सोमवार, 25 मार्च 2013

भगवान नृसिंह जयंती



हिन्दू पंचांग के अनुसार नृसिंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है. पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में अवतार लिया था. जिस कारणवश यह दिन भगवान नृसिंह के जयंती रूप में बड़े ही धूमधाम और हर्सोल्लास के साथ मनाया जाता है. भगवान नृसिंह जयंती की व्रत कथा इस प्रकार से है
--------

नृसिंह जयंती पर लें शुभ संकल्प

( नृसिंह जयंती )
http://www.ashram.org/Publications/ArticleView/tabid/417/ArticleId/1326/.aspx
भगवान नृसिंह की कथा में तीन प्रतीक मिलते हैं। ये तीन पात्रों से जुड़े हैं – हिरण्यकशिपु अहंकार से भरी बुराई का प्रतीक है, प्रह्लाद विश्वास से भरी भक्ति का प्रतीक है और दुष्ट का वध करने वाले भगवान नृसिंह भक्त के प्रति प्रेम का प्रतीक हैं। अब सवाल यह है कि हम अपने जीवन को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं ? यदि अहंकार और बुराई की ओर ले जायेंगे तो निश्चित ही अंत बुरा है। इसलिए विश्वास से भरे भक्तिरूप प्रह्लाद को जीवन में उतारना होगा। प्रह्लाद से होते हुए आस्था व विश्वास का रास्ता भगवान तक जाता है। विकारों, आसक्तियों को जीतने की शक्ति विश्वास से हो जाती है और दुष्टता का अंत करने का बल पैदा होता है। हिरण्यकशिपु के रूप में यह दुष्टता हमारे अपने मन की है, जिसे अपने भीतर भगवान नृसिंह का आह्वान करके ही दूर किया जा सकता है। 'नृसिंह जयंती' इसी संकल्प का पर्व है।
भक्ति व प्रेम के महान आचार्य देवर्षि नारदजी ने जब सदगुरू के रूप में प्रह्लाद को दीक्षा-शिक्षा दी, तब उसके जीवन में भगवदभक्ति व प्रेम का प्राकट्य हुआ था। अतः इस दिन संकल्प लें कि हम भी किन्हीं हयात ब्रह्मज्ञानी महापुरूष को खोजकर उनसे दीक्षा-शिक्षा ग्रहण करके, उनके बताये हुए मार्ग पर चल के प्रह्लादरूपी दृढ़ भक्ति के द्वारा अपने जीवन में भगवान का अवतरण करेंगे। अहंकार व बुराईरूपी हिरण्यकशिपु का नाश कर अपने हृदय को भगवदभक्ति व संतों के ज्ञान से प्रकाशित करेंगे।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अप्रैल 2011, पृष्ठ संख्या 7, अंक 166
-------------
http://hindi.webdunia.com

नृसिंह जयंती व्रत कथा

प्राचीन काल में कश्यप नामक एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम दिति था। उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम हरिण्याक्ष तथा दूसरे का हिरण्यकशिपु था। हिरण्याक्ष को भगवान श्री विष्णु ने वाराह रूप धरकर तब मार दिया था, जब वह पृथ्वी को पाताल लोक में ले गया था।
इस कारण हिरण्यकशिपु बहुत कुपित हुआ। उसने भाई की मृत्यु (हत्या) का प्रतिशोध लेने के लिए कठिन तपस्या करके ब्रह्माजी व शिवजी को प्रसन्न किया। ब्रह्माजी ने उसे 'अजेय' होने का वरदान दिया। यह वरदान पाकर उसकी मति मलीन हो गई और अहंकार में भरकर वह प्रजा पर अत्याचार करने लगा।
उन्हीं दिनों उसकी पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। धीरे- धीरे प्रह्लाद बड़ा होने लगा। हालाँकि उसने एक राक्षस के घर में जन्म लिया था, किंतु राक्षसों जैसे कोई भी दुर्गुण उसमें नहीं थे। वह भगवान का भक्त था तथा अपने पिता के अत्याचारों का विरोध करता था।
भगवान-भक्ति से प्रह्लाद का मन हटाने और उसमें अपने जैसे दुर्गुण भरने के लिए हिरण्यकशिपु ने बड़ी चालें चलीं, नीति-अनीति सभी का प्रयोग किया किंतु प्रह्लाद अपने मार्ग से न डिगा। अंत में उसने प्रह्लाद की हत्या करने के बहुत से षड्यंत्र रचे मगर वह सभी में असफल रहा। भगवान की कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ।
एक बार हिरण्यकशिपु ने उसे अपनी बहन होलिका (जिसे वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी) की गोद में बैठाकर जिन्दा ही चिता में जलवाने का प्रयास किया, किंतु उसमें होलिका तो जलकर राख हो गई और प्रह्लाद जस का तस रहा। जब हिरण्यकशिपु का हर प्रयास विफल हो गया तो एक दिन क्रोध में आग-बबूला होकर उसने म्यान से तलवार खींच ली और प्रह्लाद से पूछा- 'बता, तेरा भगवान कहाँ है?' 'पिताजी!' विनम्र भाव से प्रह्लाद ने कहा- 'भगवान तो सर्वत्र हैं।' 'क्या तेरा भगवान इस स्तम्भ (खंभे) में भी है?' 'हाँ, इस खंभे में भी हैं।' यह सुनकर क्रोधांध हिरण्यकशिपु ने खंभे पर तलवार से प्रहार कर दिया। तभी खंभे को चीरकर श्री नृसिंह भगवान प्रकट हो गए और हिरण्यकशिपु को पकड़कर अपनी जाँघों पर डालकर उसकी छाती नखों से फाड़ डाली। इसके बाद प्रह्लाद के कहने पर ही भगवान श्री नृसिंह ने उसे मोक्ष प्रदान किया तथा प्रह्लाद की सेवा भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि आज के दिन जो लोग मेरा व्रत करेंगे, वे पाप से मुक्त होकर मेरे परमधाम को प्राप्त होंगे।
वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान श्री नृसिंह ने खंभे को चीरकर भक्त प्रहलाद की रक्षार्थ अवतार लिया था। इसलिए इस दिन उनका जयंती-उत्सव मनाया जाता है। भगवान श्री नृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें