गुरुवार, 17 मार्च 2011

शैम...शैम....; कांग्रेस का राष्ट्र विरोधी चेहरा फिरसे उजागर

- अरविन्द सीसोदिया 
        कांग्रेस का राष्ट्र विरोधी और घोर  साम्प्रदायिक चेहरा फिरसे उजागर हुआ है , इस वार यह यह भाजपा या संघ परिवार के द्वारा नहीं , बल्कि  अमरीकी ख़ुफ़िया गिरी के विकीलीक्स पर लीक दस्तावेत से सामने आया है ...! जिस कांगेस नें महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी के हत्यारों को बहुत कम समय में फांसी दे दी .., उसी कांग्रेस  ने भारतीय संसद पर हमले के लिए जिम्मेवार अफजल गुरू की फांसी लगातार इसा तरह से टली मानों , संसद पर हमले ये स्वंय शामिल हों .....! कांग्रेस के इस राष्ट्र विरोधी कार्य की कड़ी से कड़ी निदा की जानी चाहिए ...! 
खबर ........
नई दिल्ली। 2001 में संसद पर हमले के मामले में दोषी अफजल गुरू की फांसी का मामला एक बार फिर भारतीय राजनीति को गरमा सकता है। विकीलीक्स ने अफजल गुरू की फांसी के मामले को लेकर सनसनीखेज खुलासा किया है। विकीलीक्स के गोपनीय दस्तावेजों के मुताबिक कांग्रेसी नेता व मौजूदा केन्द्रीय मंत्री गुलान नबी आजाद ने अफजल गुरू को दया याचिका मंजूर किए जाने के लिए भारी दबाव बनाया था।

2006 में नई दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास की ओर से वॉशिंगटन भेजे गए गोपनीय दस्तावेजों के मुताबिक अफजल की फांसी के मुद्दे पर तत्कालनी राष्ट्रपति
एपीजे अब्दुल कलाम और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच खुलकर मतभेद सामने आ गए थे। गुलान नबी आजाद की ओर से अफजल गुरू को माफ किए जाने का दबाव बनाना ही कलाम और सोनिया के बीच मतभेद की बड़ी वजह थी।

20 अक्टूबर, 2006 को अमरीकी दूतावास के राजनयिक जेफरी पैट ने गुप्त दस्तावेज (82638) में यह भी कहा था कि अगर राष्ट्रपति कलाम को लगता है कि सोनिया उन्हें दोबारा राष्ट्रपति नहीं बनने देंगी तो वे अफजल गुरू के मुद्दे को सही समय पर उछाल भी सकते हैं। दस्तावेज में अफजल गुरू को लेकर 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के चुनावी असमंजस की भी बात बताई गई है।

दस्तावेज में पार्टी के ही एक नेता के हवाले से कहा गया है कि अगर यूपीए अफजल गुरू की फांसी की सजा को माफ करती है तो भाजपा नेता कांग्रेस पर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कमजोर होने का आरोप लगा सकते हैं। वहीं, अगर यूपीए अफजल गुरू को फांसी की सजा होने देती है तो इस बात का डर है कि मुस्लिम वोट बैंक जो राष्ट्रीय स्तर पर परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ रहा है, छूट जाएगा।

 New Delhi, Mach 16: The Hindu on Wednesday published a US diplomat's cable from India on the Afzal Guru hanging issue saying that the Congrtess was facing a "significant electoral dilemma" as it feared losing Muslim votes.

The report says: "The issue of executing Mohammed Afzal Guru, sentenced to death in the 2001 Parliament attack case, “may bring to light longstanding animosity between President Kalam  and Sonia Gandhi,” states a cable sent by the United States Embassy in New Delhi to Washington in 2006.

"It added that this was so “especially as a member of her own party, Chief Minister Azad, has argued on Afzal's behalf” — a possible reference to news reports that Mr. Azad had pressed for clemency to be granted to the convict.

"Sent on October 20, 2006 by Geoffrey Pyatt, U.S. Embassy Deputy Chief of Mission, the cable (82638: confidential) goes on to conjecture mischievously that “if President Kalam believes Sonia won't grant him a second term next summer, he may choose to push the issue into the forefront again at a crucial moment.”

"Accessed by The Hindu through WikiLeaks, the cable highlights the “significant electoral dilemma” the Afzal Guru issue posed for the Congress, just ahead of the “crucial” elections to the Uttar Pradesh Assembly in early-2007.

"It quotes unnamed party sources as telling the Embassy that if “the UPA grants a pardon for Afzal or stalls his execution, the Congress Party will be portrayed by BJP leaders as weak on national security. If, however, the President lets him hang, some fear Congress may lose support from their traditional Muslim vote block on a national scale.”

"The cable records the difference in the manner in which Kashmiri Muslims and the rest of the Indian public reacted to Afzal Guru's possible execution.

"It says that for Srinagar's Muslim population, it “highlights concerns about the fairness of the Indian justice system and failures in India's longstanding program to demobilize and reintegrate surrendered militants [such as Afzal Guru]”… For much of the public, commuting his sentence would demonstrate India remains weak in the face of attacks emanating from Pakistan.”

"It quotes Jammu and Kashmir Liberation Front Chairman Yasin Malik as telling a Consulate political officer that many “Kashmiri Muslims feel sympathy for Afzal” and that his only crime was “buying a car.” (Afzal Guru was not a member of the team that attacked Parliament but had bought the Ambassador car which breached Parliament's first line of security.) “How does this warrant a death sentence?” Mr. Malik is said to have asked.

"However, Mr. Malik's comments were at variance with many moderate Kashmiri separatist leaders in the Valley. One Hurriyat leader told the Consulate's political officer that his faction was “remaining as quiet as possible because they do not feel strongly that Indian should pardon Afzal.”

