में न जाएँ, उस दिन अटलजी से वही प्रश्न 'आपके पिताजी कहाँ हैं?' फिर वही ठहाके। छात्रावास में ये पिता-पुत्र दोनों साथ ही एक ही कमरे में छात्र-रूप में रहते थे। झुंड के झुंड लड़के उन्हें देखने आया करते थे।

प्रथम जेल यात्रा
बचपन से ही अटल जी की सार्वजनिक कार्यों में विशेष रुचि थी। उन दिनों ग्वालियर रियासत दोहरी गुलामी में थी। राजतंत्र के प्रति जनमानस में आक्रोश था। सत्ता के विरुद्ध आंदोलन चलते रहते थे। सन् 1942 में जब गाँधी जी ने 'अँग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा दिया तो ग्वालियर भी अगस्त क्रांति की लपटों में आ गया। छात्र वर्ग आंदोलन की अगुवाई कर रहा था। अटलजी तो सबके आगे ही रहते थे। जब आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया तो पकड़-धकड़ होने लगी।

कोतवाल, जो उनके पिताश्री कृष्ण बिहारी के परिचित थे, ने पिताजी को बताया कि आपके चिरंजीवी कारागार जाने की तैयारी कर रहे हैं। पिताजी को अटल जी के कारागार की तो चिंता नहीं थी, किंतु अपनी नौकरी जाने की चिंता जरूर थी। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को अपने पैतृक गाँव बटेश्वर भेज दिया। वहाँ भी क्रांति की आग धधक रही थी। अटलजी के बड़े भाई श्री प्रेमबिहारी उन पर नजर रखने के लिए साथ भेजे गए थे। अटलजी पुलिस की लपेट में आ गए। उस समय वे नाबालिग थे। इसलिए उन्हें आगरा जेल की बच्चा-बैरक में रखा गया। चौबीस दिनों की अपनी इस प्रथम जेलयात्रा के संस्मरण वे हँस-हँसकर सुनाते हैं।
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'भारत रत्न' को ही गौरवान्वित किया अटलजी ने

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। वह ना केवल एक राजनीतिज्ञ हैं, बल्कि एक महान कवि भी हैं। वाजपयी ने ढेरों कविताएं लिखीं। वे पत्रकार के रूप में भी सक्रिय रहे। वे इतने उच्च कोटि के वक्ता रहे हैं कि संसद में उनके भाषणों को पंडित नेहरू जैसे राजनीतिक विरोधियों ने भी सराहा। लम्बे समय तक राजनीति में रहे, लेकिन उन्होंने कभी किसी के बारे में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं कहा।

 संसदीय लोकतंत्र में एक विरोधी दल के नेता और बाद में एक प्रधानमंत्री के रूप में देश की सेवा की। अपने पूरे जीवन में अजातशत्रु रहने वाले अटलजी की ‍खूबियों और उपलब्धियों की एक लम्बी सूची है। अपने आचरण और व्यवहार में वे एक ऐसे व्यक्ति रहे जिसने कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया और अगर आज के नेताओं से उनकी तुलना करें तो पाएंगे कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में किसी तरह का आरोप लगाने का मौका नहीं दिया और पूरी तरह कबीर की भांति 'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया' की तरह बेदाग रहे।

वाजपेयी के नेतृत्व की क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि वे एनडीए (राजग) सरकार के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री के तौर पर 5 साल बिना किसी समस्या के पूरे किए। उन्होंने 24 दलों के गठबंधन से सरकार बनाई थी जिसमें 81 मंत्री थे, जिन्हें संभालना किसी विरले व्यक्ति का काम हो सकता है, लेकिन उन्होंने अपनी कविता 'हार नहीं मानूंगा' की तर्ज पर सदैव ही नीर-क्षीर विवेक से काम लिया।

अटलजी उन चंद लोगों में से एक हैं जिन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। इतना नही नहीं, वे वर्ष 1968 से 1973 तक वह उसके अध्यक्ष भी रहे थे। राजनीतिज्ञ वाजपेयी का एक और चेहरा अच्छे कवि और संपादक का भी है। उनकी कविताओं का संकलन 'मेरी इक्यावन कविताएं' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। एक पत्रकार के तौर पर उन्होंने लंबे समय तक राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर-अर्जुन आदि पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया और समसामयिक मामलों पर अपने विचार रखे।

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर, 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर  में हुआ था और उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी ग्वालियर में हुई, लेकिन कॉलेज की पढ़ाई-लिखाई के लिए उन्हें कानपुर में रहना पड़ा। वे अपने कॉलेज के समय से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवक बन गए थे। डीएवी कालेज में पढ़ाई के दौरान उन्होंने राजनीति शास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। एलएलबी भी करना चाहते थे, लेकिन पढ़ाई बीच में ही छोड़कर राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो गए।

राजनीति में उनका पहला कदम अगस्त 1942 में रखा गया, जब उन्हें और बड़े भाई प्रेम को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 23 दिन के लिए गिरफ्तार किया गया। वर्ष 1951 में वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक बने। उन्होंने 1955 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया। इस प्रयोग का परिणाम यह रहा कि वे लखनऊ में चुनाव हार गए। दूसरे निवार्चन क्षेत्र मथुरा संसदीय क्षेत्र में तो उनकी ज़मानत भी ज़ब्त हो गई, लेकिन बलरामपुर (जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश) से चुनाव जीतकर वे लोकसभा पहुंचे थे।

वे 1957 से 1977 तक (जनता पार्टी की स्थापना तक) जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे। 1968 से 1973 तक उन्हें भारतीय जनसंघ के राष्टीय अध्यक्ष पदासीन होने का मौका मिला। देश में आपातकाल के बाद हुए आम चुनावों में वर्ष 1977 में पहली बार वाजपेयी गैर कांग्रेसी विदेश मंत्री बने। उस समय मोरारजी देसाई की सरकार थी। वह 1977 से 1979 तक विदेश मंत्री रहे और इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया। वे पहले ऐसे विदेश मंत्री थे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था।

आपातकाल के बाद जिस जनता पार्टी का राजनीतिक जन्म हुआ था उसमें शुरू से ही राजनीतिक अस्थिरता और उठापटक का माहौल बना हुआ था। परिणाम स्वरूप उन्होंने 1980 में जनता पार्टी से असंतुष्ट होकर पार्टी छोड़ दी और भाजपा की स्थापना में मदद की। 1980 से 1986 तक उन्हें बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया और इसी दौरान वे बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे। दो बार राज्यसभा के लिए भी निर्वाचित हुए। 16 मई 1996 को उन्हें पहली बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने के कारण 31 मई 1996 को उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद 1998 तक वह लोकसभा में विपक्ष के नेता बने रहे।

उनके  राजनीतिक जीवन से जुड़ा एक आश्चर्यजनक पहलू यह रहा है कि अटलजी नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए। वे सबसे लम्बे समय तक सांसद रहे हैं। उनकी दृढ़ता को इसी बात से जाना जा सकता है कि परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की संभावित नाराजगी से विचलित हुए बिना उन्होंने परमाणु परीक्षण कर देश की सुरक्षा के लिए साहसी कदम भी उठाया। यह परमाणु परीक्षण वर्ष 1998 में राजस्थान में जैसलमेर जिले के पोखरण कस्बे के पास किए गए थे।

वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि और शिक्षक थे। उन्हें 1992 में पद्म विभूषण सम्मान, 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार, 1994 में श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार और 1994 में ही गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आज यानी 27 मार्च 2015 को उन्हें भारत रत्न का सम्मान दिया गया है, जिसके वे एक लम्बे समय से हकदार थे। वास्तव में, यह कहना गलत ना होगा कि भारत सरकार ने उन्हें पुरस्कार प्रदान कर भारत रत्न की ही गरिमा को बढ़ाया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त है, लेकिन स्वतंत्रता बाद के शुरुआती दिनों में भाजपा की पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की स्थिति की कल्पना की जा सकती है। वर्ष 1957 की दूसरी लोकसभा में भारतीय जनसंघ के सिर्फ चार सांसद थे। जब इन सांसदों का परिचय तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन से कराया गया तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा था कि वह किसी भारतीय जनसंघ नाम की पार्टी को नहीं जानते। अटलजी उन चार सांसदों में से एक थे, जिन्हें राष्ट्रपति से मिलवाया गया था।

एक सांसद से देश के प्रधानमंत्री तक के सफर में अटलजी ने कई पड़ाव तय किए। नेहरू-गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटलबिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओं में शामिल है, जिन्होंने केवल अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर सरकार बनाई और देश पर शासन किया।

अटल सरकार ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने का काम किया। यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीकी से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं, इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊंचाइयों को छुआ।

अटलजी के कार्यकाल को पाकिस्तान से संबंधों में सुधार की पहल किए जाने के लिए याद किया जाएगा। 19 फरवरी, 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। इस सेवा की शुरुआत करते हुए प्रथम यात्री के रूप में वाजपेयी जी ने पाकिस्तान की यात्रा करके नवाज़ शरीफ से मुलाकात की और आपसी संबंधों में एक नई शुरुआत की।

कुछ ही समय पश्चात पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया था। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतरराष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया। इस युद्ध में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण भारतीय सेना को जान माल का काफी नुकसान हुआ और पाकिस्तान के साथ शुरू किए गए संबंध सुधार एकबार फिर शून्य हो गए।

उनके कार्यकाल में ही भारत भर के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना (अंगरेजी में- गोल्डन क्वाड्रिलेट्रल प्रोजेक्ट या संक्षेप में जी क्यू प्रोजेक्ट) की शुरुआत की गई थी। इसके अंतर्गत दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई व मुंबई को राजमार्ग से जोड़ा गया। वाजपेयी के कार्यकाल में ही एक सौ साल से भी ज्यादा पुराने कावेरी जल विवाद को सुलझाया गया।
   
