रविवार, 31 जनवरी 2016

आखिरी ओवर : युवराज और रैना ने पलटा मैच : ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर क्लीन स्वीप

आखिरी ओवर : युवराज और रैना ने पलटा मैच : 140 साल में पहली बार ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर क्लीन स्वीप




खेल डेस्क. तीसरे और आखिरी टी-20 मैच में जीत के लिए 198 रनों के टारगेट का पीछा कर रही टीम इंडिया के सामने आखिरी ओवर में 17 रन बनाने का चैलेंज था। 19th ओवर की आखिरी बॉल पर युवराज ने एक रन ले लिया। इसका मतलब था कि 20th ओवर की पहली बॉल वही खेलेंगे। युवराज के सामने ऑस्ट्रेलिया के बॉलर टाई थे। युवी ने पहली दो बॉल्स पर 10 रन बनाकर मैच का रुख भारत की तरफ मोड़ दिया। रैना ने आखिरी बॉल पर चौका मारते हुए अपनी टीम को जीत दिला दी। इस तरह भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 7 विकेट से हराते हुए सीरीज3-0 से जीत ली।

20वें ओवर में ऐसे बने रन...

पहली बॉल
- इंडियन इनिंग के 19 वें ओवर में सिर्फ 5 रन बने थे। युवराज कई शॉट्स मिस टाइम कर रहे थे। इससे युवराज पर प्रेशर था।
- 20 वें ओवर की पहली बॉल पर स्ट्राइक युवी के पास थी। ऑस्ट्रेलिया की ओर से बॉलर टाई ने युवराज के पैड्स की तरफ लेंथ बॉल फेंकी। युवी ने फाइन लेग के ऊपर से फ्लिक करते हुए बॉल को बाउंड्री के बाहर भेज दिया।
दूसरी बॉल
- टाई ने फिर युवी के पैड की तरफ लेंथ बॉल फेंकी। युवी ने डीप मिडविकेट के ऊपर से सिक्स मार दिया।
तीसरी बॉल
- टाई ने स्लोअर ऑफकटर फेंकी। युवराज ने शॉट मिस किया। लेकिन तब तक रैना ने दौड़ कर बाई के तौर पर एक रन ले लिया।
चौथी बॉल
- टाई ने रैना के पैड की तरफ यॉर्कर फेंकी। रैना ने लेग साइड की तरफ शॉट खेलकर दो रन ले लिए।
पांचवीं बॉल
- भारत को दो बॉल्स पर चार रन चाहिए थे। टाई ने फुल टॉस फेंकी। रैना ने स्क्वॉयर लेग की तरफ ड्राइव किया। दो रन मिले।
छठी बॉल
- आखिरी बॉल। भारत को जीत के लिए दो रन चाहिए थे। टाई ने शॉर्ट बॉल फेंकी। रैना ने प्वॉइंट के ऊपर से शॉट मारा। चार रन। भारत ने मैच जीत लिया।
ओवर-बाई-ओवर दोनों टीमों के स्कोर्स का COMPARISON
ऑस्ट्रेलियाई इनिंगइंडियन इनिंग
ओवरस्कोरइस ओवर में बने रनस्कोरइस ओवर में बने रन
11/017/07
215/01418/011
324/1942/024
437/11349/17
548/11162/113
657/1974/112
763/1681/17
872/2991/110
975/2396/15
1080/35102/16
1189/39112/110
12103/314122/110
13118/315130/28
14127/39139/29
15140/313147/38
16149/39156/39
17168/419164/38
18176/48176/312
19187/411181/35
20197/510200/319
15 ओवर के बाद 11 से ऊपर चला गया था रन रेट
- 16th ओवर में 9, 17th में 8, 18th 12 और 19th ओवर में सिर्फ 5 रन बनने से ऑस्ट्रेलिया भारी पड़ने लगा। रिक्वायर रन रेट 11 से ऊपर चला गया।
- आखिरी ओवर में 17 रन चाहिए थे। इस ओवर में युवी ने चौका और छक्का लगाकर जोरदार वापसी की।
- इसके बाद रैना ने अंतिम बॉल पर चौका लगाकर जीत दिला दी।
मैच के स्पेशल FACTS...

- विराट पहले ऐसे बैट्समैन हैं, जिन्होंने एक टी-20 सीरीज के सभी मैचों में फिफ्टी लगाई है।
- पिछले 6 मैच में विराट 4 फिफ्टी लगा चुके हैं। ये ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ लगातार तीसरी फिफ्टी थी।
- वाटसन (124*) ने कप्तान के रूप में एक इनिंग में सबसे ज्यादा रन का रिकॉर्ड अपने नाम किया। उनसे पहले ये रिकॉर्ड साउथ अफ्रीका के फॉफ डु प्लेसिस (119) के नाम था।
- शॉन टेट के एक ओवर में 24 रन बने। ये टी-20 में दूसरा सबसे महंगा ओवर रहा। इंग्लैंड के स्टुअर्ट ब्रॉड ने 2007 में 36 रन खर्च किए थे।
- 140 साल में पहली बार ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर किसी टीम (भारत) ने उसे क्रिकेट के किसी भी फॉर्मेट (टी-20) में क्लीन स्वीप (3-0) करते हुए हराया है।

भारत के "रन"बांकुरों ने फिर भारत माँ को गौरवान्वित किया।


‪#‎T20‬ में भारतीय क्रिकेट टीम का यह शानदार प्रदर्शन, मार्च में आ रहे #T20‪#‎WorldCup‬ के लिए बहुत ही शुभ संकेत है।
ऑस्ट्रेलिया को 140 साल बाद किसी ने उन्ही की धरती पर सीरिज़ के सारे मैच हरा कर सीरिज़ जीती है, और इस बात से इस जीत का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। भारतीय क्रिकेट टीम के दो अनमोल रत्न, Man Of The Series Virat Kohli व आज के बाज़ीगर रहे Yuvraj Singh को इस ऐतिहासिक जीत पर दिल से विशेष बधाई। यशस्वी भवः।
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टी-20 में भारत का क्लीन स्वीप

बीबीसी हिन्दी
सिडनी में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले गए तीसरे और अंतिम टी-20 मैच में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 7 विकेट से हरा दिया है. इसके साथ ही भारत ने तीन मैचों की सिरीज़ 3-0 से जीत ली.
सिरीज़ में बेहतरीन प्रदर्शन की बदौलत भारतीय टीम आईसीसी टी-20 रैंकिंग में चोटी पर पहुँच गई है. दूसरे स्थान पर वेस्टइंडीज़ है.
ऑस्ट्रेलिया ने शेन वॉटसन के शानदार शतक की बदौलत 197 रन बनाए थे. भारत ने 20 ओवरों में तीन विकेट खोकर 200 रन बनाकर मुक़ाबला जीत लिया.
भारत की ओर से सुरेश रैना 49 रन बनाकर नाबाद रहे, जबकि युवराज सिंह 12 गेंदों में 15 रन बनाकर नाबाद रहे.
भारत की पारी में रोहित शर्मा और शिखर धवन ने ठोस शुरूआत की.

शिखर धवन 9 गेंदों में चार चौकों और एक छक्के की मदद से 26 रन बनाकर आउट हुए. जबकि रोहित शर्मा ने 38 गेंदों में पाँच चौकों और एक छक्के की मदद से 52 रन बनाए.
धवन के बाद आए विराट कोहली 36 गेंदों में 50 रन बनाकर आउट हुए.
इससे पहले, ऑस्ट्रेलिया की ओर से वॉटसन 71 गेंदों में 124 रन बनाकर नाबाद रहे. उन्होंने 10 चौके और छह छक्के लगाए.

ऑस्ट्रेलिया की ओर से वॉटसन के अलावा ट्रेविस हेड ने 26 और उस्मान ख़्वाजा ने 14 रन बनाए.
भारत की ओर से नेहरा, बुमराह, अश्विन, जडेजा और युवराज ने एक-एक विकेट लिया.
ऑस्ट्रेलिया ने 9.85 रन प्रति ओवर की औसत से पाँच विकेट खोकर 197 रन बनाए हैं.
तीन मैचों की इस सीरीज़ को भारत पहले ही दो मैच जीतकर अपने नाम कर चुका है.

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टी-20 में शीर्ष पर पहुंचा भारत

तीसरे टी-20 में आॅस्ट्रेलिया को हराने के साथ ही भारत टी-20 रैंकिंग में पहले स्थान पर पहुंच गया है. 120 अंकों के साथ भारत पहले स्थान पर है.वहीं वेस्टइंडीज़ और श्रीलंका 118 अंकों के साथ दूसरे और 117 अंकों के साथ इंग्लैंड तीसरे स्थान पर हैं.
मैच के ख़त्म होने के बाद भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने कहा, "पिछले मैचों में हमारे बल्लेबाज़ अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे. हमें अपने गेंदबाज़ों से 10 प्रतिशत अधिक मेहनत चाहिए थी."
उन्होंने कहा, "टी-20 में गेंदबाज़ों ने वही किया जिसकी उनसे उम्मीद थी. टी-20 वर्ल्ड कप में लगभग हमारी यही टीम रहने वाली है."
सिडनी मैच में आॅस्ट्रेलिया के कप्तान शेन वॉटसन के 124 रनों की वजह से उनकी टीम 197 रनों का विशाल स्कोर खड़ा करने में कामयाब रही थी.
लेकिन भारत की तरफ से रोहित शर्मा के 52, विराट कोहली के 50 और सुरेश रैना के 49 रनों की वजह से भारत ने जीत दर्ज की.

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तीसरे रोमांचक टी-20 में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 7 विकेट से हराया, 

भारत ने सीरीज 3-0 से जीती
Date: 31/01/2016 

सिडनी, 31 जनवरी (वीएनआई)। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सिडनी क्रिकेट मैदान पर आज खेले गए रोमांच के भरपूर तीसरे और अंतिम टी-20 मैच में रोहित शर्मा (52) विराट कोहली (50), सुरेश रैना (नाबाद 49) की शानदार पारियों की मदद से भारत ने आस्ट्रेलिया को सात विकटों से हराकर श्रृंखला पर 3-0 से कब्जा जमा लिया। 
टॉस जीत कर पहले बल्लेबाजी करने उतरी आस्ट्रेलिया ने भारत के सामने 198 रनों का विशाल लक्ष्य रखा था जिसे भारत ने मैच की अंतिम गेंद पर हासिल कर लिया। भारत ने लक्ष्य का पीछा करने के लिए पूरे 20 ओवर खेले और महज तीन विकेट गंवाए। 
विशाल लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम के सलामी बल्लेबाजों शिखर धवन (26) ने शुरु से ही तेज खेल खेला। दोनों ने पहले विकेट के लिए 46 रनों की साझेदारी की। शेन वाटसन ने धवन को आउट कर इस साझेदारी को तोड़ा। इसके बाद आए कोहली ने रोहित के साथ पारी को आगे बढ़ाया और आस्ट्रेलियाई गेंदबाजों की जमकर धनाई की। दोनों ने दूसरे विकेट के लिए 78 रनों की साझेदारी की। दोनों ही खिलाड़ियों को कैमरून वॉयस ने आउट किया। 
रोहित ने अपनी आतिशी पारी में 38 गेंदो का सामना करते हुए पांच चौके और एक छक्का लगाया। वहीं कोहली ने अपनी पारी में 36 गेंदे खेलीं। उन्होंने अपनी पारी में दो चौके और एक छक्का लगाया। इन दोनों के बाद मैच जिताने की जिम्मेदारी रैना और युवराज सिंह (15) पर थी। दोनों ने रन गति को बनाए रखा और आस्ट्रेलियाई गेंदबाजों पर लगातार प्रहार करते रहे। रैना ने अपनी तूफानी पारी में 25 गेंदें खेलीं। उनकी पारी में छह चौके और एक छक्का शामिल है।
अंतिम ओवर की आखिरी गेंद पर भारत को जीत के लिए 2 रनों की जरूरत थी। रैना ने अपने बल्ले से गेंद को सीमांरेखा के पार पहुंचा कर भारत को जीत दिलाई और आस्ट्रेलिया को टी-20 श्रृंखला में 3-0 से हराकर सूपडा साफ किया। आस्ट्रेलिया की तरफ से वाटसन ने एक और वायस ने दो विकेट लिए। 
इससे पहले आस्ट्रेलिया ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए कप्तान शेन वाटसन (नाबाद 124) की तूफानी पारी की बदौलत निर्धारित 20 ओवरों में पांच विकेट के नुकसान पर 197 रन बनाए। आस्ट्रेलिया की तरफ से वाटसन के अलावा ट्रेविस हेड ने 26 रनों का पारी खेली। आस्ट्रेलिया के बल्लेबाज भारतीय गेंदबाजों को ठीक से खेल नहीं पा रहे थे, लेकिन दूसरे छोर पर खड़े वाटसन ने ना सिर्फ पारी को संभाला बल्कि अपना तेज खेल भी जारी रखा। चोटिल एरॉन फिंच की जगह कप्तानी कर रहे वाटसन नाबाद पेवलियन लौटे। उन्होंने अपनी पारी में 71 गेंदों का सामना किया और 10 चौके और छह छक्के लगाए। 
टी-20 में किसी भी कप्तान का यह सर्वाधिक स्कोर है। इससे पहले यह रिकार्ड दक्षिण अफ्रीक के फाफ डू प्लेसी के नाम था। वाटसन और प्लेसी के अलावा श्रीलंका के तिलकरत्ने दिलशान ही ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने टी-20 में कप्तान के तौर पर शतक लगाया है। वाटसन पहले आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी हैं जिन्होंने क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में शतक लगाए हैं। भारत की तरफ से जसप्रीत बुमराह, आशीप नेहरा, रविन्द्र जडेजा, रविचन्द्रन अश्विन और युवराज सिंह ने एक - एक विकेट लिया।
अपनी शानदार शतकीय पारी के लिए वाटसन को मैन ऑफ द मैच चुना गया। तीन मैचों में लगातार तीन अर्धशतक लगाने वाले भारत के कोहली को मैन ऑफ द सीरीज चुना गया। 



