फेसबुक (अंग्रेज़ी:Facebook) इंटरनेट पर स्थित एक निःशुल्क सामाजिक नेटवर्किंग सेवा है, जिसके माध्यम से इसके सदस्य अपने मित्रों, परिवार और परिचितों के साथ संपर्क रख सकते हैं। यह फेसबुक इंकॉ. नामक निजी कंपनी द्वारा संचालित है। इसके प्रयोक्ता नगर, विद्यालय, कार्यस्थल या क्षेत्र के अनुसार गठित किये हुए नेटवर्कों में शामिल हो सकते हैं और आपस में विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।[5] इसका आरंभ 2004 में हार्वर्ड के एक छात्र मार्क ज़ुकेरबर्ग ने की थी। तब इसका नाम द फेसबुक था। कॉलेज नेटवर्किग जालस्थल के रूप में आरंभ के बाद शीघ्र ही यह कॉलेज परिसर में लोकप्रिय होती चली गई। कुछ ही महीनों में यह नेटवर्क पूरे यूरोप में पहचाना जाने लगा। अगस्त 2005 में इसका नाम फेसबुक कर दिया गया। फेसबुक में अन्य भाषाओं के साथ हिन्दी में भी काम करने की सुविधा है।
फेसबुक ने भारत सहित 40 देशों के मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों से समझौता किया है। इस करार के तहत फेसबुक की एक नई साइट का उपयोग मोबाइल पर निःशुल्क किया जा सकेगा। यह जालस्थल फेसबुक का पाठ्य संस्करण है। भारत में रिलायंस कम्युनिकेशंस और वीडियोकॉन मोबाइल पर यह सेवा प्रदान करेंगे। इसके बाद शीघ्र ही टाटा डोकोमो पर भी यह सेवा शुरू हो जाएगी। इसमें फोटो व वीडियो के अलावा फेसबुक की अन्य सभी संदेश सेवाएं मिलेंगी।[6]
फेसबुक का उपयोग करने वाले अपना एक प्रोफाइल पृष्ठ तैयार कर उस पर अपने बारे में जानकारी देते हैं। इसमें उनका नाम, छायाचित्र, जन्मतिथि और कार्यस्थल, विद्यालय और कॉलेज आदि का ब्यौरा दिया होता है। इस पृष्ठ के माध्यम से लोग अपने मित्रों और परिचितों का नाम, ईमेल आदि डालकर उन्हें ढूंढ़ सकते हैं। इसके साथ ही वे अपने मित्रों और परिचितों की एक अंतहीन श्रृंखला से भी जुड़ सकते हैं। फेसबुक के उपयोक्ता सदस्य यहां पर अपना समूह भी बना सकते हैं।[5] यह समूह उनके विद्यालय, कॉलेज या उनकी रुचि, शहर, किसी आदत और जाति का भी हो सकता है। समूह कुछ लोगों का भी हो सकता है और इसमें और लोगों को शामिल होने के लिए भी आमंत्रित किया जा सकता है। इसके माध्यम से किसी कार्यक्रम, संगोष्ठी या अन्य किसी अवसर के लिए सभी जानने वालों को एक साथ आमंत्रित भी किया जा सकता है।
लोग इस जालस्थल पर अपनी रुचि, राजनीतिक और धार्मिक अभिरुचि व्यक्त कर समान विचारों वाले सदस्यों को मित्र भी बना सकते हैं। इसके अलावा भी कई तरह के संपर्क आदि जोड़ सकते हैं। साइट के विकासकर्त्ता भी ऐसे कई कार्यक्रम तैयार करते रहते हैं, जिनके माध्यम से उपयोक्ता अपनी रुचियों को परिष्कृत कर सकें। फेसबुक में अपने या अपनी रुचि के चित्र फोटो लोड कर उन्हें एक दूसरे के साथ बांट भी कर सकते हैं। ये चित्र मात्र उन्हीं लोगों को दिखेंगे, जिन्हें उपयोक्ता दिखाना चाहते हैं। इसके लिये चित्रों को देखनेका अनुमति स्तर निश्चित करना होता है। चित्रों का संग्रह सुरक्षित रखने के लिए इसमें पर्याप्त जगह होती है। फेसबुक के माध्यम से समाचार, वीडियो और दूसरी संचिकाएं भी बांट सकते हैं। फेसबुक ने 2008 में अपना आवरण रूप बदला था।[5]
