शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नीरा कि जवानी,सारे भरते पानी ...!







- अरविन्द सीसोदिया 
नीरा कि जवानी, 
सारे  भरते पानी ...
पूंजीपतियों कि शैतानी...
सरकार करे गुलामी...
शरमाते महात्मा गांधी...!
        *****१ ***** 
भ्रष्टाचार की गंगा, 
ऊपर से नीचे आती..
सबसे ऊपर सोनिया जी 
उनके नीचे मनमोहन जी 
नीचे नीचे आते हैं पटवारी जी
    ***** २  ***** 
गये साल तो नीरा ने किये थे तमाम इंतजाम ..
अब तो वो कर नहीं सकती मगर याद आती ...
राजा का बजा बाजा , टाटा का हुआ भाटा .. 
किश्मत भी खूब खेल खिलती ....
***** ३  *****
सामने आई मीडिया कि कहानी
बिकाऊ मण्डी बन गये अखबारी 
दलालों की सामने दलाली 
शर्म  फिर भी नहीं आती....!!


 

दिल्ली बदनाम हुई .., खूब बदनाम हुई .., कांग्रेस तेरे राज में ......



- अरविन्द सीसोदिया 
यह अंग्रेजी साल का अंतिम दिन है , मगर इसका कोई अर्थ नहीं है क्यों कि हम बजट में साल १ अप्रेल से प्रारंभ करते हैं और हमारा अपना वर्ष चैत्र सुदी एकम से प्रारंभ होता है !! खै सन के रूपमें हम इसे विदा कर रहे हैं और अखबार साल के किस्से छाप  रहे हैं कौन कितना बदनाम हुआ या कौन कितना मशहूर हुआ !! कौन खास रहा और खासियत से गिर गया !! घोटालों गिनाने की जरुरत नहीं है..आप सब जानते हैं रोज चर्चा में हैं ....
दिल्ली इसलिए भी बदनाम हुई की प्रधानमंत्री तो रिवोट प्रधानमंत्री थे ही मगर ...भारत के राष्ट्रपति से करवाई गईं दो नियुक्तियां भी सरकार के नैतिक पतन के बखेड़े  की लिस्ट को लंबा करते हैं ..!
में राजनीति कि कुछ समझ रखता हूँ .., 
मेरी दृष्टि में दिल्ली का नैतिक पतन अवश्य इस साल में सन में सबसे विचारणीय  प्रश्न  है!
* इटली के लोग भारतीय नैतिकताओं को नहीं समझ सकते..ठीक हे  !!
* ...मगर जिम्मेवार पदों पर तो भारतीय ही हैं...? 
* वे क्यों यह नहीं समझते या समझाते की इतिहास सब कुछ याद रखता है !!
* प्रणव  दा या मनमोहन सिंह को यह याद क्यों नहीं है कि बोफोर्स घोटाले के बाद आज तक कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है ????
---- देश में २०१० में जो महंगाई और भ्रष्टाचार के हालत हैं उन्होंने दिल्ली को शर्मसार किया है !!
---- दिल्ली के शर्मसार होने का मतलब यही है की केंद्र की सरकार की लगाम थामें सोनिया जी ...!!!! प्रधानमंत्री के पद पर आसीन मनमोहन सिंह , सम्पूर्ण केन्द्रीय केबीनेट...., सभी ने भ्रष्टाचार और महंगाई के मामलें में खूब डुबोया !
---- कांग्रेस के मुख्यमंत्रीयों ने भी खूब डुबाया !!


बची खुझी इज्जत नियुक्तियों में भी डुबाई...... , 
राष्ट्रपती से हुई दो नियुक्तियां ......
* भ्रष्ट अफसर ईसाई पी जे थामस  जो २- जी घोटाले में भी सम्बद्ध है को केन्द्रीय सतर्कता अयोग़ (सी वी सी )संभालाया 
केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त (सीवीसी) पी.जे . थॉमस की नियुक्ति से संबंधित दस्तावेज पर असंतुष्टि जताते हुए सीवीसी और केन्द्र सरकार को नोटिस भेजा है। कोर्ट ने पूछा है कि क्यों न थॉमस की नियुक्ति रद्द कर दी जाए। कोर्ट ने इस बारे में 4 सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी 2011 को होगी।
भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी) संभालाया 
१-  सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश वी.आर. कृष्ण अय्यर ने सोमवार को उठाया था और मानवाधिकार आयोग के मौजूदा अध्यक्ष बालाकृष्णन के खिलाफ भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों की छानबीन की मांग की थी। केरल उच्च न्यायालय के वकील इस बात को लेकर अचरज में हैं कि पेशे से वकील श्रीनिजिन ने इतने बड़े पैमाने पर संपत्ति कैसे जुटा ली।
----वर्ष 1980 में सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त हो चुके पूर्व न्यायाधीश अय्यर ने कहा, "पूर्व प्रधान न्यायाधीश के दामाद, उनकी पुत्री और रिश्तेदारों के बारे में रिपोर्ट में जो बताया गया है, उनकी जांच होनी है।"पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि बालाकृष्णन मामले की जांच तीन न्यायाधीशों की जांच समिति से कराई जानी चाहिए।उल्लेखनीय है कि जनवरी 2007 से मई 2010 के बीच बालाकृष्णन भारत के प्रधान न्यायाधीश थे। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया।
२- इससे पूर्व ए राजा द्वारा धमकाए गये न्यायाधीस का मामला अनसुना करने का उन पर आरोप है |
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एचएल गोखले ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस केजी बालाकृष्णन की उस बात का खंडन किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस रघुपति का कोई ख़त नहीं मिला जिसमें पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए राजा का ज़िक्र रहा हो। जस्टिस गोखले ने एक बयान में कहा कि मद्रास हाईकोर्ट का चीफ़ जस्टिस होने के नाते उन्होंने ही जस्टिस रघुपति का ख़त जस्टिस बालाकृष्णन को भेजा था जिसमें राजा का ज़िक्र था और जस्टिस बालाकृष्णन की ओर से उन्हें ख़त पाने की जानकारी भी मिल गई थी।

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

१ जनवरी : यह तो अंगेजों का कामकाजी साल है



भारतीय नव वर्ष ही ईश्वरीय है .......
- अरविन्द सीसोदिया 
सामान्यतः सभी धर्मो और पंथों में , मानव आचरण  के दो पहलू  सामनें आते हैं , वे हैं अच्छाई और बुराई ...! इनके पक्ष में चलने वाले क्रमशः अच्छे और बुरे लोग माने जाते हैं ..! जो कुछ ३१ दिसम्बर  की रात  और १ जनवरी के प्रारंभ को लेकर यूरोप - अमेरिका और ईसाई समुदाय सहित अन्य लोग देख देखी करते हैं वह अच्छाई तो नहीं है !!! यथा शराब पीना , अश्लील नाचगाना ,  सामान्य मर्यादाओं को तिलांजली देना  ! होटल , रेस्तरां   और पब में जा कर मौज  मजे के नाम पर जो कुछ होता है !! वह न तो सभ्यता का हिस्सा है और न ही उसे अच्छा होने का सर्टिफिकेट दिया जा सकता है | इसलिए सभ्यातानुकूल यह नया साल नहीं है इसमें सृष्टि जानी या नक्षत्रिय सरोकार भी नहीं है | बल्की यह सामान्यतः  दिन - प्रतिदिन के  क्रिया कलापों  को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया में  निर्मित सत्रारंभ है ! इसकी तुलना कभी भी भारतीय नववर्ष से नहीं की जा सकती , क्यों कि वह ईश्वरीय है , सृष्टिजन्य है ,  नक्षत्रिय  है  इसी कारण सम्पूर्ण हिन्दू समाज में सभी धार्मिक आयोजन , कार्यशुभारंभ महूर्त , मानव जीवन से सम्बद्ध मांगलिक कार्यों को आज भी बड़ी निष्ठा से इन्ही आधार पर आयोजित किया जाता है |
भारतीय काल गणना का प्रारंभ वर्ष प्रतिपदा से होता है , यह सामान्यतः मार्च महीने  में आती है , हिन्दू महीनों के अनुसार चैत्र मॉस की एकम से  प्रारंभ होता है | इस दिन जो स्थिति पृथ्वी , सूर्य और आकाशगंगा में बनती है वह खगोलीय और ब्रहमांड के ग्रहों और नक्षत्रों के मिलन से होने के कारण वैज्ञानिक स्वरूप में भी बहुत ही शुद्धता लिया होती है | इसी कारण इसे हिन्दू समाज का विश्वाश प्राप्त है जबकी अंग्रेजी साल को महज तनखाह लेने और लें दें के हिसाब तक ही सीमित रखा  जाता है |
ईश्वरीय सत्य... 
- यह समया स्थिति पृथ्वी पर इस तरह  की होती है कि हर और हर्ष तथा उल्लास का वातावरण होता है | वृक्ष अपने पुराने पत्तों को छोड़ कर नई कोंपलों के साथ नया प्रारंभा  कर रहे होते हैं | इसी तरह से समुद्र से नये कालक्रम के लिए वाष्प बनाना प्रारंभ होती है जो आगे चल कर वर्षा के रूपमें नई फसलों की क्रमिक को क्रमिक करती है |
वैज्ञानिक सत्य ...
- भागवत पुराण और अन्य हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रम्हा जी के द्वारा की गई  सृष्टि  रचना का पहला दिन वर्ष प्रतिपदा है ! यह अवसर १ अरब ९७ करोड़ , ३९ लाख , ४९ हजार और १०९ वर्ष पूर्व आया था तथा वर्शनुक्र्म के रूप में प्रति वर्ष उपस्थित होता है | ....और आश्चर्य यह है कि वैज्ञानिक भी इसी अवधी के आस पास खड़े हैं !!
एतिहासिक तथ्य...
भारत में समय पर विशेसा यादगार को लेकर कई बार संवत प्रारंभ ही और लुप्त हुए ..! पाश्चात्य जगत में भी इस के जन से पूर्व कोई और संवत चलता होगा ....क्यों कि वहां के लोग भी कमसे कम ६००० वर्ष पूर्व की सभ्यता मानते हैं .., हालांकी यह अब वैज्ञानिक तथ्यों से गलत साबित हो गया है | सभ्यताएं तो करोड़ों और अरवों वर्ष पूर्व से हैं समयानुसार परिवर्तन होते रहे हैं , इसकी नियामक प्रकृति की परिवर्तन शीलता रही है ! 
वर्ष प्रतिपदा ... ( चैत्र शुक्ल एकम )
- विक्रमी संवत इसीदिन  से प्रारंभ  होता है ! १ जनवरी २०११ को विक्रम संवत २०६७ है | कलयुग के प्रारंभ को घोतक युगाब्द भी इसीदिन से प्रारंभ  होता है ! १ जनवरी २०११ को युगाब्द संवत ५११२  है | 
- श्री रामचन्द्र जी का राज्याभिषेक  दिवस 
- नवरात्र की स्थापना का पहला दिन 
- सिख परंपरा के द्वितीय  गुरु अंगदेव के प्रगटोत्सव  ! 
- सिन्धी संत झूलेलाल  का जम दिवस 
- राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के संस्थापक डा केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म दिवस
- आर्य समाज का स्थापना दिवस 
- शलिवाहन संवत का प्रारंभ दिवस ......
भारतीय नववर्ष में जो सृष्टि गत  , प्रकृति गत और नक्षत्रिय तथ्यों के साथ साथ वैज्ञानिकता पर पूर्ण है , उसकी एतिहासिक और सांस्क्रतिक स्वरूप में जो मान्यता है वह अंग्रेजी नव वर्ष को कहीं भी प्राप्त नहीं है | इस लिए भारत वासियों को अपने सात्विक और धर्म पूर्ण नव वर्ष ही मानना चाहिए ...! अंग्रेजी नव वर्ष की नशाखोरी और अश्लीलता से बचाना चाहिए !      


