बुरी ताकतों के विरूद्ध अच्छी ताकतें एक जुट हों - सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी






धर्म के सुसंस्कार ही समाज को विकृतियों से बचाते हैं -सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी
स्वामी विवेकानन्दजी के विचारों की प्रासंगिता आज की परिस्थितियों में अधिक -सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी
धर्म निरपेक्षता ही विकृतियों की जड है - सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी
बुरी ताकतों के विरूद्ध अच्छी ताकतें एक जुट हों - सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी

अरविन्द सीसोदिया
09509559131/09414180151

कोटा  31 दिसम्बर। धर्म के सुसंस्कार ही समाज को विकृतियों से बचाते हैं और विकृतियों पर अंकुश रखकर समाज में पवित्रता स्थापित करते है। वर्तमान भारत को विकृतियों से मुक्ति के लिये आध्यात्मिक मूल्यों की रचनात्मक शक्ति से परिपूर्ण संस्कारों से सुसंस्कारित करने की आवश्यक है। उक्त विचार राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के अखिल भारतीय पदाधिकारी सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी ने सोमवार 31 दिस्मबर को स्वामी विवेकानन्द सार्धशति समारोह समिति, कोटा महानगर की ओर से आयोजित ‘‘प्रबुद्धजन समागम’’ कार्यक्रम में कहे। 
उन्होने स्वामी विवेकानन्द जी के 150 वीं जंयति की प्रांसगिकता के महत्व को दर्ज करते हुये उन्होने बताया कि स्वामी विवेकानन्द के विचार भारतमाता की गौरव गाथा की ऊर्जा से परिपूर्ण थे,जिनकी प्रेरणा की जरूरत आज की परिस्थतियों में अधिक प्रासंगिक है।
सह सरकार्यवाह सोनी ने कहा स्वामी विवेकानन्द के विचार विश्वव्यापी स्पन्दन युक्त थे तथा उनके बाद के सभी क्षेत्रों के अग्रजों ने उनके विचारों से प्रेरणा ग्रहण की है। वे राष्ट्रीय आन्दोलन तथा स्वंतत्रता संग्राम के आध्यात्मिक पितामह थे। उनकी प्रेरणायें राष्ट्रगौरव से भरी हुई हैं और उनके विचार टोनिक की तरह प्रभाव युक्त है, जो कि विद्युत उर्जा जैसे प्रभाव से प्रेरित करते हैं। समय -समय पर उनके विचारों से भारत और भारत के बाहर के महापुरूषों ने प्रेरणायें ग्रहण की हैं।
उन्होने कहा समाज धर्म से आत्म अनुशासित होता है, उसेे हमेशा सदाचरण के लिये शिक्षित किया जाना चाहिये, बहुत पुरानी बात नहीं जब देश में पाप का पैसा घर में नहीं लाया जाता था, गलत पैसा नहीं आना चाहिये यह भावना नागरिकों में थी। मगर अब संस्कारों के अभावों में, अनाचरण के कारण “मेरा पैसा तो मेरा है ही, तेरा पैसा भी मेरा है, मुझे दे जा “ की भावना आ गई। पहले खराब पैसे को इसलिये घर नहीं लाते थे कि यह बुरा है। मगर अब गलत पैसा यह कह कर ले लिया जाता है कि “पापी पेट का सवाल है।” सोच का बदलाव ही भ्रष्टता का कारण है। यह सरकारें बदलने और अल्पकालिक आंदोलनों से नहीं जायेगा बल्कि समाज की सोच में सकारात्म बदलाव करने होंगें।
सोनी ने कहा गलत चीजों से चिड़ होनी ही चाहिये,यही जीवित समाज की पहचान है। दण्ड का भय थोडा बहुत रोक सकता है, मानव मन में विकृतियां बडती गईं तो कानून, व्यवस्था नहीं दे पायेगा। धर्म के रास्ते ही संयम आता है जो विकृतियों पर नियंत्रण करता है। धर्म के सुसंस्कार ही समाज को सुसंस्कृत करते हैं। धर्म का महत्व सर्वोपरी है।
