ओस की बूंदों सी होती हैं बेटियां - नन्द किशोर हटवाल
ओस की बूंदों सी होती हैं बेटियां ज़रा भी दर्द हो तो रोती हैं बेटियां . रोशन करेगा बेटा एक ही कुल को , दो-दो कुलों की लाज ढोती हैं बेटियां . काँटों की राह पर यह खुद ही चलती रहेंगी औरों के लिए फूल सी होती हैं बेटियां ! बोये जाते हैं बेटे और उग आती हैं बेटियां . खाद- पानी बेटों में और लहलहाती हैं बेटियां . ऊंचाइयों तक ठेले जाते हैं बेटे और चढ़ जाती हैं बेटियां . रुलाते हैं बेटे और रोती हैं बेटियां मुट्ठी भर नीर सी होती हैं बेटियां . कई तरह से गिराते हैं बेटे , संभाल लेती हैं बेटियां ! विधि का विधान है , यही दुनिया की रस्म है , जीवन तो बेटों का है , और मारी जाती हैं बेटियां !!! - नन्द किशोर हटवाल