संरचनात्मक ढांचे के लिए कार्यदल, सॉफ्टवेयर विकास के लिए सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल, विद्युतीकरण में गति लाने के लिए केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग आदि का गठन उनके ही शासन काल में हुआ। राष्ट्रीय राजमार्गों एवं हवाई अड्डों का विकास शुरू कराया गया और नई टेलीकॉम नीति तथा कोंकण रेलवे की शुरुआत करके बुनियादी संरचनात्मक ढांचे को मजबूत करने वाले कदम उठाए गए।

वाजपेयी के 90 साल के होने के एक दिन पहले उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा 24 दिसंबर, 2014 को की गई थी। उम्र से जुड़ी बीमारियों के कारण वे इन दिनों सार्वजनिक जीवन से दूर हैं। एक राजनेता के रूप में वाजपेयी की सराहना की जाती है और अक्सर उनका जिक्र भाजपा के एक उदारवादी चेहरे के रूप में होता है।






अटल बिहारी वाजपेयी : रग रग हिंदू मेरा परिचय



मेरा परिचय - अटल बिहारी वाजपेयी

*** हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥
मै शंकर का वह क्रोधानल, कर सकता जगती क्षार-क्षार
डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं, जिसमें नाचता भीषण संहार
रणचंडी की अतृप्त प्यास, मैं दुर्गा का उन्मत्त हास
मै यम की प्रलयंकर पुकार, जलते मरघट का धुंआधार
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती में आग लगा दूं मैं
यदि धधक उठे जल थल अंबर, जड चेतन तो कैसा विस्मय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मै आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिए आया भू पर
पय पीकर सब मरते आए, मैं अमर हुआ लो विष पीकर
अधरों की प्यास बुझाई है, मैंने पीकर वह आग प्रखर
हो जाती दुनिया भस्मसात, जिसको पल भर में ही छूकर
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन
मै नर नारायण नीलकण्ठ बन गया, न इसमें कुछ संशय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मै अखिल विश्व का गुरु महान, देता विद्या का अमर दान
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग, मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर
मेरा स्वर्णाभा में गहरा-गहरा, सागर के जल में चेहरा-चेहरा
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मैं
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मैं तेजःपुन्ज तम लीन जगत में फैलाया मैंने प्रकाश
जगती का रच करके विनाश, कब चाहा है निज का विकास
शरणागत की रक्षा की है, मैंने अपना जीवन देकर
विश्वास नहीं यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर
यदि आज देहलि के खण्डहर सदियों की निद्रा से जगकर
गुंजार उठे उनके स्वर से हिंदू की जय तो क्या विस्मय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

दुनिया के वीराने पथ पर, जब जब नर ने खाई ठोकर
दो आँसू शेष बचा पाया जब जब मानव सब कुछ खोकर
मैं आया तभी द्रवित होकर, मैं आया ज्ञान दीप लेकर
भूला-भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर
पथ के आवर्तों से थककर, जो बैठ गया आधे पथ पर
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढनिश्चय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥


मैने छाती का लहू पिला, पाले विदेश के सुजित लाल
मुझको मानव में भेद नहीं, मेरा अन्तःस्थल वर विशाल
जग से ठुकराए लोगों को लो मेरे घर का खुला द्वार
अपना सब कुछ हूं लुटा चुका, पर अक्षय है धनागार
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयों का वह राजमुकुट
यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरिट तो क्या विस्मय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मैं वीरपुत्र मेरी जननी के जगती में जौहर अपार
अकबर के पुत्रों से पूछो क्या याद उन्हें मीना बझार
क्या याद उन्हें चित्तौड़ दुर्ग मे जलने वाली आग प्रखर
जब हाय सहस्त्रो माताएं तिल-तिल कर जलकर हो गईं अमर
वह बुझने वाली आग नहीं, रग-रग में उसे समाए हूं
यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या विस्मय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है, कर लूं सब को गुलाम
मैंने तो सदा सिखाया है, करना अपने मन को गुलाम
गोपाल राम के नामों पर, कब मैंने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिंदू करने, घर-घर मे नरसंहार किया
कोई बतलाए काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी
भूभाग नहीं शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मै एक बिंदु परिपूर्ण सिंधु है यह मेरा हिंदू समाज
मेरा इसका संबंध अमर मैं व्यक्ति और यह है समाज
इससे मैंने पाया तन-मन, इससे मैंने पाया जीवन
मेरा तो बस कर्त्तव्य यही, कर दूं सब कुछ इसके अर्पण
मैं तो समाज की थाति हूं, मैं तो समाज का हूं सेवक
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

गुरुवार, 26 मार्च 2015

भाजपा : 31 मार्च के बाद विश्व में सबसे बड़ी पार्टी




संगठनात्मक गतिविधियां: सदस्यता महाभियान
31 मार्च के बाद विश्व में सबसे बड़ी पार्टी
के रूप में उभरेगी भाजपा: दिनेश शर्मा
भाजपा राष्टन्न्ीय उपाध्यक्ष श्री दिनेश शर्मा उत्तर प्रदेश से
सम्बह् हैं और वे उत्तर प्रदेश की राजध्ाानी के महापौर है। वे
भाजपा सदस्यता अभियान के राष्टन्न्ीय संयोजक भी है। ‘कमल
संदेश’ के सम्पादकीय मंडल सदस्य राम प्रसाद त्रिपाठी से हुई
बातचीत में उन्होंने सदस्यता अभियान को अत्यध्ािक सफल
बताते हुए संगठन की उपलब्ध्ाियां सामने रखीं। उन्होंने निकट
भविष्य में संगठन की महत्वाकांक्षी योजनाओं का भी उल्लेख
किया और इसकी सफलताओं पर विश्वास व्यक्त करते हुए
कहा कि 31 मार्च के बाद भाजपा विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी उभर कर आएगी। प्रस्तुत है मुख्य
अंश:

लोकसभा की ऐतिहासिक विजय और राज्य विध्ाानसभा के
चुनावों में उसकी ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा ने
राष्टन्न्व्यापी सदस्यता अभियान शुरू किया है, जिसमें
कम से कम 10 करोड़ नए सदस्य बनाने की योजना
है। किन्तु पार्टी इस लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर पाएगी
और इसका तंत्र क्या है?
पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए प्रध्ाानमंत्री श्री नरेन्द्र
मोदी और भाजपा राष्टन्न्ीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने
1 नवम्बर 2014 को राष्टन्न्ीय अभियान छेड़कर पार्टी
में कम से कम तीन से चार गुणा तक प्राइमरी सदस्य
बढ़ाने का संकल्प किया है। उन्होंने इसी दिन अपना
मोबाईल फोन इस्तेमाल कर पार्टी की प्राइमरी सदस्यता
ग्रहण की। विशेष बात यह है कि भाजपा ही देश में
ऐसी राजनैतिक पार्टी है जो आरम्भ से ही हर छह वर्ष
के बाद इस प्रकार का सदस्यता अभियान चलाती है।
वर्तमान सदस्यता अभियान 31 मार्च 2015 तक
चलेगा। आम आदमी की जबरदस्त भागीदारी से हमारा
यह कार्यÿम सफल होगा और हम अपने लक्ष्य को
पार कर जाएंगे।
पहले की तरह ही, भाजपा बड़े पैमाने पर सदस्यता अभियान
चला रही है, परन्तु जहां तक अभियान तंत्र का संबह्
है, पारम्परिक तौर-तरीकों के अलावा हम पहली बार नई
तकनीक का प्रयोग कर रहे है और सदस्यों को मोबाईल
फोन पर सदस्य बना रहे हैं।
कोई व्यक्ति किस प्रकार से भाजपा का प्राइमरी सदस्य बन
सकता है और सÿिय सदस्य बनने के लिए क्या
प्रÿिया है?
कोई भी व्यक्ति भाजपा का सदस्य बनने के लिए
18002662020 पर फोन करेगा। किन्तु 1 अप्रैल से हम
‘सदस्यता महाभियान’ चला रहे है और हमारे कार्यकर्ता
प्रत्येक प्राइमरी सदस्य के घर जाएंगे और उन्हें रजिस्टर
करेंगे। योजना के अनुसार, अप्रैल और मई माह के दौरान
हम प्रत्येक प्राइमरी सदस्य को ‘पहचान पत्र’ देंगे। जेा
लोग आपराध्ािक रिकार्ड के होंगे या जो भाजपा के सदस्य
बनने के लिए उचित नहीं होंगे, उन्हें अयोग्य करार दिया
जाएगा।
सÿिय सदस्य बनने के लिए उसे कम से कम 100 प्राइमरी
सदस्य बनाना आवश्यक है। पार्टी ने इस प्रयोजन के
लिए उन्हें ‘सदस्यता फार्म’ जारी किया है और
कार्यकर्ताओं को अपने 7 दिन के प्रवास में सदस्यता
संख्या, व्यक्ति का नाम, उस प्राइमरी सदस्य का
टेलीफोन नं. और पार्टी के मण्डल/जिला अध्यक्ष को
इसे जमा कराना होगा। तभी वह सÿिय सदस्य बन
सकेगा/सकेगी।
11
कमल संदेश 􀂁 मार्च 1-15, 2015 􀂁 11
सदस्यों को एनरोल करने के लिए मोबाइल टैक्नोलाॅजी की
शुरूआत करने के पीछे क्या तर्क है?
सर्वे रिपोर्टों के अनुसार भारत में 93 करोड़ से अध्ािक लोगों
के पास मोबाइल हैं। इस प्रकार के आंकड़ों ने हमें अपने
सदस्यों को एनरोल करने के लिए इस मोबाइल टैक्नोलाॅजी
का इस्तेमाल करने की प्रेरणा दी। पिछली बार डेढ़ वर्षों
में हमने रसीद पुस्तकों के माध्यम से 3.7 करोड़ सदस्य
बनाए थे। अतः, इस बार संगठन ने निर्णय लिया है कि
हम मोबाइल के माध्यम से सदस्य बनाने की नई तकनीक
का प्रयोग करेंगे। वास्तव में यह तकनीक बड़ी उत्साहजनक
रही। 22 फरवरी 2015 तक भाजपा ने 5 करोड़ 70
लाख सदस्य रजिस्टर किए और लगभग 10 कराड़ फोन
काॅल प्राप्त हुईं। हमने इन काॅलों को सदस्य सूची में दर्ज
किया है। अब भी 66 लाख लोगों ने रसीद पुस्तकों के
माध्यम से सदस्यता ग्रहण की है। अब मोबाइल सदस्यता
अभियान जारी है और हमें उम्मीद है कि इस टैक्नोलाॅजी
का इस्तेमाल कर हम कम से कम 3-4 गुणा सदस्यों
की संख्या बढ़ा सकेंगे।
उन लोगों के लिए आपके पास क्या योजना है, जिनके पास
मोबाइल फोन नहीं है? वे किस प्रकार से भाजपा के
सदस्य बन सकते है?
हमने ‘एक मोबाइल एक सदस्य’ की व्यवस्था रखी है। यदि
हम एक मोबाइल संख्या से अनेकानेक सदस्य बनाने की
अनुमति देते हैं तेा यह आंकड़ा कई गुणा बढ़ जाएगा।
किन्तु, बिना मोबाइल वाले व्यक्तियों को फोन सं.
9242492424 पर एसएमएस भेजना होगा और वह
भाजपा का/की सदस्य बन सकेगा/सकेगी। दूसरे, रसीद
पुस्तक व्यवस्था द्वारा पारम्परिक सदस्यता ग्रहण करना
जारी है। परन्तु हम उनकी सदस्यता पर बाद में विचार
करेंगे।
अब तक सदस्यता अभियान का रिस्पांस क्या है?
कार्यÿम शुरू करने के बाद पहले 30 दिनों में हमने 1 करोड़
सदस्य बनाए, फिर अगले 22 दिनों में हमने 1 करोड़
सदस्य बनाए, इसके बाद 13 दिनों, 15 दिनों, 16 दनों
और 18 दिनों की अवध्ाि में हमने प्रत्येक अवध्ाि में
ÿमशः 1 करोड़ सदस्य बनाए। इस प्रकार, सदस्यों की
संख्या निरंतर बढ़ती रही है। राजस्थान, पश्चिम बंगाल,
बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, ओडिशा और दक्षिणी राज्यों
में भाजपा के सदस्यों की संख्या ने सभी रिकार्ड तोड़
दिए है और इनमें भारी वृह् िहुई है। इससे पहले, पश्चिम
बंगाल में 1.5 लाख सदस्य थे। 1 नवम्बर के बाद और
अब तक हमने 20 लाख नए सदस्य बनाए हैं। इसी
प्रकार, कर्नाटक में हमारे 45 लाख, दिल्ली में 2.6 लाख,
राजस्थान में 40 लाख, गुजरात में 60 लाख नए सदस्य
बने हैं और अन्य दूसरे राज्यों में सदस्यों की संख्या
उत्साहवधर््ाक है। इससे हमारे इस कार्यÿम की सफलता
और लोकप्रियता का पता चलता है।
जहां तक संख्या का संबंध्ा है तो क्या भाजपा ने कोई लक्ष्य
निध्ाारित किया है?
हमने कोई लक्ष्य नहीं रखा है, परन्तु, हमारा लक्ष्य पार्टी की
प्राइमरी सदस्यता अभियान को कम से कम 3-4 गुणा
बढ़ाना है और सÿिय सदस्यता में वर्तमान आंकड़ों से
बढ़कर कम से कम 50 प्रतिशत वृह् िकरना है। अब
इस समय चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की वास्तविक
सदस्यता लगभग 6.5 करोड़ है। किन्तु उन्होंने जबरदस्ती
आर्मी, पुलिस सरकारी कर्मचारियों को सदस्य बनाकर
इसे 8 करोड़ तक पहुंचा दिया है। एक बात निश्चित
है कि 31 मार्च के बाद यह आंकड़ा कहीं अध्ािक बढ़
जाएगा और भाजपा विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक
पार्टी होगी।
क्या पार्टी के पास प्रशिक्षण कार्यÿम की योजना है, जिससे
वह भाजपा की विचारध्ाारा को नए सदस्यों में समावेश
कर सके?
‘सदस्यता महाभियान’ के बाद पार्टी जून और जुलाई में नए
सदस्यों और पार्टी के सÿिय सदस्यों के लिए बड़े पैमाने
पर प्रशिक्षण शिविर लगाएगी और हम भाजपा की
विचारध्ाारा उन तक पहुंचाएंगे।
31 मार्च को इस अभियान की समाप्ति के बाद क्या पार्टी की
सदस्यता अभियान के विस्तार की कोई योजना है?
‘यह-सदस्यता अभियान’ 31 मार्च को समाप्त होगा। उसके
बाद, संगठन ने पूरे वर्ष 2015 को ‘सदस्यता पर्व वर्ष’
के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य
‘सदस्यता अभियान’ को देश के घर-घर तक ले जाना
है और पार्टी का अंतिम उद्देश्य है कि देश में ‘घर-घर
भाजपा’ या हर घर में भाजपा का सदस्य हो।
किस प्रकार से भाजपा इतने बड़े पैमाने पर सदस्यता
अभियान का आयोजन करती है और भाजपा का
कार्यकर्ता इसमें अपना कितना सहयोग दे सकता है?
विश्व की किसी भी राजनैतिक पार्टी का सबसे बड़ा सदस्यता अभियान होता
है। अतः भाजपा राष्टन्न्ीय अध्यक्ष श्री अमित शाह इस कार्यÿम पर निगाह
रख रहे हैं और इस प्रयोजन के लिए हर राज्य में जा रहे हैं। मैं इस कार्यÿम
का संयोजक हूं और मैं 18 राज्यों में जा चुका हूं। भाजपा सदस्यता अभियान
के राष्टन्न्ीय सह-संयोजक, अर्थात् डाॅ. विनय सहस्रबुह्े, श्री अरुण सिंह, श्री
सीटी रवि और श्रीमती सुध्ाा यादव भी प्रभागीय और जिला स्तर के शहरों
और विभिन्न राज्यों के कस्बों में जाकर बैठकें आयोजित कर रही है। इसी
प्रकार, प्रत्येक राज्य में हमारे संयोजक और सह-संयोजक हैं, जो मण्डल
स्तर तक इनका आयोजन करते हैं। किन्तु हम कार्यकर्ताओं को अध्ािकाध्ािक
सदस्य बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। हमने निर्णय लिया है कि जो कार्यकर्ता
1000 से अध्ािक सदस्य बनाएंगे, उनका राज्य स्तर पर अभिवादन किया
जाएगा। और जो 5000 से अध्ािक सदस्य बनाएंगे, जैसे राजस्थान के श्री
सागर जोशी ;अकेले 15,000 सदस्य बनाएद्ध और श्री सी.आर. पाटिल,
एम.जी, सूरत, गुजरात जिन्होंने ;6000 सदस्य बनाएद्ध, उन्हें संगठन केन्द्रीय
स्तर पर अभिवादन करेगा। वास्तव में, यह पार्टी कार्यकर्ताओं की सÿिय
भागीदारी से इतनी बड़ी सफलता मिल सकती है और इससे निश्चित ही
भाजपा विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बन सकेगी। 􀂄 

बुधवार, 25 मार्च 2015

गाँव से बात : नरेन्द्र मोदी , प्रधानमंत्री



Text of PM’s Mann Ki Baat with Farmers
March 22, 2015

http://www.narendramodi.in/text-of-pms-mann-ki-baat-with-farmers/

मेरे प्यारे किसान भाइयो और बहनो, आप सबको नमस्कार!

ये मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे देश के दूर सुदूर गाँव में रहने वाले मेरे किसान भाइयों और बहनों से बात करने का अवसर मिला है। और जब मैं किसान से बात करता हूँ तो एक प्रकार से मैं गाँव से बात करता हूँ, गाँव वालों से बात करता हूँ, खेत मजदूर से भी बात कर रहा हूँ। उन खेत में काम करने वाली माताओं बहनों से भी बात कर रहा हूँ। और इस अर्थ में मैं कहूं तो अब तक की मेरी सभी मन की बातें जो हुई हैं, उससे शायद एक कुछ एक अलग प्रकार का अनुभव है।

जब मैंने किसानों के साथ मन की बात करने के लिए सोचा, तो मुझे कल्पना नहीं थी कि दूर दूर गावों में बसने वाले लोग मुझे इतने सारे सवाल पूछेंगे, इतनी सारी जानकारियां देंगे, आपके ढेर सारे पत्र, ढेर सारे सवाल, ये देखकर के मैं हैरान हो गया। आप कितने जागरूक हैं, आप कितने सक्रिय हैं, और शायद आप तड़पते हैं कि कोई आपको सुने। मैं सबसे पहले आपको प्रणाम करता हूँ कि आपकी चिट्ठियाँ पढ़कर के उसमें दर्द जो मैंने देखा है, जो मुसीबतें देखी हैं, इतना सहन करने के बावजूद भी, पता नहीं क्या-क्या आपने झेला होगा।
आपने मुझे तो चौंका दिया है, लेकिन मैं इस मन की बात का, मेरे लिए एक प्रशिक्षण का, एक एजुकेशन का अवसर मानता हूँ। और मेरे किसान भाइयो और बहनो, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, कि आपने जितनी बातें उठाई हैं, जितने सवाल पूछे हैं, जितने भिन्न-भिन्न पहलुओं पर आपने बातें की हैं, मैं उन सबके विषय में, पूरी सरकार में जागरूकता लाऊँगा, संवेदना लाऊँगा, मेरा गाँव, मेरा गरीब, मेरा किसान भाई, ऐसी स्थिति में उसको रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मैं तो हैरान हूँ, किसानों ने खेती से संबधित तो बातें लिखीं हैं। लेकिन, और भी कई विषय उन्होंने कहे हैं, गाँव के दबंगों से कितनी परेशानियाँ हैं, माफियाओं से कितनी परेशानियाँ हैं, उसकी भी चर्चा की है, प्राकृतिक आपदा से आने वाली मुसीबतें तो ठीक हैं, लेकिन आस-पास के छोटे मोटे व्यापारियों से भी मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं।

