कविता - कौन कहता है वह आंदोलन था
कविता -
सुनो आराजकताई सुरक्षा प्रहरी का
भी राष्ट्रधर्म है
- अरविन्द सिसोदिया
9414180151
कौन कहता है वह आंदोलन था,
वह तो संसद पर अराजकता का आक्रमण था।
मत इसको कमतर आंको,
यह षड्यंत्र महाभयंकर था।
अपराधी थे, दंगाई थे, अराजक थे,
तभी तो रक्त बहा, वर्दी फट गई !
हेलमेट भी चकनाचूर हुए,
गिरे हुए प्रहरी को भी पैरों तले रौंदा गया,
यह कैसा विरोध प्रदर्शन था ,
जिसमें हजारों अपराधियों को भरा गया।
पर सुन लो —
सुरक्षा प्रहरी यदि शस्त्र उठाए,
तो वह क्रोध नहीं, कर्तव्य होता है।
जब संसद पर संकट मंडराए,
तो रण ही उसका राष्ट्रधर्म होता है।
वह प्रहरी है, कोई दर्शक नहीं,
जो चुपचाप अपमान सह जाएगा।
भारत माँ की संसद पर जो वार करेगा,
तो प्रहरी सिंह-गर्जन बनकर महाकाल बन जाएगा।
ढाल उठी तो राष्ट्र बचा,
दंड उठा तो संविधान बचा।
सीना तान जो प्रहरी डटा,
उससे भारत का सम्मान बचा।
आत्मरक्षा उसका भी अधिकार है,
राष्ट्ररक्षा उसका भी संकल्प है।
जो तिरंगे की ओर बढ़ेगा,
उसको प्रतिउत्तर ही कर्तव्य का संकल्प है।
याद रखो, यह वही धरा है
जहाँ प्रताप ने शीश झुकाया नहीं,
जहाँ शिवाजी ने स्वराज रचा,
जहाँ भगतसिँह ने अन्याय अपनाया नहीं।
यह भारत है, रणभूमि में
कायरता का इतिहास नहीं लिखता।
जो संसद पर आँख उठाता है,
भारत उसका विश्वास नहीं लिखता।
तिरंगे की शपथ यही पुकारे—
राष्ट्र रहेगा, तभी स्वतंत्रता रहेगी।
संविधान की मर्यादा अक्षुण्ण रहे,
तभी भारत की विजय-पताका लहराएगी।
सुनो गौर से,
प्रहरी जो करता है वह राष्ट्रधर्म होता है,
यही कर्तव्य पूरा करने उसने वर्दी पहनी है।
वंदे मातरम्!
भारत माता की जय!
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जो संसद की ओर बढ़े प्रहार लिए,
क्या प्रहरी फिर चुप रह जाते?
रक्षा की जो शपथ उठाई,
क्या उससे वे मुकर भी जाते?
ढाल उठाना धर्म था उनका,
कर्तव्य से पीछे हटना नहीं।
आत्मरक्षा का अधिकार उन्हें भी,
यह कोई अपराध कहीं नहीं।
संसद केवल एक भवन नहीं,
जन-जन के विश्वास का मान है।
उसकी रक्षा में खड़ा सिपाही,
भारत के संविधान की शान है।
जब कानून पर संकट आए,
प्रहरी को दृढ़ होना पड़ता है।
संयम पहले, चेतावनी पहले,
पर अंततः कर्तव्य निभाना पड़ता है।
लोकतंत्र की रक्षा का अर्थ,
हिंसा का विस्तार नहीं होता।
पर जो व्यवस्था पर वार करे,
उसे रोकना भी अन्याय नहीं होता।
विचारों की राह सदा खुली है,
संवादों का सम्मान रहे।
पर संसद और संविधान की रक्षा में,
प्रहरी का साहस अमर रहे।
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