कांग्रेस अमेरिकी और चीनी कंपनियों की संरक्षक है इसलिए अंबानी अडानी विरोधी है - अरविन्द सिसोदिया



मनमोहन सिंह सरकार (2004–2014) के दौरान भारत में अमेरिकी और चीनी कंपनियों का बढ़ता प्रभाव

डॉ. मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री कार्यकाल (2004–2014) भारत की अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण का महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस अवधि में भारत ने लगातार उच्च आर्थिक वृद्धि दर्ज की, विदेशी निवेश (FDI) बढ़ा और भारत विश्व की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया। लगभग 120 करोड़ की आबादी, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और आईटी क्षेत्र के विस्तार ने भारत को वैश्विक कंपनियों के लिए अत्यंत आकर्षक बाज़ार बना दिया।

इस दौर में विशेष रूप से अमेरिका और चीन की कंपनियों ने भारत में अपने व्यापार का व्यापक विस्तार किया।

1. अमेरिकी कंपनियों का तेज़ विस्तार

इस अवधि में अनेक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत को केवल उपभोक्ता बाज़ार ही नहीं बल्कि तकनीकी विकास, अनुसंधान और सेवा केंद्र के रूप में भी विकसित किया।

Google ने भारत में अपने संचालन और इंजीनियरिंग गतिविधियों का विस्तार किया।

Microsoft ने भारत में अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा क्लाउड सेवाओं का विस्तार किया।

IBM, Oracle, Cisco, Intel, Adobe जैसी कंपनियों ने हजारों भारतीय इंजीनियरों को रोजगार दिया और बड़े विकास केंद्र स्थापित किए।

Facebook (अब Meta) ने लगभग 2010 में भारत में स्थानीय कार्यालय और सार्वजनिक नीति (Public Policy) टीम के साथ अपना परिचालन शुरू किया।

Amazon ने 2013 में भारतीय ई-कॉमर्स क्षेत्र में प्रवेश किया और अरबों डॉलर के निवेश की घोषणा की।

Starbucks ने 2012 में टाटा समूह के साथ संयुक्त उद्यम बनाकर भारत में कारोबार शुरू किया।


इन कंपनियों ने भारत में करोड़ों उपभोक्ताओं तक अपनी पहुँच बनाई और भारत उनके सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक बाज़ारों में शामिल हो गया।

2. चीनी कंपनियों और उत्पादों का विस्तार

इसी अवधि में चीन की कंपनियों और चीन से आने वाले उत्पादों की भारतीय बाज़ार में उपस्थिति भी लगातार बढ़ी।

Huawei और ZTE ने भारतीय दूरसंचार कंपनियों को नेटवर्क उपकरण उपलब्ध कराए।

Lenovo ने कंप्यूटर बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई।

Haier ने घरेलू उपकरणों के क्षेत्र में विस्तार किया।

भारत में बिजली उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सौर उपकरण और अन्य औद्योगिक सामान का आयात चीन से तेजी से बढ़ा।


यद्यपि Xiaomi, Vivo और OPPO जैसी मोबाइल कंपनियों का बड़ा विस्तार मुख्यतः 2014 के बाद हुआ, लेकिन उनके लिए भारतीय बाज़ार का आधार पहले से तैयार हो चुका था।

3. भारत-चीन व्यापार में बड़ा बदलाव

इस अवधि में भारत और चीन के बीच व्यापार कई गुना बढ़ा। लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण आर्थिक समस्या भी सामने आई—भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) लगातार बढ़ता गया।

अर्थात भारत चीन से जितना सामान खरीद रहा था, उसके मुकाबले चीन को भारत से होने वाला निर्यात काफी कम था। परिणामस्वरूप भारत का बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा व्यय चीन से आयात पर होने लगा।

4. भारत वैश्विक कंपनियों का प्रमुख बाज़ार बना

2004–2014 के दौरान भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में था। इसका लाभ अमेरिका और चीन दोनों देशों की कंपनियों ने उठाया।

