मलयाली नर्सों की व्यथा-कथा


यदि हम धर्म निरपेक्ष देश हैं तो केरल से विदेशों में धार्मिक आधार पर नौकरी पर जानें की सुविधा क्यों ?

मलयाली नर्सों की व्यथा-कथा

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ तमिल पत्रकार
10-08-2014 

आप हिन्दुस्तान के किसी भी अस्पताल में जाएं, तो संभव है कि वहां आपको कोई-न-कोई मलयाली नर्स मिल ही जाए। दुनिया के दूसरे मुल्कों की अपनी यात्रा के दरम्यान भी बहुत मुमकिन है कि वे आपको बीमार लोगों की तिमारदारी में जुटी दिखाई दे जाएं, खासकर खाड़ी के देशों में। आखिर केरल इतनी तादाद में नर्सों को विदेश क्यों भेजता है? क्या वजह है कि उनमें से कई नर्सें बमबारी और गोलियों की बरसात वाले खतरनाक हालात में भी काम छोड़कर आना नहीं चाहतीं? इसमें कोई दोराय नहीं कि यह एक महान पेशा है और नर्सें स्वास्थ्य सेवा में एक निर्णायक भूमिका अदा करती हैं। उनकी पेशेवर ईमानदारी और निजी प्रतिबद्धताओं से जुड़ी न जाने कितनी ही कहानियां हमें सुनने को मिलती हैं। अस्पताल से छुट्टी के वक्त हममें से ज्यादातर उनकी सेवा और देखभाल के लिए न सिर्फ उनका धन्यवाद करते हैं, बल्कि उनके प्रति हृदय से आभारी होते हैं। लेकिन हममें से ज्यादातर लोग शायद इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि नर्सों और पैरा-चिकित्सकों के साथ ज्यादातर अस्पतालों में या उनके प्रबंधन का क्या सलूक होता है। यदि ‘यूनाइटेड नर्सेज एसोसिएशन’ के दावों पर यकीन करें, तो भारत में नर्सें चिकित्सा सेवा में खुद को हाशिये पर मानती हैं। उन्हें बेहतर तनख्वाह तो नहीं ही दी जाती, बल्कि खराब माहौल में काम करना पड़ता है।

ज्यादातर अस्पतालों में उन्हें अनुभव और योग्यता के मुताबिक वेतन नहीं मिलता। एसोसिएशन का कहना है कि ‘इस क्षेत्र में उत्पीड़न और शोषण लंबे समय से जारी है, मगर इसके खिलाफ आवाज उठाने का साहस आज भी कोई नहीं करता।’ पिछले सप्ताह नर्सों का एक दल लीबिया से सकुशल घर लौटा। लगभग एक महीने पहले ही इराक में फंसी 47 नर्सों को भारत सरकार स्वदेश वापस लाई थी। तब वह खबर हर तरफ सुर्खियों में थी। उन भयभीत नर्सों ने बेहद खौफनाक कहानियां सुनाई थीं। केरल के अखबारों और न्यूज चैनलों में वे कहानियां लगातार प्रकाशित-प्रसारित हुईं। उनमें कुछ तो त्याग और साहस की बेमिसाल निजी दास्तां थीं। लेकिन कुछ खबरें यह भी बता रही थीं कि इराक के इतने खतरनाक हालात के बावजूद उनमें से कुछ नर्सें वापस काम पर बगदाद लौटना चाहती हैं! कई नर्सें बैंक की कर्ज अदायगी की समस्या से जूझ रही थीं और एक के पिता को यह कहते हुए दिखाया गया था कि उसके पास अपनी बेटी को तिरकित वापस भेजने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं है, क्योंकि वहां के लिए एजेंट सबसे कम धन वसूलते हैं। तिरकित के लिए जहां एजेंट 1.5 लाख रुपये लेते हैं, वहीं कुवैत के लिए यह राशि 12 से 18 लाख रुपये के बीच बैठती है। ये पैसे वीजा, टिकट और एजेंटों की फीस के रूप में वसूले जाते हैं।

