मंगलवार, 12 मार्च 2013

लुप्त सरस्वती नदी के संदर्भ में प्रकाशित शोध

लुप्त सरस्वती नदी के संदर्भ में इंडिया टुडे ६ मार्च २० १ ३ के अंक में प्रकाशित शोध





पाताल में मिला सरस्वती का पता


नई दिल्‍ली, 11 मार्च 2013
पीयूष बबेले | सौजन्‍य: इंडिया टुडे
—साथ में राम प्रकाश मील और विमल भाटिया

कालीबंगा के मिट्टी के टीले खामोश खड़े हैं. अगर लोहे की काली सलाखों वाली बड़ी-सी चारदीवारी में इन्हें करीने से सहेजा न गया हो, तो यह एहसास करना कठिन है कि हम पुरखों की उस जमीन पर खड़े हैं, जहां कभी सरस्वती-सिंधु की नदी घाटी सभ्यता सांस लेती थी. मिट्टी के इन ढूहों के पीछे गेहूं के लहलहाते खेत हैं.

बगल में पुरातत्व विभाग के बोर्ड पर खुदा नक्शा याद दिलाता है कि इन टीलों को घेरकर कभी सरस्वती नदी बहा करती थी और आज उसी के बहाव क्षेत्र में 21वीं सदी की फसल लहलहा रही है. वैसे तो आज भी बरसात के मौसम में यहां से एक छोटी-सी नदी घग्घर कुछ दिन के लिए बहती है, लेकिन उस महानदी के सामने इस बरसाती पोखर की क्या बिसात, जिसकी गोद में कभी दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक फल-फूल रही थी.

ओल्डहैम से आइआइटी तक
तो वह नदी कहां लुप्त हो गई? आज से 120 साल पहले 1893 में यही सवाल एक अंग्रेज इंजीनियर सी.एफ. ओल्डहैम के जेहन में उभरा था, जब वे इस नदी की सूखी घाटी से अपने घोड़े पर सवार होकर गुजरे. तब ओल्डहैम ने पहली परिकल्पना दी कि हो न हो, यह प्राचीन विशाल नदी सरस्वती की घाटी है, जिसमें सतलुज नदी का पानी मिलता था. और जिसे ऋषि-मुनियों ने ऋग्वेद (ऋचा 2.41.16) में ''अम्बी तमे, नदी तमे, देवी तमे सरस्वती” अर्थात् सबसे बड़ी मां, सबसे बड़ी नदी, सबसे बड़ी देवी कहकर पुकारा है. ऋग्वेद में इस भूभाग के वर्णन में पश्चिम में सिंधु और पूर्व में सरस्वती नदी के बीच पांच नदियों झेलम, चिनाब, सतलुज, रावी और व्यास की उपस्थिति का जिक्र है.Sarswati

ऋग्वेद (ऋचा 7.36.6) में सरस्वती को सिंधु और अन्य नदियों की मां बताया गया है. इस नदी के लुप्त होने को लेकर ओल्डहैम ने विचार दिया कि कुदरत ने करवट बदली और सतलुज के पानी ने सिंधु नदी का रुख कर लिया. बेचारी सरस्वती सूख गई. एक सदी से ज्यादा के वक्त में विज्ञान और तकनीक ने रफ्तार पकड़ी और सरस्वती के स्वरूप को लेकर एक-दूसरे को काटती हुई कई परिकल्पनाएं सामने आईं. इस बारे में अंतिम अध्याय लिखा जाना अभी बाकी है. 1990 के दशक में मिले सैटेलाइट चित्रों से पहली बार उस नदी का मोटा खाका दुनिया के सामने आया. इन नक्शों में करीब 20 किमी चौड़ाई में हिमालय से अरब सागर तक जमीन के अंदर नदी घाटी जैसी आकृति दिखाई देती है.