   

रविवार, 26 दिसंबर 2010

राम लला हमेशा ही जीतें हैं - उमाशंकर


















- अरविन्द सीसोदिया 
      कोटा राजस्थान में, श्री हनुमत शक्ति जागरण अनुष्ठान समिति कि और से आयोजित धर्म सभा  को संबोधित करते हुए , विश्व हिन्दू  परिषद् के केन्द्रीय मंत्री माननीय उमाशंकर जी ने कहा " राम लला कभी भी हारे नहीं है हमेशह उनकी ही जीत हुई है और आगे भी वे ही जीतेंगे ! क्योंकि वे सत्य हैं ! " उन्होंने कहा " इस सरकार नई मानसिकता का पाता इसी से लगता है कि इन्होने शपथपत्र द्वारा ही राम के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाया और फिर जनशक्ती के प्रतिरोध से घबरा कर वापस भी हुए | "













उन्होंने अपने संबोधन में स्पष्टता  से कहा कि " व्ययालय को २४ सितम्बर को ही निर्णय दे देने  दिया होता तो राम लला के भक्तों को और आनंद  दायक होता " आगे उमाशंकर जी ने कहा " फैसले के  निकट आते ही इस तरह का साम्प्रदायिक  माहौल सरकार और अन्य तरीके से  खड़ा कर दिया गया कि न्यायालय ने धर्म निरपेक्षता के पक्ष में झुकते हुए,  रामजी का पूर्ण पक्ष रोक कर १/३ मस्जिद के पक्ष में बंटवारा करना पड़ा ! "
         उन्होंने कहा " जिस न्यायालय ने दोनों पक्षों की दावेदारी ( पिटीशन ) अस्वीकार करदी और रामलला की ही दावेदारी मानी , उसने जमीन का बंटवारा कैसे कर दिया ? " उमाशंकर जी  ने कहा " ३० तारीख के फैसले में रामलला की जन्मभूमी को प्रमाणित किया है , इससे हिन्दुओं की मांग सही सावित हुई , यह अदालत ने हर तरह के साक्ष्यों के आधार पर निर्णय दिया है| जिस तरह शरीर की चीर फाड़ होती है उसी तरह से जन्म स्थान की खुदाई और राडार परिक्षण के बाद मिले सबूतों ने यह साबित किया है कि इस  स्थान पर हजारों साल पूर्व हिन्दू मंदिर ही था |  "
      उन्होंने अमरीकी अधिकारी के आगे कांग्रेस महासचिव के द्वारा
भगवा आतंकवाद कह कर कदमों में गिडगिडानें  की निंदा क़ी तथा कहा कि  " यह इस दल की मानसिकता को उनके भावी व्यवहार का सूचक है उनका रंग और ढंग सामने आ गया है !"
उमाशंकर जी ने कहा " आज भ्रष्टाचार ने हर क्षैत्र को प्रभावित किया है आकाश में , जमीन में , जमीन के नीचे और हवा में तक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार छाया  हुआ है ! "

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

भारत परमाणु समपन्न महाशक्ति


- अरविन्द सीसोदिया
     भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के ८७वें जन्म दिन ( २५ दिसम्बर २०१० )को भारतीय जनता पार्टी पूरे उत्तर प्रदेश में धूमधाम से मना रही है जिसमें पार्टी के प्रमुख नेता विभिन्न स्थानों पर अटलजी के जन्म दिन के कार्यक्रमों में भाग ले रहे हैं। अटलजी काफी समय से अस्वस्थ  हैं वृद्धवस्था में इस तरह की अस्वस्थता आजाती है सो आश्चर्य भी नहीं है ! सब कुछ समय गति है | 
    अटल जी नें  ही प्रधान मंत्री रहते हुए, भारत को परमाणु शस्त्र समपन्न देश के रूप में गौरवानिवित करवाया , यह उसी करिश्में का फल है कि हाल ही में साल २०१०में विश्व कि सभी परमाणु शक्तियाँ आपके दरवाजे पर नमस्कार करने आईं ..! भारत को एक महा शक्ति के रूप में स्थापित करने का श्रेय सिर्फ और सिर्फ अटल जी को जाता है !!! भगवान उन्हें खुश रखे यही देश इस अवसर पर शुभकामना कर सकता है | उन्होंने भारत माता के एक एसे सपूत का कर्तव्य पूरा किया जो मातृ भूमी को परम वैभव के सिंहासन पर आरुड़ करने के सपने देखता था ...!   
        भारतीय परमाणु आयोग ने पोखरण में अपना पहला भूमिगत परिक्षण १८ मई, १९७४ को किया था। हलाकि उस समय भारत सरकार ने घोषणा की थी कि भारत का परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण कार्यो के लिये होगा और यह परीक्षण भारत को उर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिये किया गया है।
      बाद में ११ और १३ मई, १९९८ को पाँच और भूमिगत परमाणु परीक्षण किये और भारत ने स्वयं को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इनमें ४५ किलोटन का एक तापीय परमाणु उपकरण शामिल था जिसे प्रायः पर हाइड्रोजन बम के नाम से जाना जाता है। ११ मई को हुए परमाणु परीक्षण में १५ किलोटन का विखंडन उपकरण और ०.२ किलोटन का सहायक उपकरण शामिल था। इस परीक्षण के प्रतिक्रिया स्वरुप पाकिस्तान ने भी इसके तुरंत बाद २८ मई, १९९८ को परमाणु परीक्षण किये। पाकिस्तान को स्वयं को परमाणु शक्ति से संपन्न राष्ट्र घोषित करने के बाद उस समय निंदा झेलनी पड़ी जब पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान जो पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं, पर चोरी छुपे परमाणु तकनीक लीबिया, ईरान और उत्तर कोरिया को बेचने का पर्दाफाश हुआ।
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दैनिक भास्कर . कॉम पर पोखरण -२ की पूरी कहानी है ,
शीर्षक - पोखरण-२ सब कुछ जो आप हमेशा जानना चाहते थे
जिसका वेव पाता नीचे दिया गया है
http://www.bhaskar.com/2009/09/08/090908032621_pokharan-2_atom_test.html
Bhaskar News Tuesday, September 08, 2009 03:03 [IST



















ऑपरेशन शक्ति11 मई 1998 : तीन एटमी डिवाइस का परीक्षण




13 मई 1998 : दो एटमी डिवाइस का परीक्षण
सिर्फ इन्हें मालूम थाः
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी, तत्कालीन उपप्रधानमंत्री व गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, तत्कालीन विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा, तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र रक्षा मंत्री को 48 घंटे पहले बताया उस समय के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नाडीज और वित्त मंत्री जसवंत सिंह तक को 48 घंटे पहले बताया गया था।
छद्म नामों में वैज्ञानिक
* परीक्षण में शामिल 80 से ज्यादा वैज्ञानिक एक साथ पोकरण रवाना नहीं हुए।
* बदले नामों से छोटे समूह में भिन्न शहरों में पहुंचे, जहां से वे जैसलमेर के सैन्य ठिकाने तक गए और फिर सेना उन्हें पोकरण ले गई।
* एक समूह काम करके लौटता, तब दूसरा वहां पहुंचता।
* पत्नियों व परिवार के सदस्यों को सेमिनार व सम्मेलनों का कारण बताकर रवाना हुए।
* नामों में कोड के इस्तेमाल से वैज्ञानिक इतने चकरा गए कि वे कहने लगे कि इससे तो भौतिकी के हमारे जटिल समीकरण आसान लगते हैं!
* सारे टेक्निकल स्टाफ ने सैन्य वर्दी पहन ली ताकि अमेरिकी उपग्रह की छवियों में यही नजर आए कि वे परीक्षण स्थल की निगरानी करने वाले सैनिक हैं।
ऐसे दिया था अमेरिका को चकमाः
1995 में तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने परमाणु परीक्षण का फैसला किया था, लेकिन अमेरिकी उपग्रहों ने परीक्षण स्थल की गतिविधियों को देख लिया और अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत सरकार पर दबाव डालकर परीक्षण होने नहीं दिया। इससे सबक लेकर ऑपरेशन शक्ति में सावधानी बरती गई।
* परीक्षण स्थल पर तैयारी का ज्यादातर काम रात में किया गया।
* भारी उपकरण इस्तेमाल के बाद तड़के उसी जगह पर रख दिए जाते ताकि अमेरिकी उपग्रह की छवियों का विश्लेषण करने वाले समझे कि उन उपकरणों को हिलाया ही नहीं गया।
* परमाणु परीक्षण के लिए जमीन में चैंबर तैयार करते समय निकली रेत को रेतीले तूफान में बनने वाले टीलों की शक्ल दी गई।
* परीक्षण स्थल पर पहले ही उपयोग में नहीं लाए जा रहे नौ कुएं ‘नवताल’ मौजूद थे, जिससे खुदाई का काम आसान हो गया।
* चैंबर के लिए खड्ढे खोदने की जगह पर नेट लगाई व उस पर घास-पत्तियां डालकर उसे छिपा दिया गया।
ऐसे रवाना हुए हथियार

