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किसानों की भूमि अधिग्रहण

कानून में व्यवहारीक बदलाव की जरूरत है - अरविन्द सीसोदिया   जो करोड़पति और खरबपति  घराने वोट भी नही डालते  वे देश की संसद और सरकारों को अपनी जेब में रखने की ताकत रखते हैं , बहुराष्ट्रीय संस्थान   तो देश के बजट से कई गुणा अपना बजट रखते हैं , वे राजनीती में चल रही धन बनाओ मैराथन का फायदा उठा रहे हैं | राजनेता जो पहलीवार  भी जीता है वह अपनी सातसो (७००)   पीढ़ियों का इंतजाम कर जाना चाहता  हैं . इसी कमजोरी के कारण पूरी दुनिया  की कंपनियां भारत पर हावी हैं | हर बड़े प्रोजेक्ट के पीछे कोई ना कोई पार्टी , नेता होता है , वह नीति और कानून  भी बदल वाने में तक अपनी ताकत छोंक  देता है |  जब हमारा राजतन्त्र जो समस्त अन्य तंत्रों का  नियंत्रक है , वही भ्रष्ट है तो ईमानदारी कहाँ तलाशेंगे| जब ईमानदार राजनीती नही होगी तो आम और गरीव , जिस पर देनें कुछ भी नही है , उसके पक्ष में नीतियाँ कैसे बनेंगी ? मुछे नहीं लगता की किसानों के हित में वास्तविक लाभकारी कोई कानून बन पायेगा !!    किसानों की भूमि अधिग्रहण को लेकर होने वाले विवादों की असली वजह, राजनैतिक दलों का  पूंजीवाद के प्रती अनन्य भक्तीभाव  है इसमें क