अमेरिकी कंपनियों ने भारत के सेवा, इंटरनेट, सॉफ्टवेयर और ई-कॉमर्स बाज़ार में अपनी मजबूत स्थिति बनाई।

चीनी कंपनियों ने इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार और विनिर्माण उपकरणों के क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की।

दोनों देशों की कंपनियों ने भारत से महत्वपूर्ण राजस्व और लाभ अर्जित किया।


5. क्या यह केवल सरकार की नीति का परिणाम था?

यह निष्कर्ष निकालना कि केवल मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों के कारण अमेरिका और चीन की कंपनियों का विस्तार हुआ, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उचित नहीं होगा।

इस विस्तार के पीछे कई समानांतर कारण थे—

1991 में शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण।

भारत की तेज़ आर्थिक वृद्धि।

बढ़ता मध्यम वर्ग और उपभोक्ता बाज़ार।

आईटी और सेवा क्षेत्र का विकास।

वैश्वीकरण और विश्व व्यापार का विस्तार।

विदेशी निवेश के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल वातावरण।


अर्थात सरकार की आर्थिक नीतियाँ इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थीं, लेकिन वे अकेला कारण नहीं थीं।

निष्कर्ष

इतिहास के उपलब्ध आर्थिक आँकड़े यह दर्शाते हैं कि 2004–2014 का दशक भारत में वैश्विक कंपनियों के विस्तार का महत्वपूर्ण दौर था। इस अवधि में अमेरिका और चीन—दोनों देशों की कंपनियों ने भारत में अपनी व्यापारिक उपस्थिति उल्लेखनीय रूप से बढ़ाई और भारतीय बाज़ार से व्यापक आर्थिक लाभ प्राप्त किए। साथ ही, चीन के साथ व्यापार असंतुलन भी बढ़ा, जो बाद के वर्षों में भारत की आर्थिक और रणनीतिक नीति का एक प्रमुख विषय बना।

इसलिए तथ्यात्मक रूप से यह कहा जा सकता है कि मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में भारत वैश्विक कंपनियों, विशेषकर अमेरिकी और चीनी कंपनियों, के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण बाज़ार के रूप में स्थापित हुआ। वहीं, यह कहना कि यह विस्तार केवल तत्कालीन सरकार की नीतियों का परिणाम था, उपलब्ध साक्ष्यों से सिद्ध नहीं होता; इसमें वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भारत की दीर्घकालिक आर्थिक नीतियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

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हाँ, व्यापक अर्थ में यह कहना सही है कि 2004–2014 के दौरान अमेरिका और चीन—दोनों देशों की कंपनियों ने भारत में अपना कारोबार काफी बढ़ाया और भारतीय बाज़ार से महत्वपूर्ण राजस्व एवं मुनाफ़ा कमाया। लेकिन इस कथन में कुछ आवश्यक संदर्भ जोड़ना चाहिए।
अमेरिकी कंपनियाँ जैसे Google, Microsoft, IBM, Amazon (2013 से ई-कॉमर्स), Facebook (अब Meta), Oracle, Cisco आदि ने भारत में निवेश, कार्यालय, अनुसंधान केंद्र और सेवाओं का विस्तार किया। भारत उनके लिए एक बड़ा उपभोक्ता बाज़ार और प्रतिभा (IT workforce) का स्रोत बना।
चीनी कंपनियाँ और चीन से आयातित सामान का प्रभाव भी बढ़ा। Huawei, ZTE, Lenovo जैसी कंपनियों ने विस्तार किया और चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी तथा टेलीकॉम उपकरणों का आयात तेज़ी से बढ़ा। इसी अवधि में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा भी काफी बढ़ा।
हालाँकि, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि:
कई अमेरिकी और चीनी कंपनियाँ 2004 से पहले भी भारत में मौजूद थीं, लेकिन इस दशक में उनका विस्तार तेज़ हुआ।
इसका कारण केवल केंद्र सरकार की नीतियाँ नहीं थीं। 1991 के आर्थिक उदारीकरण, भारत की तेज़ आर्थिक वृद्धि, बढ़ता मध्यम वर्ग, वैश्वीकरण और विदेशी निवेश के अनुकूल माहौल ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसलिए सबसे संतुलित निष्कर्ष यह होगा:
2004–2014 के दौरान भारत वैश्विक कंपनियों के लिए एक बड़ा बाज़ार बनकर उभरा। अमेरिकी और चीनी दोनों देशों की कंपनियों ने भारत में उल्लेखनीय विस्तार किया और बड़े पैमाने पर व्यापार व लाभ अर्जित किया। लेकिन इसे केवल किसी एक सरकार की नीति का परिणाम कहना उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उचित नहीं होगा।