अब जिज्ञासा यह थी कि कोई नदी इतनी चौड़ाई में तो नहीं बह सकती, तो आखिर उस नदी कासटीक रास्ता और आकार क्या था? और उसके विलुप्त होने की सच्ची कहानी क्या है? इन सवालों के जवाब ढूंढऩे के लिए 2011 के अंत में आइआइटी कानपुर के साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय (वाराणसी) और लंदन के इंपीरियल कॉलेज के विशेषज्ञों ने शोध शुरू किया. ''इस परियोजना में हमने इलेक्ट्रिकल रेसिस्टिविटी साउंडिंग तकनीक का प्रयोग किया.

इस तकनीक से जमीन के भीतर पानी की परतों की सटीक मोटाई का आकलन किया जाता है. हमें यह सुनिश्चित करना था कि पश्चिम गंगा बेसिन में यमुना और सतलुज नदियों के बीच एक बड़ी नदी बहा करती थी. यह नदी कांस्य युग और हड़प्पा कालीन पुरातत्व स्थलों के पास से बहती थी. कोई साढ़े तीन हजार साल पहले यह सभ्यता नदी के पानी के धार बदल लेने से लुप्त हो गई. हालांकि सभ्यता के लुप्त होने की दूसरी वजहें भी हो सकती हैं.”

परियोजना के प्रभारी और आइआइटी कानपुर में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर रंजीत सिन्हा ने नई खोज की यह भूमिका रखी. इससे कुछ समय पहले ही अमेरिका में मिसीसिपी नदी घाटी के भूजल तंत्र का अध्ययन करने के लिए इस तकनीक का सफलता से प्रयोग किया जा चुका है. इसके अलावा मिस्र के समानुद इलाके में नील डेल्टा के पास नील नदी की लुप्त हो चुकी धाराओं का नक्शा खींचने में भी इस तकनीक को कामयाबी हासिल हुई है. नील नदी की लुप्त धाराओं के बारे में बने इस नए नक्शे ने कई ऐतिहासिक मान्यताओं को चुनौती भी दी है. साउंड रेसिस्टिविटी तकनीक से सरस्वती नदी के भूमिगत नेटवर्क के इन्हीं साक्ष्यों का पता लगाने के लिए टीम ने पहले चरण में पंजाब में पटियाला और लुधियाना के बीच पडऩे वाले पुरातत्व स्थल कुनाल के पास मुनक गांव, लुधियाना और चंडीगढ़ के बीच के सरहिंद गांव और राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में हड़प्पाकालीन पुरातत्व स्थल कालीबंगा का चयन किया.

2012 के अंत और सदी के पहले महाकुंभ से पहले प्रो. सिन्हा और उनकी टीम का 'इंटरनेशनल यूनियन ऑफ क्वाटरनरी रिसर्च’ के जर्नल क्वाटरनरी जर्नल में एक शोधपत्र छपा. इसका शीर्षक था: जिओ इलेक्ट्रिक रेसिस्टिविटी एविडेंस फॉर सबसरफेस पेलिओचैनल सिस्टम्स एडजासेंट टु हड़प्पन साइट्स इन नॉर्थवेस्ट इंडिया. इसमें दावा किया गया: ''यह अध्ययन पहली बार घग्घर-हाकरा नदियों के भूमिगत जलतंत्र का भू-भौतिकीय (जिओफिजिकल) साक्ष्य प्रस्तुत करता है.” यह शोधपत्र योजना के पहले चरण के पूरा होने के बाद सामने आया और साक्ष्यों की तलाश में अभी यह लुप्त सरस्वती की घाटी में पश्चिम की ओर बढ़ता जाएगा.

 ऊंचे हिमालय से उद्गम
पहले साक्ष्य ने तो उस परिकल्पना पर मुहर लगा दी कि सरस्वती नदी घग्घर की तरह हिमालय की तलहटी की जगह सिंधु और सतलुज जैसी नदियों के उद्गम स्थल यानी ऊंचे हिमालय से निकलती थी. अध्ययन की शुरुआत घग्घर नदी की वर्तमान धारा से कहीं दूर सरहिंद गांव से हुई और पहले नतीजे ही चौंकाने वाले आए. सिन्हा बताते हैं, ''दरअसल 1980 के यशपाल के शोधपत्र में इस जगह पर घघ्घर-हाकरा नदियों की लुप्त हो चुकी संभावित सहायक नदी की मौजूदगी की बात कही गई थी. हम इसी सहायक नदी की मौजूदगी की पुष्टि के लिए साक्ष्य जुटा रहे थे.” लेकिन जो नतीजा सामने आया, उससे सरहिंद में जमीन के काफी नीचे साफ पानी से भरी रेत की 40 से 50 मीटर मोटी परत सामने आई. यह घाटी जमीन के भीतर 20 किमी में फैली है.

इसके बीच में पानी की मात्रा किनारों की तुलना में कहीं अधिक है. खास बात यह है कि सरहिंद में सतह पर ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता जिससे अंदाजा लग सके कि जमीन के नीचे इतनी बड़ी नदी घाटी मौजूद है. बल्कि यहां तो जमीन के ठीक नीचे बहुत सख्त सतह है. पानी की इतनी बड़ी मात्रा सहायक नदी में नहीं बल्कि मुख्य नदी में हो सकती है. सिन्हा ने बताया,''भूमिगत नदी घाटी में मिले कंकड़ों की फिंगर प्रिंटिंग बताती है कि यह नदी ऊंचे हिमालय से निकलती थी. कोई 1,000 किमी. की यात्रा कर अरब सागर में गिरती थी. इसके बहाव की तुलना वर्तमान में गंगा नदी से की जा सकती है.”

सरहिंद के इस साक्ष्य ने सरस्वती की घग्घर से इतर स्वतंत्र मौजूदगी पर मुहर लगा दी. इस शोध में तैयार नक्शे के मुताबिक, सरस्वती की सीमा सतलुज को छूती है. यानी सतलुज और सरस्वती के रिश्ते की जो बात ओल्डहैम ने 120 साल पहले सोची थी, भू-भौतिकीय साक्ष्य उस पर पहली बार मुहर लगा रहे थे.

आखिर कैसे सूखी सरस्वती?
तो फिर ये नदियां अलग कैसे हो गईं? विलुप्त सरस्वती नदी की घाटी का पिछले 20 साल से अध्ययन कर रहे पुरातत्व शास्त्री और इलाहाबाद पुरातत्व संग्रहालय के निदेशक राजेश पुरोहित बताते हैं, ''समय के साथ सरस्वती नदी को पानी देने वाले ग्लेशियर सूख गए. इन हालात में या तो नदी का बहाव खत्म हो गया या फिर सिंधु, सतलुज और यमुना जैसी बाद की नदियों ने इस नदी के बहाव क्षेत्र पर कब्जा कर लिया. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सरस्वती नदी का पानी पूर्व दिशा की ओर और सतलुज नदी का पानी पश्चिम दिशा की ओर खिसकता चला गया. बाद की सभ्यताएं गंगा और उसकी सहायक नदी यमुना (पूर्ववर्ती चंबल) के तटों पर विकसित हुईं. पहले यमुना नदी नहीं थी और चंबल नदी ही बहा करती थी. लेकिन उठापटक के दौर में हिमाचल प्रदेश में पोंटा साहिब के पास नई नदी यमुना ने सरस्वती के जल स्रोत पर कब्जा कर लिया और आगे जाकर इसमें चंबल भी मिल गई.”

यानी सरस्वती की सहायक नदी सतलुज उसका साथ छोड़कर पश्चिम में खिसककर सिंधु में मिल गर्ई और पूर्व में सरस्वती और चंबल की घाटी में यमुना का उदय हो गया. ऐसे में इस बात को बल मिलता है कि भले ही प्रयाग में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम का कोई भूभौतिकीय साक्ष्य न मिलता हो लेकिन यमुना के सरस्वती के जलमार्ग पर कब्जे का प्रमाण इन नदियों के अलग तरह के रिश्ते की ओर इशारा करता है. उधर, जिन मूल रास्तों से होकर सरस्वती बहा करती थी, उसके बीच में थार का मरुस्थल आ गया. लेकिन इस नदी के पुराने रूप का वर्णन ऋग्वेद में मिलता है. ऋग्वेद के श्लोक (7.36.6) में कहा गया है, ''हे सातवीं नदी सरस्वती, जो सिंधु और अन्य नदियों की माता है और भूमि को उपजाऊ बनाती है, हमें एक साथ प्रचुर अन्न दो और अपने पानी से सिंचित करो.”