किसी ने गाँव में गन्दा पानी पीना पड़ रहा है उसकी चर्चा की है, किसी ने गाँव में अपने पशुओं को रखने के लिए व्यवस्था की चिंता की है, किसी ने यहाँ तक कहा है कि पशु मर जाता है तो उसको हटाने का ही कोई प्रबंध नहीं होता, बीमारी फैल जाती है। यानि कितनी उपेक्षा हुई है, और आज मन की बात से शासन में बैठे हुए लोगों को एक कड़ा सन्देश इससे मिल रहा है। हमें राज करने का अधिकार तब है जब हम इन छोटी छोटी बातों को भी ध्यान दें। ये सब पढ़ कर के तो मुझे कभी कभी शर्मिन्दगी महसूस होती थी, कि हम लोगों ने क्या किया है! मेरे पास जवाब नहीं है, क्या किया है? हाँ, मेरे दिल को आपकी बातें छू गयी हैं। मैं जरूर बदलाव के लिए, प्रामाणिकता से प्रयास करूंगा, और उसके सभी पहलुओं पर सरकार को, जगाऊँगा, चेताऊंगा, दौडाऊंगा, मेरी कोशिश रहेगी, ये मैं विश्वास दिलाता हूँ।

मैं ये भी जानता हूँ कि पिछले वर्ष बारिश कम हुई तो परेशानी तो थी ही थी। इस बार बेमौसमी बरसात हो गयी, ओले गिरे, एक प्रकार से महाराष्ट्र से ऊपर, सभी राज्यों में, ये मुसीबत आयी। और हर कोने में किसान परेशान हो गया। छोटा किसान जो बेचारा, इतनी कड़ी मेहनत करके साल भर अपनी जिन्दगी गुजारा करता है, उसका तो सब कुछ तबाह हो गया है। मैं इस संकट की घड़ी में आपके साथ हूँ। सरकार के मेरे सभी विभाग राज्यों के संपर्क में रह करके स्थिति का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं, मेरे मंत्री भी निकले हैं, हर राज्य की स्थिति का जायजा लेंगे, राज्य सरकारों को भी मैंने कहा है कि केंद्र और राज्य मिल करके, इन मुसीबत में फंसे हुए सभी किसान भाइयों-बहनों को जितनी ज्यादा मदद कर सकते हैं, करें। में आपको विश्वास दिलाता हूँ कि सरकार पूरी संवेदना के साथ, आपकी इस संकट की घड़ी में, आपको पूरी तत्परता से मदद करेगी। जितना हो सकता है, उसको पूरा करने का प्रयास किया जायेगा।

गाँव के लोगों ने, किसानों ने कई मुददे उठाये हैं। सिंचाई की चिंता व्यापक नजर आती है। गाँव में सड़क नहीं है उसका भी आक्रोश है। खाद की कीमतें बढ़ रही हैं, उस पर भी किसान की नाराजगी है। बिजली नहीं मिल रही है। किसानों को यह भी चिंता है कि बच्चों को पढ़ाना है, अच्छी नौकरी मिले ये भी उनकी इच्छा है, उसकी भी शिकायतें हैं। माताओं बहनों की भी, गाँव में कहीं नशा-खोरी हो रही है उस पर अपना आक्रोश जताया है। कुछ ने तो अपने पति को तम्बाकू खाने की आदत है उस पर भी अपना रोष मुझे व्यक्त करके भेजा है। आपके दर्द को मैं समझ सकता हूँ। किसान का ये भी कहना है की सरकार की योजनायें तो बहुत सुनने को मिलती हैं, लेकिन हम तक पहुँचती नहीं हैं। किसान ये भी कहता है कि हम इतनी मेहनत करते हैं, लोगों का तो पेट भरते हैं लेकिन हमारा जेब नहीं भरता है, हमें पूरा पैसा नहीं मिलता है। जब माल बेचने जाते हैं, तो लेने वाला नहीं होता है। कम दाम में बेच देना पड़ता है। ज्यादा पैदावार करें तो भी मरते हैं, कम पैदावार करें तो भी मरते हैं। यानि किसानों ने अपने मन की बात मेरे सामने रखी है। मैं मेरे किसान भाइयों-बहनों को विश्वास दिलाता हूँ, कि मैं राज्य सरकारों को भी, और भारत सरकार के भी हमारे सभी विभागों को भी और अधिक सक्रिय करूंगा। तेज गति से इन समस्याओं के समाधान के रास्ते खोजने के लिए प्रेरित करूँगा। मुझे लग रहा है कि आपका धैर्य कम हो रहा है। बहुत स्वाभाविक है, साठ साल आपने इन्तजार किया है, मैं प्रामाणिकता से प्रयास करूँगा।
किसान भाइयो, ये आपके ढेर सारे सवालों के बीच में, मैंने देखा है कि करीब–करीब सभी राज्यों से वर्तमान जो भूमि अधिग्रहण बिल की चर्चा है, उसका प्रभाव ज्यादा दिखता है, और मैं हैरान हूँ कि कैसे-कैसे भ्रम फैलाए गए हैं। अच्छा हुआ, आपने छोटे–छोटे सवाल मुझे पूछे हैं। मैं कोशिश करूंगा कि सत्य आप तक पहुचाऊं। आप जानते हैं भूमि-अधिग्रहण का कानून 120 साल पहले आया था। देश आज़ाद होने के बाद भी 60-65 साल वही कानून चला और जो लोग आज किसानों के हमदर्द बन कर के आंदोलन चला रहे हैं, उन्होंने भी इसी कानून के तहत देश को चलाया, राज किया और किसानों का जो होना था हुआ। सब लोग मानते थे कि कानून में परिवर्तन होना चाहिए, हम भी मानते थे। हम विपक्ष में थे, हम भी मानते थे।

2013 में बहुत आनन-फानन के साथ एक नया कानून लाया गया। हमने भी उस समय कंधे से कन्धा मिलाकर के साथ दिया। किसान का भला होता है, तो साथ कौन नहीं देगा, हमने भी दिया। लेकिन कानून लागू होने के बाद, कुछ बातें हमारे ज़हन में आयीं। हमें लगा शायद इसके साथ तो हम किसान के साथ धोखा कर रहे हैं। हमें किसान के साथ धोखा करने का अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ जब हमारी सरकार बनी, तब राज्यों की तरफ से बहुत बड़ी आवाज़ उठी। इस कानून को बदलना चाहिए, कानून में सुधार करना चाहिए, कानून में कुछ कमियां हैं, उसको पूरा करना चाहिए। दूसरी तरफ हमने देखा कि एक साल हो गया, कोई कानून लागू करने को तैयार ही नहीं कोई राज्य और लागू किया तो उन्होंने क्या किया? महाराष्ट्र सरकार ने लागू किया था, हरियाणा ने किया था जहां पर कांग्रेस की सरकारें थीं और जो किसान हितैषी होने का दावा करते हैं उन्होंने इस अध्यादेश में जो मुआवजा देने का तय किया था उसे आधा कर दिया। अब ये है किसानों के साथ न्याय? तो ये सारी बातें देख कर के हमें भी लगा कि भई इसका थोडा पुनर्विचार होना ज़रूरी है। आनन–फानन में कुछ कमियां रह जाती हैं। शायद इरादा ग़लत न हो, लेकिन कमियाँ हैं, तो उसको तो ठीक करनी चाहिए।…और हमारा कोई आरोप नहीं है कि पुरानी सरकार क्या चाहती थी, क्या नहीं चाहती थी? हमारा इरादा यही है कि किसानों का भला हो, किसानों की संतानों का भी भला हो, गाँव का भी भला हो और इसीलिए कानून में अगर कोई कमियां हैं, तो दूर करनी चाहिए। तो हमारा एक प्रामाणिक प्रयास कमियों को दूर करना है।
अब एक सबसे बड़ी कमी मैं बताऊँ, आपको भी जानकर के हैरानी होगी कि जितने लोग किसान हितैषी बन कर के इतनी बड़ी भाषणबाज़ी कर रहें हैं, एक जवाब नहीं दे रहे हैं। आपको मालूम है, अलग-अलग प्रकार के हिंदुस्तान में 13 कानून ऐसे हैं जिसमें सबसे ज्यादा जमीन संपादित की जाती है, जैसे रेलवे, नेशनल हाईवे, खदान के काम। आपको मालूम है, पिछली सरकार के कानून में इन 13 चीज़ों को बाहर रखा गया है। बाहर रखने का मतलब ये है कि इन 13 प्रकार के कामों के लिए जो कि सबसे ज्यादा जमीन ली जाती है, उसमें किसानों को वही मुआवजा मिलेगा जो पहले वाले कानून से मिलता था। मुझे बताइए, ये कमी थी कि नहीं? ग़लती थी कि नहीं? हमने इसको ठीक किया और हमने कहा कि भई इन 13 में भी भले सरकार को जमीन लेने कि हो, भले रेलवे के लिए हो, भले हाईवे बनाने के लिए हो, लेकिन उसका मुआवजा भी किसान को चार गुना तक मिलना चाहिए। हमने सुधार किया। कोई मुझे कहे, क्या ये सुधार किसान विरोधी है क्या? हमें इसीलिए तो अध्यादेश लाना पड़ा। अगर हम अध्यादेश न लाते तो किसान की तो जमीन वो पुराने वाले कानून से जाती रहती, उसको कोई पैसा नहीं मिलता। जब ये कानून बना तब भी सरकार में बैठे लोगों में कईयों ने इसका विरोधी स्वर निकला था। स्वयं जो कानून बनाने वाले लोग थे, जब कानून का रूप बना, तो उन्होंने तो बड़े नाराज हो कर के कह दिया, कि ये कानून न किसानों की भलाई के लिए है, न गाँव की भलाई के लिए है, न देश की भलाई के लिए है। ये कानून तो सिर्फ अफसरों कि तिजोरी भरने के लिए है, अफसरों को मौज करने के लिए, अफ़सरशाही को बढ़ावा देने के लिए है। यहाँ तक कहा गया था। अगर ये सब सच्चाई थी तो क्या सुधार होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए? ..और इसलिए हमने कमियों को दूर कर के किसानों का भला करने कि दिशा में प्रयास किये हैं। सबसे पहले हमने काम किया, 13 कानून जो कि भूमि अधिग्रहण कानून के बाहर थे और जिसके कारण किसान को सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला था, उसको हम इस नए कानून के दायरे में ले आये ताकि किसान को पूरा मुआवजा मिले और उसको सारे हक़ प्राप्त हों। अब एक हवा ऐसी फैलाई गई कि मोदी ऐसा कानून ला रहें हैं कि किसानों को अब मुआवजा पूरा नहीं मिलेगा, कम मिलेगा।