"He said “moderate members of the Hurriyat are unable to express this view publicly, given the mood in the Valley and the threat from terrorists. He claimed that the controversy over Afzal Guru had led to a loss of support for moderates such as himself among Kashmiri Muslims, “especially [among] a small but growing cadre of Kashmiri youth who are being educated in extremist madarassas springing up across Srinagar with Pakistani Jamaat-i-Islami party funding.”

"The cable suggests that the “easiest option for the Congress may be to delay Afzal's execution for years to consider his appeal for clemency.” This is exactly what has happened. In February 2011, Home Minister P. Chidambaram clarified in Parliament that Afzal Guru's mercy petition, filed on October 3, 2006, had not yet been forwarded to President Pratibha Patil

न्यायलय तुम देश बचाओ जनता तुम्हारे साथ हैं ..

- अरविन्द सिसोदिया 
.........इस समय देश में लूटपाट का हमला चल रहा है ...इस आक्रमण से मुकवाला करनें में प्रतिपक्ष भी उतना कारगर जितनें की आवश्यकता है ..! केंद्र की सरकार नें कई दलों को आय से अधिक संपत्ति के मामलों में सीबीआई से बाँध दिया है सो वे भी सरकार के परोक्ष गुलाम बन गए  हैं ..! इस स्थिति में भारतीय न्यायपालिका ने ही देश हित में कुछ कदम उठाये हैं ..! उन्हें भी रोकनें के लिए कांग्रेस ने यह बात चल वाई है की न्यायपालिका अति सक्रीय है ..., जब की सच यह है कि देश के साथ लूट पात की अति सक्रियता  है..! प्रधान मन्त्र के विभाग से एस बैंड स्पेक्ट्रम घोटाला हो जाये और त्यागपत्र की जगह मात्र साफ सफाई से रफा दफा किया जाये ...! एक नहीं .. लगातार असंवैधानिक गतिविधियों में सरकार लिप्त हो तो कौन उसे रोकेगा ..? जबकि आधा विपक्ष बंधक बन चुका हो ..? अतः न्यायलय की सक्रियता आवश्यक है ...इसका स्वागत होना चाहिए ..! न्यायलय तुम देश बचाओ जनता  तुम्हारे साथ हैं .. यह नारा देश में गूंजना चाहिए ..!.........देखिये न्यायपालिका को दवाब में लेने की कोशिस की दो रिपोर्टें .....
१६ मार्च २०११ को उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि देश में विधायिका और न्यायपालिका के बीच 'उचित संतुलन' बनाये रखने की जरूरत है |  राज्यसभा के सभापति अंसारी ने कहा, 'हमारी व्यवस्था शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर काम करती है. इस सिद्धांत में बारीक भेद है और इस बारीक भेद को समझने की जरूरत है. सार्वजनिक घोषणाओं के दौरान विवेक और नीतियों को लागू करते समय सतर्कता बरतने की जरूरत है ताकि हर समय उचित संतुलन बनाये रखना सुनिश्चित किया जा सके.'
      उन्होंने कहा कि सभी व्यवस्थायें 'दबाव और तनाव' से गुजरती हैं लेकिन लोकतांत्रिक प्रणाली इसका जवाब चर्चा और विचार विमर्श आयोजित करके देती है.उप राष्ट्रपति ने कहा, 'मैं समझता हूं कि चर्चा और विचार विमर्श तथा इसके लिये पर्याप्त समय दिये जाने की जरूरत है. आज के समय में विभिन्न कारणों से यह और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है जब हम इसमें से कुछ चीजों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं.' अंसारी ने अपने विचार यहां पर एक किताब का विमोचन करते समय रखे.
     इस अवसर पर राज्यसभा के उप सभापति के रहमान खान ने कहा कि जहां संसद कानून बनाने का सर्वोच्च निकाय है वहीं न्यायपालिका, संविधान और विधायिका संस्थानों द्वारा पारित किये गये कानून की व्याख्या करने की अंतिम शक्ति है. उन्होंने कहा कि हालांकि विधायिका और न्यायपालिका दोनों ही को अपने कार्य के लिये पूर्ण स्वायत्तता और स्वतंत्रता है फिर कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब 'संसद और न्यायपालिका के बीच उचित संतुलन उनकी स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर मतभेद के कारण तनाव ग्रस्त हो जाता है.
सुधांशु रंजन 
पिछले कुछ समय से न्यायिक सक्रियता का एक नया दौरशुरू हुआ है। 2- जी घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट कठोर टिप्पणी करचुका है और अब उसकी जांच की निगरानी भी कर रहा है।महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्य मंत्री विलासराव देशमुख द्वारा एकआपराधिक मामले में पुलिस पर दबाव डालकर जांच प्रक्रिया कोप्रभावित करने के लिए अदालत ने राज्य सरकार पर 10 लाख रु. का जुर्माना किया। काले धन पर भी सुप्रीम कोर्ट की तल्खटिप्पणियां लगातार आ रही हैं। गत 3 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पी. जे . थॉमस की सीवीसी के रूप में की गई नियुक्ति को निरस्तकर एक नयी सक्रियता का परिचय दिया। यह संभवत : पहलाअवसर है जब किसी अदालत ने न सिर्फ इतनी उच्च पदस्थ नियुक्तिको अवैध करा दिया , बल्कि उस अनुशंसा को रद्द कर दिया जिसके आधार पर यह नियुक्ति की गई थी। अर्थात यह मानाजाएगा कि यह नियुक्ति कभी हुई ही नहीं।