आइआइटी कानपुर के अध्ययन में भी नदी का कुछ ऐसा ही पुराना रूप निखर कर सामने आता है. साउंड रेसिस्टिविटी पर आधारित आंकड़े बताते हैं कि कालीबंगा और मुनक गांव के पास जमीन के नीचे साफ पानी से भरी नदी घाटी की जटिल संरचना मौजूद है. इन दोनों जगहों पर किए गए अध्ययन में पता चला कि जमीन के भीतर 12 किमी से अधिक चौड़ी और 30 मीटर मोटी मीठे पानी से भरी रेत की तह है. जबकि मौजूदा घग्घर नदी की चौड़ाई महज 500 मीटर और गहराई पांच मीटर ही है. जमीन के भीतर मौजूद मीठे पानी से भरी रेत एक जटिल संरचना दिखाती है, जिसमें बहुत-सी अलग-अलग धाराएं एक बड़ी नदी में मिलती दिखती हैं.

सिन्हा के शब्दों में, ''यह जटिल संरचना ऐसी नदी को दिखाती है जो आज से कहीं अधिक बारिश और पानी की मौजूदगी वाले कालखंड में अस्तित्व में थी या फिर नदियों के पानी का विभाजन होने के कारण अब कहीं और बहती है.” अध्ययन आगे बताता है कि इस मीठे पानी से भरी रेत से ऊपर कीचड़ से भरी रेत की परत है. इस परत की मोटाई करीब 10 मीटर है. गाद से भरी यह परत उस दौर की ओर इशारा करती है, जब नदी का पानी सूख गया और उसके ऊपर कीचड़ की परत जमती चली गई. ये दो परतें इस बात का प्रमाण हैं कि प्राचीन नदी बड़े आकार में बहती थी और बाद में सूख गई. और इन दोनों घटनाओं के कहीं बहुत बाद घग्घर जैसी बरसाती नदी वजूद में आई.

सरस्वती से गंगा के तट पर पहुंची सभ्यता
वैज्ञानिक साक्ष्यों की श्रृंखला यहीं नहीं रुकती. इसी शोध टीम के सदस्य और दिल्ली विश्वविद्यालय में जियोलॉजी के सहायक प्रोफेसर डॉ. शशांक शेखर बताते हैं, ''कालीबंगा में घग्घर नदी के दोनों ओर जिस तरह के मिट्टी के ढूह मिलते हैं, उस तरह के ढूह किसी बड़ी नदी की घाटी के आसपास ही बन सकते हैं.” और जिस तरह से कालीबंगा के ढूहों के नीचे से हड़प्पा काल के अवशेष मिलते हैं, उससे इस बात को बल मिलता है कि सरस्वती नदी और हड़प्पा संस्कृति के बीच कोई सीधा रिश्ता था.

कालीबंगा अकेला पुरातत्व स्थल नहीं है बल्कि राजस्थान के हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिलों में ऐसे 12 बड़े ढूह चिन्हित किए गए हैं. हड़प्पा सभ्यता के अवशेष पश्चिम में गुजरात तक और पूर्व में मेरठ तक मिले हैं. वहीं इलाहाबाद के पास कौशांबी में हड़प्पा सभ्यता का नया चरण शुरू होने के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं. इन पुरातात्विक तथ्यों का विश्लेषण करते हुए मेरठ पुरातत्व संग्रहालय के निदेशक डॉ. मनोज गौतम कहते हैं, ''घग्घर-हाकरा या वैदिक सरस्वती के तट पर सिर्फ पूर्व हड़प्पा काल के अवशेष मिलते हैं. जबकि कौशांबी के पास पूर्व हड़प्पा और नव हड़प्पा काल के अवशेष एक साथ मिले हैं. यह संदर्भ सरस्वती नदी के लुप्त होने और गंगा-यमुना के तट पर नई सभ्यता के विकसित होने के तौर पर देखे जा सकते हैं.”