दुनिया में चमक रहा है भारतीय मेधा का सितारा : शेषाद्रि चारी


दुनिया में चमक रहा है भारतीय मेधा का सितारा
तारीख: 04 Jan 2016
शेषाद्रि चारी
(लेखक आर्गेनाइजर साप्ताहिक के पूर्व संपादक और भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं।)


भारत की विदेश नीति में अनिवासी भारतीयों की एक बड़ी भूमिका है, ठीक वैसे ही जैसी चीन में आधुनिक औद्योगिक समाज बनाने में अनिवासी चीनियों की, इस्रायल के संदर्भ में अमरीका और पश्चिमी यूरोपीय नीतियों में अनिवासी यहूदियों की भूमिका है। आज संगठित अनिवासी समूहों की नीति प्रक्रिया में प्रमुख भागीदारों के नाते भूमिका एकाएक बढ़ गई है। पश्चिम में इस प्रकिया से एकदम विपरीत, एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में अनिवासी भारतीयों का दखल सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक-व्यावसायिक आदान-प्रदान के नाते रहा है। अनिवासियों में नस्लीय, राष्ट्रीय, पांथिक और जातीय समूह शामिल हो सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि अनिवासी भारतीय समाज अब खुद को अपने मूल देश यानी भारत में घटने वाली घटनाओं से जुड़ा महसूस करता है। इस देश में किसी वक्त जरूरत पड़ने पर यह समूह राजनीतिक रूप से सक्रिय हो सकता है।
बीते कुछ वर्षों के दौरान अनिवासी समाज पूरी दुनिया में एक ताकतवर आर्थिक और राजनीतिक समूह के नाते उभरा है। चीनी और भारतीय अनिवासी समुदाय अनिवासियों के आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। हाल के कुछ वर्षों में अनिवासियों के अध्ययन में बौद्धिक पलायन का एक नया आयाम शामिल हुआ है, खासकर भारत जैसे देशों के संदर्भ में। अमरीका में स्नातक शिक्षा ले रहे विदेशी छात्रों में आधे से ज्यादा अपने मूल देश लौट कर नहीं जाते जिससे उनके देशों में कुशल और शिक्षित नागरिकों की कमी हो जाती है। इसीलिए इनमें से कई देशों ने दोहरी नागरिकता, शिक्षा और आंतरिक मामलों से जुड़ी नीतियों में बदलाव लाना शुरू कर दिया है। भारत सरकार बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियरों और उद्यमियों को अपने वतन वापस लौटकर काम करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। लौटने वाले ये लोग अपने साथ प्रौद्योगिकी, धन, प्रबंधकीय और संस्थागत दक्षता लेकर आते हैं। उदाहरण के लिए भारत ने सागरपारीय भारतीय मामलों का मंत्रालय स्थापित किया और अनिवासी भारतीयों को अनिवासी भारतीय या एनआरआई के साथ ही पी.आई.ओ. (पर्संस आॅफ इंडियन ओरिजिन) का विशेष दर्जा दिया है। अभी हाल तक पी.आई.ओ. और एनआरआई ने सामाजिक, सांस्कृतिक, पांथिक और आर्थिक जुड़ावों के जरिए भारत से अपने संबंध बनाए रखे हैं। लेकिन अब भारत अनिवासी समाज के सदस्यों के बीच सूत्र जोड़े रखने के लिए वार्षिक सम्मेलन प्रायोजित करता है और उन-उन देशों में उनके सामने आ रहे मुद्दों पर चर्चा करता है, जिनमें आज वे रह रहे हैं।
यूके में वहां के आम चुनावों पर शायद भारतीय राजनीतिक परिदृश्य का कुछ ज्यादा दखल दिखा है जो आज के भारत में बढ़ते आत्मविश्वास को काफी हद तक दर्शाता है। 2010 के यूके चुनावों में कुल उम्मीदवारों में 89 एशियाई मूल के थे जो कि एक रिकार्ड था। पिछले चुनावों में एशिया मूल के 15 उम्मीदवार सांसद चुने गए और ये भी अनिवासी भारतीय समाज की चुनावी उपलब्धियों में मील का पत्थर साबित होता है। दो बहनें, कीथ वाज और वेलेरी वाज भारतीय मूल की महिला सांसद चुनी गर्इं। प्रीति पटेल विल्हम चुनाव क्षेत्र से जीतीं। भारतीय मूल की दो महिलाएं पहली बार हाउस आॅफ कॉमन्स में चुनी गर्इं। यूके संसद के निचले सदन के इतिहास में पहली बार वाज और पटेल एशियाई मूल की पहली महिला सांसद बनीं। जीतने वालों में वीरेन्द्र शर्मा और मारशा सिंह भारतीय मूल के ही हैं। कन्जर्वेटिव उम्मीदवार पॉल उप्पा वोल्वरहेम्प्टन दक्षिण पश्चिम चुनाव क्षेत्र से जीते। रीडिंग वेस्ट से आलोक शर्मा जीते तो कैंब्रिजशायर नार्थ वेस्ट से शैलेश वारा जीते।
लघु भारत कहे जाने वाले मॉरीशस को यह नाम वहां बड़ी तादाद में अनिवासी भारतीयों के बसे होने की वजह से नहीं दिया गया है बल्कि यह उन कुछ विदेशी हिस्सों में से है, जहां अनिवासी भारतीय समाज की जबरदस्त राजनीतिक ताकत है। इस देश के राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए अनिवासी भारतीय समाज की राजनीतिक प्रभुता कोई बड़ी खबर नहीं बनती। भारत से इसका सांस्कृतिक जुड़ाव एक नहीं अनेक क्षेत्रों में है। यह नि:संदेह अनिवासी भारतीय समाज की राजनीतिक यात्रा का एक और पहलू है।
इधर अटलांटिक के पार कैरीबियाई देशों में अनिवासी भारतीय समाज ने एक अनूठी राजनीति विजय हासिल की है। भारतीय मूल की श्रीमती कमला प्रसाद बिसेसर त्रिनिदाद और टोबैगो की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी हैं। आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने पार्टी के संस्थापक बासुदेव पाण्डे को हराया था, जो खुद इस देश के भारतीय मूल के प्रधानमंत्री रहे थे। अटलांटिक के और पश्चिम में जाएं तो वहां भी भारतीय अमरीकी, अमरीकी राजनीतिक परिदृश्य में एक ताकतवर शक्ति के रूप में उभर रहे हैं। इसमें उनकी निर्विवाद आर्थिक सफलता, उद्यमशीलता, कड़ी मेहनत और पारिवारिक मूल्यों तथा परंपराओं और संस्कृति से जुड़े रहने का बड़ा हाथ है। दूसरी पीढ़ी के भारतीय अमरीकियों ने तो अपनी राजनीतिक सूझबूझ और दमदारी के साथ प्रस्तुत की है।
भारतीय अमरीकी नागरिकों ने अब अपने देश के सार्वजनिक जीवन में और अधिक भागीदारी लेनी शुरू कर दी है, जिसके पीछे प्रेरणा है भारत की बढ़ती वैश्विक की साख की और नई दिल्ली तथा वाशिंगटन के बीच वैश्विक भू राजनीतिक परिदृश्य की पृष्ठभूमि में बढ़ते मेलमिलाप की। इस समाज का अमरीका की सरकार और राजनीतिक शक्ति केन्द्रों पर अपना आर्थिक असर दिखाने का माद्दा है। यह चचा सैम की नीतियों पर खासतौर पर भारत के दीर्घकालीन हितों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। जहां बराक ओबामा प्रशासन ने एक तरह का रिकार्ड बनाते हुए कई कामयाब भारतीय अमरीकी व्यवसायियों को प्रशासनिक जिम्मेदारियों के ओहदों पर बैठाया है वहीं भारतीय मूल के लोगों ने राजनीतिक वातावरण में भी अपनी पैठ बढ़ाई है।
जैसा हमने चीन के संदर्भ में देखा, अनिवासी समाज आर्थिक विकास में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर किसी देश को आधुनिक औद्योगिक समाज में बदल सकता है। चीन में 80 और 90 के दशकों में कुल विदेशी निवेश का 68 प्रतिशत सागरपारीय चीनियों से आया था। अनिवासी समाज राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है। 2011 में भारत को 56 अरब से ज्यादा अमरीकी डालर प्राप्त हुए थे। केरल के सकल घरेलू उत्पाद का 20 प्रतिशत से कुछ ज्यादा हिस्सा इसी से आता है। पंजाबी अनिवासियों ने खेती के उपकरण खरीदकर हरित क्रान्ति में योगदान दिया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार की मेक इन इंडिया तथा अन्य आर्थिक योजनाओं के चलते कौशल पलायन, पूंजी बहिर्गमन और प्रौद्योगिकी घाटा कम होना चाहिए ताकि उन्नति की नई कहानी में अनिवासी भारतीयों की भागीदारी और बढ़े।
इसमें संदेह नहीं है कि अनिवासी भारतीय समाज की कामयाबी, खासकर राजनीतिक क्षेत्र में अपने मूल देश यानी भारत पर कोई प्रभाव नहीं डालती। विभिन्न देशों में चुनावी सफलताएं तो अनिवासी भारतीयों के लिए एक ताजा घटा घटनाक्रम है, ऐसा जिसमें अभी उनको काफी माहिर होने की जरूरत है। पहले भी भारतीयों ने पूर्वी अफ्रीका में गजब की कामयाबी दर्ज कराई है, हालांकि उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और भौगोलिक राजनीतिक धारा ने उनके कुल प्रभाव को सीमित कर दिया था। इसके बाद यूके में और भी सफलताएं हासिल हुर्इं, पहले उद्योगों में, और अब हाल ही में राजनीतिक क्षेत्र में शानदार कामयाबी मिली है। कैरेबियाई देशों, पूर्व (उदाहरण के लिए फिजी) और मारीशस में कहानी कुछ अलग है, क्योंकि यहां प्रमुख रूप से अनिवासी भारतीय समाज की बसाहट, उपस्थिति और प्रयासों ने ही उन देशों को आकार दिया है। अमरीका में तो अनिवासी भारतीय समाज का असर निश्चित तौर पर बहुत ज्यादा है। एक बात साफ तौर उभरती है कि अगर भारत अपनी राजनीति समग्र राष्ट्रीय शक्ति को बढ़ाते हुए वैश्विक शक्ति का दर्जा हासिल करना चाहता है तो, देश को भविष्य में अपने अनिवासी समाज के रणनीतिक प्रभाव के लिए स्थान बनाना होगा। सागर पार हमारी ताकत को मजबूत करना है तो अपने देश में राजनीतिक रूप से कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव अपनाने ही पड़ेंगे।            

