मंगलवार, 29 मार्च 2011

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह एकमात्र फोटो





झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह एकमात्र फोटो है, जिसे कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन द्वारा 1850 में ही खींचा गया था। यह फोटो अहमदाबाद निवासी चित्रकार अमित अंबालाल के संग्रह में मौजूद है।
आप सभी से निवेदन है की इस चित्र को अपनीं वाल पर साझा करें और अपनें मित्रों से भी साझा करनें को कहें... नेहरुओं/गांधियों के चित्रों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण चित्र है...!!
द्वारा: Sachin Khare

बुधवार, 23 मार्च 2011

संपूर्ण ब्रह्माण्ड ज्ञान से आलोकित : भारतीय नववर्ष : वर्ष प्रतिपदा : मन्वन्तर विज्ञान













- बालमुकुन्द पाण्डेय
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय सह-संगठन मन्त्री हैं)
भारतवर्ष वह पावन भूमि है जिसने संपूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने ज्ञान से आलोकित किया है। इसने जो ज्ञान का निदर्षन प्रस्तुत किया है वह केवल भारतवर्ष में ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्‍व के कल्याण का पोषक है। यहाँ संस्कृति का प्रत्येक पहलू प्रकृति व विज्ञान का ऐसा विलक्षण उदाहरण है जो कहीं और नहीं मिलता। नये वर्ष का आरम्भ अर्थात् भारतीय परम्परा के अनुसार ‘वर्ष प्रतिपदा’ भी एक ऐसा ही विलक्षण उदाहरण है।भारतीय कालगणना के अनुसार इस पृथ्वी के सम्पूर्ण इतिहास की कुंजी मन्वन्तर विज्ञान मे है। इस ग्रह के संपूर्ण इतिहास को 14 भागों अर्थात् मन्वन्तरों में बाँटा गया है। एक मन्वन्तर की आयु 30 करोड़ 67 लाख और 20 हजार वर्ष होती है। इस पृथ्वी का संपूर्ण इतिहास 4 अरब 32 करोड़ वर्ष का है। इसके 6 मन्वन्तर बीत चुके हैं। और सातवाँ वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है। हमारी वर्तमान नवीन सृष्टि 12 करोड़ 5 लाख 33 हजार 1 सौ 4 वर्ष की है। ऐसा युगों की भारतीय कालगणना बताती है। पृथ्वी पर जैव विकास का संपूर्ण काल 4,32,00,00,00 वर्ष है। इसमें बीते 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 1 सौ 11 वर्षों के दीर्घ काल में 6 मन्वन्तर प्रलय, 447 महायुगी खण्ड प्रलय तथा 1341 लघु युग प्रलय हो चुके हैं। पृथ्वी व सूर्य की आयु की अगर हम भारतीय कालगणना देखें तो पृथ्वी की शेष आयु 4 अरब 50 करोड़ 70 लाख 50 हजार 9 सौ वर्ष है तथा पृथ्वी की संपूर्ण आयु 8 अरब 64 करोड़ वर्ष है। सूर्य की शेष आयु 6 अरब 66 करोड़ 70 लाख 50 हजार 9 सौ वर्ष तथा सूर्य की संपूर्ण आयु 12 अरब 96 करोड़ वर्ष है।
विश्व की प्रचलित सभी कालगणनाओं मे भारतीय कालगणना प्राचीनतम है। इसका प्रारंभ पृथ्वी पर आज से प्राय: 198 करोड़ वर्ष पूर्व वर्तमान (तत्कालीन) श्वेत वराह कल्प से होता है। अत: यह कालगणना पृथ्वी पर प्रथम मानवोत्पत्ति से लेकर आज तक के इतिहास को युगात्मक पद्वति से प्रस्तुत करती है। काल की इकाइयों की उत्तरोत्तर वृद्धि और विकास के लिए कालगणना के हिन्दू विषेषज्ञों ने अंतरिक्ष के ग्रहों की स्थिति को आधार मानकर पंचवर्षीय, 12वर्षीय और 60 वर्षीय युगों की प्रारम्भिक इकाइयों का निर्माण किया। भारतीय कालगणना का आरम्भ सूक्ष्मतम् इकाई त्रुटि से होता है। इसके परिमाप के बारे में कहा गया है कि सूई से कमल के पत्ते में छेद करने में जितना समय लगता है वह त्रुटि है। यह परिमाप 1 सेकेन्ड का 33750वां भाग है। इस प्रकार भारतीय कालगणना परमाणु के सूक्ष्मतम इकाई से प्रारम्भ होकर काल की महानतम इकाई महाकल्प तक पहँचती है।
पृथ्वी को प्रभावित करने वाले सातों ग्रह कल्प के प्रारम्भ में एक साथ एक ही अश्विन नक्षत्र में स्थित थे। और इसी नक्षत्र से भारतीय वर्ष प्रतिपदा का प्रारम्भ होता है। अर्थात् प्रत्येक चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथमा को भारतीय नववर्ष प्रारम्भ होता है जो वैज्ञानिक दृष्टि के साथ-साथ सामाजिक व सांस्कृतिक संरचना को प्रस्तुत करता है। भारत में अन्य संवत्सरों का प्रचलन बाद के कालो में प्रारम्भ हुआ जिसमें अधिकांष वर्ष प्रतिपदा को ही प्रारम्भ होते हैं। इनमे विक्रम संवत् महत्वपूर्ण है। इसका आरम्भ कलिसंवत् 3044 से माना जाता है। जिसको इतिहास में सम्राट विक्रमादित्य के द्वारा शुरु किया गया मानते हैं। इसके विषय में अलबरुनी लिखता है कि ”जो लोग विक्रमादित्य के संवत का उपयोग करते हैं वे भारत के दक्षिणी एवं पूर्वी भागो मे बसते हैं।”
इसके अतिरिक्त भगवान श्रीराम का जन्म भी चैत्र शुक्लपक्ष में तथा वरुण देवता (झूलेलाल) का जन्म भारतीय मान्यताओं के अनुसार वर्ष प्रतिपदा को माना जाता है। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती के द्वारा आर्य समाज की स्थापना तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक प.पू.डॉ0 केशव राम बलिराम जी का जन्म 1889 में इसी पावन दिन (वर्ष प्रतिपदा) को हुआ था।
इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी भारतीय नववर्ष उसी नवीनता के साथ देखा जाता है। नये अन्न किसानों के घर में आ जाते हैं, वृक्ष में नये पल्लव यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी अपना स्वरुप नये प्रकार से परिवर्तित कर लेते हैं। होलिका दहन से बीते हुए वर्ष को विदा कहकर नवीन संकल्प के साथ वाणिज्य व विकास की योजनाएं प्रारम्भ हो जाती हैं। वास्तव में परम्परागत रुप से नववर्ष का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही प्रारम्भ होता है।

मंगलवार, 22 मार्च 2011

Amar Shaheed Bhagat Singh


Amar Shaheed Bhagat Singh
Born: September 27, 1907
Martyrdom: March 23, 1931
Achievements: Gave a new direction to revolutionary movement in India, formed 'Naujavan Bharat Sabha' to spread the message of revolution in Punjab, formed 'Hindustan Samajvadi Prajatantra Sangha' along with Chandrasekhar Azad to establish a republic in India, assassinated police official Saunders to avenge the death of Lala Lajpat Rai, dropped bomb in Central Legislative Assembly along with Batukeshwar Dutt.

Bhagat Singh was one of the most prominent faces of Indian freedom struggle. He was a revolutionary ahead of his times. By Revolution he meant that the present order of things, which is based on manifest injustice must change. Bhagat Singh studied the European revolutionary movement and was greatly attracted towards socialism. He realised that the overthrow of British rule should be accompanied by the socialist reconstruction of Indian society and for this political power must be seized by the workers.

Though portrayed as a terrorist by the British, Sardar Bhagat Singh was critical of the individual terrorism which was prevalent among the revolutionary youth of his time and called for mass mobilization. Bhagat Singh gave a new direction to the revolutionary movement in India. He differed from his predecessors on two counts. Firstly, he accepted the logic of atheism and publicly proclaimed it. Secondly, until then revolutionaries had no conception of post-independence society. Their immediate goal was destruction of the British Empire and they had no inclination to work out a political alternative. Bhagat Singh, because of his interest in studying and his keen sense of history gave revolutionary movement a goal beyond the elimination of the British. A clarity of vision and determination of purpose distinguished Bhagat Singh from other leaders of the National Movement. He emerged as the only alternative to Gandhi and the Indian National Congress, especially for the youth.

Bhagat Singh was born in a Sikh family in village Banga in Layalpur district of Punjab (now in Pakistan). He was the third son of Sardar Kishan Singh and Vidyavati. Bhagat Singh's family was actively involved in freedom struggle. His father Kishan Singh and uncle Ajit Singh were members of Ghadr Party founded in the U.S to oust British rule from India. Family atmosphere had a great effect on the mind of young Bhagat Singh and patriotism flowed in his veins from childhood.

While studying at the local D.A.V. School in Lahore, in 1916, young Bhagat Singh came into contact with some well-known political leaders like Lala Lajpat Rai and Ras Bihari Bose. Punjab was politically very charged in those days. In 1919, when Jalianwala Bagh massacre took place, Bhagat Singh was only 12 years old. The massacre deeply disturbed him. On the next day of massacre Bhagat Singh went to Jalianwala Bagh and collected soil from the spot and kept it as a memento for the rest of his life. The massacre strengthened his resolve to drive British out from India.

In response to Mahatma Gandhi's call for non-cooperation against British rule in 1921, Bhagat Singh left his school and actively participated in the movement. In 1922, when Mahatma Gandhi suspended Non-cooperation movement against violence at Chauri-chaura in Gorakhpur, Bhagat was greatly disappointed. His faith in non violence weakened and he came to the conclusion that armed revolution was the only practical way of winning freedom. To continue his studies, Bhagat Singh joined the National College in Lahore, founded by Lala Lajpat Rai. At this college, which was a centre of revolutionary activities, he came into contact with revolutionaries such as Bhagwati Charan, Sukhdev and others.

To avoid early marriage, Bhagat Singh ran away from home and went to Kanpur. Here, he came into contact with a revolutionary named Ganesh Shankar Vidyarthi, and learnt his first lessons as revolutionary. On hearing that his grandmother was ill, Bhagat Singh returned home. He continued his revolutionary activities from his village. He went to Lahore and formed a union of revolutionaries by name 'Naujavan Bharat Sabha'. He started spreading the message of revolution in Punjab. In 1928 he attended a meeting of revolutionaries in Delhi and came into contact with Chandrasekhar Azad. The two formed 'Hindustan Samajvadi Prajatantra Sangha'. Its aim was to establish a republic in India by means of an armed revolution.

In February 1928, a committee from England, called Simon Commission visited India. The purpose of its visit was to decide how much freedom and responsibility could be given to the people of India. But there was no Indian on the committee. This angered Indians and they decided to boycott Simon Commission. While protesting against Simon Commission in Lahore, Lala Lajpat Rai was brutally Lathicharged and later on succumbed to injuries. Bhagat Singh was determined to avenge Lajpat Rai's death by shooting the British official responsible for the killing, Deputy Inspector General Scott. He shot down Assistant Superintendent Saunders instead, mistaking him for Scott. Bhagat Singh had to flee from Lahore to escape death punishment.

Instead of finding the root cause of discontent of Indians, the British government took to more repressive measures. Under the Defense of India Act, it gave more power to the police to arrest persons to stop processions with suspicious movements and actions. The Act brought in the Central Legislative Assembly was defeated by one vote. Even then it was to be passed in the form of an ordinance in the "interest of the public." Bhagat Singh who was in hiding all this while, volunteered to throw a bomb in the Central Legislative Assembly where the meeting to pass the ordinance was being held. It was a carefully laid out plot, not to cause death or injury but to draw the attention of the government, that the modes of its suppression could no more be tolerated. It was decided that Bhagat Singh and Batukeshwar Dutt would court arrest after throwing the bomb.