मेरे किसान भाइयो-बहनो, मैं ऐसा पाप सोच भी नहीं सकता हूँ। 2013 के पिछली सरकार के समय बने कानून में जो मुआवजा तय हुआ है, उस में रत्ती भर भी फर्क नहीं किया गया है। चार गुना मुआवजा तक की बात को हमने स्वीकारा हुआ है। इतना ही नहीं, जो तेरह योजनाओं में नहीं था, उसको भी हमने जोड़ दिया है। इतना ही नहीं, शहरीकरण के लिए जो भूमि का अधिग्रहण होगा, उसमें विकसित भूमि, बीस प्रतिशत उस भूमि मालिक को मिलेगी ताकि उसको आर्थिक रूप से हमेशा लाभ मिले, ये भी हमने जारी रखा है। परिवार के युवक को नौकरी मिले। खेत मजदूर की संतान को भी नौकरी मिलनी चाहिए, ये भी हमने जारी रखा है। इतना ही नहीं, हमने तो एक नयी चीज़ जोड़ी है। नयी चीज़ ये जोड़ी है, जिला के जो अधिकारी हैं, उसको इसने घोषित करना पड़ेगा कि उसमें नौकरी किसको मिलेगी, किसमें नौकरी मिलेगी, कहाँ पर काम मिलेगा, ये सरकार को लिखित रूप से घोषित करना पड़ेगा। ये नयी चीज़ हमने जोड़ करके सरकार कि जिम्मेवारी को Fix किया है।
मेरे किसान भाइयो-बहनो, हम इस बात पर agree हैं, कि सबसे पहले सरकारी जमीन का उपयोग हो। उसके बाद बंजर भूमि का उपयोग हो, फिर आखिर में अनिवार्य हो तब जाकर के उपजाऊ जमीन को हाथ लगाया जाये, और इसीलिए बंजर भूमि का तुरंत सर्वे करने के लिए भी कहा गया है, जिसके कारण वो पहली priority वो बने।
एक हमारे किसानों की शिकायत सही है कि आवश्यकता से अधिक जमीन हड़प ली जाती है। इस नए कानून के माध्यम से मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि अब जमीन कितनी लेनी, उसकी पहले जांच पड़ताल होगी, उसके बाद तय होगा कि आवश्यकता से अधिक जमीन हड़प न की जाए। कभी-कभी तो कुछ होने वाला है, कुछ होने वाला है, इसकी चिंता में बहुत नुकसान होता है। ये Social Impact Assessment (SIA) के नाम पर अगर प्रक्रिया सालों तक चलती रहे, सुनवाई चलती रहे, मुझे बताइए, ऐसी स्थिति में कोई किसान अपने फैसले कर पायेगा? फसल बोनी है तो वो सोचेगा नहीं-नहीं यार, पता नहीं, वो निर्णय आ जाएगा तो, क्या करूँगा? और उसके 2-2, 4-4, साल खराब हो जाएगा और अफसरशाही में चीजें फसी रहेंगी। प्रक्रियाएं लम्बी, जटिल और एक प्रकार से किसान बेचारा अफसरों के पैर पकड़ने जाने के लिए मजबूर हो जाएगा कि साहब ये लिखो, ये मत लिखों, वो लिखो, वो मत लिखो, ये सब होने वाला है। क्या मैं मेरे अपने किसानों को इस अफसरसाही के चुंगल में फिर एक बार फ़सा दूं? मुझे लगता है वो ठीक नहीं होगा। प्रक्रिया लम्बी थी, जटिल थी। उसको सरल करने का मैंने प्रयास किया है।
मेरे किसान भाइयो-बहनो 2014 में कानून बना है, लेकिन राज्यों ने उसको स्वीकार नहीं किया है। किसान तो वहीं का वहीं रह गया। राज्यों ने विरोध किया। मुझे बताइए क्या मैं राज्यों की बात सुनूं या न सुनूं? क्या मैं राज्यों पर भरोसा करूँ या न करूँ? इतना बड़ा देश, राज्यों पर अविश्वास करके चल सकता है क्या? और इसलिए मेरा मत है कि हमें राज्यों पर भरोसा करना चाहिये, भारत सरकार में विशेष करना चाहिये तो, एक तो मैं भरोसा करना चाहता हूँ, दूसरी बात है, ये जो कानून में सुधार हम कर रहे हैं, कमियाँ दूर कर रहे हैं, किसान की भलाई के लिए जो हम कदम उठा रहे हैं, उसके बावजूद भी अगर किसी राज्य को ये नहीं मानना है, तो वे स्वतंत्र हैं और इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि ये जो सारे भ्रम फैलाए जा रहे हैं, वो सरासर किसान विरोधी के भ्रम हैं। किसान को गरीब रखने के षड्यन्त्र का ही हिस्सा हैं। देश को आगे न ले जाने के जो षडयंत्र चले हैं उसी का हिस्सा है। उससे बचना है, देश को भी बचाना है, किसान को भी बचाना है।

अब गाँव में भी किसान को पूछो कि भाई तीन बेटे हैं बताओ क्या सोच रहे हो? तो वो कहता है कि भाई एक बेटा तो खेती करेगा, लेकिन दो को कहीं-कहीं नौकरी में लगाना है। अब गाँव के किसान के बेटों को भी नौकरी चाहिये। उसको भी तो कहीं जाकर रोजगार कमाना है। तो उसके लिए क्या व्यवस्था करनी पड़ेगी। तो हमने सोचा कि जो गाँव की भलाई के लिए आवश्यक है, किसान की भलाई के लिये आवश्यक है, किसान के बच्चों के रोजगार के लिए आवश्यक है, ऐसी कई चीजों को जोड़ दिया जाए। उसी प्रकार से हम तो जय-जवान, जय-किसान वाले हैं। जय-जवान का मतलब है देश की रक्षा। देश की रक्षा के विषय में हिंदुस्तान का किसान कभी पीछे हटता नहीं है। अगर सुरक्षा के क्षेत्र में कोई आवश्कता हो तो वह जमीन किसानों से मांगनी पड़ेगी।..और मुझे विश्वास है, वो किसान देगा। तो हमने इन कामों के लिए जमीन लेने की बात को इसमें जोड़ा है। कोई भी मुझे गाँव का आदमी बताए कि गाँव में सड़क चाहिये कि नहीं चाहिये। अगर खेत में पानी चाहिये तो नहर करनी पड़ेगी कि नहीं करनी पड़ेगी। गाँव में आज भी गरीब हैं, जिसके पास रहने को घर नहीं है। घर बनाने के लिए जमीन चाहिये की नहीं चाहिये? कोई मुझे बताये कि यह उद्योगपतियों के लिए है क्या? यह धन्ना सेठों के लिए है क्या? सत्य को समझने की कोशिश कीजिये।

हाँ, मैं एक डंके की चोट पर आपको कहना चाहता हूँ, नए अध्यादेश में भी, कोई भी निजी उद्योगकार को, निजी कारखाने वाले को, निजी व्यवसाय करने वाले को, जमीन अधिग्रहण करने के समय 2013 में जो कानून बना था, जितने नियम हैं, वो सारे नियम उनको लागू होंगे। यह कॉर्पोरेट के लिए कानून 2013 के वैसे के वैसे लागू रहने वाले हैं। तो फिर यह झूठ क्यों फैलाया जाता है। मेरे किसान भाइयो-बहनो, एक भ्रम फैलाया जाता है कि आपको कानूनी हक नहीं मिलेगा, आप कोर्ट में नहीं जा सकते, ये सरासर झूठ है। हिंदुस्तान में कोई भी सरकार आपके कानूनी हक़ को छीन नहीं सकती है। बाबा साहेब अम्बेडकर ने हमें जो संविधान दिया है, इस संविधान के तहत आप हिंदुस्तान के किसी भी कोर्ट में जा करके दरवाजे खटखटा सकते हैं। तो ये झूठ फैलाया गया है। हाँ, हमने एक व्यवस्था को आपके दरवाजे तक लाने का प्रयास किया है।
एक Authority बनायी है, अब वो Authority जिले तक काम करेगी और आपके जिले के किसानों की समस्याओं का समाधान उसी Authority में जिले में ही हो जायेगा।..और वहां अगर आपको संतोष नहीं होता तो आप ऊपर के कोर्ट में जा सकते हैं। तो ये व्यवस्था हमने की है।
एक यह भी बताया जाता है कि भूमि अधिग्रहित की गयी तो वो पांच साल में वापिस करने वाले कानून को हटा दिया गया है। जी नहीं, मेरे किसान भाइयो-बहनो हमने कहा है कि जब भी Project बनाओगे, तो यह पक्का करो कि कितने सालों में आप इसको पूरा करोगे। और उस सालों में अगर पूरा नहीं करते हैं तो वही होगा जो किसान चाहेगा। और उसको तो समय-सीमा हमने बाँध दी है। आज क्या होता है, 40-40 साल पहले जमीने ली गयी, लेकिन अभी तक सरकार ने कुछ किया नहीं। तो यह तो नहीं चल सकता। तो हमने सरकार को सीमा में बांधना तय किया है। हाँ, कुछ Projects ऐसे होते हैं जो 20 साल में पूरे होते हैं, अगर मान लीजिये 500 किलोमीटर लम्बी रेलवे लाइन डालनी है, तो समय जाएगा। तो पहले से कागज़ पर लिखो कि भाई कितने समय में पूरा करोगे। तो हमने सरकार को बाँधा है। सरकार की जिम्मेवारी को Fix किया है।