शनिवार, 30 जनवरी 2016

हिन्दू जगेगा तो ही विश्व जगेगा : सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी




हिन्दू जगेगा तो ही विश्व जगेगा: भैयाजी जोशी
तारीख: 04 Jan 2016



गत 29 दिस्म्बर को इंदौर के एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल में हिन्दू स्वयंसेवक संघ के 'विश्व संघ शिविर-2015' का उद्घाटन हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी तथा लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन ने दीप प्रज्वलित करके इस पांच दिवसीय आवासीय शिविर का शुभारम्भ किया। शिविर में दुनिया के 40 देशों से 750 से ज्यादा शिविरार्थियों ने भाग लिया। उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने कहा कि रक्त, मन, मस्तिष्क में स्थापित विचार कभी दुर्बल नहीं होते। आज हम भिन्न प्रकार का चिंतन लेकर विश्व में खड़े हैं। हमने विश्व को एक परिवार माना है, इसे हम अपने चिंतन से प्रभावित करना चाहते हैं। सभी संघर्षों को समाप्त करने हेतु चिंतन हिन्दू समाज ही दे सकता है। हम हिन्दू हैं, यह अहंकार नहीं, स्वाभिमान है। विश्व तभी जगेगा, जब हिन्दू जगेगा। उन्होंने आगे कहा कि भारत से हजारों लोग विश्व के अनेक देशों में किसी को हराने या लूटने नहीं गए। भारत में देने की परम्परा है, लेने की नहीं। हम शास्त्र व मूल्य लेकर गए, शस्त्र नहीं। संघ या हिन्दू स्वयंसेवक संघ का कार्य इस यात्रा का दर्शन कराना है।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि लोकसभा अध्यक्षा श्रीमती सुमित्रा महाजन ने कहा कि भारतीय संस्कृति और हमारे संस्कारों के सच्चे राजदूत विश्व में फैले हुए भारतीय ही हैं, जिन्होंने भारत की विरासत को विश्व में पहंुचाया है। भारतीय संस्कृति के अनुसार हम पेड़-पौधों की पूजा करते हैं, ये संस्कार आधारित जीवन दर्शन है। हम समस्त जीवों को अपने परिवार का सदस्य मानते हैं। आज भी विश्व के कई देशों में दीपावली-गणेश उत्सव आदि त्योहार बड़े पैमाने पर मनाए जाते हैं। भारतीय नागरिक जिस देश में भी गए, वहां उन्होंने मंदिर बनाने को प्राथमिकता दी, सम्पूर्ण विश्व में सनातन संस्कृति का प्रसार किया।

इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका एवं सीडी का विमोचन भी किया गया। हिन्दू स्वयंसेवक संघ के संयोजक श्री सौमित्र गोखले ने विश्व में संघ द्वारा किए जा रहे कार्यों का वृत्त प्रस्तुत किया। शिविर के दूसरे दिन भारत की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने एक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस दिन एक सत्र में शिविरार्थियों से अ. भा. प्रचार प्रमुख श्री मनमोहन वैद्य ने प्रचार और उसे जुड़े विभिन्न आयामों पर चर्चा की। उन्होंने प्रचार साधनों और उनकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला। प्रश्नोत्तर में अनेक रोचक प्रश्न पूछे गए। शाम को विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने समां बांध दिया। नृत्य-संगीत की इन प्रस्तुतियों में भारतीय संस्कृति और परंपराओं की झलक देखने को मिली।

एक सत्र में शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय सेवा प्रमुख श्री सुहासराव हिरेमठ ने सेवाभाव का अर्थ और उद्देश्य समझाया। उन्होंने कहा कि सेवा कायार्को भारत में चार आयामों में बांटा गया है- शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज और स्वावलंबन। आज पूरे भारत में 1 लाख 52 हजार 388 सेवा कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा चलाये जा रहे हैं। हमारा लक्ष्य है कि आज हम जिन लोगों की सेवा कर रहे हैं, जल्दी ही वे आत्मनिर्भर बनकर समाज में सेवक के रूप में कार्य करें।

संघ के विश्व विभाग के संयोजक श्री अनिल वर्तक ने बताया कि विदेशों से आए ये प्रतिनिधि अपने-अपने देशों के प्रमुख मुद्दों, सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। शिविर में ऐसे अनेक अनुभव साझे किए गए जिनसे विभिन्न देशों में भारतीय संस्कृति और मूल्यों के प्रचार-प्रसार की और उनमें जुटे कार्यकर्ताओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई है।

शिविर में दैनिक कार्यक्रमों में शिविरार्थी बड़े ही मनोयोग से भाग ले रहे हैं। प्रात: उठकर नियमित कार्यक्रम के बाद मातृशक्ति द्वारा दण्ड संचालन व योग का कार्यक्रम होता है। पुरुष स्वयंसेवक योगाभ्यास, खेल आदि में एकत्र होते हैं। शिविर के मुख्य शिक्षक एवं शारीरिक शिक्षा प्रमुख श्री रमयावरन (सिडनी, आस्ट्रेलिया) ने बताया कि शिविर में बौद्धिक के साथ शारीरिक अभ्यास नियमित होता है, जिसमें भारत की सांस्कृतिक विरासत, योगाभ्यास व खेलकूद के अलग-अलग सत्र होते हैं। इससे एकाग्रता और स्फूर्ति विद्यमान रहती है। शारीरिक के द्वारा हमें अनुशासन की भी प्रेरणा मिलती है।

हिन्दू स्वयंसेवक संघ के संयोजक श्री सौमित्र गोखले ने एक प्रेस वार्ता में बताया कि इन्दौर में शिविरार्थियों को अद्भुत अनुभव हुआ है। व्यंजनों के लिए प्रसिद्ध इंदौर का भोजन सभी शिविरार्थियों को बेहद पसंद आ रहा है। शिविर में अपने-अपने देशों में जो कार्य हो रहे हैं, उनको कैसे बेहतर बनाना है, इस संबंध में एक दूसरे के अनुभवों को आपस में बांटा जा रहा है। शिविर में टैक्सास, अमरीका से आये श्री रमेश पूनमचंद शाह ने भी मीडिया से अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने एकल विद्यालय के लिए विदेशों में बहुत जागरूकता पैदा की है। वे पिछले     सत्रह वर्ष से इस कार्य में लगे हुए हैं। शिविर में राष्ट्रपति सेना मेडल से सम्मानित मेजर सुरेन्द्र नारायण माथुर ने बताया कि वह विदेशी धरती पर अखिल भारतीय वनवासी कल्याण  आश्रम का कार्य करते हैं। विदेशों में उनके इस काम की काफी सराहना हो रही है। न्यूजीलैण्ड से आए प्रोफेसर जी.एन. मंगेशन ने भी अपने अनुभव मीडिया के साथ  साझा किये। प्रतिनिधि

सत्य की अधूरी खोज : डॉ. वी.एस. हरिशंकर







सत्य की अधूरी खोज
तारीख: 18 Jan 2016 12:21:03
-डॉ. वी.एस. हरिशंकर
http://panchjanya.com