स्टेटस अद्यतन
फेसबुक पर उपयोक्ताओं को अपने मित्रों को यह बताने की सुविधा है कि किसी विशेष समय वे क्या कर रहे हैं या क्या सोच रहे हैं और इसे 'स्टेट्स अपडेट' करना कहा जाता है। फेसबुक और ट्विटर के आपसी सहयोग के द्वारा निकट भविष्य में फेसबुक एक ऐसा सॉफ्टवेयर जारी करेगा, जिसके माध्यम से फेसबुक पर होने वाले 'स्टेट्स अपडेट' सीधे ट्विटर पर अद्यतित हो सकेंगे। अब लोग अपने मित्रों को बहुत लघु संदेशों द्वारा यह बता सकेंगे कि वे कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं या क्या सोच रहे हैं।[7]
ट्विटर पर १४० कैरेक्टर के 'स्टेट्स मैसेज अपडेट' को अनगिनत सदस्यों के मोबाइल और कंप्यूटरों तक भेजने की सुविधा थी, जबकि फेसबुक पर उपयोक्ताओं के लिये ये सीमा मात्र ५००० लोगों तक ही सीमित है। सदस्य ५००० लोगो तक ही अपने प्रोफाइल के साथ जोड़ सकते हैं या मित्र बना सकते हैं। फेसबुक पर किसी विशेष प्रोफाइल से लोगों के जुड़ने की संख्या सीमित होने के कारण 'स्टेट्स अपडेट' भी सीमित लोगों को ही पहुँच सकता है।
सार्वजनिक खाते
सार्वजनिक खाते (पब्लिक पेज) यानी ऐसे पेज जिन्हें हर कोई देख सकता है और लोग जान सकते हैं कि उनके आदर्श नेता, प्यारे पॉप स्टार या सामाजिक संगठन की क्या गतिविधियाँ हैं। फेसबुक के ट्विटर से जुड़ जाने के बाद अब कंपनियाँ, संगठन, सेलिब्रिटी अपने प्रशंसकों और समर्थकों से सीधे संवाद कर पाएँगे, उन्हें बता पाएँगे कि वे क्या कर रहे हैं, उनके साथ फोटो शेयर कर पाएँगे। फिलहाल यह सुविधा पब्लिक पेज प्रोफाइल वालों को ही उपलब्ध है। फेसबुक के सार्वजनिक पृष्ठ (पब्लिक पेज) बनाना हाल के दिनों में काफी लोकप्रिय होता जा रहा है। पब्लिक पेज बनाने वालों में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोजी और रॉक बैंड यू-२ शामिल हैं। इनके अलावा भी कई बड़ी हस्तियों, संगीतकारों, सामाजिक संगठनों, कंपनियों ने अपने खाते फेसबुक पर खोले हैं।[7] ये हस्तियां या संगठन अपने से जुड़ी बातों को अपने प्रशंसकों या समर्थकों के साथ बाँटना चाहते हैं तो आपसी संवाद के लिए फेसबुक का प्रयोग करते हैं।
प्रतिबंध
फेसबुक पर आयोजित पैगंबर मोहम्मद के आपत्तिजनक कार्टून बनाने की प्रतियोगितामें मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप के कारण पाकिस्तान के एक न्यायालय ने फेसबुक पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। फेसबुक पर चल रही इस कार्टून प्रतियोगिता को ईशनिंदा के कारण पाक में ३१ मई, २०१० तक प्रतिबंधित किया गया है। इसके साथ ही न्यायालय ने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को निर्देश जारी किया कि वह ईशनिंदा में बनाए गए कार्टून के मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाए।[8][9]