* मई : बार्क से कर्नल उमंग कपूर के नेतृत्व में सेना के चार ट्रक इन्हें लेकर सुबह 3:00 बजे मुंबई एअरपोर्ट रवाना हुए।
* पौ फटते ही वायुसेना का एएन-32 परिवहन विमान इन्हें लेकर जैसलमेर के सैन्य ठिकाने की ओर रवाना हुआ।
* जैसलमेर से सेना के चार ट्रक तीन खेपों में परमाणु साधन व अन्य सामग्री पोकरण ले गए।
* सारी चीजें परीक्षण की तैयारी वाली इमारत प्रेयर हॉल में पहुंचाई गईं।
क्या व्हिस्की सर्व करना शुरू किया
जब परमाणु डिवाइस उनके निर्धारित चैंबर में रखे जा रहे थे तो दिल्ली से पूछा गया, क्या सिएरा ने कैंटीन में व्हिस्की सर्व करना शुरू कर दिया है? (क्या परमाणु उपकरण को उसके स्पेशल चैंबर (व्हाइट हाउस, व्हिस्की जिसका कोडनेम था) में रख दिया गया है और क्या वैज्ञानिकों (सिएरा) ने काम शुरू कर दिया है।
थोड़ी देर बाद फिर संदेश आया, क्या चार्ली जू चला गया है और ब्रेवो प्रार्थना में लग गया है?
माइक ऑन। (क्या डीआरडीओ की टीम कंट्रोल रूम (जू) चली गई है और क्या बार्क की टीम प्रेयर हॉल (जहां उपकरणों को असेंबल किया जा रहा था) में चली गई है। सैन्य अभियान के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल वर्मा (माइक) प्रगति जानना चाहते हैं।
ऐसी कूटनीति कि दुनिया को भनक तक न पड़ी
* भारतीय राजनेताओं व कूटनीतिज्ञों ने ऐसे बयान दिए, जिससे लगे कि अपनी एटमी स्थिति को लेकर भारत असमंजस में है और वे भाजपा द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान परमाणु परीक्षण करने के वादे को गंभीरता से न लें।
* रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नाडीज व विदेश सचिव के. रघुनाथ ने अमेरिकी अधिकारियों को बैठकों में बताया कि भारत ने अभी एटमी टेस्ट के बारे में कुछ तय नहीं किया है और इसके लिए 26 मई को राष्ट्रीय सुरक्षा की बैठक बुलाई गई है।
* दोनों ने अमेरिका व विश्व समुदाय को साफ बताया कि भारत अचानक परीक्षण कर चौंकाएगा नहीं।
एटमी साधन पहुंचे अपनी जगह

* ताप नाभिकीय डिवाइस 200 फीट गहराई में एक चैंबर में रखा गया, जिसे व्हाइट हाउस नाम दिया गया था।
* विखंडन अर्थात फिशन आधारित परमाणु बम को 150 फीट गहरे गड्ढे ताज महल में रखा गया।
* एक किलोटन से कम वाले उपकरण को कुंभकरण नामक चैंबर में रखा गया।
* दूसरी सीरीज में टेस्ट किए जाने वाले उपकरणों को जहां रखा गया उन्हें एनटी1 व एनटी2 नाम दिया या।
* 10 मई को परीक्षण के तीनों उपकरण अपने चैंबर में रख दिए गए और इन्हें सील किया गया। अंतिम चैंबर अगले दिन सुबह साढ़े सात बजे सील किया गया। परीक्षण के नियत समय से 90 मिनट पहले सबकुछ तैयार था।
इनका हुआ परीक्षण
शक्ति 1 : यह दो चरण वाला ताप नाभिकीय उपकरण था। 200 किलो टन की ऊर्जा देने में सक्षम इस उपकरण को परीक्षण के लिए 45 टन की क्षमता का बनाया गया था। वास्तव में यह कोई परमाणु हथियार नहीं था। इसे देश की हाइड्रोजन बम क्षमता जांचने और भविष्य में हथियार बनाने के उद्देश्य से आंकड़े इकट्ठे करने के लिए बनाया गया था। 1000 किलो टीएनटी बारूद के विस्फोट जितनी ऊर्जा निकलने की क्षमता को 1 किलोटन कहते हैं।
शक्ति 2 - 15 किलोटन ऊर्जा छोड़ने वाला प्लूटोनियम के विखंडन की प्रक्रिया पर आधारित यह डिवाइस वाकई एक परमाणु हथियार था। इसे बमवर्षक विमान से गिराया अथवा मिसाइल पर लादकर दागा जा सकता था। यह 1974 के पहले परीक्षण में इस्तेमाल डिवाइस का ही परिष्कृत रूप था। परीक्षण से इसमें लाए गए सुधार की पुष्टि हुई।
शक्ति 3 - 0.3 किलोटन का यह डिवाइस यह पता लगाने के लिए बनाया गया था कि रिएक्टर में इस्तेमाल होने वाले प्लूटोनियम से परमाणु हथियार बनाया जा सकता है या नहीं। इसके जरिए परमाणु विस्फोट को नियंत्रित करने और जरूरत पड़ने पर ऊर्जा निकास की मात्रा कम करने की भारत की महारत को प्रदर्शित करना भी था।
शक्ति 4 - 0.5 किलोटन का यह प्रायोगिक उपकरण था। इसके परीक्षण का उद्देश्य आंकड़े इकट्ठा करना और बम के विभिन्न हिस्सों के प्रदर्शन की जांच करना था।
शक्ति 5 - 0.2 किलोटन के इस प्रायोगिक उपकरण में यूरेनियम 233 का इस्तेमाल किया गया, जो प्रकृति में नहीं पाया जाता और थोरियम से चलने वाले देश के फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों में बनता है। इसके जरिए भी आंकड़े इकट्ठे किए गए।
शक्ति 6 - एनटी3 नामक शाफ्ट में एक और कम ऊर्जा वाला नाभिकीय उपकरण रखा गया था, लेकिन पांच धमाकों के बाद परमाणु ऊर्जा आयोग के तत्कालीन प्रमुख आर. चिदंबरम ने कहा कि वांछित आंकड़े उपलब्ध हो गए हैं। इसके परीक्षण की जरूरत नहीं है। उनके शब्द थे, इसे क्यों जाया किया जाए।
और फिर हुए धमाके
* चैबरों को अच्छी तरह सील करने के बाद भी परमाणु विकिरण का खतरा रहता है। अमेरिका में परीक्षण के दौरान ऐसा हो चुका था। इसलिए आबादी की तरफ बह रही हवा के रुख बदलने का इंतजार किया गया।
* तापमान 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका था। फिर दोपहर बाद हवा का बहना लगभग बंद हो गया और परीक्षण करने का निर्णय लिया गया।
* परीक्षण स्थल के इंचार्ज डॉ. संथानम ने उल्टी गिनती शुरू करने की प्रणाली की दो चाबियां सुरक्षा के इंचार्ज डॉ. एम. वासुदेव को दीं। उन्होंने एक-एक चाबी बार्क व डीआरडीओ के प्रतिनिधियों को दी। दोनों ने मिलकर उल्टी गिनती की प्रणाली शुरू की।
* दोपहर बाद 3:45 बजे तीन परमाणु उपकरणों में विस्फोट हो गया।
* धमाके होते ही क्रिकेट के मैदान जितना हिस्सा जमीन से कुछ मीटर ऊपर उछल गया। हवा में धूल व रेत का गुबार छा गया।
* मरु भूमि पर तीन बड़े गड्ढे बन गए।
* दो दिन बाद 13 मई को दोपहर 12:21 बजे दो और उपकरणों में विस्फोट किया गया। इनके कंपनों को भूंकपीय शालाओं में रिकॉर्ड नहीं किया जा सका, क्योंकि ये बहुत कम क्षमता के थे।



















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पाकिस्तान में सब कुछ पहले से चल रहा था ....
       परमाणु हथियारों के विकास के मामले में केवल भारत को ही पाकिस्तान पर शक नहीं था बल्कि इस्लामाबाद में अमरीकी राजदूत ऑर्थर हुमेल ने तत्कालीन तानाशाह ज़िया उल हक को काहुटा परमाणु लेबोरेटरी की सेटेलाइट तस्वीरें दिखाकर पूछा था कि क्या गतिविधियां चल रही हैं. हुमेल के अनुसार ज़िया ने इन आरोपों को बेबुनियाद करार दिया था और प्रस्ताव रखा था कि अमरीकी जांचकर्ता लेबोरेटरी आएं लेकिन पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था.
       आगे चलकर 1979 में जब सोवियत संघ ने अफ़गानिस्तान पर हमला किया तो अमरीका और पाकिस्तान के रिश्तों में नाटकीय बदलाव आया. इसी दौरान अमरीका ने पाकिस्तान को चालीस करोड़ डॉलर की सहायता दी थी जिसे ज़िया उल हक ने ख़ारिज कर दिया था. 1981 में कार्टर की हार हुई और नए राष्ट्रपति बने रोनाल्ड रीगन.

पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार , चुप भारत सरकार

- अरविन्द सीसोदिया
  पाकिस्तान और बांगलादेश सहित दुनिया भर में हिन्दुओं पर होने वाले  अत्याचारों और शोषण के विरुद्ध भारत सरकार का प्रतिक्रिया में उतना उत्साह नहीं होता जिस की आवश्यकता है ! भारत सरकार हमेशा ही इस तरह का रोल अदा करती है जैसे उसे भारत वंशियों से कोई लेने देना ही नहीं है ! ठंडी और आधी अधूरी कोशिशें कभी भी परिणाम प्राप्त नहीं कर पाती  और भारतीयों  या भारतीय मूल और भारतीय पंथों के लोगों का उचित संरक्षण नहीं हो पाता जो कुल मिला कर हिंदुत्व से जुड़े लोगों पर घातक प्रभाव छोड़ रहा है ! भारत सरकार को इस और सही और जबाव देही से कोशिशें करनीं चाहिए आखिर वह ८५ प्रतिशत हिन्दुओं के वोट से ये सरकार   बनती है !  
पाकिस्तान का हालिया घटना क्रम ...
***       इस्लामाबाद.पाकिस्तान में हिंदुओं के धार्मिक नेता लखीचंद गर्जी का अपहरण कर लिया गया है। वे बलूचिस्तान प्रांत के कलात जिले में स्थित काली माता मंदिर से जुड़े हुए हैं। उनके अपहरण की घटना के खिलाफ हिंदू समुदाय के लोगों ने कई जगहों पर प्रदर्शन किए। इस बीच तालिबान द्वारा दो सिखों के अपहरण और उनका सिर धड़ से अलगर करने के बाद एक हिंदू युवक के अपहरण का मामला सामने आया है। अपहरण करने वालों ने फिरौती की रकम के तौर पर एक करोड़ रुपये की मांग की गई है। धर्म गुरु के अपहरण के बाद सड़कों पर विरोध प्रदर्शन
     85 वर्षीय लखीचंद एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए कलात से खुजदार इलाके की ओर जा रहे थे। उनके साथ कुछ और लोग भी थे। अज्ञात सशस्त्र लोगों ने उन्हें रास्ते में रोका और लखीचंद व अन्य लोगों को अगवा कर लिया। हालांकि अपहर्ताओं ने फिरौती की रकम मिलने पर उनमें से एक को छोड़ भी दिया।
      घटना के विरोध में कलात और अन्य स्थानों पर सैकड़ों हिंदुओं ने प्रदर्शन कर सड़कें जाम कर दीं जिसकी वजह से यातायात बाधित हुआ। प्रदर्शनकारी लखीचंद को तुरंत छुड़ाने की मांग कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने बलूचिस्तान के खुजदार, क्वेटा, कलात और नौशकी में अपहरण के विरोध में प्रदर्शन किए और सरकार से लखीचंद की सुरक्षित रिहाई तुरंत करवाई जाए और हिंदू समुदाय को सुरक्षा मुहैया कराई जाए। खुजदार में विरोध कर रहे हिंदुओं को संबोधित करते हुए नंद लाल, राजकुमार और चंदर कुमार ने कहा कि सरकार आम लोगों खासकर अल्पसंख्यकों की ज़िंदगी और उनकी संपत्तियों की सुरक्षा करने में नाकाम रही है। क्वेटा की हिंदू पंचायत ने आर्य समाज मंदिर से एक रैली निकाली। यह रैली जिन्ना रोड, मस्जिद रोड, शाहरा-ए-इकबाल और मन्नान चौक होते हुई गुजरी।
 सिख भी निशाने पर
       पाकिस्तान के कबिलाई इलाके में अगवा किए गए दो सिखों-महल सिंह और जसपाल सिंह की सिर कटी लाश मिलने से पाकिस्तन के अल्पसंख्यक समुदाय में सनसनी फैल गी है। इसके अलावा दो से चार सिख अब भी तालिबान के कब्जे में हैं। पाकिस्तान की अल्पसंख्यक सिख समुदाय ने सिखों के अपहरण और उनकी हत्या की तीखी आलोचना की है।
पहले से हो रहा है हिंदुओं पर अत्याचार
    पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी करीब दो फीसदी है। लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय के साथ बहुसंख्यक अच्छा बर्ताव नहीं करते हैं। कई हिंदू परिवारों को अपना पुश्तैनी घर छोड़ने और मंदिर को तोड़े जाने के फरमान जारी होते रहते हैं। पेशावर जैसे कई शहरों में ऐसे फरमान जारी हो चुके हैं। हिंदु लड़कियों का अपहरण करके उनके साथ जबर्दस्ती शादी करने और धर्म परिवर्तन की कई घटनाएं हो चुकी हैं। यही वजह है कि १९४८ में पाकिस्तान में जहां हिंदुओं की आबादी करीब १८ फीसदी थी, वही अब घटकर करीब दो फीसदी हो गई है।
       पाकिस्तान में तालिबानी कट्टरपंथियों का कहर पिछले कुछ सालों से हिंदू परिवारों पर भी टूट रहा है। हिंदू परिवार ही लड़कियों का अपहरण और उनका जबरन धर्म परिवर्तन अब आम बात हो गई है। सरकारी तंत्र ने भी कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए हैं।
होते रहे हैं अपहरण
      पाकिस्तान के सिंध प्रांत के जैकोबाबाद में रहने वाले एक हिंदू परिवार की लड़की रवीना (16) का तालिबानी आतंकियों ने २००९ में अपहरण कर लिया था। 16 लाख रुपये की फिरौती लेने के बाद आतंकियों ने रवीना को मुक्त किया था। वहीं, कराची में लॉयर टाउन के चक्कीवाड़ा की रहने वाली एक नाबालिग लड़की का दो मुस्लिम युवकों-इकबाल और अरशद ने अपहरण कर लिया। इस पर परिजनों ने पुलिस में मामला दर्ज कराया। पुलिस ने छापा मारकर किशोरी को बरामद कर लिया, लेकिन उसे हवालात में डाल दिया गया। मेडिकल जांच में दुष्कर्म की पुष्टि होने के बावजूद कोर्ट ने एकतरफा फैसला सुनाते हुए मामला खारिज कर दिया। कोर्ट का कहना था कि किशोरी ने इस्लाम स्वीकार कर अरशद से निकाह कर लिया है।
हजारों हिंदू खटखटा रहे हैं भारत का दरवाजा

       एक आकलन के मुताबिक पिछले छह वर्षो में पाकिस्तान के करीब पांच हजार परिवार भारत पहुंच चुके हैं। इनमें से अधिकतर सिंध प्रांत के चावल निर्यातक हैं, जो अपना लाखों का कारोबार छोड़कर भारत पहुंचे हैं, ताकि उनके बच्चे सुरक्षित रह सकें।
          2006 में पहली बार भारत-पाकिस्तान के बीच थार एक्सप्रेस की शुरुआत की गई थी। हफ्ते में एक बार चलनी वाली यह ट्रेन कराची से चलती है भारत में बाड़मेर के मुनाबाओ बॉर्डर से दाखिल होकर जोधपुर तक जाती है। पहले साल में 392 हिंदू इस ट्रेन के जरिए भारत आए। 2007 में यह आंकड़ा बढ़कर 880 हो गया। पिछले साल कुल 1240 पाकिस्तानी हिंदू भारत जबकि इस साल अगस्त तक एक हजार लोग भारत आए और वापस नहीं गए हैं। वह इस उम्मीद में यहां रह रहे हैं कि शायद उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाए, इसलिए वह लगातार अपने वीजा की मियाद बढ़ा रहे हैं।
दैनिक भास्कर.कॉम पर २४ दिसम्बर २०१० को यह खबर प्रमुखता से दी गई है , नीचे वेव का पता है जिस पर अधिक जानकारी मिल सकती है !
पाकिस्तान में हिन्दू  बनें निशाना , काली मंदिर के पुजारी और युवक का अपहरण  
pakistan men hinduon kii durdasha
http://www.bhaskar.com/article/INT-hindu-holy-mans-kidnap-in-pakistan-triggers-protests‎-1686095.html

भाजपा नहीं कांग्रेस देश से माफ़ी मांगे...

- अरविन्द सीसोदिया 
      विपक्ष के लोग इटली से आये हुए नहीं जो कांग्रेस पार्टी और सरकार उसका इतना अपमान करनें में लगे  है ! विपक्ष के लोग इस देश कि अनादी संस्कृती के वंशज हैं जरा यह ध्यान रहे , सरकार और कांग्रेस अपने व्यवहार को लोकतान्त्रिक बनाये , आश्चर्यजन लूट हुई है हिसाब तो देना ही पडेगा ..! इसमें झुन्झलानें से काम थोड़े ही चलता है !
   मुझे कई बार देश के महामहिम मीडिया पर तरस आता है कि उसकी वह वीरता कहाँ खो गई जो देश के स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान मुखर हो कर राष्ट्र स्वाभिमान  के लिए प्रज्वलित थी ! वह रचनात्मक विश्लेष्ण , विचार विनिमय सब कुछ गिरवी थोड़े ही रखा जाता है ! हमने नैतिक मूल्यों  पर हो रहे आक्रमण पर ठोस  प्रहार क्यों नहीं करने चाहिए ..? इसलिए हम कोंन नजर अंदाज करें कि कुछ मीडिया कर्मी इस में शामिल हैं ? मीडिया पर जिस तरह से पूंजीवादियों के सिकंजा कसा है उसे तोड़ कर बाहर आना होगा , मालिक  लोग राष्ट्रहित , सत्य और नैतिकता से खिलवाड़ नहीं कर पायें इस हेतु मीडिया को ही सशक्त होना होगा ! आज  मीडिया को यह पूछना ही चहिये की केंद्र सरकार नैतिकता और मर्यादा कि किसा पायदान पर कड़ी है ? २ जी स्पेक्ट्रम को दबाने के  लिए यदुरप्पा पर आरोप लगादो ..! बस  हो गया सब खत्म ?
१-      २जी स्पेक्ट्रम का मामला , आर्थिक तो है ही , राष्ट्रीय धन की लूट भी है ! मगर सच उससे कडवा है वह यह है कि संसद से बाहरी  ताकतें जो बाजार कहलाती हैं जिन्हें हम सम्मान से उद्योगपति या व्यापारी कहते हैं ..! वे केन्द्रीय  मंत्रिमंडल के गठन को प्रभावित कर रहे थे ..?  मंत्रीमंडल गठन प्रधानमंत्री का स्वअधिकार है वह उनकी इच्छा के विरुद्ध मंत्रियों को थोपा जा रहा था ..? ये विषय लोक लेखा समिति के क्षैत्र से बहार का विषय है , इस पर कैसे जांच करेगी ? कांग्रेस का तर्क पहले दिन से ही गलत है कि यह मात्र घोटाला है ..! सच यह है कि आपने एक विभाग  का सौदा कर अपना समर्थन हांसिल किया है को नैतिक अपराध है ?  इस सौदे के कारण ही उस दल का मंत्री प्रधानमंत्री तक को हडकाता हुआ लिखित पत्र लिख देता है ! विधि मंत्रालय की सलाह नहीं मानता है ! इतना महत्वपूर्ण मामला मंत्री मंडलीय समिति के सामने ही नहीं जाता ! यह घोटाला सीधे तौर पर समर्थन के बदले  पेमेंट का है !!! यह सवाल सम्पूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था  पर कलंक है और प्रश्नचिह है ? जिसको हाल करना है ? जिसे वही फोरम विचार कर सकता है जो विस्तृत विषयों पर व्हिचार के लिए सक्षम हो ..! वह जे पी सी से अधिक उपयुक्त क्या हो सकती है !
२-        प्रणवदा लोकतंत्र  के गलियारों में वर्षों से हैं मगर वे अपने प्रान्त  पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को कभी खड़ा नहीं कर सके ! लोग तो यह भी कहते हैं की वे तभी चुनाव जीतते हैं जब वामपंथी उन पर कृपा करते हैं ! वे अपना अस्तित्व बनाये रखनें के लिए ख़ैर अब वे कह रहे हैं की सरकार जे पी सी की माँग पर बहस करवाने के लिए विशेष सत्र बुलाने तैयार है ? ये क्या मजाक है , जब संसद चल रही थी तब आपने सदन में यह प्रस्ताव रखते और बहस करवा लेते | आप न तो विपक्ष से बात कर रहे न कोई ठीक जांच प्रक्रिया अपना रहे , न ही ठीक से उत्तर दे रहे ! जब भी कोई आपसे चोर कहता तो आप सिर्फ यह कोशिस करते हैं कि हम जैसी बीजेपी है ? इससे अपराध माफ़ थोड़े  ही हो गया ! आपने एक जाच बिठाई उसमें उसे एनडीए के शासन काल से इस लिए बिठाया की विपक्ष दब जाये ..! ये क्या तमासा है ! आपमें दम है तो पूर्व संचार मंत्री सुखराम के समय से जांच बिठाते जिसने कहा था की मेरे पास वरामद  पैसा कांग्रेस का है !  जो करोड़ों रूपये  के साथ पकडे गये थे !
*** सवाल यह है कि आप बार - बार विपक्ष को दबाने का अपराध कर रहे हैं ! पहली क्षमा आपको इस बात के लिए मांगनी चाहिए ! दूसरी क्षमा इस बात के लिए मांगनी चाहिए की जो बात विपक्ष से करनी है सदन से करनी है वह आप लोग बाहरी मंचों पर करते हैं , जिसका सीधा सीधा अर्थ यह है कि देश के साथ आपका संवाद कुछ है और विपक्ष के साथ आपका संवाद है नहीं .. अर्थात यह भी एक प्रकार कि देश से धोका धडी है ! इसे मक्कारी भी कहा जा सकता है !
समाचार चैनल ‘सीएनएन-आईबीएन’ के एक पुरस्कार वितरण समारोह में पहुंचे मुखर्जी ने कार्यक्रम के दौरान कहा, "वे (विपक्ष) यदि बहस सुनिश्चित करें, तो मैं बजट सत्र से संसद का विशेष सत्र बुलाने को तैयार हूं।" कुल मिला कर आपका चल चरित्र और चेहरा भिन्न भिन्न है , इस लिए आप ही गुमराह करने के घेरे में खड़े हैं ! प्रणव दा का यह बयान भी गुमराह करने वाला है !  

