कविता - भारत भूमि पुण्यधाम है


कविता - भारत भूमि पुण्यधाम है

भारत भूमि पुण्यधाम है,
यह अपने जीवन का प्राण है,
इसकी माटी में पुरखों का शान है,
यह त्याग, तपस्या और बलिदान है।
भारत भूमि पुण्यधाम है
भारत भूमि पुण्यधाम है
===1===
इसकी गोद में आँखें खोलीं,
इसके अन्न-जल से तन है अपना ,
इसके संस्कारों से सिंचित
तन, मन,जीवन है अपना।
===2=== 
जननी जन्मभूमि भारत ,
यह हमारा अभिमान है;
इसके कण-कण में बसता
अपना पूरा हिंदुस्तान है।
===3===
हिमगिरि आपके प्रहरी हैं,
पवित्र गंगा आपकी पहचान,
वेदों की वाणी से गूँज रहा,
अपना गौरवमयी व्याख्यान ।
===4===
बुद्ध, महावीर, नानक, तुलसी ने
सत्य अहिंसा और प्रेम का पाठ पढ़ाया,
वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश यहाँ से गुंजा 
सारे जग को अपनापन समझाया।
===5===
पर जन्मभूमि केवल गौरवगान नहीं
इसका ऋण भी चुकाना है;
जिस मिट्टी ने जीवन दिया,
उसके काम हमें आना है।
===6===
यह मेरी कर्मभूमि है,
कर्म ही जिसकी पहचान,
निष्काम कर्म, सत्य और सेवा
जिसका सच्चा सम्मान।

खेतों में किसान तपता है,
सीमा पर सैनिक खड़ा,
वैज्ञानिक नव सृजन करे,
श्रमिक देश का भार उठा।

कोई काम छोटा नहीं,
कोई श्रम बेकार नहीं;
राष्ट्रहित से बढ़कर जग में
कोई और विचार नहीं।

अन्याय जहाँ दिखे, वहाँ
सत्य के साथ खड़े होना है,
भूखे, निर्बल, वंचित जन के
दुख को अपना दुख समझना है।
नारी का सम्मान सुरक्षित हो,
हर बच्चे का भविष्य सँवरे,
जाति-धर्म की दीवारें टूटें,
मानवता के दीप निखरें।

अधिकारों के साथ कर्तव्य भी
जीवन में स्वीकार करें;
संविधान और लोकतंत्र का
हर पल हम सम्मान करें।

यह मेरी पुण्यभूमि है,
आत्मा का तीर्थ महान,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में
एक ही ज्योति समान।

धर्म बने सद्भाव की भाषा,
प्रेम बने व्यवहार,
विविध रंगों में एक रहे
भारत का परिवार।

नदियाँ, वन, पर्वत, धरती—
सब अपनी धरोहर हैं;
इनकी रक्षा करना भी
राष्ट्रसेवा के स्वर हैं।

जल बचाएँ, वृक्ष लगाएँ,
धरती का सम्मान करें;
आने वाली पीढ़ी के हित
आज सही निर्माण करें।

भाषाएँ अनेक, वेश अनेक,
फिर भी भारत एक रहे;
'मैं' से ऊपर उठकर हर मन
'हम भारत' का भाव कहे।

भ्रष्टाचार, हिंसा, छल से
भारत को मुक्त बनाएँ,
ईमानदारी, श्रम और साहस से
राष्ट्र को आगे ले जाएँ।

युवा उठें तो देश उठेगा,
युवा ही इसकी शान हैं;
ज्ञान, चरित्र और अनुशासन
भारत की पहचान हैं।

जन्मभूमि से प्रेम करें,
कर्मभूमि का धर्म निभाएँ;
पुण्यभूमि की पावनता से
जीवन अपना धन्य बनाएँ।

न पद चाहिए, न यश चाहिए,
निज स्वार्थों का राज नहीं;
भारत के हित से बढ़कर
मेरे जीवन का काज नहीं।

जब तक तन में प्राण रहें,
भारत तेरा मान रहे;
मेरी हर साँस, हर कर्म में
माँ, तेरा ही नाम रहे।

भारत को केवल महान न कहें—
मिलकर भारत महान बनाएँ।
अपने कर्तव्य की ज्योति जलाएँ,
भारत का गौरव और बढ़ाएँ।

वंदे मातरम्!
भारत माता की जय!