बाद में जिस फेसबुक उपयोक्ता ने 'एवरीवन ड्रॉ मोहम्मद डे' प्रतियोगिता आयोजित की थी, उसने यह पृष्ठ हटा लिया है। इसके साथ ही उसने इस अभियान से जुड़ा ब्लॉग भी हटा लिया था।[10]
खतरा
सोश्यल नेटवर्किंग साइट फेसबुक इंटरनेट के माध्यम से जुड़े लोगों के जीवन का अभिन्न अंग बनती जा रही है। परंतु कुछ साइबर विशेषज्ञ फेसबुक से उत्पन्न खतरों के बारे में समय समय पर आगाह करते रहते हैं। चीफ सैक्यूरिटी ऑफिसर ऑनलाइन नामक सामयिक के वरिष्ठ सम्पादक जॉन गूडचाइल्ड के अनुसार कई कम्पनियाँ अपने प्रचार के लिए फेसबुक जैसे नेटवर्किंग माध्यम का उपयोग करना चाहती है परंतु ये कम्पनियाँ ध्यान नहीं देती कि उनकी गोपनियता अभि भि अनिश्चित है। सीबीसी न्यूज़ के 'द अर्ली शॉ ऑन सैटर्डे मॉर्निंग' कार्यक्रम में गूडचाइल्ड ने फेसबुक से उत्पन्न पाँच ऐसे खतरों के बारे में बताया जिससे निजी और गोपनीय जानकारियों की गोपनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।[11] ये इस प्रकार से हैं:
डाटा बांटना: यहां दी गई जानकारी केवल घोषित मित्रों तक ही सीमित नहीं रहती है, बल्कि वह तृतीय पार्टी अनुप्रयोग विकासकर्त्ताओं (थर्ड पार्टी अप्लिकेशन डेवलपर) तक भी पहुँच रही हैं।
बदलती नीतियां: फेसबुक के हर नये संस्करण रिलीज़ होने के बाद उसकी प्राइवेसी सेटिंग बदल जाती है और वह स्वत: डिफाल्ट पर आ जाती है। प्रयोक्ता उसमें बदलाव कर सकते हैं परंतु काफी कम प्रयोक्ता इस ओर ध्यान दे पाते हैं।
मैलावेयर: फेसबुक पर प्रदर्शित विज्ञापनों की प्रामाणिकता का कोई वादा नहीं है। ये मैलावेयर हो सकते हैं और उनपर क्लिक करने से पहले उपयोक्ताओं को विवेक से काम लेना चाहिये।
पहचान उजागर: उपयोक्ताओं के मित्र जाने अनजाने उनकी पहचान और उनकी कोई गोपनीय जानकारी दूसरों से साझा कर सकते हैं।
जाली प्रोफाइल: फेसबुक पर सेलिब्रिटियों को मित्र बनाने से पूर्व उपयोक्ताओं को ये चाहिये कि पहले उनकी प्रोफाइल की अच्छी तरह से जाँच अवश्य कर लें। स्कैमरों के द्वारा जाली प्रोफाइल बनाकर लोगों तक पहुँच बनाना काफी सरल है।
फेसबुक छोड़ो अभियान
हाल ही में फेसबुक ने अपने सुरक्षा नियमों को पहले से कुछ कड़ा कर दिया है जिसके कारण इसके उपयोक्ताओं में काफी रोष दिखा है। इसके कड़े सुरक्षा नियमों से नाराज उपयोक्ताओं ने एक समूह बनाकर फेसबुक पर फेसबुक के विरुद्ध ही अभियान चला दिया है।[12] उन्होंने ने एक साइट बनाई है क्विटफेसबुकडे डॉट काम जिसपर फेसबुक उपयोक्ताओं से ३१ मई को फेसबुक छोड़ो दिवस के रूप में मनाने का आहवान किया है। इस वेबसाइट पर संदेश है कि यदि आप को लगता है कि फेसबुक आपकी स्वतंत्रता, आपके निजी डाटा और वेब के भविष्य का सम्मान नहीं करता तो आप फेसबुक छो़ड़ो अभियान में हमारा साथ दे सकते हैं। फेसबुक छोड़ना आसान नहीं है, यह इतना ही मुश्किल है जितना की धूम्रपान छोड़ना लेकिन फिर भी उपयोक्ताओं को अपने अधिकारों के लिए यह करना ही पड़ेगा।[13] क्विटफेसबुकडे डॉट काम पर अब तक एक हजार से अधिक लोग ३१ मई को अपना फेसबुक खाता समाप्त करने की शपथ ले चुके हैं।
