दिमागी नक्सलवाद

प्रेस विज्ञप्ति 

लोकतंत्र, संविधान और राष्ट्रविरोधी व्यवहार ही दिमागी नक्सलवाद — अरविन्द सिसोदिया

कोटा, 18 अगस्त। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल से जुड़े शिक्षा-प्रोत्साहन न्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लालकिले की प्राचीर से दिए गए संबोधन में प्रयुक्त “दिमागी नक्सलवाद” शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि यह शब्द केवल हिंसक नक्सली गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन वैचारिक प्रवृत्तियों की ओर भी संकेत करता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं, राष्ट्रीय एकता और भारत की संप्रभुता को कमजोर करने का प्रयास करती हैं।

सिसोदिया ने कहा कि प्रधानमंत्री का “दिमागी नक्सलवाद” से सावधान रहने का आह्वान वर्तमान समय में अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत ने लंबे समय तक हिंसक वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद की चुनौती का सामना किया है। सरकार के सुरक्षा, विकास और प्रशासनिक प्रयासों के कारण देश के अनेक क्षेत्रों में इस हिंसक चुनौती को काफी हद तक नियंत्रित किया गया है। किंतु किसी भी हिंसक विचारधारा की चुनौती केवल हथियारों के समाप्त हो जाने से पूरी तरह समाप्त नहीं होती; उसके पीछे मौजूद वैचारिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों पर भी लोकतांत्रिक ढंग से विमर्श आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र, संविधान, राष्ट्रीय एकता और विधि के शासन को नकारने वाली किसी भी प्रवृत्ति का विरोध किया जाना चाहिए। नक्सलवाद का हिंसक स्वरूप सशस्त्र संघर्ष, राज्य व्यवस्था के विरुद्ध हिंसा और अराजकता के रूप में सामने आया। उसी प्रकार यदि कोई विचारधारा लोकतांत्रिक संस्थाओं को अस्वीकार करने, संवैधानिक प्रक्रिया को कमजोर करने, हिंसा को वैध ठहराने अथवा भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता के विरुद्ध वातावरण बनाने का प्रयास करती है, तो उसका लोकतांत्रिक समाज में वैचारिक स्तर पर भी प्रतिरोध आवश्यक है।

सिसोदिया ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति, असहमति और शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधि का अधिकार देता है। इसलिए सरकार की आलोचना, नीतियों का विरोध, संसद में बहस, धरना-प्रदर्शन और लोकतांत्रिक असहमति को राष्ट्रविरोधी कहना उचित नहीं है। लोकतंत्र की शक्ति ही इस बात में है कि सत्ता की नीतियों पर प्रश्न पूछे जा सकें और विपक्ष अपनी वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत कर सके। लेकिन असहमति और राष्ट्रविरोध, आलोचना और अपमान, राजनीतिक संघर्ष और हिंसक अराजकता के बीच अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि समय-समय पर सार्वजनिक मंचों पर लगाए गए कुछ ऐसे नारे और दिए गए वक्तव्य, जिनमें भारत के विखंडन, हिंसा अथवा राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के समर्थन की भावना दिखाई देती है, गंभीर सार्वजनिक विमर्श का विषय हैं। उन्होंने उदाहरण के रूप में “भारत तेरे टुकड़े होंगे”, “कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी”, “भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी”, “हमें क्या चाहिए—आजादी” जैसे नारों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे नारों का मूल्यांकन उनके संदर्भ, उद्देश्य और वास्तविक प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति या समूह के विरुद्ध आरोप तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित होने चाहिए तथा लोकतांत्रिक एवं न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान किया जाना चाहिए।

सिसोदिया ने कहा कि इसी प्रकार “ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद”, “मनुवाद मुर्दाबाद”, “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद”, “पूंजीवाद मुर्दाबाद” जैसे नारों को भी व्यापक वैचारिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। किसी सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक विचारधारा या राजनीतिक सिद्धांत की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन यदि कोई विचार या आंदोलन संविधान-विरोधी, हिंसक अथवा समाज में वैमनस्य और विघटन को बढ़ावा देने वाली दिशा में जाता है, तो उस पर गंभीर बहस आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भारत में वामपंथ की अनेक लोकतांत्रिक धाराएँ चुनाव, संसद और संवैधानिक व्यवस्था में विश्वास रखते हुए सक्रिय रही हैं। इसलिए हर वामपंथी, हर कम्युनिस्ट या सरकार के हर आलोचक को “दिमागी नक्सली” कहना न तो उचित होगा और न ही लोकतांत्रिक दृष्टि से सही। “दिमागी नक्सलवाद” की चर्चा उन विशिष्ट प्रवृत्तियों के संदर्भ में होनी चाहिए जो हिंसा, अराजकता, संवैधानिक व्यवस्था के अस्वीकार या राष्ट्र की एकता-अखंडता को कमजोर करने की दिशा में जाती हैं।