On April 8, 1929 Bhagat Singh and Batukeshwar Dutt threw bombs in the Central Assembly Hall while the Assembly was in session. The bombs did not hurt anyone. After throwing the bombs, Bhagat Singh and Batukeshwar Dutt, deliberately courted arrest by refusing to run away from the scene. During his trial, Bhagat Singh refused to employ any defence counsel. In jail, he went on hunger strike to protest the inhuman treatment of fellow-political prisoners by jail authorities. On October 7, 1930 Bhagat Singh, Sukh Dev and Raj Guru were awarded death sentence by a special tribunal. Despite great popular pressure and numerous appeals by political leaders of India, Bhagat Singh and his associates were hanged in the early hours of March 23, 1931.
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मनमोहन सिंह से होली खेली नारद जी नें

मनमोहन सिंह की होली ...
- अरविन्द सिसोदिया 
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से होली खेलनें के लिए, नारद जी विशेष  यान से दिल्ली  पहुचे !
साथ में वे बहुत से दुर्लभ रंग भी लाये थे ..!! साथ में संगीत और होली के दुर्लभ गीतों को सुनानें के लिए मण्डली भी लाये थे ! 
मगर ये क्या ....., 
प्रधान मंत्री जी बहुत उदास  बैठे थे ..,
नारद जी को देख वे शिष्टाचार वश उठ कर खड़े हो गए .., सम्मान पूर्वक नारद जी को उच्च - आसन पर बिठाया ..! 
नारद जी ने अन्य बातों के बाद.., गूढ़ दृष्टी जब पी एम् पर डाली .., तो पी एम् ने सभी अन्य को वहां से चले जाने का इशारा करते हुए कहा एकांत..!
एकांत हो गया ...!! 
नारद जी ने कहा - उदासा कैसे हो जी ..
मन मोहन सिंह जी - आपतो जानते ही हैं की सोनिया जी बाहर हैं ...
नारद जी -तो क्या हुआ ....?
मनमोहन सिंह जी -उनकी इच्छा  के बिना में हँस नहीं सकता -  रो नहीं सकता..
प्रभु आपतो सब जानते हैं कि....!!!!!!
नारद जी - चलो हंसनें रोने कि बात छोडो ..रंग तो खेल लें ..यह तो अपनी संस्कृति है..
मनमोहन सिंह जी - आपकी आज्ञा  सर माथे पर .., पर मेरी सुनलें .. बेकार ही एक नई खबर बनेंगी ..
नारद जी - क्यों भई...
मनमोहन सिंह जी -सर आपका एक भी रंग नहीं चढ़ने वाला .. रंगों की  भी बेइज्जती होगी ..! आप के पास भी नकली रंग है यह एक नया मेसेज चला जाएगा ..! लोग  कहेंगे कि भगवान के यहाँ भी नकलची हैं .., नकली रंग बनाते / बेंचते हैं ..!
नारद जी - ऐसा कैसे हो सकता है ..? आप व्यर्थ में ही भ्रम पाल रहे हैं ..! 
मनमोहन सिंह जी -अजी में सही बोल रहा हूँ .., आज कल में ही मिडिया में हूँ , हर  बुरे को मुझ पर ही थोपा  जा रहा है जब की सारे मीडियो को मालूम हे कि बुरे का जिम्मेवार कौन है ......?
नारद जी - अजी बुरे भले को छोडिये .., अपन तो रंग खेलते हैं ...
मनमोहन सिंह जी - अजी छोडिये भी .., सुरेश कलमाडी का रंग , ए रजा का रंग , थामस का रंग , विकिलीक्स का रंग ..., हसन अली का रंग .., अजी देखते जाईये  कि आगे आगे होता क्या है .. की तर्ज पर कौन कौन  से रंग और देखना भाग्य में लिखा है...!!
नारद जी अत्यंत गंभीर हो कर सतर्क भी हो गए ...! अब गंभीरता मनमोहन सिंह के चहरे पर नहीं बल्की नारद जी के चहरे पर थी ..! वे बहुत गंभीरता से बोले - सच है यह पृथ्वी लोक है ..!
और नारद जी उठे और चले  गए.... जाते जाते बुदबुदा रहे थे ....कलमाडी का रंग , राजा का रंग , राडिया का रंग .., महंगाई  का रंग , भ्रष्टाचार का रंग .., विकिलीक्स का रंग .., भुखमरी का रंग .., बेरोजगारी का रंग ...थामस का रंग .. अजी भगवान ने तो सात रंग बनाये थे और नौ रत्न बनाये थे  .. मगर यहाँ तो रंगों के भी रंग है और नौ रत्न तो नौ लखा हैं ........नारद जी भी मनमोहन सिंह की बात मान कर चले गए ..भला भारत की जनता की क्या विसात जो यह उनकी बात नहीं मानें ...सच यही है की हर बदरंग के लिए मनमोहन पर राज करने वाली शक्ती ही तो जिम्मेवार है ..!     

सोमवार, 21 मार्च 2011

कोटि-कोटि श्रद्धांजली , आलोक तोमर



- अरविन्द सिसोदिया
    मेरा मन बहुत ख़राब है , मुझे जब से पता चला की आलोक तोमर नहीं रहे ..., नीरा रडिय के टेपों को सार्वजनिक कर उन्होंने एक भ्रष्ट तम मंत्री ए राजा को न केवल त्याग पत्र  को मजबूर कर दिया बल्की वह भ्रष्टाचारी मंत्री आज जेल में है ....! लोकतंत्र की लूटतंत्र पर एक विजय उनके हाथ से लिखी हुई ..! भगवान भी गजब का बेईमान है ..अच्छे लोगों को पहले ऊपर ले लेते है और बुरे लोगों का साम्राज्य चलने देता है ..? ख़ैर इसमें भी कोई अच्छाई ही होगी ..! हमारी कोटि-कोटि श्रद्धांजली इस निष्पक्ष पत्रकार को , उनकी पत्रकारिता को .....!!  
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धारदार पत्रकारिता की पहचान थे आलोक तोमर
http://www.livehindustan.com-
उनकी कलम जब पन्नों पर चलती तो शब्द एक दुर्लभ लेखन शैली में ढलकर पूरे सच को बयां करते थे। बेबाक और धारधार पत्रकारिता की पहचान रहे आलोक तोमर भलेही सोमवार को पंचतत्व में विलीन हो गए, पर उन्होंने अपने पीछे लेखन का एक अंदाज छोड़ा है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
आलोक तोमर का असमय चले जाना हिंदी पत्रकारिता के लिए दुखद घटना है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के रछेड़ गांव में 27 दिसम्बर, 1960 को जन्मे आलोक तोमर ने राष्ट्रवादी विचारधारा के अखबार ‘स्वदेश’ से अपने करियर की शुरुआत की, पर उन्हें खास पहचान जनसत्ता अखबार ने दिलाई। ‘स्वदेश’ के माध्यम से जहां उन्होंने मध्य प्रदेश प्रशासन की नाकामियों को पूरी बेबाकी से उजागर किया, वहीं जनसत्ता की पत्रकारिता ने उन्हें अपराध, मानवीय और सामाजिक सरोकार वाली संवेदनशील खबरों के जरिए पाठकों के बीच खास पहचान बनाने का मौका दिया।
‘जनसत्ता’ में 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़ी उनकी खबरों में पाठक वर्ग की खास रुचि हुआ करती थी। उन्होंने इन दंगों के स्याह सच को बेपर्द किया। दिल्ली की गलियों और सड़कों पर मौत के मंजर को उन्होंने कलमबद्ध कर प्रशासन की नाकामी का पर्दाफाश किया। इसके अलावा उन्होंने अपराध और सामाजिक सरोकार की कई यादगार खबरें लिखीं जो आज भी यथार्थवादी पत्रकारिता के प्रतिमान हैं।
पाठकों की रुचि और अपनी शर्तो पर पत्रकारिता करने वाले आलोक तोमर एक दुर्लभ लेखन शैली के लिए जाने जाते थे। इसके लिए वे सम्पादक से भी वैचारिक संघर्ष करने से नहीं चूकते। ऐसा ही एक वाकया ‘पायनियर’ साप्ताहिक पत्रिका से जुड़ा है। इस पत्रिका में बतौर ब्यूरो प्रमुख काम करते हुए जब भाषा शैली को लेकर सम्पादक से उनका मतभेद हुआ तो उन्होंने सम्पादक से वैचारिक बहस से परहेज नहीं किया। सम्पादक का तर्क था कि आलोक तोमर वाक्यों में कोमा और अर्धकोमा का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इस पर तोमर का कहना था, ‘स्तरीय भाषा के लिए कोमा और अर्धकोमा का कोटा तय नहीं किया जा सकता। ऐसी पत्रकारिता मुझे पसंद नहीं।’ इस घटना के कुछ दिनों बाद हालांकि तोमर को संस्थान को अलविदा कहना पड़ा था।
‘जनसत्ता’ से पहले उन्होंने यूएनआई समाचार एजेंसी के लिए भी काम किया। उन्होंने टीवी, प्रिंट, वेब, सिनेमा, इंटरटेनमेंट समेत कई क्षेत्रों में रचनात्मक हस्तक्षेप किया। वर्ष 2000 में उन्होंने डेटलाइन इंडिया नामक इंटरनेट न्यूज एजेंसी की स्थापना की और इसके माध्यम से कई क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय अखबारों एवं पत्रिका के लिए पुख्ता समाचार स्रोत की भूमिका निभाई। उन्होंने पायनियर साप्ताहिक और सीनियर इंडिया पत्रिका के लिए भी काम किया।
चर्चित टीवी धारावाहिक ‘जी मंत्री जी’ की पटकथा भी उन्होंने ही लिखी थी, वहीं बेहद लोकप्रिय टीवी गेम शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का स्वरूप तय करने में उन्होंने केंद्रीय भूमिका निभाई। केबीसी-1 के सारे सवाल उनकी टीम तय करती थी। लोगों की जुबां पर चढ़ जाने वाले जुमले ‘कंप्यूटरजी लॉक कर दिया’ को उन्होंने ही गढ़ा था। पिंट्र के अलावा, जी न्यूज, एस 1, आज तक और सीएनईबी जैसे चैनलों में भी काम करते हुए उन्होंने टीवी की भाषा का परिष्कार करने में योगदान दिया।
आज जब सुबह सैकड़ों पत्रकारों की गमगीन उपस्थिति के बीच उनकी बेटी मिष्ठी ने उन्हें मुखाग्नि दी तो सब की प्रतिक्रिया यही थी दूसरा आलोक तोमर शायद इस समाज को मयस्सर नहीं होगा।
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अधिक जाननें और पढ़नें के लिए ......
http://www.datelineindia.com

