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भारत के काले कानून : राजीव दीक्षित

भारत के काले कानून - राजीव दीक्षित भारत में 1857 के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हुआ करता था वो अंग्रेजी सरकार का सीधा शासन नहीं था | 1857 में एक क्रांति हुई जिसमे इस देश में मौजूद 99 % अंग्रेजों को भारत के लोगों ने चुन चुन के मार डाला था और 1% इसलिए बच गए क्योंकि उन्होंने अपने को बचाने के लिए अपने शरीर को काला रंग लिया था | लोग इतने गुस्से में थे कि उन्हें जहाँ अंग्रेजों के होने की भनक लगती थी तो वहां पहुँच के वो उन्हें काट डालते थे | हमारे देश के इतिहास की किताबों में उस क्रांति को सिपाही विद्रोह के नाम से पढाया जाता है | Mutiny और Revolution में अंतर होता है लेकिन इस क्रांति को विद्रोह के नाम से ही पढाया गया हमारे इतिहास में | 1857 की गर्मी में मेरठ से शुरू हुई ये क्रांति जिसे सैनिकों ने शुरू किया था, लेकिन एक आम आदमी का आन्दोलन बन गया और इसकी आग पुरे देश में फैली और 1 सितम्बर तक पूरा देश अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया था | भारत अंग्रेजों और अंग्रेजी अत्याचार से पूरी तरह मुक्त हो गया था | लेकिन नवम्बर 1857 में इस देश के कुछ गद्दार रजवाड़ों ने अंग्रेजों को वापस बुला

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना

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Charaiveti-Charaiveti (चरैवेति-चरैवेति) चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना । नहीं रुकना, नहीं थकना, सतत चलना सतत चलना । यही तो मंत्र है अपना, शुभंकर मंत्र है अपना ॥ध्रु॥                     हमारी प्रेरणा भास्कर, है जिनका रथ सतत चलता ।                     युगों से कार्यरत है जो, सनातन है प्रबल ऊर्जा ।                     गति मेरा धरम है जो, भ्रमण करना भ्रमण करना ।                     यही तो मंत्र है अपना, शुभंकर मंत्र है अपना ॥१॥ हमारी प्रेरणा माधव, है जिनके मार्ग पर चलना । सभी हिन्दू सहोदर हैं, ये जन-जन को सभी कहना । स्मरण उनका करेंगे और, समय दे अधिक जीवन का । यही तो मंत्र है अपना, शुभंकर मंत्र है अपना ॥२॥                     हमारी प्रेरणा भारत, है भूमि की करें पूजा ।                     सुजल-सुफला सदा स्नेहा, यही तो रूप है उसका ।                     जिएं माता के कारण हम, करें जीवन सफल अपना ।                     यही तो मंत्र है अपना, शुभंकर मंत्र है अपना ॥३॥ चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना । नहीं रुकना, नहीं थकना, सतत चलना सतत चलना । यही तो

आरती : ओम जय जगदीश हरे

ओम जय जगदीश हरे http://hi.wikipedia.org मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से इस देश के हिन्दू-सनातन धर्मावलंवी के घरों और मंदिरों में गूंजनेवाले भजनों में प्रमुख है, इसे विष्णु की आरती कहते हैं। हिन्दुओं का मानना है- हजारों साल पूर्व हुए हमारे ज्ञात-अज्ञात ऋषियों ने परमात्मा की प्रार्थना के लिए जो भी श्लोक और भक्ति गीत रचे, ओम जय जगदीश की आरती की भक्ति रस धारा ने उन सभी को अपने अंदर समाहित सा कर लिया है। यह एक आरती संस्कृत के हजारों श्लोकों, स्तोत्रों और मंत्रों का निचोड़ है। लेकिन इस अमर भक्ति-गीत और आरती के रचयिता पं. श्रद्धाराम शर्मा के बारे में कोई नहीं जानता और न किसी ने उनके बारे में जानने की कोशिश की। रचयिता मुख्य लेख : पं॰ श्रद्धाराम शर्मा ओम जय जगदीश की आरती के रचयिता थे पं॰ श्रद्धाराम शर्मा। उनका जन्म 1837 में पंजाब के लुधियाना के पास फिल्लौर में हुआ था। उनके पिता जयदयालु खुद एक ज्योतिषी थे। बताया जाता है कि उन्होंने अपने बेटे का भविष्य पढ़ लिया था और भविष्यवाणी की थी कि यह एक अद्भुत बालक होगा। बालक श्रद्धाराम को बचपन से ही धार्मिक संस्कार तो विरासत में ही मिले थे। उन्होंने बचपन