जून 2011 में पेनांग, मलेशिया में 'हमारे विश्वविद्यालयों की उपनिवेशीकरण से मुक्ति' विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था, जिसमें पश्चिम से बाहर के विश्वविद्यालयों को पश्चिमी संस्थानों द्वारा पहंुचाई गई हानि चर्चा का मुख्य विषय रही। 'पश्चिम की सांस्थानिक घुसपैठ' पर चर्चा करते हुए वक्ता इस निष्कर्ष पर पहंुचे -' हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि यूरोप केन्द्रित प्रत्येक बिन्दु हमारे विश्वविद्यालयों की कई अंतर्निहित विधाओं में झलकता है। पश्चिम ने हमारे प्रकाशन, सिद्धांतों, अनुसंधान के आदर्शों को भी प्र्रभावित किया है जो हमारी संास्कृतिक और बौद्धिक परंपरा के लिए उचित नहीं है।' सांस्कृतिक समालोचक प्रो. एडवर्ड सैद ने कहा कि 'पश्चिम ने बर्बरता, जनजातीयता और आदिम व्यवस्थाओं को विकसित किया।' वास्तव में सैद उन कुछ अध्येताओं में थे जिन्होंने पश्चिम के सांस्कृतिक आक्रमण से पूर्वीय संस्कृति को पहुंचे नुकसान की चर्चा की। जाने-माने समाजशास्त्री जे.पी.एस. ओबेराय ने विज्ञान पर पश्चिमी प्रभुत्व के विभिन्न प्रभावों की चर्चा की। हाल ही में भारत में विज्ञान पर यूरोप केन्द्रित विचारों और यूरो मार्क्सवाद का प्रतिवाद करने के लिए भगवाकरण के आरोप उछाले गए। 
3 से 7 जनवरी 2016 तक मैसूर विश्वविद्यालय में भारतीय विज्ञान कांग्रेस भगवाकरण के इन आरोपों की साक्षी बनी। भारत में जन्मे नोबल पुरस्कर्ता वेंकटरमन रामकृष्णन ने भारतीय विज्ञान के बारे में कहा कि भारतीय विज्ञान कांंग्रेस ने बहुत कम लक्ष्यों को प्राप्त किया और यह 'दरअसल एक सर्कस थी जिसमें विज्ञान पर बहुत कम चर्चा हुई।' बी.एम. बिरला विज्ञान केन्द्र, हैदराबाद के बी.जी. सिद्धार्थ ने इसे 'विज्ञान का कुंभ मेला' बताया, जिसका पूरा ध्यान प्रधानमंत्री की यात्रा पर केन्द्रित रहा। महाराष्ट्र में पिछले साल हुई राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस में प्रधानमंत्री द्वारा अपने उद्घाटन भाषण में भगवान गणेश का संदर्भ लेने पर ही वामपंथियों और सेकुलर लॉबी ने इसे फासीवाद और भगवाकरण का नाम दे दिया था। 
बाद में इस 'भगवाकरण' को गाढ़े वैचारिक रुझान और अलगाववादी प्रवृत्तियों वाले वैज्ञानिकों के एक समूह ने देश में कथित तौर पर बढ़ती 'असहिष्णुता' के साथ संस्थागत रूप दे दिया। सेन्टर फॉर सेल्यूलर एंड मोलिक्यूलर बायोलॉजी के संस्थापक निदेशक पी.एम. भार्गव ने अपना पद्मभूषण सम्मान देश में बढ़ रही इस 'असहिष्ण्ुाता' के विरोध में लौटा दिया था। 29 अक्तूबर 2015 को हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत में भार्गव ने रा.स्व. संघ पर उसके कथित अल्पसंख्यक विरोधी रुख के लिए पाबंदी लगाने की मांग तक कर डाली। इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह समूची चर्चा विज्ञान के विषय से संबंधित नहीं बल्कि पूरी तरह से रा.स्व. संघ के विरुद्ध अपनी भड़ास मिटाने की सोची-समझी नीति थी। भार्गव जैसे वैज्ञानिकों का यह समूह वास्तव में संघ के प्रति अपने पूर्वाग्रहों की अभिव्यक्ति करना चाहता था। प्रिंस्टन के गणितज्ञ मंजुल भार्गव, जो फील्ड्स मेडल, नोबल प्राप्त करने वाले भारतीय मूल के पहले वैज्ञानिक हैं, ने कहा कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस में कई सकारात्मक चीजें हासिल हुईं। उनका कहना था कि विज्ञान कांग्रेस का यह लक्ष्य सफल रहा कि सुदूर देशों से आए वैज्ञानिकों ने एक जगह एकत्रित होकर विज्ञान पर चर्चा की और कांग्रेस में उभरे विभिन्न आम सहमति के क्षेत्रों में रुचि दिखाई। शीर्ष अंतरिक्ष वैज्ञानिक जी. माधवन नायर ने वैज्ञानिकों द्वारा सम्मान वापसी के निर्णय को गलत बताया। उनके शब्दों में, देश में बढ़ती 'असहिष्णुता' उन वैज्ञानिकों के मन की कल्पना थी। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलूरु के पूर्व निदेशक जी. पद्मनाभन ने कहा कि बढ़ती 'असहिष्णुता' का विवाद और उसे लेकर पूर्वाग्रह से ग्रस्त आक्रोश खतरनाक साबित हो सकता है। भारत में हो रहे आतंकी हमले उसी जिहादी आंदोलन का नतीजा हैं। ऐसे प्रकरणों में बुद्धिजीवी लोग या तो मौन धारण कर लेते हैं या फिर कह दिया जाता है कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता। लेकिन जब कोई हिन्दू समूह छोटी गतिविधि में भी संलिप्त मिलता है तो जरा भी समय गंवाए वे उसे 'हिन्दू आतंकवाद' की संज्ञा देने से नहीं चूकते।
इससे पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में 2014 में हुई भारतीय इतिहास कांग्रेस में एक प्रस्ताव पारित कर मिथकों को भारतीय विज्ञान का अंग बनाए जाने और उनको इतिहास के रूप में स्थापित करने की कोशिशों का विरोध किया गया था। ऐसी चीजों को इतिहास से जोड़ने पर जोर दिया गया। पारंपरिक भारत पर वामपंथी इतिहासकारों  द्वारा लिखी गई मुख्यधारा की इतिहास पुस्तकें, जैसे डी.एन. झा की 'प्राचीन भारत' अथवा रोमिला थापर की 'पेंग्विन हिस्ट्री ऑफ अर्ली इंडिया' भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों पर पूरी तरह से मौन दिखाई पड़ती हैं। आर्यभट्ट के बाद वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य की एक लंबी परंपरा में भारत में गणित और चिकित्सा के क्षेत्र में कई व्यक्तित्व आते हैं। उनमें वटेश्वर, मंजुला, आर्यभट्ट द्वितीय, श्रीपति, शतानन्द, महावीर, श्रीधर, नारायण पंडित, माधव तथा चक्रपाणि दत्त शामिल हैं। नटराज की प्रतिमा, जो सृष्टि के निर्माण और विनाश को प्रदर्शित करने वाले शिव के तांडव नृत्य को दिखाती है। 2004 में भारत सरकार ने  'यूरोपियन सेंटर फॉर रिसर्च इन पार्टिकल फिजिक्स' (सीइआरएन) जेनेवा को भेंट की थी।
ऐसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि मैसूर विज्ञान कांग्रेस में भगवान शिव को पारिस्थितिकी के संरक्षक के रूप में प्रदर्शित किया गया था। यजुर्वेद के तैत्तरीय संहिता के शतरु द्रीय प्रकरण में रुद्र को पर्यावरण के कई रूपों के संरक्षक के रूप में वर्णित किया गया है। लेकिन भगवाकरण का आरोप लगाने वाले वास्तविक पक्ष की अनदेखी करते हैं। आवश्यकता है कि वे और पक्षों को भी देखें।
रोमन कैथोलिक द लिटिल फ्लावर चर्च और सेंट जार्ज चर्च केरल के कोझिकोड जिले में स्थित पश्चिम घाट क्षेत्र में बड़ी मात्रा में खनन का काम करवा रहे हैं। प्रो. माधव गाडगिल के नेतृत्व वाले वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल (डब्ल्यूजीइइपी) का मालाबार कैथोलिक चर्च के लोगों ने काफी विरोध किया था। वे लोग जो विज्ञान कांग्रेस में शिव के नाम पर भगवाकरण की बात कर रहे हैं, जबकि पश्चिम घाट क्षेत्र में कैथोलिक चर्च द्वारा किए जा रहे विध्वंसकारी कृत्यों का समर्थन करते रहे हैं।
सेकुलर वैज्ञानिक समुदाय की यह दोमुंही और गिरगिटिया चाल कई परिप्रेक्ष्यों में दखल की मांग करेगी। वे तब मौन धर लेते हैं जब दिल्ली का एक वैज्ञानिक मारा जाता है और पांच लोग घुसपैठियों की खुली गोलीबारी में 28 दिसम्बर 2005 को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में घायल हो जाते हैं। पुलिस ने इसमें पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का हाथ होने से इनकार नहीं किया था।
नवम्बर 2007 में जब एक मौलवी ने कोलकाता में लेखिका तस्लीमा नसरीन के खिलाफ फतवा जारी किया था तो उन्हें कोलकाता छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा था और वाममोर्चा सरकार ने उनको सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था। 2010 में केरल में कथित मजहब विरोधी कृत्य का बदला लेने के लिए न्यूमैन कालेज के एक प्रोफेसर टी.जे. जोसफ का हाथ कलाई से काट दिया गया। इसमें एक मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन पोपुलर फ्रंट के सदस्यों की संलिप्तता उजागर हुई थी। इतिहासकार श्रीधर मेनन और अमलेन्दु डे को वाम तत्वों द्वारा धमकी दी गई क्योंकि उन्होंने उनकी पार्टी लाइन के आगे झुकने से मना कर दिया था। वैज्ञानिक समुदाय को केरल और पश्चिम बंगाल में, जहां मार्क्सवादी सरकारें उनकी संरक्षक थीं, कोई असहिष्णुता नजर नहीं आई। रेशनलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष सानल इदामरुकु मुम्बई में एक चर्च में कथित चमत्कार पर प्रश्न उठाते हैं। अप्रैल 2012 में कैथोलिक चर्च सानल के विरुद्ध मुम्बई के कई पुलिस थानों में शिकायतें दर्ज करा देता है, उन्हें कई पुलिसथानों में अपमानित किया जाता है और धमकाया जाता है। अंत में 31 जुलाई 2012 को सानल भारत छोड़ देते हैं और फिनलैंड में जा बसते हैं। भारत के वैज्ञानिक समुदाय ने इसके विरोध में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया, क्योंकि तब की केन्द्र सरकार उनके वैचारिक संरक्षक दलों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर देती थी।  इसी तरह मुंबई में जब विभिन्न कैथोलिक चर्च संगठन कैजाद कोतवाल द्वारा निर्देशित 'एग्नेस ऑफ गॉड' नामक नाटक पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हैं तो सेकुलर वैज्ञानिकों का समूह कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता। अंतत: अक्तूबर 2015 में भयभीत कोतवाल को मैरिन ड्राइव पुलिस थाने में अपनी सुरक्षा की गुहार लगानी पड़ती है।
असहिष्णुता के विरोध में और सेकुरवाद के लिए मशाल उठाने वाले भारत के इस वैज्ञानिक समुदाय की प्रतिबद्धता और पारदर्शिता को दिवंगत डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से जुड़ी एक घटना से समझा जा सकता है। राष्ट्रपति के रूप में डॉ. कलाम ने 2006 में नालंदा विश्वविद्यालय का गौरव एक प्राचीन विश्वविद्यालय के रूप में पुनर्जीवित करने का सुझाव दिया था। बाद में डॉ. कलाम ने पूर्व विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा को लिखा कि इसे डॉ. अमर्त्य सेन के नेतृत्व में जिस तरीके से चलाया गया उससे वे बहुत क्षुब्ध हैं।     

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

मोदी टीम : 83% फैसले लागू ! लगता हे देश में सरकार हे !!




83% फैसले लागू, नहीं बदलेगी टीम मोदीः PM अब हर महीने लेंगे मंत्रियों की क्लास
aajtak.in [Edited by: विकास वशिष्ठ] | नई दिल्ली, 29 जनवरी 2016



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिलहाल अपनी टीम में कोई बदलाव नहीं करने जा रहे हैं. यानी फिलहाल कैबिनेट फेरबदल की योजना टाल दी गई है. कारण है कि मोदी अपने मंत्रियों के कामकाज से संतुष्ट हैं. उन्होंने 27 जनवरी को अपने मंत्रियों की बैठक बुलाई थी. कयास लगाए जा रहे थे कि इसके बाद कभी भी फेरबदल का ऐलान हो सकता है.

फेरबदल टलने की 3 बड़ी वजहें

मोदी इससे संतुष्ट हैं कि सरकार के 83 फीसदी फैसलों पर काम शुरू हो चुका है.सरकार का फोकस अटके पड़े अहम विधेयकों को बजट सत्र में पास कराने पर है. कहा जा रहा था कि मोदी को अच्छे लोग नहीं मिल रहे. संभव है लोग न मिले हों.

परफॉर्मेंस मीटिंग के बाद टला फैसला
मोदी ने 27 जनवरी की बैठक में मंत्रियों की परफॉर्मेंस पूछी. पता चला कि पीएम मोदी के सत्ता संभालने के बाद लिए गए 548 फैसलों में से 459 लागू किए जा चुके हैं. यानी 83 फीसदी फैसलों पर अमल शुरू हो चुका है. अपने मंत्रियों के काम का यह आंकड़ा देख पीएम मोदी ने फिलहाल इसी टीम के साथ काम आगे बढ़ाने का फैसला किया है. वैसे, मोदी सरकार ने नवंबर 2014 में अब तक एक बार ही कैबिनेट विस्तार किया है.

अब हर महीने पूछेंगे PM- कितना काम हुआ
सूत्रों के मुताबिक अब आने वाले समय में ऐसी परफॉर्मेंस बैठकें हर महीने के आखिरी बुधवार को होती रहेंगी. पीएम हर महीने मंत्रियों से उनके काम की तरक्की के बारे में पूछेंगे. इसके लिए मंत्रियों को तीन कैटेगरी में रखा गया है- एग्रीकल्चर, इंफ्रास्ट्रक्चर और सोशल. तीनों के साथ उनसे जुड़े मंत्रालयों को क्लब कर दिया गया है. सोशल सेक्टर के साथ दूसरे अहम मंत्रालयों को रखा है.

27 जनवरी को इन्होंने दी प्रजेंटेशन
बुधवार को कृषि, ग्रामीण विकास, जल संसाधन, खाद्य वितरण, केमिकल और फर्टिलाइजर सहित पांच मंत्रालयों ने अपने काम की प्रजेंटेशन दी. इस दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार जो भी काम करे उसका आम लोगों में खूब प्रचार किया जाए. लोगों को अपने-अपने मंत्रालय की उपलब्धियां बताई जाएं.

इसलिए लगाए जा रहे थे बदलाव के कयास
कहा जा रहा था कि बिहार विधानसभा चुनाव में हार का सामना करने के बाद मोदी अपनी कैबिनेट में बदलाव करना चाहते हैं. उन पर संघ की ओर से भी दबाव था कि पश्चिम बंगाल, यूपी और असम में चुनाव से पहले केंद्र सरकार की छवि सुधारी जाए. कहा गया था कि सरकार की परफॉर्मेंस को बेहतर करने के लिए वह कैबिनेट में बदलाव चाहते हैं. हालांकि कहा यह भी गया था कि मंत्रियों को बदलने के लिए उनके पास सही लोग नहीं हैं.

माओवाद-नक्सवाद : क्यों नहीं होती चर्च की चर्चा ?