मैं और एक बात बताऊं किसान-भाइयो, कभी-कभी ये एयरकंडीशन कमरे में बैठ करके जो कानून बनाते हैं न, उनको गाँव के लोगों की सच्ची स्थिति का पता तक नहीं होता है। अब आप देखिये जब डैम बनता है, जलाशय बनता है, तो उसका नियम यह है कि 100 साल में सबसे ज्यादा पानी की सम्भावना हो उस हिसाब से जमीन प्राप्त करने का नियम है। अब 100 साल में एक बार पानी भरता है। 99 साल तक पानी नहीं भरता है। फिर भी जमीन सरकार के पास चली जाती है, तो आज सभी राज्यों में क्या हो रहा है की भले जमीन कागज़ पर ले ली हो, पैसे भी दे दिए हों। लेकिन फिर भी वो जमीन पर किसान खेती करता है। क्योंकि 100 साल में एक बार जब पानी भर जाएगा तो एक साल के लिए वो हट जाएगा। ये नया कानून 2013 का ऐसा था कि आप खेती नहीं कर सकते थे। हम चाहते हैं कि अगर जमीन डूब में नहीं जाती है तो फिर किसान को खेती करने का अवसर मिलना चाहिये।..और इसीलिये वो जमीन किसान से कब्ज़ा नहीं करनी चाहिये। ये लचीलापन आवश्यक था। ताकि किसान को जमीन देने के बावजूद भी जमीन का लाभ मिलता रहे और जमीन देने के बदले में रुपया भी मिलता रहे। तो किसान को डबल फायदा हो। ये व्यवस्था करना भी जरूरी है, और व्यावहारिक व्यवस्था है, और उस व्यावहारिक व्यवस्था को हमने सोचा है।
एक भ्रम ऐसा फैलाया जाता है कि ‘सहमति’ की जरुरत नहीं हैं। मेरे किसान भाइयो-बहनो ये राजनीतिक कारणों से जो बाते की जाती हैं, मेहरबानी करके उससे बचिये! 2013 में जो कानून बना उसमे भी सरकार नें जिन योजनाओं के लिए जमीन माँगी है, उसमें सहमती का क़ानून नहीं है।…और इसीलिए सहमति के नाम पर लोगों को भ्रमित किया जाता है। सरकार के लिए सहमति की बात पहले भी नही थी, आज भी नहीं है।..और इसीलिये मेरे किसान भाइयों-बहनो पहले बहुत अच्छा था और हमने बुरा कर दिया, ये बिलकुल सरासर आपको गुमराह करने का दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास है। मैं आज भी कहता हूँ कि निजी उद्योग के लिए, कॉर्पोरेट के लिए, प्राइवेट कारखानों के लिए ये ‘सहमति’ का कानून चालू है, है…है।

…और एक बात मैं कहना चाहता हूँ, कुछ लोग कहतें है, PPP मॉडल! मेरे किसान भाइयो-बहनो, मान लीजिये 100 करोड रुपए का एक रोड बनाना है। क्या रोड किसी उद्योगकार उठा कर ले जाने वाला है क्या? रोड तो सरकार के मालिकी का ही रहता है। जमीन सरकार की मालिकी की ही रहती है। बनाने वाला दूसरा होता है। बनाने वाला इसीलिए दूसरा होता है, क्योंकि सरकार के पास आज पैसे नहीं होते हैं। क्योंकि सरकार चाहती है कि गाँव में स्कूल बने, गाँव में हॉस्पिटल बने, गरीब का बच्चा पढ़े, इसके लिए पैसा लगे। रोड बनाने का काम प्राइवेट करे, लेकिन वो प्राइवेट वाला भी रोड अपना नहीं बनाता है। न अपने घर ले जाता है, रोड सरकार का बनाता है। एक प्रकार से अपनी पूंजी लगता है। इसका मतलब ये हुआ कि सरकार का जो प्रोजेक्ट होगा जिसमें पूंजी किसी की भी लगे, जिसको लोग PPP मॉडल कहतें हैं। लेकिन अगर उसका मालिकाना हक़ सरकार का रहता है, उसका स्वामित्व सरकार का रहता है, सरकार का मतलब आप सबका रहता है, देश की सवा सौ करोड़ जनता का रहता है तो उसमें ही हमने ये कहा है कि सहमति की आवश्यकता नहीं है और इसीलिये ये PPP मॉडल को लेकर के जो भ्रम फैलाये जातें हैं उसकी मुझे आपको स्पष्टता करना बहुत ही जरुरी है।

कभी-कभार हम जिन बातों के लिए कह रहे हैं कि भई उसमें ‘सहमति’ की प्रक्रिया एक प्रकार से अफसरशाही और तानाशाही को बल देगी। आप मुझे बताईये, एक गावं है, उस गॉव तक रोड बन गया है, अब दूसरे गॉव के लिए रोड बनाना है, आगे वाले गॉव के लिए, 5 किलोमीटर की दूरी पर वह गॉव है। इस गॉव तक रोड बन गया है, लेकिन इन गॉव वालों की ज़मीन उस गॉव की तरफ है। मुझे बताईये उस गॉव के लोगों के लिए, रोड बनाने के लिए, ये गॉव वाले ज़मीन देंगे क्या? क्या ‘सहमति’ देंगे क्या? तो क्या पीछे जो गॉव है उसका क्या गुनाह है भई? उसको रोड मिलना चाहिए कि नहीं, मिलना चाहिये? उसी प्रकार से मैं नहर बना रहा हूँ। इस गॉव वालो को पानी मिल गया, नहर बन गयी। लेकिन आगे वाले गॉव को पानी पहुंचाना है तो ज़मीन तो इसी गावंवालों के बीच में पड़ती है। तो वो तो कह देंगे कि भई नहीं, हम तो ज़मीन नहीं देंगे। हमें तो पानी मिल गया है। तो आगे वाले गावं को नहर मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए?

मेरे भाइयो-बहनो, ये व्यावहारिक विषय है। और इसलिए जिस काम के लिए इतनी लम्बी प्रक्रिया न हो, हक और किसान के लिए, ये उद्योग के लिए नहीं है, व्यापार के लिए नहीं है, गावं की भलाई के लिए है, किसान की भलाई के लिए है, उसके बच्चों की भलाई के लिए है।

एक और बात आ रही है। ये बात मैंने पहले भी कही है। हर घर में किसान चाहता है कि एक बेटा भले खेती में रहे, लेकिन बाकी सब संतान रोज़ी–रोटी कमाने के लिए बाहर जाये क्योंकि उसे मालूम है, कि आज समय की मांग है कि घर में घर चलाने के लिए अलग-अलग प्रयास करने पड़ते हैं। अगर हम कोई रोड बनाते है और रोड के बगल में सरकार Industrial Corridor बनाती है, प्राइवेट नहीं। मैं एक बार फिर कहता हूँ प्राइवेट नहीं, पूंजीपति नहीं, धन्ना सेठ नहीं, सरकार बनाती है ताकि जब Corridor बनता है पचास किलोमीटर लम्बा, 100 किलोमीटर लम्बा तो जो रोड बनेगा, रोड के एक किलोमीटर बाएं, एक किलोमीटर दायें वहां पर अगर सरकार Corridor बनाती है ताकि नजदीक में जितने गाँव आयेंगे 50 गाँव, 100 गाँव, 200 गाँव उनको वहां कोई न कोई, वहां रोजी रोटी का अवसर मिल जाए, उनके बच्चों को रोजगार मिल जाए।

मुझे बताइये, भाइयों-बहनो क्या हम चाहतें हैं, कि हमारे गाँव के किसानों के बच्चे दिल्ली और मुंबई की झुग्गी झोपड़ियों में जिन्दगी बसर करने के लिए मजबूर हो जाएँ? क्या उनके घर और गाँव के 20-25 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा भी कारखाना लग जाता है और उसको रोजगार मिल जाता है, तो मिलना चाहिये की नहीं मिलना चाहिये? और ये Corridor प्राइवेट नही है, ये सरकार बनाएगी। सरकार बनाकर के उस इलाके के लोगों को रोजगार देने का प्रबंध करेगी। ..और इसीलिए जिसकी मालिकी सरकार की है, और जो गाँव की भलाई के लिए है, गाँव के किसानो की भलाई के लिए है, जो किसानों की भावी पीड़ी की भलाई के लिए हैं, जो गाँव के गरीबों की भलाई के लिए हैं, जो गाँव के किसान को बिजली पानी मोहैया कराने के लिए उनके लिए हैं, उनके लिए इस भूमि अधिग्रहण बिल में कमियाँ थी, उस कमियों को दूर करने का हमारे प्रामाणिक प्रयास हैं।…और फिर भी मैंने Parliament में कहा था की अभी भी किसी को लगता है कोई कमी हैं, तो हम उसको सुधार करने के लिए तैयार हैं।

जब हमने लोकसभा में रखा, कुछ किसान नेताओं ने आ करके दो चार बातें बताईं, हमने जोड़ दी। हम तो अभी भी कहतें कि भाई भूमि अधिग्रहण किसानों की भलाई के लिए ही होना चाहिये। ..और ये हमारी प्रतिबद्धता है, जितने झूठ फैलाये जाते हैं, कृपा करके मैं मेरे किसान भाइयों से आग्रह करता हूँ कि आप इन झूठ के सहारे निर्णय मत करें, भ्रमित होने की जरुरत नहीं है। आवश्यकता यह है की हमारा किसान ताकतवर कैसे बने, हमारा गाँव ताकतवर कैसे बने, हमारा किसान जो मेहनत करता है, उसको सही पैसे कैसे मिले, उसको अच्छा बाज़ार कैसे मिले, जो पैदा करता है उसके रखरखाव के लिए अच्छा स्टोरेज कैसे मिले, हमारी कोशिश है कि गाँव की भलाई, किसान की भलाई के लिए सही दिशा में काम उठाएं।