नियुक्ति की समीक्षा 
अदालत ने सरकार और थॉमस की यह दलील खारिज कर दी कि कार्यपालिका द्वारा की गयी नियुक्तियों की समीक्षाअदालत नहीं कर सकती। सरकार का पक्ष था कि कोई भी नियुक्ति उसका विवेकाधिकार है , लेकिन सुप्रीम कोर्ट नेव्यवस्था दी है कि नियुक्ति की न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। किंतु लोकतंत्र में न्यायालय को इसअधिकार का इस्तेमाल संयम के साथ करना चाहिए , हालांकि यह भी न्यायपालिका को ही तय करना है कि उसकी सीमाक्या होगी। विनीत नारायण ; 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट दिशानिर्देश दिए कि सीबीआई और सीवीसी का पुनर्गठन इसप्रकार किया जाना चाहिए ताकि ये बाहरी प्रभावों से पूरी तरह मुक्त रहें।

शून्य भरने का सिद्धांत 
मुख्य न्यायाधीश जे . एस . वर्मा ने शून्य भरने का सिद्धांत दोहराया कि यदि विधायिका अपना काम न करे तोकार्यपालिका को उस शून्य को भरना चाहिए क्योंकि इसका कार्यक्षेत्र विधायिका के साथ मिलता है। और जहांकार्यपालिका भी किसी कारणवश काम न करे , वहां न्यायपालिका को संविधान के अनुच्छेद 32 और 142 के अंतर्गतअपने दायित्वों का निर्वाह करने के लिए शिरकत करनी पडे़गी , जब तक कि विधायिका कानून बनाकर उसे पूरा न करे।अदालत के इन निर्देशों का अनुपालन नहीं हुआ , किंतु इसके अदालत ने सरकार के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरूनहीं की।

प्रकाश पी . हिंदुजा ; 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया - ' ए . के . राय बनाम संघ में यह व्यवस्था दी गई किविधायिका द्वारा बनाए गए कानून को लागू कराने के लिए कोई मैंडामस जारी नहीं किया जा सकता। इसलिए , सीवीसीको कानूनी दर्जा दिये जाने के बारे में दिए गए निर्देश को ऐसा नहीं माना जा सकता , जिसका अनुपालन न किए जाने कोअवमानना माना जाए। ' इस तरह अदालत ने अपनी परिधि से बाहर जाने की बात परोक्ष रूप से स्वीकार कर ली , किंतुइससे विनीत नारायण मामले में दिए गए उसके निर्देशों का मजाक बना। इससे वैसे अदालती आदेशों का अनुपालन नकिए जाने की गुंजाइश खुलती है जो कार्यपालिका की दृष्टि में न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र से बाहर है। लेकिन इधर अदालतका रवैया फिर आक्त्रामक सक्त्रियता वाला दिख रहा है।

अभी पूरी दुनिया में राजनीतिक मसले भी अदालतों के समक्ष लाए जा रहे हैं। चुनावी नतीजों से लेकर सत्ता परिवर्तन ,युद्ध और शांति , सामूहिक पहचान के प्रश्न और सीधे - सीधे राष्ट्र निर्माण से जुड़े मुद्दों पर भी अदालतें विचार कर रहीं हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव , चेचन्या में युद्ध और पाकिस्तान की राजनीतिक उथल - पुथल से लेकर तुर्की में सेक्युलरराजनीतिक व्यवस्था तक पर अदालत को फैसले सुनाने पडे़ हैं। भारतीय सुप्रीम कोर्ट पूरे विश्व में सबसे शक्तिशाली है ,इसलिए यहां यह प्रवृत्ति और ज्यादा मुखर है।

यहां संविधान के लागू होते ही निर्वाचित सांसद यह माननेे लगे कि देश की तकदीर को गढ़ने का जनादेश उन्हें ही प्राप्तहुआ है , लेकिन न्यायपालिका का भी स्पष्ट पक्ष था कि उसकी स्वाधीनता के साथ सरकार या विधायिका को कोई हस्तक्षेपनहीं करना चाहिए। 28 फरवरी 1950 को सुप्रीम कोर्ट के उद्घाटन के अवसर पर मुख्य न्यायाधीश हीरालाल कानिया नेअपना रुख साफ कर दिया था कि न्यायपालिका को छूने की कोई कोशिश कोई न करे। संवधिान के प्रथम संशोधन केसाथ ही नवीं अनुसूची का जन्म हुआ जिसमें डाले गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती थी। सुप्रीम कोर्ट नेहाल में इसे भी निरस्त कर दिया।

जवाहर लाल नेहरू न्यायपालिका की स्वतंत्रता में पूरा विश्वास रखते थे , फिर भी उन्होंने 19 मई 1951 को संसद में कहाथा कि बड़ी योजनाओं और बड़े सामाजिक परिवर्तनों में न्यायपालिका की कोई भूमिका नहीं है। गोलकनाथ मामले में जबसुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती तो उस समय इसे न्यायिकसक्त्रियता का सबसे बड़ा उदाहरण माना गया था। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सांसद नाथ पई ने संसद के अधिकार कोबहाल करने के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। इसका जोरदार विरोध उसी पार्टी के राम मनोहर लोहिया औरमधु लिमये ने किया। बाद में 1973 में केशवानंद भारती मामले में संविधान के मौलिक ढांचे में संशोधन न करने कीव्यवस्था देकर सुप्रीम कोर्ट ने संसद की शक्ति को हमेशा के लिए सीमित कर दिया।

काम में भी दिखे सक्रियता 
न्यायिक सक्त्रियता के कई सुखद परिणाम सामने आए हैं किंतु न्यायपालिका को त्वरित न्याय दिलाने में भी सक्त्रियतादिखानी चाहिए , अन्यथा उसकी सक्त्रियता पूरी तरह सार्थक नहीं हो पाएगी। पी . जे . थॉमस के मामले में अदालत नेउनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर नहीं , प्रक्त्रिया के उल्लंघन पर सवाल उठाया है। थॉमस के खिलाफ आरोप करीब 20 वर्षपुराना है। अगर कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपित होता है तो क्या न्यायपालिका को यह सुनिश्चित नहीं करनाचाहिए कि मामले का जल्द निष्पादन हो जाए ? अगर ऐसा नहीं होता तो क्या आरोपित व्यक्ति ताउम्र सभी पदों के लिएअयोग्य बना रहेगा ?