संवाद और समन्वय से सुलझेगी समस्या
तारीख: 25 Jan 2016 





पाञ्चजन्य, ऑर्गनाइजर द्वारा आयोजित सुरक्षा पर संवाद अपने तीसरे वर्ष में है। इस बार विशेषज्ञों के साथ दिनभर चली चर्चाओं में खंगाले गए लाल आतंक यानी नक्सलवाद से जुड़े तमाम पहलू। प्रस्तुत हैं इस विचार-विमर्श के संपादित अंश।

ताकत संवाद की- मोबाइल रेडियो कर सकता है माओवाद को पंक्चर-शुभ्रांशु चौधरी
मेरी समझ में माओवादी आतंक यानी 'लाल आतंक' छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश में फैला है। 60 के दशक में यह लड़ाई शुरू करने वाले आज भी डटे हैं और वे हिंसा से सत्ता परिवर्तन चाहते हैं। उनकी ओर से लड़ाई दो प्रकार से लड़ी जा रही है। माओवादी बिना हथियार हैं तो माओवादी समर्थकों के हाथों में हथियार हैं। माओवादियों की संख्या मात्र एक या दो फीसद है, जबकि 99 फीसद माओवादी समर्थक हैं। लोग माओवाद से प्रभावित या आकर्षित होकर उनकी तरफ नहीं गए हैं, पर ज्यादातर हमारे उनसे बातचीत न करने, संपर्क नहीं किए जाने और हम लोगों के दबाव के कारण वहां गए हैं। वैसे, बस्तर में माओवादी आंदोलन की ताकत ऊपरी तौर पर कम हुई है। उसके पोलित ब्यूरो में 40 में से मात्र 20 लोग या उससे भी कम बचे हैं। कुछ जेल में हैं, कुछ मर चुके हैं। जो बुद्धिजीवी, जिनसे लोग जुड़ते थे,  उनका वह क्रम 90 के दशक के बाद से लगभग बंद हो गया है, पर वहीं थोड़े से 100-200 लोग जो भी बचे हैं उन्हें स्थानीय मदद लगातार बढ़ रही है। इन वनवासियों के साथ हमने कभी कोई संपर्क नहीं बनाया है। वे सिर्फ ऑल इंडिया रेडियो ही सुन सकते हैं और आजादी के 70 साल बाद भी 1़2 करोड़ गोंड आदिवासियों की भाषा में एक न्यूज बुलेटिन तक नहीं है। गोंडी भाषा का कोई संस्थान नहीं है। माओवाद को हम देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती कहते हैं, लेकिन कोई भी पत्रकार, पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी नहीं मिलता जिसने इस भाषा को सीखने का प्रयास किया हो। रेडियो ऐसे में वह कर सकता है जो बंदूक नहीं कर सकती है। यह स्थिति संवाद टूटने की वजह से पैदा हुई है। हम मनुष्य हैं, यदि आप मुझसे बात नहीं करेंगे तो निश्चित ही मैं दूसरी तरफ के लोगों से बात करूंगा। उसके पास बात करने के लिए केवल माओवादी हैं। मध्य भारत में 10 करोड़ वनवासी रहते हैं। इन्हें यदि मोबाइल का प्रयोग करना, बात करना, गीत गाना सुलभ करा दें तो सुधार होगा। लोग माओवादी इसलिए बन रहे हैं क्योंकि वनवासियों की छोटी से छोटी समस्याएं हल नहीं हो रही हैं। मोबाइल रेडियो ये काम कर सकता है। हम माओवादियों की व्यवस्था मंे पंक्चर कर सकते हैं। वनवासी संपर्क टूटने से आशा खो चुके हैं, उनमें आशा जगाने की जरूरत है। माओवादियों ने कभी दावा नहीं किया कि वे वनवासियों की दशा या समस्या सुधारने में लगे हैं।  उनका उद्देश्य साफ है कि वे लालकिले पर अपना झंडा फहराना चाहते हैं। उस इलाके को केवल उन्होंने चुना था छिपने के लिए, जो आज उनका मुख्यालय बन चुका है।
  विजय क्रांति- आम आदमी को मुख्यधारा से जोड़ना होगा। सड़क से दूर जंगल में रहने वाले आम आदमी को जब तक देश की व्यवस्था का लाभ नहीं मिलेगा, वह हमारे संपर्क में नहीं रहेगा तो उसे कोई भी अपने साथ ले जाएगा।
ल्ल  पवन देव -उपेक्षित करने वाला तथ्य गलत है। वहां पर असल में नक्सलियों का एक भय है और भय के कारण ग्रामीण उन्हें समर्थन देते हैं। उन्हें भय है कि पुलिस 24 घंटे उन्हें सहयोग नहीं दे सकती है। यह जो भय का कारण है, वही सबसे बड़ी समस्या है।
  अता हसनैन- यह पता करना बेहद जरूरी है कि माओवाद इतने लंबे समय तक आखिर चल कैसे गया और उसके पीछे क्या ताकतें हैं। यदि कोई उनसे जुड़ा है तो कौन है और उसकी क्या भूमिका है। इस तरह की चीजें बिना किसी आर्थिक मदद के चल नहीं सकतीं और बिना मदद के इतना लंबा चलना नामुमकिन हो जाता है। दूसरी बात यह है कि जब तक निचले स्तर पर राजनीति न की जाए, तब तक आप सफल नहीं हो सकते। देश में बहुत जगहों पर पंचायती राज्यों की भूमिका रही है। क्या छत्तीसगढ़ में ऐसी कोई व्यवस्था है?
  शुभ्रांशु- मैं समस्या को भाषा की दृष्टि से देख रहा हूं, यह 'फॉल्ट लाइन' है। बस्तर दक्षिण भारत का हिस्सा है और उस पर एक उत्तर भारतीय मानसिकता के साथ शासन किया जा रहा है। वही उत्तर में अता हसनैन जी को ग्राम पंचायत और राजनीति के बारे में देना चाहूंगा। आप दो किलोमीटर अंदर चले जाइए, भूखे मर जाएंगे। पराई भाषा का कोई एक शब्द भी नहीं समझता, विशेषकर महिलाएं। हिन्दी और गोंडी के बीच गहरी खाई बन चुकी है। अनुवाद ज्यादातर गलत होते हैं। शिक्षा और जमीनी स्तर पर देखभाल बेहद जरूरी है।
  आलोक बंसल- मेरा मानना है कि विकास नहीं हुआ इसलिए लोग माओवादी बन गए, यह गलत है। जिस चीज से लोग असंतुष्ट हैं, वह अन्याय है। इस मत में मेरी शुभ्रांशु से भिन्नता है। वे बोलते हैं कि 90 के दशक में ऐसा हुआ जिससे लोग माओवादी बन गए। मैं बस्तर में उस समय रहा हूं जब लिखा जाता था 'बस्तर की गलियां सूनी हैं, डी़ पी़ मिश्रा खूनी है।' प्रवीरचंद भंजदेव को उसके घर में घुसकर सोफे के नीचे गोली मार दी गई थी। उसके बावजूद वहां नक्सलवाद नहीं बढ़ा। मैं जब वहां रहा, तब वहां शांति थी। हिन्दी और गोंडी में कोई विवाद न था। बस्तर के वनवासी संतुष्ट लोग हैं। वहां एक विचारधारा को संगठित किया जा रहा है। इस्लामी कट्टरवाद में भी यही हो रहा है। 1970 में भी वहां नक्सलवाद की कोशिश की गई पर वे कामयाब नहीं हो पाए। विषय यह है कि नक्सलवाद 1990 में क्यों हुआ?
सूत्र खंगालिए: कहां-कहां जुड़े हैं तार- पी.वी. रमन्ना
चीजों को तब से ध्यान से देखना होगा जब 1980 में पीपुल्स वार की स्थापना हुई। इसके बाद 1991 में एक दस्तावेज आया जिसमें कोंडापल्ली सीतारमैय्या ने कहा कि अबूझमाड़ हमारे लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह हमारा कमान मुख्यालय बनेगा। चलो, आगे बढ़कर यहां कब्जा करें। आज बस्तर जो भी है वह लंका पापी रेड्डी की वजह से है।
क्रांति भले ही जिनका एजेंडा न हो, ऐसे अन्य समूहों से भी रणनीतिक संबंध रखना और वहां पैठ बनाना यह माओवादी रणनीति का हिस्सा है। आप सबने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और इसकी बैठकों के बारे में सुना होगा। जहां भी वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम  का आयोजन होता है वहां-वहां वर्ल्ड सोशल फोरम का भी आयोजन होता है। बैठकें की जाती हैं। मगर वर्ल्ड सोशल को तो पश्चिमी साम्राज्यवाद ने ही खड़ा किया है! माओवादियों को यह बात समझने में देर लगी। और बाद में इसके जवाब में उन्होंने 'एमआर2004' या 'मुंबई रजिस्टेंस' का गठन किया। लैटिन अमेरिका से फिलीपींस तक, दक्षिणपूर्व एशिया के 43 देश इस बैठक में शामिल हुए। उन्होंने मुंबई में रैलियां की, वृतचित्र बनाए।
समन्वय की जरूरत : मिल कर चलें केन्द्र और राज्य -प्रकाश सिंह
आज सवाल है कि हम माओवादी समस्या का कैसे सामना करें? इसमें केन्द्र और राज्यों का समन्वय अहम है लेकिन यह देखने को नहीं मिलता है। सवाल यह भी है कि समन्वय किस स्तर पर हो, किन मुद्दों पर हो। माओवादी समस्या से निबटने के लिए अब तक कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बनी। ऐसा क्यों हुआ? केन्द्र और राज्य के बीच समन्वय न होने का प्रमुख कारण ही है राष्ट्रीय स्तर की सुरक्षा नीति का न होना। मुख्यमंत्री अपनी बुद्धि, विवेक और समझ के अनुसार माओवाद का सामना कर रहे हैं। हर प्रदेश अलग ढंग से लड़ रहा है। किसी का बल प्रयोग तो किसी का आर्थिक प्रगति का दृष्टिकोण है। यही कारण है कि यह समस्या एक गांव से शुरू होकर आज 180 जिलों में फैल चुकी है। कई मुख्यमंत्रियों पर आरोप लग चुके हैं कि वे माओवादी नेताओं को अपने पक्ष में मतदान के लिए बोलते हैं।
साथ ही, केन्द्र का राज्य और राज्य का दूसरे राज्यों से सूचनाओं का आदान-प्रदान भी काफी महत्वपूर्ण  है एक बार पश्चिम बंगाल और झारखंड एक-दूसरे पर सूचनाओं का आदान-प्रदान न करने का आरोप लगा रहे थे। आंध्रप्रदेश की एसआईबी का काम सराहनीय रहा है, एसआईबी न केवल अपनी, बल्कि दूसरे राज्यों और कई बार राष्ट्रीय स्तर की सूचनाएं रखती थी। दिल्ली तक उन्होंने अपनी सूचनाएं पहंुचाई हैं। आंध्रप्रदेश में जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक अपने स्तर पर गांव-गांव में लोगों से संपर्क साधते थे। बच्चों के लिए खेल-कूद प्रतियोगिताओं का आयोजन करवाते थे। जिन परिवारों के बच्चे माओवादियों के संपर्क में आकर चले जाते थे, उनके परिवार के सदस्यों की पुलिस देखभाल करती थी। बीमार परिजनों के उपचार से लेकर उन्हें आर्थिक मदद मुहैया करवाई जाती थी। इसका असर हुआ। माओवादियों का इस तरह की कार्यप्रणाली से हृदय परिवर्तन भी हुआ। हमारे निष्क्रिय रहने की वजह से छोटे रूप में उभरी समस्या विकराल रूप ले लेती है जिसे बाद में हम देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। वैसे, जान को जोखिम में डाले बिना समस्या से कभी नहीं लड़ा जा सकता। एक समय ऐसा आ गया था कि केन्द्र की नीतियां भी आमने-सामने के संघर्ष में जान के जोखिम से कतराती थीं।
 कर्नल जयबंस सिंह- माओवाद-नक्सवाद  से देश के पांच-छह राज्य जूझ रहे हैं। नक्सलियों की अलग-अलग धाराएं हैं, अलग भाषाएं और दूसरे अंतर हैं तो फिर केन्द्र सरकार किस प्रकार एक ही योजना से इस समस्या का समाधान कर सकती है? दूसरे, एक ही विभाग इस समस्या का हल कैसे निकाल सकता  है?
 प्रकाश सिंह- देखिए, राष्ट्रीय नीति सभी राज्यों में इस समस्या का समाधान कर सकती है। दिक्कत यह है कि हमारे पास न कोई आतंकवाद निरोधक नीति है और न ही कोई राष्ट्रीय स्तर की नीति है जिससे हम आतंकवाद का सामना कर सकें। अमेरिका और ब्रिटेन में उनकी सुरक्षा नीति को बखूबी देख सकते हैं जबकि हमें अपने देश में इन नीतियों से संबंधित कोई पत्र या कागजात देखने को नहीं मिलते। आज तक कभी किसी सरकार ने इस नीति को क्यों नहीं बनाया, जबकि यह पांच से छह माह में तैयार हो सकती है?
  पवन देव- मुझे लॉस एंजिलिस जाने का अवसर मिला। वहां एक सवाल किया गया पुलिस अधिकारियों से कि 9/11 के बाद वहां बड़ा हमला क्यों नहीं हुआ, जबकि भारत मंे हर साल-दो साल में कुछ न कुछ घटना हो जाती है। इस पर उन अधिकारियों का कहना था कि इसके लिए परिणाम पर काम करना होगा। घटनाएं रोकने के लिए अपराधियों को पकड़ना होगा।
  प्रकाश सिंह- दिक्कत यह है कि यदि कोई सरकार आतंकवाद या नक्सलवाद पर कड़ाई करनी शुरू करती है तो कार्रवाई से पहले ही विपक्ष हंगामा खड़ा कर देता है। जबकि सुरक्षा के मुद्दे पर कोई दखल नहीं होना चाहिए। फ्रांस में हुए हमले के बाद वहां की सरकार ने तुरंत कार्रवाई का निर्णय कर लिया, लेकिन भारत में बटला हाउस एनकाउंटर हुआ तो दुनियाभर में बवाल मच गया। राष्ट्रीय सुरक्षा नीति तैयार करनी चाहिए, यहां राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर कोई विचारधारा ही नहीं है।
  केजी सुरेश-हम विचारधारा की बात करते हैं। इसे राष्ट्रीय परिपेक्ष में देखें। पिछले 65 साल से देश में एक ही दल का शासन रहा है और ये इसलिए रहा क्योंकि इसके सामने इसे चुनौती देने वाली कोई अन्य विचारधारा नहीं दिखती थी। कोई भी विचारधारा ऐसी स्थिति में हावी होने लगती है जब उसके सामने उसे चुनौती देने वाला विचार मौजूद न हो। विचार की गैरमौजूदगी में राज्य इसकी जगह नहीं ले सकता, कोई विचारधारा नहीं हो सकता। यह इसका जवाब नहीं हो सकता। पुलिस भी इसका जवाब नहीं हो सकती। विचारधारा को तो विचारधारा से ही चुनौती दी जा सकती है। मुझे लगता है नक्सल समस्या को सुलझाने की दृष्टि से यह बात समझना महत्वपूर्ण है।
सब साफ-साफ हो : नीतियों में स्पष्टता से मिलेंगे परिणाम- पवन देव
संविधान के अनुसार पुलिस राज्य का विषय है और आंतरिक सुरक्षा राज्य का हिस्सा है। अभी सीआरपीएफ या आईटीबीपी को नहीं पता कि उन्हें क्या करना है। दुविधा यही है। सीआरपीएफ, आईटीबीपी या बीएसएफ बोलती है कि नक्सलवाद खत्म करना है, राज्य पुलिस ऐसे में क्या करे? यदि पुलिस को कहीं ऑपरेशन का संचालन करना है तो फिर सीआरपीएफ की क्या भूमिका है? सीआरपीएफ स्थानीय पुलिस महानिरीक्षक की सुनेगी या अपने पुलिस महानिरीक्षक की? आईटीबीपी आती है तो कहती है क्षेत्र में पुलिस तंत्र विफल हो चुका है। यदि अभियानों में नियंत्रण और संचालन अलग-अलग होगा तो माओवाद या किसी दूसरी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। नीतियों में स्पष्टता से आतंकवाद के विरुद्ध अभियानों के परिणाम बेहतर हो सकते हैं।
  प्रकाश सिंह- देखिए, दिक्कत राज्य पुलिस की ओर से भी रही है। ऐसा इसलिए हुआ कि जब राज्य पुलिस की ओर से माओवाद की समस्या को दूर करने के लिए कोई रुख स्पष्ट नहीं हुआ तो अर्द्धसैनिक बलों की जरूरत पड़ी। पुलिसकर्मी अधिक संख्या में क्यों नहीं भेजे जाते? राज्य सरकार अपने स्तर पर कार्य तो करे तो यह विवाद खत्म हो सकता है।
  धु्रव कटोच- सुरक्षाबलों के परस्पर समन्वय का महत्व बहुत ज्यादा है यह बात समझनी होगी। इसके लिए संयुक्त कार्रवाई करनी होगी।
छोड़नी होगी हिचक : डर के आगे जीत है-प्रकाश सिंह
आज की तारीख में एक शहरी और दूसरा ग्रामीण क्षेत्र है। जहां पर प्रशासन की देखभाल नहीं है, वहां वनवासी सरकार के पास न जाकर माओवादी से संपर्क करता है।
सरकार की विफलता ही है कि वहां, आजादी के सात दशक बाद भी विकास न हो सका। सवाल यह है कि वहां तक क्यों नहीं पहंुचा गया? मैं अबूझमाड़ की सीमा तक गया, लेकिन वहां की पुलिस ने मुझे आगे नहीं जाने दिया, कहा कि सुरक्षा की जिम्मेदारी हम नहीं ले सकते हैं। लोग माउंट एवरेस्ट पर जा सकते हैं तो फिर अबूझमाड़ जाना संभव क्यों नहीं है? एक बार वर्चस्व होने के बाद पीछे क्यों हटते हैं?
क्यों नहीं होती चर्च की चर्चा? 
नक्सली भय फैलाना चाहते हैं। इसके लिए हमें वनवासी समाज को सामर्थ्यवान बनाना होगा। पहले तो हम वनवासियों को राजनीति से दूर कर चुके हैं, केवल ऊपरी लोग ही राजनीति में सक्रिय हैं। इन लोगों से कोई संवाद नहीं है। क्या हम एक ऐसा कोई प्लेटफार्म संवाद का बना सकते हैं, जहां पर इन लोगों से संपर्क किया जा सके? रेडियो को वहां बढ़ावा दिया जाए, जो कि क्रिश्चियन मिशनरी कर रही हैं। नारायणपुर में चर्च के प्रति वनवासियों का रुझान बढ़ रहा है। चमत्कार बताकर बांटी जा रही अंग्रेजी दवाओं की पुडि़या से बीमारी ठीक हो रही है। गांव के गांव टुकड़ों में बंट रहे हैं। कन्वर्जन तेजी से बढ़ रहा है।      — शुभ्रांशु चौधरी
माओवाद जब नेपाल में बढ़ा, उसकी कम चर्चा हुई। वहां कन्वर्जन वालों को करोड़ों रुपया विदेशों से आता है। नेपाल में चर्च ने बहुत बड़ी रकम माओवादियों को दी। चर्च आतंकवादी संगठनों को धन उपलब्ध करवाकर कन्वर्जन को बढ़ावा दे रहा है और पिछड़े इलाकों में खूब सक्रिय हो रहा है। वे सुनियोजित तरीके से अपनी योजना को अंजाम दे रहे हैं।  
—विजय क्रांति
मैं जब नागालैण्ड में तैनात था तो देखा कि चर्च कन्वर्जन के लिए राशि मुहैया करवाता था।
—धु्रव कटोच