शहीदे आजम भगत सिंह के प्रेरणा स्त्रोत


 सरदार भगत सिंह के प्रेरणा स्त्रोत 
(शहीदे आजम भगत सिंह विशेषांक, १ नवम्बर २००७ अंक / पाथेय कण ) से
- अरविन्द सिसौदिया 
कभी वो दिन भी आएगा कि आजाद हम होंगे ,
ये अपनी ही जमीन होगी , यह अपना आसमां होगा |
शहीदों कि चिताओं पर , लगेंगे हर बरस मेले ,
वतन पर मरने  वालों  का, यही बांकी निशां होगा |
            ये पंक्तियाँ तो १९३० के दौर की हैं, अगर आज भगत सिंह जीवित होते तो सौ वर्ष से अधिक के होते ...! इतिहास कहता है कि गांधीजी और कांग्रेस चाहती तो ये क्रांतिवीर फांसी से बचाए जा सकते थे और यह भी सच है कि गांधी जी ने क्रांतिवीरों पर हो रहे अंग्रेजी शासन के अत्याचारों पर घोर उपेक्षा बरती | इनके मानवीय अधिकारों के लिए कभी व्रत , भूख हड़ताल , सत्याग्रह आयोजित नहीं किये गए | कलम भी आज यह लिखनें को मजबूर है कि क्रांतिवीरों पर हुए अत्याचारों को गांधी जी और कांग्रेस  की शह थी ...!
            १९४७ से १९६४ तक शासन में रहते हुए पं. नेहरु भगत सिंह और साथी क्रांतिकारियों की समाधी नहीं बना सके , जलियांवाला बाग़ को स्मारक नही बना सके | जिस स्थान पर शहीदों को फांसी लगी थी , उसे पाकिस्तान में संरक्षित नहीं करवाया | लन्दन में इण्डिया हॉउस जो भारतीय क्रांतिकारियों की ऐतिहासिक धरोहर था , नेहरू सरकार के अनिर्णय के कारण अंग्रेजों ने हड़प लिया | जब श्रीमती इंदिरा गांधी शासन में आई , तब उन्होंने उपरोक्त दोनों स्मारक बनवाये | सुभाष की राख तो आज भी गंगा में बहाई जानें की प्रतीक्षा कर रही है | 
            ख़ैर , नेताओं की बात छोड़ कर इस पर विचार करें कि सरदार भगत सिंह कैसे शहीदे-आजम बनें ? किनका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा, कौन उनको प्रेरणा देने वाले थे ..?
वीरों की जननी पंजाब... 
        प्रथम प्रभाव तो पंजाब की भूमि का था, यह भूमि वीरों की जननी थी, यहाँ लाखों वीरों ने जन्म लिया और हजारों ने बलिदान किया | बलिदान भी ऐसा कि दूसरी मिसाल नहीं मिलाती | गुरु अर्जुनदेव जी कि शहादत , गुरु तेगबहादुर जी की शहादत, गुरु गोविन्दसिंह  जी की शहादत, भाई मतिदास जी जिन्हें शत्रुओं  ने आरे से चीरा था , भाई दयाल जी जिन्हें खौलते पानी में बिठा कर शहीद किया था , भाई सतिदासा जी जिन्हें रुई में लपेट कर जिन्दा जलाया  था , ९ वर्ष की आयु के साहिबजादा जोरावर सिंह और ७ वर्ष की आयु के साहिबजादा फ़तेह सिंह जी ; जिन्हें जिन्दा दिवार में चुनवा दिया था |
        शहीद बाबा बंदा बैरागीजी , भाई विचित्र सिंह जी, शहीद तारा सिंह जी , शहीद मनीसिंह जी , शूरवीर शहीद भाई सुखसिंह जी - महताब सिंह जी , शहीद बाबा बोता सिंह जी - गरसा सिंह जी , शहीद भाई सुबेगसिंह जी  - शाहबाज सिंह जी , बुजुर्गवार जनरैल बाबा दीप सिंह जी , कुका आन्दोलन , ग़दर पार्टी , अकाली आन्दोलन , जलियाँवाला बाग़,... किन किन की गिनती करोगे..? पंजाब की जमीन पर वीरों कि संख्या इतनी  है कि गिनती कम पड जाती है | इन्ही में लाला लाजपतराय , शहीद भगत सिंह और शहीद  उधम सिंह भी थे ! स्वामी राम तीर्थ भी थे !
भक्ता का बेटा भगत सिंह...
        भगत सिंह कि माता बहुत धर्म प्रेमी थीं | उन्हें लोग भक्ता के उप नाम से भी पुकारते थे |  उनका जन्‍म 28 सितंबर 1907 में एक देश भक्‍त क्रान्तिकारी परिवार में हुआ था। सही कह गया कि शेर कर घर शेर ही जन्‍म लेता है। वे अक्सर भगत सिंह को बताया करतीं थीं कि एक धोकेबाज के कारण गुरु गोविन्द सिंह जी के ९ वर्षीय पुत्र  साहिबजादा जोरावर सिंह और ७ वर्षीय पुत्र साहिबजादा फ़तेह सिंह जी और माता गूजरी जी को सरहिंद के सूबेदार नबाव वजीर खां ने पकड़ लिया था | वह इन को इस्लाम कबूलवाना चाहता था,तीन दिन उसनें दरबार में इन बालकों को बुला कर यह प्रयास किया | वह जब भी इन बालकों को प्रलोभन देनें या भयभीत करने का प्रयास करता तो ये  दोनों वीर बालक नारा लगते थे :-
" वाहे गुरुजी का खालसा , वाहे गुरुजी की फ़तेह | "
        अंततः खीज कर नबाव ने इन बच्चों को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया था | बाद में बंदा बैरागी नें इस नबाव का वध कर उनका बदला लिया था | भगत सिंह की माँ एक भगति-भाव से परीपूर्ण ही नहीं बल्की पूर्ण वीरता की अवतारी भी थीं .., क्यों कि उनके पति , जेठ  और देवर भी तो क्रांतिवीर थे ..! गुलामी के विरुद्ध संघर्षरत थे ..! 
     भगत सिंह पर माता का बहुत असर था और उन्होंने उस वीरता के इतिहास को दोहरानें की ठानी थी |  इसीलिए केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकते वक्त और अदालतों में मुकदमों की सुनवाई के दौरान और फांसी के फंदे को चूमते वक्त ...; वे इन्कलाब  जिंदाबाद  और साम्राज्यवाद ख़त्म हो ' के नारे , उन्ही वीर बालकों कि तरह लगते थे | उन्हें यह नारा " वाहे गुरुजी का खालसा , वाहे गुरुजी की फ़तेह | " जैसा ही था ..! 
क्रांतिवीर परिवार और परिस्थितियाँ ...
         भगत सिंह पर परिवार के वातावरण का भी असर पड़ा | दादाजी , पिताजी , दोनों चाचा ..सबके सब तेजस्वी और ओजस्वी राष्ट्र धर्मी थे | उनके लिए भी माँतृ भूमी सबसे पहले थी , सारी बातें बाद में थीं | इनसबकी रग-रग में देश के प्रति स्वाभिमान भरा हुआ था |
         किशोर उम्र में भगत सिंह का अम्रतसर जाना हुआ , उन्होंने जलियांवाला बाग़ देखा उसकी मिट्टी कई वर्षों तक अपनें साथ रखी , वह मिटटी प्रेरणा स्त्रोत थी | 
         जब वे नेशनल कालेज में पढ़ते थे; तब पंजाब में अमर शहीद मदनलाल धींगडा ( खत्री परिवार ) के चर्चे थे , धींगडा पंजाब के युवाओं के " हीरो " थे | क्योंकि , धींगडा इंग्लैंड में वीर विनायक दामोदर सावरकर के साथी थे , उन्होंने १ जुलाई १९०९ को ब्रिटिश महा साम्राज्य की राजधानी लन्दन में ही , सेकेट्री आफ स्टेट के सहयोगी सर विलियम कर्जन वायली की " इंस्टीट्युट आफ इम्पीरियल स्टडीज " में गोली मार कर हत्या कर दी | वे भागे नहीं , माईक पर गए , भाषण दिया और गिरिफ्तारी दी | अख़बारों में प्रेस नोट वे पहले ही दे चुके थे जो ' दी डेली न्यूज ' में प्रकाशित भी हुआ | ब्रिटिश अदालत का उन्होंने बहिस्कार किया और उन्हें १७ अगस्त १९०९ को फांसी हो गई | भगत सिंह ने इन सारे प्रयोगों को २० साल बाद पुनः अपनाया और दोहराया |
        हालाँकि यह तथ्य भी है कि भगत सिंह ने पढ़ा था कि फ़्रांसिसी अराजकतावादी वेंला ( वेलीएंट ) ने फ़्रांसीसी असेम्बली में बम फेंक कर एक बयान दिया था | वह बात भी उनके माँ में रही होगी , भारत में अंगेजों के अत्याचारों की जानकारी विश्व भर में फैलाने के लिये इसी तरह का कोई क्रांतिकारी कदम उठाना चाहिए , जो बाद में उनके द्वारा केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंक कर गिरिफ्तारी देनें के रूप में परिणित हुआ |
        भगत सिंह व उनके ज्यादातर साथी गण देश के तत्कालीन राजनैतिक समाचारों पर पैनी नजर रखते थे , वे ज्यादातर महत्वपूर्ण खबरों की कटिंग भी रखते थे | जब दल में समाजवाद , साम्यवाद , प्रजातंत्र पर बहस होती तो अंतिम निर्णय चन्द्रशेखर आजाद , सुखदेव या भगत सिंह यह कह कर देते कि हमारा समाजवाद , साम्यवाद , प्रजातंत्र का अर्थ सिर्फ " देश कि आजादी " है | 
जेल सुधार का संघर्ष.... 
        भगत सिंह ने जेल में पहुँचते ही यूरोपीय कैदियों के समकक्ष खानें , रहनें और एनी सुविधों को दिए जानें का संघर्ष प्रारंम्भ किया | इस हेतु ऐतिहासिक भूख हड़ताल प्रारम्भ कर दी , जिसका समर्थन करते हुए जिन्ना ने यह मामला केन्द्रीय असेम्बली में उठाया तथा मोतीलाल नेहरु स्थगन प्रस्ताव लाये | इसी भूख हड़ताल में बंगाल के जतीन्द्र्नाथ कि मृत्यु हो गई | लाश कलकत्ता पहचानें कि व्यवस्था हेतु ६०० रूपये नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने दिए थे | पूरे रास्ते में इस शहीद का अभूतपूर्व स्वागत हुआ , जब शव कलकत्ता पंहुचा तो ६ लाख से ज्यादा नागरिक अंतिम यात्रा में शामिल हुए | भगत सिंह ने जेल में ११६ दिन भूख हड़ताल का विश्व कीर्तिमान बनाया | इससे पहले आयरलैंड के एक क्रन्तिकारी के नाम ९६ दिन भूख हड़ताल का विश्व कीर्तिमान था ..! भगत सिंह के चाचा अतीत सिंह पर २२ केस लगाये गए थे , इतनें ही केस भगत सिंह पर भी लगाये गए | 
शहीद उधम सिंह की प्रेरणा ...
       उन दिनों जलियाँवाला बाग़ कांड ( १३ अप्रेल १९१९) में अपने माँ बाप की शहादत दे चुका ; तब का बालक उधम सिंह किसी केस में लाहोर सेंट्रल जेल में बंद था, वहां भगत सिंह और उनके बीच जो विचार विमर्श हुआ माना जाता है की वही .., जलियांवाला गोली कांड का आदेश देनें वाले जनरल माइकल ओ डायर की लन्दन में गोली मार कर बदला लेने का कारण बना ..! जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधमसिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते।
भाई परमानन्द और सराबा...
       सरदार भगत सिंह के जीवन पर भाई परमानन्द , शहीद करतार सिंह सराबा तथा स्वातंत्र्यवीर सावरकर का भी गहरा प्रभाव  पड़ा | अमरीका में लाला हरदयाल जी की पहल पर स्थापित ' ग़दर पार्टी ' ने भारत के भारत के क्रांतिकारियों के सहयोग से प्रथम विश्व - युद्ध छिड़ते ही भारत को स्वतंत्र कराने की एक व्यापक योजना बनाई, भारत में रासबिहारी बसु और भाई परमानन्द इसके संचालक थे | योजना के अनुसार बड़ी संख्या में अमरीकी भारतीय भारत में आने लगे | उनमें एक अठारह वर्ष का नौजवान करतार सिंह सराबा भी था | सैनिक छ्वानियों में विप्लव के सन्देश जानें लगे | २१ फरवरी १९१५ को विप्लव का शंखनाद करना तय हुआ |  दुर्भाग्यवश  अंग्रजों के एक गुप्तचर कृपाल सिंह ने ग़दर पार्टी में घुस पैठ कर ली | परिणाम स्वरूप समय से पहले ही इस महती योअजना का पता लग गया तथा धर - पकड़ शुरू हो गई | मुक़दमा शिरू हुआ और ' प्रथम लाहोर षड्यंत्र केस ' के नाम से प्रशिद्ध हुआ |  इसमें इकसठ क्रांतिकारियों पर अभियोग चला , जिनमें से २४ को फांसी तथा २६ को आजन्म कारावास का दंड सुनाया गया |
         भाई परमानन्द की फांसी की सजा बाद में आजीवन कारावास कला पानी में बदल दी गई | १६ अन्य का भी मृत्युदण्ड आजन्म कैद में बदल गया | जिन सात देश भक्तों को फांसी दी गई करतार सिंह सराबा भी थे | १९ वर्ष की आयु में उन्होंने मस्ती के साथ फांसी का फंदा चूमा और स्वंय गले में दल लिया | भगत सिंह उनके इस निर्भीक बलिदान से बड़े प्रभावित थे और 'नौजवान भारत सभा ' में हर साल १६ नवम्बर को करतार सिंह सराबा का शाही दिवस उत्साह से मनाया जाता था | 
        भाई परमानन्द सैट वर्ष अंडमान की सजा भोगनें के बाद रिहा कर दिए गए थे | काले पानी से मुक्ति के बाद वे लाला लाजपत राय द्वारा लाहोर में स्थापित नेशनल कालेज में प्रोफ़ेसर हो गए | मेट्रिक पास न होनें के बाद भी भगत सिंह को ऍफ़ ए ( ११ वीं ) में प्रवेश भाई परमानन्द जी ने ही दीया | शहादत की परम्परा भाई परमानन्द के परिवार में भी मातादीन के समय से थी , जो नवम गुरु तेगबहादुर के साथ औरन्गजेब से मिलनें गए थे और जिन्हें उस क्रूर मुग़ल नें आरे से चिरवाया था | सरदार भगत सिंह भाई जी की देश भक्ति , उनके त्याग , सादगी और विद्वता से बहुत प्रभावित थे |
वीर सावरकर...
         वीर सावरकर का अदभुत ग्रन्थ ' १८५७ का प्रथम भारतीय स्वातंत्र्य समर ' उस समय के क्रांतिकारियों के लिय गीता की तरह था | अंग्रेज सरकार नें इस ग्रन्थ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था , फिर भी भगत सिंह ने इसे खोज कर कई बार पढ़ा , इसके तृतीय संस्करण का प्रकाशन गुप्त रूप से भगत सिंह ने ही करवाया था | तब भगत सिंह ने कानपुर में प्रताप प्रेस में काम करते हुए; अत्यंत गुप्त रीति से तृतीय संस्करण निकला तथा इसकी पहली प्रति राजर्षि पुरुषोतम दास टंडन के पास भिजवाई | भगत सिंह पर सावरकर के जीवट और  लन्दन में किये गए उनके कार्यों से अत्यधिक प्रभावित थे |
अदालत सिर्फ औपचरिकता 
        भगत सिंह और उनके साथी अच्छी तरह जानते थे कि अंग्रेज अदालतें वही फैसला करती हैं , जो अंग्रेज अफसर चाहते हैं , मगर हमें इस परिस्थिति का लाभ उठाना है | इस मंच का उपयोग भी अपनें मिशन को , लक्ष्य को समर्पित करना है | जेल में भी इनकी एक रणनीति कमेटी थी , जिसमें भगत सिंह , विजय कुमार सिन्हा और सुखदेव प्रमुख थे | योजनानुसार अदालत में इस तरह का व्यवहार किया जाता था , जिससे आजादी के आन्दोलन को अधिकतम बल मिले सके |
        लाहौर केस का फैसला ट्रिब्यूनल  ने तय समय के तीन हफ्ते पूर्व ही दे दिया था | भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को फांसी और किशोरी लाल ] महावीर सिंह , विजय कुमार सिन्हा , शिव वर्मा , गया प्रशाद , जयदेव और कमलनाथ तिवारी को आजीवन कारावास की सजा दी गई | कुंदन लाल को ७ साल और प्रेमदत्त को ५ साल की कैद दी गई | 
         मदन मोहन मालवीय उस समय के एक बड़े नेता थे , वाईसराय से उन्होंने तार भेज कर फांसी कि सजा को काम करके आजीवन कारावास में बदलने का आग्रह किया | पूरे देश में इस तरह कि मांग हो रही थी , मगर यह भी सच है कि उस फांसी कि सजा को आजीवन कारावास में बदलनें की मांग को लेकर कांग्रेस ने कोई आन्दोलन नहीं किया था | हालाँकि बाद में बहुत से स्पष्टिकरण दिए गए , मगर देश ने यही माना कि कांग्रेस के प्रयत्न दिखावटी थे,अन्दर कोई और ही बात रही होगी |
आजाद द्वारा बचने की कोशिश 
         जिस समय भगत सिंह जेल में थे ,चन्द्रशेखर आजाद बहुत बेचैन थे | जेल में भगत सिंह के साथ भूख हड़ताल के दौरान बंगाल के साथी जतिन्द्र्नाथ दास कि मृत्यु हो गई थी | अतः लार्ड वायसराय इरविन से प्रतिशोध लेना तय हुआ | लार्ड वायसराय इरविन जिस रेल से दिल्ली लौट रहे थे , उस रेल को २३ दिसंबर १९२९ को यशपाल और उनके साथी ने उदा दिया , तीन डिब्बे क्षति ग्रस्त हुए और एक डिब्बे का तो ढांचा  मात्र बचा था , पटरी भी उड़ गई , मगर वायसराय बच गया | 
       पंजाब के गवर्नर को गोली मरनें का भी तय हुआ | गवर्नर एक विश्व विद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित करने आया था , गोली चली , गवर्नर घायल भी हुआ , क्रन्तिकारी हरिकिशन पकड़ा गया पर उसे फांसी दे दी गई | यह सच है कि भगत सिंह को आजाद करानें के लिए सेनापति आजाद हर हद से गुजर जाना चाहते थे | उन पर सथितों का दबाव था; कि  वे अपना ठिकाना मुम्बई बना लें अथवा विदेश चलें जाएँ अन्यथा वे पकडे गए तो दल के समक्ष नेतृत्व का संकट खड़ा हो जायेगा | मगर वे दिल्ली के निकट ही डटे  रहे | उनका कहना था ' जिस मिट्टी से यह शरीर बना , उसी मिट्टी को उसे लेने का हक़ है , में यहाँ जन्मा हूँ ,यहीं मरुंगा ! '
       चन्द्रशेखर आजाद ,यशपाल और भगवती भाई जेल तोड़ कर अपने साथियों को बहार लानें कीई एक के बाद दूसरी योजनाएं बना रहे थे | जेल की मजबूत  दीवार को तोड़ने के लिए शक्तिशाली बम बनाते हुए भगत सिंह केअत्यंत प्रिय साथी भगवती भाई जो की दुर्गा भाभी के पति थे , ने बम परिक्षण में अपनी जान गँवा दी | अंततः दल के ही एक गद्दार के कारण २७ फरवरी १९३१ को इलाहबाद में पुलिस मुठभेड़ में आजाद भी शहीद हो गए | 
स्वामी रामतीर्थ और स्वामी विवेकानंद .... 
       भगत सिंह के वारे में यह अनावश्यक ही लाद दिया गया कि वे वाम पंथी थे , सच यह है कि बचपन से लेकर किशोर वस्था तक वे उग्र आर्य समाजी थे , किशोरावस्था से लेकर युवावस्था तक वे सक्रीय अकाली थे और इसके बाद शुद्ध राष्ट्रवादी थे | राष्ट्र के हित के लिए तमाम दुनिया कि तमाम क्रांतियों का उन्होंने अध्ययन किया | देश के अन्दर के राष्ट्रवाद के समस्त नायकों के विचार जानें - समझे|
        भगत सिंह स्वामी रामतीर्थ और स्वामी विवेकानंद को बहुत मानते थे | उन्हें इस बात पर गर्व था कि इन दोनों महान संतों ने विदेश में जाकर यश प्राप्त किया और आत्म तत्वों का ज्ञान फैला कर ख्याती प्राप्त की | 
भगत सिंह की आशंका सही निकली ...
       भगत सिंह के एक भाई की मृत्यु हो गई थी , दो भाई कुलवीर सिंह और कुलतार सिंह तथा तीन बहनें अमर कौर , सुमित्रा कौर और शकुंतला कौर थीं | उन्हें अपनी माँ से बहुत प्यार था | उन्होंने एक बार अपनी माँ को एक पत्र लिखा " माँ , मुझे इस बात में बिलकुल भी शक नहीं की एक दिन मेरा देश आजाद होगा | मगर मुझे दर है की 'गोरे साहबों'  की खाली हुई कुर्सियों पे काले  / भूरे साहब बैठनें जा रहे हैं |  " उनका शक सही निकला ,आज भारत का सिंहासन चंद काले अंग्रेजों और उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले राजनैतिज्ञों के हाथ की काठ पुतली बन चूका है |
      लोग कहते हैं की भगत सिंह नास्तिक थे मगर सच यह था की वे आस्तिक थे | अनावश्यक कर्मकांड के लिए उनके पास समय जरुर नहीं था | जब उनके वकील प्राणनाथ मेहता नें फांसी वाले दिन पूछा था कि उनकी अंतिम इच्छा क्या है तो भगत सिंह ने जबाव  था कि ' में दुबारा इस देश में पैदा होना चाहता हूँ |' अर्थात वे पुर्न जन्म में विश्वास रखते थे | इसके अतिरिक्त वे युवावस्था में श्री कृष्ण विजय नाटक का मंचन भी किया करते थे , जो अंग्रेजों के खिलाफ बनाया गया था | 
वन्देमातरम ...
      आज वन्देमातरम को साम्प्रदायिक कहने वाले मार्क्सवादियों को भगत सिंह के ये विचार भी पढ़ लेने चाहिए - " ए भारतीय युवक ! तू क्यों गफलत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है | उठ ,आँख खोल ,देख प्राची दिशा का ललाट सिंदूरी रंजित हो उठा है | अब अधिक मत सो ! सोना हो  तो अनंत निद्रा कि गोद में जाकर सो रह !! कापुरुषता  के खोल में क्यों सोता है ? माया और मोह त्याग कर गरज उठ - वन्देमातरम - वन्देमातरम !  "
वे आगे लिखते हैं " तेरी माता ,तेरी प्रातः स्मरणीय,तेरी परम पवन वंदनीया , तेरी जगदम्बा , तेरी अन्नपूर्णा, तेरी त्रिशूल धारणी, तेरी सिन्हवाह्नी, तेरी शस्य श्यामला , आज फूट फूट कर रो रही है | क्या उसकी विकलता मुझे तनिक भी चंचल नहीं करती | धिकार है तेरी निर्जिविता पर | तेरे पितर भी नतमस्तक हैं इस नपुंसकत्व  पर | यदि अब भी तेरे किसी अंग में तुक हया बांकी हो, तो उठ कर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा , उसके आंसुओं की एक - एक बूँद की सौगंध ले , उसका बेडा पार कर और बोल मुक्त कंठ से .., वन्दे मातरम ..! "
- राधा - कृष्ण मंदिर रोड , डडवाडा, कोटा जन . (राजस्थान)

रविवार, 20 मार्च 2011

अमर शहीद भगत सिंह तारीखों में ......



- अरविन्द सिसोदिया 
    भगत सिंह का जन्म 2८ सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में चक नंबर 105 (अब पाकिस्तान में) नामक जगह पर हुआ था। हालांकि उनका पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवांशहर ज़िले के खट्करकलाँ गाँव में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था।, एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था, जिसका अनुकूल प्रभाव उन पर पड़ा था। भगतसिंह के पिता 'सरदार किशन सिंह' एवं उनके दो चाचा 'अजीतसिंह' तथा 'स्वर्णसिंह' अंग्रेज़ों के ख़िलाफ संघर्षरत होने के कारण जेल में बन्द थे । जिस दिन भगतसिंह पैदा हुए उनके पिता एवं चाचा को जेल से रिहा किया गया था , इस शुभ घड़ी के अवसर पर भगतसिंह के घर में खुशी और भी बढ़ गयी थी । भगतसिंह की दादी ने बच्चे का नाम 'भागां वाला' (अच्छे भाग्य वाला) रखा । बाद में उन्हें 'भगतसिंह' कहा जाने लगा । वे 14 वर्ष की आयु से ही पंजाब की क्रान्तिकारी संस्थाओं में कार्य करने लगे थे। डी.ए.वी. स्कूल से उन्होंने नवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1923 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें विवाह बन्धन में बाँधने की तैयारियाँ होने लगी तो वे लाहौर से भागकर कानपुर आ गये।
वर्षघटनाक्रम
*1919 वर्ष 1919 से लगाये गये 'शासन सुधार अधिनियमों' की जांच के लिए फ़रवरी 1928 में 'साइमन कमीशन' मुम्बई पहुंचा। पूरे भारत देश में इसका व्यापक विरोध हुआ।
*1926 भगतसिंह ने लाहौर में 'नौजवान भारत सभा' का गठन किया ।
*1927 दशहरे वाले दिन छल से भगतसिंह को गिरफ़्तार कर लिया गया। झूठा मुकदमा चला किन्तु वे भगतसिंह पर आरोप सिद्ध नहीं कर पाए, मजबूरन भगतसिंह को छोड़ना पड़ा ।
*1927 'काकोरी केस' में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला, राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशनसिंह को फांसी दे दी गई ।
*सितंबर, 1928 क्रांतिकारियों की बैठक दिल्ली के फिरोजशाह के खण्डरों में हुई, जिसमें भगतसिंह के परामर्श पर 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' का नाम बदलकर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन' कर दिया गया । जिसमें चन्द्रशेखर आजाद टीम लीडर थे |
*30 अक्टूबर, 1928 कमीशन लाहौर पहुंचा। लाला लाजपत राय के नेतृत्व में कमीशन के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुआ। जिसमें लाला लाजपतराय पर लाठी बरसायी गयीं। वे ख़ून से लहूलुहान हो गए। भगतसिंह ने यह सब अपनी आंखों से देखा।
*17 नवम्बर, 1928 लाला जी का देहान्त हो गया। भगतसिंह बदला लेने के लिए तत्पर हो गए। लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने के लिए 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' ने भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, आज़ाद और जयगोपाल को यह कार्य दिया। क्रांतिकारियों ने साण्डर्स को मारकर लालाजी की मौत का बदला लिया।
*8 अप्रैल, 1929 क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगतसिंह ने निश्चित समय पर केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंका। दोनों ने नारा लगाया 'इन्कलाब जिन्दाबाद'… ,अनेक पर्चे भी फेंके, जिनमें जनता का रोष प्रकट किया गया था। बम फेंककर इन्होंने स्वयं को गिरफ़्तार कराया। अपनी आवाज़ जनता तक पहुंचाने के लिए अपने मुक़दमे की पैरवी उन्होंने खुद की।

*7 मई, 1929 भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के विरूद्ध अदालत का नाटक शुरू हुआ ।
*6 जून,1929 भगतसिंह ने अपने पक्ष में वक्तव्य दिया, जिसमें भगतसिंह ने स्वतंत्रता, साम्राज्यवाद, क्रांति पर विचार रखे और क्रांतिकारियों के विचार सारी दुनिया के सामने आये।
*12 जून, 1929 सेशन जज ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत आजीवन कारावास की सज़ा दी। इन्होंने सेशन जज के निर्णय के विरुध्द लाहौर हाइकोर्ट में अपील की। यहाँ भगतसिंह ने पुन: अपना भाषण दिया ।
*13 जनवरी, 1930 हाईकोर्ट ने सेशन जज के निर्णय को मान्य ठहराया। इनके मुकदमे को ट्रिब्यूनल के हवाले कर दिया ।
*5 मई, 1930 पुंछ हाउस, लाहौर में मुक़दमे की सुनवाई शुरू की गई। आज़ाद ने भगतसिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी बनाई।
*28 मई, 1930 भगवतीचरण बोहरा बम का परीक्षण करते समय घायल हो गए। उनकी मृत्यु हो जाने से यह योजना सफल नहीं हो सकी। अदालत की कार्रवाई लगभग तीन महीने तक चलती रही ।
*मई1930 'नौजवान भारत सभा' को गैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया।
*26 अगस्त, 1930 अदालत ने भगतसिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 तथा 6 एफ तथा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिध्द किया।
*7 अक्तूबर, १९३० को 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी की सज़ा दी गई। लाहौर में धारा 144 लगा दी गई ।
*नवम्बर 1930 प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। प्रिवी परिषद में अपील रद्द किए जाने पर भारत में ही नहीं, विदेशों में भी लोगों ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई ।
*23 मार्च, 1931 फाँसी का समय प्रात:काल 24 मार्च, 1931 निर्धारित हुआ था।
*23 मार्च, 1931 सरकार ने 23 मार्च को सायंकाल 7.33 बजे, उन्हें एक दिन पहले ही प्रात:काल की जगह संध्या समय तीनों देशभक्त क्रांतिकारियों को एक साथ फाँसी दी। भगतसिंह तथा उनके साथियों की शहादत की खबर से सारा देश शोक के सागर में डूब चुका था। 
*मुम्बई, मद्रास तथा कलकत्ता जैसे महानगरों का माहौल चिन्तनीय हो उठा। भारत के ही नहीं विदेशी अखबारों ने भी अंग्रेज़ सरकार के इस कृत्य की बहुत आलोचनाएं कीं।
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आभार सहित ...

फिल्मी गीतों ने.. होली का भी खूब धमाल मचाया है ...

- अरविन्द सिसोदिया 
..अजी होली तो होली ही है .., जम कर मनाई..,गालों पर गुलाल .., ललाट पर ऊपर तक मसला.,
चेहरा पहचान जाएँ तो होली ही काहे की...! आतंक और अधर्म के पर्याय बनें हिरण्यकश्यप के राजतन्त्र से मुक्त होनें पर उनकी जनता ने इसी तरह खुशी मनाई थी ..! हमारे शासकों को अच्छी तरह  समझ लेना चाहिए यह जनता अधर्म और अनाचार कतई पसंद  नहीं करती  और वक्त जरूरत इसका जबाव भी देती हे ..!
  फिल्मी गीतों ने हमारे त्यौहारों को खूब उभरा है , चाहे वीर रसा की बात हो या रक्षा बंधन.., होली का भी खूब धमाल मचाया है ... 
कुछ यादगार गीत जो मस्ती में ला देते हैं ... 
तन रंग लो जी मन रंग लो...(कोहिनूर)
होली आई रे कन्हाई...(मदर इंडिया)
अरे जा रे हट नटखट...(नवरंग)
होली के रंग दिल खिल जाते हैं...(शोले)

कुछ यादगार गीत जो मस्ती में ला देते हैं ...

रंग बरसे भींगे चुनर वाली...(सिलसिला)
अंग से अंग लगा ले सजन...(डर)
आज न छोडेंगे हम हमजोली...(कटी पतंग)
मल दे गुलाल मोहे...(कामचोर)

कुछ यादगार गीत जो मस्ती में ला देते हैं .

आई रे आई रे, होली आई रे...(ज़ख़्मी)
ओ देखो होली आई रे...(मशाल)
होरी खेले रघुवीरा अवध में...(बाग़वान)
‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं’ (शोले )

कुछ यादगार गीत जो मस्ती में ला देते हैं .
‘भागी रे भागी रे भागी ब्रजबाला, कान्हा ने पकड़ा रंग डाला’ (‘राजपूत’)
‘सात रंग में खेल रही है दिल वालों की होली रे’ (‘आखिर क्यों’)
‘जा रे हट नटखट’ ( ‘नवरंग’ )
‘पिया संग होली खेलूँ रे’ (‘फागुन’)


कुछ यादगार गीत जो मस्ती में ला देते हैं .
‘मोहे छेड़ो न नंद के लाला’(‘लम्हे’)
‘मारो भर-भर पिचकारी’(‘धनवान’
‘लाई है हजारों रंग होली’(‘फूल और पत्थर’ )
‘आज न छोड़ेंगे बस हमजोली’ (‘कटी पतंग’)

होली : नरसिंह अवतार,प्रह्लाद,हिरण्यकश्यप और होलिका.....


होली की बहुत बहुत शुभ कामनाएं और बधाई ..!
रंगों के इस त्यौहार का सन्देश स्पष्ट है 
कि जिन्दगी बहुरंगी होनी चाहिए ..!
एक रंग नीरसता को लाता है ..
तो बहुरंगता विविधता के द्वारा नीरसता को तोड़ता है ..!
जीवन को बहु रंगी बनायें ..
जम कर होली मनाएं ..! 
- अरविन्द सिसोदिया , कोटा , राजस्थान , भारत |
09414180151  
blog - jai jai bharat  
arvindsisodiakota .blogspot.com
mail - sisodiaarvind @yahoo .com
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संझिप्त  में होली की कथा ..... 
होली के प्रचलन की अनेक कथाओं में प्रमुख है भक्त प्रहलाद , उसके पिता , बुआ और भगवान की कथा। कहा जाता है कि प्राचीन काल में एक असुर था जिसका नाम था हिरण्यकश्यप। अपने बल और सामर्थ्य के अभिमान में वह स्वयं को ही भगवान मानने लगा था। उसका पुत्र प्रह्लाद बड़ा ईश्वर भक्त था।  हिरण्यकश्यप की  भारी व्यथा यह थी कि उसके घर में ही उसे विद्रोह के स्वर (धर्म-पालन और ईश्वर-भक्ति के वचन) सुनाई दे रहे थे। अर्थात प्रह्लाद की ईश्वर-भक्ति और धर्मपरायणता उसके ढोंग को नकार देते थे ..! जिससे  नाराज होकर हिरण्यकश्यप ने  प्रह्लाद को  विभिन्न प्रकार से दंड दिए । परंतु पुत्र भी अडिग हो धर्म का मार्ग न छोड़ने को प्रतिबद्ध था।  उस असुर पिता की एक असुरा बहन भी थी , जिसका नाम था होलिका । उसको वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जल सकती ( फायर फ्रूफ लेडी )। अत: कोई अन्य मार्ग न पाकर एक पिता ने अपने पुत्र की हत्या करने कि सोची। हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। उसको उम्मीद थी कि अग्नि में उसके अशक्त पुत्र कि इहलीला समाप्त हो जायेगी। परन्तु हुआ कुछ अलग ही। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई और प्रह्लाद बच गया। यह देख हिरण्यकश्यप अपने पुत्र से और अधिक नाराज हो गया और पुत्र पर उसका अत्याचार बढ़ता चला गया।
          बुरी प्रवृत्ति के लोग भी अत्यंत कठोर तपस्या कर अपने स्वार्थ साधने के लिए उपयोगी वरदान भगवान से येन-केन प्रकारेण पा ही लेते थे। जाहिर  है ऐसा ही हिरण्यकश्यप के साथ भी हुआ। वैसे तो वह अमरता का वरदान प्राप्त करना चाहता था ,किन्तु भगवान ने कहा कि यह वरदान वे नहीं दे सकते। इसपर उसने भी चालाकी से बाजी मारने कि कोशिश की। काफी जद्दोजहद के बाद उस असुर को यह वरदान मिला कि वह न दिन में मर सकता है न रात में , न जमीन पर मर सकता है और न आकाश या पाताल में , न मनुष्य उसे मार सकता है और न जानवर या पशु- पक्षी , इसीलिए भगवान उसे मारने का समय संध्या चुना और आधा शरीर सिंह का और आधा मनुष्य का- नरसिंह अवतार। नरसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यप का वध न जमीन पर की न आसमान पर , बल्कि अपनी गोद में लेकर की। 

    राजा ने उसे खंभे से बांधकर मारना चाहा; पर तभी खंभे से नरसिंह भगवान प्रकट हुए। उनका आधा शरीर मनुष्य और आधा शेर का था। वे राजा को घसीटकर महल के दरवाजे पर ले आये और अपनी जंघाओं पर लिटाकर नाखूनों से उसका पेट फाड़ दिया। इस प्रकार भगवान के वरदान की भी रक्षा हुई और अत्याचारी राजा का नाश भी। उसी के स्मरण में आज तक होली मनाने की प्रथा है।




शुक्रवार, 18 मार्च 2011

विकिलीक्स की जय हो ..!

- अरविन्द सिसोदिया
विकिलीक्स  ने वह कमाल  कर दिखाया जो होना ही चाहिए था .., लाखों जेम्स बांड जो रहस्य नहीं खोल  सकते थे , वे रहस्य खुल  कर सामनें हैं ..,  विश्व राजनीति का मतलब मानवीय साम्राज्य  का नीतियों और सिद्धन्तो पर आधारित हो कर सत्यता पूर्ण न्याय और मानवता का परस्पर सहयोग हो ..! अमेरिका सहित तमाम संपन्न देशों ने राजनीति को छल , कपट और धोकेबाजी  का धंधा बना लिया है और उसके सामनें विवश विकासशील और अविकसित देश सिर्फ और सिर्फ हाथ जोड़े महज गिदगिड़ाहट  में हैं ...!  विकासशील देशों के लिए ये लाभ  देने हेतु प्रतिबद्ध हैं .., महज बाजार बना  कर विश्व को देखनें का अधर्म अमरीका के नेतृत्त्व में हो रहा है संयुक्त राष्ट्र संघ मात्र एक कठपुतली संस्था बन कर रह गई ..! इतनें सरे लीकेज सामनें आ चुके हैं कोई भी प्रतिक्रिया नहीं है .., एक सुदूर चुप्पी के अलावा...!   
      भारत के बारे  में जो खुलासे  सामनें हैं उससे स्पष्ट है कि कांग्रेस नें परोक्ष / अपरोक्ष अमरीका की गुलामी जैसी स्थिति तो देश की बनाई  है ..! अब धुधलके में यह दिख रहा है कि भारत सरकार  को क्या करना है यह अमरीका में तय हो रहा है ..! जो भी अमरीकी या इसाइयत के हित में है वह बगेहर न्याय और नैतिकता  को ध्यान में रखे किया जा रहा है ..! बेशर्मी की भी वजह यही है की परोक्ष  अमरीकी हुकूमत के आदेशों के आगे सोनिया नेतृत्त्व नत मस्तक है ...! अनुज्ञया पालन की स्थिति में है ...!! सच यही है कि यही अमरीकी व्यवहार पूरी दुनिया के साथ है ...!! यह भारतीय राजनीति से कहीं अधिक अमरीका  के लिए भी शर्मनाक है कि वे दूसरे देशी के आतंरिक  मामलों कितना गहरे तक झांकते  हैं ..! उन्हें किस स्तर तक प्रभावित करते हैं ..!  इन खुलाशों के बाद कांग्रेस की मान्यता ख़त्म क्यों  नहीं करदी जाये  और इस दल  के सदस्यों को चुनाव लडनें  से पूरी तरह क्यों न रोका जाये ..!

 विकिलीक्स के खुलासों से
विकिलीक्स के खुलासों से तमाम देशों के आपसी रिश्ते तार-तार हो रहे हैं। असांजे के समर्थकों ने अब वित्तीय संस्थानों पर भी हमले शुरू कर दिए हैं।बंकर में दस्तावेज
जेम्स बांड की किसी फिल्म की तरह विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने अमेरिका की हजारों कूटनीतिक फाइलों को स्वीडन में शीत युद्ध के दौर के एक परमाणु बंकर में छिपा रखा है। स्टॉकहोम में सौ फीट जमीन के नीचे स्थित यही बंकर विकिलीक्स का अहम डाटा सेंटर है। इसमें दर्जनों ताकतवर कंप्यूटर सर्वर रखे हुए हैं। 1970 के दशक में इस बंकर का निर्माण किया गया था, ताकि महत्वपूर्ण सरकारी फाइलों को परमाणु हमलों से सुरक्षित रखा जा सके। इस बंकर में अत्याधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं। ब्रिटिश अखबार डेली मेल के मुताबिक असांजे किसी जेम्स बांड फिल्म के विलेन के जैसा लगने का प्रयास कर रहे हैं। विकिलीक्स के सर्वर स्वीडन के साथ ही बेल्जियम में भी हैं क्योंकि वहां प्रेस गोपनीयता कानून के तहत उसे सुरक्षा की गारंटी मिलती है।
ऐसे होता है काम
मूलरूप से ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड शहर के रहने वाले जूलियन असांजे ने 2006 में विकिलीक्स वेबसाइट की स्थापना की। उनके अलावा वेबसाइट को चलाने के लिए नौ सदस्यों की एक सलाहकार समिति भी है। दुनिया भर में करीब 800 स्वयंसेवक विकिलीक्स को सूचनाएं इकट्ठा करके पहुंचाते हैं। बंकर में स्थित डाटा सेंटर अत्याधुनिक क्रिप्टोग्राफिक सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग कर यह सूचना बांटता है। 2008 में ‘इकनॉमिस्ट मैगजीन’ ने विकिलीक्स को ‘न्यू मीडिया अवॉर्ड’ दिया था। 2009 में विकिलीक्स और असांजे को एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी यूके मीडिया अवॉर्ड से नवाजा।
कानून का शिकंजा
असांजे को दो महिलाओं के साथ बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। उन पर आरोप है कि इस वर्ष अगस्त में जब वह एक सेमिनार में भाग लेने स्वीडन पहुंचे, तो आयोजकों में एक अन्ना आर्डिन और एक फोटोग्राफर सोफिया विलेन से उनकी नजदीकियां बढ़ीं। अन्ना का आरोप है कि संबंध के दौरान असांजे ने सुरक्षात्मक उपायों का ध्यान नहीं रखा, वहीं सोफिया ने कहा कि उनके साथ संबंध बनाने में कंडोम तक का इस्तेमाल नहीं किया गया।
हेक्टिविस्टों का खेल
राजनीतिक और सामाजिक कारणों से प्रेरित होकर कंप्यूटर हैक करने को हेक्टिविज्म का नाम दिया गया है और ऐसा करने वाले खुद को हेक्टिविस्ट घोषित कर रहे हैं। यानी ऐसे एक्टिविस्ट जो कथित रूप से अच्छे उद्देश्यों के लिए हैकिंग कर रहे हैं हेक्टिविस्ट हैं।
बड़े खुलासे
निशाने पर अमेरिका
विकिलीक्स ने अमेरिकी कारनामों की कलई खूब उधेड़ी। इराक युद्ध में अमेरिका, इंग्लैंड और नाटो की सेनाओं के गंभीर युद्ध अपराध के सुबूतों के दस्तावेज जारी करने के बाद वेबसाइट ने ऐसे धुआंधार खुलासे किए कि ओबामा प्रशासन रक्षात्मक मुद्रा में आ गया।
अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन को इन सबसे खूब फजीहत झेलनी पड़ी।
बिखर जाएगा पाक
अमेरिकी सेना ने 2008 में ही आशंका जता दी थी कि पाकिस्तान में आतंकवाद इस कदर हावी हो रहा है कि कुछ वर्षों में इसके टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। खुलासे में यह भी कहा गया कि पाकिस्तानी सेना लश्कर-ए-तैयबा समेत चार बड़े आतंकी गुटों को गुप-चुप तरीकेसे मदद करती है। लश्कर का सालाना बजट 52 लाख अमेरिकी डॉलर है।
माफिया राज
अमेरिकी नेता दुनिया भर केनेताओं के लिए आपत्तिजनक उपनामों का प्रयोग करते हैं। इनमें फ्रांस केराष्ट्रपति निकोलस सरकोजी को नंगा राजा, रूस केप्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन को अल्फा डॉग, अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई को मानसिक रोगी कहा गया। यही नहीं, पुतिन के शासन को माफिया राज कहा गया है।
ये हैं जनाब असांजे
यायावर जीवन जीने वाले जूलियन असांजे मूलतः ऑस्ट्रेलिया के क्वीसलैंड शहर के रहने वाले हैं। पारदर्शी पत्रकारिता के इस हिमायती ने महज 16 वर्ष की उम्र में ही कंप्यूटर हैकिंग की शुरुआत कर दी। तब वह यह काम मैनडेक्स के नाम से किया करते थे। बाद में दो अन्य हैकरों को लेकर उन्होंने एक समूह बनाया और उसका नाम रखा, द इंटरनेशनल सब्वर्सिव (अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी)। दिलचस्प है कि हैकिंग के आरोप में उन्हें ऑस्ट्रेलिया पुलिस ने गिरफ्तार भी किया, पर इससे उनके उद्देश्यों पर फर्क नहीं पड़ा। उनके पास आम तौर पर दो पिट्ठू बैग होता है, जिसमें से एक में उनके कपड़े और दूसरे में लैपटॉप रहता है।

(वेबसाइट का दावा है कि उसके पास 10 लाख से भी ज्यादा गुप्त दस्तावेज हैं।)


http://www.amarujala.com/विकिलेअक्स
    
Friday, March 18, 2011  | 
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४० लाख पन्नों का भूत - विकिलीक्स  
अमेरिका दहशत में है. अमेरिकी राष्ट्रपति की नींद हराम हो चुकी है. अफवाहों के साथ सच्चाइयों का बाजार गर्म है. विकिलीक्स खुलासे पे खुलासे किया जा रहा है. अफगान वार हो या ईराक युद्ध सभी में अमेरिका द्वारा किए गए विभिन्न धांधलियों का सिलसिलेवार खुलासा विकिलीक्स कर रहा है. अमेरिका बार-बार चेतावनी जारी कर रहा है कि ऐसे दस्तावेज रोके जाएं लेकिन विकिलीक्स है कि मानता ही नहीं. अमेरिका को लगता है कि 40 लाख पेज के इन गोपनीय दस्तावेज़ों से उसके संबंध कई देशों से ख़राब हो सकते हैं और इसमें भारत भी शामिल है. हालांकि अमेरिका नहीं चाहता कि विकिलीक्स इन दस्तावेज़ों का खुलासा करे. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई मूल के जूलियन एसेंज जो विकिलीक्स के एडिटर हैं उन्होंने हाल ही में इराक वॉर लॉग्स में सनसनीखेज़ खुलासे किए थे और इस बार भी वे रुकने वाले नहीं.