फेसबुक पर बुक
उत्तर प्रदेश के एक आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने फेसबुक पर अपने अनुभवों तथा अपने कार्यों को पृष्ठभूमि बनाते हुए हिंदी तथा अंग्रेजी भाषा में एक-एक पुस्तक लिखने का कार्य प्रारम्भ किया है जो बहुत शीघ्र ही प्रकाशित हो जायेंगे. अमिताभ ठाकुर द्वारा ये पुस्तकें फेसबुक संस्थापक मार्क झुकरबर्ग तथा अपने फेसबुक के साथियों को समर्पित किया गया है।
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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही ब्रिटेन में डिजिटल इंडिया को बढ़ावा दे रहे हों लेकिन फ़ेसबुक द्वारा जारी एक सेंसरशिप रिपोर्ट कई सवालिया निशान खड़े करती है.
फ़ेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्रियों में से 15,155 सामग्रियों पर भारत ने फ़ेसबुक से कहकर प्रतिबंध लगवाया.
वहीं दूसरे स्थान पर तुर्की रहा जिसने केवल 4,496 सामग्रियों के ख़िलाफ ऐसा किया.
फ़ेसबुक पर मौजूद लोगों के अकाउंट के बारे में जानकारी हासिल करने में अमरीका सबसे आगे रहा तो भारत दूसरे स्थान पर.
अमरीका ने फ़ेसबुक से 26,579 लोगों की जानकारी मांगी वहीं भारत ने 6,268 लोगों की जानकारी हासिल की.
ब्रिटेन तीसरे स्थान पर रहा, उसने 4,489 लोगों की जानकारी फ़ेसबुक से ली.
फ़ेसबुक की इस रिपोर्ट से तीन बड़े सवाल खड़े होते हैं.
जिस तरह से फ़ेसबुक पर मौजूद सामग्रियों पर प्रतिबंध लगवाया जा रहा है वो कहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम कसना तो नहीं है?
कहीं सरकार इसका प्रयोग अपने राजनीतिक विरोधियों को रोकने के लिए तो नहीं कर रही?
क्या फ़ेसबुक अपनी इंटरनेट सेवा को भारत में लॉन्च करने के लिए यहां की सरकार की कुछ ज़्यादा ही मदद तो नहीं कर रहा?
Image copyrightAFP
फ़ेसबुक के अनुसार, उनकी वेबसाइट पर मौजूद सामग्रियों पर प्रतिबंध लगवाने के लिए भारत की कानून प्रवर्तन एजेंसियों और कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम की तरफ से आवेदन किए गए थे.
उनके अनुसार, ये सभी सामग्रियां धर्म विरोधी और भड़काऊ भाषण की श्रेणी में आती थीं.
मीडियानामा के संस्थापक निखिल पाहवा कहते हैं, "दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जिस तरह की सामग्रियों पर प्रतिबंध लगाया गया है उसका कोई डेटा मौजूद नहीं है."
निखिल के अनुसार, "ऐसे में हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि किस तरह की चीज़ों पर प्रतिबंध लगाया गया है."
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इनमें से कई सामग्रियां आपराधिक मामलों से भी जुड़ी थीं.
ऐसे में भारतीय एजेंसियों ने फ़ेसबुक से बहुत ही मूलभूत जानकारियां मांगी जैसे कि सब्सक्राइबर जानकारी, आईपी एड्रेस, अकाउंट कंटेंट या लोग क्या पोस्ट कर रहे हैं.
हालांकि यह भी कहा गया है कि फ़ेसबुक इस तरह का कोई भी फैसला लेने से पहले यह सुनिश्चित करता है कि क्या वह सामग्री स्थानीय कानून का उल्लंघन कर भी रही है या नहीं.