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मंथन - माओवाद के बुर्के में चर्च!! - देवेन्द्र स्वरूप

13 अगस्त शनिवार को रात 9.15 बजे उड़ीसा के कंधमाल जिले के जलेसपट्टा कन्या आश्रम में कृष्ण जन्माष्टमी समारोह में व्यस्त 84 वर्षीय संत स्वामी लक्ष्मणानंद जी सरस्वती की चार शिष्यों के साथ हत्या की पाशविक घटना ने पूरे उड़ीसा को जनाक्रोश के दावानल में झोंक दिया है। एक दिन पहले ही स्वामी जी ने थाने को लिखित सूचना दी थी कि उन्हें जान से मारने की धमकी का गुमनाम पत्र मिला है अत: उन्हें समुचित सुरक्षा प्रदान की जाए। पर पुलिस अधिकारियों ने उनकी चेतावनी को अनसुना कर दिया। क्या वे सचमुच नहीं जानते थे कि 50 वर्षों से उड़ीसा के कंधमाल जिले के गरीब और पिछड़े वनवासियों की नि:स्वार्थ सेवा में जुटे स्वामी लक्ष्मणानंद जी का उड़ीसा वासियों के अंत:करणों में कितना ऊंचा स्थान है और ऐसे तपस्वी संत की पाशविक हत्या की प्रतिक्रिया कितनी तीव्र होगी? क्या उन्हें यह भी पता नहीं था कि 1924 में जन्मे स्वामी लक्ष्मणानंद का गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने और दो पुत्रों के पिता होने के बाद भी उनकी अध्यात्म-पिपासा उन्हें हिमालय की गुफाओं में खींच ले गयी थी और वहां से लौटकर उन्होंने गांधी जी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी संत विनोबा के गोरक्षा आंदोलन का व्रत धारण किया? 1966 में प्रयाग के कुंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी एवं नवोदित विश्व हिन्दू परिषद् से प्रभावित होकर कंधमाल जिले को ही अपनी आजीवन तपोभूमि बनाने का संकल्प लिया। कंधमाल जिले के गरीब वनवासियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास की अनेकविध योजनाओं को प्रारंभ करते समय उन्हें माओवादी कहीं नहीं दिखायी दिये, पर पग-पग पर बड़े पैमाने पर वनवासियों के मतांतरण में जुटे ईसाई मिशनरियों ने उन्हें मार्ग की बाधा के रूप में देखा और उन्हें अपना शत्रु घोषित कर दिया।

तेजी से बढ़ा ईसाई प्रतिशत

कंधमाल जिले में ईसाई मिशनरियों के मतांतरण अभियान की विशालता और गति का अनुमान इसी से लग सकता है कि उस जिले में मतांतरित ईसाइयों का प्रतिशत 1971 के 6 प्रतिशत से बढ़कर 2001 में 27 प्रतिशत पहुंच गया। 1991 में वहां मतांतरितों की संख्या 75,571 थी तो 2001 में वह बढ़कर 11,79,500 पहुंच गयी। पानोस जाति के वनवासियों में 70 प्रतिशत मतांतरित ईसाई बन गए। इतने बड़े पैमाने पर मतांतरण में कितना विशाल संगठन तंत्र और साधन लगे होंगे इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

स्वामी लक्ष्मणानंद जी ने अत्यंत सीमित साधनों के होते हुए भी अपनी नि:स्वार्थ सेवा भावना और पाण्डित्यपूर्ण तपोबल के भरोसे मतान्तरण की इस गति को न केवल कुंठित किया बल्कि प्रलोभन, छल और बल से मतान्तरित वंचित ईसाइयों को "घर वापसीव् की प्रेरणा भी दी। बड़ी संख्या में मतान्तरित ईसाई पुन: अपने पूर्वजों की श्रद्धा-धारा में वापस लौट आए। स्वामी जी के तपोबल के इस प्रभाव से मिशनरी तंत्र चिंतित हो गया। उन्हें अपने रास्ते से हटाने के लिये उन पर पहले भी 1971 और 1995 में प्राणघाती हमले किए गये, पर ईश्वरीय कृपा से वे हर बार बच गए। पिछले साल दिसंबर 2007 में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद राधाकांत नाईक, जो स्वयं भी वंचित वर्ग के ईसाई हैं, के गांव ब्रााह्मणी में स्वामी जी की कार पर पथराव हुआ, उत्तेजित ईसाई भीड़ ने वहां के पुलिस स्टेशन पर भी आधुनिक आग्नेयास्त्रों से हमला किया। इसके प्रतिक्रिया स्वरूप ईसाई और हिन्दू वनवासियों के बीच व्यापक हिंसक संघर्ष हुए। इस संघर्ष में कुछ ईसाई पादरी भी मारे गए। तभी से चर्च क्षेत्रों में स्वामी जी को रास्ते से हटाने के लिये तरह-तरह के षड्यंत्र रचे जा रहे थे।