सिसोदिया ने कहा कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों के शीर्ष नेताओं द्वारा विदेशों में भारत की आंतरिक राजनीति पर की गई टिप्पणियों को भी इसी लोकतांत्रिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए। विदेश में सरकार की आलोचना करना अपने आप में राष्ट्रविरोधी नहीं है, क्योंकि लोकतांत्रिक नेताओं को अपनी राजनीतिक राय रखने का अधिकार है। लेकिन यदि कोई सार्वजनिक वक्तव्य जानबूझकर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं, संवैधानिक पदों अथवा देश की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा को कमजोर करने की दिशा में जाता है, तो उसकी आलोचना और तथ्याधारित समीक्षा होना स्वाभाविक है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रहित और राजनीतिक दलगत हित एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। सरकार बदल सकती है, राजनीतिक दल बदल सकते हैं और नीतियों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाएँ, न्यायपालिका, संसद, निर्वाचन व्यवस्था और भारत की संप्रभुता जैसी मूल संस्थाएँ पूरे राष्ट्र की साझा धरोहर हैं। राजनीतिक संघर्ष इन संस्थाओं को मजबूत करने वाला होना चाहिए, उन्हें कमजोर करने वाला नहीं।

सिसोदिया ने कहा कि संसद और विधानसभाओं में तीखी बहस लोकतंत्र की आवश्यकता है। सरकार की कमियों को उजागर करना, विपक्ष की नीतियों की आलोचना करना, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक विफलताओं पर प्रश्न उठाना और जनता के मुद्दों को सदन में मजबूती से उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। किंतु व्यक्तिगत अपमान, गाली-गलौज, असंसदीय भाषा, चरित्र पर अनावश्यक प्रहार, तथ्यहीन आरोप और संस्थाओं के प्रति लगातार अवमाननापूर्ण व्यवहार लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता को गिराते हैं।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध कीजिए, लेकिन हिंसा का समर्थन मत कीजिए; सरकार की आलोचना कीजिए, लेकिन संविधान को कमजोर मत कीजिए; सत्ता से असहमति रखिए, लेकिन राष्ट्र की एकता और अखंडता को चुनौती मत दीजिए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक आचरण की मूल भावना है।

सिसोदिया ने कहा कि “दिमागी नक्सलवाद” का मुकाबला दमन से नहीं, बल्कि संविधान, शिक्षा, तर्क, तथ्य, लोकतांत्रिक संवाद और राष्ट्रहित की सकारात्मक चेतना से किया जाना चाहिए। युवाओं को किसी भी विचारधारा को आंख बंद करके स्वीकार करने के बजाय उसके इतिहास, परिणाम और संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर परखने की शिक्षा दी जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता, लोकतांत्रिक परंपरा और संविधान में निहित है। मतभेद भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता हैं। आवश्यकता इस बात की है कि मतभेदों को वैचारिक संघर्ष तक सीमित रखा जाए और उन्हें हिंसा, अराजकता अथवा राष्ट्र-विघटन की दिशा में जाने से रोका जाए।

सिसोदिया ने अंत में कहा कि भारत में लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है; यह संविधान में आस्था, कानून के शासन का सम्मान, शांतिपूर्ण असहमति, संस्थाओं की गरिमा, नागरिक अधिकारों और राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्धता का समग्र स्वरूप है। जो भी विचारधारा इन मूल्यों को मजबूत करती है, वह लोकतंत्र की सहयोगी है; और जो प्रवृत्ति हिंसा, अराजकता, संवैधानिक अस्वीकार अथवा राष्ट्र की एकता को कमजोर करने की दिशा में जाती है, उसके प्रति समाज को सजग रहना होगा। यही “दिमागी नक्सलवाद” के विरुद्ध वास्तविक वैचारिक लड़ाई है।

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