विकीलीक्स द्वारा जारी किए गए अमेरिका के पिछले तीन साल के संदेशों से गोपनीय राजनयिक अध्याय और पर्दे के पीछे हुई कूटनीतिक सौदेबाजियों के बारे में अप्रत्याशित जानकारी मिली है. इसमें परमाणु ऊर्जा के मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ हुआ गतिरोध भी शामिल है.  न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अपने खुलासे को लेकर दुनियाभर में सुर्खियों में आई इस वेबसाइट ने अमेरिकी कूटनीति के रहस्यों को उजागर कर दिया है.

टाइम्स ने एक संदेश के हवाले से कहा कि अमेरिका ने वर्ष 2007 के बाद से एक पाकिस्तानी शोध संयंत्र से उच्च संव‌र्धित यूरेनियम को हटाने के लिए गोपनीय तौर पर प्रयास किया हालांकि यह प्रयास अभी तक असफल रहा है.  अमेरिकी अधिकारियों को भय था कि इसका इस्तेमाल गैर कानूनी परमाणु हथियार बनाने के लिए किया जा सकता है.

मई 2009 में राजदूत अन्ने डब्लू पेटर्सन ने बताया कि पाकिस्तान अमेरिकी विशेषज्ञों के दल को जाने की अनुमति नहीं दे रहा है.  पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना था कि यदि स्थानीय मीडिया को यूरेनियम हटाने की सूचना मिलती है तो वे निश्चित रूप से इसे अमेरिका द्वारा पाकिस्तानी परमाणु हथियारों पर कब्जा करने का प्रयास करार देंगे.

दस्तावेजों में कहा गया है कि विश्व के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल की हैकिंग चीन के सरकारी अधिकारियों, निजी सुरक्षा विशेषज्ञों और चीनी सरकार द्वारा भर्ती किए गए अपराधियों ने की थी. इसके अलावा उन्होंने अमेरिका के सरकारी कंप्यूटरों, अमेरिकी व्यावसायिक नेटवर्क और दलाई लामा के कंप्यूटर नेटवर्क को भी हैक किया.  एक अन्य संदेश में अफगानिस्तान में फैले भ्रष्टाचार का ब्यौरा भी दिया गया है.

दस्तावेजों में आस्ट्रेलिया का भी जिक्र

दुनियाभर में चर्चा का विषय बनी विकीलीक्स वेबसाइट द्वारा हासिल किए गए अमेरिका के 1442 गोपनीय दस्तावेजों में आस्ट्रेलिया का भी जिक्र आया है जो अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों में से एक है. एएपी की रिपोर्ट के मुताबिक सोमवार को जारी किए गए दस्तावेजों में से एक में वर्ष 2007 के एपेक सम्मेलन में पर्दे के पीछे हुई बातचीत का भी उल्लेख है.

इससे पहले जारी गोपनीय दस्तावेजों में अमेरिका और चीन के बीच की उस बातचीत का भी विवरण है जो बीजिंग के रास्ते शस्त्रों की खेप लेकर ईरान जा रहे जहाज के बारे में हुई थी.  यह संदेश उत्तर कोरिया द्वारा बीजिंग के रास्ते ईरान भेजी जा रही हथियारों की खेप को लेकर तुरंत कार्रवाई करने के लिए भेजा गया था.

दस्तावेज में कहा गया है कि सितंबर में सिडनी में हुई एपेक की बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश ने चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओं के साथ बातचीत में उत्तर कोरिया द्वारा ईरान के मिसाइल कार्यक्रम के लिए बैलेस्टिक मिसाइल प्रणाली के मुख्य कल पुर्जे बीजिंग के रास्ते ईरान भेजने पर गहरी चिंता जताई थी.

लीक हुए दस्तावेजों में अमेरिका और पश्चिम एशिया के बीच कूटनीतिक संबंधों की भी चर्चा है.  एक दस्तावेज में जिंबाब्वे के राजनीतिक हालात पर चर्चा की गई है.  इसमें आस्ट्रेलिया की भी चर्चा है और उसे अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगियों में से एक बताया गया है.

बंद की जाए विकिलीक्स वेबसाइट

विकिलीक्स के गोपनीय अमेरिकी दस्तावेजों के अवैध प्रकाशन से नाराज अमेरिका के सभी प्रमुख दलों के सांसदों ने ओबामा प्रशासन से कहा है कि प्रशासन हरसंभव कानूनी उपाय करके वेबसाइट को बंद कर दे.

सीनेट की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष सीनेटर जॉन कैरी ने कहा कि इन परिस्थितियों में गोपनीय दस्तावेजों को जारी करना पूरी तरह गलत काम है, जो बहुत सी जिंदगियों को खतरे में डाल सकता है.  उन्होंने बताया कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला नहीं है और न ही यह पेंटागन से जुड़े दस्तावेजों को जारी करने के समान है.  कैरी ने बताया कि इसकी बजाय यह दस्तावेज वर्तमान समय में जारी मामलों के विश्लेषण से जुड़े हैं, जिन्हें गोपनीय बनाए रखना अत्यंत जरूरी है.

सीनेट की होमलैंड सिक्युरिटी और शासकीय मामलों की समिति के अध्यक्ष जो लिबरमैन ने कहा कि विकिलीक्स ने जानबूझकर इन दस्तावेजों का खुलासा किया है, जो न केवल अमेरिका, बल्कि दूसरे बहुत से देशों की भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं.  लिबरमैन ने ओबामा प्रशासन से आग्रह किया कि इससे पहले कि विकिलीक्स और दस्तावेज जारी करके देश को और नुकसान पहुंचा सके, प्रशासन हरसंभव वैधानिक तरीके अपना कर विकिलीक्स को बंद कर दे.
--- २९ November,  २०१०



गुरुवार, 17 मार्च 2011

शैम...शैम....; कांग्रेस का राष्ट्र विरोधी चेहरा फिरसे उजागर

 
- अरविन्द सीसोदिया 
        कांग्रेस का राष्ट्र विरोधी और घोर  साम्प्रदायिक चेहरा फिरसे उजागर हुआ है , इस वार यह यह भाजपा या संघ परिवार के द्वारा नहीं , बल्कि  अमरीकी ख़ुफ़िया गिरी के विकीलीक्स पर लीक दस्तावेत से सामने आया है ...! जिस कांगेस नें महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी के हत्यारों को बहुत कम समय में फांसी दे दी .., उसी कांग्रेस  ने भारतीय संसद पर हमले के लिए जिम्मेवार अफजल गुरू की फांसी लगातार इसा तरह से टली मानों , संसद पर हमले ये स्वंय शामिल हों .....! कांग्रेस के इस राष्ट्र विरोधी कार्य की कड़ी से कड़ी निदा की जानी चाहिए ...! 
खबर ........
नई दिल्ली। 2001 में संसद पर हमले के मामले में दोषी अफजल गुरू की फांसी का मामला एक बार फिर भारतीय राजनीति को गरमा सकता है। विकीलीक्स ने अफजल गुरू की फांसी के मामले को लेकर सनसनीखेज खुलासा किया है। विकीलीक्स के गोपनीय दस्तावेजों के मुताबिक कांग्रेसी नेता व मौजूदा केन्द्रीय मंत्री गुलान नबी आजाद ने अफजल गुरू को दया याचिका मंजूर किए जाने के लिए भारी दबाव बनाया था।

2006 में नई दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास की ओर से वॉशिंगटन भेजे गए गोपनीय दस्तावेजों के मुताबिक अफजल की फांसी के मुद्दे पर तत्कालनी राष्ट्रपति
एपीजे अब्दुल कलाम और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच खुलकर मतभेद सामने आ गए थे। गुलान नबी आजाद की ओर से अफजल गुरू को माफ किए जाने का दबाव बनाना ही कलाम और सोनिया के बीच मतभेद की बड़ी वजह थी।

20 अक्टूबर, 2006 को अमरीकी दूतावास के राजनयिक जेफरी पैट ने गुप्त दस्तावेज (82638) में यह भी कहा था कि अगर राष्ट्रपति कलाम को लगता है कि सोनिया उन्हें दोबारा राष्ट्रपति नहीं बनने देंगी तो वे अफजल गुरू के मुद्दे को सही समय पर उछाल भी सकते हैं। दस्तावेज में अफजल गुरू को लेकर 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के चुनावी असमंजस की भी बात बताई गई है।

दस्तावेज में पार्टी के ही एक नेता के हवाले से कहा गया है कि अगर यूपीए अफजल गुरू की फांसी की सजा को माफ करती है तो भाजपा नेता कांग्रेस पर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कमजोर होने का आरोप लगा सकते हैं। वहीं, अगर यूपीए अफजल गुरू को फांसी की सजा होने देती है तो इस बात का डर है कि मुस्लिम वोट बैंक जो राष्ट्रीय स्तर पर परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ रहा है, छूट जाएगा।

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http://www.indiatvnews.com/Afzal_Hanging
 New Delhi, Mach 16: The Hindu on Wednesday published a US diplomat's cable from India on the Afzal Guru hanging issue saying that the Congrtess was facing a "significant electoral dilemma" as it feared losing Muslim votes.

The report says: "The issue of executing Mohammed Afzal Guru, sentenced to death in the 2001 Parliament attack case, “may bring to light longstanding animosity between President Kalam  and Sonia Gandhi,” states a cable sent by the United States Embassy in New Delhi to Washington in 2006.

"It added that this was so “especially as a member of her own party, Chief Minister Azad, has argued on Afzal's behalf” — a possible reference to news reports that Mr. Azad had pressed for clemency to be granted to the convict.

"Sent on October 20, 2006 by Geoffrey Pyatt, U.S. Embassy Deputy Chief of Mission, the cable (82638: confidential) goes on to conjecture mischievously that “if President Kalam believes Sonia won't grant him a second term next summer, he may choose to push the issue into the forefront again at a crucial moment.”

"Accessed by The Hindu through WikiLeaks, the cable highlights the “significant electoral dilemma” the Afzal Guru issue posed for the Congress, just ahead of the “crucial” elections to the Uttar Pradesh Assembly in early-2007.

"It quotes unnamed party sources as telling the Embassy that if “the UPA grants a pardon for Afzal or stalls his execution, the Congress Party will be portrayed by BJP leaders as weak on national security. If, however, the President lets him hang, some fear Congress may lose support from their traditional Muslim vote block on a national scale.”

"The cable records the difference in the manner in which Kashmiri Muslims and the rest of the Indian public reacted to Afzal Guru's possible execution.

"It says that for Srinagar's Muslim population, it “highlights concerns about the fairness of the Indian justice system and failures in India's longstanding program to demobilize and reintegrate surrendered militants [such as Afzal Guru]”… For much of the public, commuting his sentence would demonstrate India remains weak in the face of attacks emanating from Pakistan.”

"It quotes Jammu and Kashmir Liberation Front Chairman Yasin Malik as telling a Consulate political officer that many “Kashmiri Muslims feel sympathy for Afzal” and that his only crime was “buying a car.” (Afzal Guru was not a member of the team that attacked Parliament but had bought the Ambassador car which breached Parliament's first line of security.) “How does this warrant a death sentence?” Mr. Malik is said to have asked.

"However, Mr. Malik's comments were at variance with many moderate Kashmiri separatist leaders in the Valley. One Hurriyat leader told the Consulate's political officer that his faction was “remaining as quiet as possible because they do not feel strongly that Indian should pardon Afzal.”