भ्रामक प्रचार उजागर

23 अगस्त की रात्रि के प्राणघाती हमले को इन्हीं षड्यंत्रों की कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। रात्रि में 9.15 बजे के लगभग 50 नकाबधारी लोग काले वस्त्र पहनकर आधुनिकतम स्वचालित शस्त्रों से लैस होकर कृष्ण जन्माष्टमी समारोह में तल्लीन कन्याश्रम में घुस आए। उनका एकमात्र लक्ष्य स्वामी जी एवं उनके शिष्य अरूपानंद, चिन्मयानंद, माता भक्तिमयी थे। स्वामी जी उस समय शौचालय में थे। पर उन दुष्टों ने शौचालय का दरवाजा तोड़कर नि:शस्त्र व असावधान स्वामी के शरीर को गोलियों से छेद डाला। इस दुर्घटना के एक घंटे के भीतर ही डी.जी.पी. गोपाल नंदा और राज्य के गृह सचिव टी.के.मिश्रा ने इस आक्रमण को माओवादियों की करतूत घोषित कर दिया। फलत: मीडिया ने देश भर में इसे माओवादी हमले के रूप में प्रस्तुत किया। इस भ्रामक प्रचार की पुष्टि के लिये किसी माओवादी संगठन दि पीपुल्स लिबरेशन रिवोल्यूशनरी ग्रुप ने इस हमले और स्वामी जी की हत्या की जिम्मेदारी भी ले ली। गृहसचिव तरुणकांत मिश्र ने कहा कि "हथियारों के प्रकार और हमले की शैली से इस हमले में माओवादियों के हाथ को नकारा नहीं जा सकता।व् विश्व हिन्दू परिषद् की राज्य इकाई के सचिव गौरी प्रसाद रथ ने सवाल उठाया कि यदि यह माओवादी हमला था तो उन्होंने आश्रम के द्वार पर मौजूद चार होमगार्डों को अपना निशाना क्यों नहीं बनाया, क्यों सीधे स्वामी लक्ष्मणानंद जी और उनके संन्यासी शिष्यों को ही निशाना बनाया? यदि माओवादी गरीबों के हित चिंतक हैं तो स्वामी जी से उनकी क्या शत्रुता हो सकती है, क्योंकि स्वामी जी की तो 40 वर्ष लम्बी साधना तो गरीबों, वंचितों, पिछड़ों के उद्धार के लिए ही समर्पित थी? सरकारी तंत्र भले ही इस घटना को माओवादी हमले के रूप में देख रहा हो, पर उड़ीसा की जनता को तनिक भ्रम नहीं है कि इस घटना के पीछे चर्च का षड्यंत्र है, क्योंकि चर्च ही स्वामी जी को अपने मतान्तरण के प्रयत्नों का शत्रु मान बैठा था।

इस हत्याकांड की पृष्ठभूमि और उसका स्वरूप इतना स्पष्ट है कि माओवादी हमले का भ्रामक प्रचार पूरी तरह ढह गया है। इस घटना के संबंध में जो व्यक्ति अब तक गिरफ्तार हुए हैं- गुंजीवाडी का विक्रम दिग्गल, विलियम दिग्गल और खड़कपुर का प्रकाश दास-वे तीनों ही वंचित ईसाई हैं और उन्होंने हमलावर गिरोह में सम्मिलित होने की बात कबूल कर ली है। इनके पास से प्रतिबंधित सीपीआई (माओ) की फ्रंट संस्था वंशधारा कमेटी का पेम्फ्लेट भी बरामद हुआ है। इन सब तथ्यों के कारण अब यह कहा जा रहा है कि शायद चर्च और माओवादियों के बीच गठबंधन हो गया है और दोनों एक दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं। ग्राहम स्टींस की हत्या के आरोपी दारासिंह को गिरफ्तार करने वाले साहसी पुलिस महानिरीक्षक वाई.जी. खुरानियां ने दिसंबर 1994 में पुलिस थाने पर ईसाई भीड़ द्वारा इस्तेमाल किये गये आग्नेयास्त्रों और 23 अगस्त की घटना में समानता का उल्लेख करते हुए कहा कि ईसाई मिशनरियों व माओवादियों के बीच गठबंधन की आशंका की पुष्टि होती जा रही है। अब उड़ीसा का प्रशासन तंत्र कैथोलिक चर्च द्वारा दक्षिण अमरीका में आविष्कृत लिबरेशन थियोलॉजी का भी स्मरण करने लगा है।

वस्तुत: पिछले कई वर्षों से हमारी अन्तरात्मा कह रही थी कि उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के सघन वनवासी क्षेत्रों में माओवादी हिंसा की बाढ़ के पीछे चर्च का हाथ होना चाहिए। यहां स्थिति माओवादियों और चर्च के बीच गठबंधन की नहीं है। न ही चर्च माओवादियों का इस्तेमाल कर रहा है। वस्तुत: चर्च स्वयं ही माओवाद के बुर्के को ओढ़कर इन वनवासी क्षेत्र में हिंसा के द्वारा भय और आतंक का वातावरण पैदा करके अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। चर्च ने भोले, अशिक्षित, गरीब वनवासियों को ही अपनी धर्मांतरण योजना का लक्ष्य चुना है। "लिबरेशन थियोलॉजीव् को भारतवर्ष में माओवाद के आवरण में क्रियान्वित किया जा रहा है। स्वामी लक्ष्मणानंद ने अपनी प्राणाहुति देकर चर्च के षड्यंत्री चेहरे पर से माओवाद का बुर्का हटा दिया है। अब उड़ीसा, छत्तीसगढ़ की आंखें खुल जानी चाहिए और उन्हें माओवाद के भ्रमजाल से बाहर निकलकर चर्च की घेराबंदी करनी चाहिए।

संलिप्तता के सबूत

चर्च की संगठन क्षमता एवं षड्यंत्रकारी कार्यशैली के सूक्ष्म अध्येताओं को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि माओवादियों के आधुनिक शस्त्र, वाहन, पैसा व प्रशिक्षण आदि साधन चर्च ही प्राप्त करा सकता है। माओवाद का बुर्का ओढ़ लेने पर चर्च को उन सब वामपंथी, प्रगतिवादी, मानवाधिकारवादी बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों एवं संगठनों का रक्षा कवच सहज ही मिल जाता है जो माओवादी हिंसा को आर्थिक विषमता, शोषण और गरीबी का प्रस्फुटन मान बैठे हैं। छत्तीसगढ़ में डा.विनायक सेन की गिरफ्तारी के विरुद्ध जो प्रचार अभियान भारत और विदेशों में चलाया जा रहा है वह केवल चर्च ही चला सकता है, माओवादी नहीं चला सकते। डा. विनायक सेन को जेल से बाहर लाने के लिये उनके लिए यूरोप में एक पुरस्कार की व्यवस्था की गयी, उनके पक्ष में दस यूरोपीय नोबल पुरस्कार विजेताओं का संयुक्त वक्तव्य जारी कराया गया। दस यूरोपीय नोबल पुरस्कार विजेताओं के हस्ताक्षर जुटाना भारतीय माओवादियों के बूते में नहीं है, यह चर्च ही कर सकता है। इस दृष्टि से चर्च की कार्यशैली का, उनके साहित्य का सूक्ष्म अध्ययन बहुत आवश्यक है। स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या की उग्र प्रतिक्रिया से चिंतित होकर वेटिकन तुरंत मैदान में कूद पड़ा। उसने चर्च द्वारा संचालित अनाथालय पर हमले की निंदा की। उसे विश्व प्रचार का मुद्दा बनाया। एक कार्दिनल जॉन लुईस तौरान ने भी अनाथालय पर हमले को ही उछाला। जिस प्रकार गुजरात के दंगों के समय दो चित्र पूरे विश्व में उछाले गए थे उसी प्रकार इस बार भी एक चित्र, जिसमें किसी चर्च के शिखर पर लगे क्रॉस पर किसी बजरंग दल के कार्यकर्ता को भगवा फहराते हुए दिखाया गया है, सब समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जा रहा है। उसे भारत में ईसाई मत पर हमले के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया जाएगा।

कितना दुर्भाग्य है कि चर्च अभी भी मतान्तरण को ही अपना एकमात्र एजेंडा बनाकर चल रहा है, जो समाजों के बीच वैमनस्य और संघर्ष का मुख्य कारण बन गया है। चर्च अपने आंतरिक पतन को दूर करने की कोशिश क्यों नहीं करता? यह प्रश्न उसकी रातों की नींद क्यों नहीं उड़ाता कि यूरोप और अमरीका के जो गोरी चमड़ी वाले हजार वर्ष पहले चर्च की शरण में आए, वे उसे छोड़कर क्यों जा रहे हैं? पश्चिम का मीडिया बड़े-बड़े पादरियों के यौनाचार की कथाओं से भरा पड़ा है। स्वयं चर्च के भीतर पादरियों में विवाह की भूख बढ़ती जा रही है। अब पश्चिमी देशों से मिशनरी कम संख्या से निकलते हैं। भारत जैसे गरीब देश से ईसाई मिशनरी विदेशों में भागे जा रहे हैं। स्वयं ईसाई समाज के भीतर चर्च के पतन और मतान्तरण की नीति की आलोचना व्यापक होती जा रही है। अनेक ईसाई विचारक चर्च द्वारा मतान्तरण के कार्यक्रम को इक्कीसवीं शताब्दी में पूरी तरह अप्रासंगिक एवं कालबाह्र मानते हैं। एक भारतीय वंचित ईसाई आर.एल.फ्रांसिस ने हाल ही में "आस्था से विश्वासघातव् पुस्तक में वंचित ईसाइयों के प्रति भेदभाव की नीति के तथ्य प्रस्तुत किये हैं। इस पुस्तक के एक अध्याय का शीर्षक है, "गरीबों से दूर होता चर्चव्, दूसरे का शीर्षक है, "धर्मान्तरण से नहीं बदली जीवन की तस्वीरव्, तीसरे का शीर्षक है, "दलित ईसाई-चर्च नेतृत्व से मुक्ति की जरूरतव्। ये शीर्षक चर्च की विफलता की बोलती कहानी हैं। पर चर्च अपनी विफलताओं को ढकने के लिए गरीब, भोले, अशिक्षित वनवासियों के धन, बल, छल से मतान्तरण में ही अपनी पूरी शक्ति लगा रहा है।

निशाने पर बस हिन्दू समाज

उसने विविधताओं से परिपूर्ण हिन्दू समाज को ही अपना मुख्य निशाना बनाया है। इसके लिए वह सभी हिन्दूद्वेषी तत्वों से गठबंधन को तैयार है। 26 जुलाई के बम विस्फोटों की जांच में पता चला कि जिहादी सोभान या तौकीद ने जो ईमेल 5 मिनट पहले भेजी थी वह मुम्बई के केन हेवुड नामक अमरीकी के यहां से भेजी गयी थी। अब जांच से सामने आया है कि हेवुड मतान्तरण के लिये कुख्यात एक चर्च में अत्यधिक सक्रिय था और वह जांच के भय से रहस्यमय ढंग से अमरीका चला गया। अमदाबाद के फादर सेड्रिक प्रकाश की हिन्दू विरोधी गतिविधियों के तार अमरीका तक फैले हुए हैं। छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सरकारों ने यदि माओवादी हिंसा की गहरी छानबीन की तो माओवाद के बुर्के में छिपा चर्च का चेहरा बेनकाब हो जाएगा।

चर्च भारत के ईसाई समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि वह ईसाई समाज का सबसे बड़ा शत्रु है। उसकी एकमात्र चिंता अपने अस्तित्व की रक्षा और अपने साम्राज्य का विस्तार है। दिल्ली के श्रेष्ठ विद्यालय सेंट स्टीफेंस कालेज में पिछले दिनों प्राचार्य के चयन और स्टाफ व छात्रों में ईसाई कोटे को लेकर चर्च ने जो दबाव बनाया उससे इस कालेज की छवि को बहुत धक्का लगा। उदारवादी ईसाई बुद्धिजीवियों ने ही चर्च के हस्तक्षेप का विरोध किया। भारत का ईसाई समाज अधिकांशत: उदार, प्रगतिशील व देशभक्त है। इसी 27 अगस्त को बंगलूरू के कर्नल जोजन जोसेफ थामस (43) ने कश्मीर के मट्टन सेक्टर में जिहादी घुसपैठियों के विरुद्ध वीरतापूर्ण संघर्ष में आत्मबलिदान किया, वह पूरे भारत के लिए गर्व का विषय है। 29.8.2008

पांच बच्चों की मां के शाहबानों प्रकरण में महामहिम "राष्ट्रपति" का दर्द सामनें आया




Date: Jan 29 2016

राजीव गांधी चुगली सुनते थे, मैंने धैर्य पर हताशा को हावी होने दिया : प्रणब मुखर्जी


राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा के दूसरे संस्करण ‘द टरबुलेंट ईयर : 1980-1996’ में किये कई खुलासे, लिखा
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक ‘द टरबुलेंट ईयर : 1980-1996’ का गुरुवार को उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने राष्ट्रपति भवन में विमोचन किया. इसमें इंदिरा गांधी की हत्या, बाबरी मसजिद ढांचे को ढाहे जाने, ऑपरेशन ब्लूस्टार और राजीव गांधी कैबिनेट से उनका निकाला जाना सहित उनके राजनीतिक जीवन की अहम घटनाओं का जिक्र है. इसमें 1980 और 1990 के दशक के उन कुछ यादगार घटनाक्रमों का जिक्र है, जिन्हें आजादी के बाद के भारत के इतिहास में सर्वाधिक कलह पैदा करनेवाला माना जाता है.

