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जनवरी 14, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

समाज का सुख संघर्ष में नहीं है अपितु सामंजस्य में है - डॉ. कृष्ण गोपाल जी

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समाज का सुख संघर्ष में नहीं है अपितु सामंजस्य में है - डॉ. कृष्ण गोपाल जी ‘सामाजिक समरसता और हिन्दुत्व’ एवं ‘दत्तोपंत ठेंगड़ी जीवन दर्शन व एकात्म मानववाद – खंड 7 व 8’ नाम से तीन पुस्तकों का लोकापर्ण करते हुए डॉ. कृष्ण गोपाल जी एवं पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर 8 जनवरी, नई दिल्ली, (इंविसंके). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने आज ‘सामाजिक समरसता और हिन्दुत्व’ एवं ‘दत्तोपंत ठेंगड़ी जीवन दर्शन व एकात्म मानववाद – खंड 7 व 8’ नाम से तीन पुस्तकों का लोकापर्ण किया। नई दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इन पुस्तकों के विमोचन के अवसर पर नेशनल बुक ट्रस्ट के सहयोग से एक परिचर्चा भी आयोजित की गई. जिसमें डॉ. कृष्ण गोपाल ने संघ के तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस के सामाजिक समरसता के संदर्भ में दिए गये विचारों को सबके समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि भारत ऋषि परम्परा का देश है.  वेद लिखने वाले ऋषियों में सभी जातियों के विद्वान थे, जिनमें महिलाएं व शूद्र वर्ण के भी अनेक ऋषि थे, जिसमें सूर्या, सावित्री, घोषा, अंबाला वहीँ पुरुषों में

मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे की बड़ी सौगात : गैंता-माखीदा उच्च स्तरीय नदी पुल

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कितनी ही सरकारें आईं गई सबने माना पूल जरुरी है मगर यह अत्यंत आवश्यक पूल चंबल नदी पर दिया राजस्थान की यशस्वी मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे जी ने ! धन्यवाद माननीया वसुंधरा राजे जी ! - अरविन्द सिसोदिया , जिला महामंत्री , भाजपा कोटा शहर !  94141 80151 / 95095 59131 कल चंबल नदी पर पुल की आधारशिला रखेंगी  सीएम राजे, 120 करोड़ में होगा तैयार हाड़ौती अंचल के अपने दौरे के दौरान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कोटा और बूंदी जिलों की बरसों पुरानी उम्मीदों की आधारशिला रखेंगी. कोटा जिले के गैंता और बूंदी जिले के माखीदा गांवों को आपस में जोड़ने वाले गैंता-माखीदा पुल की रविवार को रखी नींव जाएगी. चम्बल नदी पर 120 करोड़ की लागत से बन रहे पौने दो किलोमीटर से लंबे इस पुल के निर्माण की मांग दोनों जिलों के लोग बरसों से कर रहे थे और पिछले प्रदेश बजट में ही मुख्यमंत्री ने इस पुल के निर्माण की घोषणा कर दी थी. पुल का शिलान्यास कार्यक्रम बूंदी के माखीदा और कोटा के गैंता में नदी के दोनों तरफ होगा और दोनों ही समारोहों में बतौर मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मौजूद रहेंगी, लेकिन राजे इस शिलान्

गंगासागर मेले

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12 लाख श्रद्धालु पहुंचे सागरदीप By Prabhat Khabar | Updated Date: Jan 14 2017 गंगासागर से विकास गुप्ता  में आस्था की डुबकी लगाने शुक्रवार शाम तक तकरीबन 12 लाख श्रद्धालु सागरदीप में पहुंच गये हैं. राज्य के पंचायतमंत्री सुब्रत मुखर्जी ने शुक्रवार को आधिकारिक तौर पर यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि कुछ लोग रास्ते में हैं, शनिवार दोपहर तक और तीन लाख के करीब श्रद्धालु गंगासागर मेले में पहुंच जायेंगे. मौके पर सुब्रत मुखर्जी ने कहा कि मेला प्रांगण में अब तक कोई भी अनचाही घटना नहीं घटी है. सभी कार्य सुचारू रुप से चल रहा है. किसी भी श्रद्धालु के तबीयत बिगड़ने की भी खबर नहीं है. छोटे-मोटे बीमारी का प्राथमिक उपचार कर लोगों को स्वस्थ कर दिया जा रहा है. मौके पर राज्य के बिजली मंत्री शोभनदेव चटर्जी ने बताया कि मेला प्रांगण में बिजली की पर्याप्त व्यवस्था है. कहीं भी बिजली जाने की खबर नहीं है. मेला प्रांगण में स्वेच्छासेवक 24 घंटे निस्वार्थ भाव से सेवाकार्य कर रहे हैं. किसी भी स्थिति से निपटने के लिए सभी टीम को तैयार रहने को कहा गया है. किसी भी समस्या मिलने पर तुरंत उन्हें

भीष्म पितामह के स्वर्गारोहण की तिथि है मकर संक्रांति

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भीष्म पितामह के स्वर्गारोहण की तिथि है मकर संक्रांति अशोक ‘प्रवृद्ध’ https://www.rashtriyakhabar.com यह सर्वविदित तथ्य है कि ऋतु परिवर्तन का पर्व मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव उतरायण में प्रवेश करते हैं और सूर्य के उत्तर की ओर उदय होने की अवधि अर्थात उत्तरायण में दिन बढ़ता जाता है और रात्रि घटती जाती है। सूर्य की मकर राशि की संक्रांति से अर्थात उत्तरायण में सूर्य के प्रकाश की अधिकता के कारण इसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। और यही कारण है कि देश में मकर संक्रांति के दिन को अधिक महत्व दिया जाता है। सूर्य देव के उत्तरायण में प्रवेश करने के पर्व मकर संक्रांति की महिमा का वर्णन संस्कृत साहित्य में वेद से लेकर पुराण तथा आधुनिक ग्रंथों में विशेष रूप से की गई है। वैदिक ग्रंथों में उत्तरायण को देवयान कहा गया है। हमारी संस्कृति का मुख्य ध्येय तमसो मा ज्योतिर्गमय की भावना है। अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर चलें। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में उत्तरायण के प्रथम या आरम्भ के दिन को अत्यधिक महत्व दिया जाता है और प्राचीन काल से ही इस दिवस को एक पर्व के रूप में मनाये जाने की परिपाटी है