मेरे किसान भाइयो-बहनो, हमारी कोशिश है कि देश ऐसे आगे बढ़े कि आपकी जमीन पर पैदावार बढ़े, और इसीलिए हमने कोशिश की है, Soil Health Card. जैसे मनुष्य बीमार हो जाता है तो उसकी तबीयत के लिए लेबोरेटरी में टेस्ट होता हैं। जैसा इंसान का होता है न, वैसा अपनी भारत-माता का भी होता हैं, अपनी धरती- माता का भी होता है। और इसीलिए हम आपकी धरती बचे इतना ही नहीं, आपकी धरती तन्दुरूस्त हो उसकी भी चिंता कर रहे हैं।

….और इसलिये भूमि अधिग्रहण नहीं, आपकी भूमि अधिक ताकतवर बने ये भी हमारा काम है। और इसीलिए “Soil Health Card” की बात लेकर के आये हैं। हर किसान को इसका लाभ मिलने वाला है, आपके उर्वरक का जो फालतू खर्चा होता है उससे बच जाएगा। आपकी फसल बढ़ेगी। आपको फसल का पूरा पैसा मिले, उसके लिए भी तो अच्छी मंडियां हों, अच्छी कानून व्यवस्था हो, किसान का शोषण न हो, उस पर हम काम कर रहे हैं और आप देखना मेरे किसान भाइयो, मुझे याद है, मैं जब गुजरात में मुख्यमंत्री था इस दिशा में मैंने बहुत काम किया था। हमारे गुजरात में तो किसान की हालत बहुत ख़राब थी, लेकिन पानी पर काम किया, बहुत बड़ा परिवर्तन आया। गुजरात के विकास में किसान का बहुत बड़ा योगदान बन गया जो कभी सोच नही सकता था। गाँव के गाँव खाली हो जाते थे। बदलाव आया, हम पूरे देश में ये बदलाव चाहते हैं जिसके कारण हमारा किसान सुखी हो।

…और इसलिए मेरे किसान भाइयो और बहनो, आज मुझे आपके साथ बात करने का मौका मिला। लेकिन इन दिनों अध्यादेश की चर्चा ज्यादा होने के कारण मैंने ज़रा ज्यादा समय उसके लिए ले लिया। लेकिन मेरे किसान भाइयो बहनो मैं प्रयास करूंगा, फिर एक बार कभी न कभी आपके साथ दुबारा बात करूंगा, और विषयों की चर्चा करूँगा, लेकिन मैं इतना विश्वास दिलाता हूँ कि आपने जो मुझे लिख करके भेजा है, पूरी सरकार को मैं हिलाऊँगा, सरकार को लगाऊंगा कि क्या हो रहा है। अच्छा हुआ आपने जी भरके बहुत सी चीजें बतायी हैं और मैं मानता हूँ आपका मुझ पर भरोसा है, तभी तो बताई है न! मैं ये भरोसे को टूटने नहीं दूंगा, ये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ।

आपका प्यार बना रहे, आपके आशीर्वाद बने रहे। और आप तो जगत के तात हैं, वो कभी किसी का बुरा सोचता, वो तो खुद का नुकसान करके भी देश का भला करता है। ये उसकी परंपरा रही है। उस किसान का नुकसान न हो, इसकी चिंता ये सरकार करेगी। ये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ लेकिन आज मेरी मन की बातें सुनने के बाद आपके मन में बहुत से विचार और आ सकते हैं। आप जरुर मुझे आकाशवाणी के पते पर लिखिये। मैं आगे फिर कभी बातें करूँगा। या आपके पत्रों के आधार पर सरकार में जो गलतियाँ जो ठीक करनी होंगी तो गलतियाँ ठीक करूँगा। काम में तेजी लाने की जरुरत है, तो तेजी लाऊंगा और और किसी को अन्याय हो रहा है तो न्याय दिलाने के लिए पूरा प्रयास करूँगा।

नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है। मेरी आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

सोमवार, 23 मार्च 2015

त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज : - डॉ. दीपक आचार्य



मावजी महाराज के चौपड़े को अब हिन्दी में पढ़ पाएंगे

  Bhaskar News Network    Sep 03, 2014
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तीन नदियों के संगम पर स्थित प्रसिद्ध श्रद्धास्थल बेणेश्वरधाम के पहले महंत और भविष्यवक्ता के रूप में पहचाने जाने वाले मावजी महाराज के चौपड़े को अब आम श्रद्धालु हिन्दी और अंग्रेजी में पढ़ पाएंगे।

एक साल के प्रयासों के बाद धाम के महंत अच्युतानंद महाराज के सानिध्य में फाउंडेशन के विद्वानों ने अनुवाद का काम पूरा कर लिया है। लगभग 600 पेज के अनुवाद को 200-200 पेजों के तीन खंड में विभाजित कर आम श्रद्धालुओं के सामने इस चौपड़े को रखा जाएगा। पिछली राज्य सरकार ने मावजी महाराज के चौपड़े का हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद करने के लिए जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग से 43.50 लाख रुपए की वित्तीय सहायता स्वीकृत कराई थी। इसके बाद इस कार्य को टीआरई (ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट़्यूट) और मावजी फाउंडेशन के माध्यम से पूरा करने का जिम्मा दिया गया था। अनुवाद के लिए बनाई समिति के संरक्षक और मार्गदर्शक महंत अच्युतानंद महाराज रहे हैं। इस काम की पहल तत्कालीन मंत्री महेंद्रजीतसिंह मालवीया और प्रमुख शासन सचिव प्रीतमसिंह ने की थी।

पांच में से चार चौपड़े ही सुरक्षित
मावजीमहाराज के 5 चौपड़ों में से 4 इस समय सुरक्षित हैं। ऐसी लोकमान्यता है कि इनमें ‘मेघसागर’ हरिमंदिर साबला में है, जिसमें गीता-ज्ञान उपदेश, भौगोलिक परिवर्तनों की भविष्यवाणियां हैं। ‘सामसागर’ शेषपुर में है। इसे हेपर कहा जाता है। जिसमें शेषपुर और धोलागढ़ का वर्णन और दिव्य वाणियां हैं। तीसरा ‘प्रेमसागर’ डूंगरपुर जिले के ही पुंजपुर में है, जिसमें धर्मोपदेश, भूगोल, इतिहास और भावी घटनाओं की प्रतीकात्मक जानकारी है। ‘अनंत सागर’ नामक एक ओर चौपड़ा मराठा आमंत्रण के समय बाजीराव पेशवा द्वारा ले जाया गया, जिसे बाद में अंग्रेज ले गए। बताया जाता है कि इस समय यह लंदन के किसी म्यूजियम में सुरक्षित है। इसमें ज्ञान-विज्ञान की जानकारियां समाहित हैं।

अब प्रकाशन के लिए चाहिए बजट, सरकार बदल गई
मावजीमहाराज के चौपड़े का अनुवाद होने के बाद ग्रंथ के रूप में प्रकाशन के लिए बजट और वित्तीय सहायता की जरूरत है। यह प्रोजेक्ट कांग्रेस राज में बना और इस पर काम हुआ था, बाद में सरकार बदल गई है। हालांकि उम्मीद की किरण मुख्यमंत्री ने जगाई है, अपने उदयपुर के दौरे के दौरान उनके द्वारा चौपड़े को लेकर जानकारी ली गई थी, लेकिन टीएडी मंत्री की ओर से फिलहाल कोई पहल नहीं की गई है। 

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मावजी के चौपड़ों का प्रकाशन होगा

Posted By: नया इंडिया टीम Posted date: August 28th, 2013
उदयपुर। राजस्थान सरकार ने वागड के संत मावजी महाराज द्वारा तीन शताब्दी पहले लिखे गए धार्मिक चौपडों के अनुवाद, संरक्षण व प्रकाशन कार्य के लिए 43.50 लाख रूपए स्वीकृत किए हैं। जनजाति क्षेत्रीय विकास आयुक्त सुबोध अग्रवाल ने मंगलवार को जानकारी देते हुए बताया कि इस स्वीकृत राशि में से मावजी महाराज के चौपडों का प्रकाशन चार खंडों में किया जाएगा।
साथ ही इसके लिए लगभग 4 हजार पृष्ठों का अनुवाद कार्य पूरा हो चुका है। उन्होंने बताया कि मावजी फाउण्डेशन की ओर से किए जा रहे इस प्रकाशन का संपादन व पुस्तक रूप प्रदान करनें व कम्पयूटरीकरण का कामजल्द ही पूरा कर लिया जाएगा। डा. अग्रवाल ने बताया कि चारों चौपडों के संरक्षण डिजिटल फोंटोग्राफी व मूल स्वरंप को बनाए रखने के लिए केमिकल ट्रीटमेंट नेशनल आरचीव्ज आफ इंडिया के माध्यम से कराया जाने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने बताया कि श्रीहरि मंदिर साबला व शेषपुर के वस्त्र पट चित्रों का भी केमिकल ट्रीटमेंट, प्रेमिंग आदि कार्य कराया जाएगा। इसके तहत श्रीमावजी महाराज के जीवन चरित्र व रास लीलाओं पर आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्म के निर्माण कराए जाने का भी निर्णय लिया गया। इसके लिए फिल्म व टीवी इन्स्टीट्युट पूना से भी संपर्क किया जा रहा है। गौरतलब है कि मावजी महाराज आदिवासी बहुल उदयपुर संभाग के वागड अंचल के महान संत थे। उनका जन्म विक्रम सम्वत 1771 को माघ शुक्ल बसंत पंचमी को साबला में दालम रिषि के घर हुआ था। उनकी मां का नाम केसर बाई था।  मावजी महाराज ने साम्राज्यवाद के अंत प्रजातंत्र की स्थापना, अछूतोद्धार, पाखंड व कलियुग के प्रभावों में वृद्धि, सामाजिक व सांसारिक परिवर्तनों पर स्पष्ट भविष्यवाणियां की थी। जनश्रुति के मुताबिक द्वापर युग की अधूरी रासलीला को पूर्ण करनें के लिए श्रीकृष्ण ने ही श्रीमावजी महाराज का रूप लिया। इस कारण इन्हें इस क्षेत्र में कृष्ण का अवतार माना जाता है। श्रीमावजी महाराज ने करीब तीन सौ वर्ष पहले माही, सोम व जाखम नदी के संगम पर बाणेश्वर में तपस्या की थी व  जनजाति समाज में सामाजिक चेतना जागृत करने के भी प्रयास किए थे। मावजी महाराज द्वारा चार वृहद ग्रंथ, चौपडें, कई लघु ग्रंथ व गुटके लिखे गए। इसमें वागड की गौरव गाथा के साथ ही आधुनिक जीवनकी नवीन तकनीक व सामाजिक व्यवस्था पर कई भविष्यवाणियां भी की गई। मावजी महाराज के पांच चौपडों में से चार इस समय सुरक्षित हैं। इनमें मेघसागर डूंगरपुर जिलें में साबला के हरि मंदिर में है, जिसमें गीता ज्ञान उपदेश, भागोलिक परिवर्तनों की भविष्यवाणियां है। दूसरा साम सागर शेषपुर में है, जिसमें शेषपुर व धोलागढ़ का वर्णन व दिव्य वाणियां है। तीसरा प्रेमसागर डूंगरपुर जिलें के ही पुंजपुर में है, जिसमें धर्मोपदेश, भूगोल, इतिहास व भावी घटनाओं की प्रतीकात्मक जानकारी है।
चौथा चौपडा, रतनसागर, बांसवाडा शहर के त्निपोलिया रोड स्थित विश्वकर्मा मंदिर में सुरक्षित है। इनमें रंगीन चित्र रामलीला, कृष्णलीलाओं आदि की मनोहारी वर्णन सजीव उठा है। मावजी महाराज का पांचवां चौपडा अनन्त सागर मराठा के आक्रमण के समय बाजीराव पेशवा द्वारा ले जाया गया, जिसें बाद में अंग्रेज ले गए। बताया जाता है कि इस समय यह लंदन के किसी संग्रहालय में सुरक्षित है। इसमें ज्ञान-विज्ञान की जानकारियां समाहित हैं।
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त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज 

