पोस्ट

जुलाई 11, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लौकी जूस पर यह आक्रमण

इमेज
अब लौकी निशाने  पर ...! बहु-राष्ट्रिय  कंम्पनियों का खेल  .....!! - अरविन्द सीसोदिया मेरा निश्चय यह है की वैज्ञानिक की मृत्यु की सही- सही जाँच होनी चाहिए , यह सिर्फ एक दुर्घटना है या कोई षड्यंत्र ..?  यदि   किसी मौषम के  कारण  से बदलाव  हुआ तो उसका कारण भी सामने आना चाहिए ..!! पहली खबर  - राजधानी देहली  के नानकुपरा में रहने वाले सीएसआईआर के वैज्ञानिक सुशील सक्सेना की  कथित तोर   पर लौकी और करेला का मिक्स विषैले जूस पीने से मौत हो गई। सुशील सक्सेना (59) को डायबीटीज थी इसलिए वे रोजाना करेला व लौकी का जूस पीते थे। टीवी पर योग गुरू द्वारा जूस पीने की सलाह पर उन्होंने लौकी का जूस पीना शुरू किया था। उस दिन लौकी का जूस पीते ही उन्हें उलटियां होने लगी थी तब  अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। यहाँ यह तथ्य  ध्यान में रखना चाहिए कि वे काफी समय से यह जूस ले रहे थे ,जो हुआ अचानक हुआ,चार साल से लौकी व करेला का जूस पी रहे थे। फिर दूसरी  खबर - लौकी का जूस पीने से दिल्ली में एक वैज्ञानिक की मृत्यु   से पहले जहां पहले लौकी 40 रुपए प्रतिकिलो बिक रही थी, अब शहर की अलग-अलग सब्जी मंडियों में यह 25 स

जनसंख्या विस्फोट से भी ज्यादा खतरनाक है , जनसंख्या असंतुलन....!

इमेज
जनसंख्या विस्फोट से भी ज्यादा खतरनाक है , जनसंख्या असंतुलन....!  - अरविन्द सिसोदिया         भारत में 1950 के दशक में प्रति महिला बच्चों का औसत छह था.  भारत ने जनसंख्या विस्फोट की समस्या को समझा और जनसंख्या नियंत्रण के सुनियोजित प्रयास करने वाला पहला देश बना. तब से आधी सदी बाद आज भारत में जन्म दर घट के आधी रह गई है, लेकिन देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती, अब भी भारी जनसंख्या ही है. 20 वीं सदी के प्रारम्भ में जन्म दर और मृत्यु दर दोनो अधिक थीं, भारत में 1960 और 1970 के दौरान जनसंख्या विस्फोट हुआ जबकि मृत्यु दर में अचानक कमी आई क्यों कि महा संक्रामक बीमारियों पर काबू पा लिया गया , परन्तु जन्म दर अधिक (उच्च) ही बनी रही। इस अवधि के दौरान, भारत की जनसंख्या जो 1950 में थी उससे दुगुनी हो गई। तब लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि वे अपने परिवार का आकार घटाएं और प्रति महिला 6 बच्चों के स्थान पर दो बच्चों को ही जन्म दे। उस समय एक लोकप्रिय अभियान जैसे कि "हम दो हमारे दो " चलाया गया जिसका उद्देश्य छोटे परिवार की वांछनीयता पर ध्यान केन्द्रित करना था।     मगर इस जनसंख्या नियन्त्रण क