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स्वामी विवेकानन्दजी की 150 वीं जयंति : ‘‘भारत जागो! विश्व जगाओ!!’’

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यह जानकारी जनहित में ली गई ............. - अरविन्द सिसोदिया 09414180151 शुक्रवार, 13 जनवरी 2012 सहभाग का आह्वान भारतमाता के महान सपूत जो आगे चल कर विश्व के आदर्श बने ऐसे स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘‘ना तो मैं भविष्य में देखता हूँ ना ही भविष्य की चिन्ता करता हूँ। किन्तु एक दृश्य मेरे सम्मुख जीवित स्पष्टता से दिखाई देता है कि हमारी यह प्राचीन भारतमाता पुनः एक बार जागृत हो चुकी है और अपने सिंहासन पर पूर्व से भी अधिक आलोक के साथ विराजमान है। आइए! शान्ति एवं मंगल वचनों से पूरे विश्व के सम्मुख इसकी उद्घोषणा करें’’ स्वामीजी की 150 वीं जयंति हम सब के लिये राष्ट्रीय महायज्ञ में योगदान का अवसर है। हमारे समर्पण से समस्त मानवता के जागरण में सहयोग होगा और स्वामीजी का स्वप्न ‘‘भारत जागो! विश्व जगाओ!!’’ साकार होगा। आप भी सहभागी बन सकते हैं।   प्रकाशनों को प्रायोजित कर  होर्डिंग, स्टीकर्स, पोस्टर, पत्रक तथा विज्ञापनों के माध्यम से समारोह का संदेश प्रचारित कर  आगामी दो वर्ष पूर्णकालिक के रूप में समय देकर  अपने नगर में समारोह के आयोजन हेतु कार्यकर्ता के रूप में पंज

नैसर्गिक सौन्दर्य निखार का पर्व : रूप चौदस

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सौन्दर्य निखार का ब्यूटी पर्व रूप चौदस. रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) बृहस्पतिवार, अक्तूबर 27, 2011 सदियों से रूप का आकर्षण मानव मन को मोहित करता रहा है। नैसर्गिक सौन्दर्य भरी प्रकृति के फूल-पत्तों, तितलियों, पखेरुओं, कल-कल बहती सरिताओं का हो चाहे मनुष्य के तन का। रूप के पाश से आबद्ध हो मन-प्राण खीचें चले आते हैं। मानव मात्र में रूपवान बनने-दिखने की चिरन्तन अभिलाषा के साथ ही रूप सौन्दर्य के प्रति पारम्परिक एवं सहज स्वाभाविक आकर्षण रहा है। वनवासियों में स्वाभाविक सौन्दर्य, ओज और लावण्य नैसर्गिक वरदान है। वनाँचल सुघड़ एवं सबल देहयष्टि प्रदान करता है। दीपावली से ठीक एक दिन पूर्व वनांचल के लोगों के लिए रूप निखार का वार्षिक पर्व होता है। रूप चौदस के दिन न केवल घर परिवेश बल्कि स्वयं का भी रूप निखारने का यत्न किया जाता है। इस दिन सौन्दर्य निखार की प्राचीन संस्कृति एवं परम्परा के दर्शन रूप चौदस की सार्थकता को भली प्रकार अभिव्यक्त करते हैं। दक्षिणांचल के लोगों में सौन्दर्य एवं रूप के प्रति पिपासा किसी भी प्रकार से कम नहीं कही जा सकती। वे किसी उद्यान में सायास पल्लवित किए पुष्पों की तरह नहीं