उन्होने कहा भारतीय संस्कृति केे जीवित रहने से ही विश्व जीवित रहेगा ओर उसी से विश्व में धर्म, मानवता, सद्गुण, संस्कार, प्रेम, अपनत्व जैसी आपसी भाई चारे की मानवीय संस्कृति बची रह सकेगी। उन्होने कहा कि भारतीय संस्कृति में ही विश्वबंधुत्व का भाव है, यदि यह नहीं रहेगी तो मानवता और भाईचारा भी नहंी रहेगा और सम्पूर्ण समाज पाश्चात्य प्रभाव में पशुवत दानवी व्यवहारों से विकृत हो जायेगा।
उन्होने कहा मगर समस्या यह है कि राजनेता और सरकारें कहती है धर्मनिरपेक्ष बनों, धर्म से दूर रहो, तो संस्कार हीनता तो आनी ही है। समाज में मौजूदा जो विकृतियां और वैमनष्यतायें है उसका जनक तो ये धर्मनिरपेक्षता ही है। इसके ये ही परिणाम आने थे। इस स्थिती को बदलने के लिये बडी आध्यात्मिक क्रांती की जरूरत है। समस्त बुरी ताकतों के खिलाफ, समस्त अच्छी ताकतों को एक जुट हो कर पूरी ताकत से काम करना होगा।
सोनी ने शिक्षा प्रणाली पर प्रहार करते हुये कहा अंग्रेज लार्ड मैकाले ने जिस शिक्षा प्रणाली को भारत को धर्मविहीन कर देने के लिये चलाई थी। वह आज तक बनी हुई हे। शिक्षा तब ही पूर्ण है जब उसमें राष्ट्र गौरव और मानवता की पूरी पूरी संवेदनायें हों।
उन्होने कहा कि स्वामीजी का जन्म और उनके विचार युगान्तकारी है। जो कि आध्यात्म सहित सम्पूर्ण मानवता को आधुनिक रूप में प्रस्तुत करते हुये समाज को सम्पूर्ण मानवता और अपनत्व का चिन्तन देते है। सोनीजी ने कहा स्वामी विवेकानंदजी के बताये मार्ग की प्रसंगिकता आज और अधिक है। उनके विचार आज कहीं अधिक कल्याणकारी और समाज को दिशा देने वाले हैं। उनके विचारों की विद्युतीय तेजश्विता और टोनिक जैसी शक्ति से पुनः भारत के आत्म गौरव का जागरण करने की जरूरत है। सार्द्धशति समारोह के द्वारा स्वामीजी के विचारों की प्रेरणा के साथ राष्ट्र के आत्म गौरव के पुर्न जागरण की चेतना जाग्रत करनें में हम सभी को जुटना होगा।
स्वामीजी ने राष्ट्र जीवन के पुनः निर्माण के क्षेत्र में अद्वितीय कार्य किया जिसके कारण ही भारत भूमि पुनः विश्व गुरू के रूप में प्रतिष्ठित हुई। उसी कार्य को आज सम्पूर्ण समर्पण के साथ, सम्पूर्ण तेजस्विता से बढानेे की जरूरत है। सोनी ने कहा कि स्वामी विवेकानन्द की 150 वीं जयंति के अवसर को राष्ट्रीय गौरव के पुनः उत्थान की प्रेरणा के रूप में अधिक से अधिक समाज तक पहुॅचाना ही सार्ध शति समारोह के कार्यक्रमों का ध्येय है।  

    कार्यक्रम के प्रारम्भ में समिति के चित्तौड प्रान्त सहसंयोजक जटाशंकर शर्मा द्वारा प्रस्ताव वाचन कर स्वामी विवेकानन्दजी के जीवन पर प्रकाश डालते हुये सार्धशति समारोह के द्वारा देश में स्वाभिमान की तेजस्विता का अलख जगाने का आव्हान किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध शिक्षाविद् आर के शर्मा ने की तथा अतिथियों का परिचय समिति के विभाग सहसंयोजक बाबूलाल रेनवाल ने की। धन्यवाद ज्ञापन एवं आभार समिति के महानगर संयोजक महेश शर्मा ने किया। अतिथियो का स्वागत समिति के विभाग संयोजक त्रिलोक चन्द्र डूंगरवाल एवं प्रबुद्ध भारत संयोजक डॉ गिरीश शर्मा ने किया।

अरविन्द सीसोदिया
09509559131
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