कविता - दरी बिछाये कार्यकर्ता, गद्दार करे जजमानी
कविता - दरी बिछाये कार्यकर्ता, जजमान बनें गद्दार
- अरविन्द सिसोदिया
दरी बिछाये कार्यकर्ता , गद्दार करे जजमानी,
वाहरी राजनीती तूनें अपनों को सगी न मानी ,
जनता से का का करेगी बेईमानी।
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जिंदाबाद-मुर्दाबाद में बीत गई सारी उम्र,
कार्यकर्ता फिर भी ढूंढता रहा अपना मुकाम
धूप में झंडा उठाया, बारिश में नारे लगाए,
अपनों के लिए जाने कितने जूते घिसाए।
दरी बिछाये वफादार, जजमान बनें गद्दार,
वाहरी राजनीती तू अपनों की सगी नहीं,
जनता का क्या करेगी हॉल।
=====2=====
जो कल तक देते थे गाली, आज गले के हार,
मौका मिलते ही बदल गए रिश्ते और विचार।
जिसने बुरे वक्त में साथ दिया,वो आज भी कतार ,
कल के विरोधी बने आपके दरबार
न कोई धरम कोई शरम न कोई ईमान।
कार्यकर्ता सीढ़ी बना, सब चढ़ गए आसमान,
मंजिल मिलते ही भूल गए उसका सारा एहसान।
=====3=====
दरी बिछाये वफादार जमान बनें गद्दार
वाहरी राजनीती तू अपनों की सगी नहीं,
जनता का क्या करेगी हॉल।
जिंदाबाद-मुर्दाबाद में बीत गई सारी उम्र,
फिर भी कार्यकर्ता ढूंढता रहा अपना मुकाम हर कदम।
धूप में झंडा उठाया, बारिश में नारे लगाए,
नेताओं की खातिर उसने अपने अरमान जलाए।
वफादार दरी पर बैठा, गद्दारों का मंच पर राज,
मेहनत करने वालों से पूछो—क्यों नहीं मिलता सम्मान आज?
जो कल तक देते थे गाली, आज गले मिलकर खास,
सत्ता की कुर्सी दिखी तो बदल गए सारे एहसास।
जिसने बुरे वक्त में साथ दिया, वो आज भी कतार में,
जो कल तक विरोधी थे, वो बैठे हैं दरबार में।
कार्यकर्ता सीढ़ी बना, सब चढ़ गए आसमान,
मंजिल मिलते ही भूल गए उसी सीढ़ी का एहसान।
वाह रे राजनीति! तेरा भी अजब इंतजाम—
वफादारी को दरी, और गद्दारी को मिलता मुकाम।
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