4,000 साल पुराना पानी
आइआइटी ने अभी भले ही पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में साउंड रेसिस्टिविटी से सरस्वती का नक्शा तैयार किया हो लेकिन अभी राजस्थान के बाकी हिस्से और गुजरात अपनी बारी की प्रतीक्षा में खड़े हैं. सैटेलाइट इमेज दिखाती है कि सरस्वती की घाटी हरियाणा में कुरुक्षेत्र, कैथल, फतेहाबाद, सिरसा, अनूपगढ़, राजस्थान में श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, थार का मरुस्थल और फिर गुजरात में खंभात की खाड़ी तक जाती थी. अध्ययन के आगे बढऩे पर नदी की बाकी दफन हो चुकी घाटी के मिलने की प्रबल संभावनाएं हैं. राजस्थान के जैसलमेर जिले में बहुत से ऐसे बोरवेल हैं, जिनसे कई साल से अपने आप पानी निकल रहा है. ये बोरवेल 1998 में मिशन सरस्वती योजना के तहत भूमिगत नदी का पता लगाने के लिए खोदे गए थे. इस दौरान केंद्रीय भूजल बोर्ड ने किशनगढ़ से लेकर घोटारू तक 80 किमी के क्षेत्र में 9 नलकूप और राजस्थान भूजल विभाग ने 8 नलकूप खुदवाए. जिले के जालूवाला गांव में गोमती देवी के नलकूप से पिछले दो साल से अपने आप पानी बह रहा है. रेगिस्तान में निकलता पानी लोगों के लिए आश्चर्य से कम नहीं है. इसी तरह अरशद के ट्यूबवेल से भी अविरल जलधारा बह रही है. इस बारे में राजस्थान भूजल विभाग के वैज्ञानिक डॉ. एन.डी. इणखिया कहते हैं कि यह सरस्वती का पानी है या नहीं, यह तो जांच के बाद ही कहा जा सकता है. लेकिन नलकूपों से निकले पानी को भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने 3,000 से 4,000 साल पुराना माना था. वैसे आइआइटी की कालगणना अभी बाकी है. यानी आने वाले दिनों में कुछ और रोमांचक जानकारियां मिल सकती हैं.

बचा लो विरासत
वैज्ञानिक साक्ष्य और उनके इर्द-गिर्द घूमते ऐतिहासिक, पुरातात्विक और भौगोलिक तथ्य पाताल में लुप्त सरस्वती की गवाही दे रहे हैं. हालांकि विज्ञान आस्था से एक बात में सहमत नहीं है और इस असहमति के बहुत गंभीर मायने भी हैं. मान्यता है कि सरस्वती लुप्त होकर जमीन के अंदर बह रही है, जबकि आइआइटी का शोध कहता है कि नदी बह नहीं रही है, बल्कि उसकी भूमिगत घाटी में जल का बड़ा भंडार है.

प्रो. सिन्हा आगाह करते हैं कि ऐसे में अगर लुप्त नदी घाटी से लगातार बड़े पैमाने पर बोरवेल के जरिए पानी निकाला जाता रहा तो पाताल में पैठी नदी हमेशा के लिए सूख जाएगी, क्योंकि उसमें नए पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है. वे सरस्वती की सही-सही पैमाइश इसीलिए कर रहे हैं, ताकि यह बताया जा सके कि कौन-सा पानी सामान्य भूजल है और कौन सा सरस्वती का संरक्षित जल. वैज्ञानिक तो यही चाहते हैं कि पाताल में जमी नदी के पानी का बेहिसाब इस्तेमाल न किया जाए क्योंकि अगर ऐसा किया जाता रहा तो जो सरस्वती कोई 4,000 साल पहले सतह से गायब हुई थी, वह अब पाताल से भी गायब हो जाएगी. नदी को बचाने की जिम्मेदारी अब उन्हीं लोगों की होगी, जिनके पुरखों को हजारों साल पहले इस नदी ने अपनी घाटी में बसाया था.

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