"He said “moderate members of the Hurriyat are unable to express this view publicly, given the mood in the Valley and the threat from terrorists. He claimed that the controversy over Afzal Guru had led to a loss of support for moderates such as himself among Kashmiri Muslims, “especially [among] a small but growing cadre of Kashmiri youth who are being educated in extremist madarassas springing up across Srinagar with Pakistani Jamaat-i-Islami party funding.”

"The cable suggests that the “easiest option for the Congress may be to delay Afzal's execution for years to consider his appeal for clemency.” This is exactly what has happened. In February 2011, Home Minister P. Chidambaram clarified in Parliament that Afzal Guru's mercy petition, filed on October 3, 2006, had not yet been forwarded to President Pratibha Patil

न्यायलय तुम देश बचाओ जनता तुम्हारे साथ हैं ..



- अरविन्द सिसोदिया 
.........इस समय देश में लूटपाट का हमला चल रहा है ...इस आक्रमण से मुकवाला करनें में प्रतिपक्ष भी उतना कारगर जितनें की आवश्यकता है ..! केंद्र की सरकार नें कई दलों को आय से अधिक संपत्ति के मामलों में सीबीआई से बाँध दिया है सो वे भी सरकार के परोक्ष गुलाम बन गए  हैं ..! इस स्थिति में भारतीय न्यायपालिका ने ही देश हित में कुछ कदम उठाये हैं ..! उन्हें भी रोकनें के लिए कांग्रेस ने यह बात चल वाई है की न्यायपालिका अति सक्रीय है ..., जब की सच यह है कि देश के साथ लूट पात की अति सक्रियता  है..! प्रधान मन्त्र के विभाग से एस बैंड स्पेक्ट्रम घोटाला हो जाये और त्यागपत्र की जगह मात्र साफ सफाई से रफा दफा किया जाये ...! एक नहीं .. लगातार असंवैधानिक गतिविधियों में सरकार लिप्त हो तो कौन उसे रोकेगा ..? जबकि आधा विपक्ष बंधक बन चुका हो ..? अतः न्यायलय की सक्रियता आवश्यक है ...इसका स्वागत होना चाहिए ..! न्यायलय तुम देश बचाओ जनता  तुम्हारे साथ हैं .. यह नारा देश में गूंजना चाहिए ..!.........देखिये न्यायपालिका को दवाब में लेने की कोशिस की दो रिपोर्टें .....
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http://www.samaylive.com/vice-president-hamid-ansari
१६ मार्च २०११ को उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि देश में विधायिका और न्यायपालिका के बीच 'उचित संतुलन' बनाये रखने की जरूरत है |  राज्यसभा के सभापति अंसारी ने कहा, 'हमारी व्यवस्था शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर काम करती है. इस सिद्धांत में बारीक भेद है और इस बारीक भेद को समझने की जरूरत है. सार्वजनिक घोषणाओं के दौरान विवेक और नीतियों को लागू करते समय सतर्कता बरतने की जरूरत है ताकि हर समय उचित संतुलन बनाये रखना सुनिश्चित किया जा सके.'
      उन्होंने कहा कि सभी व्यवस्थायें 'दबाव और तनाव' से गुजरती हैं लेकिन लोकतांत्रिक प्रणाली इसका जवाब चर्चा और विचार विमर्श आयोजित करके देती है.उप राष्ट्रपति ने कहा, 'मैं समझता हूं कि चर्चा और विचार विमर्श तथा इसके लिये पर्याप्त समय दिये जाने की जरूरत है. आज के समय में विभिन्न कारणों से यह और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है जब हम इसमें से कुछ चीजों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं.' अंसारी ने अपने विचार यहां पर एक किताब का विमोचन करते समय रखे.
     इस अवसर पर राज्यसभा के उप सभापति के रहमान खान ने कहा कि जहां संसद कानून बनाने का सर्वोच्च निकाय है वहीं न्यायपालिका, संविधान और विधायिका संस्थानों द्वारा पारित किये गये कानून की व्याख्या करने की अंतिम शक्ति है. उन्होंने कहा कि हालांकि विधायिका और न्यायपालिका दोनों ही को अपने कार्य के लिये पूर्ण स्वायत्तता और स्वतंत्रता है फिर कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब 'संसद और न्यायपालिका के बीच उचित संतुलन उनकी स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर मतभेद के कारण तनाव ग्रस्त हो जाता है.
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सुधांशु रंजन 
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7718836.cms
पिछले कुछ समय से न्यायिक सक्रियता का एक नया दौरशुरू हुआ है। 2- जी घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट कठोर टिप्पणी करचुका है और अब उसकी जांच की निगरानी भी कर रहा है।महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्य मंत्री विलासराव देशमुख द्वारा एकआपराधिक मामले में पुलिस पर दबाव डालकर जांच प्रक्रिया कोप्रभावित करने के लिए अदालत ने राज्य सरकार पर 10 लाख रु. का जुर्माना किया। काले धन पर भी सुप्रीम कोर्ट की तल्खटिप्पणियां लगातार आ रही हैं। गत 3 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पी. जे . थॉमस की सीवीसी के रूप में की गई नियुक्ति को निरस्तकर एक नयी सक्रियता का परिचय दिया। यह संभवत : पहलाअवसर है जब किसी अदालत ने न सिर्फ इतनी उच्च पदस्थ नियुक्तिको अवैध करा दिया , बल्कि उस अनुशंसा को रद्द कर दिया जिसके आधार पर यह नियुक्ति की गई थी। अर्थात यह मानाजाएगा कि यह नियुक्ति कभी हुई ही नहीं।


नियुक्ति की समीक्षा 
अदालत ने सरकार और थॉमस की यह दलील खारिज कर दी कि कार्यपालिका द्वारा की गयी नियुक्तियों की समीक्षाअदालत नहीं कर सकती। सरकार का पक्ष था कि कोई भी नियुक्ति उसका विवेकाधिकार है , लेकिन सुप्रीम कोर्ट नेव्यवस्था दी है कि नियुक्ति की न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। किंतु लोकतंत्र में न्यायालय को इसअधिकार का इस्तेमाल संयम के साथ करना चाहिए , हालांकि यह भी न्यायपालिका को ही तय करना है कि उसकी सीमाक्या होगी। विनीत नारायण ; 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट दिशानिर्देश दिए कि सीबीआई और सीवीसी का पुनर्गठन इसप्रकार किया जाना चाहिए ताकि ये बाहरी प्रभावों से पूरी तरह मुक्त रहें।


शून्य भरने का सिद्धांत 
मुख्य न्यायाधीश जे . एस . वर्मा ने शून्य भरने का सिद्धांत दोहराया कि यदि विधायिका अपना काम न करे तोकार्यपालिका को उस शून्य को भरना चाहिए क्योंकि इसका कार्यक्षेत्र विधायिका के साथ मिलता है। और जहांकार्यपालिका भी किसी कारणवश काम न करे , वहां न्यायपालिका को संविधान के अनुच्छेद 32 और 142 के अंतर्गतअपने दायित्वों का निर्वाह करने के लिए शिरकत करनी पडे़गी , जब तक कि विधायिका कानून बनाकर उसे पूरा न करे।अदालत के इन निर्देशों का अनुपालन नहीं हुआ , किंतु इसके अदालत ने सरकार के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरूनहीं की।

प्रकाश पी . हिंदुजा ; 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया - ' ए . के . राय बनाम संघ में यह व्यवस्था दी गई किविधायिका द्वारा बनाए गए कानून को लागू कराने के लिए कोई मैंडामस जारी नहीं किया जा सकता। इसलिए , सीवीसीको कानूनी दर्जा दिये जाने के बारे में दिए गए निर्देश को ऐसा नहीं माना जा सकता , जिसका अनुपालन न किए जाने कोअवमानना माना जाए। ' इस तरह अदालत ने अपनी परिधि से बाहर जाने की बात परोक्ष रूप से स्वीकार कर ली , किंतुइससे विनीत नारायण मामले में दिए गए उसके निर्देशों का मजाक बना। इससे वैसे अदालती आदेशों का अनुपालन नकिए जाने की गुंजाइश खुलती है जो कार्यपालिका की दृष्टि में न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र से बाहर है। लेकिन इधर अदालतका रवैया फिर आक्त्रामक सक्त्रियता वाला दिख रहा है।

अभी पूरी दुनिया में राजनीतिक मसले भी अदालतों के समक्ष लाए जा रहे हैं। चुनावी नतीजों से लेकर सत्ता परिवर्तन ,युद्ध और शांति , सामूहिक पहचान के प्रश्न और सीधे - सीधे राष्ट्र निर्माण से जुड़े मुद्दों पर भी अदालतें विचार कर रहीं हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव , चेचन्या में युद्ध और पाकिस्तान की राजनीतिक उथल - पुथल से लेकर तुर्की में सेक्युलरराजनीतिक व्यवस्था तक पर अदालत को फैसले सुनाने पडे़ हैं। भारतीय सुप्रीम कोर्ट पूरे विश्व में सबसे शक्तिशाली है ,इसलिए यहां यह प्रवृत्ति और ज्यादा मुखर है।

यहां संविधान के लागू होते ही निर्वाचित सांसद यह माननेे लगे कि देश की तकदीर को गढ़ने का जनादेश उन्हें ही प्राप्तहुआ है , लेकिन न्यायपालिका का भी स्पष्ट पक्ष था कि उसकी स्वाधीनता के साथ सरकार या विधायिका को कोई हस्तक्षेपनहीं करना चाहिए। 28 फरवरी 1950 को सुप्रीम कोर्ट के उद्घाटन के अवसर पर मुख्य न्यायाधीश हीरालाल कानिया नेअपना रुख साफ कर दिया था कि न्यायपालिका को छूने की कोई कोशिश कोई न करे। संवधिान के प्रथम संशोधन केसाथ ही नवीं अनुसूची का जन्म हुआ जिसमें डाले गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती थी। सुप्रीम कोर्ट नेहाल में इसे भी निरस्त कर दिया।

जवाहर लाल नेहरू न्यायपालिका की स्वतंत्रता में पूरा विश्वास रखते थे , फिर भी उन्होंने 19 मई 1951 को संसद में कहाथा कि बड़ी योजनाओं और बड़े सामाजिक परिवर्तनों में न्यायपालिका की कोई भूमिका नहीं है। गोलकनाथ मामले में जबसुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती तो उस समय इसे न्यायिकसक्त्रियता का सबसे बड़ा उदाहरण माना गया था। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सांसद नाथ पई ने संसद के अधिकार कोबहाल करने के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। इसका जोरदार विरोध उसी पार्टी के राम मनोहर लोहिया औरमधु लिमये ने किया। बाद में 1973 में केशवानंद भारती मामले में संविधान के मौलिक ढांचे में संशोधन न करने कीव्यवस्था देकर सुप्रीम कोर्ट ने संसद की शक्ति को हमेशा के लिए सीमित कर दिया।


काम में भी दिखे सक्रियता 
न्यायिक सक्त्रियता के कई सुखद परिणाम सामने आए हैं किंतु न्यायपालिका को त्वरित न्याय दिलाने में भी सक्त्रियतादिखानी चाहिए , अन्यथा उसकी सक्त्रियता पूरी तरह सार्थक नहीं हो पाएगी। पी . जे . थॉमस के मामले में अदालत नेउनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर नहीं , प्रक्त्रिया के उल्लंघन पर सवाल उठाया है। थॉमस के खिलाफ आरोप करीब 20 वर्षपुराना है। अगर कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपित होता है तो क्या न्यायपालिका को यह सुनिश्चित नहीं करनाचाहिए कि मामले का जल्द निष्पादन हो जाए ? अगर ऐसा नहीं होता तो क्या आरोपित व्यक्ति ताउम्र सभी पदों के लिएअयोग्य बना रहेगा ?