बस होली है...होली है ...

रचना, लेखन एवं प्रस्तुति,
प्रो. अश्विनी केशरवानी ‘‘ राघव ’’ 
डागा कालोनी, चाम्पा-495671 ( छत्तीसगढ़ )
  होली हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। भारतीय संस्कृति का अनूठा संगम उनकी त्योहारों और पर्वो में दिखाई देता है। इन पर्वो में न जात होती है न पात, राजा और रंक सभी एक होकर इन त्योहारों को मनाते हैं। सारी कटुता को भूलकर अनुराग भरे माधुर्य से इसे मनाते हें। इसीलिए होली को एकता, समन्वय और सदभावना का राष्ट्रीय पर्व कहा जाता है। होली के आते ही धरती प्राणवान हो उठती है, प्रकृति खिल उठती है और कवियों का भावुक नाजुक मन न जाने कितने रंग बिखेर देता है अपनी गीतों में। देखिये इसकी एक बानगी पेश है:-
होली का त्योहार मनायें
   ले लेकर अबीर होली में
   निकलें मिल जुलकर टोली में
   बीती बातों को बिसराकर
   सब गले मिलें होली में
   पिचकारी भर भरकर
   सबको हंसकर तिलक लगायें
   आओं मिलकर होली मनायें।

   गांवों में बसा हमारा भारत ग्राम्य संस्कृति में घुले मिले रचे बसे लोग मांगलिक प्रसंगों पर लोकगीत गाकर वातावरण को लुभावना बना देते हैं। गांवों में नगरीय सभ्यता से जुड़े मंच नहीं होता। यहां के लोग धरती के गीत गाते हैं और उन्हीं में हमारे पर्व और त्योहारों की झांकी होती है। संभवतः समूचे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां के पर्व और मांगलिे प्रसंग आपस में जोड़ने का काम करते हैं। होली का पर्व या दीपावली का, उसमें भारतीयता झलकती है। हसरत रिसालपुरी के शब्दों में:-

   मुख पर गुलाल लगाओ
   नयनयन को नयनों से मिलाओ
    बैर भूलकर प्रेम बढ़ाओ
 सबको आत्मज्ञान सिखाओ
 आओ प्यार की बोली बोलें
 हौले हौले होली खेलें।

   भारत में वैसे पर्व और त्योहार इतने हैं उतने कहीं नहीं है। यहां हर दिन किसी न किसी उत्सव से जुड़ा है। इनमें हमारा धर्म, हमारी सभ्यता और संस्कृति के साथ साथ आध्यात्म जुड़ा होता है। ब्रज की होली या कहीं और की, उनमें समूचा भारतीय समाज रचा बसा है। कवि इन पर्व प्रसंगों को अपने जीवन का सहचर मानता है। कवि पद्माकर का यह छंद अनूठा और होली को रंगमय बनाने वाला है:-

   एकै संग धाये नंदलाल अउ गुलाल दोउ
   दृगन नये ते भरि आनंद मढ़ै नहीं।
   धोय धोय हारी पद्माकर तिहारी सोय
   अब तो उपजाऊ एकौ चित में चढ़ै नहीं।
   कैसे करौं, कहां जाओंष् कासे कहां बावरी
   कोउ तो निकारो जाओ दरद बढ़ै नहीं।
   ऐरी मेरी बोर जैसे तैसे इन आंखिन में
   कढ़ियोे अबीर पै अहीर तो कढ़ै नहीं।

  ऐसे रंगों से सराबोर होली को खेलने में भला देवतागण भला पीछे क्यों रहे ? राधा-कृष्ण की होली के रंग ही कुछ और है। ब्रज की होली का रंग ही निराला है। अपने श्यामा श्याम के संग रंग में रंगोली बनाकर ब्रजवासी भी होली खेलने के लिये हुरियार बन जाते हैं और ब्रज की नारियां हुरियारिनेंा के रूप में साथ होते हैं और चारों ओर एक ही स्वर सुनाई देता है:-

   आज बिरज में होली रे रसिया
   होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
   उड़त गुलाल लाल भए बादर
   केसर रंग में बोरी रे रसिया।
   बाजत ताल मृदंग झांझ ढप
   और मजीरन की जोरी रे रसिया।
   फेंक गुलाल हाथ पिचकारी
   मारत भर भर पिचकारी रे रसिया।
   इतने आये कुंवरे कन्हैया
   उतसों कुंवरि किसोरी रे रसिया।
   नंदग्राम के जुरे हैं सखा सब
   बरसाने की गोरी रे रसिया।
   दौड़ मिल फाग परस्पर खेलें
   कहि कहि होरी होरी रे रसिया।

  इतना ही नहीं वह श्याम सखाओं को चुनौती देती है कि होली में जीतकर दिखाओ। उनमें ऐसा अद्भूत उत्साह जागृत होता है कि सब ग्वाल-बालों को अपना चेला बनाकर बदला चुकाना चाहती हैं। जिन ब्रज बालों ने अटारी में चढ़ी हुई ब्रज गोपियों को संकोची समझा था, आज वे ही होली खेलने को तैयार हैं। पेश है इस दृश्य की एक बानगी:-

   होरी खेलूंगी श्याम तोते नाय हारूं
   उड़त गुलाल लाल भए बादर
   भर गडुआ रंग को डारूं
   होरी में तोय गोरी बनाऊं लाला
   पाग झगा तरी फारूं
   औचक छतियन हाथ चलाये
   तोरे हाथ बांधि गुलाल मारूं।