===1===
इस चित्र में कई तथ्यों, आधे-सच, और राय/निष्कर्ष को मिलाकर प्रस्तुत किया गया है। केवल इस पोस्ट के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि "Meta इंडिया कांग्रेस के नियंत्रण में है" या "एल्गोरिद्म का उपयोग एंटी-मोदी नैरेटिव बनाने के लिए किया जा रहा है"—इसका कोई सार्वजनिक, पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

नीचे दावों का क्रमवार मूल्यांकन है:

दावा स्थिति टिप्पणी

अमन जैन Meta India में Public Policy से जुड़े रहे हैं। ✅ काफी हद तक सही वे Meta India की पब्लिक पॉलिसी टीम में रहे हैं।
अमन जैन 2013–14 में युवा मामलों के मंत्रालय में कांग्रेस सरकार के दौरान सलाहकार रहे थे। ✅ सही उपलब्ध सार्वजनिक प्रोफाइलों में ऐसा उल्लेख मिलता है। लेकिन यह अपने-आप किसी वर्तमान राजनीतिक पक्षपात का प्रमाण नहीं है।
प्रियंका राव खान Meta India में Public Policy Manager रही हैं। ✅ सही यह उनके सार्वजनिक प्रोफाइल से मेल खाता है।
प्रियंका राव खान, कांग्रेस नेता मोहम्मद खान की पत्नी हैं। ✅ यदि पोस्ट में जिस व्यक्ति का उल्लेख है, वह वही हैं, तो यह संबंध सार्वजनिक रूप से बताया गया है। रिश्ता होना अपने-आप हितों के टकराव या पक्षपात का प्रमाण नहीं है।
शशांक शाह Meta India में Content Policy Manager रहे हैं। ✅ सार्वजनिक प्रोफाइलों के अनुसार यह सही है। 
वे कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी के LAMP Fellow रहे हैं। ✅ LAMP Fellowship का यह संबंध सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से मेल खाता है। LAMP Fellowship स्वयं एक गैर-पक्षपातपूर्ण संसदीय फेलोशिप है जिसमें विभिन्न दलों के सांसद भाग लेते हैं। 


जिन दावों का प्रमाण नहीं है

❌ "Meta India = एंटी-मोदी कांग्रेस कंट्रोल रूम"

इसका कोई विश्वसनीय सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

Meta के निर्णय अनेक स्तरों (स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक) पर लिए जाते हैं।

केवल कुछ कर्मचारियों के पुराने पेशेवर या व्यक्तिगत संबंधों से पूरी कंपनी के राजनीतिक नियंत्रण का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।


❌ "Meta का एल्गोरिद्म जानबूझकर एंटी-मोदी नैरेटिव और कांग्रेस पक्षपात को बढ़ावा देता है।"

इस दावे के समर्थन में कोई सार्वजनिक तकनीकी या कानूनी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

Meta पर अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा अलग-अलग समय पर पक्षपात के आरोप लगाए गए हैं, लेकिन आरोप और प्रमाण अलग बातें हैं।