अटल जी : जिनके मुखसे बोलती थी, भारत की अंतरात्मा


- अरविन्द सीसोदिया ( कोटा )
      श्री अटल बिहारी वाजपेयी 16 से 31 मई, 1996 और दूसरी बार 19 मार्च, 1998 से 13 मई, 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद वे ऐसे अकेले प्रधानमंत्री रहे हैं जिन्होंने लगातार तीन जनादेशों के जरिए भारत के प्रधानमंत्री पद को सुशोभित किया। श्री वाजपेयी, श्रीमती इन्दिरा गांधी के बाद ऐसे पहले प्रधानमंत्री रहे हैं जिन्होंने निरन्तर चुनावों में विजय दिलाने के लिए अपनी पार्टी का नेतृत्व किया।
       श्री वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर, 1924 को ग्वालियर (मध्यप्रदेश) में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी और माता का नाम श्रीमती कृष्णा देवी है। श्री वाजपेयी के पास 40 वर्षों से अधिक का एक लम्बा संसदीय अनुभव है। वे 1957 से सांसद रहे हैं। वे पांचवी, छठी और सातवीं लोकसभा तथा फिर दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं तेरहवीं और चौदहवीं लोकसभा के लिए चुने गए और सन् 1962 तथा 1986 में राज्यसभा के सदस्य रहे। वे लखनऊ (उत्तरप्रदेश) से लगातार पांच बार लोकसभा सांसद चुने गए। वे ऐसे अकेले सांसद हैं जो अलग-अलग समय पर चार विभिन्न राज्यों-उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश तथा दिल्ली से निर्वाचित हुए हैं।
       वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन जो देश के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न पार्टियों का एक चुनाव-पूर्व गठबन्धन है और जिसे तेरहवीं लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों का पूर्ण समर्थन और सहयोग हासिल है, के नेता चुने गए। श्री वाजपेयी भाजपा संसदीय पार्टी जो बारहवीं लोकसभा की तरह तेरहवीं लोकसभा में भी अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, के निर्वाचित नेता रहे हैं।
      उन्होंने विक्टोरिया (अब लक्ष्मीबाई) कॉलेज, ग्वालियर और डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर (उत्तरप्रदेश) से शिक्षा प्राप्त की। श्री वाजपेयी ने एम.ए. (राजनीति विज्ञान) की डिग्री हासिल की है तथा उन्होंने अनेक साहित्यिक, कलात्मक और वैज्ञानिक उपलब्धियां अर्जित की हैं। उन्होंने राष्ट्रधर्म (हिन्दी मासिक), पांचजन्य (हिन्दी साप्ताहिक) और स्वदेश तथा वीर अर्जुन दैनिक समाचार-पत्रों का संपादन किया। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं-''मेरी संसदीय यात्रा''(चार भागों में); ''मेरी इक्यावन कविताएं''; ''संकल्प काल''; ''शक्ति से शांति'' और ''संसद में चार दशक'' (तीन भागों में भाषण), 1957-95; ''लोकसभा में अटलजी'' (भाषणों का एक संग्रह); ''मृत्यु या हत्या''; ''अमर बलिदान''; ''कैदी कविराज की कुंडलियां''(आपातकाल के दौरान जेल में लिखीं कविताओं का एक संग्रह); ''भारत की विदेश नीति के नये आयाम''(वर्ष 1977 से 1979 के दौरान विदेश मंत्री के रूप में दिए गए भाषणों का एक संग्रह); ''जनसंघ और मुसलमान''; ''संसद में तीन दशक''(हिन्दी) (संसद में दिए गए भाषण 1957-1992-तीन भाग); और ''अमर आग है'' (कविताओं का संग्रह),1994।
      श्री वाजपेयी ने विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया है। वे सन् 1961 से राष्ट्रीय एकता परिषद् के सदस्य रहे हैं। वे कुछ अन्य संगठनों से भी सम्बध्द रहे हैं जैसे-(1) अध्यक्ष, ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एंड असिस्टेंट मास्टर्स एसोसिएशन (1965-70);

(2) पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मारक समिति (1968-84);
(3) दीनदयाल धाम, फराह, मथुरा (उत्तर प्रदेश); और
(4) जन्मभूमि स्मारक समिति, (1969 से)
पूर्ववर्ती जनसंघ के संस्थापक-सदस्य (1951),