  फिर क्या था ब्रज में होली की ऐसी धूम मची कि सब रंग में सराबोर हो गये। जिसका जैसा वश चला उसने वैसी ही होली खेली। श्रीकृष्ण ने भी घाघर में केसर रंग घोला है और झोली में अबीर भरा है। उड़ते गुलाल से लाल बादल सा छा गया है। रंग से भरी यमुना बह रही है। ब्रज की गलियों में राधिका होली खेल रही है, रंग से भरे ग्वाल-बाल लाल हो गये हैं:-

   होरी खेलत राधे किसोरी बिरिजवा के खोरी।
   केसर रंग कमोरी घोरी कान्हे अबीरन झोरी।
   उड़त गुलाल भये बादर रंगवा कर जमुना बहोरी।
   बिरिजवा के खोरी।
   लाल लाल सब ग्वाल भये, लाल किसोर किसोरी।
   भौजि गइल राधे कर सारी, कान्हर कर भींजि पिछौरी।
   बिरिजवा के खोरी।

  अयोध्या में श्रीराम सीता जी के संग होली खेल रहे हैं। एक ओर राम लक्ष्मण भरत और शत्रृघन हैं तो दूसरी ओर सहेलियों के संग सीता जी। केसर मिला रंग घोला गया है। दोनों ओर से रंग डाला जा रहा है। मुंह में रोरी रंग मलने पर गोरी तिनका तोड़ती लज्जा से भर गई है। झांझ, मृदंग और ढपली के बजने से चारों ओर उमंग ही उमंग है। दंवतागण आकाश से फूल बरसा रहे हैं। देखिए इस मनोरम दृश्य की एक झांकी:-

   खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी
   इत राम लखन भरत शत्रुहन,
   उत जानकी सभ गोरी, केसर रंग घोरी।
   छिरकत जुगल समाज परस्पर
   मलत मुखन में रोरी, बाजत तृन तोरी।
   बाजत झांझ, मिरिदंग, ढोेलि ढप
   गृह गह भये चंहु ओरी, नवसात संजोरी।
   साधव देव भये, सुमन सुर बरसे
   जय जय मचे चंहु ओरी, मिथलापुर खोरी।

  होली के दूसरे दृश्य में, रघुवर और जनक दुलारी सीता अवधपुरी में होली खेल रहे हैं। भरत, शत्रुघन, लक्ष्मण और हनुमान की अलग अलग टोली बन गयी है। पखावज का अपूर्व राग बज रहा है, प्रेम उमड़ रहा है और सभी गीत गा रहे हैं। थाली में अगर, चंदन और केसरिया रंग भर रहे हैं। सभी अबरख, अबीर, गुलाल, कुमकुम रख रहे हैं। माथे पर पगड़ी रंग गयी है और गलियों में केसर से कीचड़ बन गया है। इस दृश्य की एक बानगी पेश है:-

   खेलत अवधपुरी में फाग, रघुवर जनक लली
   भरत, शत्रुहन, लखन, पवनसुत, जूथ जूथ लिए भाग।
   बजत अनहद ताल पखावज, उमगि उमगि अनुराग
   गावत गीत भली।
   भरि भरि थार, अगरवा, केसर, चंदन, केसरिया भरि थार
   अबरख, अबीर, गुलाल, कुमकुमा, सीस रंगा लिए पाग।
   केसर कीच गली।

  तीसरे दृश्य में जानकी, श्रुति, कीर्ति, उर्मिला और मांडवी के साथ होली खेल रही हैं:-

   जानकी होरी खेलन आई
   श्रुति, कीरति, उरमिला, मांडवी, संग सहेली सुलाई
   केसर रंग भरे घर केचन चंदर गंध मिलाई
   पीत मधु छिरकत आयी है, संग लिये सभ भाई
   कर कंचन पिचुकारी हाथ लिये चलि आयी।

  जब राधा-कृष्ण ब्रज में और सीता-राम अयोध्या में होली खेल रहे हैं तो भला हिमालय में उमा-महेश्वर होली क्यों न खेलें ? हमेशा की तरह आज भी शिव जी होली खेल रहे हैं। उनकी जटा में गंगा निवास कर रही है और पूरे शरीर में भस्म लगा है। वे नंदी की सवारी पर हैं। ललाट पर चंद्रमा, शरीर में लिपटी मृगछाला, चमकती हुई आंखें और गले में लिपटा हुआ सर्प। उनके इस रूप को अपलक निहारती पार्वती अपनी सहेलियों के साथ रंग गुलाल से सराबोर हैं। देखिए इस अद्भूत दृश्य की झांकी:-

आजु सदासिव खेलत होरी
   जटा जूट में गंग बिराजे अंग में भसम रमोरी
   वाहन बैल ललाट चरनमा, मृगछाला अरू छोरी।
   तीनि आंखि सुन्दर चमकेला, सरप गले लिपटोरी
   उदभूत रूप उमा जे दउरी, संग में सखी करोरी
   हंसत लजत मुस्कात चनरमा सभे सीधि इकठोरी
   लेई गुलाल संभु पर छिरके, रंग में उन्हुके नारी
   भइल लाल सभ देह संभु के, गउरी करे ठिठोरी।

  शिव जी के साथ भूत-प्रेतों की जमात भी होली खेल रही है। देखिए इसकी एक झांकी:-

   सदासिव खेलत होरी, भूत जमात बटोरी
   गिरि कैलास सिखर के उपर बट छाया चंहुओरी
   पीत बितान तने चंहु दिसि के, अनुपम साज सजोरी
   छवि इंद्रासन सोरी।
   आक धतूरा संखिया माहुर कुचिला भांग पीसोरी
   नहीं अघात भये मतवारे, भरि भरि पीयत कमोरी
   अपने ही मुख पोतत लै लै अद्भूत रूप बनोरी
   हंसे गिरिजा मुंह मोरी।

  औघड़ बाबा शिव जी की होली को देखकर सभी स्तुति करने लगते हैं कि हे बाबा ! हमारे नगर में निवास करो ओर हमारे दुख हरो:-

