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श्री गणेशजी की आरती

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आरती श्री गणेशजी की व्रकतुंड महाकाय, सूर्यकोटी समप्रभाः | निर्वघ्नं कुरु मे देव,सर्वकार्येरुषु सवर्दा || जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा | माता जाकी पार्वती ,पिता महादेवा || जय गणेश देवा... एक दन्त दयावंत चार भुजा धारी | माथ पर तिलक सोहे, मुसे की सवारी | पान चढ़े फुल चढ़े ,और चढ़े मेवा | लड्डुवन का भोग लगे ,संत करे सेवा || जय गणेश देवा... अंधन को आखँ देत ,कोढ़ियन को काया | बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया | सुर श्याम शरण आये सफल कजे सेवा | | जय गणेश देवा... जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा | माता जाकी पार्वती ,पिता महादेवा || जय गणेश देवा...बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले ना भीख |

स्वस्तिक : सूर्य का प्रतीक

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Pandit Ashu Bahuguna ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सूर्य को समस्त देवशक्तियोंका केंद्र और भूतल तथा अन्तरिक्ष में जीवनदाता माना गया है। स्वस्तिक को सूर्य की प्रतिमा मान कर इन्हीं विशेषताओं के प्रति श्रद्धाभिव्यक्तिजागृत करने का उपक्रम किया जाता है। पुराणों में स्वस्तिक को विष्णु का सुदर्शन चक्र माना गया है। उसमें शक्ति, प्रगति, प्रेरणा और शोभा का समन्वय है। इन्हीं के समन्वय से यह जीवन और संसार समृद्ध बनता है। विष्णु की चार भुजाओं की संगति भी कहीं-कहीं सुदर्शन चक्र के साथ बिठाई गई है। गणेश की प्रतिमा की स्वस्तिक चिह्न के साथ संगति बैठ जाती है। गणपति की सूंड, हाथ,पैर, सिर आदि को इस तरह चित्रित किया जा सकता है, जिसमें स्वस्तिक की चार भुजाओं का ठीक तरह समन्वय हो जाए। ॐको स्वस्तिक के रूप में लिया जा सकता है। लिपि विज्ञान के आरंभिक काल में गोलाई के अक्षर नहीं, रेखा के आधार पर उनकी रचना हुई थी। ॐको लिपिबद्ध करने के आरंभिक प्रयास में उसका स्वरूप स्वस्तिक जैसा बना था। ईश्वर के नामों में सर्वोपरि मान्यता ॐकी है