- डॉ. दीपक आचार्य

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याद में लहराता है अगाध आस्थाओं का महासागर
त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज भविष्य के संकेतों को जानने-समझने की ललक मनुष्य में पौराणिक काल से रही है। प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं तपस्वियों ने ध्यान और समाधिगम्य दृश्य के माध्यम से भविष्य दर्शन कर इनके संकेत प्राप्त कर जग में प्रचारित किया। बेणेश्वर धाम के आद्य पीठाधीश्वर एवं जन-जन की अगाध आस्था के प्रतीक संत मावजी महाराज की भविष्यवाणियां इसी परंपरा का अंग रही हैं, जो जाने कितने युगों से लोगों को आगत की झलक दिखाती रही हैं। समय-समय पर ये भविष्यवाणियां अक्षरशः सही साबित हुई हैं। डूंगरपुर जिले के साबला गांव में संवत् 1771 में वसन्त पंचमी के दिन अवतरित तथा घोर तपस्या के उपरान्त त्रिकालज्ञ संत के रूप में जन-जन के समक्ष संवत् 1784 में प्रकट हुए मावजी महाराज को भक्तगण भगवान श्रीकृष्ण के लीलावतार के रूप में पूजते हैं। संत मावजी की स्मृति में आज भी हर वर्ष उनके प्राकट्य दिवस माघ पूर्णिमा को बेणेश्वर महाधाम पर विराट मेला भरता है, जिसमें देश-विदेश के सैलानियों के अलावा राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के समीपवर्ती अंचल के कई लाख लोग हिस्सा लेते हैं। दस दिन चलने वाला यह मेला देश के आदिवासी अंचलों का सबसे बडा मेला है। इस बार मुख्य मेला माघ पूर्णिमा के दिन 30 जनवरी को भरेगा। यह दस दिवसीय मेला 3 फरवरी को सम्पन्न होगा। अलौकिक संत मावजी महाराज ने अपनी रचनाओं में आने वाले युगों को लेकर ढेरों भविष्यवाणियां की है, जो लोक मन को आरंभ से ही प्रभावित एवं विस्मित करती रही हैं। मावजी की भविष्यवाणियां प्रतीकात्मक हैं। आज से लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व ही मावजी महाराज को इक्कीसवीं सदी की घटनाओं के संकेतों का पता चला और उन्होंने जो-जो भविष्यवाणियां की है वे तमाम अक्षरशः खरी उतरी हैं। वर्ष में अनेक अवसरों पर इन भविष्यवाणियों, जिन्हें ‘आगलवाणी’ कहा जाता है, का वाचन होता है, जिसमें बडी संख्या में श्रद्धालु जमा होते हैं। आज की बढती जनसंख्या और नियंत्रित मूल्य पर राशन वितरण के दृश्य उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखकर ही कहा था- ‘गऊं चोखा गणमा मले महाराज’ अर्थात गेहूं-चावल राशन से मिलेंगे। लगभग पौने तीन सौ वर्ष पूर्व जब पानी की कोई कमी नहीं थी तब उन्होंने आज के हालातों को जानकर कहा था ‘परिये पाणी वेसाये महाराज’ अर्थात तोल (लीटर) के अनुसार पानी बिकेगा। ‘डोरिया दीवा बरे महाराज’ अर्थात वायर-वायर बिजली लगेगी। सामन्ती सत्ता के पराभव को उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखकर ही कहा था- ‘पर्वत गरी ने पाणी थासे।’
खारे समुद्र के पानी से पेयजल, सामाजिक कुरीतियों, घर-परिवार के झगडों, जातिगत समानताओं आदि पर उनकी ये वाणियां अक्षरशः सिद्ध हो रही हैं-खारा समुद्र मीठडा होसे,
बेटी ने तो बाप परणसे,
सारी न्यात जीमावेगा,
वऊ-बेटी काम भारे,
ने सासु पिसणा पीसेगा,
ऊंच नू नीच थासेनीच नूं ऊंच थासे,
हिन्दु-मुसलमान एक होसे,
एक थाली में जमण जीमासे,
न रहे जाति नो भेद,...’
खेती-बाडी में बैलों की बजाय ट्रैक्टरों एवं यंत्रों के इस्तेमाल को उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखकर ही कहा था- ‘बडद ने सर से भार उतरसे’। अर्थात् बैल के सर से भार उतर जाएगा। कलियुग के प्रभाव से पृथ्वी पर पाप बढ जाने पर निष्कलंक अवतार (पुराणों के अनुसार कल्कि अवतार) के आविर्भाव के बारे में उनकी आगमवाणी में कहा गया है कि जब पाप एवं अत्याचारों स जमीन का भार बढ जाएगा तब निष्कलंक अवतार होगा, जो लोगों को सारी पीडाओं से मुक्ति दिलाएगा। उन्हीं के शब्दों में आगामी भविष्य को संकेत करती यह आगमवाणी आज भी भक्तों द्वारा गायी जाती है-सब देवन का डेरा उठसेनिकलंक का डेरा रेसे,
धोलागढ ढोलकी वागे महाराज,
बेणेश्वर बेगको रसासे महाराज,
दिल्ली तम्बू तणाए महाराज,
चित्तौड ऊपर सोरी सितराए महाराज,
माण्डवगढ माण्डवो रोपाए महाराज,
तलवाडे तोरण बंदाए महाराज,
जती ने सती ने साबरमतीत्यां होते सूरा नो संग्रामकांकरिया तरावे तम्बु तणासे महाराजबतरी हाथ नो पुरुष प्रमाणपेला-पेला पवन फरूकसे, नदिए नहीं होवे नीरउत्तर दिशा थी साहेबो आवसे,
धरती माथे रे हेमर हालसे, सूना नगरे बाजारलक्ष्मी लुटसे लुकतणी, तेनी बारे ने बोमे देव रेकेटलाक खडक से हरसे, केटलाक मरसे रोगे रेहरे भाई स्त्री सणगार संजसी ने मंगल गावे मेग रेपर्णा नर सू प्रीत तोडे और करे नर आदिन रे...’
हस्ती ना दूधे माट भरासीधोबी ने घेरे गाय सरेगा, बामण बकरी राखेगा। इन आगमवाणियों में मावजी महाराज ने मानव धर्म की स्थापना, साबरमती में संग्राम होने, बत्तीस हाथ का पुरुष, उत्तर दिशा से अवतार के आने, धरती पर अत्याचार बढने, व्यभिचारों में अभिवृद्धि, अकाल, भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचारिता आदि का संकेत दिया है। अश्लीलता बढने, अत्याचारों में बढोतरी, पाखण्ड फैलने आदि का जिक्र किया गया है-‘अनन्त कुंवारियां नू दल जुनि मेलाण ऐसी लाख मयें हेमण हणसी,
चौदह लोक मए पाखण्डी पडसी,
असुरी आवी सामा-सामी मणसी....’
दानवों के अंततोगत्वा संहार के आशावादी भविष्य को अभिव्यक्त करते हुए मावजी की भविष्यवाणी है-‘दृष्टि दानव न तो संगल कटासीदाहित दानव न संगल कटासीसमुद्री पानी के मीठे होने तथा सागर किनारे खेती होने की संभावनाओं को इन पंक्तियों में जाहिर किया गया है-‘खारं समुद्र मीठडं होसेसमुद्र ने तीरे करसण ववासेकलमी कोदरो करणी कमासी,...’
इसके बाद जब निकलंक भगवान अवतार लेकर पृथ्वी से अधर्म का नाश करेंगे तब सतयुग जैसा माहौल कर फिर स्थापित होगा। इस बारे में ढेरों भविष्यवाणियां आज भी आशावाद का संचार करती हैं। विभिन्न अवसरों पर इन वाणियों का गान होता है, जिसे सुनकर लोग भविष्य के अनुमान लगाते हैं और संत मावजी के प्रति अनन्य श्रद्धा भाव व्यक्त करते हैं।
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