   बम भोला बाबा, कहवां रंगवत पागरिया
   कहवां बाबा के जाहा रंगइले और कहवां रंगइलें पागरिया
   कासी बाबा के जाहा रंगइले आरे बैजनाथ पागरिया
   तोहरा बयल के भ्ूासा देवो भंगिया देइबि भर गागरिया
   बसे हमारी नगरिया हो बाबा, बसे हमारी नगरिया।

  देवताओं की होली को देखकर मन उनकी भक्ति में रम जाता है। ईश्वर का गुणगान करो, ताली बजाओ और सभी के संग होली खेलो। चित चंचल है अपने रंगीले मन को ईश्वर की भक्ति में रंग लोकृ

   रसिया रस लूटो होली में,
   राम रंग पिचुकारि, भरो सुरति की झोली में।
   हरि गुन गाओ, ताल बजाओ, खेलो संग हमजोली में
   मन को रंग लो रंग रंगिले कोई चित चंचल चोली में
   होरी के ई धूमि मची है, सिहरो भक्तन की टोली में।

बस होली है भई होली है ... ब्लॉगों की भी लूटपाट और मस्ती है ...............          

होली है भई होली है ......

- अरविन्द सिसोदिया 
चलिये याद करेँ,..... होली आई रे कन्हाई

कुल मिला कर होली के इस त्यौहार पर हम ईर्ष्या रूपी होलिका को जलादें .. तभी इस त्यौहार की सार्थकता है ..!
अवध की होली और राम का चरित्र 
होली राग रंग से भरा ऐसा उल्लास पर्व है जिसका धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं राष्ट्रीय महत्व है। इसमें भारतीय जनमानस का स्वाभाविक व्यक्तित्व झलकता है। हालाँकि यह पर्व प्राचीन काल से आज तक अनेक रूपों में विकसित हुआ है फिर भी हर्ष, उल्लास और उत्सवधर्मिता में कभी कोई कमी नहीं आई।
अवध राम की जन्म स्थली और क्रीड़ा स्थली रही है। उनकी यशोगाथा से भरे अवधी लोकगीतों में लोकमानस की भावनाएँ, आशाएँ, आकांक्षाएँ व कामनाएँ परिलक्षित होती है। इस परिप्रेक्ष्य में डाक्टर महेश अवस्थी द्वारा संपादित 'लोकगीत रामायण' में संकलित लोकगीतों में राम से संबंधित होली का सहज चित्रण देखने को मिलता है। होली के मादक रंग में रंगे हुए चारो भाइयों के होली खेलने का यह दृश्य लोकजीवन और लोकप्रेम की सुरम्य झाँकी प्रस्तुत कर रहा है :
अवध माँ होली खेलैं रघुवीरा।
ओ केकरे हाथ ढोलक भल सोहै, केकरे हाथे मंजीरा।
राम के हाथ ढोलक भल सोहै, लछिमन हाथे मंजीरा।
ए केकरे हाथ कनक पिचकारी ए केकरे हाथे अबीरा।
ए भरत के हाथ कनक पिचकारी शत्रुघन हाथे अबीरा।

अवधी लोकगीतो में राम मिथिलापुर में भी होली खेल रहे हैं, मिथिलापुर की एक चतुर स्त्री अपनी सहेलियों से कह रही है कि राम फिर जनकपुर नही आएँगे और न ही हम लोग अवधपुर जाएँगे इसलिए इनसे खूब जमकर होली खेल ली जाय। जब सीता अपनी सहेलियों के साथ हाथ में पिचकारियाँ लेकर चली तो सीता राम का मुख मोड़ कर सिंहासन पर बैठने का निवेदन करते हुए कहती है कि मैं समुद्र को काटकर उसमें से नदी ले आऊँगी और जलयानों में रंग घोलकर पिचकारी भर-भर कर रंग चलाऊँगी, जैसे सावन की बूँदे पड़ती हैं। और केसर, कुसुम तथा अरगजा चंदन से एक ही पल में आपको सराबोर कर दूँगी। सीता के ऐसे उमंगमय भावों को मुखरित करता है होली का यह लोकगीत :
होरी खेलैं राम मिथिलापुर माँ
मिथिलापुर एक नारि सयानी, सीख देइ सब सखियन का,
बहुरि न राम जनकपुर अइहैं, न हम जाब अवधपुर का।।
जब सिय साजि समाज चली, लाखौं पिचकारी लै कर माँ।
मुख मोरि दिहेउ, पग ढील दिहेउ प्रभु बइठौ जाय सिंघासन माँ।।
हम तौ ठहरी जनकनंदिनी, तुम अवधेश कुमारन माँ।
सागर काटि सरित लै अउबे, घोरब रंग जहाजन माँ।।
भरि पिचकारी रंग चलउबै, बूँद परै जस सावन माँ।
केसर कुसुम, अरगजा चंदन, बोरि दिअब यक्कै पल माँ।।
सीता जी के द्विरागमन के उपरांत अयोध्या में पहली होली पड़ी तब राम और सीता ने सरयू तट पर लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न आदि के साथ होली खेलने का निश्चय किया। सरयू तट पर होली के रंगारंग धमाल में राम हाथ में सोने की पिचकारी लिए हुए हैं, लक्ष्मण के हाथ में अबीर की पुटकी तो भरत के हाथ में रंग गुलाल है। एक तरफ़ शत्रुघ्न के साथ मित्र मंडली तो दूसरी ओर सीता के साथ वधुएँ हैं और उर्मिला के साथ सहेलियों का झुंड। प्रस्तुत होली गीत में इसी का उल्लेख है :
सरजू तट राम खेलैं होली, सरजू तट।
केहिके हाथ कनक पिचकारी, केहिके हाथ अबीर झोली, सरजू तट।
राम के हाथ कनक पिचकारी, लछिमन हाथ अबीर झोली, सरजू तट।
केहिके हाथे रंग गुलाली, केहिके साथ सखन टोली, सरजू तट।
केहिके साथे बहुएँ भोली, केहिके साथ सखिन टोली, सरजू तट।
सीता के साथे बहुएँ भोली, उरमिला साथ सखिन टोली, सरजू तट।
आभार सहित ......
होली खेलें रघुवीरा-बृजेश कुमार शुक्ला


