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कोटि-कोटि श्रद्धांजली , आलोक तोमर

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- अरविन्द सिसोदिया     मेरा मन बहुत ख़राब है , मुझे जब से पता चला की आलोक तोमर नहीं रहे ..., नीरा रडिय के टेपों को सार्वजनिक कर उन्होंने एक भ्रष्ट तम मंत्री ए राजा को न केवल त्याग पत्र  को मजबूर कर दिया बल्की वह भ्रष्टाचारी मंत्री आज जेल में है ....! लोकतंत्र की लूटतंत्र पर एक विजय उनके हाथ से लिखी हुई ..! भगवान भी गजब का बेईमान है ..अच्छे लोगों को पहले ऊपर ले लेते है और बुरे लोगों का साम्राज्य चलने देता है ..? ख़ैर इसमें भी कोई अच्छाई ही होगी ..! हमारी कोटि-कोटि श्रद्धांजली इस निष्पक्ष पत्रकार को , उनकी पत्रकारिता को .....!!   ------ धारदार पत्रकारिता की पहचान थे आलोक तोमर http://www.livehindustan.com - उनकी कलम जब पन्नों पर चलती तो शब्द एक दुर्लभ लेखन शैली में ढलकर पूरे सच को बयां करते थे। बेबाक और धारधार पत्रकारिता की पहचान रहे आलोक तोमर भलेही सोमवार को पंचतत्व में विलीन हो गए, पर उन्होंने अपने पीछे लेखन का एक अंदाज छोड़ा है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। आलोक तोमर का असमय चले जाना हिंदी पत्रकारिता के लिए दुखद घटना है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के रछेड़ गांव म

शहीदे आजम भगत सिंह के प्रेरणा स्त्रोत

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  सरदार भगत सिंह के प्रेरणा स्त्रोत  (शहीदे आजम भगत सिंह विशेषांक, १ नवम्बर २००७ अंक / पाथेय कण ) से - अरविन्द सिसौदिया  कभी वो दिन भी आएगा कि आजाद हम होंगे , ये अपनी ही जमीन होगी , यह अपना आसमां होगा | शहीदों कि चिताओं पर , लगेंगे हर बरस मेले , वतन पर मरने  वालों  का, यही बांकी निशां होगा |             ये पंक्तियाँ तो १९३० के दौर की हैं, अगर आज भगत सिंह जीवित होते तो सौ वर्ष से अधिक के होते ...! इतिहास कहता है कि गांधीजी और कांग्रेस चाहती तो ये क्रांतिवीर फांसी से बचाए जा सकते थे और यह भी सच है कि गांधी जी ने क्रांतिवीरों पर हो रहे अंग्रेजी शासन के अत्याचारों पर घोर उपेक्षा बरती | इनके मानवीय अधिकारों के लिए कभी व्रत , भूख हड़ताल , सत्याग्रह आयोजित नहीं किये गए | कलम भी आज यह लिखनें को मजबूर है कि क्रांतिवीरों पर हुए अत्याचारों को गांधी जी और कांग्रेस  की शह थी ...!             १९४७ से १९६४ तक शासन में रहते हुए पं. नेहरु भगत सिंह और साथी क्रांतिकारियों की समाधी नहीं बना सके , जलियांवाला बाग़ को स्मारक नही बना सके | जिस स्थान पर शहीदों को फांसी लगी थी , उसे पाकिस्तान में संरक्षित नहीं