अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, किसी को भी अपमानजनक व्यवहार का अधिकार नहीं देती

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने अगस्त 2026 में दिए अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र में राजनीतिक आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के खिलाफ अपमानजनक, अभद्र या मानहानिकारक भाषा का इस्तेमाल करना पूरी तरह से गैरकानूनी है। न्यायालय ने ज़ोर देकर कहा कि संविधान के तहत मिलने वाला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का लाइसेंस नहीं देता है। 

जस्टिस टी. अमरनाथ गौड़ और जस्टिस एस. दत्ता पुरकायस्थ की खंडपीठ ने सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने से इनकार करते हुए यह फैसला सुनाया। 

## कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें:

* संवैधानिक पद की गरिमा: अदालत ने कहा कि प्रधानमंत्री देश में एक उच्च संवैधानिक पद पर आसीन हैं। उनके नाम और उपनाम का मज़ाक उड़ाना या उनके खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना वैश्विक स्तर पर उनकी छवि को धूमिल करने के प्रयास जैसा है। 

* अभिव्यक्ति की आजादी असीमित नहीं: कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत उनकी पोस्ट को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण प्राप्त है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 19(2) मानहानि के खिलाफ उचित प्रतिबंध लगाता है। 

* साइबर मानहानि (Cyber Defamation): पीठ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान में लोग सोशल मीडिया का उपयोग अपने विचार व्यक्त करने के बजाय दूसरों की मानहानि और दुर्भावनापूर्ण सामग्री फैलाने के लिए अधिक करने लगे हैं। 

* आलोचना बनाम दुर्व्यवहार: कोर्ट के अनुसार, लोकतंत्र में सरकार या नीतियों की राजनीतिक आलोचना करना जायज है, लेकिन दुर्व्यवहार या अपमानजनक टिप्पणियां भारतीय कानून के दायरे से बाहर और दंडनीय हैं। 
-------------

त्रिपुरा हाईकोर्ट के समक्ष आए इस मामले में कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती (मून मून बिस्वास) पर आरोप था कि उन्होंने सोशल मीडिया (वीडियो और पोस्ट) के जरिए देश के प्रधानमंत्री [नरेंद्र मोदी] और अन्य प्रतिष्ठित हस्तियों पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। न्यायालय ने इन टिप्पणियों को प्रथम दृष्टया आपराधिक मानहानि (Criminal Defamation) और अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग माना। 

न्यायालय के आदेश और मामले के तथ्यों के आधार पर इसका पूर्ण व विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
## प्रधानमंत्री पर किस तरह की टिप्पणी की गई थी?
प्राथमिकी (FIR) और अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया पर वीडियो और पोस्ट साझा किए थे जिनमें निम्नलिखित बातें शामिल थीं:

* नाम और उपनाम (Surname) का मज़ाक: आरोपी ने वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अगरतला के मेयर दीपक मजूमदार के नामों और उपनामों (Surnames) का सीधे तौर पर मज़ाक उड़ाया था और उनका उपहास किया था। [6, 7] 
* वैश्विक स्तर पर छवि धूमिल करने का प्रयास: टिप्पणियों में ऐसी अभद्र, अपमानजनक और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया गया था, जिसका उद्देश्य प्रधानमंत्री और मेयर को वैश्विक स्तर पर बदनाम (Defame Globally) करना था।

* धार्मिक भावनाओं को ठेस: प्रधानमंत्री के अलावा, याचिकाकर्ता ने त्रिपुरा की प्रसिद्ध आराध्य देवी 'माता त्रिपुरेश्वरी' (माता त्रिपुरासुंदरी) के संबंध में भी आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं, जिससे राज्य के लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। 

------------------------------

## इसके बारे में न्यायालय ने क्या कहा? (विस्तृत कानूनी टिप्पणी)
न्यायमूर्ति डॉ. टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति एस. दत्ता पुरकायस्थ की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों को पूरी तरह खारिज करते हुए बेहद सख्त टिप्पणियां कीं: 

## 1. अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम मानहानि (Free Speech vs Defamation)
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि उनकी पोस्ट संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के तहत सुरक्षित हैं। इस पर कोर्ट ने कहा: 

"संविधान के तहत दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी नागरिक को दूसरों की व्यक्तिगत या व्यावसायिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का लाइसेंस नहीं देती है। ऐसी बिना विशेषाधिकार वाली टिप्पणियां मानहानि के दायरे में आती हैं।" 

## 2. आलोचना और दुर्व्यवहार में अंतर (Criticism vs Abuse)
अदालत ने लोकतंत्र में आलोचना के अधिकार को स्वीकार किया, लेकिन अमर्यादित भाषा की सीमा तय की: 

"भारत में प्रधानमंत्री का पद एक बेहद उच्च संवैधानिक पद है। लोकतंत्र में राजनीतिक आलोचना (Political Criticism) पूरी तरह स्वीकार्य है, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री को निशाना बनाकर अपमानजनक, अभद्र या मानहानिकारक भाषा का उपयोग करना पूरी तरह से गैरकानूनी (Illegal) है।" 

## 3. साइबर मानहानि (Cyber Defamation) पर चिंता
सोशल मीडिया के वर्तमान परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:

"आजकल लोग सोशल मीडिया का उपयोग रचनात्मक विचार व्यक्त करने के बजाय दूसरों के खिलाफ ऑनलाइन दुर्भावना फैलाने और साइबर मानहानि (Cyber Defamation) के लिए अधिक करने लगे हैं। सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी और अभद्र बातें बहुत तेजी से फैलती हैं और किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को पल भर में अपूरणीय क्षति पहुँचाती हैं।" 
------------------------------
## इस मामले की वर्तमान कानूनी स्थिति क्या है?

* केस रद्द करने से इनकार: त्रिपुरा हाईकोर्ट ने आरोपी महिला के खिलाफ दर्ज दो प्राथमिकी (FIR) और पुलिस द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया। 

* ट्रायल का सामना: कोर्ट ने कहा कि आरोपी के वीडियो और टिप्पणियां प्रथम दृष्टया आपराधिक मानहानि (भारतीय न्याय संहिता/IPC की धाराएं) और आईटी एक्ट (IT Act) के प्रावधानों के तहत अपराध की श्रेणी में आते हैं। इसलिए, मामले की सच्चाई का फैसला अब ट्रायल (निचली अदालत में मुकदमे) के दौरान ही होगा। 

* जमानत: आरोपी महिला को शुरुआत में जनवरी 2026 में अंतरिम जमानत मिली थी और बाद में चार्जशीट दाखिल होने के बाद स्थायी जमानत दे दी गई थी, लेकिन उन पर आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा। 



टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, मास्को जेल में..?

Daughter of Netaji Subhas Chandra Bose

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

राजस्थान के व्याबर जिले में देवमाली गांव,कैंसर का 'झाड़ा'

वीरांगना रानी अवंती बाई

तीसरी सहस्त्रावदी का ईसाई विस्तारवाद का आक्रमण हो चुका है

दशा माता पूजन Dasha Mata Puja