कविता - जन-जन की पहरेदारी
मुखड़ा — जन-जन की पहरेदारी। - अरविन्द सिसोदिया लूटतंत्र से बचना और बचाना, लोकतंत्र की जिम्मेदारी। कर्तव्यपरायण देश बनें, यही जन-जन की पहरेदारी। अंतरा 1 जब सत्ता सेवा से भटके, और लोभ बने हथियार। तब जागे जन-जन प्रहरी, ले सत्य को ढाल-संभार। न बिके मत, न झुके विचार, न हो मौन की लाचारी। लूटतंत्र से बचना और बचाना, लोकतंत्र की जिम्मेदारी। अंतरा 2 झूठ, भय और धन-बल से, मत का अपमान न हो। जनादेश की पवित्रता, किसी सौदे में न खो। प्रश्न पूछना पाप नहीं, यह नागरिक हक़दारी। लूटतंत्र से बचना और बचाना, लोकतंत्र की जिम्मेदारी। अंतरा 3 जाति, धर्म के नाम पे जब, बाँटी जाए पहचान। तब विवेक उठे, विवेचना करे, बचे राष्ट्र, बचे संविधान। समता, न्याय, स्वतंत्रता, ये मूल्य हमारी धरोहरी। कर्तव्यपरायण देश बनें, यही जन-जन की पहरेदारी। अंतरा 4 चुप्पी भी अपराध बने जब, अन्याय खुलेआम चले। तब लेखनी, वाणी, मतदान, तीनों शस्त्र बनकर जले। न्यायपालिका, जन और मीडिया, सबकी हो जवाबदेही भारी। लूटतंत्र से बचना और बचाना, लोकतंत्र की जिम्मेदारी। अंतरा 5 (आह्वान) आओ शपथ लें आज सभी, न बिकेंगे, न बिकवाएँगे। लोकतंत्र के दुर्गुणों से, ...