स्वतंत्र शोध में सोशल मीडिया एल्गोरिद्म पर कई तरह की आलोचनाएँ हुई हैं, पर इस विशेष दावे की पुष्टि नहीं हुई है।


समग्र निष्कर्ष

पोस्ट में जिन लोगों के पद और उनके कुछ पूर्व पेशेवर/व्यक्तिगत संबंध बताए गए हैं, उनमें कई बातें सही या काफी हद तक सही हैं।

लेकिन इन तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि Meta India कांग्रेस द्वारा नियंत्रित है या एल्गोरिद्म राजनीतिक रूप से संचालित किया जा रहा है, प्रमाणित नहीं है।

इसलिए पोस्ट में तथ्यात्मक जानकारी और राजनीतिक निष्कर्ष/आरोप को मिलाकर प्रस्तुत किया गया है।

यदि चाहें, मैं इन तीनों व्यक्तियों के सार्वजनिक LinkedIn/आधिकारिक प्रोफाइल और उपलब्ध स्रोतों के आधार पर प्रत्येक दावे का स्रोत-सहित विस्तृत सत्यापन भी कर सकता हूँ।
====2===
संक्षिप्त उत्तर: हाँ, यदि आशय Facebook/Meta के भारत में कारोबार शुरू करने से है, तो वह मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में ही हुआ था। लेकिन इसे यह कहना कि "मनमोहन सरकार ने Meta को भारत में विशेष अनुमति या स्थान दिया", तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

मुख्य तथ्य:

Facebook (आज की Meta) की स्थापना 2004 में हुई।

Facebook ने भारत में अपना परिचालन और कार्यालय लगभग 2010 के आसपास शुरू किया, जब केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार थी। 

Meta नाम कंपनी ने 2021 में अपनाया। इसलिए 2010 में भारत में जो कंपनी आई थी, उसका नाम Facebook था; बाद में वही Meta बनी। 

भारत में उस समय कई वैश्विक तकनीकी कंपनियाँ (Google, Microsoft, Amazon, Facebook आदि) अपने कारोबार का विस्तार कर रही थीं। यह विदेशी निवेश और भारतीय बाज़ार के आकर्षण का हिस्सा था, न कि केवल किसी एक कंपनी को विशेष राजनीतिक अनुमति दिए जाने का मामला। 


इसलिए:

✅ "Facebook/Meta भारत में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते आया" — सही।

❌ "मनमोहन सिंह सरकार ने Meta को विशेष रूप से बसाया या इसलिए आज Meta किसी राजनीतिक दल के प्रभाव में है" — ऐसा निष्कर्ष उपलब्ध सार्वजनिक तथ्यों से सिद्ध नहीं होता।
====3====
डॉ. मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री कार्यकाल 2004–2014 था। इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही थी और कई अमेरिकी कंपनियों ने भारत में प्रवेश किया या अपना बड़ा विस्तार किया। ध्यान रहे कि कुछ कंपनियाँ पहले भारत में मौजूद थीं, लेकिन UPA काल में उन्होंने बड़े पैमाने पर निवेश या परिचालन शुरू किया।

कुछ प्रमुख उदाहरण:

Facebook (अब Meta) – भारत में कार्यालय और स्थानीय परिचालन लगभग 2010 में शुरू हुआ।

Amazon – भारत में अपना ई-कॉमर्स कारोबार 2013 में शुरू किया और अरबों डॉलर के निवेश की घोषणा की। 

Walmart – 2007 में भारती एंटरप्राइजेज के साथ साझेदारी कर कैश-एंड-कैरी कारोबार शुरू किया। 

