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मार्च 8, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के पितामह - रामधारी सिंह 'दिनकर'

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  स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के पितामह  -रामधारी सिंह 'दिनकर' उन्नीसवीं सदी के अंग्रेजी पढ़े-लिखे हिन्दू अपने धर्म के कुपरिणामों को समझने लगे थे। इसका एक यह भी कारण था कि धर्म पर से उनकी श्रद्धा हटने लगी थी। अतएव, जब स्वामी विवेकानंद का आविर्भाव हुआ, उन्हें अपने सामने कई प्रकार के उद्देश्य दिखाई पड़े। सब से बड़ा कार्य धर्म की पुन:स्थापना का कार्य था। बुद्धिवादी मनुष्यों की श्रद्धा धर्म पर से केवल भारत में ही नहीं, सभी देशों में हिलती जा रही थी। अतएव, यह आवश्यक था कि धर्म की ऐसी व्याख्या की जाए जो अभिनव मनुष्य को ग्राह्य हो, जो उसकी इहलौकिक विजय के मार्ग में बाधा नहीं डाले। दूसरा काम हिन्दू धर्म पर, कम से कम, हिन्दुओं की श्रद्धा जमाये रखना था। किंतु, हिन्दू यूरोप के प्रभाव में आ चुके थे तथा अपने धर्म और इतिहास पर भी वे तब तक विश्वास करने को तैयार न थे, जब तक कि यूरोप के लोग उनकी प्रशंसा नहीं करें। और तीसरा काम भारतवासियों में आत्म गौरव की भावना को प्रेरित करना था, उन्हें अपनी संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं के योग्य उत्तराधिकारी बनाना था। स्वामी विवेकान

वे विश्व गुरु थे : नरेन्द्र कोहली

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वे विश्व गुरु थे : नरेन्द्र कोहली तारीख:19/jan/2013 स्वामी विवेकानन्द अथवा बालक नरेन्द्रनाथ दत्त को, उनके माता-  पिता ने काशी-स्थित वीरेश्वर महादेव की पूजा कर प्राप्त किया था। नरेन्द्र के शैशव का दृश्य है कि तीन वर्ष की अवस्था में, वे खेल ही खेल में हाथ में चाकू ले कर, अपने घर के आंगन में उत्पात मचा रहे थे। इसको मार दूं। उसको मार दूं। दो-दो नौकरानियां उनको पकड़ने का प्रयत्न कर रही थीं। और पकड़ नहीं पा रही थीं। अंतत: माता भुवनेश्वरी देवी ने नौकरानियों को असमर्थ मान कर परे हटाया और पुत्र को बांह से पकड़ लिया। स्नानागार में ले जाकर उसके सिर पर लोटे से जल उड़ेला और उच्चारण किया, शिव- शिव। बालक शांत हो गया। उत्पात का शमन हो गया। उस समय तक वे विचारक नहीं थे, साधक नहीं थे, संत नहीं थे, किंतु वे वीरेश्वर महादेव के भेजे हुए थे। उस समय ही नहीं, आजीवन ही वे जब-तब आकाश की ओर देखते थे और उनके मुख से उच्चरित होता था- शिव- शिव। परिणामत: उनका मन शांत हो जाता था। पेरिस की सड़कों पर घूमते हुए भीड़ और पाश्चात्य संस्कृति की भयावहता से परेशान हो जाते थे, तो जेब से शीशी निकाल कर गंगा जल की कुछ बूंदें

उन्नत राष्ट्र का संकल्प लें - मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, रा.स्व.संघ

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भारतीय स्वाभिमान और शौर्य का उदघोष     १० मार्च २०१३ पाञ्चजन्य              स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती समारोह का भव्य उद्घाटन उन्नत राष्ट्र का संकल्प लें -मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, रा.स्व.संघ 'किसी भी राष्ट्र, समाज, व्यक्ति की उन्नति जिन तत्वों के कारण होती है, सारी दुनिया की उन्नति जिन तत्वों के कारण होती है उन्हीं बातों को स्वामी विवेकानंद ने भी कहा। उसी सनातन धर्म को उन्होंने 11 सितंबर, 1893 को शिकागो में भी कहा। वह तो जीवनभर कहते रहे कि ईश्वर प्रेम स्वरूप है। सारी दुनिया को प्रेम करना सीखो। वे कहते थे ʅइस प्रकार अपने आत्मीयता के दायरे का विस्तार ही जीवन हैʆ। हम संकुचित हो रहे हैं, हम अपने स्वार्थ में फंस रहे हैं। मैं, अधिक से अधिक मेरा परिवार, इससे आगे हम जाते ही नहीं हैं। हमें इससे बाहर निकलना होगाʆ। उक्त उद्गार रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने गत 11 जनवरी को नई दिल्ली स्थित सीरीफोर्ट सभागार में स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती समारोह समिति के तत्वावधान में आयोजित स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती समारोह के उद्घाटन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। वे कार्यक्रम