अगर ऐसा पाया जाता है तो उस पर उस देश में प्रतिबंध लगा दिया जाता है.
निखिल कहते हैं, "एक नागरिक के तौर पर हमें यह जानकारी होनी चाहिए कि किस हद तक सामग्रियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं. हम सभी को यह अधिकार है, केवल सरकार को नहीं."
वो कहते हैं, "यह फ़ेसबुक की भी ज़िम्मेदारी बनती है कि वो ऐसी सामग्रियों और आवेदन के बारे में जानकारी साझा करे."
Image copyrightGETTY
इतनी बड़ी संख्या में आवेदन करना सरकारी मशीनरी द्वारा लोगों की असहमति को दबाने का ज़रिया बन सकता है.
यह वैसा ही होगा जैसे धारा 66ए का बड़ी तादात में ग़लत इस्तेमाल कर राज़्य सरकारें किसी को भी गिरफ़्तार कर लेती थीं.
जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट को बीच में दखल देकर इस धारा को ख़त्म करना पड़ा.
सरकार भले ही दावे कर रही हो कि वो यह प्रतिबंध धर्म विरोधी और भड़काऊ भाषणों को रोकने के लिए लगवा रही है लेकिन दुर्भाग्यवश ज़मीनी तौर पर उसकी कथनी और करनी में बहुत ही फर्क नज़र आ रहा है.
जैसा कि हमें इस साल की शुरुआत में देखने को मिला, उत्तर प्रदेश में एक छात्र ने समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान के बारे में कुछ आपत्तिजनक पोस्ट किया.
जिसके बाद खान ने उसके ख़िलाफ एफआईआर दर्ज कराई और छात्र को 15 दिन के लिए जेल हो गई.
Image captionसंस्कृति मंत्री महेश शर्मा
हाल ही में संपन्न हुए बिहार चुनाव में भी हमने देखा कि भाजपा नेताओं की तरफ से कई आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं थीं.
दादरी मामले में भी संस्कृति मंत्री महेश शर्मा और भाजपा विधायक संगीत सोम की तरफ से कई मूर्खतापूर्ण टिप्पणियां की गईं जिसका चौतरफा विरोध हुआ लेकिन उनके ख़िलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई.
ऐसे में इस आशंका को नहीं नकारा जा सकता कि सरकार केवल उनके ख़िलाफ ही कार्रवाई करेगी जो उनकी समीक्षा करेगा.
इस पर पाहवा कहते हैं कि फ़ेसबुक पर जिन सामग्रियों पर भी प्रतिबंध लगाया जाता है उसके बारे में और अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए. इससे लोगों में उन्हें समझने में और अधिक आसानी होगी.
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एक ईसा, एक बाइबल, लेकिन ईसाइयों के कितने मजहब (संप्रदाय)❓ ईसाइयत दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक समुदायों में से एक माना जाता है। लेकिन सभी ईसाई एक ही चर्च या धार्मिक संगठन से जुड़े नहीं हैं। ईसाइयत के भीतर रोमन कैथोलिक, ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स, ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स और प्रोटेस्टेंट जैसे प्रमुख मजहब हैं। इनके अतिरिक्त अनेक स्वतंत्र चर्च और छोटे-बड़े संप्रदाय भी मौजूद हैं। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ग्लोबल क्रिश्चियनिटी और वर्ल्ड क्रिश्चियन डेटाबेस से जुड़े अनुमानों में दुनिया भर में ईसाई संप्रदायों की संख्या लगभग 47,000 से अधिक बताई गई है। कुछ अनुमानों में यह संख्या 2025 ईस्वी तक लगभग 49,000 तक पहुँचती है। हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि ईसाइयत के भीतर लगभग 49,000 ऐसे समूह हैं जिनकी धार्मिक मान्यताएँ एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं। इस संख्या की गणना में अलग-अलग देशों में मौजूद स्वतंत्र चर्चों और संस्थागत रूप से अलग इकाइयों को भी अलग संप्रदायों के रूप में गिना जा सकता है। इसलिए वास्तविक संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि मजहब (संप्रदाय) की परिभाषा क्या रखी गई है। ईसाइयत में इतने सारे संप्रदाय ...