Starbucks – 2012 में टाटा समूह के साथ संयुक्त उद्यम के जरिए भारत में आया।

Groupon – 2011 में भारत में आया।

eBay – भारत में अपना विस्तार किया और स्थानीय ई-कॉमर्स में निवेश बढ़ाया।

PayPal – भारत में अपनी सेवाओं का विस्तार किया और भारतीय व्यापारियों को अंतरराष्ट्रीय भुगतान सुविधाएँ दीं।


इसके अलावा कई अमेरिकी कंपनियों ने इस अवधि में अपने भारत संचालन का काफी विस्तार किया, जैसे:

Google

Microsoft

Oracle

IBM

Cisco

Intel

Adobe

Dell

Accenture


इनमें से कई कंपनियाँ 2004 से पहले भी भारत में मौजूद थीं, लेकिन UPA सरकार के दौरान उन्होंने बड़े विकास केंद्र, अनुसंधान केंद्र या निवेश बढ़ाए। उस समय भारत-अमेरिका व्यापार और निवेश संबंध भी मज़बूत हुए। 

इसलिए यदि कोई कहे कि "मनमोहन सिंह के समय बहुत-सी अमेरिकी कंपनियाँ भारत आईं", तो यह काफी हद तक सही है। लेकिन यह भी सही है कि इसका आधार केवल उस सरकार की नीतियाँ नहीं थीं; 1991 के आर्थिक उदारीकरण, भारत के बड़े उपभोक्ता बाज़ार, आईटी प्रतिभा और वैश्विक निवेश माहौल ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

=====4=====
यदि आपका आशय यह है कि "क्या मनमोहन सिंह (2004–2014) के कार्यकाल में चीन की कंपनियों ने भी भारत में मजबूत पकड़ बनाई?" तो उत्तर है: हाँ, काफी हद तक। लेकिन इसका कारण केवल सरकारी नीति नहीं था; वैश्विक व्यापार, कम कीमत वाले चीनी उत्पाद और भारतीय बाज़ार की मांग भी बड़े कारण थे।

उदाहरण के तौर पर:

Huawei – भारत में 2000 के दशक से मौजूद थी, लेकिन 2004–2014 के दौरान टेलीकॉम उपकरणों में उसका बड़ा विस्तार हुआ।

ZTE – भारतीय दूरसंचार कंपनियों को नेटवर्क उपकरण की आपूर्ति बढ़ी।

Lenovo – IBM के PC कारोबार के अधिग्रहण के बाद भारत में तेज़ी से बढ़ी।

Haier – घरेलू उपकरणों के क्षेत्र में विस्तार किया।

OPPO, Vivo, Xiaomi – इनका बड़ा उपभोक्ता प्रवेश मुख्यतः 2014 के बाद हुआ, इसलिए इन्हें मनमोहन सिंह सरकार के दौर की कंपनियाँ कहना सही नहीं होगा।


साथ ही, 2004–2014 के दौरान:

भारत-चीन व्यापार कई गुना बढ़ा।

भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा (Trade Deficit) भी तेज़ी से बढ़ा।

बिजली, दूरसंचार और इलेक्ट्रॉनिक्स में चीनी आयात पर निर्भरता बढ़ी।


हालाँकि, यह कहना कि "सरकार ने जानबूझकर चीन की कंपनियों का दबदबा स्थापित किया" उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं होता। अधिक सटीक बात यह होगी कि उस दौर में:

1. भारत का बाज़ार तेजी से खुला और बढ़ा,


2. चीनी कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर विस्तार कर रही थीं,


3. भारतीय कंपनियाँ कम लागत वाले चीनी उत्पादों और उपकरणों का बड़े पैमाने पर आयात करने लगीं।

इसलिए "चीनी कंपनियों की भारत में मौजूदगी और प्रभाव 2004–2014 में काफी बढ़ा" कहना तथ्यात्मक है, लेकिन इसे केवल किसी एक सरकार की नीति का परिणाम कहना एक अतिसरलीकरण होगा।

======5=====

यदि आपका प्रश्न 2008 में चीन में हुए MoU के बारे में है, तो मुख्य तथ्य ये हैं:

  • हाँ, 7 अगस्त 2008 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच एक Memorandum of Understanding (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे।
  • यह भारत सरकार और चीन सरकार के बीच नहीं, बल्कि दो राजनीतिक दलों के बीच हुआ समझौता था।
  • उस समय:
    • सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थीं और चीन यात्रा पर मौजूद थीं।
    • राहुल गांधी, जो कांग्रेस महासचिव थे, ने कांग्रेस की ओर से हस्ताक्षर किए।
    • चीनी पक्ष की ओर से उस समय के वरिष्ठ CPC नेता (बाद में चीन के राष्ट्रपति बने) Xi Jinping सहित पार्टी नेतृत्व मौजूद था।
  • प्रियंका गांधी भी उस चीन दौरे में परिवार के साथ गई थीं, लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार वे MoU की हस्ताक्षरकर्ता नहीं थीं।
  • डॉ. मनमोहन सिंह इस पार्टी-से-पार्टी MoU के हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे। वे उस समय भारत के प्रधानमंत्री थे, लेकिन यह समझौता कांग्रेस पार्टी और CPC के बीच था, भारत सरकार की ओर से नहीं। अलग से, जनवरी 2008 में उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में चीन की आधिकारिक यात्रा की थी और दोनों देशों के बीच सरकारी स्तर पर संयुक्त दस्तावेज़ों पर सहमति बनी थी।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 2008 के इस MoU का पूरा पाठ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए उसके विस्तृत प्रावधानों पर निश्चित निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है। 2020 में इस MoU को लेकर जाँच की मांग वाली याचिका भी दायर हुई थी, लेकिन उससे MoU की सामग्री या किसी अवैध कार्य का न्यायिक निष्कर्ष स्थापित नहीं हुआ। 

======6======
यह कहना कि "2008 के MoU के बाद भारत में चीन का अंधाधुंध आयात हुआ"—इसे सीधे कारण-परिणाम (cause-and-effect) के रूप में स्थापित करना उपलब्ध साक्ष्यों से संभव नहीं है।

लेकिन निम्न बातें तथ्यात्मक हैं:

हाँ, 2004–2014 के दौरान भारत का चीन से आयात तेज़ी से बढ़ा।

भारत-चीन का कुल व्यापार भी तेज़ी से बढ़ा।

इसी अवधि में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा (trade deficit) भी काफी बढ़ गया। उदाहरण के लिए, भारत का चीन से आयात 2007–08 में लगभग 27.1 अरब डॉलर से बढ़कर 2008–09 में 32.5 अरब डॉलर हुआ, जबकि निर्यात उतनी तेजी से नहीं बढ़ा। 

सरकार ने स्वयं संसद में स्वीकार किया था कि चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे का मुद्दा उठाया गया और चीन से भारतीय निर्यात बढ़ाने के प्रयास किए गए। 


हालाँकि, यह कहना कि:

> "2008 के कांग्रेस–चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) MoU के कारण चीन का आयात बढ़ा"



—इस दावे का कोई सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। MoU और आयात वृद्धि के बीच प्रत्यक्ष संबंध सिद्ध नहीं हुआ है।

अधिक सटीक निष्कर्ष यह होगा:

> 2004–2014 के दौरान भारत में चीन से आयात और चीन की आर्थिक उपस्थिति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा व्यापार घाटा भी बढ़ा। यह ऐतिहासिक तथ्य है। लेकिन उपलब्ध साक्ष्य यह सिद्ध नहीं करते कि 2008 के कांग्रेस–CPC MoU के कारण ही यह वृद्धि हुई। व्यापार बढ़ने के पीछे वैश्विक विनिर्माण में चीन की बढ़त, भारत की बढ़ती मांग, कम कीमत वाले चीनी उत्पाद और उस समय की व्यापारिक परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण कारण थे। 
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