अध्यक्ष, भारतीय जनसंघ (1968-73),
जनसंघ संसदीय दल के नेता (1955-77) तथा
जनता पार्टी के संस्थापक-सदस्य (1977-80),
श्री वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष (1980-86) और
भाजपा संसदीय दल के नेता (1980-1984,1986 तथा 1993-1996) रहे। 
वे ग्यारहवीं लोकसभा के पूरे कार्यकाल तक प्रतिपक्ष के नेता रहे।
इससे पहले वे 24 मार्च 1977 से लेकर 28 जुलाई, 1979 तक मोरारजी देसाई सरकार में भारत के विदेश मंत्री रहे।
        पंडित जवाहरलाल नेहरु की शैली के राजनेता के रुप में देश और विदेश में अत्यंत सम्मानित श्री वाजपेयी के प्रधानमंत्री के रुप में 1998-99 के कार्यकाल को ''साहस और दृढ़-विश्वास का एक वर्ष'' के रुप में बताया गया है। इसी अवधि के दौरान भारत ने मई 1998 में पोखरण में कई सफल परमाणु परीक्षण करके चुनिन्दा राष्ट्रों के समूह में स्थान हासिल किया। फरवरी 1999 में पाकिस्तान की बस यात्रा का उपमहाद्वीप की बाकी समस्याओं के समाधान हेतु बातचीत के एक नये युग की शुरुआत करने के लिए व्यापक स्वागत हुआ। भारत की निष्ठा और ईमानदारी ने विश्व समुदाय पर गहरा प्रभाव डाला। बाद में जब मित्रता के इस प्रयास को कारगिल में विश्वासघात में बदल दिया गया, तो भारत भूमि से दुश्मनों को वापिस खदेड़ने में स्थिति को सफलतापूर्वक सम्भालने के लिए भी श्री वाजपेयी की सराहना हुई। श्री वाजपेयी के 1998-99 के कार्यकाल के दौरान ही वैश्विक मन्दी के बाबजूद भारत ने 5.8 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृध्दि दर हासिल की जो पिछले वर्ष से अधिक थी। इसी अवधि के दौरान उच्च कृषि उत्पादन और विदेशी मुद्रा भण्डार जनता की जरुरतों के अनुकूल अग्रगामी अर्थव्यवस्था की सूचक थी। ''हमें तेजी से विकास करना होगा। हमारे पास और कोई दूसरा विकल्प नहीं है'' वाजपेयीजी का नारा रहा है जिसमें विशेषकर गरीब ग्रामीण लोगों को आर्थिक रुप से मजबूत बनाने पर बल दिया गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, सुदृढ़ आधारभूत-ढांचा तैयार करने और मानव विकास कार्यक्रमों को पुनर्जीवित करने हेतु उनकी सरकार द्वारा लिए गये साहसिक निर्णय ने भारत को 21वीं सदी में एक आर्थिक शक्ति बनाने के लिए अगली शताब्दी की चुनौतियों से निपटने हेतु एक मजबूत और आत्म-निर्भर राष्ट्र बनाने के प्रति उनकी सरकार की प्रतिबध्दता को प्रदर्शित किया। 52वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लालकिले की प्राचीर से बोलते हुए उन्होंने कहा था, ''मेरे पास भारत का एक सपना है: एक ऐसा भारत जो भूखमरी और भय से मुक्त हो, एक ऐसा भारत जो निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो।''
         श्री वाजपेयी ने संसद की कई महत्वपूर्ण समितियों में कार्य किया है। वे सरकारी आश्वासन समिति के अध्यक्ष (1966-67); लोक लेखा समिति के अध्यक्ष (1967-70); सामान्य प्रयोजन समिति के सदस्य (1986); सदन समिति के सदस्य और कार्य-संचालन परामर्शदायी समिति, राज्य सभा के सदस्य (1988-90); याचिका समिति, राज्य सभा के अध्यक्ष (1990-91); लोक लेखा समिति, लोक सभा के अध्यक्ष (1991-93); विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष (1993-96) रहे।
श्री वाजपेयी ने स्वतंत्रता संघर्ष में हिस्सा लिया और वे 1942 में जेल गये। उन्हें 1975-77 में आपातकाल के दौरान बन्दी बनाया गया था।
        व्यापक यात्रा कर चुके श्री वाजपेयी अंतर्राष्ट्रीय मामलों, अनुसूचित जातियों के उत्थान, महिलाओं और बच्चों के कल्याण में गहरी रुचि लेते रहे हैं। उनकी कुछ विदेश यात्राओं में ये शामिल हैं- संसदीय सद्भावना मिशन के सदस्य के रुप में पूर्वी अफ्रीका की यात्रा, 1965; आस्ट्रेलिया के लिए संसदीय प्रतिनिधिमंडल 1967; यूरोपियन पार्लियामेंट, 1983; कनाडा 1987; कनाडा में हुई राष्ट्रमंडल संसदीय संघ की बैठकों में भाग लेने हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल 1966 और 1984; जाम्बिया, 1980; इस्ले आफ मैन, 1984; अंतर-संसदीय संघ सम्मेलन, जापान में भाग लेने हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल, 1974; श्रीलंका, 1975; स्वीट्जरलैंड 1984; संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल, 1988, 1990, 1991, 1992, 1993 और 1994; मानवाधिकार आयोग सम्मेलन, जेनेवा में भाग लेने हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता, 1993।
         श्री वाजपेयी को उनकी राष्ट्र की उत्कृष्ट सेवाओं के लिए वर्ष 1992 में पद्म विभूषण दिया गया। उन्हें 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार तथा सर्वोत्तम सांसद के लिए भारत रत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पंत पुरस्कार भी प्रदान किया गया। इससे पहले, वर्ष 1993 में उन्हें कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा फिलॉस्फी की मानद डाक्टरेट उपाधि प्रदान की गई।
         श्री वाजपेयी काव्य के प्रति लगाव और वाक्पटुता के लिए जाने जाते हैं और उनका व्यापक सम्मान किया जाता है। श्री वाजपेयीजी पुस्तकें पढ़ने के बहुत शौकीन हैं। वे भारतीय संगीत और नृत्य में भी काफी रुचि लेते हैं।

तारीखवार अटल जी की राजनातिक यात्रा

अरविन्द सीसोदिया
निम्नलिखित पदों पर आसीन रहे 
1951 - भारतीय जनसंघ के संस्थापक-सदस्य (B.J.S)
1957 - दूसरी लोकसभा के लिए निर्वाचित
1957-77 - भारतीय जनसंघ संसदीय दल के नेता
1962 - राज्यसभा के सदस्य
1966-67 - सरकारी आश्वासन समिति के अध्यक्ष
1967 - चौथी लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (दूसरी बार)
1967-70 - लोक लेखा समिति के अध्यक्ष
1968-73 - भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष
1971 - पांचवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (तीसरी बार)
1977 - छठी लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (चौथी बार)
1977-79 - केन्द्रीय विदेश मंत्री
1977-80 - जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य
1980 - सातवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (पांचवीं बार)
1980-86 - भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष
1980-84, 1986 और 1993-96 - भाजपा संसदीय दल के नेता
1986 - राज्यसभा के सदस्य; सामान्य प्रयोजन समिति के सदस्य
1988-90 - आवास समिति के सदस्य; कार्य-संचालन सलाहकार समिति के सदस्य
1990-91 - याचिका समिति के अध्यक्ष
1991 - दसवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (छठी बार)
1991-93 - लोकलेखा समिति के अध्यक्ष
1993-96 - विदेश मामलों सम्बन्धी समिति के अध्यक्ष; लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता
1996 - ग्यारहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (सातवीं बार)
16 मई 1996 - 31 मई 1996 - तक-भारत के प्रधानमंत्री; विदेश मंत्री और इन मंत्रालयों/विभागों के प्रभारी मंत्री-रसायन तथा उर्वरक; नागरिक आपूर्ति, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण; कोयला; वाणिज्य; संचार; पर्यावरण और वन; खाद्य प्रसंस्करण उद्योग; मानव संसाधन विकास; श्रम; खान; गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत; लोक शिकायत एवं पेंशन; पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस; योजना तथा कार्यक्रम कार्यान्वयन; विद्युत; रेलवे, ग्रामीण क्षेत्र और रोजगार; विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी; इस्पात; भूतल परिवहन; कपड़ा; जल संसाधन; परमाणु ऊर्जा; इलेक्ट्रॉनिक्स; जम्मू व कश्मीर मामले; समुन्द्री विकास; अंतरिक्ष और किसी अन्य केबिनेट मंत्री को आबंटित न किए गए अन्य विषय।
1996-97 - प्रतिपक्ष के नेता, लोकसभा
1997-98 - अध्यक्ष, विदेश मामलों सम्बन्धी समिति
1998 - बारहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (आठवीं बार)
1998-99 - भारत के प्रधानमंत्री; विदेश मंत्री; किसी मंत्री को विशिष्ट रूप से आबंटित न किए गए मंत्रालयों/विभागों का भी प्रभार
1999 - तेरहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (नौवीं बार)
13 अक्तूबर 1999 से 13 मई 2004 - तक-भारत के प्रधानमंत्री और किसी मंत्री को विशिष्ट रूप से आबंटित न किए गए मंत्रालयों/विभागों का भी प्रभार
2004 - चौदहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (दसवीं बार)

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

अटल जी : आज़ादी अभी अधूरी है...

कवि ह्रदय अटलबिहारी वाजपेयी
- अरविन्द सीसोदिया
    आज यदि अटल जी स्वस्थ होते तो विपक्ष की धर न केवल तेज होती बल्की अभी तक तूफ़ान भारतीय राजनीति में आ गया होता , जिन्दा कौमें पांच साल तक शोषण सहन नही सहती !! शयद वे इस शब्दों में वर्तमान का बयान कर रहे होते ........

सूर्य गिर गया

अन्धकार में ठोकर खाकर
भीख माँगता है
कुबेर झोली फैलाकर
कण कण को मोहताज
कर्ण का देश हो गया
माँ का अँचल द्रुपद सुता
का केश हो गया

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आज़ादी अभी अधूरी है...
पन्द्रह अगस्त का दिन कहता -
आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाक़ी हैं,
रावी की शपथ न पूरी है॥
जिनकी लाशों पर पग धर कर
आजादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश
ग़म की काली बदली छाई॥
कलकत्ते के फुटपाथों पर
जो आंधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के
बारे में क्या कहते हैं॥
हिन्दू के नाते उनका दुख
सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो
सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥
इंसान जहाँ बेचा जाता,
ईमान ख़रीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,
डालर मन में मुस्काता है॥
भूखों को गोली नंगों को
हथियार पिन्हाए जाते हैं।
सूखे कण्ठों से जेहादी
नारे लगवाए जाते हैं॥
लाहौर, कराची, ढाका पर
मातम की है काली छाया।
पख़्तूनों पर, गिलगित पर है
ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥
बस इसीलिए तो कहता हूँ
आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं?
थोड़े दिन की मजबूरी है॥
दिन दूर नहीं खंडित भारत को
पुनः अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक
आजादी पर्व मनाएँगे॥
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से
कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ,
जो खोया उसका ध्यान करें॥
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भारतीयता, राष्ट्रीयता, मानवता, सहृदयता और उदात्तता की भावभूमि पर सर्जना के स्वरों को मुखरित करने वाले पंडित अटल बिहारी वाजपेयी सच्चे अर्थों में वरदायिनी, हंस-सुहाविनी माँ शारदा के वरद पुत्र हैं । उनके अनमोल खजाने का एक मोती :

"टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते ।
सत्य का संघर्ष सत्ता से,
न्याय लड़ता निरंकुशता से,
अंधेरे ने दी चुनौती है,
किरण अंतिम अस्त होती है ।

दीप निष्ठा का लिए निष्कंप,
वज्र टूटे या उठे भूकंप,
यह बराबर का नहीं है युद्ध,
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध,
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज,
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज ।

किन्तु फिर भी जूझने का प्राण,
पुनः अंगद ने बढ़ाया चरण,
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार,
समर्पण की माँग अस्वीकार ।

दांव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते ।
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते ।"

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

आचार्य रजनीश

आचार्य रजनीश (रजनीश चन्द्र मोहन) अर्थात  ओशो के नाम से प्रख्यात हैं जो अपने विवादास्पद नये धार्मिक (आध्यात्मिक) आन्दोलन के लिये मशहूर हुए और भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में रहे। रजनीश ने प्रचलित धर्मों की व्याख्या की तथा प्यार, ध्यान और खुशी को जीवन के प्रमुख मूल्य माना। ओशो रजनीश (११ दिसम्बर, १९३१ - १९ जनवरी १९९०) का जन्म भारत के मध्य प्रदेश राज्य के जबलपुर शहर में हुआ था। भारत व विदेशों में जाकर प्रवचन दिये।
         रजनीश अर्थात ओशो हैं , उनके धरा प्रवाह भाषणों के आधार पर ६५० से भी अधिक पुस्तकें २० भाषाओं में छप चुकी हैं , उनकी एक पुस्तक "भारत : एक अनूठी संपदा " है , उसमें उन्होंने ईसा मसीह के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि ईसा ज्ञान कि प्रकाश भारत से लेकर गए थे और उनकी मृत्यु भी भारत में ही हुई है !
*** अधिक जानकारी के लिए नीचे दी गई वेव पेज को पढ़ें ...
http://arvindsisodiakota.blogspot.com/2010/09/blog-post_28.html

