रविवार, 15 अगस्त 2010

अखंड भारत कि पहली पायदान

देश का विभाजन तो जाना ही चाहिए
अखंड भारत कि पहली पायदान
- अरविन्द सीसोदिया

यह सच मानना ही होगा कि १४-१५ अगस्त १९४७ को, भारत का विभाजन हुआ और खण्डित भारत के  रूप में हम आजाद हुए | यह तिथि " श्री अरविन्द " की जन्म तिथी भी है, वे १५ अगस्त १८७२ में कलकत्ते  में जन्में थे तथा १५ अगस्त १९४७ में भी भारत स्वतंत्रता पर अपनी प्रतिक्रिया देने उपलब्ध  थे | उन्होंने कहा था " भारत स्वाधीन हो गया पर उसने एकता उपलब्ध नहीं की , केवल  एक विभाजित और भग्न स्वाधीनता ही प्राप्त की है | " उन्होंने तब यह भी कहा था " ऐसी आशा की जनीं चाहिए कि कांग्रेस और राष्ट्र इस तय किये गए तथ्य को हमेशा के लिए तय हुए जैसा नहीं मानेंगे अथवा एक अस्थायी कार्य - साधक से ज्यादा और कुछ भी नहीं मानेंगे | " आगे वे चेतावनी देते हुए कहते हैं " यदि यह ( विभाजन ) बना रहता है तो भारत गंभीर रूप से निर्बल , यहाँ तक कि पंगु भी हो सकता है, गृह संघर्ष की संभावना सदा बनी  रहे सकती है | यहाँ तक कि एक नया आक्रमण और विदेशी विजय भी संभव हो सकती है | देश का  विभाजन तो जाना ही चाहिए |  " श्री अरविन्द कि भविष्यवाणीं  सत्य सावित हुई , पाकिस्तानी फोजों नें कवाईलीवेष में अक्टूवर १९४७ में भारत पर हमला बोल दिया और बहुत बड़ा भू भाग उसके कब्जे में आज तक है , १९६२ में चीन का आक्रमण हुआ और हम हारे | नक्सलवादी और आतंकवादी हमले यह बता रहे हैं , आतंरिक गृह  युध आ रहा है | उनकी तीनों बातें सत्य हो रहीं हें , मगर भारत सरकार ध्यान देने को तैयार ही नही है | 
यहाँ पंडित प्रदीप की यह पंत्तियां प्रासंगिक हैं -      
पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के |
अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के |
मंजिल पे आया मुल्क हर बला को टाल के |
सदियों के बाद फ़िर उड़े बादल गुलाल के |
हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के |
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के |
 - यह  समय कोई आलोचना का नहीं है एक देश भक्त के बहुत थोड़े विचार बहुत अधिक कह देते हैं , पाकिस्तान से आये शरणार्थियों में से एक सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता  मनोज कुमार भी हैं , वे  उन चंद हज़ार लोगों में से थे  जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू को स्वतंत्र भारत का पहली वार , लाल किले पर झंडा फ़हराते देखा था, तब वे १० साल की उम्र के थे तथा देहली में शरणार्थियों के लिए बने एक कैंप में रहते थे,उन पर इस समारोह कि इतना गहरा आसर हुआ की जैसे ही उन्हें अवसर मिला उन्होंने कई देश भक्ति फ़िल्में बनानी , उनका नाम ही  मनोजकुमार से ‘भारतकुमार’ हो गया था | उन्होना आजादी के संदर्भ में विचार व्यक्त करते हुए कहा है  "ये जोश शायद ही अब कहीं बचा हो. आज़ादी एक पवित्र चीज़ है जो बड़ी कुर्बानियों के बाद हमें मिली.लेकिन हमारी हुकूमत ने उसकी क़द्र नहीं की. उन्होंने कद्र नहीं की  तो आवाम़ ने भी नहीं की.मुझे जब भी मौका मिला फ़िल्मों के ज़रिए मैंने लोगों में ये जोश भरने की कोशिश की | " कुल मिला का देश को  भारत बनाने वाले शासक नही मिले...!! एनिया की भटकन ने देश का बेडा गर्क कर दल ...!!! प्रधानमंत्री को ग्रोथ देखनी है तो गरीवी की ग्रोथ देखें ...!!!

आराम की तुम भूल-भुलैया में न भूलो |
सपनों के हिंडोलों में मगन हो के न झूलो |
अब वक़्त आ गया मेरे हंसते हुए फूलों |
उठो छलांग मार के आकाश को छू लो |
तुम गाड़ दो गगन में तिरंगा उछाल के |
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के |
 भारत कोई दिन - दो दिन  का देश नही है, यह देशों से भी ऊपर जो संस्कृति  होती है वह है   तथा संस्कृति को भी अनेकों वार जन्म  देने के  सामर्थ्य से पूर्ण मानव सभ्यता की उदघाटित करने वाली भारत माता  है, जनक है | सागर भी कितना ही टूटे , घुटे घुटे फिर भी रहता है , इसलिए भारत हमेशा था , हमेशा ही रहा और हमेशा ही रहेगा..! मगर हमारी  जागरूकता से | आदिकाल से हमने विश्व को नेतृत्व  दिया है आगे भी हम  ही नेतृत्व देने वाले हैं , विश्व में सुख , शांती से वैभव के  सूत्र हमारे ही यहाँ है, जो शांती के साथ जीवन देता है | समय कालीन अंधकार कोई पहली वार नहीं हैं , इस तरह के अनेकानेक  अवसर आये और परास्त भी हुए, जिस सांस्कृतिक धारा से हमनें भीषणतम दुर्दिनों को पराजित किया है , उसको   तेजस्वी बनाये रखना ही हमारा प्रथम उद्देश्य होना चाहिए |
अभी अपूण है .....
   

1 टिप्पणी:

  1. Hello Sisodia ji
    Mujhe hindi typing nahi aati isliye english main likh rahi hoon. Apne jo bhi jankarian di hain main unkayliye abhari hoon. Yah karya aage bhi jari rakhiye. Thanx, Mujhe bahut khushi hoti hain jab main aise kisi karya ko dekhti hoon. Yahi samay hai jab hamey jag jana chahiye.

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