मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

प्रधानमंत्री को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए - सुषमा स्वराज





सुषमा ने सरकार पर जमकर बोला हमला
Tue, 30 Apr 2013
www.jagran.com


Dainik Jagran Hindi News
नई दिल्ली। संसद में कांग्रेस सदस्यों द्वारा लगातार की जा रही टोकाटोकी से खफा भाजपा नेता सुष्मा स्वराज ने कहा कि अब वे संसदीय कार्यमंत्री तथा लोकसभा के स्पीकर द्वारा बुलाई गई किसी भी बैठक में शामिल नहीं होगी। लोकसभा में नेता विपक्ष सुष्मा स्वराज ने मंगलवार को कहा कि यह सरकार सभी मोर्चे पर पूरी तरह विफल हो गई है। हालांकि उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाएगी।

इससे पहले, कोयला घोटाले और चीनी घुसपैठ को लेकर संसद में गतिरोध जारी है। घोटाले को लेकर सीबीआइ रिपोर्ट में सरकार द्वारा किए गए फेरबदल और उस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद विपक्ष तेवर और कड़े हो गए हैं।

मंगलवार को कार्रवाई शुरू होने के बाद भाजपा सदस्यों के हंगामे के बाद लोकसभा की कार्यवाही पहले दोपहर 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। दोबारा सदन की कार्यवाही शुरू होने पर विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि हर सत्र से पहले नया घोटाला उजागर हो जाता है। नया घोटाले पहले वाले घोटाले से बड़ा होता है और इसका रिकॉर्ड टूटने का सिलसिला बना हुआ है। उन्होंने यूपीए सरकार को आजाद भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार करार दिया।
सुषमा स्वराज ने कहा कि हम पर सदन को बाधित करने का आरोप मढ़ा जाता है, लेकिन हम ऐसा देशहित में करते हैं। सरकार ने अपना भरोसा पूरी तरह से खो दिया है इसलिए अब वह विपक्ष से सहयोग की अपेक्षा न रखे। उन्होंने कहा कि सरकार ने सत्ता में बने रहने का अधिकार खो दिया है। सुषमा ने कहा कि यह सरकार भ्रष्टाचार तो कर ही रही है और उसे दबाने के लिए जो हथकंडे अपना रही है वह शर्मनाक है। प्रधानमंत्री को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए।
उधर, सीबीआइ की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर 'आप' के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि हम पिछले दो वर्षो से यही बात कह रहे हैं कि सीबीआइ को स्वतंत्र किया जाए। उन्होंने कोर्ट की टिप्पणी को गंभीर बताते हुए इस ओर तुरंत कदम उठाने की मांग की।


प्रधानमंत्री को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए - सुषमा स्वराज
सुषमा ने सरकार पर जमकर बोला हमला
Tue, 30 Apr 2013
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नई दिल्ली। संसद में कांग्रेस सदस्यों द्वारा लगातार की जा रही टोकाटोकी से खफा भाजपा नेता सुष्मा स्वराज ने कहा कि अब वे संसदीय कार्यमंत्री तथा लोकसभा के स्पीकर द्वारा बुलाई गई किसी भी बैठक में शामिल नहीं होगी। लोकसभा में नेता विपक्ष सुष्मा स्वराज ने मंगलवार को कहा कि यह सरकार सभी मोर्चे पर पूरी तरह विफल हो गई है। हालांकि उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाएगी।

इससे पहले, कोयला घोटाले और चीनी घुसपैठ को लेकर संसद में गतिरोध जारी है। घोटाले को लेकर सीबीआइ रिपोर्ट में सरकार द्वारा किए गए फेरबदल और उस पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद विपक्ष तेवर और कड़े हो गए हैं।

मंगलवार को कार्रवाई शुरू होने के बाद भाजपा सदस्यों के हंगामे के बाद लोकसभा की कार्यवाही पहले दोपहर 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। दोबारा सदन की कार्यवाही शुरू होने पर विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि हर सत्र से पहले नया घोटाला उजागर हो जाता है। नया घोटाले पहले वाले घोटाले से बड़ा होता है और इसका रिकॉर्ड टूटने का सिलसिला बना हुआ है। उन्होंने यूपीए सरकार को आजाद भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार करार दिया।
सुषमा स्वराज ने कहा कि हम पर सदन को बाधित करने का आरोप मढ़ा जाता है, लेकिन हम ऐसा देशहित में करते हैं। सरकार ने अपना भरोसा पूरी तरह से खो दिया है इसलिए अब वह विपक्ष से सहयोग की अपेक्षा न रखे। उन्होंने कहा कि सरकार ने सत्ता में बने रहने का अधिकार खो दिया है। सुषमा ने कहा कि यह सरकार भ्रष्टाचार तो कर ही रही है और उसे दबाने के लिए जो हथकंडे अपना रही है वह शर्मनाक है। प्रधानमंत्री को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए।
उधर, सीबीआइ की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर 'आप' के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि हम पिछले दो वर्षो से यही बात कह रहे हैं कि सीबीआइ को स्वतंत्र किया जाए। उन्होंने कोर्ट की टिप्पणी को गंभीर बताते हुए इस ओर तुरंत कदम उठाने की मांग की।

कोलगेट घोटाला : एडि‍शनल सॉलि‍सि‍टर जनरल ने दिया इस्‍तीफा, जाएगी कानून मंत्री की कुर्सी ?





एडि‍शनल सॉलि‍सि‍टर जनरल ने दिया इस्‍तीफा, जाएगी कानून मंत्री की कुर्सी ?
dainikbhaskar.com  |  Apr 30, 2013,

नई दि‍ल्‍ली. कोलगेट घोटाले में घिरी यूपीए सरकार की मुसीबतें लगातार बढ़ती ही जा रही हैं। अटॉर्नी जनरल के खिलाफ गंभीर आरोप लगाने वाले  एडिशनल सॉलिसिटर जनरल हरेन रावल ने अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया है। सरकार के कहने पर इस्‍तीफा देने वाले रावल की जगह यू यू ललित की नियुक्ति की गई है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट और हलफनामे पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और जांच एजेंसी की जमकर खिंचाई की। सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामे को परेशान करने वाला और चौंकाने वाला बताते हुए नाराजगी जाहि‍र की। हरेन रावल के लेटर बम पर लोकसभा में जमकर हंगामा भी हुआ। वि‍पक्ष ने प्रधानमंत्री और कानून मंत्री के इस्‍तीफे की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्‍पणी के बाद कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने पीएम मनमोहन सिंह से मुलाकात की। पीएम ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की टिप्‍पणी का अध्‍ययन कर रहे हैं। इसके बाद ही वह जरूरी कदम उठाएंगे। कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने भी पीएम से मुलाकात की। सवाल यह उठ रहा है कि क्‍या कानून मंत्री की कुर्सी जाएगी? अश्विनी कुमार से जब पत्रकारों ने कोर्ट की टिप्‍पणी पर प्रतिक्रिया मांगी तो उन्‍होंने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया।
लोकसभा में बीजेपी की नेता सुषमा स्‍वराज ने यूपीए-2 की सरकार को आजाद भारत की सबसे भ्रष्‍ट सरकार करार दिया है और वि‍त्‍त वि‍धेयक पर बीजेपी ने वाकआउट कर दि‍या। (सुषमा का सोनिया पर वार, स्‍पीकर का करेंगी बहिष्‍कार) कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि उनकी पार्टी ने कभी अदालत के फैसलों पर टिप्‍पणी नहीं की है। वैसे, आज की टिप्‍पणी को अदालत का फैसला कहना सही नहीं होगा। अगर सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला सुनाता है तो सरकार पूरे सम्‍मान के साथ उसपर अमल करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के हलफनामे पर नाराजगी जाहि‍र करते हुए कहा कि इस मामले में कोर्ट को अंधेरे में रखा गया। जस्‍टि‍स आरएम लोढ़ा ने मामले की सुनवाई शुरू करते ही हलफनामे पर सीबीआई के वकील यूयू ललि‍त पर नाराजगी जाहि‍र करनी शुरू कर दी। जस्‍टि‍स लोढ़ा ने कहा कि सीबीआई को राजनीति‍क चंगुल से छुड़ाना है। सीबीआई राजनीति‍क आकाओं से आदेश न ले। मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब 8 मार्च को स्‍टेटस रि‍पोर्ट बनाई गई थी तो कोर्ट को यह क्‍यों नहीं बताया कि कानून मंत्री को यह रि‍पोर्ट दि‍खाई गई थी। 26 को कानून मंत्री को यह रि‍पोर्ट दि‍खाई गई थी। लेकि‍न यह नहीं बताया कि इसमें क्‍या बदलाव कि‍ए गए थ। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह से कोर्ट को अंधेरे में रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए चार सवाल पूछे हैं जि‍नका जवाब सभी पक्षों को देना है। सीबीआई के वकील यूयू ललि‍त ने कोर्ट में कहा कि वह इन सवालों का जवाब अभी देने की स्‍थि‍ति में हैं पर फि‍र भी उन्‍हें दो दि‍न का वक्‍त दि‍या जाए। वहीं कोर्ट ने कहा कि जो हलफनामा साझा कि‍या गया, उससे मामले की पूरी प्रक्रि‍या पर असर पड़ा। रि‍पोर्ट दि‍खाने के मामले में सरकारी वकीलों ने भी झूठ बोला। कोर्ट ने सीबीआई को सोमवार को नया हलफनामा देने को कहा है। सीबीआई के डायरेक्‍टर रंजीत सिन्‍हा ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्‍पणी पर कहा कि इसमें अफसोस करने लायक कुछ भी नहीं है। अब यह मामला सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच है। सीबीआई डायरेक्‍टर ने कहा, 'मैं भी सरकार का अंग हूं। मैं अपनी बात 6 मई को सुप्रीम कोर्ट में रखूंगा।'

सर्वोच्च न्यायलय करेगा कानून मंत्री अश्विनी की किस्मत का फैसला



आज तक ब्यूरो |
नई दिल्ली, 30 अप्रैल 2013 |

कोयला घोटाले में फंसी यूपीए सरकार के सामने आज नई मुसीबत खड़ी हो सकती है. देश की सर्वोच्च अदालत में सीबीआई की स्टेट्स रिपोर्ट पर आज सुनवाई होनी है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि जांच एजेंसी की ओर से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने से पहले उसे कानून मंत्री, कोयला मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय से साझा करना सही है या गलत. सुप्रीम कोर्ट को सीबीआई ने बताया था कि जांच रिपोर्ट में बदलाव किए गए थे और दो स्तर पर रिपोर्ट बदली गई थी.
कानून मंत्री अश्चिनी कुमार का क्‍या होगा?
आज पूरे देश की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं क्योंकि इस मसले से कानून मंत्री अश्विनी कुमार का भाग्य भी जुड़ा है. सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में माना है कि उसने कोयला घोटाले पर अपनी रिपोर्ट को कानून मंत्री अश्विनी कुमार को दिखाया था. कहा जा रहा है कि सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट के दो वर्जन कोर्ट में सौंपे. सूत्रों के मुताबिक दूसरे वर्जन में तमाम बदलाव साफ नजर आ रहे हैं. जाहिर है सर्वोच्च अदालत की एक तीखी टिप्पणी कानून मंत्री के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है.

सवालों के घेरे में प्रधानमंत्री कार्यालय
कानून मंत्री के साथ-साथ कोयला मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय भी सवालों के घेरे में है. 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में सीबीआई के डॉयरेक्टर रंजीत सिन्हा ने माना है कि उन्होंने रिपोर्ट को कानून मंत्रालय, कोयला मंत्रालय और पीएमओ कार्यलाय से साझा किया था. आरोप है कि सीबीआई ने इन मंत्रालयों के अफसरों के कहने पर मूल स्टेट्स रिपोर्ट में फेरबदल किया था. साफ है पूरे मामले में विपक्ष के हमले झेल रही यूपीए सरकार की मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं.

सुनवाई को लेकर सरकार चिंतित
कोयला घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट में आज होने वाली अहम सुनवाई को लेकर सरकार चिंतित है. सूत्रों के मुताबिक सरकार के बड़े अधिकारी इस मामले पर कानून विशेषज्ञों की राय ले रहे हैं. बताया जा रहा है कि इस हफ्ते अटॉर्नी जनरल जी ई वाहनवती ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात भी की. विपक्ष कानून मंत्री अश्विनी कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है और सरकार को मालूम है कि अगर सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई तीखी टिप्पणी की जाती है तो उसके सामने नई मुसीबत आ जाएगी.

आमने-सामने कानूनी अफसर
कोयला घोटाले में सीबीआई पर दबाव बनाने का आरोप झेल रही सरकार एक नई मुसीबत में फंस गई है. स्टेटस रिपोर्ट को लेकर सरकार के दो बड़े कानूनी अफसर आमने−सामने आ गए हैं. सूत्रों के मुताबिक एडिशनल सॉलिसिटर जनरल हरीन रावल ने अटॉर्नी जनरल वाहनवती को 4 पन्नों की चिट्ठी लिखी है, जिसमें अटॉर्नी जनरल पर गंभीर आरोप लगाए हैं. एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने वाहनवती पर सीबीआई के कामकाज में दखलअंदाजी का आरोप लगाया है. हरीन रावल ने अपनी चिट्ठी में कहा है कि अटॉर्नी जनरल ने ऐसे कई मामलों में दखलअंदाजी की जिसकी सीबीआई जांच कर रही है. एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने लिखा है कि उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है.

बीजेपी को मिला एक और मौका
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के खुलासे ने बीजेपी को सरकार पर हमला करने का एक और मौका दे दिया. बीजेपी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने कहा है कि एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के नए खुलासे ने सभी को अंचभे में डाल दिया है. उन्‍होंने कहा कि इस खुलासे के बाद यह साबित हो चुका है कि प्रधानमंत्री भी पूरे मामले में दोषी हैं और उन्हें फौरन इस्तीफा दे देना चाहिए.

पीएम के इस्‍तीफे पर अड़ी बीजेपी
कोयला घोटाले को लेकर सोमवार को भी संसद में जमकर हंगामा हुआ. विपक्ष के हंगामे के कारण दोनों सदनों में कोई कामकाज नहीं हो सका. बीजेपी अब भी प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़ी है. बीजेपी ने प्रधानमंत्री के साथ-साथ कानून मंत्री अश्विनी कुमार का भी इस्तीफा मांगा है. बीजेपी के अड़ियल रुख को देखते हुए यह साफ हो गया है कि इस मुद्दे पर संसद में गतिरोध आगे भी जारी रहेगा.

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

अफजल गुरु की फांसी के बदले में सबरजीत पर जान लेवा हमला





विपक्ष इस मामले मे राजनीति कर रहा है. सीमा पर सैनिक का सिर् कटा जाई तब भी बोलने पर विपक्ष राजनीति करता है, युध बंदियों के शव पर यातनाओं के इतने निशान थे तब भी बोलने पर विपक्ष राजनीति करता है, देश की जनता की दौलत लूटने वालों के खिलाफ बोलने तो विपक्ष राजनीति करता है, आतंकवादी हमले मे सरकार की नाकामी पर बोलने पर भी विपक्ष राजनीति करता है. देश मे करोरों टन अनाज सढ जाने पर भी विपाकश राजनीति करता है. सीबी आइ के दुपयोग पर बोलने पर भी विपक्ष राजनीति कर रहा है का इल्जाम लगता है , रोज़ बलात्कार होने पर घटना की निन्दा करते हुए अगर किसी भी पार्टी का नेता पुलिस तंत्र की नाकामी की भी बात करे तो राजनीति कर रहा है.. मेरे ख्याल से कांग्रेस की सरकार को एक कानून पास कर देना चाहिये कि हर पार्टी को सरकार के हर कदम हर पॉलिसी का समर्थन करना जरूरी है, अगर किसी ने भी उसके खिलाफ बोला तो आपराधिक कृत्य माना जायेगा और देशद्रोह की सजा मिलेगी.

अफजल गुरु की फांसी के बदले में सबरजीत पर जान लेवा हमला 

सरबजीत की हालत नाजुक, ISI ने कराया हमला ? 

पाक जेल में सरबजीत सिंह पर कैदियों ने किया हमला
नवभारतटाइम्स.कॉम | Apr 27, 2013, 02.24PM IST
लाहौर।। पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में हमले में घायल भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की हालत बेहद नाजुक है। अगले 24 घंटे सरबजीत के लिए बेहद अहम हैं। लाहौर के जिन्ना अस्पताल में भर्ती कराए गए सरबजीत को वेंटिलेटर पर रखा गया है। सरबजीत डीप कोमा में हैं और हालत स्थिर होने तक किसी तरह की सर्जरी नहीं की जा सकती है।

सरबजीत पह हमला ISI की साजिश?
सरबजीत पर कैदियों ने हमला किया या यह आईएसआई ने करवाया? पाकिस्तान की जेल में सरबजीत पर हुए हमले में साजिश की बू आ रही है। सरबजीत सिंह की जान को जेल में खतरे के बारे में इंटेलिजेंस ब्यूरो और रॉ की रिपोर्ट के बाद भारत सरकार ने पाक सरकार को आगाह किया था, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान ने कोई कदम नहीं उठाए। पाकिस्तान की कोट लखपत जेल से छूटे सुरजीत सिंह ने भी सरबजीत पर हमले की पीछे साजिश की आशंका जाहिर की है। उन्होंने कहा कि जेल में कैदियों के बीच भाईचारा रहता है, इसलिए कोई कैदी हमला नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि सरबजीत को खत्म करने के लिए यह साजिश रची गई होगी। कोट लखपत जेल में मारे गए चमेल सिंह के बेटे दीपक सिंह ने भी सरबजीत पर हमले की पीछे साजिश की आशंका जाहिर की है।

बहन सदमे में, तबीयत बिगड़ी
सरबजीत पर हमले की खबर से उनकी बहन दलबीर कौर और बेटियां सदमे में हैं। शनिवार को दलबीर की तबीयत बिगड़ गई। दलबीर को बेचैनी और सीने में दर्द की शिकायत पर डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने की सलाह दी है। दलबीर का इलाज कर रहे डॉक्टरों ने बताया कि उनका ब्लड प्रेशर बढ़ गया है। दलबीर कौर ने पाकिस्तान में अपने भाई से मिलने की इच्छा जताई है। उन्होंने पाकिस्तान सरकार से गुजारिश की है कि वह सरबजीत से मिलने के लिए उन्हें वीजा दे। उधर, सरबजीत की सलामती के लिए देशभर में पूजा और इबादत का दौर जारी है।

सरबजीत को देखने पहुंचे भारतीय अधिकारी
भारतीय उच्चायोग के दो अधिकारी देर रात जिन्ना हॉस्पिटल के आईसीयू में सरबजीत को देखने पहुंचे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने बताया कि इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के अधिकारी लाहौर स्थित जिन्ना हॉस्पिटल के आईसीयू में रात दो बजे सरबजीत को देखने पहुंचे। सरबजीत की देखभाल कर रहे डॉक्टरों ने बताया कि वह वेंटिलेटर पर कोमा में हैं और उन्हें आईवी ड्रिप दी जा रही है।

जेल के दो अधिकारी सस्पेंड, हमलावर कैदियों की पहचान
सरबजीत पर हमले का मामला गर्माने पर पाकिस्तान ने कोट लखपत जेल के असिस्टेंड सुपरिंटेंडेंट और जेल वॉर्डन को सस्पेंड कर दिया है। जियो न्यूज के हवाले से मिली खबरों के मुताबिक, सरबजीत पर जेल के दो कैदियों ने हमला किया और उनकी पहचान कर ली गई है। हमला करने वाले कैदियों के नाम मुदस्सर और आमेर आफताब बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि कुछ दिन पहले आमेर का सरबजीत से झगड़ा हुआ था।



ईंट और ब्लेड से किया हमला
कैदियों ने सरबजीत सिंह पर ईंटों और ब्लेड से हमला किया और उनकी जमकर पिटाई की। पिटाई में सरबजीत बुरी तरह घायल हो गए। उनके सिर में काफी चोट लगी है। सरबजीत पर हमला करने वाले दोनों कैदी मौत की सजा पाए हुए हैं। दोनों कैदियों से पूछताछ की जा रही है ताकि हमले की वजह का पता लगाया जा सके।

वेंटिलेटर पर सरबजीत सिंह
कैदियों के हमले में घायल सरबजीत को गंभीर हालत में लाहौर के जिन्ना अस्पताल में आईसीयू में भर्ती कराया गया। फिलहाल उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है। डॉक्टरों ने सरबजीत की हालत बेहद नाजुक बताई है। इस घटना की सूचना मिलते ही भारतीय उच्चायोग के दो अधिकारियों को लाहौर भेजा गया। जेल अधिकारियों ने सरबजीत पर हमले के मामले में फिलहाल आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि जेल में सरबजीत को अलग वॉर्ड में रखा जाता था। यह घटना लंच टाइम में हुई, जब उन्हें दूसरे वॉर्ड में शिफ्ट किया जा रहा था।

सरबजीत की बेटी की आत्मदाह की धमकी
भारत में सरबजीत सिंह के गांव में उनकी सलामती के लिए दुआ की जा रही है। सरबजीत की बेटी ने आत्मदाह की धमकी देते हुए भारत सरकार से इस मामले में कड़े कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने इस मामले में सही कदम नहीं उठाए तो वह आत्मदाह कर लेंगी। सरबजीत की बेटी ने बताया कि उन्हें न्यूज चैनल से हमले के बारे में पता लगा और उसके बाद उन्हें पाकिस्तान से फोन पर भी इस घटना की जानकारी दी गई।

सरबजीत की बहन के संगीन आरोप
सरबजीत सिंह की बहन ने शुक्रवार को कहा कि संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी के बाद से उनके भाई की जान को पाकिस्तान में लगातार खतरा बना हुआ था और हमले की आशंका को लेकर उन्होंने अधिकारियों से मुलाकात की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने 2 दिन पहले ही भारत सरकार को सरबजीत के खिलाफ साजिश की जानकारी दी थी। पाकिस्तान के जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्नी ने भी साजिश की आशंका जताई।

सियासी पार्टियों ने की हमले की निंदा
कांग्रेस और बीजेपी समेत सभी पार्टियों ने सरबजीत पर हमले की कड़ी निंदा की। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि अगर पाक सरकार जेल के भीतर भारतीय कैदियों को सुरक्षा देने में नाकाम है तो इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। बीजेपी प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि जेल के भीतर सरबजीत को जान से मारने की कोशिश से साफ हो गया कि पाकिस्तान एक आतंकवादी राष्ट्र है। वीएचपी ने भी सरबजीत सिंह पर जेल के भीतर हुए हमले की निंदा की। वीएचपी ने भारत सरकार से इस मामले पर कड़ा रुख अपनाने की मांग की।

सरबजीत पर क्या है आरोप?
49 साल के सरबजीत को 1990 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हुए बम धमाके में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इस धमाके में 14 लोगों की जान गई थी। गिरफ्तारी के बाद सरबजीत को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। बाद में सरबजीत ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की, जिस पर अब तक कोई फैसला नहीं किया गया है। हालांकि, भारत इस मामले को गलत पहचान का मामला बताता है।


मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी


पाकिस्तान की जेल में भारतीय कैदी सरबजीत सिंह पर हुए हमले को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार को अपने नागरिकों के जीवन की कोई चिंता नहीं है।





शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

संत श्री आशाराम बापू : Sant Shree Asaram Bapu


http://bharatdiscovery.org
भारत डिस्कवरी प्रस्तुति


आध्यात्मिक गुरु 

आशाराम बापू

संत श्री आशाराम बापू अथवा आसाराम बापू (अंग्रेज़ी: Asaram Bapu, जन्म: 17 अप्रॅल, 1941, सिंध) एक भारतीय आत्मज्ञानी संत हैं, जो मानवमात्र में एक सच्चिदानन्द ईश्वर के अस्तित्व का उपदेश देते हैं। आशाराम बापू का वास्तविक नाम 'आसुमल सिरुमलानी' है।

जीवन परिचय
संत श्री आसारामजी महाराज का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में सिंधु नदी के तट पर बसे बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 तदनुसार विक्रम संवत 1998 को चैत्र वदी षष्ठी के दिन हुआ था। इनकी पूजनीय माताजी का नाम महँगीबा है। उस समय नामकरण संस्कार के दौरान आपका नाम आसुमल रखा गया था।

बाल्य अवस्था
आशाराम का बाल्यकाल संघर्षों की एक लंबी कहानी हैं। विभाजन की विभिषिका को सहनकर भारत के प्रति अत्यधिक प्रेम होने के कारण आपका परिवार अपनी अथाह चल-अचल सम्पत्ति को छोड़कर यहाँ के अहमदाबाद शहर में 1947 में आ पहुँचा। अपना धन-वैभव सब कुछ छूट जाने के कारण वह परिवार आर्थिक विषमता के चक्रव्यूह में फँस गया लेकिन आजीविका के लिए किसी तरह से पिताश्री थाऊमलजी द्वारा लकड़ी और कोयले का व्यवसाय आरम्भ करने से आर्थिक परिस्थिति में सुधार होने लगा। तत्पश्चात् शक्कर का व्यवसाय भी आरम्भ हो गया।

शिक्षा
आशाराम बापू की प्रारम्भिक शिक्षा सिन्धी भाषा से आरम्भ हुई। तदनन्तर सात वर्ष की आयु में प्राथमिक शिक्षा के लिए आपको 'जयहिन्द हाईस्कूल', मणिनगर, (अहमदाबाद) में प्रवेश दिलवाया गया। अपनी विलक्षण स्मरणशक्ति के प्रभाव से आप शिक्षकों द्वारा सुनाई जाने वाली कविता, गीत या अन्य अध्याय तत्क्षण पूरी की पूरी हू-ब-हू सुना देते थे। विद्यालय में जब भी मध्यान्ह की विश्रान्ति होती, बालक आसुमल खेलने-कूदने या गप्पेबाजी में समय न गँवाकर एकांत में किसी वृक्ष के नीचे ईश्वर के ध्यान में बैठ जाते थे। चित्त की एकाग्रता, बुद्धि की तीव्रता, नम्रता, सहनशीलता आदि गुणों के कारण बालक का व्यक्तित्व पूरे विद्यालय में मोहक बन गया था। आप अपने पिता के लाड़ले संतान थे। अतः पाठशाला जाते समय पिताश्री आपकी जेब में पिश्ता, बादाम, काजू, अखरोट आदि भर देते थे जिसे आसुमल स्वयं भी खाते एवं प्राणिमात्र में आपका मित्रभाव होने से ये परिचित-अपरिचित सभी को भी खिलाते थे। पढ़ने में ये बड़े मेधावी थे तथा प्रतिवर्ष प्रथम श्रेणी में ही उत्तीर्ण होते थे, फ़िर भी इस सामान्य विद्या का आकर्षण आपको कभी नहीं रहा। लौकिक विद्या, योगविद्या और आत्मविद्या ये तीन विद्याएँ हैं, लेकिन आपका पूरा झुकाव योगविद्या पर ही रहा।

परिवार
माता-पिता के अतिरिक्त आशाराम बापू के परिवार में एक बड़े भाई तथा दो छोटी बहनें थीं। बालक आसुमल को माताजी की ओर से धर्म के संस्कार बचपन से ही दिये गये थे। माँ इन्हें ठाकुरजी की मूर्ति के सामने बिठा देतीं और कहतीं -“बेटा, भगवान की पूजा और ध्यान करो। इससे प्रसन्न हो कर वे तुम्हें प्रसाद देंगे।” वे ऐसा ही करते और माँ अवसर पाकर उनके सम्मुख चुपचाप मक्खन-मिश्री रख जातीं। बालक आसुमल जब आँखें खोलकर प्रसाद देखते तो प्रभु-प्रेम में पुलकित हो उठते थे।

विवाह
तरुणाई के प्रवेश के साथ ही घरवालों ने इनकी शादी करने की तैयारी की। वैरागी आसुमल सांसारिक बंधनों में नहीं फँसना चाहते थे इसलिए विवाह के आठ दिन पूर्व ही वे चुपके से घर छोड़ कर निकल पड़े। काफी खोजबीन के बाद घरवालों नें उन्हें भरूच के एक आश्रम में पा लिया। "चूँकि पूर्व में सगाई निश्चित हो चुकी है, अतः संबंध तोड़ना परिवार की प्रतिष्ठा पर आघात पहुँचाना होगा। अब हमारी इज्जत तुम्हारे हाथ में है।" सभी परिवारजनों के बार-बार इस आग्रह के वशीभूत होकर तथा तीव्रतम प्रारब्ध के कारण उनका विवाह हो गया, किन्तु आसुमल उस स्वर्णबंधन में रुके नहीं। अपनी सुशील एवं पवित्र धर्मपत्नी लक्ष्मीदेवी को समझाकर अपने परम लक्ष्य ‘आत्म-साक्षात्कार’ की प्राप्ति तक संयमी जीवन जीने का आदेश दिया। अपने पूज्य स्वामी के धार्मिक एवं वैराग्यपूर्ण विचारों से सहमत होकर लक्ष्मीदेवी ने भी तपोनिष्ठ एवं साधनामय जीवन व्यतीत करने का निश्चय कर लिया।

गृहत्याग एवं ईश्वर की खोज
विक्रम संवत 2020 की फाल्गुन सुदी 11 तदनुसार 23 फरवरी 1964 के पवित्र दिवस आप किसी भी मोह-ममता एवं अन्य विघ्न-बाधाओं की परवाह न करते हुए अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए घर छोड़कर चल पड़े। घूमते-घूमते आप केदारनाथ पहुँचे, जहाँ अभिषेक करवाने पर आपको पंडितों ने आशीर्वाद दिया कि ‘लक्षाधिपति भव।’ जिस माया को ठुकराकर आप ईश्वर की खोज में निकले, वहाँ भी मायाप्राप्ति का आशीर्वाद....! आपको यह आशीर्वाद रास न आया। अतः आपने पुनः अभिषेक करवा कर ईश्वरप्राप्ति का आशीर्वाद पाया एवं प्रार्थना की ‘भले माँगने पर भी दो समय का भोजन न मिले लेकिन हे ईश्वर! तेरे स्वरूप का मुझे ज्ञान मिले’ तथा ‘इस जीवन का बलिदान देकर भी अपने लक्ष्य की सिद्धि करके रहूँगा...!’ इस प्रकार का दृढ़ निश्चय करके वहाँ से आप भगवान श्रीकृष्ण की पवित्र लीलास्थली वृन्दावन पहुँच गये। होली के दिन यहाँ के दरिद्रनारायण में भंडारा कर कुछ दिन वहीं पर रुके और फिर उत्तराखंड की ओर निकल पड़े। गुफाओं, कन्दराओं, वनाच्छाति घाटियों, हिमाच्छादित पर्वतश्रृंखलाओं एवं अनेक तीर्थों में घूमे। कंटकाकीर्ण मार्गों पर चले, शिलाओं की शैया पर सोये। मौत का मुकाबला करना पड़े, ऐसे दुर्गम स्थानों पर साधना करते हुए वे नैनीताल के जंगलों में पहुँचे।

गुरु की प्राप्ति
ईश्वरप्राप्ति की तड़प से वे नैनीताल के जंगलों में पहुँचे। 40 दिन के लम्बे इन्तजार के बाद वहाँ इनका परमात्मा से मिलाने वाले परम पुरुष से मिलन हुआ, जिनका नाम था स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज। वह बड़ी अमृतवेला कही जाती है, जब ईश्वर की खोज के लिए निकले परम वीर पुरुष को ईश्वरप्राप्त किसी सदगुरु का सान्निध्य मिलता है। उस दिन को नवजीवन प्राप्त होता है। गुरु के द्वार पर भी कठोर कसौटियाँ हुई थीं, लेकिन परमात्मा के प्यार में तड़पता यह परम वीर पुरुष सारी-की-सारी कसौटियाँ पार करके सदगुरुदेव का कृपाप्रसाद पाने का अधिकारी बन गया। सदगुरुदेव ने साधना-पथ के रहस्यों को समझाते हुए आसुमल को अपना लिया। आध्यात्मिक मार्ग के इस पिपासु-जिज्ञासु साधक की आधी साधना तो उसी दिन पूर्ण हो गई जब सदगुरु ने अपना लिया। परम दयालु सदगुरु साईं श्री लीलाशाहजी महाराज ने आसुमल को घर में ही ध्यान भजन करने का आदेश देकर 70 दिन तक वापस अहमदाबाद भेज दिया।

आश्रम की स्थापना
साबरमती नदी के किनारे की उबड-खाबड़ टेकरियों (मिट्टी के टीलों) पर भक्तों द्वारा आश्रम के रूप में 29 जनवरी 1972 को एक कच्ची कुटिया तैयार की गई। इस स्थान के चारों ओर कंटीली झाड़ियाँ व बीहड़ जंगल था, जहाँ दिन में भी आने पर लोगों को चोर-डाकुओं का भय बराबर बना रहता था। लेकिन आश्रम की स्थापना के बाद यहाँ का भयावह एवं दूषित वातावरण एकदम बदल गया। आज इस आश्रमरूपी विशाल वृक्ष की शाखाएँ भारत में ही नहीं, विश्व के अनेक देशों तक पहुँच चुकी हैं। साबरमती के बीहड़ों में स्थापित यह कुटिया आज ‘संतश्री आसारामजी आश्रम’ के नाम से एक महान पावन तीर्थधाम बन चुकी है। इस ज्ञान की प्याऊ में आज लाखों की संख्या में आकर हर जाति, धर्म व देश के लोग ध्यान और सत्संग का अमृत पीते हैं तथा अपने जीवन की दुःखद गुत्थियों को सुलझाकर धन्य हो जाते हैं।

सत्संग समारोह
आज के अशांत युग में ईश्वर का नाम, उनका सुमिरन, भजन, कीर्तन व सत्संग ही तो एकमात्र ऐसा साधन है जो मानवता को जिन्दा रखे बैठा है और यदि आत्मा-परमात्मा को छूकर आती हुई वाणी में सत्संग मिले तो सोने में सुहागा ही मानना चाहिए। श्री योग वेदान्त सेवा समिति की शाखाएँ अपने-अपने क्षेत्रों में संतश्री के सुवचनों का आयोजन कर लाखों की संख्या में आने वाले श्रोताओं को आत्मरस का पान करवाती हैं। श्री योग वेदान्त सेवा-समितियों के द्वारा आयोजित आसारामजी बापू के दिव्य सत्संग समारोह में अक्सर यह विशेषता देखने को मिलती है कि इतनी विशाल जनसभा में ढाई-ढाई लाख श्रोता भी शांत व धीर-गंभीर होकर इनके वचनामृतों का रसपान करते हैं तथा मंडप कितना भी विशाल क्यों नहीं बनाया गया हो, वह भक्तों की भीड़ के आगे छोटा पड़ ही जाता है।

नारी उत्थान केन्द्र की स्थापना
‘राष्ट्र को उन्नति के परमोच्च शिखर तक पहुँचाने के लिए सर्वप्रथम नारी-शक्ति का जागृत होना आवश्यक है...’ यह सोचकर इन दीर्घदृष्टा मनीषी ने साबरमती के तट पर ही अपने आश्रम से क़रीब आधा किलोमीटर की दूरी पर ‘नारी उत्थान केन्द्र’ के रूप में महिला आश्रम की स्थापना की। महिला आश्रम में भारत के विभिन्न प्रान्तों से एवं विदेशों से आईं हुई अनेक सन्नारियाँ सौहार्दपूर्वक जीवनयापन करती हुई आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हो रही हैं।

आशाराम बापू
आशाराम बापू
पूरा नामसंत श्री आशाराम बापू
अन्य नामआसुमल सिरुमलानी
जन्म17 अप्रॅल 1941
जन्म भूमिसिंध, ब्रिटिश भारत
अविभावकथाऊमलजी सिरुमलानी और महँगीबा
गुरुस्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज
कर्म-क्षेत्रआध्यात्मिक गुरु
नागरिकताभारतीय
अद्यतन‎

पश्चिम बंगाल चिटफंड घोटाला : कांग्रेस का एक और घोटाला



                      पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता और  वित्तमंत्री पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम

चिटफंड घोटाले की आंच कांग्रेस तक

Apr 26, 2013,
navbharattimes.indiatimes.com
पीटीआई॥ नई दिल्ली, कोलकाता
पश्चिम बंगाल में निवेशकों के 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम डकार लेने के आरोपी शारदा गु्रप से जुड़े मामले की आंच अब तृणमूल से आगे बढ़कर कांग्रेस तक पहुंच गई है। आरोपों से बैकफुट पर आई तृणमूल कांग्रेस ने मामले में चेन्नै की एक सीनियर महिला वकील की भूमिका को लेकर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। इस वकील की केंद्र सरकार के एक मिनिस्टर से शादी हुई है।
गौरतलब है कि आरोपी सुदीप्तो सेन की ओर से सीबीआई को कथित तौर पर लिखे गए लेटर में आरोप लगाया गया था कि कुछ राजनेताओं, जर्नलिस्ट और वकीलों ने उसे ब्लैकमेल किया और सिक्युरिटी देने की एवज में उससे मोटी रकम भी ऐंठ ली। उधर, केंद्र में प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी ने भी महिला वकील की भूमिका होने के आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
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चिदंबरम की पत्नी लपेटे में
-सुदीप्तो सेन की कथित चिट्ठी में तृणमूल एपी संृजॉय बोस और कुनाल घोष, असम से कांग्रेस के एक मिनिस्टर के अलावा वित्तमंत्री पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम का नाम भी शामिल है।
- तृणमूल ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर नलिनी का नाम लिए बिना लिखा है, 'चेन्नै की एक महिला वकील शारदा घोटाले में डीलिंग क्यों कर रही थी? कांग्रेस के मंत्री को इसकी सफाई देनी चाहिए।
- तृणमूल ने आरोप लगाया कि महिला वकील ने एक एग्रीमेंट तैयार करने के बदले 1 करोड़ रुपये लिए। तृणमूल ने पूछा है कि इतनी बड़ी रकम वकील को क्यों दी गई और इसके बदले में उसने शारदा गु्रप के लिए क्या किया?
- तृणमूल ने यह भी पूछा है कि जब दिल्ली और गुवाहाटी में इतने वकील हैं तो चेन्नै के एक वकील की सेवाएं क्यों ली गईं? हालांकि, नलिनी के करीबी सूत्रों ने आरोपों को खारिज किया है।
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मामले में जांच के आदेश: कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के शारदा गु्रप और उस पर लगे धांधली करने के आरोपों की जांच करने का फैसला किया है। सूत्रों के मुताबिक, कॉरपोरेट मामलों के मंत्री सचिन पायलट की दूसरे सीनियर अधिकारियों के साथ गुरुवार सुबह हुई मीटिंग में इसका फैसला लिया गया। इस मीटिंग में इस मुद्दे के अलावा दूसरे संदिग्ध चिटफंड कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने पर भी चर्चा हुई। बता दें कि सेबी और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट भी मामले की जांच कर रहा है।
पुलिस रिमांड में सुदीप्तो : चिटफंड धांधली के मुख्य आरोपी सुदीप्तो सेन को कोर्ट ने गुरुवार को 14 दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया। सुदीप्तो के अलावा कंपनी की एक डायरेक्टर देवजानी मुखोपाध्याय और झारखंड में कंपनी के कामकाज देखने वाले अरविंद सिंह चौहान को भी रिमांड में भेजा गया है। इन पर धोखाधड़ी ( धारा 420) के अलावा कुछ अन्य चार्ज लगाए गए हैं।
शारदा गु्रप के नाम सैकड़ों कंपनियां : शारदा गु्रप ने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के यहां 100 से अधिक कंपनियों का रजिस्ट्रेशन करा रखा है। ये रीयल एस्टेट , ऑटोमोबाइल , एजुकेशन और एंटरटेनमेंट क्षेत्र की कंपनियां हैं। अधिकारी शारदा गु्रप की कम से कम 10 कंपनियों में फर्जी निवेश की स्कीम्स की जांच कर रहे हैं।
वेस्ट बंगाल सरकार को हलफनामा दायर करने का आदेश :
कोलकाता हाई कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल सरकार को आदेश दिया कि वह 2 मई तक शारदा गु्रप के खिलाफ उठाए गए अपने कदमों की जानकारी एक हलफनामे के जरिए कोर्ट के सामने रखे। कोर्ट ने यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जारी किया। कंपनी को अग्रिम आदेश तक कोई भी आर्थिक लेनदेन करने से भी रोका गया है।
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सुदीप्तो की चिट्ठी में कांग्रेस नेताओं के नाम भी

एजेंसी | Apr 26, 2013 आर्टिकल

कोलकाता/नई दिल्ली. सुदीप्तो सेन की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। शारदा ग्रुप के चैनल 10 के कर्मचारियों ने कोलकाता के पार्क स्ट्रीट थाने में सांसद कुणाल घोष, शारदा ग्रुप के सीएमडी सुदीप्तो सेन और वाइस प्रेसिडेंट समेत कई शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है। इसी बीच पश्चिम बंगाल में सक्रिय दो अन्य चिट फंड कंपनियां लोगों का पैसा लेकर चंपत हो गई हैं। वहीं, शारदा ग्रुप की ब्रैंड एंबेसेडर रह चुकीं तृणमूल कांग्रेस की सांसद शताब्दी रॉय का कहना है कि उनका शारदा ग्रुप के फर्जीवाड़े से कोई लेना देना नहीं है।

इससे पहले, पश्चिम बंगाल के शारदा चिटफंड घोटाले की लपेट में केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी भी आ गई हैं। घोटाले के मुख्य आरोपी शारदा ग्रुप के चेयरमैन सुदीप्तो सेन ने उन पर भी ब्लैकमेलिंग के आरोप लगाए हैं।

सीबीआई को भेजी 18 पेज की चिट्ठी में सुदीप्तो ने नलिनी का नाम लिया है। इसी में तृणमूल कांग्रेस के दो सांसद कुणाल घोष और सृंजय बोस का भी जिक्र है। दोनों सांसदों ने पी. चिदंबरम से इस पर जवाब मांगा है। हालांकि नलिनी ने आरोपों को बेबुनियाद बताया है। सुदीप्तो ने असम सरकार के एक मंत्री समेत 22 लोगों पर उनसे फायदा उठाने का आरोप लगाया है। उसने 15 अप्रैल को ही सीबीआई को चिट्ठी लिखी थी। लेकिन संबंधित जानकारियां अब बाहर आई हैं। सुदीप्तो सेन और उनके दो साथियों को गुरुवार को कोलकाता की कोर्ट में पेश किया गया। अदालत ने सभी को 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया है। तीनों को मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के गांदरबल में गिरफ्तार किया गया था। पेशी के दौरान कोर्ट में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हंगामा भी किया।

नलिनी से जुड़े पांच आरोप

1. नरसिम्हा राव सरकार में मंत्री रहे मतंग सिंह, उनकी पत्नी मनोरंजना और मेरी कंपनी के बीच नलिनी चिदंबरम ने डील कराई।

2. सबसे अधिक नुकसान मनोरंजना सिंह और मतंग सिंह ने पहुंचाया। मनोरंजना ही अपने पॉजिटिव ग्रुप्स की बिक्री के लिए नलिनी के पास ले गईं।

3. नलिनी ने कहा था कि मैं उन्हें नॉर्थ-ईस्ट में एक चैनल स्थापित करने में मदद करूं। कोई भी विवाद होने पर उसके निपटारे का भरोसा दिलाया था।

4. मैंने उन्हें एक करोड़ से अधिक दिए। इसके अलावा जब भी वह मनोरंजना के साथ कोलकाता आतीं उनकी यात्रा और होटल खर्च मैं ही वहन करता था।

5. नलिनी ने मुझे 42 करोड़ रुपए चैनल के लिए देने को कहा। मैंने अब तक मनोरंजना सिंह और उनके एक सहयोगी को 25 करोड़ रुपए दिए हैं।

सेबी ने चार और कंपनियों पर कार्रवाई को कहा
पश्चिम बंगाल में चार और कंपनियां चार हजार करोड़ रुपए से अधिक की चिट फंड स्कीम चला रही हैं। सेबी ने राज्य सरकार को भेजी चिट्ठी में इनके खिलाफ भी जांच कर कार्रवाई करने को कहा है। इन कंपनियों में रोज वैली इन्वेस्टमेंट, सुमंगल इंडस्ट्रीज, एमपीएस ग्रीनरी और सन प्लांट ग्रुप शामिल है। सेबी के एक अधिकारी के अनुसार हालात इतने बुरे हैं कि पश्चिम बंगाल प्रेशर कुकर बम जैसी स्थिति में आ चुका है।
ईडी ने भी दर्ज किया मामला
चिटफंड कंपनी शारदा समूह के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय ने भी मामला दर्ज कर लिया है। कंपनी के खिलाफ निदेशालय के गुवाहाटी ऑफिस में मनी लाउंड्रिंग एक्ट के तहत केस दर्ज कराया गया है। इससे पहले शारदा ग्रुप के खिलाफ पश्चिम बंगाल की पुलिस, सेबी, आयकर विभाग और कॉरपोरेट मामलों का मंत्रालय पहले से ही जांच कर रहा है। उधर, पश्चिम बंगाल सरकार ने 29 अप्रैल को विधानसभा की विशेष बैठक बुलाई है। उम्मीद है कि इसमें चिट फंड कंपनियों पर अंकुश लगाने के लिए कठोर कानून पास किया जाएगा। या संभव है कि मौजूदा कानून में ही संशोधन किया जाए।

केंद्र ने मार्च में ही किया था आगाह
नई दिल्ली त्नकेंद्रीय कंपनी मामलों के मंत्री सचिन पायलट ने मार्च में ही भारतीय रिजर्व बैंक से वित्तीय कारोबार से जुड़ी संदिग्ध कंपनियों की जांच के लिए लिखा था। आम और गरीब निवेशकों के साथ वित्तीय धोखाधड़ी करने का पश्चिम बंगाल में शारद ग्रुप ऑफ कंपनीज और दो अन्य कंपनियों का मामला तो खुल गया लेकिन देश में ऐसी 22 हजार से अधिक वित्तीय कंपनियों के संदिग्ध कारोबार पर सरकार की नजर है। भास्कर में यह खबर तब भी प्रमुखता से छपी थी। संभवत: कंपनी मामलों के मंत्रालय को शारदा ग्रुप जैसी कंपनियों के फरेब का आभास हो गया था। पायलट ने इस मामले में केंद्रीय वित्त मंत्रालय को भी पत्र लिखा था। कंपनी मामलों के मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक ऐसी 87 कंपनियों के खिलाफ जांच की जा रही है, जिनके खिलाफ शिकायत मिली है।
इनमें पश्चिम बंगाल की शारदा ग्रुप की कंपनियां भी हैं। इनमें अधिकतर गैर-बैंकिंग कंपनियों के रूप में लोगों को उनके निवेश पर बेहतर रिटर्न देने का वादा करती रही हैं। मार्च के शुरू में सचिन पायलट ने रिजर्व बैंक को पत्र लिखा था कि इस समय 34,754 कंपनियां गैर-बैंकिंग या उससे मिलता-जुलता कारोबार कर रही हैं। इनमें मात्र 12,375 को ही रिजर्व बैंक ने गैर-बैकिंग कारोबार की अनुमति दी हुई है जबकि दूसरों ने बचने के लिए अपने पंजीकरण के समय ऐसी बातें जोड़ दी हैं जिससे लगे कि ये भी गैर-बैंकिंग संस्था के तौर पर काम करने को अधिकृत हैं। पायलट ने रिजर्व बैंक को सभी 34,754 कंपनियों की जानकारी साझा करते हुए उनके खिलाफ जांच की सलाह दी थी। उस समय कंपनी मामलों के मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय को भी एक पत्र लिखा था और अनुरोध किया था कि वह रिजर्व बैंक को स्पष्ट निर्देश दे कि अवैध वित्तीय कारोबार में लगी कंपनियों की जांच करे। मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक जिन 87 कंपनियों के खिलाफ जांच की जा रही है, उनमें 73 के साथ पश्चिम बंगाल की हैं। वहीं दिल्ली में 5 व तमिलनाडु में 5 कंपनियों के खिलाफ जांच चल रही है। इसके अलावा राजस्थान में 2 कंपनियों के साथ कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की 1-1 कंपनी की जांच की जा रही है।
क्या कर रहा है कंपनी मामलों का मंत्रालय
ऐसे मामले, जिसमें छोटे निवेशकों को मल्टी लेवल मार्केटिंग के नाम पर फंसाया जाता है, को रोकने के लिए पूर्वानुमान सेल बनाया जा रहा है। यह सेल बिना शिकायत के उन कंपनियों के खिलाफ अपनी जांच शुरू कर देगा, जिसकी योजनाएं अव्यावहारिक लगेंगी। मंत्रालय ने अपने एंटी फ्रॉड इंवेस्टीगेशन ऑफिस को सभी राज्य के ऐसे कार्यालय के साथ तालमेल करने को कहा है। इसके अलावा मंत्रालय अपने मार्केट रिसर्च एवं एनालिसिस यूनिट को अपनी इंटेलिजेंस यूनिट के तौर पर नए सिरे से गठित कर रहा है। राज्य सरकार के माध्यम से विभिन्न राज्यों में पुलिस के साथ भी तालमेल बढ़ा रहा है, जिससे त्वरित आधार पर किसी कंपनी के बाबत जानकारी हासिल की जा सके।
'आम और गरीब निवेशक अपने जीवन की जमा-पूंजी आकर्षक प्रलोभन की वजह से इन कंपनियों में लगा देते हैं, जब ऐसे लोगों के साथ धोखाधड़ी होती है तो केंद्र सरकार का उसमें दखल जरूरी हो जाता है। कंपनी मामलों का मंत्रालय और स्वयं मैं इस मामले से आहत और स्तब्ध हूं। इस मामले की जांच पर हम निगरानी रख रहे हैं और अपने स्तर पर भी जांच शुरू करेंगे, ताकि गरीब और आम लोगों का पैसा, जो इन कंपनियों ने हड़प लिया है, वापस दिलाने का हर संभव प्रयास किया जा सके।'
-सचिन पायलट - कंपनी मामलों के मंत्री 

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

हनुमान जी के जन्म की कथा






स्कन्दपुराण

के उल्लेखानुसार भगवान महादेव ही भगवान विष्णु के श्री राम अवतार की सहायता के लिए महाकपि हनुमान बनकर अपने ग्यारहवें रुद्र के रूप में अवतरित हुए | यही कारण है कि हनुमान जी को रुद्रावतार भी कहा जाता है | इस उल्लेख कि पुष्टि श्रीरामचरित मानस, अगत्स्य संहिता, विनय पत्रिका और वायु पुराण आदि में भी की गयी है |


हनुमान जी के जन्म को लेकर विद्वानों में अलग-अलग मत हैं | परन्तु हनुमान जी के अवतार को लेकर तीन तिथियाँ सर्वमान्य हैं |

इनमें से पहली तिथि है: चैत्र एकादशी

"चैत्रे मासे सिते पक्षे हरिदिन्यां मघाभिदे |
नक्षत्रे स समुत्पन्नौ हनुमान रिपुसूदनः | |"

इस श्लोक के अनुसार हनुमान जी का जन्म चैत्र शुक्ल की एकादशी को हुआ था|

एक दुसरे मत के अनुसार श्री हनुमान जी का जन्म चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को हुआ था | इस मत को निम्नलिखित श्लोक से समझा जा सकता है:

"महाचैत्री पूर्णीमाया समुत्पन्नौ अन्जनीसुतः |
वदन्ति कल्पभेदेन बुधा इत्यादि केचन | |"

वैसे, श्री हनुमान जी के अवतरण को लेकर एक तीसरा मत भी है, जोकि नीचे दिए गए श्लोक में उल्लिखित है:

"ऊर्जे कृष्णचतुर्दश्यां भौमे स्वात्यां कपीश्वरः |
मेष लग्ने अन्जनागर्भात प्रादुर्भूतः स्वयं शिवा | |"

इस श्लोक के अनुसार हनुमान जी के अवतार की तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि ही है|

अधिकतर विद्वान् व ज्योतिषी भी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को ही श्री हनुमान जी के अवतार की तिथि मानते हैं |

श्री हनुमान जी के अवतार कि तिथियों के समान ही उनके अवतार की कथाएँ भी विभिन्न हैं| इनमें प्रमुख रूप से दो ही कथाएँ सर्वमान्य हैं | उन कथाओं को यहाँ आप सब के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है |


पहली कथा:

विवाह के बहुत दिनों के बाद भी जब माता अंजना को संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ तब उन्होंने निश्चय करके अत्यंत कठोर तप किया | उन्हें तप करता देख महामुनि मतंग ने उनसे उनके उस तप का कारण पूछा | तब माता अंजना ने कहा, "हे मुनिश्रेष्ठ! केसरी नामक वानरश्रेष्ठ ने मुझे मेरे पिता मांगकर मेरा वरण किया| मैंने अपने पति के संग में सभी सुखों व वैभवों का भोग किया परन्तु संतान सुख से अभी तक वंचित हूँ | मैंने बहुत से व्रत और उपवास भी किये परन्तु संतान की प्राप्ति नहीं हुई | इसीलिए अब मैं कठोर तप कर रही हूँ | मुनिवर! कृपा करके मुझे पुत्र प्राप्ति का कोई उपाय बताएं |"

महामुनि मतंग ने उन्हें वृषभाचल भगवान वेंकटेश्वर के चरणों में प्रणाम कर के आकाश गंगा नामक तीर्थ में स्नान कर, जल ग्रहण करके वायुदेव को प्रसन्न करने को कहा |

माता अंजना ने मतंग ऋषि द्वारा बताई गयी विधि के अनुसार वायु देव को प्रसन्न करने के लिए संयम, धैर्य, श्रद्धा व विशवास के साथ तप आरम्भ किया| उनके तप से प्रसन्न होकर वायुदेव ने मेष राशि सूर्य की स्थिति के समय चित्र नक्षत्र युक्त पूर्णिमा के दिन उन्हें दर्शन देकर वरदान मांगने को कहा | तब माता अंजना ने उत्तम पुत्र का वरदान माँगा | वायुदेव ने वरदान देते हुए माता अंजना को उनके पिछले जन्म का स्मरण कराते हुए कहा, "हे अंजना! तुम्हारे गर्भ से एक अत्यंत बलशाली एवं तेजस्वी पुत्र जन्म लेगा, अपितु स्वयं भगवान शंकर ही ग्यारहवें रुद्र के रूप में तुम्हारे गर्भ से अवतरित होंगे| पिछले जन्म में तुम पुन्जिकस्थला नामक अप्सरा थी और मैं तुम्हारा पति था परन्तु ऋषि श्राप के कारण हमें वियोग सहना पड़ा और तुम इस जनम में अंजना के रूप में इस धरती पर आई हो, इस नाते मैं तुम्हारे होने वाले पुत्र का धर्म-पिता कहलाऊंगा तथा तुम्हारा वो पुत्र पवनपुत्र नाम से भी तीनो लोकों में जाना जाएगा|"


दूसरी कथा:

रावण का वध करने के लिए जब भगवान विष्णु ने श्री राम अवतार लिया, तब अन्य देवतागण भी श्रीराम जी की सेवा के लिए अलग-अलग रूपों में प्रकट हुए | भगवान शंकर ने पूर्वकाल में भगवान विष्णु से दास्य का वरदान माँगा था जिसे पूर्ण करने के लिए वे भी अवतार लेना चाह रहे थे परन्तु उनके समक्ष धर्मसंकट यह था कि जिस रावण का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने श्रीराम का रूप लिया था, वह रावण स्वयं उनका (शिव जी का) परम भक्त था | अपने परम भक्त के विरूद्ध वे श्रीराम जी की सहायता कैसे कर सकते थे, ऊपर से रावण को शिव जी की ओर से अभय का वरदान भी प्राप्त था| रावण ने अपने दस सिरों को अर्पित कर शिव जी के दस रुद्रों को पहले ही संतुष्ट कर रखा था, अतः भगवान शंकर अपने उन दस रुद्रों के रूप में भी श्रीराम जी की सहायता नहीं कर सकते थे, अतः उन्होंने अपने ग्यारहवें रुद्र के रूप में अवतार लिया जो कि हनुमान नाम सारे जग में विख्यात है | हनुमान रूप में भगवान शंकर ने श्री राम जी की सेवा भी की तथा रावण के वध में उनकी सहायता भी की |

ये दोनों कथाएँ श्री हनुमान जी के अवतरण की प्रमाणिकता सिद्ध करती हैं |

इस प्रकार भगवान शंकर ने ही हनुमान जी के रूप में समस्त देवी-देवताओं एवं समस्त मानवजाति का कल्याण किया है | हनुमान जी आज भी इस धरती पर विद्यमान हैं और पापियों से अपने भक्तों की रक्षा कर रहे हैं तथा उनकी आराधना एवं उपासना से बड़े से बड़े कष्ट बड़ी शीघ्रता से दूर हो जाते हैं |

"जय श्री राम"
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हनुमान जी के जन्म की कथा 

- उत्तरकाण्ड / बाल्मीकि रामायण 


यह कथा सुनकर श्रीराम हाथ जोड़कर अगस्त्य मुनि से बोले, "ऋषिवर! निःसन्देह वालि और रावण दोनों ही भारी बलवान थे, परन्तु मेरा विचार है कि हनुमान उन दोनों से अधिक बलवान हैं। इनमें शूरवीरता, बल, धैर्य, नीति, सद्‍गुण सभी उनसे अधिक हैं। यदि मुझे ये न मिलते तो भला क्या जानकी का पता लग सकता था? मेरे समझ में यह नहीं आया कि जब वालि और सुग्रीव में झगड़ा हुआ तो इन्होंने अपने मित्र सुग्रीव की सहायता करके वालि को क्यों नहीं मार डाला। आप कृपा करके हनुमानजी के बारे में मुझे सब कुछ बताइये।"
रघुनाथजी के वचन सुनकर महर्षि अगस्त्य बोले, "हे रघुनन्दन! आप ठीक कहते हैं। हनुमान अद्‍भुत बलवान, पराक्रमी और सद्‍गुण सम्पन्न हैं, परन्तु ऋषियों के शाप के कारण इन्हें अपने बल का पता नहीं था। मैं आपको इनके विषय में सब कुछ बताता हूँ। इनके पिता केसरी सुमेरु पर्वत पर राज्य करते थे। उनकी पत्‍नी का नाम अंजना था। इनके जन्म के पश्‍चात् एक दिन इनकी माता फल लाने के लिये इन्हें आश्रम में छोड़कर चली गईं। जब शिशु हनुमान को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने के लिये आकाश में उड़ने लगे। उनकी सहायता के लिये पवन भी बहुत तेजी से चला। उधर भगवान सूर्य ने उन्हें अबोध शिशु समझकर अपने तेज से नहीं जलने दिया। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके, उसी समय राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था। हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की कि देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज जब अमावस्या के दिन मैं सूर्य को ग्रस्त करने के लिये गया तो मैंने देखा कि एक दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।

"राहु की बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और राहु को साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमान जी सूर्य को छोड़कर राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमान जी के ऊपर वज्र का प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर जा गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी गति रोक ली। इससे कोई भी प्राणी साँस न ले सका और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे मृत हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्मा जी ने उन्हें जीवित कर दिया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सब प्राणियों की पीड़ा दूर की। चूँकि इन्द्र के वज्र से हनुमान जी की हनु (ठुड्डी) टूट गई थी, इसलिये तब से उनका नाम हनुमान हो गया। फिर प्रसन्न होकर सूर्य ने हनुमान को अपने तेज का सौंवा भाग दिया। वरुण, यम, कुबेर, विश्‍वकर्मा आदि ने उन्हें अजेय पराक्रमी, अवध्य होने, नाना रूप धारण करने की क्षमता आदि के वर दिया। इस प्रकार नाना शक्‍तियों से सम्पन्न हो जाने पर निर्भय होकर वे ऋषि-मुनियों के साथ शरारत करने लगे। किसी के वल्कल फाड़ देते, किसी की कोई वस्तु नष्ट कर देते। इससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने इन्हें शाप दिया कि तुम अपने बल और शक्‍ति को भूल जाओगे। किसी के याद दिलाने पर ही तुम्हें उनका ज्ञान होगा। तब से उन्हें अपने बल और शक्‍ति का स्मरण नहीं रहा। वालि और सुग्रीव के पिता ऋक्षराज थे। चिरकाल तक राज्य करने के पश्‍चात् जब ऋक्षराज का देहान्त हुआ तो वालि राजा बना। वालि और सुग्रीव में बचपन से ही प्रेम था। जब उन दोनों में बैर हुआ तो सुग्रीव के सहायक होते हुये भी शाप के कारण हनुमान अपने बल से अनजान बने रहे।"

हनुमान के जीवन की यह कथा सुनकर सबको बड़ा आश्‍चर्य हुआ।
जब अगस्त्य तथा अन्य मुनि अयोध्या से विदा होकर जाने लगे तो श्रीराम ने उनसे कहा, "मेरी इच्छा है कि पुरवासी और देशवासियों को अपने-अपने कार्यों में लगाकर मैं यज्ञों का अनुष्ठान करूँ। आपसे प्रार्थना है कि आप सब उन यज्ञों में अवश्य पधारकर भाग लेने की कृपा करें।"
सब ऋषियों ने उसमें भाग लेने की अपनी स्वीकृति प्रदान की। फिर वे वहाँ से विदा होकर अपने-अपने आश्रम को चले गये।

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

वीरांगना झलकारीबाई झाँसी




 4 अप्रैल उस महान वीरांगना को याद करने का दिन है जिसकी वीरता किसी भी मायने में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से कम नहीं थी पर उसे इतिहास और हमारे हृदयों में वो स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था| ये महान वीरांगना थी, झलकारीबाई जो झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में, महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापति थीं। २२ नवंबर १८३० झांसी के पास के भोजला गाँव में एक निर्धन कोली परिवार में सदोवर सिंह और जमुना देवी के घर में जन्मी झलकारी को कोई औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त नहीं हो पाई, लेकिन उन्होनें घुड़सवारी और हथियारों का प्रयोग करने में महारत हासिल करके खुद को एक अच्छे योद्धा के रूप में विकसित कर लिया। उनकी बहादुरी ही झाँसी की सेना के सिपाही पूरन कोरी से उनके विवाह का माध्यम बनी जो अपनी वीरता के लिए पूरे झाँसी में प्रसिद्द था|

एक बार गौरी पूजा के अवसर पर झलकारी गाँव की अन्य महिलाओं के साथ महारानी को सम्मान देने झाँसी के किले मे गयीं, वहाँ रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गयी क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं थीं (दोनो के रूप में आलौकिक समानता थी)। अन्य औरतों से झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनकर रानी लक्ष्मीबाई बहुत प्रभावित हुईं। रानी ने झलकारी को दुर्गा सेना में शामिल करने का आदेश दिया। झलकारी ने यहाँ अन्य महिलाओं के साथ बंदूक चलाना, तोप चलाना और तलवारबाजी की प्रशिक्षण लिया। यह वह समय था जब झांसी की सेना को किसी भी ब्रिटिश दुस्साहस का सामना करने के लिए मजबूत बनाया जा रहा था। चूँकि वे रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थीं इस कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वे रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं। अपने अंतिम समय में भी वे रानी के वेश में युद्ध करते हुए वे अंग्रेज़ों के हाथों पकड़ी गयीं और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। कहा जाता है कि झलकारी बाई का पति पूरन किले की रक्षा करते हुए शहीद हो गया लेकिन झलकारी ने बजाय अपने पति की मृत्यु का शोक मनाने के, ब्रिटिशों को धोखा देने की एक योजना बनाई।

जब किले का पतन निश्चित हो गया तो रानी के सेनापतियों और झलकारी बाई ने उन्हें कुछ सैनिकों के साथ किला छोड़कर भागने की सलाह दी। योजनानुसार महारानी लक्ष्मीबाई एवं झलकारी दोनों पृथक-पृथक द्वार से किले बाहर निकलीं। झलकारी ने तामझाम अधिक पहन रखा था जिस कारण शत्रु ने उन्हें ही रानी समझा और उन्हें ही घेरने का प्रयत्न किया। रानी अपने घोड़े पर बैठ अपने कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ झांसी से दूर निकल गईं। शत्रु सेना से घिरी झलकारी भयंकर युद्ध करने लगी। एक भेदिए ने पहचान लिया और उसने भेद खोलने का प्रयत्न किया। वह भेद खोले, इसके पूर्व ही झलकारी ने उसे अपनी गोली का निशाना बनाया। दुर्भाग्य से वह गोली एक ब्रिटिश सैनिक को लगी और वह गिरकर मर गया। वह भेदिया तो बच गया पर झलकारी घेर ली गई। ब्रिटिश शिविर में पहँचने पर उसने चिल्लाकर कहा कि वो जनरल ह्यूग रोज़ से मिलना चाहती है। रोज़ और उसके सैनिक प्रसन्न थे कि न सिर्फ उन्होने झांसी पर कब्जा कर लिया है बल्कि जीवित रानी भी उनके कब्ज़े में है। जनरल ह्यूग रोज़, जो उसे रानी ही समझ रहा था, ने झलकारी बाई से पूछा कि उसके साथ क्या किया जाना चाहिए? तो उसने दृढ़ता के साथ कहा,मुझे फाँसी दो। एक अन्य ब्रिटिश अफसर ने कहा--“मुझे तो यह स्त्री पगली मालूम पड़ती है।” जनरल रोज ने इसका तत्काल उत्तर देते हुए कहा---“यदि भारत की एक प्रतिशत नारियाँ इसी प्रकार पागल हो जाएँ तो हम अंग्रेजों को सब कुछ छोड़कर यहाँ से चले जाना होगा।”

उधर डोली में बैठी झलकाराई बाई को देखकर फिरंगी दल भौंचक्का रह गया। रानी आ गई, झांसी की रानी ने समर्पण कर दिया है, जैसी चर्चा हर सैनिक कर रहा था। डोली जैसे ही सेना के बीच पहुंची, गद्दार दूल्हाजू ने शोर मचा दिया कि अरे यह रानी नहीं है झलकारी है।उसेके बताने पर पता चला कि यह रानी लक्ष्मी बाई नहीं बल्कि महिला सेना की सेनापति झलकारी बाई है जो अग्रेंजी सेना को धोखा देने के लिए रानी लक्ष्मीबाई बन कर लड़ रही है। ब्रिटिश सेनापति रोज ने झलकारी को डपटते हुए कहा कि-“आपने रानी बनकर हमको धोखा दिया है और महारानी लक्ष्मीबाई को यहाँ से निकालने में मदद की है। आपने हमारे एक सैनिक की भी जान ली है। मैं भी आपके प्राण लूँगा।” झलकारी ने गर्व से उत्तर देते हुए कहा-“मार दे गोली, मैं प्रस्तुत हूँ।” सैनिक डोली पर झपटे कि झलकारी तुरन्त घोड़े पर सवार हो गई। तलवार म्यान से बाहर निकाल कर मारकाट करने लगी। ह्यूरोज जमीन पर गिर पड़ा, घबराकर बोला बहादुर औरत शाबास। जिस रानी की नौकरानी इतनी बहादुर है वह रानी कैसी होगी। झलकारी बाई ने बढ़ती हुई अंग्रेज सेना को रोका और द्रुतगति से मारकाट करने लगी। काफी संघर्ष के बाद जनरल रोज ने झलकारी को एक तम्बु में कैद कर लिया। इसके आगे इस विषय पर कुछ मतभेद है कि झलकारी बाई का अंत कैसे हुआ।

वृंदावनलाल वर्मा, जिन्होने पहली बार झलकारीबाई का उल्लेख उनकी “झांसी की रानी” पुस्तक में किया था, के अनुसार रानी और झलकारीबाई के संभ्रम का खुलासा होने के बाद ह्युरोज़ ने झलकारीबाई को मुक्त कर दिया था। उनके अनुसार झलकारी बाई का देहांत एक लंबी उम्र जीने के बाद हुआ था (उनके अनुसार उन्होने खुद झलकारीबाई के नाती से जानकारी ली थी)। बद्री नारायण अपनी Women heroes and Dalit assertion in north India: culture, identity and politics किताब में वर्मा जी से सहमत दिखते हैं। इस किंवदंती के अनुसार जनरल ह्यूग रोज़ झलकारी का साहस और उसकी नेतृत्व क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ, और झलकारी बाई को रिहा कर दिया था पर वो अंग्रेज जिन्होंने लाखों निर्दोष मनुष्यों और अनगिनत क्रांतिकारियों को कूर तरीकों से मारा था उनसे इस काम की आशा की ही नहीं जा सकती अतः यह केवल एक कयास मात्र लगता है। दूसरे पक्ष के कुछ इतिहासकारों का कहना है कि उन्हें अंग्रेजों द्वारा फाँसी दे दी गई, वहीँ कुछ का कहना है कि उनका अंग्रेजों की कैद में जीवन समाप्त हुआ। इसके विपरीत कुछ इतिहासकार मानते हैं कि झलकारी इस युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुई जो कि सही मालूम पड़ता है । श्रीकृष्ण सरल ने अपनी Indian revolutionaries: a comprehensive study, 1757-1961, Volume 1 पुस्तक में उनकी मृत्यू लड़ाई के दौरान हुई थी, ऐसा वर्णन किया है। अखिल भारतीय युवा कोली राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नरेशचन्द्र कोली के अनुसार ४ अप्रैल १८५७ को झलकारी बाई ने वीरगति प्राप्त की।

झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जा सकती है। वीरांगना झलकारी बाई का सबसे पहले उल्लेख बुन्देलखण्ड के सुप्रसिद्ध साहित्यिक इतिहासकार वृन्दावन लाल वर्मा ने अपने उपन्यास लक्ष्मीबाई में किया था जिसके बाद में धीरे - धीरे अनेक विद्वानों, सहित्यकारों, इतिहासकारों ने झलकारी के स्वतन्त्रता संग्राम के योगदान का उदघाटित किया। अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल (२१-१०-१९९३ से १६-०५-१९९९ तक) और श्री माता प्रसाद ने झलकारी बाई की जीवनी की रचना की है। इसके अलावा चोखेलाल वर्मा ने उनके जीवन पर एक वृहद काव्य लिखा है, मोहनदास नैमिशराय ने उनकी जीवनी को पुस्तकाकार दिया है और भवानी शंकर विषारद ने उनके जीवन परिचय को लिपिबद्ध किया है। झलकारी बाई का विस्तृत इतिहास भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण के प्रकाशन विभाग ने झलकारी बाई शीर्षक से ही प्रकाशित किया है। झांसी के इतिहासकारों में अधिकतर ने वीरांगना झलकारी बाई को नियमित स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में नहीं सम्मलित किया किन्तु बुन्देली के सुप्रसिद्ध गीतकार महाकवि अवधेश ने झलकारी बाई शीर्षक से एक नाटक लिखकर वीरांगना झलकारीबाई की ऐतिहासिकता प्रमाणित की है।

वीरांगना झलकारी बाई के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में दिये गये योगदान से देश का अधिकतर जनमानस तो परिचित नहीं है किन्तु एक नकारात्मक घटना ने उन्हें कम से कम बुंदेलखंड क्षेत्र में जन - जन से परिचित करा दिया। हुआ यों कि मार्च २०१० में आगरा के दो प्रकाशकों चेतना प्रकाशन और कुमार पाब्लिकेशन ने बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी के पाठयक्रम के अनुसार एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने बहु विकल्पीय प्रश्नों में वीरांगना झलकारी को नर्तकी की श्रेणी में प्रकाशित कर वीरांगना को अपमानित करने का प्रयास किया। इन दोनों प्रकाशनों का राजनैतिक व्यक्तियों, सामाजिक संगठनों, बुद्धजीवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों ने कड़ा विरोध किया और प्रकाशक के विरोध में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से व्यक्त किये गये आक्रोश से स्वयंसिद्ध हो गया कि राष्ट्र के लिए त्याग और बलिदान की मिसाल पेश करने वाली वीरांगना को नर्तकी की श्रेणी में रखना केवल वीरांगना झलकारीबाई का ही अपमान नहीं था बल्कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और देश की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों का घोर अपमान था| लोगों का गुस्सा तब शान्त हुआ जब झांसी के मण्डलायुक्त के आदेश पर प्रकाशक के विरूद्ध मुकदमा पंजीकृत हो गया। वीरांगना झलकारी बाई के बारे में इस प्रकार की अपमान जनक टिप्पणी प्रकाशित करने के पहले भले ही आम जनमानस उनके योगदान को न जानता रहा हो किन्तु उस समय से समाज के सजग पाठक अवश्य परिचित हो गये है।

यूँ तो भारत सरकार ने २२ जुलाई २००१ में झलकारी बाई के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया है था परन्तु कड़वा सच यही है कि हम कृतघ्नों ने अपने इन महान पूर्वजों को बिसरा दिया और ख़ास तौर पर उन्हें जिनका सम्बन्ध तथाकथित उच्च वर्ग से नहीं था| हमें अपनी इस गलती को सुधारना चाहिए और इन महान आत्माओं को उचित स्थान देना चाहिए| त्याग और बलिदान की अनूठी मिसाल पेश करने वाली वीरांगना झलकारीबाई को शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि| राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने झलकारी की बहादुरी को निम्न प्रकार पंक्तिबद्ध किया है -
जा कर रण में ललकारी थी, वह तो झाँसी की झलकारी थी।
गोरों से लड़ना सिखा गई, है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी।

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

फिर अकेले मोदी ही 'राक्षस' क्यों..?- मधु पूर्णिमा किश्‍वर




Mahesh Girase/ facebook

फिर अकेले मोदी ही 'राक्षस' क्यों..?
-मधु पूर्णिमा किश्‍वर
( लेखिका जानीमानी समाजविज्ञानी हैं)

फरवरी 2002 में जब हिंसक दंगों से गुजरात के कुछ हिस्से कांप उठे, तब मैंने भी राष्ट्रीय मीडिया और अपने सक्रिय प्रतिभागी मित्रों के विवरण को स्वीकार कर लिया और मान लिया कि वर्ष 2002 के दंगों में मोदी भी लिप्त थे। इस कारण से मैंने भी मोदी के खिलाफ बयानों पर हस्ताक्षर कर दिए और मानुषी में उन लेखों को छापा, जिनमें गुजरात सरकार को दोषी ठहराया गया था। हमने भी दंगा पीडि़तों के लिए फंड इकट्‍ठा किया।
लेकिन, मैं अपने नाम से कुछ भी लिखने से बचती रही क्योंकि मुझे गुजरात जाने, वहां अनुभव लेने और स्वयं स्थिति को जांचने का मौका नहीं मिला था। मेरे पहले के विभिन्न दंगों को कवर करने के अनुभव और कश्मीर तथा पंजाब में हिंसक संघर्ष की स्थितियों ने मुझे सिखा दिया था कि ऐसे मुद्‍दों पर सुनिश्चित रुख तय करने से पहले मीडिया की रिपोर्टों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है क्योंकि ये आमतौर पर लेखक की विचारधारा के रंग से रंगी होती हैं। इसलिए मैंने गुजरात पर कोई बयान देने से खुद को रोका।
देश के सभी बड़े दंगों को कवर करने के लिए- जिनमें 1984 का सिखों का नरसंहार शामिल है, 1980 के दशक में मेरठ और मलियाना में दंगों के दौर, 1993 के बॉम्बे के दंगे, 1989 में जम्मू के दंगे और कई अन्य बहुत से दंगों, जोकि बिहारशरीफ, भिवंडी, जमशेदपुर और अहमदाबाद तथा सूरत में हुए थे, के दौर का बारीकी से अध्ययन करने में बहुत-सा समय खर्च करने के बाद मैंने जाना कि दिल्ली में 1984 के दंगों को छोड़कर अन्य सभी दंगे भाजपा और कांग्रेस ने मिल-जुलकर भड़काए थे।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ था, इस अपराध में भाजपा के साथ कांग्रेस भी बराबर की भागीदार थी। महात्मा गांधी के वैचारिक आदर्शवाद से कभी प्रेरित रही कांग्रेस पार्टी इससे पूरी तरह दूर होकर और अपनी संदिग्ध भूमिका के कारण सारे देश में हाशिए पर आ गई है।
जानकार गुजरातियों का कहना था कि 2002 के दंगों में संघ परिवार के उपद्रवियों के साथ कांग्रेसी भी शामिल थे, जिन्होंने सामूहिक हत्याओं, आगजनी और लूट में बड़े उत्साह से भाग लिया था।
शुरुआती रिपोर्टों से यह जानकारी मिली और बाद में अनौपचारिक नेटववर्क्स से पता चला कि मुस्लिमों की ओर से भी बदले में भारी हिंसा की गई, जिसके चलते हजारों हिंदुओं को भारी नुकसान उठाना पड़ा और उन्हें भी शरणार्थी शिविरों में पनाह लेनी पड़ी।
इसलिए जब आमतौर पर भाजपा और विशेष रूप से मोदी को हमलों के लिए एक मात्र जिम्मेदार बताया गया और अब तक के ज्ञात इतिहास में इन दंगों से पहले और बाद में अन्य किसी राजनीतिज्ञ का इतना राक्षसीकरण नहीं किया गया। तब इस कारण से किसी में भी इतनी घृणा और मोदी हटाओ प्रचार से स्वाभाविक तौर पर बेचैनी पैदा हुई।
यह बेचैनी तब और बढ़ गई जब वर्षों के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि मोदी को राक्षस बताने और बनाने में शामिल एनजीओ, सक्रिय प्रतिभागियों, पत्रकारों, शिक्षाविदों को कांग्रेस पार्टी का सक्रिय संरक्षण मिला और कुछ को तो मोदी के खिलाफ लगातार अभियान चलाने के लिए बहुत अधिक वित्तीय सहायता भी मिली।
उत्तर भारत में 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान जो लोग पीडि़तों के लिए काम करते थे और जिन्होंने अभूतपूर्व नरसंहार के बारे में लिखा भी है, ऐसे लोगों की एक ही मांग थी कि 'दोषियों को सजा दो'।
हालांकि तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी, गृहमंत्री पीवी नरसिंह राव, दिल्ली के उपराज्यपाल पीजी गवई की इनमें सं‍ल‍िप्तता निर्लज्जता की हद तक जाहिर थी। लेकिन इसके बावजूद न तो प्रधानमंत्री, न ही गृहमंत्री और न ही उपराज्यपाल को राक्षस की तरह पेश नहीं किया गया था। लेकिन गुजरात के 2002 के दंगों में समूचा दोष केवल एक आदमी के मत्थे मढ़ दिया गया।
हाल ही के एक इंटरव्यू में फिल्म पटकथा लेखक सलीम खान ने एक मनोरंजक टिप्पणी की थी कि 'क्या किसी को याद है कि मुंबई दंगों के समय महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री कौन था और ये दंगे 2002 में गुजरात के दंगों से कम भीषण नहीं थे?' क्या किसी को याद है कि मेरठ और मलियाना में दंगों के समय उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री कौन था?
जब कांग्रेस के शासन काल में भागलपुर और जमशेदपुर में दंगे हुए थे तब बिहार का मुख्यमंत्री कौन था? स्वतंत्रता के बाद गुजरात में सैकड़ों दंगों के दौरान रहे मुख्‍यमंत्रियों के नामों की किसी को याद है? इनमें से कुछ दंगे तो 2002 के दंगों से भी ज्यादा भयानक थे।
राज्य में हर दो महीनों में हिंसा फैलती थी? क्या किसी को याद है कि जब 1984 में सिखों का नरसंहार किया गया था तब दिल्ली की सुरक्षा की कमान किसके हाथ में थी? लेकिन नरेन्द्र मोदी अकेले को ही एक राक्षस का 'अवतार' बना दिया जैसे कि उन्होंने खुद ही 2002 के दंगों में हत्याएं की हों?
ज्यादा अतीत के दंगों की ही बात क्यों करें, क्या किसी को लाखों की संख्या में बोडो और मुस्लिमों के दुर्भाग्य की याद है, जिन्हें जुलाई 2012 में अपने गांवों को छोड़ना पड़ा था क्योंकि उनके घरों को आग लगा दी गई थी या उन्हें नष्ट कर दिया गया था? 8 अगस्त 2012 तक करीब 400 गांवों से बेदखल होकर 4 लाख से ज्यादा लोगों को 270 राहत शिविरों में पनाह लेनी पड़ी थी। तब असम के मुख्यमंत्री ने सेना की तैनाती में चार दिनों की देरी की थी, जबकि राज्य में बड़े पैमाने पर सेना की टुकडि़यां तैनात बनी रहती हैं। हजारों की संख्या में लोग अभी भी शरणार्थी शिविरों में नारकीय स्थितियों में रह रहे हैं। उन दंगों को क्यों भुला दिया गया?
यह बात भी मुझे बहुत ही आश्चर्यजनक लगी कि मोदी के खिलाफ प्रचार युद्ध की अगुवाई करने वाले लोग न तो मुस्लिम हैं और न ही गुजरात के निवासी हैं। मोदी विरोधी ब्रिगेड की गुजरात से तीन सर्वाधिक महत्वपूर्ण हस्तियां मुस्लिम नहीं हैं।
जब एक गुजराती मुस्लिम ने एक अलग स्वर में बोलने की को‍श‍िश की तो उस पर क्रूरतापूर्वक हमला किया गया और इसकी उन्हें इतनी भारी कीमत चुकानी पड़ी कि डर के मारे लोगों ने मुंह बंद कर लिए। अत्यधिक सम्मानित और प्रसिद्ध मुस्लिम विद्वान मौलाना वस्तानवी को देवबंद के वाइस चांसलर पद से मात्र इसलिए इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि उन्होंने कह दिया था कि मोदी सरकार की समावेशी विकास नीतियों से गुजराती मुस्लिमों को लाभ हुआ है।
उर्दू दैनिक नईदुनिया के सम्पादक शाहिद सिद्‍दीकी पर हमला किया गया और उन्हें लगातार गालियां दी गईं क्योंकि उन्होंने मोदी का इंटरव्यू लिया था जिसमें मोदी ने उनकी सरकार पर लगे आरोपों के खिलाफ अपनी सफाई दी थी। जल्द ही सिद्‍दीकी ने अपने सुर बदल लिए और वे भी टीवी पर मोदी विरोधी गाने गाते दिखाई देने लगे।
भारत में राजनीतिक संवाद में मोदीफोबिया के चलते वातावरण इतना दूषित हो गया कि अगर आप ग्रामीण गुजरात में सड़कों की गुणवत्ता पर संतोष जताते हैं या गुजरात के गांवों, कस्बों में चौबीसों घंटे बिजली सप्लाई पर खुशी जाहिर करते हैं तो आप तुरंत ही 'फासिस्ट समर्थक' करार दिए जाते हैं।

कश्मीरी अलगाववादियों का बचाव करना, पाकिस्तानी सरकार के साथ शांतिपूर्ण वार्ता की वकालत करना या लोगों की हत्या करने वाले माओवादियों को 'गरीबों का रक्षक' करार दिया जाना आज राजनीतिक तौर पर फैशन बन गया है। लेकिन गुजरात में सरकारी सुधारों की प्रशंसा करना राजनीतिक आत्महत्या करने जैसा है। आप पर हमेशा के लिए कलंक लगा दिया जाता है और आपके चेहरे पर फासिज्म समर्थक के रंग पोत दिए जाते हैं।
मोदी बिरोधी ब्रिगेड द्वारा पैदा किए गए इस बौद्धिक आतंक ने मुझे खुद यह पता लगाने को प्रेरित किया कि मोदी को लेकर यह सनक भरी चिंता क्यों फैली है? 'धर्मनिरपेक्षतावादी' क्यों यह याद दिलाना नहीं पसंद करते हैं कि 2002 से गुजरात मे कोई दंगा नहीं हुआ? वे क्यों यह बात नहीं लिखना चाहते हैं कि सैकड़ों दंगों को देख चुके गुजरात के हिंदुओं और ‍म‍ुस्लिमों के बीच अविश्वास की बहुत गहरी खाई है जिसके बावजूद गुजरात ने मोदी के शासनकाल में एक पहला दंगा मुक्त दशक गुजारा है? इस बारे में गुजरात के मुस्लिमों का क्या कहना है? उन्हें अपनी बात को खुद क्यों नहीं कहने दिया जाता है?
-मधु पूर्णिमा किश्‍वर ( लेखिका जानीमानी समाजविज्ञानी हैं)
Source :- http://legendnews.in/index.php?subaction=showfull&id=1366372369&archive

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो -मीरा





पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ..
वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु किरपा करि अपनायो .
जनम जनम की पूंजी पाई जग में सभी खोवायो .
खरचै न खूटै चोर न लूटै दिन दिन बढ़त सवायो .
सत की नाव खेवटिया सतगुरु भवसागर तर आयो .
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर हरष हरष जस गायो .

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां - भजन


भजन - ठुमक चलत रामचंद्र
ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां ..

किलकि किलकि उठत धाय
गिरत भूमि लटपटाय .
धाय मात गोद लेत
दशरथ की रनियां ..

अंचल रज अंग झारि
विविध भांति सो दुलारि .
तन मन धन वारि वारि
कहत मृदु बचनियां ..

विद्रुम से अरुण अधर
बोलत मुख मधुर मधुर .
सुभग नासिका में चारु
लटकत लटकनियां ..

तुलसीदास अति आनंद
देख के मुखारविंद .
रघुवर छबि के समान
रघुवर छबि बनियां ..

राम के आदर्शों का अनुकरण करें - राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी




रामनवमी संदेश में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी बोले,
राम के आदर्शों का अनुकरण करें -  राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी
नई दिल्ली। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भगवान राम के जन्मदिवस के रूप में मनाए जाने वाले हिंदूओं के त्योहार रामनवमी पर देशवासियों को शुभकामनाएं दी। राष्ट्रपति ने देश के नाम जारी संदेश में कहा, "राम नवमी के पावन अवसर पर मैं देश की जनता का अभिनंदन करता हूं तथा उन्हें शुभकामनाएं देता हूं।"
उन्होंने कहा, "हम सभी इस अवसर पर भगवान राम की ईमानदारी, दया और धैर्य के आदर्शों का अनुकरण करने की कोशिश करें। मैं कामना करता हूं कि सदाचार के मार्ग पर चलने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का महान उदाहरण हमेशा हमारे लिए प्रेरणा का काम करे।" राष्ट्रपति ने कहा, "मैं यह कामना करता हूं कि उत्साह का यह पर्व हमारे देश की जनता को एक करे तथा हमारे देश का गौरवमय भविष्य लिखने के लिए प्रेरित करे।" रामनवमी का पर्व भारत में शुक्रवार को मनाया जाएगा।

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

गोधरा-गुजरात का सच आज




गुजरात दंगे का सच आज
जहा देखो वहा गुजरात के
दंगो के बारे में ही सुनने
और देखने को मिलता है
फिर चाहे वो गूगल
हो या फेसबुक हो या फिर टीवी चैनेल | रोज रोज
नए खुलाशे हो रहे हैं |
रोज गुजरात की सरकार
को कटघरे में
खड़ा किया जाता है|
सबका निशाना केवल एक नरेन्द्र मोदी |
जिसे देखो वो अपने को को जज
दिखाता है| हर कोई
सेकुलर के नाम पर एक
ही स्वर में गुजरात
दंगो की भर्त्सना करते हैं |
कारसेवको को मारने के
लिए ट्रेन को जलाने
की कई दिनों से
योजना बन रही थी- साबरमती ट्रेन हादसे में
मौत की सजा प्राप्त
अब्दुल रजाक कुरकुर के
अमन गेस्टहाउस पर
ही कारसेवको को जिन्दा
की कई हप्तो से योजना बनी थी ... इसके
गेस्टहाउस से कई पीपे
पेट्रोल बरामद हुए थे |
पेट्रोल पम्प के
कर्मचारीयो ने भी कई
मुसलमानों को महीने से पीपे में पेट्रोल खरीदने
की बात कही थी और उन्हें
पहचान परेड में
पहचाना भी था ..
पेट्रोल को सिगनल
फालिया के पास और अमन गेस्टहाउस में
जमा किया जाता था | गोधरा से तत्कालीन
सहायक स्टेशन मास्टर के
द्वारा वडोदरा मंडल
ट्रेफिक कंट्रोलर
को भेजी गयी गुप्त
रिपोर्ट ::- गोधरा के तत्कालीन
सहायक स्टेशन मास्टर
राजेन्द्र मीणा ने
वडोदरा मंडल के ट्रेफिक
कंट्रोलर को आरपीएफ के
गुप्तचर शाखा के जानकारी के आधार पर
एक रिपोर्ट
भेजी थी जिसमे उन्होंने
कहा था की गोधरा आउट
पर
किसी भी सवारी ट्रेन को रोकना और खासकर
अयोध्या जाने
वाली या आने
वाली साबरमती एक्सप्रेस
को रोकना बहुत
खतरनाक होगा क्योकि कुछ
संदिग्ध लोग
कारसेवको को नुकसान
पहुचाने
की योजना बना रहे है
उन्होंने लिखा था की ट्राफिक
को इस तरह से कंट्रोल
किया जाए
की साबरमती ट्रेन
को आउटर पर रुकना न पड़े गौरतलब है की जिस जगह
यानी सिगनल
फलिया पर
साबरमती ट्रेन
को जलाया गया था ठीक
उसी जगह पर 28 November 1990
को पांच हिन्दू
टीचरों को जलाकर
मारा गया था जिसमे
दो महिला टीचर थी .
.इस केस में भी बीस मुसलमानों को आरोपी पा आखिर ट्रेन हादसे के
दो दिनों के बाद गुजरात
में दंगे क्यों भडके ? मित्रो कभी आपने
सोचा है कि जब ट्रेन 27
फरवरी को जलाई
गयी तो गुजरात में
पहली हिंसा दो दिन के
बाद यानी 29 फरवरी को क्यों हुई ? मित्रो साबरमती हादसे
की किसी भी मुस्लिम
सन्गठन ने
निंदा नही की .. उलटे
जमायत ये इस्लामी हिन्द के तत्कालीन प्रमुख ने इसके लिए
कारसेवको को ही जिम्मेदर ठहरा दिया ..
शबाना आजमी ने
भी कहा की कारसेवको क किये
की सजा मिली है ..आखिर क्या जरूरत थी अयोध्या जाने की ...
तीस्ता जावेद सेतलवाड और मल्लिका साराभाई और शबनम हाश्मी ने एक
संयुक्त प्रेस कांफेरेस के कहा की हमे ये नही भूलना चाहिए की वो कार सेवक किसी नेक मकसद के
नही गये थे बल्कि विवादित जगह पर मन्दिर बनाने गये थे |
मशहूर पत्रकार वीर संघवी ने भी इंडियनएक्सप्रेस में एक आर्टिकल
लिखा था ""they condemn the crime, but blame the victims" उन्होंने
लिखा था की ऐसे बयानों ने हिन्दुओ को झकझोर दिया था |
जब भी मीडिया गुजरात दंगो की बात करता है तब वो दंगे भडकने के पहले और
गोधरा ट्रेन हादसे के बाद 27 February 2002 को गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और बड़े
कांग्रेसी नेता अमरसिंह चौधरी का टीवी पर आकर दिया गया बयान क्यों नही दिखाता ?
मित्रो, अमरसिंह चौधरी ने साबरमती ट्रेन हादसे की निंदा नही की बल्कि वो कारसेवको को कोसने
लगे और मृत कारसेवको के बारे में अनाप सनाप बकने लगे .. और कहा की ये लोग खुद अपनी मौत के
जिम्मेदार है ..
इन सब बातो ने गुजरात की जनता को भडकाने का काम लिया .. अब सवाल उठता है की गुजरात दंगा हुआ
क्यों ? 27 फरवरी 2002 साबरमती ट्रेन के बोगियों को जलाया गया स्टेशन से करीब ८२६ मीटर की दुरी पर स्थित जगह सिगनल फालिया पर | इस ट्रेन में जलने से 58 लोगो को मौत हुई | 25 औरते और 19 बच्चे भी मारे गये | प्रथम दृष्टया रहे वहा के 14 पुलिस के जवान जो उस समय स्टेशन पर मौजूद थे और उनमे से ३ पुलिस वाले घटना स्थल पर पहुचे और साथ ही पहुचे अग्नि शमन दल के एक जवान सुरेशगिरी गोसाई जी |
अगर हम इन
चारो लोगो की माने
तो म्युनिसिपल
काउंसिलर हाजी बिलाल भीड़ को आदेश दे रहे थे
ट्रेन के इंजन को जलने का|
साथ ही साथ जब ये जवान
आग बुझाने की कोशिस कर
रहे थे तब ट्रेन पर
पत्थरबाजी चालू कर दी गई भीड़ के द्वारा|
अब इसके आगे बढ़ कर देखे
तो जब गोधरा पुलिस
स्टेशन की टीम पहुची तब
२ लोग १०,००० की भीड़
को उकसा रहे थे ये थे म्युनिसिपल प्रेसिडेंट
मोहम्मद कलोटा और
म्युनिसिपल काउंसिलर
हाजी बिलाल| अब सवाल उठता है
की मोहम्मद कलोटा और
हाजी बिलाल को किसने
उकसाया और ये ट्रेन
को जलाने क्यों गए? असल में गोधरा की मुख्य
मस्जिद
का मौलाना मौलवी हाज
जी ही इस कांड का मुख्य
आरोपी पाया गया और
उसे अदालत ने फांसी की सजा दी ..जिसे
बाद में आजीवन
कारावास में तब्दील
किया गया | दुसरे
आरोपीयो ने विभिन्न
जाँच एजेंसियों और कोर्ट में
बताया की मौलाना उमर
हप्तो से मस्जिद में नमाज
के बाद भडकाऊ तकरीर
देता था और
कहता था की हमे बदला लेना है ..इन
कारसेवको ने
बाबरी मस्जिद तोड़ी है
इसलिए हर मुसलमान
का फर्ज है
की वो बदला ले | सवालो के बाढ़
यही नहीं रुकते हैं
बल्कि सवालो की लिस्ट
अभी लम्बी है| अब सवाल उठता है
की क्यों मारा गया ऐसे
राम भक्तो को| कुछ
मीडिया ने बताया की ये
मुसलमानों को उकसाने
वाले नारे लगा रहे....अब क्या कोई
बताएगा की क्या भगवान
राम के भजन
मुसलमानों को उकसाने
वाले लगते हैं? लेकिन इसके पहले भी एक
हादसा हुआ २७
फ़रवरी २००२ को सुबह
७:४३ मिनट ४ घंटे
की देरी से जैसे
ही साबरमती ट्रेन चली और प्लेटफ़ॉर्म
छोड़ा तो प्लेटफ़ॉर्म से
१०० मीटर की दुरी पर
ही १००० लोगो की भीड़
ने ट्रेन पर पत्थर चलाने
चालू कर दिए पर यहाँ रेलवे की पुलिस ने
भीड़ को तितर बितर कर
दिया और ट्रेन को आगे के
लिए रवाना कर दिया|
पर जैसे ही ट्रेन मुस्किल से
८०० मीटर चली अलग अलग बोगियों से कई बार
चेन खिंची गई |
बाकि की कहानी जिसपर
बीती उसकी जुबानी |
उस समय मुस्किल से
१५-१६ साल की बच्ची की जुबानी |
ये बच्ची थी कक्षा ११ में
पढने
वाली गायत्री पंचाल
जो की उस समय अपने
परिवार के साथ अयोध्या से लौट
रही थी की माने तो ट्रेन
में राम धुन चल
रहा था और ट्रेन जैसे
ही गोधरा से आगे बढ़ी एक
दम से रोक दिया गई चेन खिंच कर | उसके बाद देखने
में आया की एक भीड़
हथियारों से लैस हो कर
ट्रेन की तरफ बढ़ रही है
| हथियार भी कैसे
लाठी डंडा नहीं बल्कि त गुप्ती, भाले, पेट्रोल
बम्ब, एसिड बल्ब्स और
पता नहीं क्या क्या |
भीड़ को देख कर ट्रेन में
सवार यात्रियों ने
खिड़की और दरवाजे बंद कर लिए पर भीड़ में से
जो अन्दर घुस आए थे
वो कार सेवको को मार
रहे थे और उनके
सामानों को लूट रहे थे और
साथ ही बहार खड़ी भीड़ मरो-काटो के नारे
लगा रही थी | एक लाउड
स्पीकर जो की पास के
मस्जिद पर था उससे बार
बार ये आदेश
दिया जा रहा था की "म काटो. लादेन
ना दुश्मनों ने मारो" |
साथ ही बहार खड़ी भीड़
ने पेट्रोल डाल कर आग
लगाना चालू कर
दिया जिससे कोई जिन्दा ना बचे| ट्रेन
की बोगी में चारो तरफ
पेट्रोल भरा हुआ था|
दरवाजे बहार से बंद कर
दिए गए थे ताकि कोई
बहार ना निकल सके| एस-६ और एस-७ के वैक्यूम
पाइप कट
दिया गया था ताकि ट्रे
आगे बढ़ ही नहीं सके|
जो लोग जलती ट्रेन से
बहार निकल पाए कैसे भी उन्हें काट
दिया गया तेज
हथियारों से कुछ
वही गहरे घाव की वजह से
मारे गए और कुछ बुरी तरह
घायल हो गए| गोधरा फायर सर्विस के
जवानो का बयान नानावती औरशाह आयोग
को दिए अपने बयानों में
फायर बिग्रेड के लोगो ने
कहा की जबहमे
सुचनामिली की ट्रेन
जलाई गयी है तो हम तुरंत पहुचे लेकिन सिग्लन
फालिया के पास कई
मुस्लिम महिलाये और
बच्चे हमारा सामने लेट
गये ..और कई लोग
चिल्ला रहे थे की इनको तब तक मत जाने
देना जबतक की ट्रेन
पूरी तरह जल न जाये |
हिन्दू सड़क पर उतारे 29
फ़रवरी 2002 के दोपहर
से | पूरा दो दिन हिन्दू शांति से घरो में
बैठा रहा| अगर
वो दंगा हिंदुवो या मोद
फ़रवरी 2002 की सुबह 8
बजे से क्यों नहीं चालू हुआ?
जबकि मोदी ने 28 फ़रवरी 2002 की शाम
को ही आर्मी को सडको प
लाने का आदेश
दिया जो की अगले
ही दिन १ मार्च २००२
को हो गया और सडको पर आर्मी उतर आयी गुजरात
को जलने से बचाने के लिए
| पर भीड़ के आगे
आर्मी भी कम पड़
रही थी तो १ मार्च
२००२ को ही मोदी ने अपने पडोसी राज्यों से
सुरक्षा कर्मियों की मांग
करी| ये पडोसी राज्य थे
महाराष्ट्र (कांग्रेस
शासित- विलाश राव
देशमुख मुख्य मंत्री), मध्य प्रदेश (कांग्रेस शासित-
दिग विजय सिंह मुख्य
मंत्री), राजस्थान
(कांग्रेस शासित- अशोक
गहलोत मुख्य मंत्री) और
पंजाब (कांग्रेस शासित- अमरिंदर सिंह मुख्य
मंत्री) |
क्या कभी किसी ने भी इन
माननीय मुख्यमंत्रियों से
एक बार भी पुछा की अपने
सुरक्षा कर्मी क्यों नहीं गुजरात में जबकि गुजरात
ने आपसे
सहायता मांगी थी |
या ये एक सोची समझी गूढ़
राजनीती द्वेष
का परिचायक था इन प्रदेशो के
मुख्यमंत्रियों का गुजरात
को सुरक्षा कर्मियों का साबरमती ट्रेन
हादसा और लालूप्रसाद
यादव
की घटिया राजनीती जो
में गलत साबित हुई
साबरमती ट्रेन हादसे के ढाई साल के बाद जब
घटिया और नीच सोच
रखने वाले लालूप्रसाद
यादव रेलमंत्री बने
तो उन्होंने इस हादसे पर
अपनी नीच और गिरी हुई राजनितिक रोटी सेकने
के लिए रेलवे के
द्वारा बनर्जी आयोग
बनाया .. और इस आयोग
को पहले
ही बता दिया गया था क देनी है | असल में कुछ
महीनों के बाद बिहार
विधानसभा के चुनाव
होने वाले थे और
लालूप्रसाद यादव चाहते
थे की किसी भी हिंदूवादी
को इसका फायदा न मिले
बल्कि हिंदूवादी संघटनों
कारसेवको को ही दोषी
| सोचिये जो बोगी ढाई
सालो तक खुले आसमान के
पड़ी रही उस
बोगी की जाँच करके
बनर्जी आयोग ने
कहा की ट्रेन अंदर से जलाई गयी थी .. मतलब
वो कहना चाह रहे थे
की सभी कारसेवको को स
आत्मदाह करने
की इच्छा हो गयी इसलि
उन्होंने खुद ही ट्रेन में आग लगा ली और किसी ने
भी बाहर निकलने
की कोशिस नही की | मजे
की बात देखिये
की जस्टिस बनर्जी ने
जनवरी २००५ को यानी बिहार चुनाव
घोषित होने के ठीक
दो दिन पहले
अपना विवादास्पद
रिपोर्ट सार्वजनिक
किये ताकि इस रिपोर्ट के आधार पर लालूप्रसाद
यादव बिहार के
मुसलमानों को भड़काकर
उनका वोट हासिल कर
सके | लेकिन गोधरा ट्रेन
हादसे में जख्मी हुए
नीलकंठ तुलसीदास
भाटिया नामक एक शक्स
ने बनर्जी आयोग के झूठे
रिपोर्ट को गुजरात हाईकोर्ट में चेलेंज
किया | गुजरात
हाईकोर्ट ने विश्व के
जानेमाने फायर विशेषज्ञ
और फोरेंसिक एक्पर्ट
का एक पैनेल बनाया . और जस्टिस उमेश चन्द्र
बनर्जी को इस पैनेल के
सामने पेश होने का सम्मन
दिया ... तीन सम्मनो के
बाद पेश हुए
बनर्जी साहब ने ये नही बता पाया की आखि
उन्होंने ये कैसे निष्कर्ष
निकला की ट्रेन में आग
भीतर से लगी है ..
जबकि आग के पैटर्न और
सभी गवाहों और खुद अभियुक्तों के बयानों पे
अनुसार आग बाहर से
लगाई गयी थी और
दरवाजो को बाहर से बंद
कर
दिया गया था ..जस्टिस बनर्जी कोई जबाब
नही दिए और कोर्ट में
कहा की वो एक आयोग के
मुखिया होने के नाते
किसी भी सवाल
का जबाब देने के लिए बाध्य नही है .. मेरा काम
था रेलवे को रिपोर्ट
देना इसे सही या गलत
मानना तो रेलवे का काम
है | यानी ये पूरी तरह
साबित
हो गया था की लालूप्रस
यादव में जस्टिस
उमेशचन्द्र बनर्जी आयोग
का गठन सिर्फ अपने राजनीतक रोटिया सेकने
के लिए ही किया था |
इस आयोग को लालू ने पहले
ही बता दिया था की मुझे
किस तरह की जाँच
रिपोर्ट चाहिए | फिर ओक्टूबर २००६ के
गुजरात हाईकोर्ट
की चार जजों की बेंच ने
जिसमे सभी जज एक राय
पर सहमत थे उन्होंने लालू
के बनर्जी आयोग की रिपोर्ट को ख़ारिज
कर दिया और
टिप्पड़ी करते हुए
कहा की कोई रिटायर
जज किसी नेता के हाथ
की कटपुतली न बने ..गुजरात हाईकोर्ट ने
बनर्जी रिपोर्ट
को रद्दी, बकवास कहा ..
अपनी टिप्पड़ी में
गुजरात हाईकोर्ट ने
कहा "Gujarat High Court
quashed the
conclusions of the
Banerjee Committee
and ruled that the
panel was "unconstitution al, illegal and null and
void", and declared
its formation as a
"colourable exercise
of power with mala
fide intentions", and its argument of
accidental fire
"opposed to the
prima facie accepted
facts on record." लेकिन ताज्ज्जुब
हैकी मीडिया और दोगले
सेकुलर लोग सिर्फ एक
तरफी बाते ही चलाते है

रविवार, 14 अप्रैल 2013

खिलाडिय़ों को वैचारिक आधार पर नहीं बांटें : भाजपा






शनिवार, 13 अप्रैल 2013
RSS Strongly reacts as Rajasthan govt asks affidavit from sportsmen stating no link with RSS!
Jaipur/New Delhi April 12, 2012: A sports ceremony organised by Rajasthan's Congress government was turned in to huge controversy when government's Sports Department demanded an affidavit from every awardees stating that they are not involved in RSS !

More than 300 sports persons were given out cash award in Jaipur's SMS Stadium this afternoon for excelling at the state level championships. But a controversy broke out over an affidavit that every awardees was asked to file, stating that they are not involved in RSS and activities of Jamat-e-Islame. Sports persons were taken by surprise when this clause was pointed out to them but Rajasthan Sports Council says they have only followed government guidelines even as BJP accused Gehlot govt of bringing politics into sports.
More than 300 sports persons who have done well at state level championship, Rs 2.26 crore doled out, Rs 1 Lakh to first position holders, Rs 50,000 to second and Rs 20,000 to third position holders! But a row has erupted over the cash prizes. As a formality for claiming the award, every sports person had to give an affidavit to the effect that they will not participate in activities of RSS and Jamat-e-Islame!
RSS Reacted strongly:
Reacting to VSK-Karnataka on the above incident, RSS Akhil Bharatiya Prachar Pramukh Dr Manmohan Vaidya said, "We strongly condemn this vindictive attitude of the Rajasthan Government and the Congress. Unless the said Organisations are banned, Rajasthan government's decision to take up such affidavit from sportspersons is totally unconstitutional, vindictive and politically motivated".
'Congress should not bring its politics and personal vendetta in the field of sports', said Dr ManmohanVaidya.

जयपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व जमात-ए-इस्लामी संगठन की गतिविघियां भले ही गैरकानूनी ना हों, लेकिन इनमें शामिल होने पर प्रदेश के अव्वल खिलाडियों को भी सरकार से पुरस्कार नहीं मिलेगा। क्रीड़ा परिषद की ओर से शुक्रवार को आयोजित कार्यक्रम में पुरस्कृत खिलाडियों को इन संगठनों की गतिविघियों में शामिल नहीं होने का शपथ पत्र लिए जाने की खबर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद व भाजयुमो कार्यकर्ताओं को लगी तो उन्होंने सवाई मानसिंह स्टेडियम में करीब ढाई घंटे जोरदार हंगामा किया। प्रदर्शनकारियों ने कुर्सियां फेंकी और तोड़फोड़ करने लगे जिससे समारोह में पुलिस बुलानी पड़ी।
इसलिए विरोध 
खिलाडियों को प्रोत्साहन राशि देने के लिए सरकार एक शपथ पत्र लेती है। इसमें आवेदनकर्ता को बताना होता है कि उसका आरएसएस, जमात-ए-इस्लामी से कोई सम्बन्ध नहीं है। विद्यार्थी परिषद और भाजयुमो के कार्यकर्ता इस नियम का ही विरोध कर रहे थे। क्रीड़ा भारती राजस्थान समेत कुछ अन्य संगठनों ने भी विज्ञप्ति जारी कर इस पर विरोध जताया। 
1986 से है नियम 
क्रीड़ा परिषद के सूत्रों का कहना है कि हमने खेल विभाग के आदेशों की पालना की है और यह शर्त 1986 से लागू है। गौरतलब है कि इस दौरान दो बार भाजपा भी सत्ता में रही है। हालांकि भाजपा सरकार में खेल मंत्री रहे युनूस खान का कहना है कि मेरे कार्यकाल में आरएसएस और जमात ए इस्लामी का नियम वापस ले लिया था।
स्त्रोत:  राजस्थान पत्रिका
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कानूनी लड़ाई लड़ेगी क्रीड़ा भारती  
संदीप देशपांडे 

जयपुर, 13 अप्रेल। पुरस्कार के हकदार खिलाडिय़ों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध न रखने का शपथ पत्र भरवाने वाले खेल परिषद के अध्यक्ष शिवचरण माली स्वयं अब सवालों के घेरे में आ गए है। शिवचरण माली न सिर्फ लंबे समय तक संघ के अनुषांगिक संगठन विद्याभारती के अधीन संचालित स्कूल आदर्श विद्या मंदिर में शिक्षक रहे बल्कि संघ गतिविधियों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे। ऐसे में अब यह सवाल उठने लगे हंै कि यदि क्रीड़ा परिषद को खिलाडिय़ों के संघ से जुड़े रहने पर आपत्ति है तो खुद परिषद के अध्यक्ष को क्यों छूट दी गई है!
 दूसरी ओर खेलों के क्षेत्र में काम करने वाली संघ की आनुषांगिक संस्था क्रीड़ा भारती अब इस मामले पर अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। क्रीड़ा भारती के सचिव और आदर्श विद्या मंदिर के प्रधानाचार्य रामानंद चौधरी के अनुसार क्रीड़ा परिषद का यह फरमान गैरकानूनी है इसका जवाब कानूनी रूप से ही दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है ऐसे में खिलाडिय़ों से संघ से संबंध नहीं होने का शपथ पत्र भरवाना अवैधानिक है। चौधरी ने क्रीड़ा परिषद अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि खुद अध्यक्ष शिवचरण माली आदर्श विद्या मंदिर में शिक्षक रहे हंै। इतना ही नहीं बल्कि वे संघ शाखा में जाते थे और सभी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे हैं। चौधरी ने कहा कि जब क्रीडा परिषद अध्यक्ष ही संघ से जुड़े रहे हैं तो वे खिलाडिय़ों से इस प्रकार का बेतुका शपथ पत्र कैसे भरवा सकते है! क्या है मामलाविभिन्न खेलों में पदक हासिल करने वाले खिलाडिय़ों को सम्मान स्वरूप चेक प्रदान करने की प्रक्रिया तब विवादों में आ गई है जब खेल परिषद ने चेक देने से पूर्व खिलाडिय़ों से एक शपथ-पत्र भरवाया, जिसमें उनसे इस बात की शपथ ली गई कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात ए इस्लामी संगठन के सदस्य नहीं है। इस तरह का शपथ पत्र भरवाए जाने की बात सार्वजनिक होने पर हंगामा मच गया है।

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खेल परिषद में पुरस्कार शपथ पत्र और हंगामा 
विवाद को लेकर राजनीतिक बयानों का खेल
घमंडाराम को 3.50 लाख रुपए 
आरएसएस-जमायते इस्लामी से संबंध नहीं होने का शपथ पत्र भराने को लेकर हुआ विवाद, एबीवीपी और युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने किया इसका विरोध 

225 खिलाडिय़ों को दिया अनुदान 
इस बीच खेल परिषद ने विभिन्न खेलों के 225 खिलाडिय़ों को अनुदान दिया। 800 मी. दौड़ के नेशनल चैंपियन घमंडाराम को सर्वाधिक 3.50 लाख रुपए की राशि दी गई। 353 खिलाडिय़ों को अनुदान दिया जाना था, जिनमें से शुक्रवार को 225 खिलाड़ी मौजूद थे। बैडमिंटन की योशिता माथुर को तीन लाख रुपए का चेक दिया गया। इसके अलावा शॉटपुटर शक्ति सिंह व डेकेथलॉन के दयाराम को ढाई-ढाई लाख, वेटलिफ्टर अनिता चौधरी को दो लाख और शटलर निखिल जांगिड़ को 1.50 लाख रु. मिले। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वर्ष 2012-13 के बजट में खिलाडिय़ों की पुरस्कार राशि में 10 गुना इजाफे की घोषणा की थी। इसके तहत अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट में स्वर्ण पर 50 हजार के स्थान पर पांच लाख, राष्ट्रीय टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक पर 25 हजार के स्थान पर 2.50 लाख तथा राज्य स्तरीय स्पर्धाओं में पहले स्थान पर 10 हजार स्थान पर एक लाख रु. की घोषणा की थी। 

खेल राज्यमंत्री मांगीलाल गरासिया ने इस बारे में कहा कि यह नियम 1986 से लागू है। वर्तमान सरकार तो सिर्फ उसका पालन कर रही है। यदि कोई कह रहा है कि इसे हमने लागू कराया है, तो वो झूठ बोल रहा है। वहीं कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान ने कहा कि सांप्रदायिक व कट्टरपंथी संगठनों को बढ़ावा देना ठीक नहीं है। भाजपा के प्रदेश महामंत्री सतीश पूनिया ने कहा कि खिलाडिय़ों को वैचारिक आधार पर नहीं बांटा जाना चाहिए। उनकी उपलब्धियों व प्रदर्शन पर ही ध्यान दिया जाना चाहिए। 
युवा मोर्चा के जयपुर अध्यक्ष राजेश टिक्कीवाल ने कहा कि ऐसे शपथ पत्र भराते हुए राज्य सरकार मौलिक अधिकारों का हनन कर रही है। हम जनता की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं होने देंगे। यदि यह शर्त नहीं हटाई गई, तो हम आंदोलन तेज करेंगे। वहीं एबीवीपी कार्यकर्ता कुलदीप सिंह, अंकित चेची और दीपेश शर्मा ने कहा कि खेलों को ऐसी राजनीति से दूर रखना चाहिए। यह कांग्रेस सरकार की गलत नीति है और हम इसका विरोध जारी रखेंगे। 

खेल संवाददाता त्न जयपुर
राज्य खेल परिषद ने सवा दो करोड़ रुपए की पुरस्कार राशि बांटने के लिए शुक्रवार को खिलाड़ी तो बुला लिए, लेकिन शपथ पत्र की एक शर्त के कारण वहां काफी देर हंगामा हुआ। खिलाडिय़ों से एक शपथ पत्र भरवाया जा रहा था, जिसमें उनके आरएसएस या जमायते इस्लामी से नहीं जुड़े होने की जानकारी मांगी गई थी। खिलाडिय़ों ने तो इस पर ज्यादा आपत्ति नहीं की, लेकिन जब एबीवीपी और युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं को इसकी भनक लगी, तो वे विरोध के लिए स्टेडियम पहुंच गए। इस बीच जयपुर जिला बास्केटबॉल संघ के पदाधिकारियों ने अपने खिलाडिय़ों को पुरस्कार राशि नहीं देने का विरोध किया। परिषद के पदाधिकारियों का इस बारे में कहना था कि जब उनकी ओर से आवेदन ही नहीं किया गया, तो राशि देने का सवाल ही नहीं उठता। 

पुलिस ने कार्यकर्ताओं को मेन बिल्डिंग में प्रवेश करने से रोका गया। इस पर कार्यकर्ताओं ने विरोध तेज किया, तो उनकी पुलिसकर्मियों से भिड़ंत हो गई। 

कार्यकर्ताओं ने स्टेडियम की सीढिय़ों पर बैठकर नारेबाजी भी की। 

समारोह में पुरस्कार राशि का चेक लेते घमंडाराम (बाएं) व अन्य खिलाड़ी। 

शुक्रवार दोपहर एसएमएस स्टेडियम पर प्रदर्शन करते और कुर्सियां तोड़ते एबीवीपी और युवा मोर्चा के कार्यकर्ता। 

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राजस्थान में खिलाड़ियों से 'अजीब' शपथ-पत्र भरवाने पर हंगामा
नवभारतटाइम्स.कॉम | Apr 13, 2013, 11.44AM IST
जयपुर।। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जमात ए इस्लामी की गतिविधियां भेल ही गरकानूनी ना हों, लेकिन इनमें शामिल होने पर राजस्थान के अव्वल खिलाड़ियों को भी प्रदेश सरकार की तरफ से पुरस्कार नहीं मिलेगा। राजस्थान खेल परिषद ने मेडल हासिल करने वाले खिलाड़ियों को चेक देने से पहले एक शपथ-पत्र भरवाया, जिसमें उनसे इस बात की शपथ ली गई कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी के सदस्य नहीं हैं। इस खबर के सार्वजनिक होने पर सियासी बवाल मच गया है। इस पर आरएसएस ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

राजस्थान खेल परिषद की ओर से मेडल हासिल करने वाले खिलाड़ियों को चेक प्रदान करने की प्रक्रिया विवादों में आ गई है। खेल परिषद ने चेक देने से पहले खिलाड़ियों से एक शपथ-पत्र भरवाया, जिसमें उनसे इस बात की शपथ ली गई कि वे आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी के सदस्य नहीं हैं। इस बात के सार्वजनिक होते ही हंगामा मच गया। बीजेपी ने जयपुर स्टेडियम में विरोध भी किया। विरोध को शांत करने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी। आरएसएस ने इस पर कड़ा विरोध जताया है। आरएसएस प्रवक्ता राममाधव ने कहा है कि राजस्थान सरकार का यह फैसला गैरकानूनी है। उन्होंने इस मामले में दोषी लोगों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने की मांग की है।

क्या है प्रक्रिया
खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि देने के लिए सरकार एक शपथ लेती है। इसमें आवेदनकर्ता को बताना होता है कि उसका आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी से कोई संबंध नहीं है।

यह शर्त तो पहले से थी!
खेल परिषद के सूत्रों का कहना है कि हमने सिर्फ खेल विभाग के आदेशों का पालन किया है। यह शर्त 1986 से लागू है। गौरतलब है कि इस दौरान 2 बार बीजेपी भी सत्ता में भी रही है। हालांकि, बीजेपी सरकार में खेल मंत्री रहे युनूस खान का कहना है कि मेरे कार्यकाल में आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी का नियम वापस ले लिया था।

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खिलाड़ियों से शपथ-पत्र लेकर फंसी गहलोत सरकार
Updated on: Sat, 13 Apr 2013 

जयपुर [जासं]। राजस्थान में पदक जीतने वाले खिलाडि़यों को पुरस्कार देने के पहले दस रुपये के स्टांप पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी का सदस्य नहीं होने का शपथ-पत्र लेने पर अशोक गहलोत सरकार मुश्किल में फंस गई है। भाजपा समेत हिंदू संगठनों के साथ मुस्लिम संगठनों ने भी इस मसले पर नाराजगी जताई है और सरकार के इस निर्णय के खिलाफ आंदोलन की भी तैयारी कर रहे हैं।

गौरतलब है कि राजस्थान खेल परिषद ने पुरस्कृत होने वाले खिलाडि़यों को चेक देने से पूर्व दस रुपये के स्टांप पर एक शपथ-पत्र भरवाया कि संघ और जमात-ए-इस्लामी संगठन से उनका कोई संबंध नहीं हैं। अब विभिन्न संगठन इसके विरोध में उतर आए हैं। प्रदेश के खेल मंत्री मांगीलाल गरासिया का कहना है कि यह नियम 1986 से लागू है। सरकार उसका पालन कर रही है। लेकिन राजस्थान खेल परिषद के पूर्व अध्यक्ष एसएन माथुर ने इस तरह के किसी नियम होने से इन्कार किया है। कांग्रेसी नेताओं का एक वर्ग भी इस शर्त के खिलाफ है और आलाकमान से कहा है कि चुनावी साल में इस तरह का शपथ-पत्र मांगना पार्टी के लिए नुकसान दायक हो सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने भी मुख्यमंत्री गहलोत से विरोध दर्ज कराया है। राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ललित किशोर चतुर्वेदी और प्रदेश महामंत्री कालीचरण सर्राफ का कहना है कि ऐसा शपथ पत्र भरवाने की बात बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह तुगलकी फरमान वापस नहीं लिया तो इसके खिलाफ सड़कों पर लड़ाई लड़ी जाएगी। आरएसएस वरिष्ठ पदाधिकारी बीरू सिंह राठौड़ का कहना है कि खिलाड़ियों को वैचारिक रूप से बांटना ठीक नहीं। हिंदू समाज इस मामले को लेकर आंदोलन करेगा। जमात-ए-इस्लामी हिंद के पूर्व प्रदेश सचिव मो. नाजिमुद्दीन का कहना है कि यह गलत और गैर कानूनी है। यदि जमात-ए-इस्लामी गलत संगठन है तो इस पर प्रतिबंध लगाएं। लेकिन ऐसी हरकत का हम विरोध करेंगे। यह नियम बदला नहीं गया तो संघर्ष करेंगे। राज्य अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष शादिक अली का कहना है कि देश में कहीं भी ऐसी शर्त नहीं है तो फिर यहां क्यों रखी गई। शुक्रवार को भाजपा युवा मोर्चा और संघ के स्वयंसेवकों ने स्टेडियम में पहुंच कर इस मसले पर हंगामा किया था।
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