भारत भूमि पुण्यधाम है,

यह अपने जीवन का प्राण है,

इसकी माटी में पुरखों का







भारत : मेरी जन्मभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि

भारत भूमि पुण्यधाम है,
यह अपने जीवन का प्राण है,
इसकी माटी में पुरखों का शान है, 
त्याग, तपस्या और बलिदान है।

===1==
तेरी गोद में आँखें खोलीं,
तेरे अन्न-जल से तन है,
तेरे संस्कारों से सिंचित
मेरा मन और जीवन है।

हे भारत! तू जन्मभूमि मेरी,
तू ही मेरा अभिमान है;
तेरे कण-कण में बसता
मेरा पूरा हिंदुस्तान है।

हिमगिरि तेरे प्रहरी हैं,
गंगा तेरी पहचान,
वेदों की वाणी से गूँजा
तेरा गौरवमय गान।
बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर ने
प्रेम-सत्य का पाठ पढ़ाया,
वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश
सारे जग को समझाया।

पर जन्मभूमि केवल गौरव नहीं—
इसका ऋण भी चुकाना है;
जिस मिट्टी ने जीवन दिया,
उसके काम हमें आना है।

यह मेरी कर्मभूमि है,
कर्म ही जिसकी पहचान,
निष्काम कर्म, सत्य और सेवा
जिसका सच्चा सम्मान।

खेतों में किसान तपता है,
सीमा पर सैनिक खड़ा,
वैज्ञानिक नव सृजन करे,
श्रमिक देश का भार उठा।

कोई काम छोटा नहीं,
कोई श्रम बेकार नहीं;
राष्ट्रहित से बढ़कर जग में
कोई और विचार नहीं।

अन्याय जहाँ दिखे, वहाँ
सत्य के साथ खड़े होना है,
भूखे, निर्बल, वंचित जन के
दुख को अपना दुख समझना है।
नारी का सम्मान सुरक्षित हो,
हर बच्चे का भविष्य सँवरे,
जाति-धर्म की दीवारें टूटें,
मानवता के दीप निखरें।

अधिकारों के साथ कर्तव्य भी
जीवन में स्वीकार करें;
संविधान और लोकतंत्र का
हर पल हम सम्मान करें।

यह मेरी पुण्यभूमि है,
आत्मा का तीर्थ महान,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में
एक ही ज्योति समान।

धर्म बने सद्भाव की भाषा,
प्रेम बने व्यवहार,
विविध रंगों में एक रहे
भारत का परिवार।

नदियाँ, वन, पर्वत, धरती—
सब अपनी धरोहर हैं;
इनकी रक्षा करना भी
राष्ट्रसेवा के स्वर हैं।

जल बचाएँ, वृक्ष लगाएँ,
धरती का सम्मान करें;
आने वाली पीढ़ी के हित
आज सही निर्माण करें।

भाषाएँ अनेक, वेश अनेक,
फिर भी भारत एक रहे;
'मैं' से ऊपर उठकर हर मन
'हम भारत' का भाव कहे।

भ्रष्टाचार, हिंसा, छल से
भारत को मुक्त बनाएँ,
ईमानदारी, श्रम और साहस से
राष्ट्र को आगे ले जाएँ।

युवा उठें तो देश उठेगा,
युवा ही इसकी शान हैं;
ज्ञान, चरित्र और अनुशासन
भारत की पहचान हैं।

जन्मभूमि से प्रेम करें,
कर्मभूमि का धर्म निभाएँ;
पुण्यभूमि की पावनता से
जीवन अपना धन्य बनाएँ।

न पद चाहिए, न यश चाहिए,
निज स्वार्थों का राज नहीं;
भारत के हित से बढ़कर
मेरे जीवन का काज नहीं।

जब तक तन में प्राण रहें,
भारत तेरा मान रहे;
मेरी हर साँस, हर कर्म में
माँ, तेरा ही नाम रहे।

भारत को केवल महान न कहें—
मिलकर भारत महान बनाएँ।
अपने कर्तव्य की ज्योति जलाएँ,
भारत का गौरव और बढ़ाएँ।

वंदे मातरम्!
भारत माता की जय!

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