जर्मनी की संघीय कैबिनेट द्वारा 16 सितंबर 2026 को मंजूर किए गए 10-सूत्रीय कार्यक्रम ("सुरुक्षा बढ़ाना, स्वतंत्रता बनाए रखना, कट्टरपंथ रोकना") पर विस्तृत रिपोर्ट इस प्रकार है: EU आतंकवाद के विरुद्ध उपाय ## 1. पृष्ठभूमि और तात्कालिक कारण (The Trigger) यह विस्तृत सुरक्षा पैकेज 25 जुलाई 2026 को बर्लिन में क्रिस्टोफर स्ट्रीट डे (CSD) परेड (प्राइड इवेंट) पर हुए एक भीषण आतंकवादी हमले की सीधी प्रतिक्रिया के रूप में लाया गया है। जर्मनी में आतंकियों के विरुद्ध नये उपाय * हमला: एक 21 वर्षीय इस्लामी चरमपंथी अब्दुल बी. (Abdul Ballout) ने प्राइड परेड की भीड़ में एक वैन घुसा दी थी, जिसमें एक महिला की मौत हो गई और 30 से अधिक लोग घायल हो गए थे। घुसपैठियों का तांडव * सुरक्षा चूक: बाद में पुलिस कार्रवाई में मारा गया यह हमलावर पहले से ही खुफिया एजेंसियों की रडार पर था और एक कट्टरपंथ-विरोधी (Deradicalization) कार्यक्रम का हिस्सा था। इस घटना ने जर्मन कानून और खुफिया तंत्र की कमियों को उजागर किया, जिसके बाद गृह मंत्री अलेक्जेंडर डोब्रिंड्ट (Alexander Dobrindt) और न्याय मंत्री स्टेफनी हुबिग (S...
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7 अक्टूबर: मोदीजी के शासन प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूर्ण नवाचार, निर्णायक नेतृत्व और परिणामदायी शासन का ढाई दशक का अभूतपूर्व कीर्तिमान — अरविन्द सिसोदिया भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में 7 अक्टूबर 2001 एक टर्निंग पॉइंट था। इसी दिन एक सामान्य परिवार से निकलकर नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी की ओर से तब पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में संवैधानिक पद की शपथ ली। वे उन विरले नेताओं में रहे, जिन्होंने लंबी चुनावी सत्ता-सीढ़ी चढ़े बिना अपनी संगठनात्मक क्षमता, प्रशासनिक दक्षता और नेतृत्व के बल पर सीधे मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। उनके नेतृत्व में भारत नें आतंकवाद और शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियों का मुंहतोड़ जबाब दिया है। 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री और 2014 से निरंतर देश के प्रधानमंत्री के रूप में 7 अक्टूबर 2026 को नरेंद्र मोदी के शासन-प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। यह केवल सत्ता में बने रहने की 25 वर्ष की यात्रा नहीं है। यह भारत की शासन-व्यवस्था को पुराने ढर्रे, लालफीताशाही और प्रतिक्रियात्मक प्रशासन से निकालकर नवाचार, तकनीक, लक्ष्य-आधारित का...