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

टूजी घोटाले की महाभारत : कैग, जेपीसी, पीएसी


- अरविन्द सीसोदिया
कुल मिला कर सोनिया - मनमोहन कहते फिर रहे हैं कि उन पर छुपाने के लिए कुछ नहींहै , मगर हम जांच वह नहीं करवाएंगे जो जनता के बीच तथ्यों को सही ढंग से रख पाए ..! जहाँ झुपाया जा सके और तथ्यों को दफनाया जा सके जांच वहीं करवाएंगे ? मतलव क्या है ?? देश के मालिक तो सोनिया और मनमोहन हो नहीं गये ..!! जे पी सी भी एक व्यवस्था है .., जब आप चोर नहीं हैं तो डर कैसा ..?  
    लोक लेखा समिति (पीएसी) के सामने पेश होने की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पेशकश के बाद भाजपा ने अपनी मांग से पीछे नहीं हटते हुए कहा कि 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले की जांच के लिए सरकार को संयुक्त संसदीय समिति का गठन करना चाहिए. पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि प्रधानमंत्री अगर पीएसी का सामना करने को तैयार हैं तो फ़िर उन्हें जेपीसी से जांच कराने में क्या एतराज है. अगर जांच की आवश्यकता है तो सरकार द्वारा खुद जज तय करना गलत है. 
     उन्होंने कहा कि पीएसी की तरह जेपीसी में कांग्रेस के प्रतिनिधि होंगे. ऐसे में विपक्ष की मांग को मानने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. गडकरी ने कहा, संसदीय समिति होने के कारण पीएसी की सीमाएं हैं, क्योंकि यह कैग की रिपोर्ट के आधार पर जांच करेगी, जबकि जेपीसी के व्यापक अधिकार हैं.
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नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) रिपोर्ट 
       नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा को वर्ष 2008 में नई कंपनियों को 2जी स्पेक्ट्रम आवंटित करने में प्रधानमंत्री, वित्त मंत्रालय और विधि मंत्रालय की सलाह को नजरअंदाज करने का दोषी करार दिया है। संसद के दोनों सदनों में इस मामले में पेश कैग की एक रिपोर्ट के अनुसार, दूरसंचार मंत्री के रूप में ए राजा के इस रवैये से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए के संभावित राजस्व का नुकसान हुआ है।
       रिपोर्ट में कहा गया है कि संचार एवं आईटी मंत्रालय ने कंपनियों को लाइसेंस के लिए आशय पत्र (एलओआई) जारी करने की तारीख को मनमाने तरीके से पहले कर 25 सितंबर, 2007 रख दिया। साथ ही मंत्रालय ने यह भी फैसला कर दिया कि स्पेक्ट्रम आवंटन पहले आओ पहले पाओ (एफसीएफएस) के आधार पर किया जाएगा।
      प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नवंबर, 2007 में दूरसंचार मंत्रालय को पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि इसके लिए पारदर्शी नीलामी प्रक्रिया को अपनाया जाए और स्पेक्ट्रम की कमी तथा अधिक संख्या में आवेदन मिलने के मद्देनजर प्रवेश शुल्क में संशोधन किया जाए।
        कैग ने इस बात का खासकर तौर पर उल्लेख किया है कि विधि मंत्रालय ने बड़ी संख्या में मिले आवेदनों और स्पेक्ट्रम के मूल्य पर विचार करने के लिए मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) के गठन का सुझाव दिया था। पर दूरसंचार मंत्रालय ने उसे खारिज कर दिया।
           दूरसंचार मंत्रालय ने विधि मंत्रालय के सुझाव को खारिज करते हुए कहा था, ईजीओएम के गठन का मामला तब बनेगा, जब नई नीति बनाई जाए। पर इस मामले में यूनिफाइड एक्सेस सर्विस लाइसेंस (यूएएसएल) जारी करने के लिए नई नीति नहीं बनाई जा रही है।
           सरकारी ऑडिटर ने कहा है कि दूरसंचार विभाग के इस तर्क का समर्थन नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट के अनुसार, विधि मंत्रालय की यह सलाह कि इस बारे में ईजीओएम में विचार-विमर्श किया जाना चाहिए, को सिर्फ इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि नीति में बदलाव से मुकदमेबाजी हो सकती है। पर दूरसंचार मंत्रालय का यह तर्क सरकार के कामकाज की प्रक्रिया और केंद्रीय मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी के नजरिए से उचित नहीं बैठती है।
      रिपोर्ट में कहा गया है कि 2007-08 में 122 कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटन तथा 35 दोहरी प्रौद्योगिकी वाली सेवाएं परिचालित करने के लाइसेंस जारी करने के जो मनमाने तरीके अपनाए गए उससे सरकार को अनुमानित 1,76,645 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ। ऑडिटर ने यह अनुमान हाल में सरकार द्वारा की गई 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के मूल्य के आधार पर लगाया है। 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से सरकार को 67,000 करोड़ रुपए का राजस्व हासिल हुआ है।
         कैग ने अपनी इस 77 पृष्ठ की रपट में कहा है कि उसने राजस्व के संभावित नुकसान का आकलन कई संकेतकों के आधार पर किया है। इनमें 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से हुई आमदनी, 2007 में 2जी स्पेक्ट्रम के लिए एक कंपनी की ओर से की गई खुली पेशकश, स्पेक्ट्रम की सीमित उपलब्धता, इसके लिए प्रतिस्पर्धा, कारोबार की योजनाओं, इसकी मांग करने वाली कंपनियों की बड़ी संख्या और इस व्यावसाय के प्रसार की गति के आधार पर लगाया गया है।
     ऑडिटर ने कहा है कि दूरसंचार विभाग (डॉट) द्वारा उस समय के मौजूद ऑपरेटरों को 6.2 मेगाहर्ट्ज की अनुबंधित सीमा से अधिक का स्पेक्ट्रम आवंटन बिना अग्रिम शुल्क लिए किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2007-08 में विभिन्न सर्किलों में जो 157 लाइसेंस जारी किए गए। विभिन्न संकेतकों के आधार पर इन लाइसेंसों का अनुमानित मूल्य 58,000 करोड़ रुपए से 1,52,038 करोड़ रुपए के बीच बैठता है।

      2001 के मूल्य के आधार पर 51 सर्किलों में 13 आपेटरों के पास मौजूद स्पेक्ट्रम का मूल्य 2,561 करोड़ रुपए बैठता है। वहीं 3जी नीलामी जैसे संकेतकों के आधार पर यदि आकलन किया जाए, तो यह 12,000 से 37,000 करोड़ रुपए के बीच बैठता है।

           कैग ने कहा है कि 2008 में 122 में से 85 लाइसेंस ऐसी 13 कंपनियों को जारी किए गए, जो इसके पात्र नहीं थीं। आवेदन के समय ये कंपनियां चुकता पूंजी की अनिवार्यता को पूरा नहीं करती थीं। सरकारी ऑडिटर के अनुसार, इन 85 लाइसेंस में से 45 लाइसेंस ऐसी कंपनियों को जारी किए गए जो मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (एमओए) के मुख्य उद्देश्यों को ही पूरा नहीं करती थीं।
      कैग ने रिलायंस टेलीकम्युनिकेशंस और टाटा टेलीसर्विसेज जैसी प्रमुख दूरसंचार कंपनियों को दिए गए दोहरी प्रौद्योगिकी लाइसेंस की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोहरी प्रौद्योगिकी के लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता तथा ईमानदारी का अभाव था और इसी तरह के अन्य ऑपरेटरों को समान अवसर नहीं उपलब्ध कराए गए। ये ऑपरेटर सिर्फ नीति की औपचारिक घोषणा के बाद ही दोहरी प्रौद्योगिकी के लिए आवेदन कर सकते थे।
      रिपोर्ट में कहा गया है कि दोहरी प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल की मंजूरी 2003 के मंत्रिमंडल के फैसले के खिलाफ थी। ऑडिटर ने कहा कि सामान्य तौर पर मंत्रिमंडल के किसी फैसले से अलग हटकर चलने के लिए भी मंत्रिमंडल की मंजूरी ली जाती है। कैग ने कहा, पर दोहरी प्रौद्योगिकी (सीडीएमए, जीएसएम या कोई अन्य) के इस्तेमाल की अनुमति इस मामले को मंत्रिमंडल के पास भेजे बिना दी गई।
        इस बीच उच्चतम न्यायालय ने टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा के खिलाफ अभियोग चलाने की अनुमति देने की मांग करने वाले आवेदन पर फैसला करने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरफ से काफी विलंब करने को लेकर मंगलवार को कुछ परेशान करने वाले सवाल पूछे।
      न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली की पीठ ने जनता पार्टी अध्यक्ष और पूर्व कानून मंत्री सुब्रहमण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई के दौरान पूछा, क्या अनुमति देने वाला प्राधिकार (इस मामले में प्रधानमंत्री) शिकायत को दबा सकता है।
       पीठ ने सरकार की तरफ से पेश हुए सालीसीटर जनरल गोपाल सुब्रहमण्यम से कहा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुमति देने के लिए निर्धारित की गई तीन महीने की समय सीमा निष्पक्ष और सुशासन के लिए है। पीठ ने कहा कि हम पाते हैं कि अब 16 महीने से अधिक वक्त बीत चुका है। अनुमति देने वाला प्राधिकार कह सकता है कि मैं अनुमति देने को तैयार नहीं हूं, लेकिन हम इस कथित निष्क्रियता और चुप्पी को परेशान करने वाला पाते हैं। उन्होंने कहा कि अनुमति देने वाला प्राधिकार हां या ना कह सकता है।
      पीठ इस बात को लेकर स्पष्ट थी कि मामले में सक्षम प्राधिकार (प्रधानमंत्री) को हवाला मामले से संबंधित विनीत नारायण मामले में सुनाए गए फैसले में निर्धारित किए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार स्वामी की ओर से शिकायत मिलने के तीन महीने के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए थी।