मुखर्जी ने राजीव गांधी के पीएम बनने से राष्ट्र नेता के तौर पर पीवी नरसिम्हा राव के उभरने तक हर बड़े राजनीतिक घटनाक्रम पर नये सिरे से प्रकाश डाला है. प्रणब के दूसरे संस्मरण के विमोचन के मौके पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, पूर्व कैग विनोद राय, पूर्व केंद्रीय मंत्री करन सिंह सहित अन्य मौजूद थे.

नयी दिल्ली : प्रणब मुखर्जी ने लंबे समय से चली आ रही इन अटकलों को सिरे से खारिज किया है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वह अंतरिम प्रधानमंत्री बनना चाहते थे. प्रणब ने इसे ‘गलत और द्वेषपूर्ण’ करार दिया है.

उन्होंने लिखा है, ‘और यह कि इन बातों ने राजीव गांधी के दिमाग में शक पैदा कर दिये. ये कहानियां पूरी तरह गलत और द्वेषपूर्ण हैं.’ उन्होंने विस्तार से बताया है कि पीएम पद के मुद्दे पर उनकी और राजीव गांधी की बातचीत एक बाथरूम में हुई थी. प्रणब ने लिखा है, ‘वक्त बीतता जा रहा था.

मैं उनसे बात करने को लेकर बहुत उत्सुक था. मैं दंपती (राजीव और सोनिया) के पास गया. राजीव के कंधे के पीछे हल्का-सा स्पर्श किया, जिससे मैं उन्हें संकेत दे सकूं कि मुझे उनसे कोई जरूरी काम था. उन्होंने खुद को सोनिया से अलग किया और मुझसे बात करने के लिए पीछे मुड़े.

वह जानते थे कि यदि मामला बहुत जरूरी और गोपनीय नहीं होता, तो मैं उन्हें परेशान नहीं करता. वह तुरंत मुझे उस कमरे से सटे बाथरूम में ले गये, ताकि कमरे में दाखिल होनेवाला कोई और शख्स हमें बात करते नहीं देख सके.’

दोनों नेताओं ने उस वक्त के राजनीतिक हालात और राजीव को प्रधानमंत्री नियुक्त करने के बारे में कांग्रेसजनों की राय पर चर्चा की थी. राजीव प्रधानमंत्री बनने पर सहमत हो गये थे.

प्रणब लिखते हैं, ‘मैं बाथरूम से बाहर आया और राजीव के फैसले से हर किसी को वाकिफ करा दिया.’ पहले राजीव कैबिनेट और फिर कांग्रेस से रुखसत के लिए जिम्मेदार हालात के बारे में प्रणब ने स्वीकार किया है कि वह ‘राजीव की बढ़ती नाखुशी और उनके ईद-गिर्द रहनेवालों के बैर-भाव को भांप गये थे और समय रहते कदम उठाया’.

राष्ट्रपति ने लिखा है, ‘इस सवाल पर कि उन्होंने मुझे कैबिनेट से क्यों हटाया और पार्टी से क्यों निकाला, मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि उन्होंने गलतियां की और मैंने भी की. वह दूसरों की बातों में आ जाते थे और मेरे खिलाफ उनकी चुगलियां सुनते थे. मैंने अपने मेरे धैर्य पर अपनी हताशा हावी हो जाने दी.’ गौरतलब है कि प्रणब को अप्रैल, 1986 में कांग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (आरएससी) पार्टी बनायी थी.

बहरहाल, प्रणब का मानना है कि वह आरएससी बनाने की भूल को टाल सकते थे. उन्होंने लिखा है, ‘मुझमें यह समझदारी होनी चाहिए थी कि मैं जनाधारवाला नेता नहीं था (और न हूं). कांग्रेस को छोड़नेवाले शायद ही कामयाब हुए. 1986 और 1987 के निर्णायक सालों के दौरान जब राजीव के लिए सब कुछ गलत होता दिख रहा था, उस वक्त मैं कांग्रेस पार्टी और सरकार को कुछ मदद कर सकता था.’ प्रणब इसके दो साल बाद कांग्रेस में लौट आये थे.

प्रणब ने लिखा है कि राजीव एक ‘अनिच्छुक राजनेता’ थे, जिन्हें हालात ने 40 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने के लिए मजबूर किया था. वह अपने वक्त से आगे के शख्स थे. उन्होंने तेज बदलाव चाहा और कांग्रेस में पुरानी पीढ़ी के नेताओं को अपनी सोच के रास्ते में बाधा के तौर पर देखा.

वह आगे देखनेवाले और तकनीक पसंद थे. उन्होंने बाजार अर्थव्यवस्था को बड़ा करने के साथ-साथ भारत में विदेशी निवेश का भी स्वागत किया. प्रणब ने लिखा है, ‘इसके ठीक उलट, मैं पारंपरिक सोचवाला राजनेता था, जिसने सार्वजनिक क्षेत्र, विनियमित अर्थव्यवस्था को तवज्जो दी और सिर्फ प्रवासी भारतीयों से ही विदेशी निवेश चाहा.’

उन्होंने लिखा है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बदले के नाम पर भड़के ‘अत्यंत अनुचित’ सिख-विरोधी दंगों के समय राजीव गांधी सरकार तैयार नहीं दिखी थी. राष्ट्रपति ने लिखा है, ‘हर परिपक्व सरकार के पास ऐसे संकट से निपटने की तैयारी होती है. दुर्भाग्यवश, पूरा राष्ट्र शोक में डूब गया और उपद्रवियों ने हालात का फायदा उठाया. इससे बड़े पैमाने पर जानमाल की हानि हुई.’

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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने संस्मरण में बताईं राजीव गांधी की गलतियां, 

पढे़ं 6 प्रमुख बातें

नई दिल्ली, लाइव हिन्दुस्तान टीम
First Published:29-01-2016

महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को जारी अपने संस्मरण 'द टर्बुलेंट ईयर्स:1980-1996' में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा और राजीव गांधी से जुड़ी कई बातों को सामने रखा है। उन्होंने अयोध्या में रामजन्मभूमि मंदिर का ताला खुलवाना राजीव गांधी का गलत निर्णय बताया है तथा लिखा है कि बाबरी मस्जिद गिराया जाना पूर्ण विश्वासघात था, जिसने भारत की छवि नष्ट कर दी।

राष्ट्रपति मुखर्जी ने अपने इस संस्मरण में भारतीय राजनीति से जुडे़ कई पन्नों को अपने नजरिए के साथ सामने रखा। एक नजर उनके संस्मरण की 6 खास बातों पर-

1- मुखर्जी कहते हैं, बाबरी मस्जिद को गिराया जाना एक पूर्ण विश्वासघाती कृत्य था, एक धार्मिक ढांचे का विध्वंस निरर्थक था और यह पूरी तरह से राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए था। इससे भारत और विदेशों में मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को गहरा आघात लगा। इसने एक सहिष्णु और बहुलतावादी देश के तौर पर भारत की छवि को नष्ट किया।

2- राष्ट्रपति मुखर्जी ने शाह बानो मामले को याद करते हुए कहा कि राजीव के निर्णय ने एक आधुनिक व्यक्ति के तौर पर उनकी छवि धूमिल की। उन्होंने कहा, शाह बानो और मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक पर राजीव के कदमों की आलोचना हुई और इससे एक आधुनिक व्यक्ति के तौर पर उनकी छवि धूमिल हुई।

पांच बच्चों की मां मुस्लिम महिला शाह बानो को उसके पति ने 1978 में तलाक दे दिया था। उसने एक आपराधिक मुकदमा दर्ज किया, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया और उसे अपने पति से गुजारा भत्ते का अधिकार हासिल हुआ। यद्यपि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक अधिनियमित किया। कानून का सबसे विवादास्पद प्रावधान यह था कि ये एक मुस्लिम महिला को तलाक के बाद इददत की अवधि (करीब तीन महीने) तक गुजारा भत्ते का अधिकार देता है। कानून महिला के गुजारा भत्ते की जिम्मेदारी उसके रिश्तेदारों और वक्फ बोर्ड पर डालता है। कानून को एक भेदभावपूर्ण कानून के तौर पर देखा गया क्योंकि वह एक मुस्लिम महिला को मूलभूत गुजारा भत्ते के अधिकार से वंचित करता है, जिसका अन्य धर्म की महिलाओं को धर्मनिरपेक्ष कानून के तहत सहारा मिलता है।

3- वह कहते हैं कि वी पी सिंह सरकार का सरकारी नौकरियों और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के निर्णय के चलते सिंह एक मसीहा के तौर पर मशहूर हुए। मुखर्जी ने कहा कि इस कदम ने सामाजिक अन्याय को कम किया लेकिन इसने देश को बांट दिया और उसका ध्रुवीकरण कर दिया।

4- साल 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से आतंकवादियों के सफाये के लिए चलाए गए ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में प्रणब ने लिखा है कि इंदिरा गांधी हालात को बखूबी समझती थीं और उनकी सोच बहुत साफ थी कि अब कोई और विकल्प नहीं रह गया है । उन्हें इस बात का अंदाजा था कि उनकी जान जोखिम में है। इसके बाद भी उन्होंने काफी सोच-समझकर देशहित में आगे बढ़ने का फैसला किया। उन्होंने लिखा है कि यह कहना बहुत आसान है कि सैन्य कार्रवाई टाली जा सकती थी। बहरहाल, कोई भी यह बात नहीं जानता  कोई अन्य विकल्प प्रभावी साबित हुआ होता कि नहीं। ऐसे फैसले उस वक्त के हालात के हिसाब से लिए जाते हैं। पंजाब में हालात असामान्य थे। अंधाधुंध कत्लों, आतंकवादी गतिविधियों के लिए धार्मिक स्थलों के गलत इस्तेमाल और भारतीय संघ को तोड़ने की सारी कोशिशों पर लगाम लगाने के लिए तत्काल कार्रवाई जरूरी थी।

5- राष्ट्रपति मुखर्जी ने लंबे समय से चली आ रही इन अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वह अंतरिम प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। प्रणब ने इन अटकलों को गलत और द्वेषपूर्ण करार दिया है। प्रणब ने यह भी कहा कि राजीव गांधी कैबिनेट से हटाए जाने पर वह स्तब्ध और अचंभित रह गए थे।

उन्होंने बताया, 'कई कहानियां फैलाई गई हैं कि मैं अंतरिम प्रधानमंत्री बनना चाहता था, मैंने दावेदारी जताई थी और फिर मुझे काफी समझाया-बुझाया गया था।' प्रणब ने लिखा है, और यह कि इन बातों ने राजीव गांधी के दिमाग में शक पैदा कर दिए। ये कहानियां पूरी तरह गलत और द्वेषपूर्ण हैं।
 
6- पहले राजीव कैबिनेट और फिर कांग्रेस से रूखसत के लिए जिम्मेदार हालात के बारे में लिखते हुए प्रणब ने स्वीकार किया है कि वह राजीव की बढ़ती नाखुशी और उनके इर्द-गिर्द रहने वालों के बैर-भाव को भांप गए थे और समय रहते कदम उठाया। राष्ट्रपति ने लिखा है, इस सवाल पर कि उन्होंने मुझे कैबिनेट से क्यों हटाया और पार्टी से क्यों निकाला, मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि उन्होंने गलतियां की और मैंने भी कीं। वह दूसरों की बातों में आ जाते थे और मेरे खिलाफ उनकी चुगलियां सुनते थे। मैंने अपने धैर्य पर अपनी हताशा को हावी हो जाने दिया।

गौरतलब है कि प्रणब को अप्रैल 1986 में कांग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (आरएससी) नाम की पार्टी बनाई थी। वह 1988 में फिर कांग्रेस में लौट आए थे।