इराक से जो नर्सें भारत आईं, वे वहां 30 से 40 हजार रुपये महीना पगार पा रही थीं। लेकिन उन्होंने इराक पहुंचने और इन नौकरियों को हासिल करने के लिए जितना खर्चा किया, उतनी राशि वे कमा न सकीं। उनके माता-पिता ने उनकी पढ़ाई और यात्रा के लिए कर्ज लिए थे। कई अभिभावकों ने इसके लिए अपनी जायदाद तक बेच डाली थी। लेकिन जिस बुरे तरीके से उनका करियर संकट में पड़ गया है, उससे वे कठिन आर्थिक परेशानी में फंस गई हैं। केरल से प्रकाशित अखबारों में खाड़ी देशों में नौकरी के विज्ञापन लगातार प्रकाशित हो रहे हैं। मैंने पिछले दिनों पाया कि सिर्फ एक संस्करण में ऐसे चार विज्ञापन छपे थे। एक विज्ञापन में ढाई साल का अनुभव रखने वाली नर्सों को कुवैत में 705 दीनार (लगभग डेढ़ लाख रुपये) मासिक वेतन का प्रस्ताव किया गया था। दूसरे विज्ञापन में दो साल आठ महीने के अनुभव की शर्त थी, जबकि तीसरे में दो साल नौ महीने और चौथे में तीन साल के अनुभव की अपेक्षा की गई थी। ये विज्ञापन ट्रेवल एजेंसी द्वारा दिए गए थे और इनमें आवेदकों को ‘स्थायी नौकरी, आकर्षक तनख्वाह, मुफ्त भोजन, आवास, यातायात और भत्तें’ का प्रलोभन परोसा गया था। अक्सर एजेंटों पर ये आरोप लगते हैं कि कमीशन की अपनी राशि वसूले जाने तक वे आवेदकों का मूल पासपोर्ट जब्त कर लेते हैं। लेकिन नर्सें इसके बाद भी बाहर नौकरी पर जाना चाहती हैं।

केरल की अर्थव्यवस्था उन 20 लाख लोगों द्वारा विदेश से अपने घर भेजी गई रकम पर निर्भर है, जो विदेश में काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर लोग खाड़ी के देशों में काम कर रहे हैं। यही कारण है कि अक्सर केरल के बारे में ‘मनीऑर्डर इकोनॉमी’ पर निर्भर सूबे का जुमला उछाला जाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस राज्य में नौकरियों के अवसर काफी सीमित हैं। इसका मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र काफी उपेक्षित है और राज्य अपने लोगों के लिए नए मौके पैदा करने में नाकाम रहा है। इंडियन नर्सिंग कौंसिल का कहना है कि देश में 80 प्रतिशत नर्सें केरल से आती हैं और उनमें भी बड़ी संख्या ईसाई समुदाय के निम्न आयवर्ग वाले परिवारों की लड़कियों की है। ऐतिहासिक तथ्य है कि ईसाई मिशनरियों ने सबसे पहले केरल को ही एक पेशे के तौर पर नर्सिंग से परिचय कराया। युवा नर्सों का पहला दल जर्मनी प्रशिक्षण लेने गया था। सन 1960 में कैथोलिक समुदाय की 6,000 नर्सें जर्मनी गई थीं, क्योंकि तब वहां नर्सों की भारी कमी हो गई थी। उनका वह प्रवासन इसलिए आसानी से हो सका, क्योंकि मिशनरियों ने इसमें उनकी मदद की थी।

आखिर क्यों केरल की नर्सों को नौकरी के लिए विदेश जाने की जरूरत पड़ती है? यदि केरल उन्हें नौकरी दे सकने में नाकाम है, तो क्या देश के दूसरे हिस्सों में भी उनके लिए अवसर नहीं हैं? निस्संदेह, देश को काफी संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों के मुताबिक, भारत में प्रति 10,000 नागरिक पर नर्सों-दाइयों का समायोजित अनुपात 2.4 है। लेकिन इस कसौटी पर भी देश में प्रति एलोपैथिक डॉक्टर के मुकाबले उनकी उपलब्धता एक से भी कम है। इस अनुपात को बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि नर्सें डॉक्टरों के मुकाबले बहुत कम वेतन पर अपनी सेवाएं देती हैं। साल 1991 के खाड़ी युद्ध के समय पश्चिम एशिया के देशों से काफी भारतीय देश लौट आए थे, इनमें नर्सें भी थीं। लेकिन साल 2014 में पूरा ध्यान नर्सों पर ही रहा है, जो इराक व लीबिया से वापस लौटी हैं। इन घटनाओं ने नर्सों के हालात को सामने लाने का काम किया है। क्या सरकार ऐसा माहौल नहीं बना सकती कि उन्हें देश के भीतर ही पर्याप्त मौके मिल सकें? ऐसा हो सकता है, अगर सरकार के पास इसकी इच्छाशक्ति हो।

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