भविष्य पुराण, नारद, पुराण गृह्य सूत्र तथा जैमिनिय पूर्व मीमाँसा सूत्रोँ मेँ "होली -उत्सव" का सर्व प्रथम वर्णन आया है। चलिए , प्राचीन काल में झांकें ...
हिरण्यकश्यपु राक्षस राज, ईश्वर का अस्तित्त्व नकारते हुए, दिन रात, कुकर्म मेँ निमग्न हैँ जबकि उन्हीँ का पुत्र बालक प्रह्लाद अत्यँत पवित्र ह्र्दय का ईश्वर का परम भक्त है ।
पिता द्वारा अनेक अत्याचार और रोष करने पर भी प्रह्लाद की भक्ति,> अडिग रहती है ! तब खीझ कर, पिता हिरण्यकश्यपु, बुआ "होलिका " को आदेश देते हैँ कि , वह प्रह्लाद को गोद मेँ लेकर अग्नि मेँ प्रवेश करे और बैठ जाये ...
जब कि उसे पता था कि होलिका को वरदान प्राप्त था कि अग्नि , होलिका को जला नहीँ सकती !
राजाज्ञा का पालन हुआ । होलिका अग्नि मेँ जा बैठीँ और गोद मेँ ईश्वर नाम स्मरण करते बालक भी बैठे ! आश्चर्य !
होलिका की बुरी नियत, वरदान को जुठलाती हुई उसे जलाकर भस्म कर गई जब के प्रह्लाद को तो कुछ भी नहीँ हुआ !
नारायण का नाम स्मरण करते हुए भक्त प्रह्लाद ने पाप पर पुण्य के विजय की कथा पुन: दुहराई
भारत मेँ इसी कथा को याद करते हुए, महिलाएँ पूर्ण चन्द्र "राका " की साक्षी मेँ , अपने परिवारोँ की सुरक्षा व खुशहाली के लिये पूजा करतीँ हैँ । ग्राम प्राँत होँ या शहर, अग्नि प्रज्वलित कर, उसमेँ नारियल, खील, बतासे , कुमकुम , अक्षत का भोग लगाकर आहुति दी जाती है और नारियल की गिरी का प्रसाद खाकर असत्य पर सत्य की विजय का उत्सव "होलिका - दहन " मनाया जाता है ।
दूसरे दिन सुबह से अबीर , गुलाल (जो कभी कभार इत्र से मिलाया हुआ भी होता है) भाल पर टीका लगा कर और गालोँ पर गुलाल मल कर, भारतीय लोग, रँगोँ की होली का खेला खेलते हैँ ।
साथ मेँ गर्म मूग़ की दाल के पकौडे, गुझिया , ठडाई, तरह तरह के पकवान और मिठाईयाँ भी हंसी मजाक भरे माहौल में खाई जातीँ हैँ ।
लोग ढोलक पर थाप देते हुए नृत्य गीत से समाँ बाँधते हैँ और होली रँगीन पानी, ओईल कलर और तरह तरह के रँगोँ से मनाई जाती है । रँग छुडाने नदी या समुँदर मेँ स्नान भी किया जाता है पर कई बार रँग चढा रहता है और कुछ दिनोँ बाद ही छूटता है !
ये प्रथा भारतीय मूल के लोग जहाँ भी गये , जैसे, सूरीनाम, मोरेशीयस, जावा, सुमात्रा, फीजी, श्री लँका, इन्डोनेशिया, युरोप और अमरीका , वहाँ भी अब भारतीय लोग इसे मनाने लगे हैँ । इस प्रकार " होली " , अब एक विश्वव्यापी त्योहार बन चुका है ।
बसँत के आगमन के साथ, गुनगुनी धूप और खुशनुमा वातावरण होली के त्योहार को, और भी रँगीन बना देता है ।
हिन्दी फिल्मोँ मेँ, गीतोँ के माध्यम से होली के उत्सव को खूब प्रचार -प्रसार मिला ! होली से जुडे कई फिल्मी गीत आपके जहन मेँ इस वक्त उभर रहे होँगेँ ! चलिये याद करेँ,.....
फिल्म ' नवरँग ' का ये गीत, नायिका उलाहना देती है " अरे जा रे हट नटखट, ना छू रे मेरा घुँघट, पलट के दूँगी, आज तुझे गाली रे, मुझे समझो ना तुम, भोली भाली रे, "
तो नायक खिलँदडे स्वर मेँ पलट कर गाता है,
" आया होली का त्योहार , उडे रँग की बौछार, तू हे नार नखरेदार, मतवाली रे, आज मीठी लगे रे तेरी गाली रे " ।
लोक गीत और लोक द्रश्य यहाँ कितने सजीव हो उठे हैँ !
फिल्म :' मदर इँडिया' के गीत मेँ " होली आई रे कन्हाई, रँग छलके, सुना दे जरा बाँसुरी " हमारे प्रिय कन्हैया को , जन मन के सँग, नृत्यरत पाते हैँ तो फिल्म ' गोदान' का कलावती राग आधारित गीत " बिरज मेँ होरी खेलत नँद लाला " भी बृजभूमि की लठ्ठमार होली की याद दिलाता है ।
फिल्म ' फागुन' मेँ नायिका "पिया सँग खेलूँ होली " की चाहत मेँ , रँगोँ के खेल मेँ निमग्न है तो फिल्म "आखिर क्यूँ " मेँ " सात रँग मेँ खेल रही है, दिलवालोँ की होली रे " का समूह गान दर्शाया गया है ।
फिल्म "कटी पतँग " मेँ, " आज ना छोडेँगेँ बस हमजोली, खेलेँगेँ हम होली " हमजोलियोँ का मस्तीभरा गीत उभरता है ।