मेटा (Meta) के विशाल यूजर बेस और भारत में इसके आर्थिक योगदान के साथ-साथ, इसका एक दूसरा पहलू भी है जो बेहद संवेदनशील है। चूंकि मेटा के ऐप्स (फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप) की पहुंच भारत की 80 करोड़ से अधिक आबादी तक है, इसलिए यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) के लिए एक बड़ा खतरा और चुनौती भी बन चुका है। यहाँ इस संपूर्ण जानकारी और सुरक्षा पहलुओं के आधार पर एक व्यापक और प्रमाणित लेख दिया गया है: ## खोजी विश्लेषण: मेटा का साम्राज्य और भारत के लिए छिपे हुए बड़े खतरे आज भारत मेटा प्लेटफॉर्म्स (Meta Platforms, Inc.) के लिए दुनिया का सबसे बड़ा यूजर बेस (उपयोगकर्ता आधार) है। देश के 80 करोड़ से अधिक नागरिक रोज़ाना फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप पर अपना समय बिताते हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, मेटा भारत से ₹36,000 करोड़ से अधिक का कुल राजस्व कमा रही है, जिसमें व्हाट्सएप बिजनेस और छोटे व्यापारियों के डिजिटल विज्ञापन सबसे बड़े माध्यम हैं। लेकिन इस अपार लोकप्रियता और आर्थिक प्रभाव के पीछे एक डरावना सच भी छिपा है। इतनी विशाल आबादी प...
अतीत में कांग्रेस पार्टी और उसके वरिष्ठ नेताओं ने [एलन मस्क] की स्टारलिंक (Starlink) के भारत प्रवेश को लेकर तीखा विरोध जताया था और इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा व अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से जुड़े गंभीर आरोप लगाए थे। हाल ही में केंद्रीय दूरसंचार मंत्री [ज्योतिरादित्य सिंधिया] और भाजपा सांसद [तेजस्वी सूर्या] समेत कई आलोचकों ने कांग्रेस के पुराने बयानों को साझा करते हुए उनके "यू-टर्न" पर सवाल उठाए हैं। विस्तार से जानें कि किस नेता ने क्या कहा था: ## 1. [जयराम रमेश] (वरिष्ठ नेता और महासचिव, कांग्रेस) कांग्रेस के संचार प्रभारी और वरिष्ठ नेता [जयराम रमेश] ने आधिकारिक तौर पर मीडिया के सामने स्टारलिंक को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गंभीर आरोप लगाए थे। * क्या कहा था: उन्होंने स्टारलिंक की एंट्री को "फ्रेंडशिप-बाइंग मूव" (दोस्ती खरीदने की कोशिश) करार दिया था। * तर्क: उनका आरोप था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश रखने के लिए एलन मस्क को भारत में अनुचित फायदा पहुंचाना चाहते हैं। उन्होंने कहा था, "प्रधानमंत्री स्पष्ट रूप से यह उम्मीद ...
प्रेस कॉन्फ्रेंस के मुख्य बिंदु: माननीय केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता श्री शिवराज सिंह चौहान / 12-10-2026 केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की प्रेस कॉन्फ्रेंस के मुख्य बिंदु ****************** कांग्रेस अपनी चुनावी हार के लिए संवैधानिक संस्थाओं को दोषी ठहरा रही है, जबकि असली वजह उसका नेतृत्व है, जो विचारों से रहित है। **************************** हताश और हताश कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करके, सड़कों पर अराजकता फैलाकर और जनता को गुमराह करके सत्ता में वापसी करने की कोशिश कर रही है। ******************** कई राज्यों में लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने के कारण, कांग्रेस क्षेत्रीय दलों पर निर्भर एक कनिष्ठ सहयोगी और एक परजीवी दल बनकर रह गई है। **************************** कांग्रेस नेता इसे “शिव जी की बारात” बता रहे हैं, जबकि यह भगवान शिव की शोभायात्रा नहीं, बल्कि बदमाशों का एक समूह है जो सड़कों पर अव्यवस्था फैला रहा है। **************************** कांग्रेस और भारत-भारत गठबंधन अब विदेशी शक्तियों क...