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 ज्‍वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी.
2 स्‍पेक्‍ट्रम आवंटन घोटाले को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस हो रही है. विपक्ष इस घोटाले की जांच जेपीसी से कराना चाहता है तो सरकार कह रही है कि इस घोटाले की पीएसी करने में सक्षम है. तो जानते हैं आखिर क्‍या है जेपीसी?
जेपीसी अंग्रेजी अक्षर के JPC से बना है, जिसका पूरा मतलब होता है. ज्‍वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी. ज्‍वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी संसद की वह समिति जिसमें सभी दलों को समान भागीदारी हो. जेपीसी को यह अधिकार है कि वह किसी भी व्‍यक्ति, संस्‍था या किसी भी उस पक्ष को बुला सकती है जिसको ले‍कर जेपीसी का गठन हुआ है.
अगर वह जेपीसी के समक्ष पेश नहीं होता है तो यह संसद की अवमानना का उल्‍लघंन माना जाएगा. जेपीसी संबंधित व्‍यक्ति या संस्‍था से इस बाबत लिखित या मौखिक जवाब या फिर दोनों मांग सकती है.
भारतीय संसद के इतिहास में अब तक 4 बार जेपीसी का गठन हो चुका है.
१- 6 अगस्‍त 1987 को पहली बार बोफोर्स घोटाले को लेकर पहली बार जेपीसी का गठन हुआ.
२- 6 अगस्‍त 1992 को दूसरी बार तब जेपीसी का गठन हुआ जब हर्षद मेहता का शेयर घोटाले की जांच करनी थी.
३- 26 अप्रैल, 2001 को एक बार फिर शेयर बाजार में हुए घोटाले के कारण जेपीसी का गठन हुआ.
४- अगस्‍त 2003 में चौथी और अंतिम जेपीसी का गठन भारत में बनने वाले सॉफ्ट ड्रिंक्‍स और अन्‍य पेय पदार्थों में कीनटाशक होने की जांच के लिए किया गया था.
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पब्लिक अकाउंट्स कमेटी.
2 स्‍पेक्‍ट्रम आवंटन घोटाले को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस हो रही है. विपक्ष इस घोटाले की जांच जेपीसी से कराना चाहता है तो सरकार कह रही है कि इस घोटाले की पीएसी करने में सक्षम है. तो जानते हैं आखिर क्‍या है पीएसी?
पीएसी अंग्रेजी अक्षर के PAC से बना है, जिसका पूरा मतलब होता है. पब्लिक अकाउंट्स कमेटी. पब्लिक अकाउंट्स कमेटी यानि खर्चे का हिसाब-किताब देखने वाली कमेटी. इस कमिटी का अध्यक्ष विपक्ष का नेता होता है.
पीएसी कैग की रिपोर्ट की जांच करती है. पीएसी द्वारा तैयार की गई सिफारिश को सरकार मानने के लिए बाध्‍य नहीं है. शायद यही कारण है कि विपक्ष पीएसी नहीं जेपीसी की मांग कर रहा है. वैसे भी भाजपा के लिए पीएसी बहुत शुभ नहीं रहा है.
पहले जसवंत सिंह जी इसके अध्यक्ष बने, तो वह अपनी किताब लेकर एक तरफ खड़े हो गए और पार्टी दूसरी तरफ. अंतत: पार्टी से निकाले गए, जो फिर भाजपा में शामिल हो चुके हैं. लेकिन अब मुरली मनोहर जोशी इसके अध्यक्ष हैं, जो सरकार के पीएसी के सुर में सुर मिलाते हुए कह रहे हैं कि 2 जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले की जांच करने के लिए पीएसी सक्षम है.
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संघ ; हिन्दुओं के लिए पोप की तरह पवित्र और आदरणीय

- अरविन्द सीसोदिया 
        बुरारी में हुए कांग्रेस के ८३ वें अधिवेशन से बुराई ही बुराई सामनें आई हैं , पूरा अधिवेशन सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं को कोसनें में ही ब्यतीत किया गया ..! यदी इस समय का उपयोग  रचनात्मक  दृष्टिकोण  से किया होता तो देश को भी और कांग्रेस को भी नया रास्ता मिलता ...! मगर अनुभव हीन और निरंतर राजकाज में अनुतीर्ण हो रही कांग्रेस ने पुराना ढर्रा ही सामने रखा , घरमें बुरे दिन हो तो पडौसी से लड़ने लगो ..! 
      हिन्दू आमतौर पर शांत और अभडकाऊ व्यक्तित्व है , इसी कारण तो :-
१- राम राम जाप कर गांधीजी ने हिंदुओंकी दम पर स्वतंत्रता आन्दोलन चलाया और जब जब हिन्दू हित की बात आई कांग्रेस मुकर गई , देश का विभाजन किसने स्वीकार किया ..? ये दुष्कर्म भाजपा ने तो नहीं किया ..!
२- हिन्दुओं के  आराध्य श्री राम वर्षों तक तालें में बंद रहे , सिखों के पवित्र धर्म स्थल पर आप टैंक लेकर जा पहुंचे..! श्री लंका में वहां कि सिहल उन्हें वैध्य अधिकार भी नहीं दे रहे , उनके साथ दुर्भाग्यतम नाइंसाफी हो रही है , आप शांती सेना के नाम से उन्हें मारने जा पहुचें...?  इस तरह का व्यवहार और किसी पंथ के खिलाफ करके कांग्रेस नहीं दिखा सकती ..!  हिन्दू ही दिखता रहता है जिसपर जो चो वह जुल्म किये जाओ ..! 
३- ईसाईयों की विश्व भर में हजारों संस्थाएं हैं मुख्य केंद्र के रूप में  रोम के राष्ट्राध्यक्ष पोप हैं ! हर धर्म , पंथ , सम्प्रदाय और समाज को अपनी उन्नति और हितों के लिए सामाजिक संस्थाएं बनाने का अधिकार है | उसी तरह हिन्दुओ का सामाजिक संस्था संघ है ..! वह राष्ट्र हित और हिन्दू हित के लिए सेवा रत है ..! इसमें क्या बुराई है ? संघ पर आप तीन वार प्रातिबंध लगा चुके मगर समाज ने उअताना ही उसे स्वीकार किया और समर्थन दिया ..! 
४- इसाई संस्थाएं संचालित हो सकती हैं , इस्लामिक संस्थाएं संचालित हो सकती है , मगर हिन्दू संस्थाएं संचालित नहीं हो सकती ..येशा  क्यों भई? इसाई मिसनारियां जो गैर ईसाईयों का मिसनरी के नाम पर धर्मंतार्ण कर रही हैं , भारत में भी इस कृत्य में अनाप-सनाप धन और मिशनरियां व्यस्त हैं .., उन्हें कोसनें की हिम्मत तो है नहीं ..! येशा ही इस्लाम  और कम्युनिज्म से हो रहा है उसे आप रोक नहीं सकते ..! एक हिन्दू समाज है जिस पर कांग्रेस टूटी  पड़ी  है ..येशा भी क्या ..?

         ईसाईयों नें मुसलमानों के विश्व स्तरीय धर्म गुरु खलीफा के पद को समाप्त करवाया , मगर न तो इस्लाम समाप्त हुआ न ही उनकी एकता को कोई समाप्त कर पाए ..! इसी तरह हिन्दुओं को भी ये षड्यंत्र न तो समाप्त कर सकते और न नुकशान पहुच सकते, बल्की ये हल्के किस्म की बक बक और इस तरह के आक्रमण,  उसे एक जुट करने में सहायक होंगे !

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

डंडा और बेंत : अधिवेशन खिसयाहट

- अरविन्द सीसोदिया
कांग्रेस : मुर्गों को लड़वाओ ; वोट बैंक बनाओ
मुसलमान को डरानें  के लिए हिन्दू का भय खड़ा करना 
कांग्रेस का महा अधिवेशन हुआ , अधिवेशन में अपनी अपनी परिपक्वता पूरी पूरी बघारी जाती है , सो यही यहाँ हुआ ! हम पूरी तरह  योग्य हैं , विपक्ष बेबकूफ है इतना ही नहीं अपराधी भी है... यह साबित करने की कोशिस की गई ... मगर ताज्जुब यह है कि सरकार आपकी है , सीबीई आपकी है अपराधी हैं तो जेल में क्यों नहीं डालते ...! प्रतिबंधित क्यों नहीं करते ! रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाते  , अदालत क्यों नहीं जाते ! मुसलमान अब समझनें लगा है उसनें बिहार में मुस्लिम बहुलता के द्वारा ही सबसे ज्यादा बीजेपी को ही आगे बढाया है ! करारी हर के सामने हुआ यह अधिवेशन खिसयाहट युक्त था |
         यूं तो मुसलमान को डरानें   के लिए हिन्दू का भय खड़ा करना कांग्रेस की पुरानी आदत है | हिन्दू और मुसलमानों में एक न हो जाये यही कोशिस करना कांग्रेस का एजेंडा है ! यही सब कुछ अंग्रेज अपना राज बनाये रखने के लिए करते थे ! राज हम करेंगे तुम डरते और लड़ते रहो ...! बिहार के बाद ये बोखला गये .., मानसिक संतुलन खो बैठे हैं .., अनर्गल कुछ तो भी बके जा रहे हैं ..!
भाषा देखिये :- डंडा और बेंत : कौन है फासिस्ट ..? 
.......भाजपा व संघ के लोगों से डरने की भी जरूरत नहीं है। ये गीदड़ भभकी देते हैं। डंडा लेकर खड़े हो जाइए तो ये भाग जाएंगे नहीं तो ये लोग आपके सिर पर आ बैठेंगे। इसलिए इनका डटकर मुकाबला कीजिए। .
.और उन्होंने आगे बोलते हुए कहा 
'सोनियाजी मंत्रियों को बेंत लगाइए'
दिग्विजय सिंह ने सरकार में शामिल पार्टी के मंत्रियों पर कार्यकर्ताओं के प्रति बेरूखी का आरोप लगाया और पार्टी अध्यक्ष से अपील की कि वह इन अडियल मंत्रियों को बेंत लगाएं। सिंह ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के भाषण में मंत्रियों को दी गई नसीहत पर यह तीखी टिप्पणी की, जो कई मंत्रियों को नागवार गुजरी।

भ्रष्टाचार , महंगाई और निर्धनता के लिए कोरे शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं था !