अन्य कई गीत हैँ जिनके मुखडे याद आ रहे हैँ, " तन रँग लो जी , आज मन रँग लो, " और " होलिया मेँ उडे रे गुलाल, " और " लाई है हज़ारोँ रँग होली " जो लोक त्योहार होली का एक और रुप "फगवा "याद दिलाते हैँ ।
" जय जय शिव शँकर, काँटा लगे ना कँकर, एक प्याला तेरे नाम का पिया " गीत , होली के सँग जुडी एक और प्रथा ठँडाई और भाँग पीने का द्र्श्य उजागर करते हैँ , जहाँ राजेश खन्ना और मुमताज भँग के रँग मेँ , डोलते, भागते धूम मचाते हैँ । सन्` १८७० मेँ " होली आई रे" नाम से पूरी फिल्म बनी ! जिसका सँगीत कल्याणजी - आनँदजी की जोडी ने दिया था ।
फिल्म निर्माता यश चोपडा ने अपनी कई फिल्मोँ मेँ होली के द्रश्य प्रस्तुत किये हैँ । फिल्म ' मशाल ' - गीत : "होली आई, होली आई, देखो होली आई रे " फिल्म ''डर ' मेँ गीत : " अँग से अँग लगाना सजन, मोहे ऐसे रँग लगाना "
फिल्म ,' मोहब्बतेँ', गीत : "सोहनी सोहनी अँखियोँवाली " गीत दर्शाये थे परँतु, सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म, 'सिलसिला' " गीत : " रँग बरसे, भीगे चुनरवाली रँग बरसे " जिसे डा. हरिवँश राय "बच्चन जी ने लिखा है और उनके सुप्रसिध्ध अभिनेता पुत्र अमिताभ बच्चन जी ने अपनी प्रेयसी बनीँ सिनेतारिका रेखा के साथ होली के उत्सव मेँ, जहाँ हँसी ठठ्ठा, मजाक मस्ती का सँगम निहित है, बखूबी पर्दे पर निभाया जिसे दर्शकोँ ने खूब, सराहा !
आनेवाले समय मेँ , शायद यही सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना रहेगा !
ऐसे भी भारत मेँ २५ साल पहले और आज 'होली' का रुप बदला है फिल्मेँ समाज का दर्पण तो कभी आनेवाले समय का आइना दीखलातीँ हैँ
फिल्म 'गाईड ' मेँ, एक गीत मेँ कुछ पँक्तियाँ होली पर लीँ गईँ " आई होली आई, सब रँग लाई, बिन तेरे होली भी ना भाये, हाये, " गीत लताजी के स्वर मेँ भीगा ,रस विभोर करने मेँ सफल हुआ ।
फिल्म, 'आप बीती ' मेँ , हेमा मालिनी ने गाया " नीला, पीला, हरा, गुलाबी, कच्चा पक्का रँग डाला रे मेरे अँग अँग " तो कई रँग बिखर कर निखर गये !
'फूल और पत्थर' ' मेँ गीत : ' लाई है हज़ारोँ रँग होली, कोई तन के लिये, कोई मन के लिये " का सँदेसा गूँजा !
फिल्म, ' कोहीनूर ' मेँ , गीत " तन रँग लो जी आज मन रँग लो " की गुहार उठी लेकिन सुमधुर गायिका लताजी और स्वप्न सुँदरी कहलानेवालीँ हेमा मालिनी ने मिलकर, 'शोले' फिल्म के गीत, " होली के दिन , दिल खिल जाते हैँ, रँगोँ मेँ रँग मिल जाते हैँ, गिले शिकवे भूल कर के सभी, दुश्मन भी गले मिल जाते हैँ " को बाजी मारने का मौका दिलाया !
असल जिँदगी मेँ नायक धर्मेन्द्र और हेमा का साथ भी इसकी सफलता का एक कोण था जिसे फिल्म 'राजपूत' मेँ दुबारा वही मस्ती उभारने का मौका दिया गया गीत था, " भागी रे भागी रे ब्रिज बाला, कान्हा ने पकडा, रँग डाला " परँतु 'शोले' फिल्म के सामने इसका रँग फीका पड गया !
फिल्म ' बागबान ' निर्माता रवि चोपडा ने अमिताभ और हेमा मालिनी को गीत दिया, " होली खेले रघुबीरा, अवध मेँ होली खेले, रघुबीरा " जो काफी पसँद किया गया ।
फिल्म 'कामचोर' मेँ जया प्रदा ने माँग की, " मल दे गुलाल मोहे के आई होली आई रे " तब फिल्म ' जख्मी' मेँ सुनील दत्त ने उदास स्वरोँ मेँ गाया कि
" दिल मेँ होली जल रही है " .....
फिल्म ' धनवान ' मेँ " मारो भर भर पिचकारी " की पुकार हुई !
फिल्म ' इलाका ' मेँ माधुरी ने ऐलान किया कि ' आई है होली " ।
मँगल पाँडे मेँ, आमीर खान पर फिल्माया गीत भी होली सँबँधित है ।
अमिताभ का एक और गीत " खई के पान बनारसवाला " भी होली के त्योहार की मस्ती का एक अनूठा रँग लिये गीत है !
किँतु आज की युवा पीढी अक्षय और प्रियँका पर फिल्माया , फिल्म 'वक्त' का गीत " डू मी ए फेवर , लेट्ज़ प्ले होली ' होली के उत्सव को २१ वीँ सदी के मुहाने पर ले आया ! 
आभार सहित