मेरे टिवीटर एकाउन्ट को अधिक से अधिक फोलो करके विचार अभियान को विस्तार प्रदान करें - अरविन्द सिसौदिया इसे फोलो करें - Arvind S Sisodia @ArvindSSisodia https://x.com/ArvindSSisodia ध्येय साधना अमर रहे। ध्येय साधना अमर रहे। अखिल जगत को पावन करती त्रस्त उरों में आशा भरती भारतीय सभ्यता सिखाती गंगा की चिर धार बहे। इससे प्रेरित होकर जन-जन करे निछावर निज तन-मन-धन पाले देशभक्ति का प्रिय प्रण अडिग लाख आघात सहे। भीती न हमको छू पाये स्वार्थ लालसा नहीं सताये शुद्ध ह्नदय ले बढते जायें धन्य-धन्य जग आप कहे। जीवन पुष्प चढा चरणों पर माँगे मातृभूमि से यह वर तेरा वैभव अमर रहे माँ। हम दिन चार रहें न रहे। ------------- English :- dhyeya sādhanā amara rahe | dhyeya sādhanā amara rahe | akhila jagata ko pāvana karatī trasta uroṁ meṁ āśā bharatī bhāratīya sabhyatā sikhātī gaṁgā kī cira dhāra bahe | isase prerita hokara jana-jana kare nichāvara nija tana-mana-dhana pāle deśabhakti kā priya praṇa aḍiga lākha āghāta sahe | bhītī na hamako chū pāye svārtha lāla...
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा,संवैधानिक संस्थाओं की अनिवार्य जबाबदेही है — अरविन्द सिसोदिया वर्तमान कांग्रेस और उसके ही प्रतिस्पर्धी कुछ दलों में, इस समय असंवैधानिकता, झूठ और भ्रम पर आधारित नौटंकी खड़ी करने की प्रतिस्पर्धा चल रही है, इन दलों को जनता नें सिरे से नकार दिया है और ये बिना वोट से जीते ही, शासक बनना चाहते हैँ। इनकी इस बेतुकी जिद और बदतमीजी से, पूरे देश में ही नहीं, विश्व में भी भारतीय विपक्ष मज़ाक बनकर रह गया है। सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश तक से मिलने की, मर्यादाहीन कोशिश के बाद, देश को समझ आरहा है कि देश किस स्तरहीनता के चक्रब्यूह में फंस गया है। संवैधानिक संस्थाओं को सावचेत रहना होगा नेता प्रतिपक्ष की फ्रंट पेज पर छपने की इस बीमारी में देश के दिन-प्रतिदिन के ज़रूरी कार्यों सहित विकास और व्यवस्था बाधित हो रही है, संवेधानिक तंत्रो को जनता की सेवा की जगह, बेबुनियाद नौटंकियों में उलझाया जा रहा है। सबसे गलत यह है कि इसे जबरिया दल और जनता पर थोपा जा रहा है। वहीं देश की गरिमा और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान का निहित स्वार्थों हेतु मानमर्दन ...
प्रेस विज्ञप्ति कांग्रेस की बेतुकी मांग ब्रह्मा भी पूरी नहीं कर सकते, अति तुष्टिकरण के कारण जनता की नजर से उतरी — अरविन्द सिसोदिया कोटा, 2 अक्टूबर। भाजपा के कोटा संभाग मीडिया संयोजक एवं राजनीतिक विश्लेषक और प्रखर विचारक अरविन्द सिसोदिया ने मतदाता सूचियों में हेरफेर का आरोप लगाने वाले कांग्रेस और विपक्ष के दावों पर करारा हमला बोला है। सिसोदिया ने कांग्रेस की मांगों को पूरी तरह अतार्किक और हास्यास्पद बताते हुए कहा, "कांग्रेस की मांग तो ब्रह्मा भी पूरी नहीं कर सकते, भला दुनिया से जा चुके 2 करोड़ मृत नागरिकों को मतदाता सूची में वापस कहाँ से लाया जाएगा?" उन्होंने सोशल मीडिया और विभिन्न मीडिया चैनलों पर विपक्ष द्वारा फैलाए जा रहे झूठ का पर्दाफाश करते हुए कहा कि अपनी चुनावी विफलताओं को छिपाने के लिए 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने का फर्जी नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। जबकि ये नाम मृत, निवास छोड़ चुके, दोहरे नाम वालों के हैं, जो बूथ स्तर पर बीएलओ के द्वारा निरीक्षण से कटे हैं। इसके लिए मुख्य चुनाव आयुक्त सीधे तौर पर कतई जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि कोई त्रुटि रही भी है तो उसके लिए कांग्र...
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